Latest / Baba ji Vijay Vats / 1 Feb 26 - जीवन एक लीला: यह लीला क्या है? चरम और दिव्य चक्षु? What's The Ultimate Truth? Part - 1
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- 0:17भालचंद बाबा जी आपके पहले प्रवचन से आजतक के प्रवचन।
- 0:39मैंने सभी सुनी बस एक प्रश्न का जवाब दे दीजिए।
- 0:52व्हाटस दी अल्टीमेट टूथ ऑफ लाइफ? जीवन का अंतरिम सत्य क्या है?
- 1:10बस साल्टी में ट्रुथ ऑफ लाइफ जीवन का अंतरिम सत्य क्या है?
- 1:27देखिए भांजा जी। इसके बाद कोई भी प्रश्न सभी
- 1:40प्रश्न बेकार हो जाते हैं। यह अंतिम प्रश्न है और इसके बाद
- 1:56पूछने को कुछ रहता है बताने को भी कुछ नहीं रहता।
- 2:05आइए अगर आपने पूछ के लिया है। तो आइए हम अंतर के उन गहरे तलों
- 2:13में अंतर तम के उन गहरे तलों में चले जहाँ ये सत्य विद्यमान है।
- 2:26शांति से बैठ जाऊं। मौन होकर सुनिए जैसा मैंने जाना
- 2:45और दूसरा। जैसा आपको मानने की कोई आवश्यकता
- 2:51नहीं, मैंने अपने अनुभव से जाना जैसा मैंने जाना।
- 3:08वह सब तुम्हें मानने की बिल्कुल आवश्यक है इसलिए मीन मेख मत
- 3:18करिएगा। मैं नहीं तो जाना वो आपको बता रहा
- 3:27हूँ। यह जीवन एक खेल है।
- 3:53इसलिए महान पुरुषों के जीवन को अवतारों के जीवन को हमने लीला
- 4:03कहा। हम राम लीला करते, हम कृष्ण लीला
- 4:11करते। हाँ, मनुष्य के जीवन को हम जीवन
- 4:23कहते हैं। उसका जीवन कैसे गुजरा, लेकिन
- 4:33अवतार पुरुष? ऐसा व्यक्ति जिसमें वह सर्जन हरा
- 4:45प्रवेश कर गया हो, हमने जीवन नहीं कहा।
- 4:54उन्हें लीला कहा। रामलीला कृष्ण लेलो क्यूँ कहा
- 5:06लीला सुनिए? यहाँ जब तुम अब अपने अंतःस्थ में
- 5:25जाओगे और अंतःस्थल में गहरे अंतःस्थल में चले जाओगे तो तुम एक
- 5:37सत्य को पाओगे। और वह सत्य है कि यहाँ किसी का
- 5:52कुछ नहीं, किसी सर्जनहारी ने यह रंगमंच जता दिया और इस रंगमंच पे।
- 6:13प्रत्येक जीव आता अपने जीवन को जीता और चला जाता किसी जीव के
- 6:29साथ। वह कुछ अपने साथ लेके नहीं आता और
- 6:37कोई जीव जाता हुआ अपने साथ कुछ लेके नहीं जाता।
- 6:45यह जीवन का अटल नियम तुम भी अपनी नग्न आँखों से रोज़ देखते हो?
- 7:01तुम ने पूछा पुत्र बड़ा सुंदर सुहाल जीवन का आंतरिक सत्य है,
- 7:14जीवन का आंतरिक सत्य है। कि मैं नाम की कोई चीज़ इस सजना
- 7:30में नहीं, यह सोपन की तरह है पल भर के लिए आता।
- 7:42और न जाने कहाँ गुम हो जाता है किसी का जहाँ कुछ नहीं मैंने अपने
- 7:59अनुभव से ऐसा जाना। यहाँ जो भी आता है, कभी आँखें खोल
- 8:12के देखना कभी कुछ लेके नहीं आता। और जो जहाँ से जाता है आँखें खोल
- 8:25के देखना संग कुछ नहीं लेके जाता तुम जिसे जिंदगी कहते हो।
- 8:43सतरुप से अगर उसे वर्णन करो उसके डेफिनिशन दो तो जब तुम जाते हुए
- 8:57कुछ लेके नहीं जाते। और जब तुम जन्म लेते हो तब तुम
- 9:06कुछ ले के नहीं आते, फिर यह सारा पसारा है किसका?
- 9:25मैंने अपने अनुभव से यह जाना? और ये तो तुम भी जानते हो, मुझे
- 9:38इस पर सर्टिफिकेशन की आवश्यकता नहीं है।
- 9:46किसी दिन तुम नहीं थे। माता और पिता के बीच में संपरम और
- 9:56अंडाणु जनु विकसित हुए। गर्भ में दोनों का मिलन हुआ और
- 10:09धीरे धीरे तुम्हारा विकास हुआ। और तुम्हारे जन हो गया ज़रा
- 10:19सोचियेगा जब वो वीर तुम्हारे दादा, पड़दाता सड़ दादा।
- 10:33उनकी वीर की थैली में था परम और अण्डान माता के गर्भ में था तो
- 10:46तुम कहाँ थे? तुम ज्यादा दूर न जाओ, पांच
- 10:59पीढ़ियां पहले की बात ले लो, पांच पीढ़ियां पहले तुम भी नहीं थे,
- 11:08तुम्हारे माता पिता भी नहीं थे, उसके माता पिता भी नहीं और उसके
- 11:12माता पिता भी नहीं थे। तुम्हारी पांचवीं पीढ़ी थी।
- 11:21पांचवीं से चौथी पीढ़ी आई, पांचवीं पीढ़ी के माता पिता मिले
- 11:30उनके मिलन से चौथी पीढ़ी। चौथी पीढ़ी के माता पिता मिले तो
- 11:36तीसरी पीढ़ी तीसरी पीढ़ी के माता पिता मिले तो उनके स्पर्म और
- 11:42अंडानों से मिलकर दूसरी पीढ़ी और दूसरी पीढ़ी के माता पिता आपस में
- 11:48मिले तो उनके मिलन से। आपके मिलन से अगली पीढ़ी होगी तो
- 12:06ज़रा बताओ तुम तो थे ही नहीं क्या तुम्हारे माता पिता भी थे?
- 12:15क्या उनके माता पिता भी थे क्या उनके माता पिता भी थे?
