Latest / Baba ji Vijay Vats / 5 Dec 25 - एक से अनेक बनने का रहस्य! गोरखधंधा असल में कौन-सा खेल है? जो साधारण बुद्धि पकड़ नहीं सकती! Baba Ji Vijay Vats
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- 0:09प्रणम बाबा जी कपिल कृष्ण देहरादून से वस्ती न शून्यम
- 0:31शून्यम नवस्ते अगम अगोचर ऐसा। गगन शिखर में बालक बोले ता का नाम
- 0:44दरगुह कैसा बस्ती न सोन्यम सोन्यम न बस्ती अगम अगौचर ऐसा।
- 1:02गुरु गोरखनाथ एक बार पहाड़ों की यात्रा पर जा रहे हैं।
- 1:17उनके साथ उनके तीन शिष्य हैं। उन तीन शिशुओं ने कहा कि यहाँ कुछ
- 1:33भी नहीं है। बर्फ़ कैसे बाहर और योगी जी हमें
- 1:41भूख पड़ी लगी है। बस्ती बड़ी दूर है बस्ती न शून्यम
- 1:55शून्यम न बस्ती अगम अगोचर ऐसा तीन शिष्यों ने कहा भूख बड़ी लगी है
- 2:09पहाड़ी इलाका। बर्फ़ गिर रही सर्दी का मौसम तो
- 2:25गौर के अंदर की कोई बात नहीं, थोड़ा आगे चलते हैं, आगे ढलान आ
- 2:33जाएगा। और फिर बस्ती आ जाएगी बस्ती में
- 2:41से कहीं मांग लेंगे, मिल जाएगा पेट भरने के योग्य तो मिल ही जाता
- 2:53है, बस भरता नहीं। तो व्यक्ति का नीयत नहीं भरता,
- 3:02पेट तो सदा ही भरते रहे बस्ती न शून्यम शून्यम न बस्ती अगम अगोचर
- 3:13ऐसा। लेकिन शिष्य जद करने लगे, जद क्या
- 3:28करने लगे? उन्हें भूख वस्तु में लगी थी तो
- 3:36गोरखण जब भीतर झांक के देखा तो भूख वा वास्तव में लगी थी।
- 3:41भूख घनी थी क्योंकि काफी घंटों से लगातार चल रहे थे और पहाड़ी इलाका
- 3:52था। चढ़ाई की चढ़ाई करने में व्यक्ति
- 3:56की शक्ति ज्यादा लगती है। टिश्यूज़ और नब्स संज्ञा शून्य हो
- 4:06जाते हैं। एनर्जी रेस्टनेस की अवस्था जाती
- 4:12है, फिर भोजन चाहिए। बोले बाबा भोजन तो।
- 4:26अब तो हमसे चला ही नहीं जाता, अभी बहुत दूर है, आगे जाएंगे, काफी
- 4:36दूर जाएंगे, ढलान आएगी फिर बस्ती आएगी।
- 4:42फिर मांगेंगे। भूख तो अभी सताए जा रही है, हम तो
- 4:48कुछ कदम भी नहीं चल सकते असमर्थ। का अच्छा बैठ जाओ, शीश भोले बाबा,
- 5:16बर्फ़ जमी है कैसे बैठे कहते ठीक आँखें बंद कर लो, आँखें बंद की।
- 5:31तो उनके हाथों में भोजन से भरे हुए था और ऐसा पकवान जिसमें से
- 5:43अभी भाप निकल रहा था। जैसे बिल्कुल ताजा ताजा आपने
- 5:53कड़ाही में से सब्जी निकाली हो, रोटी निकाली।
- 6:04तो गौरव ने कहा ठीक है पुतरो खा लो, फिर हम चले, उन्होंने खाना
- 6:14शुरू कर दिया, रोज़ का धंधा था, रोज़ का काम था।
- 6:26जब कभी ऐसा होता तो मांग लेते गोरखनाथ ने जो कुछ अपने जीवन में
- 6:41किया अद्भुत था। गोरखनाथ ने इतनी पद्धतियां
- 6:48निर्मित की कि वो पद्धतियां एक दूसरे के विपरीत थीं।
- 6:58गोरख ने कभी कहा कि वह दिखता है और गोरख ने कभी कहा कि वो कभी
- 7:04नहीं दिखता। बिल्कुल उलट बातें गोरखने बोलीं,
- 7:17इसलिए हमने आज एक शब्द सुना है क्या गोरखधंधा फैला रखा है।
- 7:26गोरख जंदे का मतलब जिसकी समझ न आए तुम्हे आइए हम सूत्र पे चले यही
- 7:35इस सूत्र में समझाया क्या है बस्ती न सुन्यम सुन्यम न बस्ती
- 7:40अगम अगोचर ऐसा वह। परमात्मा की स्तुति करके इस ग्रंथ
- 7:50का आगाज कर रहे हैं गुरखनन पहला दोहा है बस्ती ना शून्य।
- 8:06ना तो उसको वस्ती कह सकते हैं वस्ती याने जहाँ लोग गसते हैं न
- 8:15शून्यम न उसको उजाड़ कह सकते हैं शून्यम जहाँ कोई नहीं रहता।
- 8:24बस्ती ना सोनयम सोनयम ना बस्ती ना उसको भरा पूरा कह सकते हैं ना
- 8:37उसको खाली कह सकते हैं, ना उसको खाली कह सकते हैं, ना उसको भरा
- 8:44पूरा कह सकते हैं। बोलने का ढंग है।
- 8:52जैसे उपनिषित ने कहा, जीस परमात्मा की खोज में तुम चले हो,
- 9:04वह बड़ी टेढ़ी खीर है। उपनिषद कहते हैं कि पूर्ण है वो
- 9:16और उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लिया जाए तो शेष वश्यता है
- 9:24पूर्ण। अब ये बात तुम्हारी समझ में नहीं
- 9:30आएगी और तुम्हारी मुसीबत ये है कि तुम हर बात समझना चाहते हो, इसलिए
- 9:42गोरख तुम्हें कहते हैं के बच्चों। उसे समझने की चेष्टा न करो।
