Latest / Baba ji Vijay Vats / 30 Jan 26 - जल्दी भगवान को पाना है? बस एक काम करना बंद कर दो | मन की शुद्धि का तरीका
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- 0:07कुछ जल्दबाज लोगों के सवाल बाबा। मैं जल्दी से पहुँच जाना चाहता
- 0:22हूँ क्या करूँ जल्दबाजी बंद कर दो पहुँच जाओ।
- 0:40ये तुम्हारी जल्दबाजी की मानसिकता और देरी करवा देती है।
- 0:49दर्द बढ़ता ही गया झूंझुन दबा के जैसे ही तुमने जल्दी के।
- 1:04उस परम ठहराव के पास पहुंचने की चूकें।
- 1:14हमसे लंबी वीडियो सुनी नहीं जाती, समय नहीं।
- 1:24या तो समय निकालिए या टालिए थोड़ा वक्त ठहर जाओ।
- 1:37सनातन धर्म ने 75 साल की उम्र। सनयस्त आश्रम के लिए रखी क्यों
- 1:45कहवाती हो? अभी वक्त नहीं है, हो जाएगा जब
- 1:56वक्त हो जाए तभी फायदा है। इस राह पे चल लेंगे अन्यथा खिचड़ी
- 2:05बन जाएगी। जल्दी से ध्यान कर लोगे, जल्दी से
- 2:11उठोगे स्नान कर लोगे, जल्दी से दफ्तर दुकान पहुँच जाओगे।
- 2:18ये जल्दबाजी आपको कहीं का नहीं छोड़ेगी।
- 2:20ना खुदा ही मिला, ना वसाले सनम, ना इधर के रहे ना उधर के रहे।
- 2:27ये जल्दबाजी आपसे सब कुछ छीन लेगी।
- 2:36जल्दी पहुंचना चाहते हो? और शार्ट में जब आप चाहते हो तो
- 2:44मैं आपसे यही कहूंगा कि जल्दी करना बंद कर दो ठहरों ठहरों जल्दी
- 2:59मत करो। भागो मत दौड़ो मत, जल्दबाजी मत
- 3:07करो अगर जल्दी पहुंचना चाहते हो, तो दूसरा सवाल।
- 3:23बाबा प्रभात वेला में उठकर सबसे पहले स्नान ध्यान करके दफ्तर जाने
- 3:30से पहले आपकी वीडियो लगा देता हूँ, फिर उठने को मन ही नहीं
- 3:36करता, अक्सर लेट हो जाता हूँ और अक्सर झिड़क पड़ती है।
- 3:42क्या करो जहाँ झिड़क पड़ती है वहाँ बैठ कर सुन लिया करो इसका और
- 3:53क्या उपाय जहाँ झिड़क पड़ती है, वहीं बैठ के सुन लिया करो।
- 4:11तीसरा प्रश्न यह प्रश्न थोड़ा सही प्रश्न है, प्रश्नों की तरह पूछा
- 4:24गया है इन्हें कोई जल्दबाजी नहीं। बाबा आप कहते हैं कि जानना है
- 4:36मानना कुछ भी नहीं ठीक है लेकिन अगर मानना ही पड़े तो क्या माने?
- 4:47सुंदर सवाल है, काम का है, पूछना चाहिए अगर मानना ही पड़े तो क्या
- 4:57माने? कायदा बढ़ाने वाला कहता है ए
- 5:04अनार। ये आम सही बात तो मानोगे ना?
- 5:14जो सही बात है उसको मानो और उसे परखें।
- 5:17कैसे कीजिये सही या गलत एम् अनार होता है।
- 5:25निश्चित आह आम होता है पक्का तो अध्यात्म में कौन सी बात माने
- 5:39बिना जाने मानी सुंद बहुत सुंदर सवाल है?
- 5:44गहरे से गहरा स्वर है जो आपको दौड़ाने की सारी व्यवस्था
- 6:06को छीन लिया है। उसके बाद।
- 6:13जो आपको दौड़ाए ना ठहराए। आज क्या हो रहा है?
