Latest / Baba ji Vijay Vats / 14 Feb 25 - कुंभ का आंतरिक विज्ञान! भगदड़ में मारे गए लोग सिर्फ़ मर गए या उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ?
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- 0:10कल के प्रवचन से आगे है आप? कांटी नुटी से समझ जाते हो,
- 0:21प्रसंग चल रहा हो तो भूमि तैयार होती है।
- 0:27बीज बोया जा सकता है। इसलिए अक्सर मैं तथ्यों को वक्त
- 0:38का इंतजार करता हूँ। कब खोलूं?
- 0:42इस रहस्य को अब वक्त आ गया है। तुलसीदास का एक शब्द है श्रद्धा
- 0:55विश्वास स्वरूपणों या व्यायाम बिनाना पश्यते श्रद्धा।
- 1:10श्रद्धा व्यक्ति को अंतर्मुखी बनाती है, लोगों को व्यक्ति को
- 1:20बेहरमुखी बनाता है। अब इन दो शब्दों को गौर से समझ
- 1:27लेना श्रद्धा व्यक्ति को अंतर्मुखी बनाती है।
- 1:35लोभ व्यक्ति को वहर्मुखी बनाता है।
- 1:43लोग से तुम बाहर की चीजें इकट्ठी करते हो, श्रद्धा तुम्हें भीतर ले
- 1:53जाने में सक्षम है। पहली बात श्रद्धा, दूसरी बात।
- 2:05ये जो चार स्थान है, जहाँ कुंभ पर्व मनाया जाता है, नासिक,
- 2:13उज्जैन, हरिद्वार, प्रयागराज यहाँ ऐसी ही घटनाएं घटी थीं।
- 2:21मैं पहले भी बता चुका हूँ। कोई ऐसा संत जो पी गया हो अगस्त
- 2:32की तरह समुद्र को यह अगस्त का समुद्र को पीना यही कहता है
- 2:44तुम्हें? अन्यथा व्यक्ति सौमद पर पी नहीं
- 2:47सकता। गागर में सागर समा नहीं सकता,
- 2:56लेकिन अगर कहीं गागर में सागर समा जाता है, वो अनहोनी घटना है।
- 3:03जहाँ जहाँ चार स्थानों पर यह अनहोनी घटना घटी वो जो पी गए थे
- 3:10उस अमृत को किसी अमृत वेला में अमृत काल में लब्बालब भरे पड़े
- 3:19थे। उन्होंने शरीर का त्याग किया
- 3:20यहाँ। इन चार स्थानों पे हर की पौड़ी,
- 3:27त्रिवेणी संगम, उज्जैन, नासिक इन चार स्थानों पे क्योंकि एक एक
- 3:39बूंद मैं कर भी बता चुका हूँ। वो एक बूंद जो अंतिम विलीन होती
- 3:47है सागर में जिसे तुम कारण शरीर कह देते हो, मैं उसे चेतना की
- 3:54बूंद कहता हूँ, जब बिलकुल आखिर में देही को छोड़कर वह चेतना की
- 4:03बूंद। समुद्र में समा जाती है उसे ही
- 4:06कबीर ने कहा बोध सामान्य समुद्र में है तो इन चार स्थानों पे चार
- 4:21प्रबुद्ध व्यक्तियों ने। अपनी वो बूंद कारण शरीर विसर्जित
- 4:30किया, को कहा किसी काल में लाखों वर्षों पहले और मैंने कल भी कहा।
- 4:44कि जब कोई व्यक्ति प्रबुद्ध व्यक्ति जो कभी किसी काल में
- 4:49विराट के उन रंगों को समाहित कर लिया था जब शरीर छोड़ेगा तो एक
- 4:56विस्फोट होगा। महा।
- 5:01शक्ति पैदा होती है जैसे परमाणु के विस्फोट से होती है, वह चहुँ
- 5:11और फैल जाएगी और चहुँ और तरती पानी वायु आकाश अपने।
- 5:23सभी में समा जाएगी। वहाँ दूर तड़प बड़ी आसान भाषा में
- 5:34बोल रहा हूँ। समझने के लिए प्रयास नहीं करना
- 5:39होगा, आपको समझ में आ जाएगा। वो व्यक्ति जिन्होंने किसी काल
- 5:46में उस अमृत का भान कर लिया वह जब विसर्जित होगा और उसकी वो कार्य
- 5:55शरीर की अमृत बूंद चैतन्य की वो बूंद वहाँ पर समुद्र में उतर