- 9:53अगर तुने उसे पाना है तो प्रथम सूत्र हमारी बहुत पुरानी आदत
- 10:04एडिक्शन संस्कार? इसको प्रथम पड़ाव पे तोड़ दिया
- 10:15गोरख ने। गोरख कहते बच्चों बस्ती न शून्यम
- 10:22शून्यम न बस्ती अगम पुस्तक जाया नहीं जा सकता।
- 10:29उस्तक गम नहीं किया जा सकता तो अगम अगोचा ऐसा दिखता नहीं वो कुछ
- 10:45बातें सीधी सीधी समझाई तो जा ही नहीं सकती, बोली भी नहीं जा सकती।
- 10:56इसलिए अध्यात्म का विषय अति गूढ़, गोपनीय और विरोधी शब्दों से मिलकर
- 11:04बना है तो जितना सरल। बुद्धिवादी लोग परमात्मा की
- 11:19व्याख्या समझते हैं, उतना ही वह कठिन है।
- 11:29तो प्रथम सूत्र तुम्हें देते हैं गोरख उसे न तो बस्ती कहा जा सकता
- 11:42है, न उसे उजाड़ कहा जा सकता है, न वह उजाड़ में मिलता है, न वह
- 11:53बस्ती में मिलता है। बस्ती न शून्यम शून्यम, न बस्ती
- 12:00शून्यम न बस्ती बस्ती न शून्यम तुम उधर जाओगे यही तो गोरखधंधा है
- 12:11इसलिए कहने वालों ने कहा कि ये क्या गोरखधंधा है।
- 12:16एक बार बोल दिया, बोल दिया अगम अवोचर ऐसा ना वहाँ तक गमन किया जा
- 12:26सकता, ना उसे गोचर किया जा सकता देखा नहीं जा सकता।
- 12:34पहुंचा नहीं जा सकता। वह ऐसा है।
- 12:47निश्चित ही तुम्हारी भाषा तुम्हारे शब्द।
- 12:56परमात्मा के विषय में मौन है तुम्हारे शब्द बोलने के लिए हैं,
- 13:05कन्वर्सेशन के लिए हैं, संसार में चीजों को व्याख्या करने के लिए
- 13:13हैं, और तुम। उसे परमात्मा को व्याख्यात करने
- 13:18में निकल जाते हो। पहली भूल अगर कोई व्यक्ति करता है
- 13:29तो गोरख कहते हैं कि वो ये करता है जो भाषा में नहीं आता।
- 13:37उसको भाषा में प्रकट करने की चेष्टा करता है और मैं तुम्हें
- 13:41बतला दूँ और मैं तुम्हें समझा दूँ।
- 13:44इसका अर्थ क्या है? गौर कहते हैं उसका अर्थ निकाला ही
- 13:50नहीं जा सकता। कैसे निकालोगे अर्थ उसका?
- 13:56वैज्ञानिक खोज लेंगे। इस सृष्टि का नियम क्या है?
- 14:08लेकिन वैज्ञानिक कभी नहीं खोज पाएंगे।
- 14:11इस सृष्टि का नियम बनाया कैसे? क्रियेशन का फॉर्मूलेशन तो वो खो
- 14:22ही लेंगे ऐसे ऐसे बना इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन बना और एक न्यूट्रॉन
- 14:29बिल्कुल न्यूट्रल। ये एटम है और एटम वाली कुल से
- 14:38बनाएं और मलीक्यूल मैटर में होते हैं।
- 14:44इतना खोज लेगा, लेकिन खोज लेगा। बना नहीं सकेगा।
- 14:51एक ज़रा कभी भी यही तुम्हारी असमर्थता है।
- 14:59प्रथम वाक्य में कह देते हैं गोरख बहुत गहरे से अगर गोरख को समझा
- 15:07जाए तो गोरख कहते हैं। जानने की कोशिश मत करो, वह अज्ञेय
- 15:16नहीं है, अज्ञात भी नहीं है। वह अज्ञेय है, जाना भी नहीं जा
- 15:27सकता। और जाना भी नहीं गया।
- 15:30कभी बड़े गहरे शब्द हैं के इसलिए गोरख को मैंने सबसे बाद में छिड़ा
- 15:40क्योंकि गोर्ख वो अनबुझ पहेली है। जीसको कितना ही बुझाने की चेष्टा
- 15:47कर लूँ फिर भी वो अनभुजा रह जाएगा, वो उसको बूझ नहीं पाऊंगा।
- 15:54मैं वहाँ जाकर खोपड़ी तिड़ तिड़ भी करती है और खोपड़ी हार भी जाती
- 16:01है और खोपड़ी हार जाती है तो खोपड़ी।
- 16:05समर्पण कर देती बस्ती न शून्यम शून्यम न बस्ती अगम अगोचर ऐसा
- 16:16परमात्मों को तुम ये कह सकते हो न तो ये कह सकते हो की वह है।
- 16:23और न तुम ये कह सकते हो कि वह नहीं है उल जाओगे पहले शब्द से ही
- 16:33गौरख ने उलझा दिया बुद्धि को और तुम बुद्धि से ही हल करने चले।
- 16:42इसलिए जल्दी जल्दी कोई गोरख को छेड़ता है।
- 16:48मैंने भी गोरख को लिया तो बिलकुल अंतिम में लिया।
- 16:53कृष्ण समझा लिए कबीर समझा लिए, नानक समझा लिए उपनिषद वेद सब समझा
- 16:59लिए लेकिन गोरख? आखिर में ले के आया हूँ गोरख
- 17:07समस्या से भरे गोरख जा रहे हैं। शिष्यों ने पूछा परमात्मा?
- 17:25एक प्रिंट था वह विराट कैसे हो गया तो गोरख बोले परमात्मा ने
- 17:37संकल्प किया एको अहम् बहुत। मैं एक से अनेक और वो हो गया,
- 17:50संकल्प किया और वो हो गया निश्चित ही तुम कैसे समझ पाओगे?
