Latest / Baba ji Vijay Vats / 29 Dec 24 - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। आश्चर्य? आश्चर्य तुम्हें रहस्य तक ले जाएगा! गीता
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- 0:21कल मैंने कहा कि उस स्तर पर जाकर पता चलता है कि सह काम।
- 0:34और निष्काम कर्म क्या होते हैं उससे पहले पता ही नहीं चलता।
- 0:46मात्र व्याख्याएं बुद्धि के होते हैं।
- 0:55इसलिए अगर ठीक ठीक से बोला जाए तो यही बोला जा सकता है कि
- 1:04आध्यात्मिकता में प्रश्न कोई ना करना।
- 1:11क्योंकि आध्यात्मिकता के सारे प्रश्न बेकार अर्थहीन हैं।
- 1:23अध्यात्म प्रश्न कोई होता ही नहीं।
- 1:29गड़बड़ी कहाँ होती है? गड़बड़ी होती है हमारी सुद्र भाषा
- 1:35में मैंने बहुत बार आपसे कहा है। हमारी जरूरत कुछ और है।
- 1:50हमारी कामना कुछ और है। इन दो शब्दों को शायद आप समझने पर
- 1:55है। हमारी जरूरत वो नहीं है जो हमारी
- 2:05कामना है। हमारी कामनाएं सदैव।
- 2:10हमारी जरूरत से अलग होती है। भगवान कृष्ण बड़ा सुन्दर शब्द
- 2:19बोलते हैं इसलिए यह श्लोक इतना गहरा जा रहा है इतना लंबा जा रहा
- 2:30है। कर्म ने वादे का रस्ते तुझे सिर्फ
- 2:36कर्म करने का अधिकार है, शुक्र करो, कृष्ण ने यह शब्द बोल दिया।
- 2:49क्योंकि इतना तो बोलना जरूरी भी था।
- 2:55युद्ध क्षेत्र में कम्पत्ति हुए अर्जुन को कुछ तो कहना ही था कर्म
- 3:04करना तेरा अधिकार है। बस अधिकार है तेरा कर्म करना आगे
- 3:14फल क्या होगा तेरा गुरु मरेगा तेरा पिता मैं मरेगा तेरे भाई
- 3:21मरेंगे तेरी भाभियाँ विधवा हो जाएंगी।
- 3:29यार तुझे क्या पता तू मरेगा तुझे पता है कृष्ण यही कहना चाहते हैं
- 3:38कि तू अन्सर्टन्टी में उतर जा, अनिश्चितता में उतर जा और कर्म
- 3:44कर। परिणाम क्या होगा?
- 3:48न तुझे मालूम है न सामने खड़े वालों को मालूम है परिणाम उसको
- 3:55पता है जो परिणाम देता है दूसरा शब्द है।
- 4:05कर्मण्य वाधिका रस्ते माँ फलेशु कदाचन।
- 4:11फल की कामना क्यों न कर क्योंकि फल की कामना तू कामना कर सकता है,
- 4:20असली फल उसका क्या होगा? जो तुने कर्म किया वो तो नहीं
- 4:24जमता। यही गड़बड़ी है वस्तु तय अगरबुद्ध
- 4:35इस जगह पे आकर रुक जाते हैं कि शांति मिल गई तो खोज पूरी हो गई।
- 4:46एक हिसाब से बिल्कुल ठीक बुध अगर यहाँ आकर रुक जाते हैं, आगे नहीं
- 4:54जाते हैं तो एक हिसाब से ठीक कहते हैं।
- 5:00बुद्ध कहते हैं यहाँ आकर तुम्हारी जरूरतें पूरी हो जाती हैं।
- 5:13मैं दुखी था। मैं कष्टों की स्थिति में था,
- 5:21अपना जीवन बनाने चला था। अपना भविष्य निर्माण करने चला था।
- 5:30मैं कॉलेज में पढ़ने जाता था, सपने थे, कल्पनाएं थी, डॉक्टर
- 5:42बनूँगा? बड़ा डॉक्टर बनूँगा सेवा करूँगा
- 5:51मानवता की और गुजर बसर भी अच्छा हो जाएगा।
- 5:58सम्मान भी बढ़िया मिलेगा और। ज्ञान भी अच्छा होगा।
- 6:10क्या मुझे पता था 1 दिन ऐसा वेला आएगा, सब उलट पुलट हो जाएगा।
- 6:25नहीं पता था किसे पता था उस विराट को पता है, हम समझ नहीं पाते हम
- 6:38इतने अज्ञानी हैं, हम समझ नहीं पाते।
- 6:45शायद हम इस सृष्टि को भर आँखों से देखते हैं, ये विराट हिमालय है।
- 6:54ये सुमेरु, ये विशाल पृथ्वी। और जिसे हम विशाल कहते हैं, उससे
- 7:05अति विशाल सूरज सूरज में सैकड़ों पृथ्वीयन सुना सकते हैं।
- 7:16चाँद, तारे, ग्रह, नक्षत्र। ये हवाएं और हवा के भीतर की 21%
- 7:29प्रतिशत ऑक्सीजन, 78% नाइट्रोजन और 1% बाकी की हवाएं।
- 7:44यह मिलान कितना शानदार सूरज की अल्ट्रावॉयलेट किरणों से बचाता
- 7:50है। ओजोन ओजोन की परत हमारे ऊपर ढकी
- 7:54हुई है। यह व्यवस्था किसने की?
- 8:05कुछ लोग कह देते हैं जब हमने एक सैभम पर आकर रुक ही जाना है तो
- 8:12क्यों ना प्रकृति पर रुक जाए? बात उनकी इजाजती है, वैज्ञानिक के
- 8:18हिसाब से जाती है। हम कहते हैं ये सब कुछ किसने
- 8:24बनाया कहता जब सब कुछ परमात्मा ने बनाया तो परमात्मा को किसने
- 8:33बनाया, वह आदमी फंस जाता है क्या कहे, बड़े परमात्मा ने बनाया तो
- 8:40फिर उसको किसने बनाया? प्रश्न कभी खत्म नहीं होता है और
- 8:49मनुष्यता ने अल्फाबेट क्या इजाद किया?
- 8:59मनुष्यता ने शब्द क्या इजाद किए? एक गलती खा बैठी मनुष्यता गलती ये
- 9:08खा बैठी के मानव ने समझ लिया कि सब समाज आएगा हमारी ही बनाई हुई
- 9:16लिपियों में। काश ये समय पता वह इतना शुद्र
- 9:24नहीं है कि तुम्हारी शुद्र लिपियों में समाचार है, ये बहुत
- 9:33विराट है। इसलिए मैं अक्सर कहता हूँ और सभी
- 9:41कहते हैं सभी संत यही बात कहते हैं, हम बोलते हैं लेकिन बोलने के
- 9:48बाद हम पछताते हैं। क्यों पछताते इसलिए हैं?
- 9:57कि वह तो नहीं बोला क्या जिसे हम बोलना चाहते थे इच्छा हमारी कुछ
- 10:05और है। बोला कुछ और जाता है जो वेद बोलते
- 10:12हैं वह बकवास और जो मैं बोलता हूँ।
- 10:17वो भी बकवास लिपियों से जो बोला तोला गया वह बकवास के अलावा और
- 10:27कुछ होता ही नहीं, क्योंकि लिपियों में वह समर्थन है।
- 10:38और तुम ऐसे हो की तुम शब्दों को पकड़ कर शब्दों की फिलॉसोफिकल
- 10:46लाइन में घुस जाते हो बाबा तुमने बाबा ऐसा कहा तो इसके हिसाब से तो
- 10:53ये हुआ और इसके हिसाब से फिर ये होना चाहिए।
- 10:57यहाँ हिसाब नहीं काम करते बेटा ईश्वर के सृष्टि में हिसाब नहीं
- 11:06काम करते। मेरी बात मानो तो हिसाब किताब को
- 11:15छोड़ दो। मैं सदा से कहता हूँ के हिसाब
- 11:19किताब करने वाली बुद्धि को छोड़ दो यह तुम्हें उलझाने के सिवा और
- 11:26कुछ न देखें शब्द जाल में तुम मिले जाओगे सत्य से तुम मंजु।
- 11:38शब्द तुम्हें और कुछ नहीं देंगे शब्द तुम्हें अपने जाल में
- 11:42उलझालेंगे और सत्य से तुम्हें वंचित कर देंगे।
- 11:47भला इसी में है कि तुम शब्दों को छोड़ दो मौन हो जाओ।
- 11:55शब्दों ही ने तो हमारा इतना वक्त खराब कर दिया।
- 12:01शब्दों ही ने तो सत्य को इतना बिगाड़ दिया कि आज लोग इतनी
- 12:07शुद्रता व्याप है, ढोल पीटते हैं, बाजारों में नाचते हैं, गाते हैं।
- 12:17हरे रामा हरे कृष्ण यह एक तरह का पागलपन है।
- 12:28इससे अगर कुछ मिलेगा तो संगीत के कारण जो पाम तुम्हारे।
- 12:37उठेंगे छन छनेंगे बस वो ही कुछ मिलेगा और कुछ नहीं मिलेगा मेरी
- 12:48तमन्ना इधर ही रहेंगी बनना क्या चाहता था?