- 6:27गुरुजन दौड़ा रहे हैं। जल्दी करो बस ये जन्म हम मिल गए
- 6:39हैं आपको और अगर इस जन्म में नहीं पहुंचे तो फिर कौन जाने हमा हम तो
- 6:50होंगे नहीं। हमारे बिना आपको कोई मिले मिले ना
- 6:54मिले तो जल्द करो, जल्द करो। जल्दबाजी सिखाने वाले लोग मूडता
- 7:06से भरे होते हैं। इन्हें खुद की जल्दी होती है।
- 7:16कैसे संख्या बढ़ाई जाए डेरों की संस्थानों की केंद्रों की
- 7:28तुम्हारी कोई परवाह नहीं होती, जल्द करो।
- 7:33यही जन्म है बस और उसके बाद न जाने आपको गुरु मिले मिले न मिले।
- 7:47यानी ये ये कह रहे हैं कि मैं तो सच्चा गुरु?
- 7:53और जब मैना रहा तो फिर आपको बतलाएगा कौन?
- 7:59यही गुरुओं की मूडता है। कभी भी ईश्वर की सृष्टि में
- 8:06गुरुओं का आकाल नहीं होता। जैनीय परंपरा में 24 तीर्थन कराये
- 8:16सिख परंपरा में 10 गुरु आए, गुरु सदा मिल जाता है।
- 8:33गुरु सदा से उपलब्ध होता है बल्कि।
- 8:38सही मायने में पानी के घड़े भरे पड़े हैं, शीतल पीने वाला ही
- 8:47नहीं। विवेकानंद ने कहा, मेरी बड़ी
- 8:55इच्छा है। 100 लोग मुझे मो।
- 8:58मोक्षु मिल जाए तो मैं सारी दुनिया हूँ क्रांति और वो
- 9:08चिल्लाते मर गए। आखिरी दम तक उनके पास एक भी
- 9:13व्यक्ति मो। मोक्षु नहीं आया।
- 9:17तो क्या गुरुओं की कमी थी? शिष्यत्व की कमी है अगर कोई
- 9:29शिष्यत्व का बहाना लेकर गुरु के पास चला भी जाता है बाद में समझ
- 9:35आता है। कि यह प्यासा था ही नहीं, इसकी
- 9:43प्यास थी संसारक कैसे रुतबा बढ़ा लूँ, प्रमोशन हो जाए, तनख्वाह बढ़
- 9:53जाए। कमी बेशी पूरी हो जाए, जिसके औलाद
- 9:59नहीं है, उसके औलाद हो जाए और जिसके ज्यादा औलाद है उसका पालन
- 10:05पोषण कैसे करे? सभी की अपनी अपनी अड़चने हैं।
- 10:10उन अड़चनों को दूर करने के लिए आए थे।
- 10:13भला राम को कौन पूछता है? बाद में पता चलता है कि ये आए किस
- 10:23लिए थे इनको परमात्मा से कुछ लेना।
- 10:37जो आपको ठहराने का मूल मंत्र दे दे, उसकी बात मानिएगा अविश्वास को
- 10:45ठीक से अपने हृदय के अंत स्तंभ में उतार लीजिए जो आपको दौड़ाए
- 10:54ना। ये लो माला जपते रहो किसी ने एक
- 11:02भूत वश में कर लिया था भूत में वश भूत वश में क्या और भूत तो काम
- 11:12मांगे। बताओ क्या करूँ?
- 11:16और जैसे ही मालिक काम बताये झटपट काम करके आ जाए।
- 11:30सारे काम बता दिए मालिक ने। और कुछ ही दिनों में उस भूत ने
- 11:36काम सारे निपटा दिए और झट से काम निपटा के फिर खड़ा हो जाए, बताओ
- 11:44और काम बताओ और देखिए उसकी शर्त थी जब वो सिद्ध होने लगा कि मैं
- 11:50एक क्षण के लिए भी। खाली नहीं बैठ सकता।
- 11:56अगर मुझे काम न दोगे तो मैं कुछ न करूँगा तो मैं खा जाऊंगा।
- 12:02अब डर भी लगे, फिर तो बड़ी जल्दी से निपटा रहा है काम और इतने
- 12:08कितने कम होते हैं लोगों के? थोड़ी सी वासनाएँ होती हैं जिनको
- 12:14लिए लिए आप घूम रहे हो, खप जाते हो, मर जाते हो, खाप हो जाते हो,
- 12:19वेलिन हो जाते हो, जीतने काम थे, कुछ ही दिनों में निपटा दिए तो
- 12:30भूत फिर आके हाँ बताओ और काम बताओ।
- 12:37तो कुछ दिन उसने ऐसे भी चलाये बेकार की बातें, लेकिन डर लगने
- 12:51लगा। क्या करे?