- 17:58बुद्धि कैसे समझ पाएगी इसको? बुद्धि और बुद्धिमान व्यक्ति
- 18:05कहेगा सब बकवास है लेकिन वो चाँद, तारे, सूरज, ग्रह, नक्षत्र, हवा,
- 18:17धूप, पेड़, पौधे। जानवर इनको नकार नहीं पाएगा।
- 18:24सब कुछ देखता हुआ भी वह कहेगा कि यह जो दिखता है यह तो ठीक है
- 18:33लेकिन इसको किसी ने बनाया यह गलत है क्योंकि वह दिखता नहीं।
- 18:41अब धीरे धीरे विज्ञान उस तरफ बढ़ना शुरू हुआ है जहाँ कहते हैं,
- 18:48जो दिखता नहीं वह भी होता है और अभी अभी जो खोज हुई।
- 19:00ये जो फोटान निकलता है, सूरत से वह कण भी है और तरंग भी है,
- 19:08पाटीकर भी है और वेब भी है, तो तुम बुद्धि से समझ कैसे पाओगे?
- 19:16बुद्धि से तुम्हें समझाने वाले खुद ही लाचार हो गए, बेबस हो गए
- 19:21और अंत में आकर उन्हें समर्पण करना पड़ा।
- 19:32गोरख कहते हैं, उसने संकल्प किया एक से अनेक हो गया।
- 19:42शिष्य भी बड़े अजूबे रह रहे होंगे।
- 19:46शिष्य कहती अच्छा तुम बताओ एक से अनेक होके दिखाओ तुम एक हो।
- 19:56गौरव कहते नहीं, मैं एक भी हूँ और मैं अनेक भी हूँ तो शिष्य कहते
- 20:07ठीक फिर एक का रूप तो हमने देखा अनेक का रूप तो कहाँ शिष्य अर्जुन
- 20:14जैसे रहे। अर्जुन कहता मैंने आपका अपना आपा
- 20:21तो देख लिया। मैं इंद्रियों से परे हूँ, मन सा
- 20:30बाचा करवणा इनसे परे हूँ। कोई कर्म मुझे बांधता नहीं, कोई
- 20:38इंद्रिया मुझे बांधती नहीं, कोई वचन मुझे बांधता नहीं, मैं सबसे
- 20:44परे हूँ, लेकिन आप कौन हैं? प्रभु कृष्ण कहते हैं, आप फिर
- 20:56मेरा विराट सुर जा। कृष्ण अर्जुन को उसका स्वय दिखाते
- 21:06हैं, अपना विराट दिखाते हैं। चल अब तू अनंत को छू ले।
- 21:17इसे कहानियों में ही समझाया जा सकता है, अन्यथा मूक रहना ही
- 21:25श्रेष्ठतम उपाय। तो गोरखाने को तुमने कभी देखा?
- 21:38निधिवन में रास रचाते हैं कृष्ण गोपियाँ अनेक हजारों की ताकत और
- 21:47रास रचाते हैं। निधिवन में प्रत्येक गोपी कहती
- 21:51हैं कृष्ण तू हमारे संग नाच। कृष्ण कहते हाँ नाचूँगा गोपी कहती
- 22:04फिर मेरे साथ नाच दूसरी कहती नहीं, नहीं मेरे साथ साथ नाच
- 22:11कृष्ण कहते तुम फिकर मत करो। तुम आँखें बंद करो, मैं सबके साथ
- 22:16नाचूं। गोपियों ने आँखें बंद कर ली और
- 22:24प्रत्येक गोपी के साथ एक कृष्ण आ गया।
- 22:28निधि वन में रास रह जाती हैं। प्रत्येक गोपी के साथ एक कृष्ण,
- 22:36एक कृष्ण अनेक हो गए। यह एक विद्या शिष्य ने आँखें
- 22:48खोलीं तो देखा ये दर देखते हैं। उधर गौर की गौर।
- 22:59जहाँ कुछ ऐसा अनहोनी घटना घट जाता है, वहाँ बुद्धि लाचार होती है और
- 23:06वही कहती है नमस्कृतम नमस्कृतम नमस्क से नमस्ते नमस्क से नमो
- 23:14नमः। कुंवर कहते देख मेरा व्रत देखो ना
- 23:33बस्ती ना शून्य हूँ मैं ना मुझे ये कह सकते हो कि मैं हूँ और ना
- 23:42ही मुझे ये कह सकते हो कि मैं नहीं हूँ बस तुम्हारी बुद्धि को
- 23:46तोड़ने का उपाय। और कुछ भी नहीं शब्दों से कैसे
- 23:54बुद्धि टूट जाए तुम्हारी तुम बुद्धि से पार हो जाओ शब्द तुम
- 23:58पकड़े हुए हो मैं जब जी पे बोल रहा था।
- 24:06पता ना पता लग आगा सा आगा तो किसी जपजी के रोज़ वाट करने वाली कहने
- 24:21लगी सर कब एंटायर नहीं पापा आगा सा नहीं आगा सा।
- 24:30मैंने कहा देवी तू तो यहाँ से तो बाबा को समझ नहीं पाएगा।
- 24:40कहती क्यों बाबा? मैंने कहा वह बाबा शब्दों से पार
- 24:45है, जिसकी वाणी मैं बोल रहा हूँ और तू शब्दों से चिपटी हुई है,
- 24:52इसलिए तू तो चल आगे बड़े बड़े मुकाम से आएँगे, जहाँ तुझे बुद्धि
- 24:57समर्पित करनी होगी और संत का उद्देश्य भी यही होता है।
- 25:04कैसे तुम्हारी बुद्धि को तुमसे अलग कर दिया जाए?
- 25:09बुद्धि ही बाधा है, बुद्धि ही जड़ है तुम्हारे अज्ञान का, कृष्ण
- 25:19कहते हैं कि देखो। प्रत्येक गोपी के साथ कृष्ण रास
- 25:26रचाते हैं कृष्ण गोकुल के लोगों को बदमाश लगते हैं, चोर उचक्के
- 25:40लगते हैं, लोगों का माखन कहा जाते हैं, चोर बदमाश लगते हैं।
- 25:46नहाती हुई स्त्रियों के कपड़े चुरा के पेड़ पर चढ़ जाते हैं।
- 25:53उनका व्यवहार संदिग्ध लगता है, इसलिए शिशु पालू धोखा खा जाता है।
- 26:02शिशु पालू से गालियाँ निकालता हर एक गाल?