- 12:55लेकिन आज मैं दूसरे शब्द का विस्तार कर रहा हूँ ध्यान से
- 12:58समझना। माँ फरेशु कदाचन।
- 13:05उसने कुछ और करना था, मैं कुछ और करना चाहता था।
- 13:15मेरी जरूरत कुछ और थी। जी और मैं मांग कुछ और रहा था तुम
- 13:24भी ऐसे हो, तुम्हारी भी जरूरत कुछ और है और तुम मांग कुछ और रह रहे
- 13:31हो एक शब्द आता है गड़बड़ी में। बहुत बार बोला कर्मी आ गए कपड़ा
- 13:41नदरी मोख दवार उस विराट ने कृपा करते कब किस पर बरस जाए, कोई पता
- 13:53नहीं। तुम उसको लाना नहीं दे सकते,
- 13:59मुझपे क्यों नहीं बरसा वह पाबंध नहीं है तुम्हारे प्रश्नों का
- 14:05जवाब देने का वो पाबंध नहीं ना दे।
- 14:09जवाब तुम क्या करोगे? तुम ज्यादा से ज्यादा मार्कर्स बन
- 14:14सकते हो। तुम कह सकते हो वह है ही नहीं,
- 14:19चारवाक बन सकते हो, नीचे बन सकते हो, स्टालिन बन सकते हो, मोसोलिन
- 14:25ही बन सकते हो, हीटर बन सकते हो, लेकिन वह तुम्हारी आज्ञा मानने का
- 14:33पाबंद नहीं है। मैं कुछ और चाहता था वह कुछ और
- 14:42चाहता था उसने नजर उसने अपनी कृपा बिखेर दी मेरे पे।
- 14:55और वो दिन मुझे याद है वो दिन मेरे जीवन के दुखों का आखिरी दिन
- 15:04था। क्यों?
- 15:07जब आश्चर्य की सीमा शुरू हो जाती है अब इन शब्दों को आप।
- 15:12अंडरलाइन कर लेना। सर्कल में जब आश्चर्य की सीमा
- 15:17शुरू हो जाती है तो आनंद की सीमा भी साथ में शुरू हो जाती है।
- 15:26जहाँ आश्चर्य है वहाँ आनंद है। जहाँ आश्चर्य नहीं है वहाँ आनंद
- 15:35नहीं है और बुद्धि, बुद्धि हिसाब किताब करती है, आश्चर्य में नहीं
- 15:42उड़ती बुद्धि यह कह के बात टाल देती है।
- 15:48कि आज ये लगता है आश्चर्य जैसा लेकिन कल खोज लिया जाएगा, ये कह
- 15:56के पिंडा छुड़ा लेती है लेकिन आज जो अश्चर्य है।
- 16:05अगर तुम्हारे जीवन में आश्चर्य शुरू हो जाये वंडर तो तुम धन्यवाद
- 16:12होये क्योंकि आश्चर्य तुम्हें रहस्य तक ले जायेगा।
- 16:20ये शब्द बहुत गहरे हैं। इनको बड़ी शान्ति से एकांत में
- 16:33पूर्ण विश्राम की स्थिति में बैठ के सुनोगे तो ये भीतर उतर जाएंगे।
- 16:43तुम समझते हो? कि शायद हमारे सभी सवालों का जवाब
- 16:49मिल जाएगा नहीं मिलेगा प्रश्न पूछा है।
- 17:05विजय पहवा, प्रभु। आपने आज के वीडियो में कहा कि
- 17:14बराट ही खेल रहा है, हम खिलौने हैं, वही खिलाड़ी हैं।
- 17:28इधर आपने गलत फैसले और सही फैसले की बात कही पश्चात आपकी बात कही।
- 17:55आपने कहा कि जो आदेश अंदर से आता है वह बाहर आकर क्रियान्वित हो
- 18:02जाता है। तो अगर हम खिलौने ही हैं तो
- 18:10इसमें। हमारा हाथ होना प्रभु यह बात समझ
- 18:18में आई नहीं समझाने की कोशिश करें कृपा करें पल पल पर।
- 18:32ऐसी दुविधाएं आती रहेंगी। ये पुत्र तुम्हारा पहला प्रश्न
- 18:44नहीं है ऐसे हजारों हजारों प्रश्न मेरे पास आ चूके हैं।
- 18:54बुद्धि के प्रश्न अभी इस शब्द को थोड़ा सा अंडरलाइन कर लो।
- 19:03बुद्धि के सारे प्रश्नों के जवाब कोई नहीं दे सकता।
- 19:12अगर किसी ने कहा हो कि मैं बुद्धि के उत्पन्न हुए सभी प्रश्नों का
- 19:17जवाब दे दूंगा या दे दिए तो कृपया करके मुझे उस महान पुरुष का नाम
- 19:24अवश्य बता देना क्यों? क्योंकि मैं उसे पागलों की सूची
- 19:30में डाल दूँ। सभी प्रश्नों का जवाब दिया ही
- 19:40नहीं जा सकता। मुझसे अगर सही पूछोगे तो किसी भी
- 19:47प्रश्न का जवाब नहीं दिया जा सकता।
- 19:54हम जदा कदा किसी भी तरह तो हमें उस मुकाम पे ले जाना चाहते हैं
- 20:03जहाँ तुम जाकर खुद अपनी आँखों से अनुभव कर लो।
- 20:08हम तुम्हें कुछ मानने की बात नहीं कहते, तुम क्यों मान रहे हो?
- 20:14मैंने कह दिया बिल्कुल ठीक कह दिया, वह करवाता है और तुम करते
- 20:21हो और मैंने कहा उसे जंक्चर पार्टी के ऊपर जाके देखो।
- 20:27और वहाँ जाकर तुम्हें परमात्मा के आदेश मिलेंगे और बाहर आकर तुम
- 20:35देखोगे वो ही कार्यान्वित हो रहे हैं तो मैं तुमसे पूछता हूँ विजय
- 20:42पहावा जी क्या तुम उस जंक्चर पैंट पे गए?
- 20:53यहीं बैठे बैठे खोपड़ी में हिसाब किताब लगाए जाते हो।
- 21:02और ये पूरी मानवता दुखी क्यों है? कभी तुमने समझा इस बात को?
- 21:11पूरी मानवता दुखी है कि तुम्हारे वाला फॉर्मूला ही अपना रहे हैं।
- 21:17संत कहते हैं मत मानो वहाँ जाके देखो क्योंकि देखने से ही तृप्ति
- 21:25हो गई देखने से ही सत्य। परिपूर्ण विश्वसनीय हो जाएगा।
- 21:34देखने से ही विश्वास श्रद्धा में तब्दील होगा।
- 21:42मैंने तो दूसरी बात भी कही थी कि जंक्चर पॉइंट पे जब तुम जाओगे।
- 21:50तो वहाँ जाकर तुम परमात्मा के आदेश आते हुए पाओगे तो मिस्टर
- 21:56विजय पावा, तुम उस जंक्चर पॉइंट पे गए तो फिर सवाल क्यों किया?
- 22:09खोपड़ी में बैठे बैठे तो मैं 1000 बार कह चुका हूँ, किसी भी प्रश्न
- 22:15को निकाल देना मुझसे बड़ा आसान है।
- 22:22अब कहने वालों ने तो बड़े आराम से कह दिया परमात्मा है ही नहीं।
- 22:31मार्कर्स ने कहा, नीचे ने कहा चरवाक ने कहा और आंधी, दुनिया से
- 22:38ज्यादा दुनिया नास्तिक है प्रत्यक्ष और मैं सही बोलूं तो
- 22:47सारी दुनिया नास्तिक है। अप्रत्यक्ष।
- 22:53कुछ इतने ज्यादा समझदार और बहादुर होते हैं कि साफ कह देते हैं कि
- 23:03नहीं है परमात्मा जी बहादुर की बात है, ये भी एक साहस है।
- 23:17परमात्मा नहीं है, ये कहना एक साहस भी है, ईमानदारी भी है कहीं
- 23:28तुम शाम को सुबह को मंदिर में जाने वाले तो नहीं हो?