- 12:54इतना कितना काम पता है उसको ये तो खा जाएगा निश्चयत ही मेरी मौत ये
- 13:02भूत के द्वारा होगी भाग कर क्या किसी संत पुरुष के पास सारी व्यथा
- 13:12बताई? सच्चा सांसद है।
- 13:16क्या करूँ पंगा तो ले बैठा, बहुत सिद्ध भी हो गया अब वो काम मांगे
- 13:24और काम सारे कर दिए और काम बाकी कुछ है नहीं मेरे तो सारे बिगड़े
- 13:29तिगड़े सारे काम कर दिए सुबोध ने बाकी कुछ है ही नहीं।
- 13:36अब क्या करूँ ये मुझे खा जाएगा। हमारी शर्त हुई थी खाली मैं बैठ
- 13:43नहीं सकता और अगर तुमने मुझे काम ना दिया तो तुझे खा जाऊंगा।
- 13:52अब मैं क्या करूँ? बाबा कहते ऐसे करो, घबराओ मत
- 13:59तुम्हारे घर में एक बाँस गाड़ दो ऊँचा ऊँचा बाँस गाड़ दो।
- 14:10गहरा जमीन में खूब ऊंचा फिर बाबा फिर उसे कहो, केश के ऊपर चढ़ते
- 14:23रहो, उतरते रहो, चढ़ते रहो, उतरते रहो।
- 14:30भूत आज भी चिंता है भूत तुम्हारा मन है इसको सिद्ध करके तुमने सबने
- 14:45गलती कर ली। और तुम्हें सन मार्ग दिखाने वाला
- 14:55कोई मिलता नहीं है तो ये गुरु आपको दौड़ाते हैं, व्यवस्था देते
- 15:02हैं ये लोमड़ा राम राम जापते रहो। नाम जबते रहो एक नाम जबते रहो
- 15:12पांच नाम जबते रहो चार नाम जबते रहो 1000 नाम जगते रहो बस ये नाम
- 15:19जबते रहो ये तुम्हारे मन के भूत को।
- 15:29काम देने के ढंग मिलने विलने वाला कुछ नहीं, ये दौड़ाते हैं आपको
- 15:42आपका मन पहले से ही दौड़ता है उस भूत की तरह और ये गुरु लोग?
- 15:49आपको और दौड़ाते हैं कि थोड़ा सा तेज आप कहते हो बा बा 20 साल हो
- 15:56गए जैसे कहा गुरु ने वैसे कर रहा हूँ?
- 16:06नितिन ब्रह्मूर्त में उठता हूँ, शान, ध्यान आदि कर के जैसे ही
- 16:12माला पकड़ता हूँ, वैसे ही दोपहर का भोजन हल्का सारा कुछ।
- 16:24बताए नियमों के अनुरूप करता हूँ लेकिन 30 साल हो गए, 25 हो गए, 35
- 16:30हो गए, 15 हो गए क्या करूँ, मिला तो कुछ नहीं, उस भूत को कभी कुछ
- 16:36नहीं मिलेगा जिसके लिए बाँस टांग दिया गया।
- 16:40चढ़ते रहो, उतरते रहो भला। तुम भी ख्याल कर उस बूथ को कुछ
- 16:46मिला होगा, आपको भी कुछ नहीं मिलने वाला।
- 16:56घबराओ मत मिलेगा, कुछ नहीं हाँ खो दोगे।
- 17:07ये कीमती वक्त जब गुरु के पास कुची खुद ही कुछ ना होगा तो
- 17:19तुम्हारे लिए बाँस ही तो गाडेगा और क्या करे?
- 17:23सब गुरु अपने अपने बाँस गाडे बैठे।
- 17:29उन्हें तिवारी समस्या समझ में आ गई है।
- 17:34ऐसा मत ये आपसे ज्यादा समझदार है। जैसे ही तुम जाते हो ये समझ जाते
- 17:44है। एक बागलोर आ गया, एक राज्य में एक
- 17:54कुआं खुदवाया, सभी ने पानी पी लिया और पानी पीकर राज़ दरबार के
- 18:02आसपास चारों तरफ घेरा डाल लिया और ऊंचे ऊंचे नारे बाजी राजा बाहर
- 18:08निकलो राजा तो हमें। तुम क्यों कब्जा जमाए बैठे हो?
- 18:11सिंघाशीन के ऊपर निकलो बाहर नहीं खींच के पकड़ के ले आएँगे बाहर
- 18:18राजा तो थर रहा है महामंत्रियों को बुलाया मंत्रियों को बुलाया।
- 18:27अब इनसे कैसे निपटा जाए? क्या हुआ?