- 26:08अरे चोर अरे गुंडा बदमाश, दूसरे की स्त्रियों को चुरा के ले जाने
- 26:18वाला, भगा के ले जाने वाला, न जाने क्या क्या गाली निकलता है।
- 26:22कृष्ण कहते हैं। 100 गालियाँ माफ़।
- 26:24मैंने बुआ को कह दिया तो कृष्ण का चरित्र तुम माप न पाओगे, परमात्मा
- 26:39की व्याख्या करते हैं। पहले शब्द में परमात्मा की ही
- 26:42व्याख्या होनी चाहिए। किसी भी संत ने जब अपना ग्रंथ
- 26:47शुरू किया तो सबसे पहले एकौ सुमरीय नान का जो जल चल रहा है।
- 26:57एकौंकार बाब नानक ने कहा, ओम भेद कहते।
- 27:05उपनिश्चित कहते हैं ओम ओंकार वो ध्वनि है, नाम नहीं ओंकार का नाम
- 27:13मत लिया करो, ओंकार का नाम जपना मुड़ता है।
- 27:18ओंकार वो ध्वनि है जिसके पास। हमने पहुंचना है और जीस ध्वनि के
- 27:24पास पहुँचकर हमारी मंजल मिल जाती है।
- 27:31हमें रास्ता समाप्त हो जाता है। उस ओंकार की बात करते हैं उपनिषद।
- 27:40और वित्त तुम जीस, ओंकार की बात करते हो, उस ओंकार का जप करते हो,
- 27:48वह जप में आता नहीं, बड़ा फिराट है।
- 27:56खरा नालों वक्खर कीड़ा शब्दा तीर्थ जो है वो शब्दों में समाएगा
- 28:01कैसे तो कृष्ण एक से अनेक हो जाते हैं, एक से अनेक हो जाते हैं।
- 28:13गोरख। और चक्कर खा जाता है उनके शिष्यों
- 28:23का दिमाग इसलिए गोरख ने इतने चमत्कार दिखाए और इतनी वाणी बोली।
- 28:35और बिल्कुल विरोधी बातें की उन विरोधी बातों को सुनकर लोगों ने
- 28:41कहा ये क्या गोरखधंधा है? बस्ती न सोनम सोनम न बस्ती अगम
- 28:56अगोचर ऐसा। गगन शिखर में बालक बोल ता का नाम
- 29:04दुर्गव कैसा गगन मंडल में बालक बोल गगन शिखर।
- 29:16गगन मंडल शिखर ब्रह्मरंद्रा इसमें बालक बोल रहा है यह जो ओंकार की
- 29:24ध्वनि अनहद नाद तुम्हें सुना ही पड़ता है।
- 29:27मैंने कल ही बात की थी और प्रथम वाक्य में ही उन्होंने आनंदनाथ का
- 29:33ये कर। गगन शिखर में बालक बोला ये बालक
- 29:41क्या है? जिसकी आवाज का कोई अर्थ नहीं
- 29:44होता, लेकिन मीठा बहुत होता है, बच्चा बोलता कितना अच्छा लगता है?
- 29:52गगन शिखर में बालक बोले तुम्हें अनंतनाथ जगह जगह तो तुम भाग्यशाली
- 30:07हुए जगह तो तुम जैसा भाग्यशाली कोई भी नहीं।
- 30:16बस तुम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ प्राणियों में शुमार हो गया, जीस
- 30:23जीस के भीतर गगन मंडल से वो आवाज आनी शुरू हुई।
- 30:29वह धन्य हो गया। गगन शिखर में बालक बोला है यह
- 30:37बालक की आवाज़ परमात्मा की आवाज़ है इसलिए ईशा ने कहा ओनली दे विल
- 30:43एंटर इन माइ गॉड एस किंगडम हू विल बी इनोसेंट जस्ट लाइक ए चाइल्ड।
- 30:52बच्चे के समान जो निर्दोष मन वाले होंगे, चित्त होगा निर्मलजन का,
- 31:02वो ही मेरे प्रभु के राज्य में प्रवेश कर पाएंगे।
- 31:08गगन शिखर में बालक भूल हैं। नाम धरगहु कैसा उसका नाम कैसे
- 31:14रखोगे? क्या रखोगे उसका नाम?
- 31:18धोनी का कोई नाम होता है अक्षरों को नाम दे दोगे तुम सरों को नाम
- 31:30दे दोगे तुम। कह दो कि ये कोमल है, ये तीव्र
- 31:35है, ये मालकोस है, ये दरबारी है रागों को नाम देखो ये भैरवी है
- 31:45लेकिन धोनी को नाम कैसे दे पाओगे? धुन को जो स्वर निकला।
- 31:56स्वर का कोई नाम नहीं होता तुमने दे दिए बात अलग तुमने दे दिए
- 32:01कन्वर्सेशन के लिए, ताकि हम समझ पाएं यह मालकोस है, यह दरबारी है?
- 32:14महल उदास और गलियाँ सुन चुप चुप हैं।
- 32:27देव? दिल क्या?
- 32:37उजड़ा तू नियाजड़ी रूठ गई है बाहर।
- 32:51हम। जी बनके ऐसे गुजारें हो हो, मंदिर
- 33:08गिरता फिर बन जाता। आय दिल को कौन सबा ले आओ, दुनिया
- 33:27के रखवा ले। धोनी को क्या नाम दोगे?
- 33:37तुम सर को कोई नाम नहीं दे सकते है सर वो मिठास सर, वो आनंद जीसको
- 33:47पिया जा सकता है। जो कानों के जरिए शहद उडलता है और
- 33:55तुम्हारे प्राणों में बस जाता है, वह स्वर को नाम कह दोगे तुम,
- 34:01लेकिन हम नाम देते हैं। ओनली फॉर दी सेक ऑफ कन्वर्सेशन।
- 34:07पहचान के लिए पहचान पत्र जैसे हम देते हैं।
- 34:11किसी को वास्तव में हमारा नाम नहीं होता।
- 34:16हमारा नाम तो हमारे माँ बाप ने रखा है या किसी ज्योतिषी ने रख
- 34:23दिया? लेकिन हमारा कोई नाम थोड़ी है इस
- 34:30पंचभौतिक तत्व, शरीर का पुतले कहाँ कोई वास्तु के नाम थोड़ी
- 34:35होता है या तो हम रख देते हैं, सिर्फ कन्वर्सेशन के लिए आसानी हो
- 34:44जाती है। गगन शिखर में बालक बोला है नाम
- 34:52दरगु कैसे तुम्हारे गगन मंडल में वह आनंदनाथ की आवाज गूंज रही है
- 35:03तो उसको नाम क्या दोगे? नाम कैसे दोगे?