- 23:36किसी गुरु, पीर, दरगाह, तीर्थ के ऊपर विश्वास करके जाने वालों में
- 23:41से तो नहीं हो फिर तुम मुड़ हो क्योंकि तुमने बिना जाने सत्य
- 23:51कहीं हुई बातों का? अनुपालन करना शुरू कर दिया।
- 23:59मैंने तो दूसरी बात भी कही थी और मैंने इस अंदाज में दूसरी बात कही
- 24:05थी कि शायद तुम दूसरी बात मान कर वहाँ चले जाओ।
- 24:11और तुम्हें ये प्रश्न करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
- 24:17आज जो तुमने ये प्रश्न किया है, यह सिर्फ बुद्धि के ऊपर बैठे बैठे
- 24:24नीचे ना उतर पाने की साहस करने की वजह से यह प्रश्न।
- 24:29जों का तू धरा रह गया। कबीर भी कहते हैं जिन खोजा दिन
- 24:36पानी तुमने खोजा बिना खोजे तुम जवाब पाना चाहते हो और हम पहले ही
- 24:47बोल चूके हैं ते खोजो। वहाँ जाओगे तो पाओगे परमात्मा के
- 24:53आदेश आते हुए तुम वहाँ गए गए तो है नहीं पक्का पता है क्योंकि अगर
- 25:03तुम चले गए होते। तो कौन सा संत है जिसने कहा कि
- 25:09अपने भीतर जाके समाधि किसे कहते हैं?
- 25:15समाधि का अर्थ है जहाँ सब प्रश्नों का समाधान हो जाता है,
- 25:22वहाँ सारे प्रश्नों का जवाब नहीं मिलता।
- 25:26वहाँ सभी दुखों का भी समाधान हो जाता है।
- 25:33तुम शब्द समाधि यह जानते हो यह रट लिया है तुमने रोए रोए में
- 25:41तुम्हारे समाधि शब्द की आभा फैल रही है।
- 25:47समाधि है क्या ये तुम्हें कोई पता नहीं है?
- 25:50प्रश्न तुम उठा सकते हो समाधि लेकिन संत कहते हैं के शब्दों की
- 26:00हेरा फेरी करने के बजाए। अगर तुम भीतर ही उतर जाके सत्य को
- 26:07देख ही ये लो अपनी नगन आँखों से तो तुम्हारा मसला हल न हो जाएगा
- 26:15इतनी जो तुम सर जुगाई करते हो टाँट खुजलाते हो और तुम्हें कुछ
- 26:22मिलता नहीं। कृष्ण कहते हैं कि तुम कर्म करो
- 26:31कर मरने व अधिकार थे कर्म तो तुने किया नहीं, मैंने भी कल यही बोला
- 26:42मैं भूलता नहीं हूँ ध्यान रखना। और सत्य को कभी बुलाया भी नहीं जा
- 26:47सकता। मैंने यह कहा कि जब तुम अपने भीतर
- 26:52उस तल पर जाओगे, जंक्चर प्वाइंट से थोड़ा नीचे तो परमात्मा के
- 26:58आदेश तुम्हें सुनाई पड़ेंगे, तुम गए नहीं गए।
- 27:05मुझे पता है तुम कुछ भी कह सकते हो कि हाँ, मैं गया नहीं गए तुम
- 27:13क्योंकि बखूबी मैं जानता हूँ, अगर तुम गए होते तो आज ये प्रश्न नहीं
- 27:19उठता और तुम जैसे पता नहीं कितने मूर्ख।
- 27:25वो जैसे प्रश्न कर देते हैं, भरे रहते हैं, व्हाट्सएप भरा रहता है,
- 27:31इन प्रश्नों से उतरते हैं नहीं तुम भीतर बस यही कबीर बड़ा
- 27:40व्यंग्य करते हैं भीतर। तुम्हारे न उतरने के कारण कबीर
- 27:47कहते हैं मैं व बुरा हूँ डंडरा गए हो किनारे बैठ मैं बेचारा हूँ ये
- 27:56व्यंग्य है कबीर का तुम समझ नहीं पर।
- 28:01मैं बेचारा मैं पूरा बूढ़न डरा मैं कमजोर वृद्ध, अशक्त निर्भर डर
- 28:10गया गयो किनारे बैठ बुद्धि के ऊपर ही बैठा रहा।
- 28:20वही तुमने किया जीस बात के ऊपर व्यंग्य कसते हैं कबीर उसी को तुम
- 28:29साक्षात किए दे रहे हो और तुम्हारा कसूर कोई नहीं तुम
- 28:36बेकसूर। जिंदगियां बीतती जाएंगी।
- 28:43वक्त अपनी चाल से चलता जाएगा। ऐसे ही तुमने इतने जन्म बर्बाद
- 28:50नहीं कर दिए हैं। ये तुम खोपड़ी के ऊपर बैठे बैठे
- 28:56मैं बपुरा बुडन डरा मैं डर गया। तुम मरने से ठीक हो, क्योंकि
- 29:03तुम्हारा अहंकार भरी भाँति जानता है।
- 29:06अगर उस जंक्चर पॉइंट के भीतर में गया तो मैं तो गया और कबीर बड़े
- 29:17समय जा रहे हैं। कबीर कहते हैं।
- 29:23जेतों प्रेम मिलन की चा। जेतों प्रेम मिलन की चा शी स
- 29:53तलीधर। शीश थलीधर, घर मेरे आऊं घर मेरे
- 30:09आऊं जीतू प्रेम मिलन। कि इच्छा मरना स्वीकार करना होगा।
- 30:25बहुत प्रवचनों में मैंने इन्हीं पुराने एक दो प्रवचनों में बड़ा
- 30:30बोला कि देखिए या तो इधर जाना ही ना।
- 30:37लेकिन ये रास्ता इतना रशीला है, इतना चुम्बक की तरह खींचता है।
- 30:44मैग्नेटिक को रुका भी नहीं जाता। जाने का मन भी करता है और शी
- 30:54सहतेली पे भी नहीं रखा जाता। तुम कोई बीच का उपाय ढूंढ़ते हो?
- 31:03मैं भलीभाँति जानता हूँ मिस्टर विजय पावा इन्हें गलियों से मैं
- 31:09खेलता खेलता गुजरता धूल दवान से लिवडा तिवडा।
- 31:16मैं भी इन्हीं व्याधियों से ग्रस्त रहा हूँ।
- 31:22इसलिए मुझे इन सभी अनुभवों का अच्छी तरह से मैं तुम्हारी ये
- 31:29बचने की कोशिश मैंने भी की थी। इसीलिए जो मष्ट मष्ट से होता है
- 31:42वह बखूबी जानता है कि यह व्यक्ति जो तर्क दे रहा है, जो प्रश्न कर
- 31:47रहा है, उसका कारण क्या है? कारण तो एक ही होता है तर्क देने
- 31:53के पीछे। या प्रश्न पूछने के पीछे एक ही
- 31:58कारण होता है। तुम अपने आप को बलिदान करने में
- 32:05असहाय महसूस करते हो, तुम डरते हो मृत्यु से घबराने वाले काया लोग।
- 32:13संतत्व को उपलब्ध नहीं हो पाते हैं।
- 32:18तुम चाहते हो कि हम संतत्व को भी उपलब्ध हो जाएं और ऐसे ही बने रहे
- 32:24जैसे हैं मूर्खपंथी उल्लू पंथी हम हमारे।
- 32:34भ्रम को संघ लेके संत हो जाएं मुश्किल है वरुण असंभव है
- 32:43इम्पॉसिबल तुम ये चाहते हो कि हमारा इलिवसन भी बचा रहे।
- 32:55और हम संत भी हो जाए, हम उस जंक्चर प्वाइंट पे पहुँच जाए जहाँ
- 33:00परमात्मा के आदेश आते है। तुम दोनों तरफ के स्वाद चाहते हो?
- 33:10मिलता है। एक तरफ का बिनय दुविधा में दोनों
- 33:15गए माया मिलि न राम तुम्हारी उलझन का ये नतीजा निकलता है न?
