Latest / Baba ji Vijay Vats / 4 Sep 25 -कैसे पता चले कि हम, मन के करीब हैं या ईश्वर के? चिंता और मन से पार जाने का सीधा रास्ता! जपुजी साहिब पौड़ी 13.
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- 0:02राजकुमार बाबा तुम ओशो बनने की कोशिश न करो अरे भाई गाली क्यों
- 0:23निकाल रहे हो? दूसरा प्रश्न कैसे पता चलेगा कि
- 0:42हम मन के करीब हैं या ईश्वर? मानस रक्षा ढूंढता है मन सहारा
- 0:53ढूंढता है। और परमात्मा अकेला रहना चाहता है।
- 1:10अगर परमात्मा के करीब हो तो उसके लक्षण बता दो।
- 1:21तुम अकेले में होना पसंद करोगे, हल्की हल्की सी कुमारी तुम्हें
- 1:26चढ़ी रहती वह मस्ती पीने के बाद फिर कुछ।
- 1:43पानी का मन नहीं करता, ये परमात्मा के लक्षण हैं।
- 1:50अगर परमात्मा के गरीब हो तो साहस आ जाएगा अगर मन के गरीब हो।
- 2:00तो तुम भीरु हो जाओगे, मन के गृह भाव तो तुम कायर हो जाओगे, यही
- 2:13लक्षण है इसी को मापदंड बना लो। और तय कर लो केतुम परमात्मा के
- 2:23करीब हो या संसार के मान के करीब हो राजकुमार ओशो बनने की कोशिश मत
- 2:35करो। देखिए मुझे कुछ भी कह लेकिन गाली
- 2:40मत निकालें। हस्तिक है उस फिलॉसफी का क्या
- 2:54फायदा? इसे इतना भी पता नहीं कि तुम लाख
- 3:00उपकार कर दो और उसके बाद एक बदमाशी कर लो, तुम्हारे लाख उपकार
- 3:06को में पड़ जाएंगे। इससे यही काम है।
- 3:17कि तुमने अपना स्वप आ लिया और स्वप आने के बाद वे तुम इतनी ऊंची
- 3:27बातों पे उतराये लिब्रल सेक्स मैं ज्यादा करलू तुम्हारी।
- 3:34तुम क्या चाहते हो कि सड़कों के ऊपर नंगे जोड़ें उस अवस्था में
- 3:39करें जीस अवस्था में तुम्हारे रजनीशपुर में फिर थे सर थोड़े
- 3:49बोलने को भी ज्यादा समझे। वैसे भी तबियत नासाज हो जाती है,
- 4:03मन का स्वभाव है, मन सुरक्षा ढूंढता है और तुम अपने आप को तो
- 4:11पहचान ही सकते हो। क्या तुम सुरक्षा ढूंढ़ते हो?
- 4:20क्या तुम धन कमाना चाहते हो? धन कमाना एक सुरक्षा ढूंढने का
- 4:25उपाय क्या तुम किसी गद्दी के ऊपर बैठना चाहते हो?
- 4:31अवश्य ही तुमने कोई अपराध किया हो?
- 4:38जीस अपराध के दंड से बचने के लिए तुम गद्दी ढूंढ़ते हो अन्यथा
- 4:44गद्दी की जरूरत क्या है? निरपराध व्यक्ति को सत्ता की
- 4:52आवश्यकता क्या है शक्ति की आवश्यकता?
- 4:58जो सत्ता ढूंढता है वो शक्ति ढूंढता है और बार बार ढूंढता है
- 5:06समझ लेना कि उसमें अपराध गमी की मंडप का है।
- 5:16अपराध उखड़ न जाए। उखड़ गए तो फिर हसर क्या होगा ये
- 5:25हिटलर जानता है। हिटलर जानता था, मसोलिनी को कैसे
- 5:31मारा गया। और मसोलनी हिटलर का गुर तो हिटलर
- 5:39की रूह का तो गई। जब वो में आ गया तो हिटलर ने अपने
- 5:49ही रिवॉल्वर से अपने कनपटी पर अपनी आत्महत्या कर।
- 5:56पर इतना ही नहीं उसे पता है तो मर तो जाऊंगा, लेकिन मेरी लाश को
- 6:04पूरा ही खराब करने के लिए तो उसने अपने अंगरक्षकों से कहा मेरे मरने
- 6:13की बात है। और ईवा के मरने के बाद हमारे
- 6:19दोनों को इस पेट्रोल के ड्रम में भगोले न और आग लगा देना ताकि
- 6:25हमारी राख भी बच जाए। सड़कों पर घसीटने के लिए हमारा
- 6:31शरीर न बचे। जहाँ तक डटते हैं डिगटेड जनता
- 6:40जनता हम मन के करीब हैं, आत्मा के करीब हैं, कैसे पैसे आने बाबा?
- 6:53मन सुरक्षा ढूंढता है मन बेईमान है मन काय ये सब सुरक्षा के उपाय
- 7:05महल बना लो जहाज ले आओ दुनिया घूम लो।
- 7:12अच्छे अच्छे पुरस्कार जमा कर लो, नाम कमा लो सबको पता है नाम कभी
- 7:24किसी का रहा खरबों खरबों खरबों खरबों लोग आए।
- 7:32किसका नाम रखा है? वक्त बुला देता है सब नामों को 1
- 7:38दिन तुम भी भूल जाओ, तुम भी बुला दिए जाओगे, ये मन की पहचान है।
- 7:56मन ढूँढता है सुरक्षण थोड़ी शिवा से आहत हो जाता है किसका?
- 8:12प्रश्न मेरे मन में बीती हुई यादों की समृद्धियों से बातें
- 8:20चलती रहती हैं? मैं इनसे बड़ा परेशान होगा।
- 8:25क्या कहा ज़िन्दगी में बहुत सा घटा 34 वर्ष की आयु और 34 वर्ष की
- 8:37आयु में इतना कुछ घट गया और वो स्मृतियां।
- 8:43सदा ही सरदर्दी पैदा करते है। दिन भर रात सोनी नहीं दिन भर रात
- 9:02अतीत की गुजरी हुई यादें। मुझे रोला रोला जाती मैं क्या
- 9:15करूँगा? वो परेशान सो नहीं सकती।
- 9:27ये परेशानी ऐसी दे जाते हैं ऐसी कि ना सोने देते हैं, ना जगने
- 9:34देते हैं, ना रात देखते हैं ना दिन देखते हैं।
- 9:42सुहाने चांदनी। राते हमें सोने नहीं देती, सुहाने
- 10:02चांदनी। रातें हमें सोने नहीं देती,
- 10:15तुम्हारी प्यार की बातें तुम्हारी।
- 10:25प्यार के बातें हमें सोने नहीं देती सुहानी चांदनी रातें।
- 10:44हम सोने नहीं दे, बढ़िया होने। दो बस एक चीज़ का ख्याल रखना।
- 10:58इनके साथ ही चेपक मचन, हेस कैथर्स।
- 11:06यह कैथल से रेचक हो रहा है। जो पल तुमने कभी जिए थे।
- 11:19तो पल आज तुम्हारी आँखों के सामने चित्र बन जा रहा है और तुम्हें
- 11:25पता भी न था कि ये चित्र तुम्हारे भीतर रिकॉर्ड है तुम भूल गए थे।
- 11:38अक्सर प्रेमी भूल जाते हैं कि हमने उसे बुला लेते हैं।
- 11:53ये रिकॉर्डर होती हैं भीतर तुम चेतन मन से भुला सकते हो।
- 11:59लेकिन अचेतन बड़ा विशाल चेतन अचेतन का दसवां हिस्सा है।
- 12:08देखिए चेतन ही इतना बुरा है अरबों, अरबों निरंजन इसमें तो
- 12:17अचेतन। कितना बड़ा होगा?
- 12:20उसमें क्या कुछ नहीं समझ सकता। ये भरा पड़ा रहता है और तुम इसी
- 12:29अहंकार में भरते रहते हो। क्या हमने उसे बुला दिया?