- 6:02जाएंगे। तो एक विस्फोट होगा महा विस्फोट
- 6:12जीसको हमारे शास्त्रों में लिखा है सृष्टि का आगाज और वैज्ञानिक
- 6:21कहते हैं। महा विस्फोट हमारा धर्म कहता है
- 6:30परमात्मा ने संकल्प किया एको अहम बहुशाम इस्लाम कहता है हो जा।
- 6:42संकल्प किया और सृष्टि हो गई। कहने के ढंग हैं, घटना एक ही है
- 6:54एक्सप्लोजन कह लो एक ओह हम बहु श्याम कह लो हो जा कह लो।
- 7:03घटना एक ही है। करोड़ों वर्ष पहले ये घटना घटी थी
- 7:12और आज भी वहाँ पर बोथ रंगे विद्यमान हैं।
- 7:17पी गई धरती पी गया आसमान। पिगा जल और अग्नि, वायु, चहुं और
- 7:36बोत रंग फैली है। पहला मैंने बताया श्रद्धा यह
- 7:44सूत्र है। दूसरा, मैंने बताया कि उस स्थान
- 7:49पर वहाँ विस्फोट हुआ हो। किसी ऐसे प्राणी ने देह विसर्जित
- 8:00किया हो, कारण शरीर विसर्जित किया हो।
- 8:06दूसरी घटना यह है पहली घटना श्रद्धा, दूसरी घटना उस स्थान पर
- 8:21यह चार स्थान जो मैंने बताया। वहाँ देही में कारण शरीफ समुद्र
- 8:29में समा गया। ये घटना घटी थी और आज लाखों साल
- 8:36बाद भी वैसे ही लगातार उत्सर्जित हो रही है।
- 8:44ना परमात्मा कभी चुकता है और ना ही ये तरंगें कभी चुकेंगी क्योंकि
- 8:52उस काल में उसने परमात्मा को पी लिया था।
- 8:55वह विराट हो गया था पीकर और तीसरी अकाशीय गृहस्थिति।
- 9:06उस वक्त आकाश में कौन सा ग्रह कौन से स्थान पर था, ये तीनों चीजों
- 9:14के मिलान से होता है। त्रिवेणी न के तीन नदियों के
- 9:19मिलान से तुम हर चीज़ को बाहर घसीट लेते हो।
- 9:24भीतर की प्रक्रिया का तुम्हें पता नहीं है।
- 9:28ये तीन चीजों का संगम जब हो जाए जीस व्यक्ति ने शरीर को विसर्जित
- 9:35किया वो स्थान तो वही रहेगा जिसे आप संगम कहते हैं।
- 9:45दूसरा श्रद्धा अब एक बात ध्यान से समझ लेना हमारे पूर्वज ऋषि बड़े
- 9:55समझदार थे, वो जानते थे शंभू। जहाँ जीस स्वभाव से इकट्ठा होगा
- 10:07वो समूह गुणित होता चला जायेगा बहुभाव आपने देखा भीड़ जब इकट्ठी
- 10:18होती है। और भीड़ क्रोध में होती है तो पता
- 10:28नहीं लगता किसकी आग जल गई, दुकान, मकान, परिवार।
- 10:39क्या हो गया कुछ पता नहीं। भीड़ के क्रोध का आवेग तुम्हें
- 10:48अपने भाव में बहा ले जाता है इसलिए भीड़ सदा ही बुरी होती है।
- 10:57इस मामले में। अगर क्रोध और नफरत से युक्त हो तो
- 11:04संत यह जानते थे एक व्यक्ति इतना क्रोध नहीं कर सकता जितना भीड़ कर
- 11:10सकती है। एक व्यक्ति इतनी नफरत नहीं फैला
- 11:12सकती जितनी भीड़ फैला सकती है। नफरत की भीड़ कुछ भी कर सकती है,
- 11:24जला सकती है, खाक कर सकती है। और आपने उदाहरण देखे होंगे।
- 11:33इतिहास में बहुत से उदाहरण मिलते हैं।
- 11:43इसी तरह श्रद्धा की अगर भीड़ हो तो श्रद्धा गुणित हो जाती है।
- 11:53आपने मामूली घटनाओं में देखा होगा।
- 11:57मामूली सत्संगों में जब भीड़ होती है तो आप श्रद्धा के भाव में बह
- 12:04जाते हैं, प्रेम और करुणा के भाव में बह जाते हैं इसलिए राजनीतिज्ञ
- 12:14बैठ जाते हैं। भीड़ का तूफान हो तो वहाँ ऐसा
- 12:22वातावरण बन जाएगा भावों का कि उस नेता को खुद ही भीतर से लगेगा कि