- 33:24तुम राम की मिठास को चख पाते हो। न तुम माया के स्वाद को चखवाते
- 33:31हो, ये संत तुम्हें ऐसे बहक आते हैं, शराब मत पीओ, जुआ मत खेलो,
- 33:42ये मत करो वो मत करो ये कमेंट्स तुम्हारे सर के ऊपर।
- 33:48थोप देते हैं। तुम्हें ये करने नहीं देते और
- 33:52परमात्मा तक शीज कटाने की तुम्हारी जरूरत नहीं होती।
- 33:56तुम बीच में फंसते हो, पेंडुलम की तरह लटके रह जाते हो।
- 34:08देव तुम्हें कुछ नहीं मिलता ऐसे बहुत से प्रश्नों का मैं जवाब दे
- 34:21चुका हूँ। शब्द नए नए हो जाते हैं, ढंग नए
- 34:28नए हो जाते हैं। पूछने वाले नाम बदल जाते हैं,
- 34:36लेकिन बात वही रहती है। तुम जो पूछना चाहते हो वो पूछा
- 34:42कहा गया, मैंने जो कहा वो तो तुमने पकड़ लिया।
- 34:50और मैंने जो कहा दूसरी बात वो तुमने पकड़ी नहीं।
- 34:55मैंने ये भी तो कहा, शायद न सुना हो, कहीं कोई पास वगैरह तो नहीं
- 35:01हो गया था? फरीदबार से वीडियो सुन लो।
- 35:08मैंने कहा जब तुम उस जंक्चर प्लांट पर पहुँचोगे तो तुम्हें
- 35:14परमात्मा के आदेश सुनाई पड़ेंगे और फिर तुम इधर देखोगे परमात्मा
- 35:22के आदेश आते हुए। और बाहर देखोगे उनको क्रियान्वित
- 35:27होते हुए वहीं कहते हैं कि वह जो करता है ठीक करता है और भले के
- 35:40लिए करता है। कृष्ण कहते हैं जो मैं करता हूँ
- 35:46ठीक करता हूँ इसलिए तू क्यों जखाई मार रहा है?
- 35:50संसार में तो मेरे ही अर्पित हो जा करना तो कुछ न कुछ पड़ेगा
- 35:57तुम्हें बिना किये तो तू रह नहीं सकता ये बिल्कुल सत्य है बात।
- 36:05बिना किये तू रह नहीं सकता, चाहे गलियों की खाक छानो कहीं किसी
- 36:11दफ्तर में बैठ कर बॉस बन जाओ, करोगे तो कुछ न कुछ चाहे सड़कों
- 36:17के चक्कर लगाओ, चाहे किसी ऑफिस का कामकाज संभालो।
- 36:23कुछ न कुछ करते ही रहोगे तो कृष्ण कहते हैं जब तुम करोगी ही तो
- 36:29क्यों नहीं तुम मेरे ढंग से कर लेते मुझको समर्पित हो के कर लेते
- 36:35हैं। तुम जरूर ही सहकाम काम करना है,
- 36:40तुम निष्काम काम कर लो। लेकिन निष्काम काम करना तुम्हारे
- 36:45बलबूते की बात नहीं है और मैं अच्छी तरह से जानता हूँ।
- 36:50मिस्टर विजय पावा तुम कभी नहीं पहुँच पाओगे क्यों?
- 37:00क्योंकि मरने का साहस तो हम कायरों में है।
- 37:06कायरता की बनी बनाई मूर्ति हो, दूसरों को गोली तो मार सकते हो,
- 37:15लेकिन खुद अपने अहंकार को गोली नहीं मार सकते।
- 37:20वो बड़ा मुश्किल काम है। दूसरों को गोली मारने वाले तुम
- 37:29समझते हो, बहादुर होते हैं, नहीं बेहोश होते हैं, दूसरों को गोली
- 37:35मारने वाले बहादुर नहीं होते। बेहोश होते हैं, मूर्छित होते
- 37:40हैं। बेहोशी में ही दूसरे को नुकसान
- 37:44किया जाता है। जागृत व्यक्ति कभी किसी का नुकसान
- 37:48कर ही नहीं सकता और यही कृष्ण कहते हैं तुम जागृत हो जाओ,
- 37:55निष्काम कर्म तुम कर ही कब सकोगे? जब तुम उस तल पर जाओगे और मज़े की
- 38:01बात यह है, हम बातों बातों में तुम्हें जागरूकता की तरफ अवेयरनेस
- 38:07की तरफ ले जाते हैं। तरीका है हमारा, ये हमारा बल है,
- 38:14हमारा डंग है तुम्हें जागरूकता की तरफ ले जाना।
- 38:18परमात्मा की तरफ जैसे जैसे तुम जाओगे अपने भीतर तुम जैसे जैसे
- 38:23जाओगे, रोज़ तुम्हारी जागृति बढ़ती जाएगी।
- 38:26मैंने कल क्या बोला? एक दम से तुम पूर्ण जागृत ना हो
- 38:30पाओगे, एक दम से तुम सीधे सीधे भीतर छलांग नहीं ले पाओगे।
- 38:38जैसे डूबने वाला धीरे धीरे डूबता है, ऐसे ही तुम अपने भीतर उतरोगे
- 38:45इसका अर्थ कैसा है? तुम अवेयर तो होगे, लेकिन एक दम
- 38:50से नहीं होगे। आज अवेयरनेस कल फिर अवेयरनेस
- 38:55थोड़ी सी ज्यादा होगी। परसों फिर अवेयरनेस थोड़ी सी और
- 38:59ज्यादा होगी। 1 दिन ये गणना बढ़ती बढ़ती बढ़ती,
- 39:04क्वांटिटेटिव सत्र के पर 100% हो जाएगी।
- 39:10तुमने ये तो किया नहीं, मुझे पता था।
- 39:18कि तुम कोई ना कोई अपने ही दिमाग की सड़ाध से निकला हुआ प्रश्न
- 39:28मुझको सौंप दोगे ये लो इसका जवाब दे दो इसका जवाब मैं क्या दूँ?
- 39:35इसका जवाब कुछ होता ही नहीं है। इसका जवाब तो तुमने जानना है भीतर
- 39:40जाके मैंने बताना नहीं है और मेरा बताया हुआ तुम विश्वास कर पाओगे।
- 39:54कितनों ने तुम्हें बताया कितने हो हो के चले गए।
- 39:58कितने संत आए भारी पड़ी है सामग्री शास्त्रों से बुद्ध पुरुष
- 40:06होए आए चले गए। कितना बोले जैसे मैं आज बोल रहा
- 40:13हूँ। ऐसा मैं अकेला नहीं हूँ।
- 40:17ऐसे हजारों हजारों लाखों लाखों आए और चले और अगर तुमने उनकी बात को
- 40:24सुना होता तो आज तुम ऐसे भोंकते न फिरते।
- 40:33ये शब्द थोड़े से तीखे लगेंगे। तुम्हें तुम जो संसार में आज दुखी
- 40:41हुए हुए भौंकने वाला व्यक्ति ही प्रश्न किया करता है।
- 40:47यह प्रश्न प्रश्न नहीं है। यह प्रश्न तुम्हारे दिमाग की
- 40:53षडाँध को सूचित करता है कि कितनी सड़ी हुई खोपड़ी है तुम्हारी कहा
- 41:06गया था कि तुम भीतर उतरो, सैकाम और निष्काम।
- 41:12कर्म की परिभाषा तुम्हें समझा रहा हूँ फिर समझ लो समर्पण कैसे होगा
- 41:21यह बदला रहा हूँ धीरे धीरे उतरो, छोड़ो अपने आप को जैसे डूबता है
- 41:29व्यक्ति नहर के भीतर। धीरे धीरे तुम भीतर जाओगे और
- 41:35जीतने तुम अपने भीतर जाओगे, उतनी ही चेतना बढ़ेगी, अवेयरनेस
- 41:42बढ़ेगी, तुमने चेतना खोई कैसे? अपनी स्वय की चेतना से दूर हो के
- 41:50तुम बाहर निकल गए, दूर निकल गए। अब इस बात को ध्यान से समझ लेना
- 41:57जितनी अपनी चेतना से जाने अपने आप से तुम दूर हो जाओगे, उतने तुम
- 42:04ऊर्छित हो जाओगे। और जीतने तुम उर्से तो हो जाओगे,
- 42:09उतने तुम दुखी हो जाओगे। ये है गणना हिसाब की और सारी धरती
- 42:18पर यही कुछ हुआ है इसलिए इतना दुख है।
- 42:23आज धरती दुखों की खबर गह बन के रह गई है।
- 42:29यहाँ एक पुतिन नहीं है जो बेवजह निर्दोष व्यक्तियों को मरवा रहा
- 42:39है। यहाँ एक जेरंस की नहीं है।
- 42:44यहाँ एक किम जोंग जोंग नहीं है। यहाँ एक हिटलर नहीं है, एक मसोलनी
- 42:51और स्टालिन नहीं है यहाँ भरे पड़े है मुठताओं से भरे हुए ये लोग।
- 43:02धरती पर शान्ति ला पाएंगे, इसकी संभावना कम है और धरती पे शान्ति
- 43:12लाने के लिए क्यों कृष्ण को आना पड़ता है?