- 18:30मेरी तो जनता ही बड़ी आज्ञाकारी थी, इनको क्या हुआ पता किया क्या?
- 18:37एक कुआं खोदा गया उसका पानी टेस्ट करने के लिए सब ने पिया जहरीला था
- 18:45पानी सभी पागल हो गए। और पागल हो गए तो फिर यही तो कुछ
- 18:50करेंगे, जो कर रहे हैं वही तो करेंगे।
- 18:58नारेबाजी जिंदाबाद मुर्दाबाद। सभी पागल इसी काम पे लगा रखे हैं।
- 19:14राजनीतिज्ञों ने भी धर्म गुर होने दे तो क्या किया जाए?
- 19:26महामंत्री से पूछा गया एक मंत्री से आना था।
- 19:33वो कहते राजा चलो, मेरे साथ उसने एक डोलू उठाया गया, कुएं के भीतर
- 19:46से डोलू भरा राजा से कहने लगा देखो उन्हें गलास गलास या तुम
- 19:50डोलू भर के बिलो। तभी निपट पाओगे इन पागलों से
- 19:56अन्यथा तुम निपट न पाओगे। पागलों से निपटने के लिए बड़े
- 20:00पागल होना पड़ता है और तब से आज तक शांति।
- 20:14राजा मज़े से राज़ कर रहा है बड़ा पागल है और प्रजा मज़ा ले रही है
- 20:22अपने पागल पर उनका छोटे पागल है जब तुम जाते हो इनके स्थानों में।
- 20:32तो कहते हैं ठीक एक मुर्गी और फँस गई और कन्ना बत्ती गुर तू चेला से
- 20:43में गुर ये ले मंत्र किसी को बताना मत।
- 20:56बताएगा तो तेरा नाश हो जाएगा और वो बेचारा डरता डरता किसी को
- 21:04बताता है और हालांकि सभी को यह मंत्र दिया जाता है लेकिन एक
- 21:10दूसरे को बताते नहीं। लोगों को बाहर नहीं बताना क्योंकि
- 21:15बाहर बताओगे तो इनका पागलपन ज़ाहिर होगा।
- 21:21कोई ना कोई समझदार कहदेगा क्या बेबकूफी किए हो?
- 21:27अरे मुड़ो? इन लपियों से भी कभी वो मिलता है
- 21:31जो अखरा नालों वखर है। इन अक्षरों से वो मिलेगा जो
- 21:36अक्षरों से पार है। कोई ना कोई तुम्हारे कान में फूंक
- 21:42मार देगा और 20 वर्ष की मेहनत बेकार देखो आज मैं फूंक मार
- 21:46दूंगा। बहुत से लोग रोते ही चिल्लाते हैं
- 21:52बाबा फिर अब क्या करें? हम तो लूट गए, पीठ गए।
- 22:14बड़े पागल हैं पहले से बन के बैठे हैं, डोलू पी रहे हैं, पानी का
- 22:20डोलू भर के पहले से पी लिया है, इन्हें पता है ग्लास हुए लोग
- 22:24हमारे पास आए बांस टांग रखा है, चढ़ते रहो, उतरते रहो।
- 22:32ये और क्या ये जप, ये तप, ये पाठ, ये पूजा, ये प्रार्थना, ये अरदास,
- 22:42ये दान, ये चढ़ावा, ये पुण्य ये क्या है?
- 22:47ये बाँस ही तो है इसके ऊपर चढ़ते रहो उतरते हो?
- 22:52और कभी कुछ मिला है किसी को ना उस भूत को कुछ मिला था जो चढ़ता रहा,
- 22:57उतरता रहा ना आपको कुछ मिलने वाला है देख लेना 10 साल हो गए 2050
- 23:06साल हो गए उम्र बीत जाएगी, शरीर छोड़ जाओगे।
- 23:14अगले जनम में फिर कोई बुद्धू मिल जाएगा।
- 23:21फिर यही सिलसिला शुरू तुम्हें अकलने को है नहीं।
- 23:30क्योंकि बुद्धों की जमात बढ़ी। संत तो कोई एक तेग बहुत रोता है
- 23:39और वो छोटी सी कोठिया में आनंद से भरा मस्त।
- 23:50वो क्यों जाएगा? आपके भीतर जाकर दरबार लगाएगा।
- 23:53आपके भीतर जाकर आपको पुकारनेगा आपके भीतर जाकर आपको मीडिया के
- 23:59ऊपर 10 घपूर संकी करेगा, क्यों करेगा?