- 12:31मैं जीत जाऊंगा। मैं पावरफुल हूँ, इतने लोग मेरे
- 12:34साथ हैं। श्रद्धा का एकी कारण जीतने ज्यादा
- 12:41लोगों का उतनी ही श्रद्धा गुणित हो जाएगी।
- 12:52इसलिए ये मेला लगाया गया उस काल खंड में।
- 12:58जब बृहस्पति, सूर्य और चंद्र ये तीनों एक विशेष स्थिति में होते
- 13:03हैं और उन विशेष स्थितियों में ही उन संतो ने उस चेतना की बूंद को
- 13:12वहाँ छोड़ा था समुद्र में। फिर से समझ लो उस आकाशीय खगोलीय
- 13:23घटना में किसी संत पुरुष ने जो पी गया था समुद्र को इस समुद्र को
- 13:31पोषण को अस्तित्व के समुद्र को। उसने अपने प्राण उत्सर्जित किए थे
- 13:37जहाँ वो चेतना की एक बूंद जिसकी मैं जिक्र करता हूँ देही के साथ
- 13:42रहती है, वो वहाँ छोड़ी थी तो उसी वक्त जाओ।
- 13:51यहाँ बीच मैं थोड़ी सी और बात बता दूँ।
- 13:56जहाँ उस व्यक्ति ने उस संत ने कारण शरीर को छोड़ा, अपनी चेतना
- 14:03को छोड़ा, वहाँ किसी भी वक्त जाकर आप लाभ ले सकते हो।
- 14:10साधना का सर्वोत्तम सत्र है वो इसलिए वाराणसी के घाट में
- 14:21हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, नासिक इनकी जगह पे।
- 14:31अगर कोई स्थान आपको न मिले तो उस स्थान के करीब जहाँ उस संत ने
- 14:41उत्सर्जन किया था चेतना का, वहाँ बैठकर तो आपको स्थान सदा ही
- 14:47उपलब्ध है। हम बात कर रहे थे कुंभ पर।
- 14:57कुंभ में आकाशीय खगोलीय सारे नक्षत्र गृह वहीं होते हैं।
- 15:06जिसमें उन्होंने प्राणों को उत्सर्जित किया था।
- 15:12श्रद्धा का समूह होता है। शुभम होने से श्रद्धा अनंतगुणित
- 15:19हो जाती है और मैंने तुम्हें पहले कहा श्रद्धा आपको अंतर्मुक्खी
- 15:24करती है। जितना समूह ज्यादा होगा उतने भाव
- 15:31में आप बह जाओगे और अंतर्मुखी हो जाओगे।
- 15:35इसलिए बहुत से लोग मेरे पिताजी कहा करते।
- 15:41कुंभ में जाकर आए थे। बड़ा आनंद आता है वहाँ।
- 15:45तब तो मैं नहीं समझता था, लेकिन अब समझ में आया कि श्रद्धा का यह
- 15:52समूह जो घटना घटी उस वक्त और श्रद्धा का यह जो समूह उमड़ा,
- 16:00उसकी याद मेमोरी के भीतर रह गई। तो तुम्हें ऐसा लगेगा बहुत अच्छा
- 16:07है, चलो फिर से दर्शन करें कुछ देर से, लेकिन तब जो घटित हुआ था
- 16:1912 वर्षों के बाद घटित होगा फिर। तीन चीज़ मैंने बताये श्रद्धा
- 16:34जितनी गुणित होगी और वो स्थान जहाँ कारण शरीर।
- 16:48वेलन हुआ समुद्र में और तीसरा खगोलीय घटना बृहस्पति, चंद्रमा और
- 16:55सूर्य ये किस स्थिति में थे? तीनों चीजों का सिंघम त्रिवेणीय
- 17:02सिंघम कहलाता है। और यह किसी भी जगह होता है, अवश्य
- 17:08नहीं है कि प्रयागराज में हूँ। इन चारों स्थानों पर जहाँ संतो ने
- 17:13प्राणों को उत्सर्जित किया वहाँ ये संगम बनता है इसलिए आप किसी
- 17:19कुंभ में भी चले जाएं, यही कुछ मिलेगा आपको।
- 17:24महासंगम है, महाकुंभ है, ये तो राजनीतिक बातें हैं, अब क्या होता
- 17:33है? कहाँ यहाँ जाके श्रद्धा की उस वीण
- 17:39में आपने अंतरमुखी होना? और श्रद्धा की उस भीड़ के बहाव