- 12:38तो कैथोरेसिस है ये, ये बाहर निकल रहा है कूड़ा जो पल तुमने कभी जीए
- 12:48थे किसी के साथ हम वो बाहर निकल रहे हैं खुशी में ना?
- 12:57तुम्हारा अचेतन खाली हो रहा है। बस एक बात का ध्यान रखना, इनके
- 13:02संग चिपट मत जाना, इन्हें आने देना जाने देना, वो प्यार की
- 13:11बातें हम जीने नहीं। सुहाने चाँद नी रातें हमें जीने
- 13:21नहीं देते, बस गुमान हो जाता है प्रेमी प्रेम का, क्योंकि चेतन
- 13:28में नहीं आता लेकिन भूल जाता है। एक बेहतर रिकॉर्डर रखा है।
- 13:34प्रकृति ने उस रिकॉर्डर में सब कुछ तय है जब तक के तुम उसको
- 13:40निकाल नहीं दोगे, नहीं कर दोगे, इवैपरेट नहीं कर दोगे।
- 13:44वातावरण में वो बेहतर ही रहेंगी। ये ठीक चेतन बहुत छोटा है।
- 13:51चेतन में सारी चीज़ आ नहीं सकती, और तो मगरूरी में संसार में घूमते
- 14:02फिरते रहोगे, ये सोचो कि हमने उसे बोला।
- 14:09बहुत। शादमा थे उन्हें हम भुला कर बहुत
- 14:22शादमा थे उन्हें हम भुला कर। अचानक ये क्या हो गया?
- 14:38जब अचेतन में से उछल के चेतन में ये यादें आती हैं।
- 14:44कि चेहरे। वे उन्हीं के मलाला गया।
- 14:54के चेहरे पे उनके। मला गया। ेशान
- 15:08उनका ख्याल लग गया विश्राम उनका। ये तुम्हें मलाल रहता है क्या?
- 15:25हम बोलते हैं लेकिन मलाल है सिर्फ चेतन को, अहंकार को बोले नहीं
- 15:36बीते रिकॉर्ड है तो अगर बेटी। ये लक्षण प्रकट होने शुरू हो गए
- 15:43तो शुरू में क्योंकि अपने आप प्रकृति इन्हें बाहर इवैपरेट कर
- 15:50रही है। वास्तव बन के निकल जाएंगे।
- 15:53चेतन मंत्र तुम इन्हें रोकना मत, तुम इनसे झगड़ा मत करना।
- 15:59तुम इनसे चिपट भी मत जाना। तुम इन्हें देखकर रोना भी मत, तो
- 16:08पुरानी यादों के सहारे इनसे चिपट के लिपट के रोना इन्हें आने देना।
- 16:19और इन्हें जाने देना इट एस ए वेव ऑफ लिबरेशन यह मुक्ति का मार्ग
- 16:28इन्हीं चीजों ने तुम्हें बंधित किया होगा और अगर यह निकलना चाहती
- 16:35हैं, प्रकृति ने निकालना चाहती हैं तो तुम्हारे बाद्य उदय हो
- 16:38जाते हैं। निकल जाने तो ही दें, निजात
- 16:44मिलेंगे चित हल्का हो जाएगा। अचेतन मन में से कुछ भार कटेगा।
- 16:53बस एक ही बात कर ख्याल रखना। इन्हें निकल जाने देना, इनसे
- 16:57झगड़ा मत करना और इनसे चेपट भी मत जाना।
- 17:01इनके पीछे भी मत लग जाना अन्यथा तुम घोर विपत्ति में पड़ोगे
- 17:08प्रकृति जो काम कर रही है उसका सहयोग करना।
- 17:17बातें मत डालना कथोर से कर रही है प्रकृति बहुत से प्रेमी मेरी बात
- 17:24को सुन रहे हैं और बहुत से प्रेमों के साथ ही अक्सर ऐसा होता
- 17:30है। तो मेरी बात को ध्यान में रखे जब
- 17:36कभी तुम एकांत में बैठे हो या रात शाम ढलेगा सूरज छिपेगा और तुम
- 17:49सोने की तैयारी कर रहे हो वे। अचानक तुम देखो उछड़कर कयामत की।
- 17:58चला गया उछलकर कयामत। किचा लग गया वैशाख अंग का ख्याल आ
- 18:23गया। जैसे ही साँझ चले गए।
- 18:29हल्की हल्की काली माँ छायेगी पैसे उसकी याद आएगी तुम्हें पता भी न
- 18:36था तुम्हारा चेतन इस अहंकार में चले जा रहे थे, बड़े शाहदमा थे
- 18:42उन्हें हम भला कर। गरूर में फूले फूले सामान है कि
- 18:51हमने उनको भुला दिया है, लेकिन यह क्या हुआ?
- 18:56वह चलकर कयामत की चाल आ गया, क्योंकि तुम्हारे भीतर से
- 19:01रिकार्डेड था ये और इस बात को ध्यान।
- 19:07रखना कि जब तक तुम्हारा अचेतन किसी भी समृद्धि से विकार से विषय
- 19:16से वासना से बराबर है, जब तक वह कृतर्ष से नहीं होता तब तक।
- 19:25तुम बंधे ही रहोगे, इसे ही तुम बंधन कहते हो, यही तुम्हें सता
- 19:30रहा है। इसी को कथक से करना होगा वातावरण
- 19:34में एटमोस्फीयर बहुत विशाल है। बड़ा विराट वह कभी भरता नहीं है
- 19:40हमारे इन क्षुद्र विचारों से। कैथोसिस से वह कभी नहीं भरता।
- 19:48वह बड़ा विराट है, तुम इसको उस विराट में जाने देना इसकी सहायता
- 19:55करना निकल जाने में के लिए निकल जाए।
- 19:59इंतजार करना, प्रतीक्षा करना कि अब ये आय शुक्र है।
- 20:05थोड़ा अचेतन खादी होगा, राहत की सांस आएगी।
- 20:13इस तरह ज़िन्दगी जीना बैठी बरा पड़ा है तुम्हारा अचेतन इन्हीं
- 20:20जातों से अच्छी या बुरी कुछ भी हो ये सब के साथ होता है।
- 20:30न तुम अकेली हो, न तुम अकेली आखिरी हो, आगे भी होती रहेंगी।
- 20:39गुजरा ज़माना भी इन बातों का साक्षी है।
- 20:42ये होती ही रहेंगी सजा लेकिन इन्हें देखकर।
- 20:48लिपट चिपट के रोने मत लग जाना इनको निकल जाने देना यही इसमें ही
- 20:54तुम्हारी समझदारी है, समझा दी तुम, अहो भाग्य है?
- 21:10के स्मृतियों का बोझ कम होना शुरू ये तुम्हारे सिर के ऊपर रखी हुई
- 21:16एक पंड है एक गठरी इनमें से कोई थोड़ी सी ईंट गिरी बाहर तो ध्यान
- 21:25रखो। वो ईंट का वार घट गया, तुम्हारे
- 21:28सर के ऊपर एक लकड़ी का गट छड़ गिरा तो गबराना मत अच्छा हुआ वार
- 21:40कम हो गया। कबीर के हाथ से तसबी छूट जाती है,
- 21:50सुमरन कर रहे होते हैं, तसबी छूट जाती है, बड़े खुश होते हैं फलो
- 21:59भयो, हरी भी सरो सर से टरी बला, कुछ तो घटा।
- 22:05तुम तो दिन भर रात इस भार को बढ़ाने में लगे रहते हो, आज पांच
- 22:12नाम कर लिए नहीं किए तो फिर करो ना काहे बेला गँवाए हुए हो
- 22:19तुम्हें नहीं पता इस जाप करने में बेला गँवा रहे थे हो?
- 22:24काश तुम उन बेलों को जाप में न करके फुर्सत के लम्हों में गुजार
- 22:31देते। तुम खाली हो कि सिर्फ बैठ जाते
- 22:36बहुत बड़ी तपस्या है। इन्हीं फुर्सत के लम्हों में ये
- 22:41समृतियां आती जो बेटी को हमने और ये समृतियां आती चेतन में प्रवेश
- 22:52कर जाती हैं तुम इन्हें निकल जाने के।
- 22:59कभी तुमने ही इन्हें जोड़ा जाप करने वालो मेरी बातों को ध्यान से
- 23:05सुन ले, ये कूड़ा इकट्ठा कर रहे हो?