- 12:29तुम खोजो और पाओगे कि इनमें से कोई भी तो नहीं था।
- 12:38के सिर्फ दो पुरुष और स्त्री के मिलन से आए।
- 12:45लेकिन तुम्हारा वजूद तो बहुत बाद में आया।
- 12:48पांचवीं पीढ़ी में आया हम पांच पीढ़ी ही गिन रहे है इसीलिए बता
- 12:54रहा हूँ। उदाहरण करो और जब तुम थे ही नहीं
- 13:02तुम्हारे पिता, दादा, परदादा सड, दादा पुरुष से पहले कैसे भैया,
- 13:10फोर फादर्स। भरा कहाँ से आए?
- 13:25कभी तो कोई काल ऐसा रहा होगा जहाँ से जी शुरुआत हुई होगी।
- 13:34प्रथम जोड़ा मिला होगा। और वह जोड़ा कहाँ से आए?
- 13:51इसलिए मैं तुम्हें कहता हूँ, सब तुम्हारी मान्यताएँ हैं, पता
- 13:57तुम्हें कुछ भी नहीं है। पता किसको है पता सिर्फ उसको है।
- 14:05जो शक्ति को जान लेता है अपने अनुभव से, अपने अनुभव से यानी
- 14:11अपनी नग्न आँखों से यहोदी धर्म, इस्लाम धर्म और ईसाईयत धर्म
- 14:22इब्राहिम से जन्म लेते हैं। और उनका मानना है कि पहले दो
- 14:31व्यक्ति स्त्री और पुरुष आदम और ईव थे, लेकिन ध्यान रखना यह
- 14:39मान्यता है सिर्फ मान्यताएँ हैं। इतिहास है।
- 14:45एक कहीं से तो हमें शुरू करना ही होगा तो इन तीन धर्मों के मुखियों
- 14:56ने शुरुआत कर दिया। आदम और ईव से।
- 15:03आदम ई मिले बहुत पहली पीढ़ी थी हमारी फिर आगे पीढ़िया बढ़ती गई
- 15:14उनके मिलने से, लेकिन तुम कहाँ थे जो आज छाती ठोक के कहते हो?
- 15:30वो कहाँ थे? तू थे, थे भी के नहीं, दिमाग से
- 15:42सोचोगे तो दिमाग गड़बड़ा जाएगा, लेकिन अनुभव से ये बातें दिखी
- 15:48जाती हैं। यह सोचने की चीज़ नहीं लिखा लिखी
- 15:53की है नहीं देखा देखी बात। तो तीन धर्मों के मुखिया कहते हैं
- 16:12अब्राहम से शुरू, उसके बाद बंट गए यहूदियों का मुँह सा ओके, ईसाइयों
- 16:25का ईसा। इस्लामियत का मोहम्मद ओके?
- 16:36लेकिन तीनों का आगाज आजमा और ईव से होता है।
- 16:51हमारा आदि स्रोत क्या कहते हैं सनातन सनातन कहता मन्नू और
- 17:00शत्रुपा आपस में मिला है। पहली जोड़ी थी पहला मन्नू, इसलिए
- 17:06मन्नू नाम रखा गया मन्नू से मनुष्य।
- 17:10मानव मन ये सब मन से बने। मन्नू और सतरूपा की जोड़ी सबसे
- 17:24पहली जोड़ी फिर धरती पर। ध्यान रखिएगा, मैं तुम्हें
- 17:35मान्यताओं की बात बताता हूँ। इसमें सत्य क्या है क्या नहीं है?
- 17:43मैं ज़रा भी जिक्र नहीं करता मैं तो वो बात बताऊँगा तुम्हें।
- 17:51जो मैंने अपनी आँखों से देखी उसके अतिरिक्त मैं कुछ भी नहीं
- 17:58बोलेंगे। बाकी मान्यताओं की बात बताऊँगा।
- 18:00तुम्हें तो सनातन कहता है। पहला जोड़ा था मन्नू और शत्रु।
- 18:12उनके दोनों से मिलने से पांच संतान ही हूँ।
- 18:21दो पुत्र थे, तीन पुत्र आगे वंश बढ़ते गए और आज हम आ गए।
- 18:35ये कहानी है इतिहास तुम कहते कागज की लिखें और मैं कहता।
- 18:57तुमने पूछा पुत्र भांजा व्हाटस दी अल्टीमेट ऑफ लाइफ चौक मत जाना,
- 19:13घबराना भी मत। अल्टीमेट सब लाइफ ये है तुम्हारा
- 19:25यहाँ कुछ नहीं, ऐसा नहीं तुम ही नहीं हो, फिर ये पसारा क्या है?
- 19:37हम नहीं हैं। और हमारा यहाँ कुछ नहीं है।
- 19:42यह बिल्कुल खुली आँखों से देखता है।
- 19:53हमारा यहाँ कुछ नहीं क्योंकि जब व्यक्ति मर जाता है तो हम उसका
- 19:58शरीर तक भी फूँक देते हैं। मान्यताएँ हैं की आत्मा होती है।
- 20:06मान्यताएँ के दूसरा जन्म होता है, लेकिन यह मान्यताएँ और मान्यताएँ
- 20:17कौन सी ठीक और कौन सी गलत यह भी तो आप।
- 20:22अभी तक सत्य नहीं कर पाए कंगाल नहीं पाए मान्यताएं तो मान्यताएं
- 20:36यह भी मान्यताएँ थी कि आदम और ईब ने शुरुआत की।
- 20:42मनु और शत्रु पानी शुरुआत की और यह भी मान्यता है कि तुम हो यह
- 20:57मान्यता है। जब तुम नहीं रहते तो तुम कहाँ
- 21:08जाते हो? अगर तुम हो तो मरने के बाद तुम
- 21:15क्या हो और वो कहाँ जाते हो? लेकिन ये बुद्धि हर चीज़ का जवाब
- 21:27देती है ध्यान रखना। मैं मात्र वही बोल रहा हूँ जो
- 21:41मैंने अपनी लग्न आँखों से देखा लिखा लिखी की है।
- 21:49देखा देखी बात तुम कहते कागज की लेखी और मैं कहता आँखों देख अगर
- 22:04तुमने पुत्र मुझसे ही पूछ लिया। तो फिर मैं लफ्ज़ जो शब्दों में आ
- 22:12सकता है, वो सत्य बोलेंगे तो पहला सत्य मैंने बोला इससे पहले तो सब
- 22:27मान्यता मनुष्यतरूपा आदम। ईव यह सब मान्यताएँ थी आपको
- 22:36समझाने के लिए कि तुम यहाँ तुम्हारा कोई लबोलबास्थान कभी
- 22:49शुरू हुई थी, यह है सरजना। मान्यताओं के हिसाब से आदम ईव और
- 22:57मनुष्य लेकिन आज तुम कहते हो कि मैं हूँ, मैं तुम्हें कहता हूँ।
- 23:12तुम नहीं हो यह मैंने अपनी आँखों से देखा कोई नहीं है यह एक के
- 23:28सिवा। इसलिए जो भी उस आंतरिक तत्व को
- 23:34देख के आया उसने पहला सत्य उच्चारण किया एक ओंकार बस वो एक
- 23:47ही है। यहाँ तक के परमाणु को तुम अपनी
- 23:54बुद्धि से भी देख सकते हो। जब यहाँ मरते हुए कोई संघ लेके
- 23:59नहीं जाता तो फिर जन्म लेते हुए संघ लेके कहाँ से आएगा?