- 17:45में तूफान होता है। श्रद्धा का तो सन्तु का यह प्रयास
- 17:50था कि उस तूफान में जो छोटा भोग बहुत अटका हुआ आदमी रह गया, जिसने
- 17:58काफी घर बैठ के साधना कर ली। बस उसको एक धक्का लग जाएगा, अपने
- 18:10भीतर गहरे उतर जाएगा और इसी धक्के की जरूरत होती है।
- 18:16यही धक्का गुरु देता है। आपको यह तीर्थ पे लग जाता है।
- 18:26लेकिन उससे पहले आप घर बैठे ध्यान की गहराइयों में उतर चूके हों,
- 18:33साहस नहीं होता अकेले में जब बिल्कुल उस प्वाइंट पर खड़े हों।
- 18:40जहाँ तुमने विलीन होना है और साहस नहीं जुटा पाते गुरु कोई है नहीं
- 18:46तो क्या करो यह तीर्थ सदा ही रहेंगे, इन तीर्थों पे जाओ घर बैठ
- 18:57के। तीन वर्ष के बाद करीब चार स्थान
- 19:04हैं। तीन तीन वर्षों के बाद आ जाते
- 19:06हैं। तीन वर्ष आप घर पे अपना साधना
- 19:11करो, अपने अंतर्मुखी हो, फिर आप प्रत्येक कुम्भ में जाओ, मैं जाने
- 19:17से नहीं रोकता। लेकिन उसका विज्ञान समझा रहा हूँ
- 19:23आपको कि वो भीड़ का उन्माद श्रद्धा का आपको धक्का मारेगा, आप
- 19:33उतरने को राजी हो जाना, पकड़े मत रहना खुद को।
- 19:39अगर पकड़े रह जाओगे, फिर तो वही ढाक के तीन पात, फिर तो सूने सूने
- 19:45वापस आ जाओगे, बस एक मेले में गए थे, हिल स्टेशन देख के आ गए, ठंडे
- 19:51पानी में स्नान करके आ गए और कुछ न घटा।
- 20:00तो एक शब्द मेरा यह बांध लेना। पोटली में श्रद्धा अंतर्मुखी करती
- 20:06है। लेकिन क्या हुआ?
- 20:12अब जिन्होंने बुलाया उन्होंने तो ठीक बुलाया।
- 20:17कि उस वक्त पर श्रद्धा का उन्माद जितना गहरा हुआ, जितना बहाव तूफान
- 20:22आ जाएगा, वो तूफान कईयों को मुक्त कर देगा।
- 20:30लेकिन मुक्ति तो मेरी लेकिन किसी और ढंग की मिले।
- 20:36लोग मर गए, डबल कुचलकर मर गए और तुम्हारे तथा कथित संत कहते हैं,
- 20:43उनको मोक्ष मिल गया जो मोक्ष की व्याख्या नहीं जानता
- 20:51अन्तर्प्रणाली नहीं जानता। वह कहता है कि मोक्ष मिल गया इनको
- 20:56जो मर गए नहीं। मोक्ष तो मिलता है लेकिन वो जानते
- 21:05नहीं कैसे मिलता है? आज मौका आया तो मैंने आपको समझा
- 21:09दिया वो व्यक्ति तो मात्र मरे हैं।
- 21:14मुक्त नहीं हुए मोक्ष नहीं मिला। वो तो एक दुर्घटना का अक्सीडेंट
- 21:21का शिकार हुए, कुचले गए, अशक्त थे, वृद्ध थे, बच्चे थे, महिलाएं
- 21:29थीं। इससे हम कुव्यवस्था भी नहीं कर
- 21:37सकते हैं क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में लोगों का हजूम इकट्ठा
- 21:43होना उनको संभालने के लिए भी व्यक्तियों की आवश्यकता होती है।
- 21:49चूक रह जाती है अक्सर। तो किस चीज़ ने किया ये काम, अब
- 21:55आपको जानकर हैरान जीस चीज़ ने ये काम किया जो चीज़ जिम्मेवार है आप
- 22:03लोगों को जिम्मेदार ठहरा दोगे? मैंने एक शब्द पहले कहा था,
- 22:13श्रद्धा आपको अंतर्मुखी करती है और लोभ आपको बहर्मुखी करता है।
- 22:20लोभ के कारण तुम मर गया, लोभ सा केश खगौलीय घटना में 140 वर्ष के
- 22:29बाद 100। ये जीतने वर्षों के वापसी, ये आप
- 22:36जानिए मुझे नहीं पता मैं हिसाब किताब से दूर रहता हूँ सदा मैं