- 35:09तुम्हारी कोई हैसियत नहीं है। तुम उस गगन मंडल में गूंजते हुए
- 35:16उस स्वर को कोई नाम दे दो, इसीलिए हमने नाम दिया अनहद अनाहत।
- 35:24जो दो चीजों के टकराने से नहीं बनता।
- 35:28अन आहत आहत। जो दो चीजों के टकराने से बनता अन
- 35:35आहत जो दो चीजों के टकराने से नहीं बनता ये कोई नाम थोड़ी है।
- 35:43ये तो उसका गुण तत्व है। अनाहत नाथ साउंड ऑफ एक्सिस्टेंस
- 35:56अनइंस्ट्रक्टेड साउंड। गगन मंडल गगन सिखर एक यही बात है
- 36:10सत्यखंड मैं बालक बोले बड़ा प्यारा शब्द प्रयोग किया।
- 36:23गोर्ख पहले ही शब्द में लुभा जाते हैं बोलने का ढंग इतना प्यारा और
- 36:31अलंकार इतनी शानदार गगन शिखर में बालक बोले नाम दुर्गहु कैसे उसका
- 36:38नाम रखूं कि कैसे? उसकी आवाज कितनी प्रिय है, कितनी
- 36:44निर्दोष है, कितनी इनोसेंट मासूम है, उसका नाम रखोगे?
- 36:49कैसे उसका कोई नाम नहीं होता। ऐसा है वो।
- 36:58सबसे पहले महिमा करते हैं गुरु गोरखनाथ उसकी जो ना सत्य है ना
- 37:12असत्य है। ये नया बात कह दिया उन्होंने।
- 37:25हमारा सनातन कहते हैं कि वह सत्य है लेकिन गोरख कहते हैं कि वह
- 37:34सत्य भी नहीं है क्योंकि जिसका विपरीत होता है वह वह नहीं है
- 37:44जैसे शांति का उल्टा अशांति होता है।
- 37:49सत्य का उलट असत्य होता है, सत्य का उलट झूठ होता है ना तुम्हें उस
- 38:01शिखर में ले जाना चाहते हैं जहाँ भेद खत्म हो जाता है।
- 38:06अद्वैत आ जाता है। अभी ईद आ जाता है और शब्दों का
- 38:12ऐसा प्रयोग करते हैं जैसे बिल्कुल छांट छांट के शब्द होते हों।
- 38:19आप सुनोगे गोरख की वाणी को तो बड़ा मज़ा आएगा।
- 38:30जीने का असली ढंग सीधा सीधा सिखाते हैं गोरख गोरख जब तक जिए,
- 38:39बड़े मज़े से जिए एक से अनेक हो जा, परमात्मा ने संकल्प किया और
- 38:52हो गया। एक से अनेक होजा कृष्ण ने संकल्प
- 38:57किया और हो गया एक से अनेक होजा गोरखनाथ ने संकल्प किया और हो गया
- 39:06जो उस सतल पर चला गया। जीस सतल को परमात्मा का तल कहा
- 39:11जाता है। उस स्तर पे जो भी चला गया उसका ये
- 39:16लक्षण है कि वह एक से अनेक हो जाने की क्षमता रखता है।
- 39:27मैंने कहानी आपको सुनाई होगी। मैं भी अनेक से अनेक हो जाया करता
- 39:38था। लोगों ने बहुत दखाया मैं अपने
- 39:41अनेक रूप एक ही वक्त में कहीं भी हूँ, वहीं भी हूँ, वहीं भी हूँ तो
- 39:50मैंने आपको पिछले ही प्रवचन में सुनाया था कि कैसे मैं तीन किलो
- 39:55लड्डू ले के आए। मैं वहाँ भी बैठा था।
- 39:59और जीस दुकान से लड्डू लेके आया वो दुकान आज भी है और जिन्होंने
- 40:05लड्डू खाये वो भी आज है और मैं वहीं बैठा हूँ।
- 40:09उनके पास वो लोग भी मौजूद हैं जिनके पास बैठा आज सब कुछ है
- 40:16लेकिन तुम पूछने कोई कोई आया? लेकिन आया बस उसकी संतुष्टि हो गई
- 40:23और वो मौन हो गया। मौन हो गया और शांत हो गया।
- 40:31उसका भ्रम टूट गया और बहुत से लोग।
- 40:38अपने एकांत में बैठे उस एकांत का रसवान उस आनंद का रसवान कर रहे
- 40:46हैं, बस उनका एक ही काम रह गया सुबह उठो क्रियाएं करो, स्नान
- 40:55ध्यान करके। कुछ न करने में बैठ जाऊं, जिसे
- 41:01मैं ध्यान कहता हूँ और जब मेरी वीडियो आये तो वीडियो सुन लो और
- 41:122233 वर्षों से बैठे हैं। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं।
- 41:20जो एक बात में ही समझे जाते हैं। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं कि पूरा
- 41:26शस्त्र भी बोल दिया जाए। पूरी रामायण बोल दी जाए तो सुबह
- 41:32उठ के वो पूछेंगे सीताराम की माँ थी।
- 41:38यही गड़बड़ पैदा हो जाती है। एक से अनेक हो जाना।
- 41:51मैंने अमीबा के उदाहरण आपको देखा, उसमें भी बिल्कुल वही शक्ति है
- 41:59इसलिए उसको इ मोटल कहते हैं अमीबा इज़ ए मोटल वो कभी मर्त नहीं।
- 42:07और परमात्मा भी कभी मर्ता नहीं नैनं चिदंती शस्त्रण नैनं दाहती
- 42:12पावख नै चैनं कलि दिन त्यापो न सुश्यतिमारूता।
- 42:22अमीबा भी कभी नहीं मरता। देखिए एक उदाहरण आपके सामने
- 42:28परमात्मा ने अपनी उदाहरण संसार में रख छोड़ी है ताकि उनको इंगित
- 42:35किया जा सके मुझको बताने के लिए। अमीबा मर्तनी अपने आप के ही
- 42:46स्वभाव से बिना और नरमाता के मिलन से अमीबा खुद से ही दो हो जाता
- 42:51है। यही परमात्मा का स्वरूप है।
- 42:54परमात्मा ने कहा, मैं एक से अनेक हो जाऊंगा।
- 42:57अमीबा भी कहता मैं एक से अनेक हो जाऊं और हो जाता है और कुछ ही
- 43:04घंटों में दो से चार और कुछ ही घंटों में चार से आठ और कुछ ही
- 43:09घंटों में आठ से 16 तुम्हें बड़ी हैरानी होगी।
- 43:15कैसे बिना नर और माता के यहाँ तो तुम्हारा बच्चा नौ महीने में फलता
- 43:21है यहाँ अमीबा कुछ घंटों में ही एक से अनेक हो जाता है।
- 43:28परमात्मा एक क्षण में ही एक से अनेक हो जाता है।
- 43:34संत व्यक्ति एक क्षण में ही एक से अनेक हो जाता है, लेकिन संत संत
- 43:41बुरा नहीं करेगा। आपका वह संत ही क्या जो किसी का
- 43:47बुरा क्या कल ही किसी ने प्रश्न पूछा था?