- 24:09और जन्म लेते हुए जब कोई संघ लेके कुछ नहीं आता तो मरते हुए संघ
- 24:15लेके कौन जाएगा। ऑल ऑफ दीज़ आर योर ओन बिलीफ्स ये
- 24:33सभी तुम्हारी मान्यता है। तुम चौंकना मत।
- 24:52नगन आँखों से देखा हो जही कि न तो यहाँ तुम ना ही तुम्हारी तुम्हारा
- 25:06यहाँ कुछ है। ऑल ऑफ दिस आर योर ओन बिलीफ्स ये
- 25:16सभी तुम्हारी मान्यताएँ भर रहे। सभी शास्त्र धार्मिक शास्त्र
- 25:27सब्जेक्ट्स। सूचना आरआर।
- 25:40ये तुम्हारी मान्यता फिर सत्य है। कि यह जगत एक लीला है, अगर तुमसे
- 25:59कहोगे अच्छा हम करो पुण्य मिलेगा पुण्य से सुख।
- 26:10पाप कर्म करोगे, दुख मिलेगा, लेकिन जब मैंने अंतरिम छोर पे
- 26:23जाकर देखा तो चीजें वस्तुएं बदल जाते है।
- 26:40एक छोर ऐसा आता है जहाँ जो तुम देखते हो वह पाते हो कि गलत था,
- 26:50जो मैंने देखा। ये दीवारें, ये छत, ये पंखा जब हो
- 27:09पाए ये दिखता है। बिल्कुल दिखता है, लेकिन अगर मैं
- 27:20तुम्हें कहूँ कि ये है नहीं फिर क्या होगा तो मुझे पागल को होगा।
- 27:39आज साइंस भी दो क्षति हो गई है। भला गो से सोचियेगा कैसे एक आकण
- 27:53तरंग भी हो सकता है बिलकुल? ऑन दी सेम जंक्चर एंड ऑन दी सेम
- 27:59पॉइंट उसी वक्त में एक पार्टिकल कण एक तरंग कैसे हो सकता है यह तो
- 28:08वो बिंदु मात्र होगा वह लकीर होगा दोनों में से एक ही होगा ना या तो
- 28:14वो बिंदु होगा। जब वो पूरी लाइन होगा लेकिन आइस
- 28:20स्ट्रीम कहते हैं ना? वह बिन्दु भी है, पार्टिकल भी है
- 28:26और वेब भी है और आज गड़बड़ा गया। और कहता यह दोनों एक वर्गी में
- 28:40दोनों चीजें देखी जाती हैं, लेकिन आज उसका सिद्धांत फैल हो गया।
- 28:53आज नया सत्य सामने आया कि दोनों यकसा नहीं देखी जाती।
- 28:58जैसे ही तुम पार्टिकल को। देखोगे?
- 29:01उसकी तरंग अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और जैसे ही तुम तरंग को
- 29:07देखोगे उसका पार्टिकल अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।
- 29:16लुई डी ब्रॉगली ने एक सिद्धांत प्रतिपादित किया।
- 29:23कि जो चीजें तरंग की तरह मानी जाती थीं, वह कण की तरह भी
- 29:29व्यवहार करती है। अजीब सिद्धांत कण और तरंग तरंग
- 29:42जैसे सूर्य की रौशनी की तरंग फोटॉन।
- 29:45और कण जैसे पदार्थ मैटर। वो कहता है कि जो चीज़ तिरंग मानी
- 29:54जाती है, वह कण की तरह भी व्यवहार करती है, लेकिन दोनों ही फॉर्मल
- 30:00राज़ करते हैं। मैंने ऐसा भी।
- 30:10मैंने जो अंतिम सत्य देखा वह यह देखा और मैं इसे अपनी एनलाइटनमेंट
- 30:21की वीडियो में डाल भी चुका। यह पदार्थ का संसार धीरे धीरे
- 30:31वास्तुभूत होता चला, पेड़ मिट गए, पौधे मिट गए, दीवारें मिट गयी,
- 30:40गोदाम मिट गया, टेम्पल मिट गया, टोम मिट गया, बाबा धर्मदास का।
- 30:48खेत का रिहान मिट गए और जैसे ही मुझे शांत मुझे सर के ऊपर नजर
- 31:00आया। शरद पूर्णिमा का चाँद जो 1985 की
- 31:10घटना है 88। और मैंने अपनी ऊँगली से जब मैंने
- 31:14चाँद को छुआ वह चाँद बड़ा ठंडा था।
- 31:28यह मैंने देखा यह कोई सिद्धांत नहीं है, दर्शन है इसे आप किसी
- 31:45प्रकार का नव सिद्धांत न समझ लीजिए।
- 31:50अनुभव और सिद्धांत में बहुत विस्तारित अंतर हुआ करता है।
- 31:57यह मैंने देखा और मैंने पहले ही ये शब्द बोला था जो मैंने अनुभव
- 32:03किया वो तुम्हें मानने की ज़रा भी आवश्यकता नहीं।
- 32:09इसलिए मैंने पहला शब्द ये बोला उस वक्त आकर शरद पूर्णिमा की रात का
- 32:21करीब 8:30 बजे का वक्त होगा। जब यह प्रोसेसर शुरू हुई, हल्की
- 32:26हल्की कुमारी क्षण शुरू हो गई। मैं मधुहोस अवस्था में हो गया।
- 32:34और मैंने देखा वहाँ एक छोटी सी दीवार थी 456 फुट ऊंची और टूटी
- 32:46फूटी थी। उसकी ईंटें इधर उधर बिखरी हुई थी।
- 32:50मैंने एक ईंट के ऊपर पांव रखा, फिर दूसरी के ऊपर पांव रखा, ऐसा
- 32:54मुझे आदेश हुआ। मुँह का आदेश और फिर आदेश के ऊपर
- 33:05देखो। और इससे पहले चंद्रमा मैंने आसमान
- 33:13में बहुत दूर जितना दूर है, 3,84,400 किलोमीटर दूर है।
- 33:23मैंने देखा मेरे सिर के बिल्कुल ऊपर था।
- 33:29लेकिन व्यक्ति को यकीन नहीं आता। मैं मैंने अपनी ये ऊँगली ऊपर उठा
- 33:37के देखा तो ऊँगली चंद्रमा के साथ लग गई, क्या हुआ?