- 24:09जिसने वो रस भी लिया वो ये पाखंड क्यों करेगा?
- 24:16कुएं को ढूंढना पड़ता है कुआं चलके तुम्हारे पास नहीं आता।
- 24:27जद पाल्या पेद कल अंदर दा बुआ खुल गया अपने अंदर दा सुखवासी हाँ उस
- 24:37मंत्र दा चित्र चढ़ दी है नलंदी है।
- 24:42उसको आप की कोई चिंता नहीं, वो मस्त है आनंद उसे जग जहान का कुछ
- 24:53पता नहीं वह सरूर से भरा बदमस्ती में खोया अपने ही आनंद में मस्त
- 25:04है। उसे तो जगाना पड़ता है, उसे तो
- 25:11उठाना पड़ता है, उससे तो बिनती करनी होती है तो कुछ बोलो लव से
- 25:21पहुँच गया था। वहाँ के राजा के पास खबर पहुंची
- 25:26कि से पहुँच गया से पूछा आपने क्या देखा पहुंचने के समय आपने
- 25:37क्या देखा? ज्ञान क्या है?
- 25:42लव से चुप रहा, पहले दरबान भेजे, मंत्री भेजे फिर खुद गया, राजा लव
- 25:53से चुप कुछ नहीं बोले। राजा कहें बोलो लव से आपने क्या
- 26:06देखा, ये संबोधि होती क्या है? ये समाधि होती क्या है?
- 26:13ये ज्ञान क्या होता है हमें भी बता दो, थोड़ा मस्त नजर आ रहे हो?
- 26:22तुम्हारे चेहरे पे नूर कुछ अलग सा दिखता है, हम लोगों से मिलती नहीं
- 26:33आपकी भृतियाँ। अकेले अकेले सारा दिन बैठे रहते
- 26:40तुम ऊबते नहीं क्या देखा तुमने ऐसा पर क्यों मस्त रहते हो?
- 26:49तो आखिर तंग करने लगा है बताओ? बाहर निकलने का फैसला कर लिया कि
- 26:56देश छोड़ जाऊं, दूसरे देश में जला जाऊं और राजा को शक पहले ही था।
- 27:01उसने सारे वार्डरूम के ऊपर जो तैनात कर दिए गए थे, वहाँ पर सेवक
- 27:06उनको कह दिया गया था अगर से यहाँ से गुजरे।
- 27:11तो उसको कागज के ऊपर लिखवा लेना कि उसने क्या देखा?
- 27:15मुझे पता है वो यहाँ से जाएगा, उसको तंग ही इतना किया गया है।
- 27:23लाउड से कहता भाई मुझे तंग मत करो, तुम जाओ क्या देखा नहीं बोल
- 27:29सकता मैं। वो बतलाया नहीं जा सकता तो एक
- 27:35बॉर्डर के पास से गुजरा रातों रात भाग के गया था।
- 27:39दूसरे देश चला जाऊं और उस राजा को पता नहीं है चलो वहाँ आराम से
- 27:45बैठेंगे। सेवक खड़े थे और नेचर ने स्पर्श
- 27:55किया। ख्याति फेल गयी थी, पता लग गया था
- 27:59पहुँच गया है, प्रणाम किया, हाथ जोड़ के खड़ा हो गया।
- 28:05हे बुधपर्ष गुस्ताखी माफ़ करें। थोड़ा राजशाही का हुक्म है।
- 28:17इस कोरे पन्ने पर लिखें जो आपने देखा तो ब्लाउज से पेंसिल पकड़ी।
- 28:29पर लिखा, वह जो मैंने देखा वह कहा नहीं जा सकता जो मैंने देखा।
- 28:49अवर्णनीय है, निर्वाचननीय है अनर्विचनीय है नहीं बोला जा सकता
- 29:00नहीं कहा जा सकता अब अज्ञान सेवक। हाँ, कुछ ले के अब ठीक राजा
- 29:08पुरस्कार देगा। सच भी थी बात वो कहा नहीं जा
- 29:17सकता। कहने की सारी कोशिशों बेकार हो
- 29:24जाती है आखिर में। कितने भी ग्रंथ कर लो आखिर में
- 29:30सभी ग्रंथ चुकता हो जाते हैं लेकिन वो अनुभव नहीं कहा जाता।