- 23:101 दिन निकलेगा फिर चलो अब तो तुम गुरुओं के सताए हुए हो।
- 23:18लेकिन तब मेरी बात याद रखना जब अचेतन खाली होने को आए।
- 23:23प्रकृति इतनी भर जाए जैसे तुम्हें वोमठ नहीं होती।
- 23:28क्यों होती है वोमठ तुम इतना खा लेते या गृष्ठ खा लेते या तलब
- 23:36होना खा लेते। प्रकृति सहन नहीं कर सकती।
- 23:40वो तुम्हें वोमिटिंग कर देते तो वोमिटिंग तुम्हें करना पड़ता है
- 23:46ऐसे ही कैथोडिस जब प्रकृति कर रही हो किसी दिन तुमने ये जाग खाया था
- 23:53किसी दिन तुमने ये सुमरण खाया था। अब तुम्हारा चेतन इतना भर गया है
- 23:58कि प्रकृति इसको बर्दाश्त नहीं कर सकते।
- 24:04अभी भी वेला है, जाप जाप इसको खाली हो जाना था, रोकना मत और
- 24:12किसी कहने वाले ने बड़े शुभ का अजपा जाप सो मैं हसूंगा।
- 24:18बड़ा सर, अपने आप जॉब चल रहा है हाँ हाँ वोमिटिंग अजबजा
- 24:37ये वोमिटिंग जो तुमने खाया था कभी।
- 24:40भोजन खाया था या वो जाप खाया था, स्मरण खाया था।
- 24:45आज वो इतना भारी हो गया है कि प्रकृति उसे सहन नहीं कर सकती।
- 24:50प्रकृति विजाती या द्रव्य को सहन नहीं कर सकती।
- 24:55प्रकृति फिस्कल मटेरियल को। सहन नहीं कर सकती।
- 25:02बाहर फेंक देती है पसीना बाहर फेंक देती है मल मूत्र बाहर फेंक
- 25:07देती है सहन नहीं कर सकती जभी जाती यह द्रव्य है बाहर निकाल
- 25:21देती है। और बात से जन कहते हैं अजपा जासु
- 25:31अब कोई तो तरकीब निकालोगे ना भाई अब पंगा तो तुमने ले लिया।
- 25:40नहीं भगत कोई पूछेगा ये क्या हो रहा है?
- 25:43अपने आप ही चल रहा है ये नाम अपने आप चल रहा है तो फिर देखो ये तो
- 25:52सब कुछ जानते हैं, ये कोई तो दलील देंगे ना?
- 26:00ये कहेंगे तुम बड़े भाग्यशाली हो। ये तो तुम्हारे अजपा जाप शुरू
- 26:07होंगे जी अजपा जाप नहीं आए थे। सुबह मैडम प्रकृति से बर्दाश्त
- 26:14नहीं कर सकती, इसलिए प्रकृति। तुम्हारी प्रेमियों की यादों को
- 26:18भी भीतर नहीं समझ सकती। ये भी विजातीय द्रव्य हैं
- 26:30हेटरोजीनियस सबस्टेंसेस होकर। फौरन मैटेरियल्स बाहरी लोग हैं,
- 26:45बाहरी द्रव्य हैं, विजातीय द्रव्य हैं, ये तुम्हारे शरीर के काम के
- 26:54और वह जो अजपा जाप जिसे तुम कहते हो, वो तुम्हारी आत्मा के काम का
- 26:58नहीं होता है। मन जितना जितना कोमल होता जाता
- 27:02है, बाहर सैनिक में असमर्थ हो जाता है।
- 27:08मन जितना जितना सरल होता है, निर्मल होता है, बाहर सैनिक में
- 27:14असमर्थ हो जाता है। फिर जब वो बाहर से आने में असमर्थ
- 27:19हो जाता है तो तुम्हारे फौरन सबस्टेंसेस मटेरियल्स हेटरोजीनियस
- 27:26मटेरियल्स को बाहर निकलता है, और ये हेटरोजीनियस मटेरियल
- 27:32सबस्टेंसेस हैं। फौरन मटेरियल सबस्टेंसेस हैं।
- 27:36जिनको मन बर्दाश्त नहीं कर सकता, इनका भार झेल नहीं सकता इसलिए
- 27:41बाहर फेंक देता है और बगत का समते हैं।
- 27:46बगत समते हैं अजवाज अफसोस कबीर कहते हैं भलो भयो, हरि भी सरो सर
- 27:57से टली बला। बड़ी बहुत बड़ी बला थी उस बला को
- 28:04तुम सिर से उतरने नहीं देते छिपकाई ही रहते हो और ध्यान रखना
- 28:19अगर तुम्हारा चेतन अचेतन। अब चेतन खाली नहीं होगा तो
- 28:31तुम्हारे बीच साहस नहीं पैदा होगा, संकल्प नहीं पैदा होगा।
- 28:40मैं कहता हूँ चेतन को खाली सिर्फ चेतन को खाली मत करो।
- 28:47अब चेतन और अचेतन को भी खाली कर दो सब कॉन्शस और अनकॉन्शस और
- 28:53कॉन्शस, इन तीनों को खाली कर दो और फिर उसके बाद क्या आएगा?
- 28:58उसके बाद आएगा कलेक्टिव अनकॉन्शस। येस, सामूहिक, कोलेक्टिव सामूहिक,
- 29:14सबका इकट्ठा। मन वह तुम्हारे हिस्से का, तुम
- 29:23उसे भी निकाल दो। वह कलेक्टिव अनकॉन्शियस भी खाली
- 29:31करता हूँ, फिर आगे क्या आएगा आगे तुम खुद ही आ जाओ।
- 29:37बड़ी भारी सरल तरीकों को मैंने प्रकट किया है, लेकिन तुम हो तुम
- 29:44हो के अभी सिर के ऊपर मज़दूरों की तरह और ईंटें रखते चले जा रहे हो।
- 29:50मजदूर होते न आपने देखा। एक ईंट रखती कर दूसरी रखती कर
- 29:56बाहर चिन्हते ही चले जाते हैं। तुम्हें तुम्हें स्वाद आता है
- 30:00सिमरन क्यों? क्योंकि मन को स्वाद आता है, मन
- 30:06शब्दों से संतुष्ट होता है, मन शब्दों से तृप्त होता है।
- 30:15आत्मशब्दों को शब्दों को बाहर ढकेलते हैं, आत्मशब्दा तीर और
- 30:26तुम्हें वहाँ पहुंचना है शब्दों के पास।
- 30:32शब्द मन का ही एक प्रारूप मन के पार हो जाना, मन को क्रॉस कर
- 30:40जाना, मन की बाउंड्री को क्रॉस कर जाना, शब्दों को क्रॉस कर जाना
- 30:46बहुत बार समझाता हूँ तुम्हें। क्यों समझता हूँ कि तुम बाद में
- 30:54ये न कहो कि गंगू कहने वाली माँ मर गई?
- 31:03राजा गंगा सिंह तो सभी के हैं लेकिन गंगू कहने वाली माँ मर गई।
- 31:12इसलिए बार बार कहता हूँ बार बार कहता हूँ इस साहित्य को संभाल कर
- 31:21फिर न जाने कभी कोई रोष न ही इस बगीचे में हो न हो।
- 31:32लग जा, गले जा। गले के फिर ये हँसी।
- 31:42रात हो न हो शायद। फिर सज़ा नम, मुलाकात हो न हो लग
- 32:06जा। गले की फिर ये हँसी।
- 32:11रात हो न हो, शायद फिर इस जन्म में मुलाकात हो न हो।
- 32:29लगी जा गले मेरी बातों को समझ लो ये तीनो प्रश्न समाप्त हुए हैं।
- 32:47अब चलें बाबा की बाड़नी की तरफ हमने कल 12 पूड़ियाँ पूर्ण कर दी
- 32:53थीं, अब देर में पड़ी हूँ शुरू करते हैं।
- 32:57मन में शरत हो गए। मन बुद्ध मन के पार होने से मन और
- 33:09बुद्धि को समझाए जाती है बड़ा प्यारा स्वर लोग मुझे पूछते हैं
- 33:15बाबा समझ में नहीं आया? आप फिर से समझाइए ना?