- 33:53कोहरे ताल मिले, नदी के जल में नदी मिले सागर में सागर मिले कौन
- 34:10से जल में? कोई ज्ञानी ना कोहरे ताल मिले,
- 34:21नदी के जल में नदी मिले सागर में। सागर मिले कौन से जल में कोई जाने
- 34:35न ओहोरे ताल मिले नदी के जल। हमने जीवन को जीने के लिए एक
- 34:49व्यवस्थाएँ बना रखी हैं और सब नियम, सब किताबें, सब विषय
- 34:56सब्जेक्ट्स और सब धार्मिक पुस्तकें मान्यताएँ हैं हमारी
- 35:02सिर्फ। इन ए रियल ऑल ऑफ दीज़ आर आवर ऑन
- 35:15बिलीफ्स ये सिर्फ हमारी स्वयं की मान्यताएँ हमारे विश्वास।
- 35:25विश्वास टूटा, वृहद रूप से टूटा ये दीवारें सामने गोदाम सामने
- 35:46नंबरदारों की ऊंची की। 910 फुट कुछ ये पेड़ पौधे बहुत आए
- 35:54थे, मात्रा में खड़े थे वो ग्रीनरी बहुत थी ये धरती, ये
- 36:01आसमान ये तारे। धीरे धीरे यह मटेरियलिस्टिक वर्ड
- 36:14इवैक्यूरेट होता क्या और धीरे धीरे यह बौद्धिक जगत?
- 36:28भौतिक पदार्थ मैट्र यह धीरे दे शून्य होने रकम और बदल गया श्वेत
- 36:40व्हाइट पार्टिकल कणों में। सब जगह सब जगह मुझे कण ही कर नजर
- 36:52आई, व्हाइट चमकते हुए शाइनिंग। हर तरफ यही कुछ था।
- 37:08कहाँ गई दीवारें कहाँ गया वह पूर्ण वृक्ष कहाँ गए आस पास के
- 37:14सभी वृक्ष कहाँ गई ये पांच छह फुट ऊंची दीवार और कहाँ गई वो पास में
- 37:21ही? गोदाम की दीवार गोदाम ही नहीं था।
- 37:27चाँद तारिक हो गए और मेरा यह है बंधन मेरा यह ढांचा।
- 37:46कब टूट गया, कब मैं इससे बाहर हो गया कोई पता नहीं सभी दिशाओं में
- 37:54इन ऑल डायमेंशन्स मेरा सेल अप शुरू हुआ।
- 38:03यहाँ आकर भ्रांति मटी कि मैं मैं मात्र शरीर नहीं वास्तव में कुछ
- 38:15और है और यह जो मैं देख रहा हूँ मेरी इन आँखों से।
- 38:22यह सत्य नहीं फिर यह सत्य है जो दिख रहा है यह वह सत्य है जो पहले
- 38:31खुली आँखों से दिख रहा था ना सड़क थी जीस पर मैं चल कर आया ना वो
- 38:38रहा था कच्चा जहाँ से मैं चल कर आया।
- 38:41कुछ भी तो नहीं था सब भौतिक जगत धीरे धीरे विलुप्त होता चला जा
- 38:48रहा था। सत्य किसे कहे जो इन आँखों से
- 39:06देखा? और 85 के अंदर में 33 वर्ष का था।
- 39:17चौंतीसवें वर्ष में इस शरीर की अवधि लग चुकी थी।
- 39:26बाबन का जन्म 85 की घटना 33 वर्ष पूरे हुए 11 अगस्त को और ये घटना
- 39:3328 अक्टूबर चौंतीसवें वर्ष में मैं चल रहा था।
- 39:42आज भी जब मैं उसे याद करता हूँ। तो किसी दूसरे आलम में खो जाता
- 39:50हूँ तो बहुत बहुत दिनों तक लगा, कभी मुझे ऐसा लगा।
- 40:09मैं इस संसार में चल रहा हूँ, कभी मुझे ऐसा लगा यह संसार मुझमें चल
- 40:15रहा है और यह कोई अनिर्णयक स्थिति नहीं थी।
- 40:25कोई संसक स्थिति नहीं थी। क्योंकि शंशा की स्थिति व्यक्ति
- 40:31को दुखी करती है। शंशाहीनता की स्थिति थी क्योंकि
- 40:38इस अनुभव में चाहे मुझमें संसार चल रहा हो, चाहे मैं संसार में चल
- 40:46रहा हूँ। इन बोथ ऑफ दी कंडीशन्स आई वॉज़ इन
- 40:51टू मच प्लेज़र मैं बहुत आनंद अवस्था में था, लेकिन आज तक मुझे
- 41:02समझ नहीं आया। आज तक कभी मुझे समझ नहीं आया कि
- 41:05सत्य क्या था? यह ठीक या वह ठीक आज भी मैं बहुत
- 41:18तनों से बोलता हूँ और मैंने पाया कि अतीत के संतों ने भी ऐसा ही
- 41:28कुछ कहा। रामकृष्णा परमहंस कभी माँ से कहते
- 41:34हैं कि माँ? केशव को ठीक कर दे, तेरा प्रसाद
- 41:38मार दूंगा और एक तट पर रामकृष्णा परमहंस कहते हैं कि जो राण और जो
- 41:45कृष्ण उन दोनों को मिला दो तो वह रामकृष्णा।
- 41:59ना तुम हो ना यह तुम्हारा कुछ यह पहला सत्य यह पहला सत्य लेकिन यह
- 42:12बोल सत्य नहीं। बढ़ता गया, बढ़ता गया, बढ़ता गया,
- 42:19कहाँ तक मेरा फैलाव था, मुझे आज भी पता नहीं कितने मिलियन
- 42:29ट्रिलियन कुयद्रिलियन माइल्स था, मुझे पता नहीं।
- 42:40कितना भ्रमंड था पता नहीं, क्योंकि भ्रमंड तक खो गए थे
- 42:47सॉलिडिटी भौतिकता समाप्त हो गए। ठोसत्व समाप्त हो गया।
- 42:58उसकी जगह क्या रहेगा, उसकी जगह शून्य नहीं रहेगा, ये समझ लेना
- 43:05बात को ठोसत्व समाप्त हो गया और वह।