- 43:16आखिर में कृष्ण ही संभाले हैं बागडोर को।
- 43:21रूप बदल जाते हैं। होते कृष्ण ही हैं, वो किसी भी
- 43:26रूप में आ जाएं आते कृष्ण ही हैं। कवि राम बन के आते हैं, कवि कृष्ण
- 43:33बन के आते हैं, कभी बुद्ध बन के आते हैं, कभी कबीर नानक बन के आते
- 43:38हैं। कभी मीरा बन के आते हैं आते कृष्ण
- 43:46के प्यार का पैगाम देने के लिए कृष्ण को ही आना होता है।
- 43:52तुम तो इतनी गंदगी फैला देते हो कालिदास की तरह।
- 43:57जैसे टहनी पे बैठे होते हो, उसके ऊपर ही आरी फिरते होते हो, काट
- 44:03रहे होते हो, तुम्हें पता नहीं होता कि ये टहनी टूट जाएगी, मैं
- 44:08भी धर्म से नीचे गिर जाऊंगा तुम इतने।
- 44:16मूर्छित हो सिखाया मैंने आज फिर सीखा देता हूँ कहते हैं कृष्ण
- 44:27कर्मण्य वाधिकार से मांम फलेशु कदाचन।
- 44:33तुम्हें नहीं पता। जैसे मुझे नहीं पता था, मैं
- 44:36डॉक्टर बनना चाहता था, लेकिन वह कुछ और कामों के फर मुझे देना
- 44:43चाहता था। वह कुछ और तरह की कृपा करना चाहता
- 44:52था वह। वह आनंद देना चाहता था, जो शायद
- 44:56मैं सारी मानवता की सेवा करके भी उसका एक लेश मात्र भी ग्रहण कर
- 45:03पाता है। तपसिदास ने लिखा है तात स्वर्ग
- 45:11अपवर्ग सुख। धर्य, तुला एक अंक है तुलना ताहे
- 45:17शक्ल मिली जो सुखलव सत शंख उसने सत शंख के समुद्र में फेंक दिया
- 45:25उठा के यानी प्यार के समुद्र में उसने नहला दिया।
- 45:29स्नान का। ये कृपा उसकी क्यों हुई ये तो
- 45:36मुझे नहीं पता लेकिन उसकी कृपा हुई, मैंने ऐसा कुछ नहीं किया।
- 45:43कृपा उसकी हुई क्यों हुई यह मैं नहीं जानता।
- 45:49तुम्हारे प्रश्न तो बहुत आएँगे। हम भी क्यों नहीं हो जाते?
- 45:53हमने क्या पकड़ा? हमने क्या उसकी बुआ के बाल बाट
- 45:57लिए तुम कहोगे लेकिन मेरे पास इन बातों का कोई जवाब है।
- 46:05मैं ये कहता हूँ कि मुझ पर ये कृपा क्यों हुई, मुझे ये पता
- 46:10नहीं। लेकिन मैं चाहता कुछ और बनना था
- 46:17और उस विराट ने कहा कि तुम्हारी जो जरूरत है वो कुछ और है,
- 46:21तुम्हारी कामना कुछ और है। चलो मैं तुम्हारी जरूरत पूरी कर
- 46:26देता हूँ। उसने ऐसा क्यों किया यह जवाब
- 46:29मुझसे कभी न हो मांगना। और मैं इसका जवाब कभी दे भी नहीं
- 46:33पाऊंगा और मैं तुम्हें एक और बात बताता हूँ।
- 46:36कोई व्यक्ति भी इसका जवाब कभी नहीं दे पाएगा।
- 46:40नानक से पूछो कबीर से पूछो दादू से पूछो पल्टू, से पूछो, सहजों से
- 46:47पूछो पूछो मीरा से पूछो दया से। सभी कहेगा उसकी कृपा होय।
- 46:56बाबा कहेंगे गुरु प्रसाद से मिला, हमारे करने से कुछ नहीं मिला,
- 47:03हमने इतना कुछ नहीं किया था। हमने कुछ भी नहीं किया था।
- 47:09उसने इतनी कृपा की गुरु प्रसाद आखिर में कहते हैं गुरु प्रसाद ये
- 47:15जो हमें मिला निरपो निर्वय, अकाल मूरत अजुनी शैपम एकुंकार सतनाम
- 47:26कर्ता पुरख। यह सब जो कुछ हमें मिला हमारे
- 47:32प्रयास करके नहीं मिला, यह मिला उसकी कृपा से है और उसकी कृपा
- 47:42कबीर पे ही क्यों हुई? मुझपे क्यों नहीं हुई?
- 47:45यह प्रश्न तो बनता है। लेकिन करना मत कभी क्योंकि कबीर
- 47:49तुम्हें जवाब नहीं दे पाएंगे। कबीर को खुद ही पता नहीं है।
- 47:53कबीर कहेंगे नानी कहेंगे गुर प्रसाद ये तो उसकी कृपा हुई है,
- 48:00उसने कृपा क्यों की? क्या मुझे नहीं पता कल को तुम इस
- 48:04बात का भी हिसाब मांगोगे? बाबा फिर ये तो बात न बनी,
- 48:09क्योंकि तुम सड़ी हुई खोपड़ी से मोल तोल करने वाले लोग तुम क्या
- 48:18जानो जो शी सतली पे धर न सके। वो प्रेम गली में आए क्यों?
- 48:42थ्रो की कड़ी बात को समझना समझाना इन कामों को छोड़ दो अगर कुछ पाना
- 48:52चाहते हो। अगर उसकी कृपा पानी चाहते हो तो
- 49:02वह बरसेगा, लेकिन पहला कदम तुम्हारी तरफ से उठना होगा
- 49:09तुम्हें। तुम्हें तैयारी दिखलानी होगी।
- 49:15पहला कदम तुम उठाओगे, फिर वो 100 कदम चलेगा, लेकिन तुम अगर पहला
- 49:22कदम नहीं उठाओगे तो फिर वो नहीं चलेगा।
- 49:27वह कृपा क्यों करता है? तुम थोड़ा सा कृपा को मांगो तो
- 49:36कृपा मांगने का अर्थ अरदास करना नहीं समझ ले ना मेरी बातों को
- 49:43थ्रोटिकल कभी अरदास करना कृपा मांगना नहीं होता, उसके राह पे
- 49:48चलना, कृपा मांगना होता है। प्रैक्टिकली उसकी कृपा मांगो,
- 49:54कैसे मांगोगे उसकी तरफ़ चालू अपने भीतर उतरो, तुम तो तुम तो भीतर
- 50:06उतरने की बजाय। रोज़ बाहर ही बाहर ज्यादा निकलते
- 50:11जा रहे हो। तुम तो इतने मूड हो गए हो कि
- 50:17भगवान की तरफ चलने के रास्ते को बताते हो और बताते हो कि राधे
- 50:24राधे करते रहो आज फिर रगड़ दिया। अभी आज आया था कि एक बेचारा रोज़
- 50:34रगडा जाता है। हंसो मत अरे भाई रगडा ही जायेगा
- 50:43जो गुमराह करेगा मानवता को परमात्मा के नाम पर।
- 50:48पर महत्त्व भी रगडेगा उसको और संत भी रगडेंगे उसको रगड़ना बनता ही
- 50:55है। वे वह योग्य है इसके तो तुम
- 51:02शब्दों से खोपड़ी से सोच के। मोल तोल करके इधर उधर करके हिसाब
- 51:10किताब मांगने की चेष्टा मत करो ज़रा ऊपर झांक के देखो थोड़ा सा
- 51:16अमावस्या की काली रात में थोड़ा सा आँखों को ऊपर उठा के देखना।
- 51:26कोई हिसाब तब है तुम सही सही तारों की गणना कर सकते हो तारों
- 51:34को छोड़ो, तुम सही सही गैलेक्सीज़ की गणना कर सकते हो?
- 51:44कितनी हैं आकाश गंगाएं तुम्हें यह पता है कि ब्राह्मण टिकते हैं,
- 51:53तुम्हें कुछ पता भी है के बस सारी सूचनाओं को एकत्रित करके सर ही
- 52:02बनना चाहते हो? फिर तुम्हारी मर्ज़ी है कौन रोकता
- 52:08है तुम्हें कोई भी तो नहीं रोकता है तुम ही चिल्लाते हो, मैं दुखी
- 52:16हूँ बाबा मैं दुखी हूँ रोज़ रोज़ मेरे पास।
- 52:23ऐसे कॉमेंट्स आते हैं, रोज़ फोन्स आते हैं बाबा बहुत विपत्ति काल
- 52:32में हूँ, बहुत दुखी हूँ इसके बेक में क्या है?
- 52:38हम उसकी बेक में तुम्हें बताना चाहते हैं क्या है?