- 33:21मैंने का पुत्र समझ नहीं आया। शब्दों से कभी समझ जाती है मन के
- 33:28पार होने से समझ जाती है बाबा इस कौड़ी में शोक कर रहे हैं तेरे
- 33:34में कौड़ी में। मने सुरत हो वे मनबुद्ध तुम्हें
- 33:49तब तक समझ नहीं आएगी जब तक तुम मन के पार में।
- 33:58और कसम का शीज यह है कि तुम मन से समझना चाहते हो बस यही दुविधा है
- 34:10मन से ही तुम समझना चाहते हो उस विराट।
- 34:16और मन के पार होने से समझ में आता है वह तो फिर किया क्या जा रहा
- 34:23है? तुम्हारा प्रश्न भी जा तुम
- 34:29वैज्ञानिक की तरह सभी नियमों को समझना चाहते हो, लेकिन परमात्मा
- 34:34कोई नियम नहीं है। परमात्मा एक्सिस्टेंस परमात्मा इस
- 34:40नॉट ए लॉ, हिज़ एक्सिस्टेंस। वह मौजूदगी है, वह नियम नहीं है।
- 35:02और तुम नियमों की तरह जैसे साइंटिस्ट तुम्हें नियम समझा देते
- 35:08हैं। ई इज़ इक्वल टू एम सी, वैसे ही
- 35:14तुम परमात्मा को भी नियमों की तरह समझना चाहते हो, लेकिन।
- 35:21ये सब बुद्धि से समझना चाहते हो? काश ये बुद्धि उसे समझा सकती या
- 35:28समझ सकती। इसलिए मैं कहता हूँ जब ये सर लोग
- 35:34परमात्मा के विषय में बोलना शुरू हो गए, ये बात करेंगे बुद्धि से।
- 35:40और वो समझ में आता है बुद्धि से पार होने से बुद्धि से पार ये हो
- 35:44नहीं पाएंगे। आचार्य लोग तो इन्हें खुद ही समझ
- 35:48नहीं आएगा और जब खुद ही समझ नहीं आएगा तो तुम्हें समझा के
- 35:53सिखाएंगे। यही बात मैं रोज़ कहता हूँ, आज
- 35:57बाबा भूल गए। इसका अर्थ ठीक से समझ मने सुरत हो
- 36:07गया। मन बुद्ध बुद्धि में उसकी समझ
- 36:15सुझी तभी आएगी। जब तुम इस मन को ही त्याग दो, एक
- 36:22छोटा सा सवाल ले लें तुम सब का स्वाद मेरा मन हर वक्त चीं चीं भी
- 36:31भी करता रहता। अतीत की स्मृतियां होने वाली
- 36:35कल्पनाएं, भविष्य के सपने। मैप्स कैसे?
- 36:40ज़िन्दगी जीना कैसे चलना कैसे जियेंगे कैसे ऐश करेंगे, कैसे
- 36:50निर्वहन करेंगे, कैसे अपनी घर कृति चलाएंगे, कैसे काम धाम
- 36:55करेंगे, कैसे रोजगार करेंगे, कैसे पढ़ेंगे लिखेंगे।
- 36:58ये तुम सारा मैप नक्शा तैयार कर लेते हो देखना इन सर लोगों का और
- 37:03इन आचार्य लोगों का टाइम टेबल बना होता है इतने बजे उठना, उसके बाद
- 37:10ये उसके बाद ये उसके बाद इतने बजे सो जाना।
- 37:16सब टाइम टेबल फिक्स होते हैं और मैंने कल के प्रवचन में कहा था जो
- 37:23टाइम बाउंडेड है वो कभी नहीं पहुँच सकेगा क्योंकि तुमने जाना
- 37:32वहाँ है जहाँ टाइम लेस्स है। एंड यू अरे टाइम बाउंडेड तुम्हें
- 37:41भक्त ने गिरफ्त में ले रखा है तो कैसे संभव है कि तुम मुक्त हो
- 37:50जाओ, तुम ले भरे हो जाओ बस यही सवाल बाबा बताते हैं।
- 37:57जस बुद्धि से तुम समझना चाहते हो उस बुद्धि से समझ नहीं आएगा, समझ
- 38:04कैसे आएगा? मन में देखिए, मैंने बहुत बार कहा
- 38:07आपसे कि इस शब्द को मैं बहुत बार बोलेंगे।
- 38:11आप इस शब्द के अर्थ को अच्छे से हृदय में उतार लो।
- 38:15मन के पार होने से समझ आएगा तुम्हें बाबक कहते हैं सूरत को
- 38:25बुद्धि को मन को समझ तब आएगा जब तुम इनसे पार जाओ।
- 38:34तो मैं इनसे कहता हूँ तुम्हारा मन झकझक करता है पक पक कहता है तुम
- 38:37वहाँ खड़े क्यों हो? ये तो बिल्कुल ऐसा ही है जैसे तुम
- 38:43कहो क्या मैं बड़ी दुर्गंध आती हूँ ध्यान से सुना तुम्हारे जीवन
- 38:49का सवाल है। तुम आचार्यों के पास जीने का ढंग
- 38:55सीखने जाते हो, तुम इस बात को गौर से समझ लो, सुन लो गटर के पास
- 39:06खड़े हो और तुम कहते हो बाबा बड़े दुखी हैं दुर्गंधारी।
- 39:15तुम्हारी मुसीबत भी सही है और मैं जानता हूँ कि तुम्हारी स्थिति जो
- 39:21है, वो गटर के किनारे है और गटर के किनारे होती ही दुर्गन्ध है ये
- 39:29सत्य है। और तुम रोते हो, चिल्लाते हो,
- 39:35पीटते हो, छाती पीटते हो, बाबा जाकर बड़ी दुर्गन्ध आ रही है और
- 39:43बाबा तुम्हारे पश्नों का हल करता है।
- 39:46बाबा कहते हैं तुम यहाँ गटर के किनारे खड़े ही क्यों हो?
- 39:52अरे बाग बगीचों में चले जाओ वहाँ की सुगंध का आनंद लो तुम क्यों
- 40:00खड़े हो गटर के किनारे गटर के किनारे तो दुर्गंध ही आएगी।
- 40:07तुम क्यों नहीं बगीचों में चले जाते?
- 40:10जहाँ सुगंधित फूलों से लगा हुआ है ये गुलशन तुम वहाँ क्यों नहीं चली
- 40:21जाती, वही जवाब मैं तुम्हें देता हूँ, तुम मन के किनारे खड़े क्यों
- 40:27हो? हटोइस मन से पार यही बाबा कहते
- 40:35मने क्रॉस दी लिमिटेशन ऑफ़ युअर माइंड क्रॉस ऑल दी बाउंडरीज़ ऑफ
- 40:45युअर माइंड। सभी बाउंडरीज़ को क्रॉस कर लो,
- 40:53उसके पार निकल जाओ, मन आती तो हो जाओ, मनुष्य हो जाओ।
- 41:05मन के परमात्मा हो जाओ, बड़ा सुन्दर नाम दिया हमने मनीषी मन को
- 41:16लांग जाओ, मन की सीमा रेखा के पार हो जाओ, तुम खड़े क्यों हो?