- 43:13श्वेत पार्टिकल्स कणों से युक्त है।
- 43:16हर जगह भरा पड़ा है लबा लब लबा लब भरा पड़ा है और दो कणों के बीच
- 43:24में कोई स्पेस नहीं है। यानी की ये है सारा विस्तार।
- 43:34उन श्वेत कणो से भरा हुआ है सारा विस्तार कूट कूट के भरा हुआ है
- 43:46श्वेत कणो से फिर वह क्या था? यह ठोस था वो दिवाली पेट्टों बट
- 43:58टेम्पल वे गोदाम, वे बोना वृक्ष और पास में खड़े हुए बहुत से
- 44:05वृक्ष और गौशल मंदिर। और गौशाला मंदिर के सामने गौशाला
- 44:14उस सड़क जहाँ से मैं आया था कहाँ गई कहीं भी नहीं थी और इस स्थिति
- 44:28में। मैं जस्ट लाइक ए स्टेचू मूर्तिवत
- 44:35खड़ा था, बस यह मूर्तिवत खड़ा होना बिल्कुल ऐसे ही था जैसे हम
- 44:41आज मंदिरों में मूर्ति खड़ी कर देते हैं, ना हिलती है, ना जुलती
- 44:46है, ना खाती है, ना पीती है। मुझे कुछ पता नहीं कि श्वास आ रहा
- 44:51था कि नहीं आ रहा था यह भी नहीं पता मुझे दिल धड़क रहा था नहीं
- 45:00धड़क रहा था मुझे नहीं पता, क्योंकि मेरा विस्तार शरीर के
- 45:06भीतर था ही नहीं। मैं इतना विस्तृत हो गया था कि
- 45:12इतनी दूर बहुत दूर, बहुत दूर और सभी दिशाओं में में ऐसा नहीं के
- 45:21पूर्व उत्तर तक दक्षिण पूर्व तक पूर्व पश्चिम तक।
- 45:27कहीं एक दिशा में या दो दिशाओं में फैला हूँ नहीं इन ऑल
- 45:31डाइमेंशन्स लगातार मैं फैल रहा था सभी दिशाओं में बराबर जैसे गोला
- 45:42का रूप में कोई बढ़ता है। वे झीलें, वे समुद्र, वे नदियां
- 45:58नहीं थीं फिरें कहाँ गईं? यह जवाब मुझे आज तक नहीं मिला।
- 46:08मिले कभी नहीं, मैं समझता हूँ क्योंकि यह जवाब देती है बुद्धि
- 46:16और बुद्धि में यह क्या घटा? यही नहीं आ सका।
- 46:24तो जवाब कहाँ से आएगा? यह क्या घटा बुद्धि से हतप्रभ है,
- 46:33चकित है वंडरफुल वंडरफुल वंडरफुल एक दर्शन हुए आगे बाद में मैंने
- 46:43जब। मैंने उससे पहले ग्रंथ नहीं पढ़े
- 46:48थे। कोई ग्रंथ अगर पढ़ता थोड़ा बहुत
- 46:55देर पढ़ता 10 5 मिनट पढ़ लिया, बंद कर देता हूँ मुझे लगता ये
- 47:01लफ्जी हैं, शाब्दिक हैं काव्य जी हैं।
- 47:05इनमें सत्य नहीं मिलेगा। छोड़ देता जो मैं नहीं जानू अपना
- 47:20ही फैला ठोसत वर्ष समाप्त हुआ सोली डर्टी खत्म हुई।
- 47:30और उसका स्थान दिया श्वेतगण बहुत मस्ती का आलम था।
- 47:41संसार में दुख है, दर्द है। संसार में समस्याएं संसार में सोच
- 47:51है संसार में तर्क है, वित्तर्क है संसार में अलग अलग रंगों का
- 47:59दर्शन है, अलग अलग वस्तुओं का दर्शन है, लेकिन वहाँ।
- 48:05कुछ बिलगाम नहीं था, बस एक ही तत्व था।
- 48:11फिर मुझे बाद में समझाया कि बाबा नानक ने समाधि की अवस्था के बाद
- 48:21फ़ौरन जो शब्द पहला बोला वो बोला एक और का।
- 48:26बस एक ही था और वह उसका नाम क्या करे?
- 48:36सफेद कण आनंद से भरे हुए कण। ज़रा भी सोचना थी ज़रा भी कष्ट न
- 48:50था, दुख न था, दर्द न था, समस्याएं नहीं होती, कोई चाहत
- 48:57नहीं थी लेकिन आनंद था। गहरा आनंद चारों तरफ बिखरा पड़ा।
- 49:04कण ही कण थे स्वेतरम खर तुम मुझसे पूछते हो?
- 49:13वर्ष साल्टी में ट्रुथ ऑफ लाइफ। देखिये ट्रुथ शब्द तो मैंने आपको
- 49:25बता दिया आई कैनट डिफाइन एंड आई कैनट डिस्क्राइब अनुभव बता दिया
- 49:38मैंने आपको और पहले भी यही कहा मैं सिर्फ आपको अनुभव बताऊँगा।
- 49:43जो मैंने देखा जो मैंने जाना। शायद इसी अवस्था में कबीर ने कहा
- 49:55होगा मैं कहता आँखों देखी वो आंख की ओर से देखने वाली।
- 50:04ये आँख तो देख रही थी जो चीज़ वह उस आंख ने नहीं देखी जो उस आंख ने
- 50:11देखी, वह इस आंख ने नहीं देखी। जो इस आंख ने देखी वह उस आंख ने
- 50:18नहीं देखी। लेकिन फर्क कितना था?
- 50:25इस आंख ने जो देखा उसमें बिलगाव था रंग रंग थे तरह तरह के ठोस था,
- 50:37वास्प था चंद्रमा की। रोशनई थी पेड़ पौधे थे, चमक दमक
- 50:46थी, ठोसत्व था, लेकिन वहाँ सब गायब था, वहाँ मात्र एक आनंद था,
- 50:55इसीलिए मैं समझा कि सत्य, चित और आनंद।
- 50:59वहाँ जाकर परमात्मा की व्याख्या ये क्यों की गई?