- 52:44और प्रश्न पूछने वाला भी कोई सुखी नहीं लगता।
- 52:46मैं नहीं जानता कौन है ये, लेकिन प्रश्न पूछने वाला सुखी होता ही
- 52:52नहीं कभी तुम गीता से क्या समझे? गीता तुम्हे एक बहुत बड़ा सबक
- 53:04सीखा के जाती है जो तुम सीख नहीं पाते।
- 53:09गीता तुम्हे यह सिखाती है। जब तक अर्जुन दुखी था ध्यान से
- 53:17समझाना बात को। जब तक अर्जुन दुखी था तब तक
- 53:21प्रश्न पूछता रहा, जब अर्जुन सुखी हो गया तो उसने प्रश्न पूछना बंद
- 53:32कर दिया। जब अर्जुन के सारे संदेह मिट गए
- 53:42ऊहो वोहो सारा भयंकर जो कंपाहट थी उसके शरीर के कैसे मारूं?
- 53:48गुरु को कैसे मारूं भीष्म को कैसे मारूं भाइयों को मुझे पाप लगेगा
- 53:56इससे अच्छा भाग जाऊं। वनों में तब कर लूँ ज़िन्दगी कोई
- 54:00लेखे तो लगेंगी। लेकिन कसम पक्के खिलाड़ी जब तक
- 54:13पूछता रहा। अर्जुन कृष्ण बताते रहे और कृष्ण
- 54:24बखूबी जानते हैं। मैं भी बखूबी जानता हूँ।
- 54:32क्या ये प्रश्नों का जवाब देके? तुम कोई सुखी नहीं हो जाओगे।
- 54:39तुम जब सुखी होगे, जब तुम प्रश्न पूछना बंद कर दोगे और सुखी तुम कब
- 54:45होगे, जब तुम्हारा भ्रम लगेगा। कृष्ण ने जब अपनी शक्ति फेंक दी।
- 54:56और उसको उस तल पर पहुंचा दिया जिसका जिक्र न कर कर रहा था।
- 55:05कृष्ण ने अर्जुन को उस तल पर पहुंचा दिया जहाँ जाकर अपना आईने
- 55:12में। अपना मुखड़ा निहारा जाता है, टु
- 55:18नो दी सेल्फ वहाँ जाकर खड़ा कर दिया यह देख मिरर में देख तू कौन
- 55:27ध्यान से समझना वहाँ जाकर सिर्फ मिरर में तुम्हें अपना चेहरा
- 55:32दिखता है। पहुंचना है वहाँ जहाँ मिरर भी हट
- 55:38जाए और तुम अपने आप में लीन हो जाओ जहाँ थोड़ा सा प्रश्न इसको
- 55:44गौर से समझ लेना जंक्चर प्वाइंट पे मिरर में तुम अपना चेहरा देखते
- 55:52हो? तुम कैसे हो, कौन वहाँ तुम्हारे
- 55:57संदेह मर जाते हैं क्योंकि जब तुम अपनी आँखों से देख लोगे मैं कैसा
- 56:01हूँ? और अर्जुन ने देख लिया मैं को और
- 56:06अर्जुन ने यह भी देख लिया समझ गया सत्य क्षण।
- 56:11मैं कौन हूँ तो विषम कौन है? विषम भी शरीर नहीं है जब मैं नहीं
- 56:17तो द्रोण भी शरीर नहीं है। जब मैं नहीं तो ये सारी फौजे 18
- 56:24अक्षुणी से भी शरीर नहीं है। अभी युद्ध शुरू नहीं हुआ।
- 56:31फिर समझाया क्यों हो? मैं तो प्रश्न पूछता ही रहा, मैं
- 56:38कितनी मूर्खता कर रहा था? एक एक भ्रम के कारण अज्ञानता के
- 56:44कारण इल्लुशन के कारण मैं कितने प्रश्न पूछूं?
- 56:51और मैं भी अच्छी तरह से जानता हूँ, तुम्हारे प्रश्नों का जवाब
- 56:56चाहे वेद दे, चाहे संत दे, चाहे ज्ञानी दे, तुम्हारा कभी भला होने
- 57:06को नहीं है। सिर्फ हम तुम्हें मार्ग बता सकते
- 57:11हैं और तुम्हारे मार्ग के कांटे हटा सकते हैं।
- 57:19गुरु आपके मार्ग के कांटे बुहारी लेकर एक तरफ़ कर देता है।
- 57:28और तुम्हें बता देता है कि इस राजपथ पर सुन और गुरु का ये काम
- 57:33बड़ा प्रो कर्ज है, फिर भी तुम शंकाएं उठते हो।
- 57:41तुम जानबूझकर उस राजपथ पर जीस राजपथ पर कांटे हटा दिए गुरु ने।
- 57:48तुम मैं जान बूझकर फिर कांटे उठाते हो, लेकिन गुरु उन्हें भी
- 57:55हटा देता है। गुरु बड़ा सहनशील और गुरु बहुत ही
- 58:04विराट करूणवान होता है। एक बार उसने कांटे हटा दिए, उबड़
- 58:11खाबड़ रास्तों से समतल कर दी। जमीन राजपथ बना दिया तुमने फिर
- 58:17उलट पुट कर दिया। गुरु फिर उसको राजपथ बना देगा,
- 58:22सारे कंकड़ पत्थर फिर हटा देगा। प्रश्नों के जवाब देने का यही
- 58:26अर्थ होता है, लेकिन तुम जब बिल्कुल अंतर के प्रश्नों के ऊपर
- 58:32सवाल खड़ा करने लगो, वह मुश्किल हो जाती है।
- 58:41बिल्कुल, आखिर में तुम कहो के परमात्मा को किसने बनाया?
- 58:47पर जवाब तो इसका कोई है नहीं, तुम कहोगे फिर अगर एक सहभम सत्ता को
- 58:54मानना ही है। तो उस सैब हम सत्ता को प्रकृति ही
- 59:04क्यों न मान लिया जाये? परमात्मा को क्यों मानें तुम्हारी
- 59:08वर्ची है तुम प्रकृति को मान लो बुद्ध ने प्रकृति को मान लिया, कह
- 59:14दिया ईश्वर है ने दोनों में से एक को इंकार करना पड़ेगा।
- 59:19यह तो परमात्मा है और परमात्मा ने अपने नियमय कायदे कानून के हिसाब
- 59:26से प्रकृति का निर्माण कर दिया। यह प्रकृति ही है, परमात्मा नहीं
- 59:32है नियम लॉज़ अरे सुफ्फिसिएंट नियम ही चलाते हैं।
- 59:39लेकिन जो बहुत अमहीन और सूक्ष्म बुद्धि के हैं वो इतनी बात अवश्य
- 59:45खटकती है। उनके भीतर वो देखे हो चाहे ना
- 59:51देखे हो लेकिन बात खटकती जरूर है कि इतना कुछ ठीक है।
- 59:58लेकिन उबड़ खाबड़ क्यों नहीं है? ये इतना सदा हुआ क्यों है?
- 1:00:02ये नियमों में अभद्र क्यों है? इतने महान संगरचना ब्लड प्रेशर का
- 1:00:1080120 होना शुगर का सो के आसपास फासटिंग।
- 1:00:20और हर चीज़ का बिल्कुल एक्यूरेट लेवल के ऊपर है।
- 1:00:26अवश्य ही कोई कारीगर है। इतनी शानदार संरचना, कोई कारीगर
- 1:00:35की कारीगरी। ही नजर आती है।
- 1:00:39कंप्यूटर तो है ठीक लेकिन कंप्यूटर के ऊपर कोई ऑपरेटर भी
- 1:00:45होगा, अन्यथा इतनी सूक्ष्मता से यह सब कुछ नहीं हो सकता था।
- 1:00:52उसकी सूक्ष्मता को देखते हुए व्यक्ति कहीं कहीं।
- 1:00:58ये शंका उत्पन्न होती है कि इसको बनाने वाला कोई है उसे ही मैं
- 1:01:03आश्चर्य करता हूँ जहाँ तुम्हें अश्चर्य लगने लगे नियमों से परे
- 1:01:12तो समझो वह आश्चर्य तुम्हें परमात्मा की दिशा की ओर अग्रसर कर
- 1:01:17रहा है। लेकिन तुम तो अभी अश्चर्य में आए
- 1:01:22नहीं, तुम अश्चर्य से दूर दूर ही रहना चाहते हो, तो कृष्ण भगवान
- 1:01:29कहते हैं, माँ फली शूक गत आचन यह आश्चर्य।
- 1:01:36तुम तो ये समझोगे कि मेरे हिसाब से मुझे ये फल मिलना चाहिए, लेकिन
- 1:01:41तुम्हारे हिसाब से कहाँ चलते हैं? अब ये कल ही मेरे पास व्यक्ति आ
- 1:01:47गया मुझे कहता है बाबा मैं बीमार हूँ, मेरे दर्द है।
- 1:01:56और सब कुछ करवा दिया। सभी मशीनों से ने सारे रिसाल्ट दे
- 1:02:01दिए। ओके सारी रिपोर्ट ओके, अगर सारी
- 1:02:06रिपोर्ट ओके है और बड़ी बड़ी मशीनों में खुद डॉक्टर हैं, वो
- 1:02:13बड़ी बड़ी मशीनों में। उसने इलाज करवाए, उसने निरीक्षण
- 1:02:18करवाए। उसने असहस्य करना चाहा, डायग्नोज़
- 1:02:24करना चाहा कि ये है क्या, दर्द होता क्यों है?