- 41:23तुम मन के किनारे खड़े हो के गाटर के किनारे खड़े हो के शिकायत करते
- 41:29हो, मन बोलता है भाई इसका स्वागत। देखिए कुछ लोग कहेंगे कि ऐसा कर
- 41:41लो, वैसा कर लो, मन को साफ कर लो, निर्मल कर लो, गंदगी है, साफ सफाई
- 41:46कर लिया करो, झाड़ू कर लिया, मैं तुम्हें ये नहीं, मैं तुम्हें
- 41:53सीधा और सरल रास्ता बताता हूँ और सही रास्ता भी है।
- 41:57उनके रास्ते गलत हैं क्योंकि उन्होंने मन से पार उनकी कला नहीं
- 42:02सीखी। मैं तुम्हें सीधी बात कहता हूँ ना
- 42:06तो साफ सफाई करो, यह गटर कभी साफ हो गई?
- 42:10यह है ही सारे शहर का कूड़ा करकट बाहर गंदगी बाहर फेंकने के लिए।
- 42:17यह कभी बंद होने को है इस में से दुर्गन्ध आती ही रहेंगी, सदा सदा
- 42:22आती रहेंगी क्योंकि ये बना ही इसलिए बसे के इलाज मन झक झक करता
- 42:32है, मन किच किच करता है। तुम ही हट जाओ यहाँ से तुम दूर
- 42:41चले जाओ, दुर्गंध हट जाए, मन के किनारे पे खड़े ना।
- 42:58यहाँ से हट जाओ, इसे साफ करने की चेष्टाएँ मत करो, यह साफ कभी होगा
- 43:05नहीं, तुम लाख कोशिश करो, पर तुम्हारी सद्गुरु तो यही कहे, मन
- 43:13को साफ करो। और तुम मन को साफ करने में लग
- 43:20जाती हो, ये मत करो, वो मत करो, शुद्ध आचरण करो।
- 43:32शुद्ध विचरण करो, भगवान का नाम जपो, वह पवित्र है, वह सुगंधी
- 43:38हैं। ये उलटे पुलटे रस्तित्व में
- 43:42दिखाएंगे। ये कहेंगे गटर में इतर फेंक दो,
- 43:47सुगंध गोबर के ऊपर इतर फेंको। ये कोई रास्ता न होगा जब कोई हल न
- 43:55हो। इट्स नॉट ए सॉल्यूशन, यह तो एक
- 44:03ढकना है और तुम करती ही हो अपने पापों को ढकने के लिए सुंदर
- 44:09वस्त्र पहनते। मुझे कृष्ण ने बताया कि एक स्त्री
- 44:15है, बहुत अमीर घराने को सात बार साड़ी बदलती है।
- 44:20मैंने कहा भीतर से गंदी हो गई। अभी तो सात बार कपड़े बदलने की
- 44:29जरूरत पड़ती है। गंदी होगी हम तो 7 दिन में एक बार
- 44:38बदल ली अच्छा मैं इतना ही काफी है, अरे रोज़ बदल लो, इतना काफी
- 44:46नहीं है इतना है करो बदल लो। लेकिन क्या करें ये गंदगी में
- 44:54डुबकी मारते होंगे। अगर कहीं वो औरत मुझे सुन रही हो
- 45:01तो सुन ले। जो सात बार साड़ी बदलती है, वो
- 45:06गंदी है, सात बार वो खीक आती होगी।
- 45:11तो गद्दी हो गई तो साड़ी बदलनी ही पड़ेगी।
- 45:17अभी से ज्यादा मैं कुछ नहीं कर सकती।
- 45:22मन्ने सागल बन की सुत। मने सुरत हो गए मनबुध मने सागल
- 45:32भवन की सुध तुम सारे भवनों की सुध लेना चाहते हो?
- 45:39कितने भवन हैं? तो बाबा तो कहते हैं आगा साँ आगा
- 45:46शलख। पाताल ना पाताल आगासः आगास ओढ़क
- 45:53ओढ़क बाल तक के वेद करने के बाद ये तो लाखों हैं, करोड़ों हैं,
- 45:59अनंत हैं, असंख्य हैं। इनकी संख्या हो ही नहीं सकती,
- 46:03इनको गणना असंभव है। इनको गिनना भी मत, इनको गिनने की
- 46:17प्रक्रिया त्याग देना तो क्या करना मैंने सगल पवाने की सुध जैसे
- 46:27मैंने कहा गडर से बाहर हो जाओ। तुम क्यों नहीं बगीचे में निकल
- 46:32जाते बगीचे भी हैं राहतें और भी हैं वसल की राहत के सिवा तुम
- 46:44सिर्फ वसल की राहत को ही राहत सुन?
- 46:47ठीक है, राहतें और भी हैं बसल की राहत के सिवा बसल की राहत के सिवा
- 46:58और भी राहतें मत खड़े रहो गट्टर के किनारों पर।
- 47:05यहाँ दुर्गंध आएगी, मन दुर्गंध युक्त है।
- 47:13निर्मल मन नाम की कोई चीज़ ही नहीं होती कि संतों ने समझाने का
- 47:18यत्न किस इस ढंग से किया है। मन कभी निर्मल नहीं होता।
- 47:24मन तो गंदा है, मन गंदा ही रहेगा इसको साफ करने की चेष्टा में मत
- 47:31लग जा कभी साफ हो पाए जिदगियां गुजर जाएंगी, वृद्ध हो जाओगे, काट
- 47:42की घोड़ी चढ़ जाओगे। फिर अगला जन्म आ जाएगा, तुम भूल
- 47:45ही जाओगी हमने कहाँ तक साधा था? यम, नियम, आसन, प्रणायाम,
- 47:50प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि फिर इनके पांच पांच अंकल सत्य,
- 47:57अहिंसा, अस्थ्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शोच, संतोष, तप,
- 48:02स्वाध्याय, ईश्वर प्राणी, धान। इसको एक एक को साधो और कैसे साध
- 48:07पाओगे तुम आज झूठ का ज़माना एक आदमी दुकान से घर जाने तक भी झूठ
- 48:15बोलता है। तुम कैसे सत्य को साध पाओगे तो
- 48:21तुम्हें एक और रास्ता बताता हूँ। निर्मल होने की चिष्टा मत करना ये
- 48:26मन कभी निर्मल नहीं हो पाएगा तो फिर क्या करें तुम वहाँ चले जाना
- 48:37जहाँ मल है ही नहीं, तुम वहाँ चले जाना।
- 48:43जहाँ सुगंध ही सुगंध, सुगंध, पृष्ठिवर्धनम, पुरवारू, कवि,
- 48:52वंधनान, मृत्यु और मोक्ष माँ मृदार्थ तुम वहाँ निकल जाना जहाँ
- 49:00दुर्गंध है ही नहीं। जहाँ मल है ही नहीं, मल में से ही
- 49:05तो दुर्गंध आती है। मैं तुम्हें बड़ा असन रस्ता दे
- 49:11रहा हूँ मैं तुम्हें कहता हूँ कि मन को तुम जानबूझ कर मन को मलिन
- 49:20भी मत कर लेना। ये भी ध्यान मेरे को मैं तुम्हें
- 49:24कहता हूँ, मानो अगर मलिन हो गया है, तो मलिन हो गया है छोड़ो इसको
- 49:30तुम इससे पार हो जाओ और उस स्थान पर पहुँच जाओ।
- 49:40जीस स्थान पर दुर्गंध नहीं है सुगंध और कौन सा स्थल मन्या सगल
- 49:51पवन के सूत्र अगर मन के पार हो गए तो तुम सुगंध ही सुगंध देखो।
- 50:03ऐसा आनंद है, वहाँ अल्फाज़ नहीं है और जीवा भी बेचारी एक तोले के
- 50:15मास। उसका वर्णन कैसे करेगी?