- 43:53कृष्ण ने पहले अंत क्यों नहीं किया कांस्य का?
- 43:57और शिशु पाल का नहीं, कृष्ण विधान को लेकर चलते हैं।
- 44:05कृष्ण अपनी सृष्टि के नियमों में ही बंधे हुए।
- 44:13हो जाते हैं। न होते हुए भी इस शब्द को फिर सुन
- 44:18लो। कृष्ण बंधे हुए नहीं हैं, उन्हें
- 44:21कोई रस्सी बांध नहीं सकती, कोई बंधन बांध नहीं सकता, लेकिन फिर
- 44:26भी। वो अपने ही बनाए हुए नियमों के
- 44:30अंतर्गत स्वयं से बंध जाते हैं, नियमों का प्रयोग करते हैं, कंठ
- 44:39को इस योग्य हो जाने दो, इतने पाप कर लेने दो।
- 44:44फिर मैं नियमों के अंतर्गत इसका वध कर दूंगा।
- 44:51शिशुपाल को इतना पाप कर लेने दो भगवान को गाली निकालने का कितना
- 44:56अर्थ होता है? इसलिए जो व्यक्ति भ्रम लीन हो गया
- 45:01उसको गाली मत निकालो। उसके साथ गलत व्यवहार मत कर, जो
- 45:13एक से अनेक होने की क्षमता रखता है, ईसा को सूली चढ़ा दिया गया।
- 45:19परिणाम देख रहे हो? आज सबसे बड़ी जमात इसाई इसाई से
- 45:28बड़ी जमात सनातन नहीं है। हमारे हिंदू तो बहुत छोटे हैं।
- 45:37कितनी तहसदद दी गई? ला इलाहा इलल्लाह, मोहम्मद उल
- 45:53फरसी रसू लल्लाह मोहम्मद को कितनी तहसद दी कि फातिमा को कितनी तहसद
- 46:00दी गई? राजनीतिज्ञ इन बातों को सुनेंगे
- 46:08नहीं, सुनना भी नहीं चाहिए, क्योंकि मेरी बातों को सुनोगे तो
- 46:14तुम्हारी राजनीति टूटेगी। तुम्हारी राजनीति टूटेगी तो
- 46:23तुम्हारा भ्रम टूटेगा, फिर तुम्हारे।
- 46:28सही लक्ष्य का तुम्हें पता चलेगा, फिर तुम इस खोपड़ी की गंदगी से
- 46:35बाहर आओगे जीसको राज़ करके भी राज़ का सुख न मिला वह का खाक
- 46:43राज़ किया। परिणाम भी तो आना चाहिए।
- 46:48लड्डू खाया, मुँह भी मीठा न हुआ, फिर क्या खाक लड्डू खाया तुम कहते
- 46:59हो हम राज़ करेंगे, लेकिन एक भी व्यक्ति मुझे बता सकता है धरती
- 47:05का। आज तक जीतने शहंशाहे आलम हुए
- 47:10जीतने चक्रवृत्ति सम्राट हुए, कितनों ने राज़ किया इस धरती पर,
- 47:16कितनों ने कहा? यह मेरा स्थान है, यह मेरा
- 47:21क्षेत्र है। क्षेत्र किसका हुआ?
- 47:29क्या ये तुम्हारा भ्रम नहीं था कि सभी ने कहा कि यह क्षेत्र तो मेरा
- 47:33है? अशोक जैसे लोग आए, चंद्रगुप्त
- 47:37विक्रमादित्य जैसे लोग आए। उन्होंने कहा, यह क्षेत्र मेरा
- 47:43है। लेकिन कहाँ गए वो, आज कहाँ है वो
- 47:49सिकंदर ने कहा मेरा है कहाँ है ऐसे ही तुम कहते हो ये मेरा है
- 48:00क्या तुम्हारा है? क्या जिन्होंने कहा था कह दूँ
- 48:10हकीमों से? ये बोलकर।
- 48:20कहते थे। दावा किताबें खोलकर।
- 48:28जमीन वहीं की वहीं रही। दावा करने वाले आज कहाँ हैं बताओ?
- 48:43उनके मुँह। से कहो ये बोलकर।
- 48:54करते। थे।
- 48:55दवा किताबें खोलकर ये दवा ये दवा हरगिज़ न खाली जाएगी।
- 49:13जब तेरी कहाँ है वो जो लुकमान, जैसे हाकीम दवा करते थे, दवा खाली
- 49:21नहीं जाएगी। डोली उनकी भी उठ गई।
- 49:27जरी शिकंदर का? यहीं पर रह गया।
- 49:33देखो तुम फिर कोई कमाए जाते हो, तुम्हें समझदार कहें या मूर्ख
- 49:40कहें या महामूढ़ कहें ये गददियों पे कल और था कोई।
- 49:49आज तुम हो कल कोई और होगा निश्चित और होगा जर सिकंदर का यहीं।
- 50:01पर रह गया मरते। मरते दम लुक।
- 50:11मानवी यह कह गया यह घड़ी यह घड़ी हरगिजन डाली जाएगी।
- 50:28जब तेरी ढोली निकाली जाएगी बे मुहूर्त के उठा ली जाएगी जब तेरी।
- 50:48बस्ती न सोन्यम सोन्यम न बस्ती अगम अगोचर ऐसा गगन शिखर, मैं बालक
- 50:55बोल ताको नाम द्रव्यु कैसा क्या सीखे तुम पहले शब्द से?