- 51:03तीन अक्षरों में वह चेतन जीता, सत्य जने मौजूद था मौजूद था मौजूद
- 51:13है मौजूद रहेगा। सत्य चेतन था।
- 51:19चेतन था क्योंकि सब समझता सब महसूस हो रहा था सब मेरी महसूसियत
- 51:35में आ रहा था हर तरफ का पहला। दसों दिशाओं का फेला और आनंद ही
- 51:44आनंद था। ये तीनों चीजों को मिलाकर सच्चे
- 51:47आनंद बनाया गया। यह बिल्कुल सही शब्द था तो फिर
- 51:54समझाया कि इससे पहले भी। संतों ने यह देखा है मैं पहला
- 52:06व्यक्ति नहीं हूँ अब तुम पूछते हो सत्य क्या है?
- 52:14सत्य तो वही है जो आनंद देता है जहाँ कोई भेद नहीं था जहाँ बस एक
- 52:24था जहाँ दुख और दर्द नहीं था जहाँ बस आनंद था, जहाँ कोई मूर्छा और
- 52:32नहीं थी, बस एक चेतना था। तुम कहाँ जाना चाहोगे ये खुद से
- 52:45पूछो इसका जवाब मैं ना दे पाऊंगा, ये तुम सोचो।
- 53:01तुम इस स्तर पर रहना चाहते हो या उस स्तर पर जाना चाहते हो, तुम
- 53:07मीरा की तरह उसकी वह की आग में जलकर उसे पुकारना चाहते हो और
- 53:16उसमें खो जाना चाहते हो या तुम उसके बिना भी।
- 53:21चला लूँगी ज़िन्दगी यह तुम्हारी ऑप्शन है यह तुम्हारी चॉइस तुम
- 53:28बिना जीवन कैसे भी था। पूछो मेरे दिल से हाय पूछो मेरे
- 53:50दिल से तुम भी न जी। कैसे भी था पूछो मेरे दिल से हाय
- 54:10पूछो मेरे दिल से। लेकिन फिर यह शक्ति इसीलिए नहीं
- 54:25है। तो हमने पूछा पुत्र अल्टीमेट
- 54:30रूल्स क्या है? क्योंकि यहाँ ठहरने का मन नहीं
- 54:32करता। इसलिए कहीं बाहर नहीं जाता।
- 54:39बाहर जाना खत्म इसलिए इस दशा में रहना नहीं चाहता इसलिए बार बार।
- 54:54वह चुम्बक मुझे अपनी तरफ खींच लेता है।
- 55:01उस आनंद का रास्ता भी लेना चाहता हूँ।
- 55:04हर वक्त उसके वृहद आलम में खो जाना चाहता हूँ हर वक्त।
- 55:12उसके विस्तार में समय जाना चाहता हूँ।
- 55:14हर वक्त अब सार में तुम मुझसे पूछोगे।
- 55:36पहले तो मैंने दोनों तल बोले तुम जीस तल में रहकर खुश हो।
- 55:47उस स्थल पे रहो तुम स्वतंत्र हो तुम्हारी सत्ता स्वतंत्र है इसलिए
- 55:55मैंने तुम्हारी स्वतंत्रता पे ज़रा भी आघात नहीं किया।
- 56:00मैंने प्रथम वाक्य ही ये बोला कि ऐसा मैंने अनुभव किया।
- 56:06और ऐसा अनुभव तब ही नहीं किया। उस वेला को तो 40 साल ईद का है।
- 56:21उससे पहले का जीवन कम था 33 वर्ष का और उसके बाद का जीवन ज्यादा 40
- 56:28वर्ष का। लेकिन आज भी इसको पी लेना चाहता
- 56:35हूँ। आज भी उस मुकाम पे आना नहीं
- 56:40चाहता। फिर क्या सत्य हुआ?
- 56:45अब तुम फैसला को ही कर लो। यहाँ आने का मन नहीं होता और वहाँ
- 56:59से आने का मन नहीं होता जहाँ आने का मन नहीं होता और वहाँ से आने
- 57:06का मन नहीं होता। सदा उस आलम की खुमारी में खो जाना
- 57:12चाहता हूँ वैसा रस है उसके पार कुछ भी है तुम अगर पूछते हो
- 57:27मुझसे। बहुत से लोग ने मुझे कहा गवा, ये
- 57:33तुम्हारी है तो फिर क्या ज़िन्दगी से ज्यादा लंबे स्वपन होते है
- 57:44ज़िन्दगी देती साल और दर्द भरी? कष्ट भरी, क्या नहीं देखा,
- 57:52ज़िन्दगी में दुख था, दर्द था, परेशानी थी, समस्याएँ थी, कष्ट
- 58:03थे, कलेश थे, उतार चढ़ाव था। वह आलम उतार चढ़ाव का था।
- 58:16कभी हँसा भी, कभी रोया फिर और वह 33 साल का जून तुम कहते हो?