- 50:19भाषा भी तो असमर्थ है। कोई भाषा, कोई लैंगुएज उसकी
- 50:27परिभाषा करने में समर्थ नहीं है, इसलिए तुम निर्मल होने की चेष्ठा
- 50:36मत करना, तुम वहाँ चले जाना जहाँ मन है ही नहीं जहाँ सुगंधी ही
- 50:43सुगंधी है और वो कौन सा स्थान मन नहीं मन के पास मन नहीं।
- 50:54मन के इधर खड़े रहोगे तो गाड रहे हैं।
- 50:58फिर गटरों की दुर्गंध तुम्हारे नशा पूठों को परेशान करती रहेंगी
- 51:06तो मन के इधर आ जाओ, इस बाउंड्री को क्रोस करो।
- 51:12इधर सुगंध ही सुगंध है। की तरफ बाग बगीचे हैं भांति भांति
- 51:20के फूल लगे आनंद की खलावट है फिजाओं की लहरें हैं।
- 51:34मदहोशी का आलम है ऐसी शान। ऐसी शीतल हवाएं बह रही हैं।
- 51:53कि तुम शिकायत न कर पाओगे कि दुर्गंध है, बस मैं तुम्हें ये
- 52:00कहता हूँ, अगर तुम्हें दुर्गंध आ रही है तो इस दुर्गंध को दूर करने
- 52:06की चेष्टा मत करो। परिस्थितियों को मत बदलना, डॉन टी
- 52:18चेंज दी सर्कमस्टैंसेस बदलना, मनोस्थितियों को बदलना चेंज यूर,
- 52:25माइंड चेंज, द स्टेट ऑफ यूर माइंड।
- 52:32मन की स्थितियों को बदलने की चेष्टा करना, परिस्थितियों को
- 52:36बदलने की चेष्टा न करना। तुम ही वहाँ से कैसे जाना, जैसे
- 52:41गटर से चलकर तुम बाग बगीचों में चले जाओ तो बदल गया ना सब कुछ
- 52:49कहाँ दुर्गंध आ रही थी, तुम शिकायत कर रहे थे।
- 52:54अब तुम सुगंधों से भरे हो, लबालब तुम्हारी नशा फूटें और श्वास
- 53:02श्वास और रोम रोम झूम रहा है, सुगंधियों से।
- 53:10मदहोशी के इस आलम में काली घटा है, मस्त फजा है, काली घटा है,
- 53:28मस्त फजा है। जाम।
- 53:32उठाकर झों झों झों झों बराबर झों शराबी झों बराबर झों बराबर झों
- 53:46शराबी। जो?
- 53:48बराबर धान काली घटा है, मस्त फजा है, काली घटा है, मस्त फजा है।
- 54:01जाम उठाकर। झूम बराबरी झूम झूमने का आनंद उठा
- 54:17इन सड़ी गरीब मान्यताओं के किनारे पे खड़ा होके।
- 54:26अपने को मत दुखी कर ये सड़ी गली मान्यताएँ इनमें रस नहीं है,
- 54:36इनमें दुर्गंधी है। तू तो बस फिर।
- 54:46काली घटा है आह क्या बात मेघ काले हैं अमावस्या की रात मौसम भी
- 54:56सुहाना है मस्त फजा है काली घटा है बस।
- 55:05जाम भी भरा हुआ है। स्वरा ही तैयार जाम उठा ले और झूम
- 55:15ले आया किस लिए? अरे थोड़ा सा आनंद तो उठा ले।
- 55:25हाँ, इन डेरों में जाकर शराब नहीं पिओगे तो वहाँ जाकर क्या कहोगे?
- 55:33जब वो पूछेगा शराब की तुम क्या कहोगे, क्या जवाब दोगे तुम?
- 55:46क्यों नहीं अरे मैंने पी थी झुबने के लिए तुमने पी क्यों नहीं?
- 55:57तुम रुखे, रुखे, रुखे, सूखे, सूखे, सूखे यहाँ भी रह जाते हो?
- 56:03और यहाँ के मैं खाने की मत पियो कौन कहता है यहाँ की मैं खाने की
- 56:11पियो वहाँ की मैं खाने की पी रहा हूँ।
- 56:21मन ने सगलपवन की सुध मन से पार जो हो गया वो त्रिकाल दृश्य हो गया।
- 56:34सब भवनों की सोंची हो जाती हो। त्रिकाल दर्शी हो गया कौन जो मन
- 56:42की दुर्गंध से पार हो गया, जिसने बैग उठाया, काली घट्टा मस्त फंसा
- 56:50है। उठा ले जाम ऑटो से लगा ले और गडक
- 57:04जा सब तैयार है सीन बस तू गडक ले सिर्फ सुरा ही भरी पड़ी है यहाँ
- 57:18कम नहीं होता। इन धर्मों ने नशे पर पाबंदी लगाकर
- 57:31उस परम नशे का बहिष्कार कर दिया। जब तुम यहाँ का छोटा नशे नहीं
- 57:38पीने दोगे तो बड़े के नशे की तरफ उन्मुख कैसे होगा बंदा?
- 57:47तुम्हारी सोच है भाई और अवश्य मैं पक्का कह सकता हूँ कि इन लोगों ने
- 57:54बड़ा नशा नहीं किया अन्यथा छोटे नशे को इंकार न कर दे।
- 57:58शुरुआत तो देखो ये अनारसी होती है।
- 58:03तुमने अनार ही नहीं करने दिया, बच्चे को थोड़ा खेल लेता, झूम
- 58:09लेता। पी लेता मदहोश कोई नालियों में घर
- 58:12जाता, कोई कुत्ते मूते जाते हैं। ये छोटे नसों से चूक गया, लेकिन
- 58:26एक बात ध्यान में रखना, छोटे नशे से इशारे ले लेना, मेरे शब्दों को
- 58:32पकड़ मत लेना, मेरे शब्दों से इशारे ले लेना, मैं बोलता कहाँ
- 58:38हूँ? इशारे तो बड़े सीमित हैं, यहाँ तक
- 58:41रह जाएंगे। लेकिन इशारों की स्ट्रीट लाइन में
- 58:44देखो तुम्हें महकता हुआ चंद्रमा शरद पूर्णिमा की रात का चंद्रमा
- 58:51दिख जायेगा। खुशबू बिखेरता हुआ मन्ने सागिल
- 59:01पवन की सुध। मन में मुँह जोटा न खाय, मन में
- 59:06जम के साथ न जाए, देखिए जो मन के पार हो जाता है, उससे हानि लाभ का
- 59:17डर नहीं होता। क्योंकि जब मन के पार हो गया इतने
- 59:24आनंद और सरूर में हो जाएगा वह हानि और अलाव की परवाह ही नहीं
- 59:28करेगा। उसे इतना मिल गया, इतना मिल गया
- 59:33कि वह तुम्हारे पीसीए का नुकसान हो गया।
- 59:36इज्जत का नुकसान हो गया। हमारा वो चला गया हमारा वो चला
- 59:41गया हमारा वो चला गया। इसीलिए राम जैसे लोग मर्यादा
- 59:46परशोतम के किताब से सुशोभित होते हैं।
- 59:50ज़रा भी तो फर्क नहीं पड़ता। एक क्षण पहले राय तिलक होना था और
- 59:58एक अक्षणा वा। एक क्षण बाद वहीं खड़े खड़े मौसम
- 1:00:04बदल जाता है। राज़ के बदले माता मुझको।
- 1:00:18हो गया हुक्म फकीर का। हेमा मुझे राज़ तो नहीं मिला
- 1:00:32फकीरी का हुक्म हुक्म बड़ा प्यारा शब्द है।
- 1:00:36हुक्म में अंदर सब को बाहर हुक्म नक्म है।
- 1:00:42खड़ा मंतेजर मैं माता तेरे हुक्म अखिर का देख क्या?
- 1:00:57कितने संस्कार प्यारे हुक्म दे दिया लेकिन माता से पूछते देखे तू
- 1:01:07जाना नहीं है, मेरी बस अंतिम हुक्म तेरा ही लेना है, पिताजी ने
- 1:01:13तो हुक्म दे दिया। इन दोनों का ही हुक्म लेना था।
- 1:01:20पिताजी ने मुझे हुक्म दे दिया तो ए माँ मैं तेरे द्वार पे खड़ा
- 1:01:26हूँ, बस आखिरी हुक्म थी को सुनने के लिए फिर आ।
- 1:01:41अच्छा हुक्म दे दे। अम्मा राय तो नहीं मिला?