- 51:07गौरख के शब्द वाणी का पहला दोहा इससे तुमने क्या सीखा?
- 51:20गगन शिखर में बालक बोला नाम दरगुह कैसा?
- 51:26जीस नाम का तुम जाप करते हो अरे मूर्ख हो जीस पांच नाम का तुम
- 51:34जिक्र करते हो जीस राधे राधे राम को बोलते बोलते तुमने आसमान के
- 51:41शिखर पे उठा लिया। और गौरख कहते हैं गगन शिखर मैं
- 51:50बालक बोल, वह धुन है वह अक्षर नहीं है, निरक्षर है।
- 52:03अक्षरों से पार है, अक्षरों से दूर है।
- 52:08गगन शिखर में बालक बोले नाम धरगहु कैसा तुम्हें क्या पता ये उसका
- 52:14नाम है? देखिए, मैं पहले भी बहुत बार कह
- 52:22चुका हूँ और हर एक संत यही शब्द कहता है और कमाल की बात है।
- 52:28तुम उसी संतों के नाम पे नाम जप करते हो और सभी संतों ने नाम जप
- 52:35का खंडन किया। गगन शिखर में बालक बोले नाम धर्गू
- 52:42कैसे? गोरख कहते है उसका नाम तो बताओ
- 52:52क्या है, कैसे रखा तुमने नाम उसका क्या है?
- 52:59फॉर्मूलेशन तुम्हारा नाम रखने का व्हाटस दी फॉर्मूला?
- 53:04तुमने उसका ये नाम रखा कैसे? बहुत से लोग कहते हैं शमण करो,
- 53:11तुम्हें पता है तुम सदा ही शमण उस चीज़ का कर पाते हो जो तुमने कभी
- 53:17देखे हो ज़रा एकांत में बैठ के। एकांत के आलम में खोए हुए अपने
- 53:28बंद कमरे में बैठ जाना, रात को सोए हुए अपने बिस्तर पे 10 मिनट
- 53:34के लिए खाली हो जाना और इस वक्त पर मनन करना।
- 53:43कि तुम्हें क्या पता कि उसका ये नाम है जो तुम जब रहे हो, किसने
- 53:48कहा और तुम जीसको स्मरण कर रहे हो?
- 53:56तुम्हें क्या पता कि वह वैसा ही है?
- 54:00जैसा तुम स्मरण कर रहे हो किसी ने सैर पे बैठी हुई माँ दुर्गा बना
- 54:09दी, किसी ने कमल के फूल पे बैठी हुई लक्ष्मी बना दी।
- 54:22सारे संसार में कहीं भी भारत के सिवा लक्ष्मी की पूजा नहीं होती,
- 54:27सभी जगह लक्ष्मी को भोंगा जाता है।
- 54:37इसी दिन तो लक्ष्मी यहाँ आती नहीं।
- 54:41भोगने की शौकीन है लक्ष्मी। और तुम लक्ष्मी को भोकते नहीं,
- 54:47तुम लक्ष्मी को पूजते हो, उसे भोग चाहिए इसलिए बाहर के मुल्कों में
- 54:54चली जाती है, अंग्रेजों के पास खूब है क्योंकि अंग्रेज उसको खूब
- 54:59भोगते हैं। उसे भोग चाहिए तुम लक्ष्मी को
- 55:08आरती दीपक दिखाना शुरू करते हो, शुद्ध शुभचार पूजन करते हो और जीस
- 55:19मुल्क में लक्ष्मी की पूजा होती है।
- 55:21वो कंगाल तुम्हें पता है जानते हो तुम?
- 55:29जब भारत सोने की चिड़िया थी, उस वक्त लक्ष्मी की पूजा नहीं होती
- 55:34थी। जब से तुमने लक्ष्मी की पूजा करनी
- 55:38शुरू कर दी और लक्ष्मी को भोगना बंद कर दिया।
- 55:43लक्ष्मी छलांग लगा के विदेशों में जुटी है।
- 55:50लक्ष्मी को कोई पासपोर्ट वीज़ा थोड़ी चाहिए।
- 55:56हमारे तो ऐसे ऐसे धूर्त हैं हम तो नाम रख लेते हैं गगन राम मंडल
- 56:02में। गगन शिखर मैं बालक बोला है नाम
- 56:08दरगहु कैसे? तुमने कैसे पता किया कि उसका नाम
- 56:16वह गुरु राम रहीम अल्लाह गॉड। राधा है किसने बताया तुम्हें
- 56:32जिसका तुम जीसको तुम याद करते हो तुम्हें पता है याद हमेशा वो आता
- 56:37है जो तुमने कभी देखा हो। तुमने कभी चाबी देखी ही न हो
- 56:41कुंजी तो तुम चाबी को याद कैसे कर पाओगे?