- 22:45हिसाब किताब से दूर रहता हूँ सदा। मैं जो वास्तव में हूँ वो जो
- 22:53बुद्धि हिसाब किताब रखती है, उससे बहुत दूर समझने वाले हिस्सा में
- 22:59जाएंगे। मैं क्या बोल रहा हूँ, कहाँ से
- 23:02बोल रहा हूँ तो जीतने सालों के बाद भी यह आया था।
- 23:09लोभ हो मरवा गया हमें जल्दी से हम स्नान कर लें।
- 23:13इस लोभ के कारण हब्बड़ दाबड़ मची हम पहले स्नान कर लें, हम पहले
- 23:22स्नान कर लें, मुक्ति हो जाएगी नहीं, ऐसे नहीं मुक्ति हो।
- 23:28सिर्फ स्नान करने से मुक्ति नहीं मिलती मुक्ति का सारा संयोजन है
- 23:36वहाँ बस तुममें श्रद्धा टूट कर लोगों में बदल गई।
- 23:42ये तीसरा जो स्तंभ था वो टूट गया। जगह आज भी है चार्ज है पूरी और
- 23:57श्रद्धा का उन्माद खो गया है। लोभा आ गया है श्रद्धालोभ में बदल
- 24:06गई, हम पहले मुक्त हो जाए। बा मुशकर इतने सालों के बाद यह
- 24:12वक्त आया है। यह मुहूर्त आया है।
- 24:19दो घटनाएं तो मौजूद हैं, खगोलीय घटना भी हैं और वो स्थान भी है।
- 24:27तीसरी घटना श्रद्धा न बची, श्रद्धा बदल गई लोभ में और लोभ
- 24:33बेहरमुखी करता है शायद समझ गए होंगे सारी बात को तीसरा स्तंभ
- 24:40टूट गया। लोभ आ गया, तुम बेहरमुखी हो गए
- 24:50तुमने जल्दी स्नान करने की कोशिश की और हबड़ धबड़ मच गई।
- 24:55यहाँ हुई गड़बड़ आप कुछ भी खुलासे करते रहना वो आपके मस्तिष्क का
- 25:04काम। कुछ व्यवस्था में कमी रही होगी।
- 25:12इसमें कोई शंका नहीं की जा सकती, लेकिन व्यवस्था में कमी कितनी भी
- 25:19हो अगर हम श्रद्धा मान रहे हैं यानी सह रहे हैं।
- 25:25शांत रहें, धीरे धीरे नंबर आने पर हम स्नान कर लेंगे।
- 25:29लोग न आई तो आराम से नहाए जा सकता है।
- 25:33इतने लोग नहा के आए हैं, नहाएंगे और भी नहाएंगे, सदा से नहाते
- 25:39रहेंगे, नहाते रहे हैं। लेकिन दुर्घटनाएँ भी सदा होती रही
- 25:46और वो जब भी हुईं लोभ के कारण आपकी श्रद्धा लोभ में परिवर्तित
- 25:55हो गई। अब आए तो हैं इतने दोस्त, डुबकी
- 25:59पहले हम ही लगा लें। देखिए ध्यान रखना अभी तो कुंभ चल
- 26:07रहा है ना कहीं स्थान जाएगा, खगोलीय घटनाएं बदल जाएंगी।
- 26:17आपकी श्रद्धा अगर साथ रहे तो आप आगे पीछे कभी भी जा सकते हैं।
- 26:22बहुत स्थान उपयुक्त है। मुझसे लोग पूछ लेते हैं बाबा यहाँ
- 26:27कोई मजार बता दीजिए? अगर कोई मजार ना मिले, अगर मिल
- 26:34जाए तो सर्वश्रेष्ठ अगर न मिले तो चार स्थान हैं।
- 26:42जहाँ पर कुम्भ लगता है वहाँ दूर तलक, कहीं भी बैठ जाओ उन्हें
- 26:48इसलिए हम तीर्थ कहते हैं वहाँ दूर तलक हवाएं श्रद्धान देते हैं वहाँ
- 26:55की माटी ने श्रद्धा को पी लिया है जीतने लोग यहाँ से श्रद्धा से भरे
- 27:00भरे आए। माटी उनको खींच गई, आसमान उनको खा
- 27:06गया, सारा वातावरण वहाँ चार्ज है, आप जाकर वहाँ आनंद ले सकते हो,
- 27:15लाभ ले सकते हो। यह है सारा विज्ञान।
- 27:24कुंभ का मेरे पास बहुत से प्रश्न थे, इस तरह के के आप जवाब दीजिए,
- 27:32ये क्यों हुआ? कारण क्या है, इसकी आंतरिक
- 27:36व्यवस्था क्या है? एंटायर क्रोन लॉजी क्या है इसके?