- 1:01:44फकीरी का हुक्म हो गया और ज़रा भी चेहरे पर शिकन नहीं आती।
- 1:01:50ज़रा भी चेहरे पर शिकन नहीं आती बल्कि सुकून आता है।
- 1:01:56अब ये शब्द सुनने में तो बराबर लगेंगे।
- 1:01:59कहाँ शिकन और कहाँ सुकून तुम्हारे तो थोड़ी सी बात पर शिकन आ जाता
- 1:02:07है। सुकून गायब हो जाता है, लेकिन राम
- 1:02:11ऐसे हैं इसलिए तो मर्यादा पुरुषों का खिताब मिला है।
- 1:02:19तो माँ से पूछते हैं माँ अब तुम मुझे हुक्म देते, मैं तेरे हुक्म
- 1:02:28के इंतजार में खड़ा खड़ा इंतजार। मैं।
- 1:02:35ए माता तेरे हुक्म अखिरिका। देखिए यह मर्यादा पुरुष होती है,
- 1:02:58ऐसे ही किताब में मया करत है चरण चुम्बक बनकर वीरों के किताब मिलना
- 1:03:05नकली। एक क्षण पहले राजतिलक के लिए
- 1:03:11बुलाया गया था और एक क्षण बाद में माहौल बदल गया।
- 1:03:17फकीरी का हुक्म हो गया और 14 साल के लिए हो गया और माँ के हाथ से
- 1:03:23थाली घर जाती। जीसको 14 वर्ष का वनवास मिला उसके
- 1:03:33शिकन नहीं आता, सुकून आ जाता आह हाँ क्या बात है, सोचना ही की तो
- 1:03:40बात है। ऋषियों से मिलेंगे, मुनियों से
- 1:03:44मिलेंगे, दर्शन करेंगे हाँ मुनियों के पास जाएंगे, पराशर के
- 1:03:52पास जाएंगे वि स्वामित्र के पास जाएंगे कितने कितने ऋषि बैठे हैं।
- 1:04:04उनके दर्शन करेंगे। जो दिन रात परमात्मा के साथ लिब
- 1:04:07लगाए, बैठ जो पिए जा रहे जाम पे जाम उसका, अहो भाग्य हैं मेरे।
- 1:04:20भरो भयो, भारी भी सरो सर से टली भला यह राज़ उनके लिए भला होती है
- 1:04:26सर राम के लिए भला था राज़ हुक्म होते ही फकीरी का?
- 1:04:40शिकन नहीं आई। सुकून आया उन शुद्ध हृदयों का संघ
- 1:04:54करेंगे उनके चरणों में से रखेंगे। उनके आगे अंजलि बांधकर सिर के ऊपर
- 1:05:05आँखों में अश्क और उनका दर्शन करेंगे।
- 1:05:10कदा निलम्ब निर जरी निकुंज कोटरे वसन विमुक्त दुर्मती सदा शिरय
- 1:05:16तमंजलि वाहन। वेलो ललो ललो चन्नू ललाम बाल लगन
- 1:05:21का श्वेत मंत्रमउच्चरण कदा सुखी। वहाँ में हम इसको शुभ कहते हैं।
- 1:05:39मने मुँह चोटा न खाये। क्या लाभ?
- 1:05:45क्या हानि? पूरा का पूरा राज़ छिन गया।
- 1:05:54अगर तुम होते तो तुम पीटते, रोते छाती पीटते।
- 1:06:03और शायद उसी वक्त सरयू में स्नान कर ले क्या?
- 1:06:09लेकिन वो राम थे ज़रा भी शिकन नहीं आया कहते ठीक मैं थोड़ा सा
- 1:06:19माँ से इजाज़त ले लूँ। फिर तो 14 वर्ष बाद ही मुलाकात
- 1:06:23होगी। मन ने मुँह चोटा न खाया, जो मन से
- 1:06:35पार हो गया, देखिये मैं एक शब्द बार बार बोल रहा हूँ, यह उनकी
- 1:06:42बातें हैं। जो मन से पार मन तो जा के चेक
- 1:06:46करेगा और उस पुत्री का जवाब है जो कहती है के मन झक झक करता है हर
- 1:06:53वक्त ये सुन ले, अच्छी तरह से इन बातों को बार बार सुन लेना मन में
- 1:07:01मुँह चोटा न खाये। मन में जम्प के साथ ना जाए।
- 1:07:07जो मन से पार हो गया उसके लिए मृत्यु नाम का शव ही खत्म हो गया।
- 1:07:12मृत्यु होती नहीं वो कहेगा मृत्यु नहीं होती, मृत्यु से बड़ा झूठ इस
- 1:07:18संसार में आई नहीं। तुम मृत्यु को सत्य कहते हो, तुम
- 1:07:23देखो जब मुर्दे को उठाते हो न तुम यही कहते हो कि मृत्यु सत्य है
- 1:07:31सत्य बोले गत है राम राम सत्य है, राम राम हो गई आखिर में तुम्हारी
- 1:07:38राधे राधे हो जाएगी कोई खास बात नहीं।
- 1:07:42शब्दों का फर्क है मन में मुँह चोटा न खाये, मन में जम के साथ न
- 1:07:49जाए। जो मन के पार हो गया उसके लिए
- 1:07:55हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश, विद्या जो उसकी निशानी है, जो मन
- 1:08:03से पार हो गया, जब मन की बाउंडरीज को क्रॉस कर गया, उसकी बात कर रहा
- 1:08:10हूँ। मैं मन के अंदर बैठे बैठे।
- 1:08:14इसका तुम विश्लेषण न कर पाओगे। मैं तुम्हारे सर के ऊपर से गुजर
- 1:08:21जाने वाली बात हूँ ऐसा नाम रंजन होय उसका नाम?
- 1:08:31उसका पसारा, उसका होना, उसका एक्सिस्टेंस इतना मलिनता से रहित
- 1:08:41है, उसमें कोई अशुद्धि नहीं है, निर्मल है वो बहुत से मतलब निकाले
- 1:08:50ऋषियों ने। निरंजन निरंजन अंजन आंख में डालने
- 1:08:58वाला सुरमा आंख में अंजन दांत में मंजन, अंजन का मतलब होता है काली।
- 1:09:10जब हम शर्मा लगाते हैं आँखों में वो काली माँ होती है, सुंदर लगती
- 1:09:15है निरंजन जिसमें मलिनता नहीं, जिसमें कालिख नहीं, जिसमें काली
- 1:09:24माँ नहीं और काली माँ छलकी प्रपंच की।
- 1:09:30द्योतक है। जीस समय ये छल कपट परपंच नहीं
- 1:09:36होता, उसे ही भगवान राम कहते हैं। निर्मल मान, जन सोई मोही।
- 1:09:51निर्मल मान जन सोई मोई निर्मल मान जान।
- 1:10:04वो ही मुझे पा सकता है। मोहे कपट छल छीद्र न मुझे कपट छल
- 1:10:14छिद्र सुराग रखकर बात करना मोहे कपट छल छिद्र न।
- 1:10:22बा, मुझे अच्छा नहीं लगता। मैं उस तत्व की बात कर रहा हूँ जो
- 1:10:31तुम भीतर तुम ही हो। उसे कपट अच्छा नहीं लगता, उसे
- 1:10:37निर्मलता अच्छा लगती है। निरबलम मान जन सोई मोहि बाबा वो
- 1:10:44ही मेरे तक पहुँच सकता है। तुम कह तो देते हो इतना तो करना
- 1:10:54सोना जब प्राण तन से निकले गोविंद नाम लेकर फिर जान तन से निकले।
- 1:11:08इतना तो करना स्वामी जब प्राण तम से निकले गोविन्द नाम लेकर।
- 1:11:27फिर प्राण तन से। निकला लेकिन प्राण तन से निकले
- 1:11:36नर्मलता के उस अभाव दिशा में प्राण तन से निकले अंत मती सो
- 1:11:43गति। अगर निर्मल मन होगा, उस वक्त
- 1:11:46आखिरी वक्त और होगा। क्या तुमने सारी उम्र, निर्मलता
- 1:11:50सादी होगी तो मरते वक्त वह कुंडीन सो जाएगी?