- 58:26तुम्हारी अहलू सुनिश्चण थी। कभी ऐसा व्यक्ति हो जिसने सपना
- 58:33ज्यादा वर्षों का देखा हो और ज्यादा कम बरसों तक रहा हुआ कोई
- 58:42ऐसा कुछ होता भी नहीं होगा भी। सपना पर दो पल का होता है।
- 58:55नींद बड़ी लंबी हो सकती है, लेकिन सपना तो कुछ देर का होता है।
- 59:06यू कैनट से आईटी हैलो कनेक्शन आईटी आईएस एक्सप्रेस यह आनंद है।
- 59:24अब मैं थोड़ा थोड़ा साफ करता जा रहा हूँ।
- 59:26बात को वर्स्ट अल्टीमेट ट्रुथ ऑफ लाइफ यह सत्यिन है और यह सीमित
- 59:41है। यह तो इस देह तक ही है और वह तो
- 59:50आलम के पार है। वह तो न जाने कितने ब्राह्मणों को
- 59:56क्रॉस किए और फैलता ही चला गया और फैलता ही चला गया और हर दिशा में
- 1:00:02फैला। यह तो पूर्व देखूंगा तो पश्चिम
- 1:00:11छिप जायेगा, उत्तर देखूंगा तो दक्षिण छिप जायेगा, लेकिन वहाँ तो
- 1:00:19सब नजर आता था तमाम आलम यक सांव यक वक्त।
- 1:00:27नजर आ रहा था। मुझे और मैं सारे चौहान सारी
- 1:00:32सृजना के भीतर एक में वहीं जाकर कहा होगा ऋषि ने एक को अहँ
- 1:00:41द्वितीय नास्त मैं ही था, अकेला ही था।
- 1:00:50वहीं जाके कहा होगा दादू ने दादू दूजा को नहीं दो जी मन की दो वहीं
- 1:01:00जाकर कहा होगा। जिन्होंने दर्शन किया जिन्होंने
- 1:01:07अनुभव किया अहम् ब्रह्मस्व वहीं जाकर कहा होगा मंसूर ने अनल हक
- 1:01:15मैं खुद खोदा हूँ और वहीं उसी अवस्था में कहा होगा किसी वाजिद
- 1:01:23ने। खालक खलक खलक मैं खालक उस खलक
- 1:01:35में, खालक है खालक खलक खलक मैं खालक।
- 1:01:48परमात्मा सृष्टि में है और सृष्टि परमात्मा में है।
- 1:01:53अजीब वाक्य शब्दों की अपनी तुच्छता है, शब्दों का अपना।
- 1:02:08सीमितता है शुद्रता है ऐसा ही बोला जायेगा सत्य क्योंकि सत्य
- 1:02:14इतना विस्तारित है कि सत्य शब्दों में अपन।
- 1:02:21उसे ऐसे ही विपरीत शब्दों में बोला जाएगा।
- 1:02:25मजबूरी है क्या करें पुत्र मैंने तुम्हें समझाया है तुम्हारे यहाँ
- 1:02:35कुछ नहीं। तुम भी यहाँ नहीं हो, लेकिन निराश
- 1:02:47हूँ, तुम्हें मैं तुम्हें कहता हूँ बूंद का कोई अस्तित्व नहीं।
- 1:03:00बूंद के रूप में बूंद का अस्तित्व जब वो समुद्र में मिल जाती है तो
- 1:03:15बूंद का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
- 1:03:24फिर बहुत समुद्र हो जाती है। तुम नहीं हो क्यों क्योंकि तुम पर
- 1:03:36महत्त्व है तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं है क्यों क्योंकि तुम्हारा
- 1:03:43यहाँ सब कुछ है। यह आखिरी परिणाम है जो मैंने
- 1:03:53देखा, इसलिए मैं अलग अलग तलसर बोलता हुआ तुम कभी मुझे देखोगे
- 1:04:08मैं बोलेंगे मैं की तरह। और कभी मुझे देखोगे मैं बोलूँगा
- 1:04:17मालिक की तरह, कभी मैं बोलूँगा गुलाम की तरह और कभी मैं बोलूँगा
- 1:04:26मालिक की तरह ध्यान रखना। जब मैं मालिक की तरह बोलेंगे तब
- 1:04:35मैं मालिक हूँ और इसमें कोई न तो झूठ होगा न इसमें कोई।
- 1:04:54ऐसा होगा कि मैं कहीं भ्रम खा गया।
- 1:05:00नहीं, मैं किसी भ्रम में नहीं होऊंगा।
- 1:05:04जब मैं कुछ बोलेंगे परमात्मा के रूप में तो उस वक्त मैं परमात्मा
- 1:05:10ही होऊंगा। जब समुद्र कहेगा मैं समुद्र हूँ
- 1:05:17तो ध्यान रखना, उस वक्त वह समुद्र ही होगा और जब समुद्र कहेगा बूंद
- 1:05:25के रूप में कि मैं बूंद हूँ तो ध्यान रखना, उस वक्त वह बूंद ही
- 1:05:32होगा। तो समुद्र के दो रूप हैं एक रूप
- 1:05:37है बूंद का जो तुम अभी हो यह बूंद दुखी है, है तो परमात्मा का
- 1:05:49स्वरूप। लेकिन विक्षण् हो गई है अलगाव हो
- 1:05:55गया है समुद्र से यह अलगाव ही दुख का कारण तुम उस समुद्र में मिल
- 1:06:05जाना चाहते हो, यह है तुम्हारी आंत्रिका विलाशन।
- 1:06:09बस और तुम तुम्हें कुछ नहीं चाहिए तुम्हारी आंत्रिक अभिलाषा तुम्हें
- 1:06:18भी नहीं पता क्या है शांत आखिर में जानता है कि व्यक्ति के
- 1:06:24आंत्रिक अभिलाषा क्या है? जब वह समुद्र में मिल जाता है तो
- 1:06:31वो जानता है कि बूंद की आखिरी अभिलाषा समुद्र में खो जाने की
- 1:06:38थी, समुद्र हो जाने की थी। तुम्हें भी नहीं पता कि तुम्हारी
- 1:06:45यांत्रिक अभिलाषा क्या? और तुम रास्ता भटक गए हो, लेकिन
- 1:06:54ध्यान रखो रास्ता भटकने से बूंद समुद्र का अंश नहीं रहती यह नहीं
- 1:07:03है, यह है सत्य नहीं। रास्ता भटक जाने से बूंद समुद्र
- 1:07:09का अंश तो सदा ही रहती है। वह समुद्र में मिल जाने का अधिकार
- 1:07:17कभी भी नहीं खोती। बूंद कितनी ही दूर चली जाए समुद्र
- 1:07:22से। लेकिन समुद्र में मिलने का अधिकार
- 1:07:28मर्ज होने का अधिकार कभी भी नहीं खोता।
- 1:07:33कभी भी मिल सकती है, कहीं भी मिल सकती है क्योंकि सभी जगहों पर है।