- 56:50तुम्हारी स्मृति में हमेशा देखी हुई चीजें फील्ड होती हैं।
- 56:55स्मृति में आकृतियाँ फीड होती हैं जो तुमने पहले से देखी होती हैं।
- 57:04ईश्वर की कोई आकृति है ही नहीं, वो ही यह कहते हैं अगम अगोचर
- 57:13जिसकी कोई आकृति नहीं जीस तक पहुंचा ही नहीं जा सकता।
- 57:20उसका कोई रूप नहीं, उसका कोई रंग नहीं है तो तुम याद करोगे तो
- 57:26करोगे किसको? मेरे पास एक बात बताये, मैं
- 57:40मुश्किल वक्त लेके आए थे। मैं वक्त थोड़ा कम देता हूँ लोगों
- 57:44को। 4:00 बजे तक तो रात की पी हुई भी
- 57:48नहीं उतरते, इतनी पी लेता हूँ सारी रात जब तुम्हारा संसार का
- 57:58सांसारिक व्यक्ति सोता है तो मेरा योगी जागता है।
- 58:06रात भर जागकर तुम करफटे बदलते हो और रात भर जागकर हम उस समय के
- 58:12प्याले पीते हैं और नाम खुमारी नान का चढ़ी रहे दिन रात।
- 58:24उसका होना उसकी मौजूदगी, उसकी एक्सिस्टेंस दट।
- 58:28इस कॉल्ड नाम उसकी खुमार चौबीसों घंटे चढ़ी रहती है।
- 58:38बा मुश्किल कहीं जाके हल्की होती है 4:00 बजे तो हम 4:00 बजे के
- 58:43बाद मिलते हैं। बरसों बीत गए
- 58:56क्योंकि 4:00 बजे से पहले वो उतरती ही नहीं है, छूटती नहीं है
- 59:05काफिर मुँह को लगी तुम जानोगे जब तुम्हें वो काफिर मुँह पे लग गई।
- 59:151 दिन तो तुम भी यही शब्द कहो के छूटती नहीं है काफी और मुँह को
- 59:23लगी हुई फिर तुम छोड़ नहीं पाओगे जो जाता है जाने दो जो आता है आने
- 59:33दो। हम तो अपनी मस्ती में आग लगे
- 59:37मस्ती में आती है हँसी मुझको हरकतें इंसान
- 59:51पर आती है हँसी मुझको हरकतें इंसान पर।
- 59:58गलतियाँ तो खुद करे और दोष दे भगवान पर जब तुमने भगवान देखा ही
- 1:00:03नहीं और तुम दोष दूसरों को दोगे, हनुमान जी इसको बता के जाते हैं,
- 1:00:16ये क्या पूछने आया है? बस इतनी सी बात बताने के लिए
- 1:00:23हनुमान जी पैरा लगाते हैं सिद्ध कर लिया इसका मतलब गुलाम बना
- 1:00:28लिया। ऐसे लोगों को हम पूछते हैं लाखों
- 1:00:35की संख्या में। हम इकट्ठे होते हैं, लाखों की
- 1:00:43संख्या में पागलों की जमात है सारी गलतियाँ तो खुद करें और दोष
- 1:00:56दे भगवान पर गुरख का पहला शब्द। बस्ती न सोन्यम सोन्यम न बस्ती
- 1:01:07अगम अगोचर ऐसा गगन शिखर में बालक बोले नाम दरगों कैसा?
- 1:01:18आनंदनाथ जो बज रहा है गगन मंडल में निरंतर दिनभर रात 2400 घंटे
- 1:01:24और उसी से दिवाली है सदा दिवाली सादगी और आठों पहरा आनंद।
- 1:01:32ओह अनंतनाथ, इतना मीठा इतना प्यारा मिश्री भी उसका क्या
- 1:01:36मुकाबला करेगी? शहद भी उसका क्या मुकाबला करेगा?
- 1:01:45गगन सिखर में बालक बोले उसकी आवाज़ बच्चे जैसी मीठी प्यारी
- 1:01:53अर्थ कोई नहीं। तुम्हारे तो शब्दों के अर्थ हैं,
- 1:01:59तुम तो परमात्मा को शब्दों से व्याख्याहित करने में लगे हो ये
- 1:02:04आचार्य गण कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ते।
- 1:02:08गीता को अष्टावक्र गीता को उपनिषदों को।
- 1:02:12व्याख्यात करने में कोई कोर कसर वाक्य नहीं छोड़ते।
- 1:02:24तमन्नाएँ हैं तमन्नाएँ ज्यादा हैं तो रुलाई तमन्नाएँ कम हैं
- 1:02:32शहनशाही। तमन्नाएं ज्यादा हैं तो रुलाई हैं
- 1:02:37तुम्हारी जितनी तमन्ना ज्यादा होगी तो तुम रहोगे, क्योंकि
- 1:02:42तमन्ना कभी किसी की पूरी हुई है तमन्नाएँ कम हैं शहंशाह।
- 1:02:50तमन्नाओं को कम कर लो। जरूरतों को कम कर लो शहंशाह इस
- 1:02:57शरीर के पंचभौतिक तत्व के शरीर पर रेशमी कपड़ा डाल लो या खदर का
- 1:03:04कपड़ा डाल लो। इस शरीर को क्या फर्क पड़ता है?
- 1:03:09तमन्नाएँ कम हैं तो शहेनशाही है और तीसरी बात तमन्नाएँ बिलकुल
- 1:03:16नहीं तमन्नाएँ बिलकुल नहीं तो खुदाई है, परमात्मा को कोई तमन्ना
- 1:03:24नहीं। उसको कुछ नहीं करना होता।
- 1:03:40म जाना मैं योगम जपम नैव पूजम न तोहम सदा सर्बदा शम्भोतोप्यम।
- 1:03:50न योग करता है, न तप करता है, न तप करता है।
- 1:03:53न पाठ करता, न पूजा करता, न प्रार्थना करता, न अरदास करता न
- 1:04:00जानाम योगम जपम नैव पूजाम न तोहम सदा सर्वदा शम्भू तोप्रम।
- 1:04:20छुप गयो, फिर तान सुनके कहाँ गयो हो।
- 1:04:37इक भान चला के छुप गए हो फिर इक तान सुना के कहा गए हो?
- 1:04:56इक बाण चला के कहाँ गए वो इक बाण चला, गोकुल ढूंढा मैंने।
- 1:05:16मथुरा ढूंढे गोकुल ढूंढा, मैंने मथुरा ढूंढे कोई नगरिया।
- 1:05:35ना छोड़ी रे कोई नगरिया ना छोड़ी रे।
- 1:05:50सुध विसरा गयो मोरी वो काला काला इक भां सूरीवाना।
- 1:06:09वो काला इक भा सुरी वाला शुध विसरा गयो मोरी रे शुध विसरा गयो।
- 1:06:29मो। रही ओह काला इक बा सुरी वाला
- 1:06:47धन्यवाद।