- 1:11:55सारी उम्र साधु की निर्मलता को तो मरते वक्त वह घनिभूत होकर संस्कार
- 1:12:01बन जाएगी। और अगले जन्म में यह निर्मलता
- 1:12:06तुम्हें मुक्ति दे देती, बस निर्मलता ही तुम्हें मुक्ति दे
- 1:12:10सकती है। तो यही राम कहते हैं यही तुम्हारा
- 1:12:16भीतर कहता है निर्मल मन जन सोई मोहि भावा।
- 1:12:22नहीं, मुझे अच्छा लगता है और उसको ही मैं अपने पास बुला लेता हूँ।
- 1:12:26मोहे कपट छल छिद्र न पावा, मने मुँह छोटा न खाये, मने जम के साथ
- 1:12:33न जाए ऐसा नाम में निरंजन होय। वह मलिनता से रहित, वह कलिका से
- 1:12:40रहित, वह काली माँ से रहित, वह छल कपट, दृढ़ता से रहित मुझे अच्छा
- 1:12:50लगता है। ऐसा नाम निरंजन होय।
- 1:12:59जे को मन जाना मन को है, कौन जान सकता है जो खुद मन से पार होगा।
- 1:13:08देखिए अफसोस की बात है। जो खुद उस तल में गए नहीं गीता की
- 1:13:19व्याख्या कर जो खुद उस तल पर गए नहीं मलिन बुद्धि से बुद्धि मलिन,
- 1:13:30सब कचरा भरा पड़ा। अच्छा भी होगा कुछ।
- 1:13:34कुछ मलिन भी होगा। अन्नकूट है, बुद्धि बुद्धि
- 1:13:41अन्नकूट है, हृदय भी अन्नकूट है। कुछ भावनाएँ प्रेम की हैं, कुछ एक
- 1:13:47शा द्वीप की हैं, कुछ नफरत की हैं, लेकिन एक तत्व तुम्हारे भीतर
- 1:13:53है। जो मरीन नहीं है, जो निर्मल है और
- 1:13:59उसको निर्मलता ही अच्छी लगती है जैसे समुद्र को बूंद ही अच्छी
- 1:14:03लगती है और बूंद ही समुद्र में ही समय जाती है क्योंकि समुद्र एच टू
- 1:14:11वो है फॉर्मूला। तो तुम्हारे अंतुष का फॉर्मूला है
- 1:14:17निर्मल पा ठंडक, शीतलता, आनंद, खुमारी यह तुम्हारे भीतर का
- 1:14:27अस्तित्व का गुण है, लक्षण है, फुंद है।
- 1:14:33वो किसको समा पाएगी? वह मल युद्ध व्यक्ति को नहीं समा
- 1:14:40पाएगी जैसे एच टू ओह एच टू ओह को ही संभा सकता है जैसे सागर में
- 1:14:48बूंद ही तो उतर सकती है। वैसे तुम्हारे अस्तित्व में वह
- 1:14:54निर्मल है तो तुम निर्मल होकर ही जा सकते हो, क्योंकि सामान में
- 1:15:01समान ही प्रवेश कर सकता है। अगर तुम असमान होगे, उसके समान
- 1:15:07नहीं होगे, उसके विपरीत होगे। तो तुम उसमें समाहित नहीं हो
- 1:15:12सकोगे इसलिए भगवान राम कहते हैं कि निर्मल मन जन सोई मोह ही बाबा
- 1:15:19क्योंकि भगवान राम निर्मल हैं मोहे कपट छल छिद्र ना बाबा।
- 1:15:26ऐसा नाम निरंजन हुए वह। मलिनता से रहित ऐसा नाम है जे को
- 1:15:36मन जाने मन कोय, जो मन से पार हो गया वह ही जान सकता है, जो मन की
- 1:15:44बाउंड्री से इधर रह गया। इतर रह गया उत्तर नहीं गया इतर रह
- 1:15:56गया उत्तर नहीं गया तुम क्या से हो तुम्हें क्या मिल गया वहाँ
- 1:16:07उत्तर मिलता है क्या? जहाँ उतर जाते हो तुम ऐसा ना
- 1:16:15धरंजन होय जी को मन जाने मन कोय जो मन के पार हुआ खुद जो इस झिक
- 1:16:24झिक से परे हो गया अरे तुम ही को नहीं उठ के पार हो जाते हो भाई
- 1:16:28तुम जा सकते हो। लूले नहीं लगड़े नहीं, अंधे नहीं
- 1:16:32काणे नहीं, कोने दो आंख वाले नहीं, आशा मत करो, थोड़ा थोड़ा
- 1:16:39बोर हो जाते है ना लंबे प्रवचन सुन के फिर थोड़े थोड़े शब्द में
- 1:16:44तुम्हारे मन की खुशी के लिए इस्तेमाल कर लेता हूँ।
- 1:16:51वही जान सकता है जो समान हो गया, जो असमान हो गया।
- 1:16:59मैं नहीं जान सकती तो उसमें कौन समा पाएगा निर्मल में?
- 1:17:08निर्मल मानस जन सोई मोज़िफर वो ही मेरे में प्रवेश कर पाए ओनली दे
- 1:17:17विल एंटर माइ गॉड्स किंगडम हो वी विल प्लीज़ इनोसेंट जस्ट लाइक ए
- 1:17:22चाइल्ड। क्योंकि वह मासूम है।
- 1:17:26बच्चों की तरह इसलिए ईशा कहते हैं कि ओनली दे विल एंटर इन मैं गॉड्स
- 1:17:32इनकम मेरे परमात्मा के राज्य में वही व्यक्ति प्रवेश कर पाएंगे।
- 1:17:38फिर भी नो सेंट जस्ट लाइक ए चार्ज जो बच्चों के समान मासूम।
- 1:17:45क्योंकि वह मासूम है पर मासूमियत ही मांगता है तुम तो गीध हो तुम
- 1:17:59तो लोभी हो लालची हो पाखंडी हो। निहित स्वार्थ से गुमा फिरा के
- 1:18:05बातें करते मन लोभी मन लालची मन चंचल मन चोर मन के मते न चा दिए
- 1:18:17परक पलक मन हो। ऐसा नाम निरंजन होय जे को मन जो
- 1:18:27मन के पार चला गया, मन के इतर न रहा मन के उत्तर चढ़ा दे।
- 1:18:38ऐसा नाम निरंजन होय। जे को मन जाने मन कोय, वही जान
- 1:18:45सकता है जो मन के पार हो गया, जो मन के पार नहीं हुआ वह नहीं जान
- 1:18:51सकता। देखिये आय पैर में बॉडी समाप्त
- 1:18:55हुई कल जो है। कब के बिछड़े हो मिलने की कवायद
- 1:19:05करो बहुत ही जन्म बीत गए। बरसा।
- 1:19:16भी कर। गए, बरसा भी कर गए।
- 1:19:32हमको मिले बिछुड़े बरसों भी से गए हमको मिले बिछुड़े बिजुरी।
- 1:19:53बनके गगनपिचा की बीते समय। की।
- 1:20:12मैंने तुमको देखा छाँबी से गए हमको मिले हैं बिछुड़े भेजूरी
- 1:20:34बनकर गगनपिचम की बीते समय की रेखा।
- 1:20:48मैंने तुमको देखा हूँ तड़प तड़प के इस बिरहन को।
- 1:21:06तड़प तड़प के इस विरहन को आया चें ज़रा सा।
- 1:21:25फिर भी मेरा मन प्यासा तड़प तड़प क इस बिरहाण को।
- 1:21:44आया चेन ज़रा सा फिर भी मेरा मन प्यासा।
- 1:22:01मेरे नैना सावन बादलों फिर भी मेरा मन प्यासा।
- 1:22:18फिर भी मेरा मन प्यार सा फिर भी मेरा हाँ मन प्यार।
- 1:22:38तड़प, तड़प तड़प के इस विराह को आया चैन जरास फिर भी मेरा मन वह।
- 1:23:02धन्यवाद।