- 1:07:44सब कहीं वो है एव्रीवेयर ही इज़ एव्रीवेयर उसके चरणों पर सब जगह
- 1:07:52पहुंचते तुम अगर दुखी रहना चाहते हो।
- 1:08:03तो ऐसे ही बने रहो जैसे तुम रहो बास नहीं होगी।
- 1:08:13इच्छाएं होंगी, कल्पनाएं होंगी, जजबात होगी।
- 1:08:20भविष्य की योजनाएं होंगी, अतीत की समृद्धियां होंगी, भोगने की इच्छा
- 1:08:26होगी, पदार्थ होगा और तुम होंगे, यंत्र होंगे, लेकिन ध्यान रखना,
- 1:08:34यह अंतरिम सत्य नहीं है। पुत्र और तुमने मुझे पूछा।
- 1:08:39के अंतरिम सत्य का है। व्हाटस अल्टीमेट रो अंतरिम सत्य
- 1:08:46है बोध का समुद्र में खो जाना और समुद्र ही हो जाना एक रूप
- 1:08:56तुम्हारा ये भी है और ये भी सत्य। एक रूप तुम्हारा वो भी है और वो
- 1:09:03भी सत्य है यहाँ असत्य नाम का कुछ भी नहीं असत्य सिर्फ भ्रम है,
- 1:09:14असत्य सिर्फ सपना है और सपना। सपने का कोई वजूद नहीं है।
- 1:09:23तुमने सपना देखा यह बिलकुल सत्य तुम्हारे मनस पटर पर सपने का
- 1:09:30चित्र चित्रण आया बिलकुल ठीक तुमने उसे देखा बिलकुल ठीक लेकिन
- 1:09:37जैसे ही आँख खुली। इक खाब सा देखा था, हमन इक खाब सा
- 1:09:52देखा था हमन जब। आँख खुली तो टूट गया जब आँख खुली
- 1:10:11तो टूट गया चरम चक्षु से। जो ख्वाब तुम देखते हो वह ख्वाब
- 1:10:20है जो चर्म चक्र से तुम देखते हो वह ख्वाब है अभी तुम ख्वाब दिख
- 1:10:28रहे हो, इक खाब सा देखा। था तुमने इक ख्वाब सा देखा था
- 1:10:43हमने जब आँख खुली तो टूट गया। जब आँख खोली तो तो उठ गया।
- 1:10:59जैसे ही ये चरम चक्षु बंद हो जाएगा और तुम्हारे दूसरे चक्षु
- 1:11:06खुल जाएंगे, जिन्हें दिव्य चक्षु। उससे भी तुम देखोगे, फिर उससे जो
- 1:11:14तुम देखोगे, वह सत्य देखोगे, कोई बात नहीं उन जक्षियों से जब तुम
- 1:11:22देखोगे तो सत्य देखोगे वह जीवन का।
- 1:11:29असल सत्य है जो तुमने पूछा पुत्र जो चर्म सक्षों से तुम देखते हो,
- 1:11:35वह सत्य नहीं लगता है? सत्य जैसा जैसे तुमने सपना देखा
- 1:11:42था क्या? सपना सत्य था अगर सत्य होता।
- 1:11:48तो आँख खुलने के बाद उसका कोई पुरजा, कोई जहाज़ देखा, तुमने
- 1:11:55उसका कोई डिराइव, कोई उसका स्टेरिंग, कोई गैर कोई रेस, कोई
- 1:12:03उसकी चाबी, कोई स्टार्ट करने की कोई बंद करने की।
- 1:12:08कुछ पहिया कुछ स्पेयर पार्ट जब आंख खोली तो टूट गया सपने का कभी
- 1:12:17कोई स्पेयर पार्ट तुम्हें दिखता है सपने खोलने का कोई थोड़ा शक
- 1:12:23कली। कोई थोड़े से पग चिन्ह आखिर कुछ
- 1:12:30तो हो? अगर उसका वजूद है तो कुछ तो बाकी
- 1:12:34रहना चाहिए ना नहीं। सपने का कोई वजूद नहीं होता, यह
- 1:12:40भ्रम है। वह कुछ भी नहीं है क्योंकि बाद
- 1:12:43में उसका कुछ भी तो नहीं मिलता। कहा किया सपना तुमने हज़ारों सपने
- 1:12:47देख आज वो वाष्प विभूत होकर भी कहा है तो जो तुमने चर्म शिक्षकों
- 1:12:58से देखा वह झूठ। और जो तुमने अभी तक नहीं देखा और
- 1:13:05वह दिव्य जक्षों से देखा जाता है। पुत्र, वह ही अल्टीमेट ट्रुथ ऑफ़
- 1:13:10लाइफ है। मैं उसको न तो डिफाइन कर सकता हूँ
- 1:13:19डिस्क्राइब कर सकता हूँ। उसके लिए क्षमा का स्वास्थ्यगार
- 1:13:27ये तुम्हारी परिभाषा है? 1 दिन बूँद समुद्र में चली जाएगी
- 1:13:37और समुद्र ही हो जाएगी। यह प्रत्येक बूंद का अंतिम परिणाम
- 1:13:44लक्ष्य एक खाब सादे का था। हमने जब आंख खुली तो।
- 1:13:59टूट गया चबान कोली तो टूट गया ये प्यार तुम्हें सब न बनकर तड़पाये
- 1:14:18कभी? तो मत रोना, ये प्यार तुम्हें
- 1:14:27स्वप्न बनकर लड़वाए कभी तो मत रोना, हम छोड़ चले हैं।
- 1:14:40महफिल को याद आई, कभी सो मत रोना में खो कर।
- 1:14:55तुम मेरे ख्यालों में खोकर बर्बाद न करना, जीवन को बर्बाद न करना
- 1:15:13जीवन को। जब कोई सहेली बात तुम्हें जब कोई
- 1:15:23सहेली बात तुम्हें समझाये कभी तो मत रो हो न?
- 1:15:34हम छोड़ चले हैं महफिल को याद आई कभी तो मत रोना जीवन के सफर में
- 1:15:50तनहल। जीवन के सफर में तनहाई मुझको तो न
- 1:16:01जिंदा छोड़ेगी मुझको तो न जन्मदा छोड़ेगी तनहाई।
- 1:16:14तनहाई इस जीवन में तनहाई होती है एक तनहाई और भी है जीसको महावीर
- 1:16:25केवर ले कहते हैं अकेलापन लोनेली लेस नेस।
- 1:16:35एक तन्हाई ये भी है संसार की यह बड़ी ओबाउ है और एक तनहाई वो भी
- 1:16:42है। साली छूट कैवल्य लोन नीरेस।
- 1:16:51एक तन्हाई मूवी है। इस तन्हाई से उस तन्हाई में जाना
- 1:16:57है, यह ऊबाऊ है, वह बड़ी मीठी है, वह तन्हाई बहुत मीठी है लेकिन यह
- 1:17:07तन्हाई तो मुझे मारेगी। जीवन के सफर में तन्हाई मुझको तो
- 1:17:17न जिंदा छोड़ेगी मुझको तो न जिंदा।
- 1:17:28छो होड़ेगी मरने की खबर ए जा नी जिगर मरने की खबर ए जा नी जिगर आ
- 1:17:43जाए कभी। तो मत रोना दिलवात।