- 27:42तो मैंने विस्तार से आपको सारी बात समझाई।
- 27:46अगर श्रद्धा से आप अपने घर पर भी बैठ जाओगे, कमरा चार्ज होता है,
- 27:57मेरे पास यहाँ लोग आ जाते हैं, कहते हैं बाबा।
- 28:01जाने को जी नहीं करता। मैंने कहा बेटा मैं क्या करूँ?
- 28:07यह स्थान बहुत छोटा है और तुम सभी यहाँ रहना चाहते हो, लेकिन मेरी
- 28:14मजबूरियां हैं थोड़ी देर के लिए बैठ जाओ।
- 28:20दीक्षा ले लू और फिर तुम्हें जाना ही होगा, क्योंकि और भी इंतजार कर
- 28:28रहे हैं तुम अकेले नहीं हो। वहाँ से आने को दिल नहीं करता,
- 28:40श्रद्धा के उस सैलाब में खो जाने को दिल करता है फना हो जाए, राख
- 28:47हो जाए खाख हो जाए। वहाँ कयामत हो गई, जीसको आप कयामत
- 29:03कहते हो, इस्लाम कयामत कहता है वो कयामत है वहाँ अगर श्रद्धा के उस
- 29:11सैलाब में तुम बह गए। और तुम्हारा वो अहंकार खो गया,
- 29:20वाश्व बनकर उठ गया और आपको समझ आ गया कि आप कौन हैं?
- 29:29बस उसके बाद अब घर पलटाना घटना घट गई।
- 29:35आपको पता चल गया आप कौन इस तूफान की जरूरत थी जो तुम्हारी ईगो को
- 29:45उड़ा के ले जाए और श्रद्धा का सैलाब आपकी ईगो को उड़ा के ले
- 29:51जाता है? यह कभी कभी आता है तीन 3 साल के
- 29:56बाद चार स्थानों पर आता है जो चूक गए जो अगले तीन सालों का इंतजार
- 30:03करो। अगर ध्यान ही करना है अपने भीतर
- 30:08तो वहाँ जाकर भी बैठ सकते हो। यथा आंतरिक विज्ञान।
- 30:18इसका तो मैंने कल समझाया के मेरे जाने के बाद जब बूंद बिखर जाएगी
- 30:28उतरेगी तो उस मूर्ति में समा जाएगी।
- 30:34उसे कहते हैं प्राण प्रतिष्ठा और प्राण प्रतिष्ठा में मैं स्वयं
- 30:44विराजमान होऊंगा, यही कृष्ण कहते हैं, बस।
- 30:56तू छोड़ दे सब कुछ आपा छोड़ दे सिर्फ मेरे मैं समा जा मुझे
- 31:04समर्पित हो जा अनन्या चिंतन तो माँ ये जना पर उपवास से तू मेरे
- 31:10करीबा के बैठ जा उपासना। उप आसन करीब आके बैठ जाना अनन्या
- 31:19चिंतित तो माँ ये जनम परिवास्ते तेशाम नित्या भुगतान नाम योग क्षम
- 31:32छोटा सा प्रश्न भक्त है अभी? अभी आधा घंटा हुआ है।