- 1:02:29लेकिन कोई कारण न मिला। मेरा शिष्य था।
- 1:02:34मुझे कहने लगा बाबा ये फिर अब क्या है?
- 1:02:38हर कार्य के पीछे कोई कारण होता है तो ये दर्द के पीछे कारण क्यों
- 1:02:43नहीं निकला? प्रश्न बड़ा जाय था, दर्द है तो
- 1:02:51अवश्य ही कोई कारण होगा। कोई शैलंग होगी, कोई और कारण होगा
- 1:02:57कि टिश्यू का टूट फूट होगा, कुछ तो होगा ना कोई घटा बड़ा होगा,
- 1:03:07लेकिन कुछ भी नहीं है। वो खुद डॉक्टर है।
- 1:03:12मैंने कहा। जब तुम यहाँ आ ही गए हो तो अब अगर
- 1:03:19कुछ भी तुम्हें यहाँ नहीं मिल रहा, कोई स्वेलिंग नहीं, कोई
- 1:03:25तुम्हारी मशीन नहीं बताती कि ये तकलीफ है, ये घटा पड़ा हुआ है, सब
- 1:03:29ओके है। तो यहाँ तुम्हारे कर्मों का
- 1:03:37प्रभाव है जहाँ कोई कारण न मिले फिर भी तुम्हें तकलीफ हो।
- 1:03:47तो वहाँ समझ लेना तुम्हारे अपने ही पुरातन कर्म प्रारम्भ उनका फल
- 1:03:55तुम्हें मिल रहा है कोई कारण नहीं है, लेकिन पुरातन कर्म तुम कुछ भी
- 1:04:04करने से दवा लेने से। एनर्जेसिक लेने से इंजेक्शन लगाने
- 1:04:10से नहीं ठीक हो रहा है। दर्द फिर उठ जाता है फिर तुम दवा
- 1:04:16ले लेते हो फिर तुम ट्रिमेडोल ले लेते हो।
- 1:04:21फिर तुम बड़े से बड़ा एनेस्थीसिया ले लेते हो, लेकिन एनस्थीसिया का
- 1:04:25जैसे ही या सब उतरा, फिर फिर दर्द होने लगा।
- 1:04:30अब ये क्या कारण है बाबा जहाँ कोई कारण तुम्हें न मिले?
- 1:04:35साइंटिफिक रूप से वहाँ एक ही कारण बचता है।
- 1:04:40वो कारण बचता है सिर्फ तुम्हारा प्रारम्भ अब तुम्हारे प्रारम्भ
- 1:04:47भुगताए जा रहे हैं अगर कोई मरीज किसी भी दवा से ठीक नहीं होता और
- 1:04:55कोई कारण भी नहीं मिल रहा। तुमने सारे इलाज करा दिए, सभी
- 1:05:00मशीनों में तुम एमआरआइ में घुस गए सीटी स्कैन करा दिया, एक्स रे करा
- 1:05:09दिया वो करा दिया ये करा दिया सब कुछ करा दिया लेकिन कुछ नहीं
- 1:05:13डायग्नोज़ हुआ ही नहीं कि बिमारी क्या है?
- 1:05:16लेकिन तकलीफ है। तो वहाँ क्या कहते हैं?
- 1:05:22संत जानते हैं कि तकलीफ क्यों तुम्हारे प्रारब्ध कर्म भुगताए जा
- 1:05:30रहे हैं और उनका तुम्हें पता नहीं चलता क्योंकि डॉक्टरों की मशीनों
- 1:05:35में तो बहुत कुछ नहीं आता। कहाँ कुंडल नहीं आती है कहाँ ये
- 1:05:41सारे चक्र आते हैं कहाँ सहस्त्रार आता है, कहाँ ब्रहम रंत्र आता है
- 1:05:46आता है नहीं आता और सही पूछो तो तुम्हारी मशीनों में तो बहुत कुछ
- 1:05:55नहीं आता। तुम बहुत कुछ बता सकते हो दिखा
- 1:06:00नहीं सकते, तुम कहते हो दर्द हो रहा है, गुस्सा आ रहा है, तुम्हें
- 1:06:07काम का आवेग उठ रहा है तुम में दुख हो रहा है तुम्हें कष्ट हो
- 1:06:14रहा है खुशी हो रही है। इनमें से कोई भी मुझे बता दो कि
- 1:06:21ये रहा दुख, ये रहा क्रोध, ये रहा वैराग्य, ये रही तकलीफ ये दिखाने
- 1:06:30वाले नहीं हैं ना तुम खुशी दिखा सकते हो?
- 1:06:33ना तुम गमी दिखा सकते हो निकाल के कि ये थी गमी जो मुझे तंग करती
- 1:06:38थी। पथरी निकल जाए तो दिखा सकते हो।
- 1:06:41ये पथरी थी जो मुझे तंग कर रही थी, लेकिन प्रारब के कर्म तुम
- 1:06:47नहीं दिखा सकते के ये प्रारब के ये कर्म थे जो मुझे तंग कर रहे
- 1:06:51थे। हर चीज़ का कारण तुम नहीं जान
- 1:06:57सकोगे। अब तुम पूछ लेते हो परमात्मा कबीर
- 1:07:03पे ही मेहरबान क्यों होता है परमात्मा नानक पे ही मेहरबान
- 1:07:08क्यों होता है? ये तुम्हारा प्रश्न वह रहता है
- 1:07:16क्योंकि जैसे नानक कहते हैं, वैसे तुम करो और तुम देखो वो तुम पे
- 1:07:21मेहरबान होता है कि नहीं होता? नानक कहते हैं, उसकी मर्ज़ी पर
- 1:07:25छोड़ दो। जो तू तो पावे सोई पल्लिका तेरा
- 1:07:34बाणा मीठा लग गया तुम्हे तो बड़ा कड़वा लगता है उसका बाणा और तुम
- 1:07:44कहते ये हो कि मुझको उसका बाणा मीठा।
- 1:07:51कर्म ने वाद का रस्ते अधिकार तुम निष्काम कर्म कर्म करो या तुम सै
- 1:07:59काम कर्म करो ये तुम्हें अधिकार है सै काम कर्म करोगे तो फल कर्म
- 1:08:06देंगे तुम्हें। अब इसको बारीकी से समझ लो अगर
- 1:08:12कर्म तुम करोगे कर्ता बनके तो कर्म तुम्हें फल देंगे एक्शन विल
- 1:08:19कम बेक एस ए एक्शन और अगर तुम। निष्काम कर्म करोगे, उसको करने
- 1:08:31दोगे, छोड़ दोगे उसके ऊपर सारी नैया की बागडोर पतवार थमा दोगे
- 1:08:38उसके हाथों में तो फिर तुम नहीं करोगे।
- 1:08:45तुम बजाए सवाल पूछने के ये तुमने कहा बाबा फिर ये ठीक नहीं आ रहा,
- 1:08:54यह मगज़ में घुस नहीं रहा तो मगज़ खवाई मत करो भाई, ये खारिश होगी,
- 1:09:03सबके होती है। लेकिन अध्यात्म में खारिश करनी
- 1:09:09नहीं होती, खारिश मिटानी होती है। फिर सुन लो मेरी बात को हसो मत।
- 1:09:16अध्यात्म में अगर खारिश हो, न वो मिटाई जाती है, करनी नहीं होती
- 1:09:22खारिश। तुम खुजलाने लग जाते हो।
- 1:09:26पांवले कुत्ते की तरह ये काम नहीं करेगा, नहीं तो फिर खारिज फिर उठ
- 1:09:30जाएगी। खारिज को खत्म करना होता है।
- 1:09:34अध्यात्म का मतलब ये है कारण को समर्पित कर देना।
- 1:09:42कारण क्या है? तुम्हारा इल्यूज़न खुजलाना नहीं
- 1:09:47होता वो तो फिर उठ जाएगी खर्क क्योंकि रोग है तुम्हें गल क्या
- 1:09:54है? शरीर पाएं पड़ गई है, मवाद पड़ गई
- 1:09:58है खर्क तो उठेगी भाई। खारिश नहीं करना है।
- 1:10:03फोड़े का इलाज करना है, चीर करना है टु डाइसेक्ट तुम खुजलाते ही
- 1:10:11रहते हो और ये आज तुम्हारा प्रश्न, मिस्टर विजय पावर ये
- 1:10:15खारिश है कब तक करोगे? मैं कहता हूँ इसे डिसेट कर लेने
- 1:10:22दो, मुझे चीर देने दो, इसे तुम्हारी मावाद अच्छी तरह से
- 1:10:28निकाल दूंगा, बिच बूझ के और अच्छी तरह से साफ कर दूंगा।
- 1:10:33आयोडीन लगा के बेटाटेन लगा के बाँध दूंगा और ऐंटीबायोटिक देकर
- 1:10:38इसको ठीक भी कर दूंगा। थोड़ा छोड़ो तो सही मेरे पे कब तक
- 1:10:45प्रश्न पूछते रहोगे? आखिर कब तक कभी तो थकोगे माँ फल ई
- 1:10:54शु कदाचन। फल में अपने हिसाब से दूंगा।
- 1:10:58तुम कहोगे मैंने दवा तो ले ली एनाल जैसे तो ले लिया, दर्द क्यों
- 1:11:03नहीं मिटा? तुम बहुत गहराई तक नहीं जा सकते।
- 1:11:08कृष्ण जानते हैं कि दर्द नहीं मिटा वो जो तुम्हारे प्रारब्ध
- 1:11:14कर्म फलने शुरू हो गए हैं। वो फल गए हैं और गिरने शुरू हो गए
- 1:11:21हैं उनको तुम जानते नहीं तुम एक घर से घर बदल लिए हो पुराने घर
- 1:11:28में तुम क्या कर के आये हो तुम्हें पता नहीं, लेकिन घर सारे
- 1:11:32उसके याद रखना। तुम नहीं जानते तुम कहाँ से उठ के
- 1:11:38आए हो, वह जानता है तुम कहाँ से उठ के आए हो इसलिए प्रश्न ही करते
- 1:11:44मत रहना, प्रश्न करना, लेकिन प्रश्न ही करते मत रहना, जो मैंने
- 1:11:52बोला उसको भी सुना। अपने भीतर उतरो छोड़ दो, समर्पण
- 1:12:03नीचे नीचे, जैसे पानी में उतरते हो, ऐसे अपने ही भीतर ही उतरोगे
- 1:12:10और एक वक्त ऐसा आएगा। तुम उतरते उतरते उतरते उस स्तर पर
- 1:12:16पहुँच जाओगे जो तुम्हारे भीतर ही एक तल है, जंकचर पॉइंट उसे थोड़ा
- 1:12:26सा नीचे जाओगे, देखो कितने बारीकी से तुम्हें इशारे दे रहा हूँ?
- 1:12:32तुम फिर प्रश्न कुजलाने लगते हो अरे भाई ऐसी बात नहीं बनेंगे, मैं
- 1:12:39तो बोलता रहूँगा, कोई बात नहीं, लेकिन तुम फिर ऐसे ऐसे करते
- 1:12:45रहोगे? मैं कहता हूँ मुझे थोड़ा सा चीरा
- 1:12:48लगा लेने दो भाई। तुम चीरा नहीं लगाने देते मेरे भी
- 1:12:54बस में नहीं है तुम्हारी आज्ञा के बिना मैं चीरा भी तो नहीं लगा
- 1:12:59सकता तुम अपने भीतर से ले जाओ, उस प्वाइंट पे जाकर देखो।
- 1:13:10फिर मुझे बताओ कि मैं गया वहाँ और ईश्वर का वहाँ आदेश आया नहीं और
- 1:13:19ईश्वर का आदेश आया लेकिन बाहर आकर मैंने देखा वैसा हुआ नहीं, कहीं
- 1:13:24कुछ तो करो। थ्रोटिकल दिमाग में बैठे बैठे
- 1:13:29कुजलाते ही हो गए भीतर उतरो, जा के देखो, उसका आदेश सुनो, उसका
- 1:13:37आदेश सुनो और बाहर आके देखो कब वही हो रहा है कोई लौज ने को पागल
- 1:13:45कुत्ते ने काट लिया था। बाबा नानक को कबीर को मीरा को
- 1:13:50पारि जो वो कहते हैं कि जो वो करता है, ठीक करता है, वो जो
- 1:13:58स्टेम्प लगाते हैं, उनको रेबीज का टीका लगना चाहिए क्या?
- 1:14:07थोड़ा सा जागो जागना ही सखाते हैं सभी संत और अगर मवाद घनी हो गई है
- 1:14:21प्रश्नों की। तो गुरु के पास प्रश्न मत पूछो
- 1:14:25गुरु के पास अपना दुखड़ा बताओ, गुरु चीरा लगा देगा मबाद रिसेगी
- 1:14:32और उसकी दुर्गंध तुम्हें आएगी। तुम जानोगे कि वे दुखी क्यों था?
- 1:14:39वो रिश्ता हुआ फोड़ा कैंसर का। वो उगलेगा मवाद को और सड़ाध तो
- 1:14:45में भी आएगी, पड़ोसियों को भी आएगी थोड़ा संत के शब्दों को
- 1:14:53अच्छी तरह सुन के थ्रोटिंग करी सुनो और प्रैक्टिकली उतरों उतरे
- 1:14:59तो है नहीं। थ्रोटिकली तो कर लिया तुमने
- 1:15:04प्रैक्टिकल तो बिल्कुल भी नहीं किया ना अपने भीतर उतरे, ना उसका
- 1:15:07आदेश सुना ना बाहर देखा वैसा होता है कि नहीं?
- 1:15:11प्रश्न दाग दिया थ्री नॉट थ्री की तरह नहीं, नहीं ऐसा काम मत करो।
- 1:15:18अगर तुम वास्तव में जिज्ञासु हो, कोई पासु हो मोमोक्ष हो तो जैसे
- 1:15:25ही मैं कहता हूँ प्रकृति कर भी करो, सुनो सुन के गुणों भी अपने
- 1:15:33भीतर उतरो, जो कहते हैं, कृष्ण ठीक कहते हैं।
- 1:15:38कबीर, नानक, मीरा, दया पल्टू यह ठीक कहते हैं या गलत?
- 1:15:45कहते हैं कब कसोगे इसको इसको कसो अवेयरनेस को जगाओ, अपने भीतर
- 1:15:54उतरो। उस पॉइंट पे पहुंचो जहाँ खुशबू ही
- 1:16:02खुशबू है, जहाँ सुदी बुदी बिखर जाती है, जहाँ तुम होशो हवा खो
- 1:16:11बैठते हो, अभी तुम यहाँ की शराबी क्या?
- 1:16:17थोड़ी देर के लिए बेहोश मूर्छित हो जाते हो लेकिन वो खुमारी नहीं
- 1:16:22जड़ते, मूर्छित हो जाते हो मैं कहता हूँ तुम खुमार में उतरो, तुम
- 1:16:29उस आनंद में उतरो, जो तुम्हें सब भला दिखे।
- 1:16:36तुम दर्द से मुक्त हो जाओगे, एनल जैसी खा के नहीं।
- 1:16:42मवाद को निकाल के ये दो बातें मैंने समझाई।
- 1:16:48एनल जैसी खा के भी तुम दर्द से निजात पा सकते हो कुछ समय के लिए।
- 1:16:54लेकिन मैं कहता हूँ मवाद को निकाल दूंगा, चीरा निकाल के सारी मवाद
- 1:17:00को झाड़ दूंगा, पका दूंगा एंटीबॉटिक देख के सूखा दूंगा और
- 1:17:06तुम बिलकुल नो बर नो हो जाओगे ठीक हो जाओगे इस बात के ऊपर।
- 1:17:12तुम थोड़ा ख्याल करो, सिर्फ सुनते ही मत रहो।
- 1:17:18प्रैक्टिकल में भी उतरो, अपने भीतर भी उतरो, समस्याओं का इलाज
- 1:17:27पूछो मत करो भी। जहाँ समस्याएं जाके समाप्त हो
- 1:17:32जाती हैं, वो समाधान जहाँ हो जाता है उस समाधि में जाने की तो मत भी
- 1:17:39उठाओ वो काला। इकबा सूरीवाला सुध विसरा गयो मोरी
- 1:18:10रे। शुद्ध विसरा गयो में वो काला।
- 1:18:35इक भा सुर वाला माखन चोर वो नन्द किशोर जो।
- 1:18:53कर गयो मन की चोरी रे सुध विसरा। गयो में रहे ओह काला एक भान सूरी
- 1:19:25वार। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे
- 1:19:40नाथ नारायण वासुदेव। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे
- 1:19:54नाथ नारायण वासुदेव पितमात स्वामी।
- 1:20:07सखा हमारे पितुमात स्वामी सखा हमारे हिनाथ नारायण।
- 1:20:25वासुदेव वा श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी नाथ नारायण।
- 1:20:43वासुदेव, धनबाद।