- 29:38चेष्टा करते हैं बेचारे संत। करुणा वश क्या आपको थोड़ी थोड़ी
- 29:48झलक मिल जाए, कोशिश करते हैं लेकिन पूरा पूरा नहीं कहा जा सकता
- 29:54क्योंकि वो लिपियों में आता नहीं तो हमारी लिपियां बहुत सीमित है।
- 30:01दुच्छ है वो विराट उच्च। तुच्छ लिपि के भीतर समाता, मजबूरी
- 30:08है। तो तुमने पूछा कि किसकी बात को
- 30:26माना जाए? अगर मानना पड़े तो ठीक लिख लेना।
- 30:34इसको हृदय में जो आपको दौड़ना सिखाए, वहाँ से दौड़ जाना।
- 30:43जो आपको ठहरना सिखाए वहाँ पे ठहर जाना।
- 30:49अब इन दो सूत्रों को आप ह्रदय में उतार लो।
- 30:54जहाँ तक परमात्मा की बात है बस ये आपको निचोड़ बता दिया।
- 31:01जो व्यक्ति हाथ में आपकी गीता थमा दे, कोई ग्रंथ थमा दे, कोई माला
- 31:06थमा दे, कोई मंत्र थमा दे जपो ये सप जप, तप, प्रदास, पूजा पाठ,
- 31:20यज्ञ, हवन। सब दौड़ रहे हैं जो आपको दौड़ना
- 31:26सखाएं वहाँ से दौड़ जाना और जो आपको ठहरना सखाएं वहाँ पे ठहर
- 31:32जाना, बस इस सूत्र को मेरे याद कर लेना।
- 31:36यह है सूत्र अध्यात्म का। अति उत्तम सूत्र है आखिरी
- 31:43अल्टीमेट फ़ॉर्मूला जो आपको दौड़ना सखाएं ये कर लो वो कर लो
- 31:53ये पकड़ो माला ये नाम लो वहाँ बैठ जाओ काली चुंड में।
- 32:00वो पीली चुंड में तुम ये कर लो तुम वो कर लो जो ऐसा कुछ सिखाये,
- 32:09दौड़ना सिखाये वहाँ से दौड़ जाना अगर गलती खाये बैठे हो।
- 32:18नहीं बताया किसी ने और मेरी आवाज आपके कानों में पहुँच गई तो अब भी
- 32:24दौड़ जाओ और जो आपको ठहरना सिखाए वहाँ पे ठहर जाना।
- 32:41अगर मानना ही पड़े किसी की बात तो फिर ऐसे व्यक्ति की बात मानना जो
- 32:49आपको ठहरना, सिखाए, उसकी बात मान लेना जो आपको दौड़ना सिखाए उसकी
- 32:56बात ना मानना क्योंकि दौड़ने से वो मिलता नहीं।
- 33:01ठहरने से वो मिलता है। मैंने पहले भी जवाब दिया,
- 33:06जल्दबाजी करोगे तो देरी हो जाएगी, धैर्य रखोगे और परम धैर्य रखोगे
- 33:17और इतना धैर्य रखोगे। के ठहर ही जाओगे तो मेरे इन
- 33:23शब्दों को हृदयस्थ कर देना आप अगले क्षण पहुँच ही जाओगे अगर
- 33:38ठहरना सीख लिया, ठीक से और परम ठहराव में ठहर गए।
- 33:49अगले ही क्षण तुम वो पालोगे जीसको पाने की भीतर से अभीपसा जग रही है
- 34:01जन्मो जन्मो। मानना हो तो इस बात को मान लेना
- 34:16ये सत्य है, ठहरने से मिलता है और जहाँ हो वहीं पे ठहर जाना, कहीं
- 34:25आश्रम वाश्रम जाने की जरूरत नहीं, कहीं स्थानक?
- 34:34कहीं डेरेक, किसी प्रकार के मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा में
- 34:41जाने की आवश्यकता नहीं सब भटकाव के स्थान तुम भटके हुए हो,
- 34:47तुम्हें मिला नहीं। इसलिए खोजते खोजते कहीं भी पहुँच
- 34:55जाते हो, वो मंदिर हो, मस्जिद हो, गुरुद्वारा हो, वो चर्च हो, कहीं
- 35:01भी हो लेकिन भाग रहे हो, मिला नहीं।
- 35:06भागते भागते कहीं भी घुस जाते हो, ये तुम्हारी अतिरिक्तता का
- 35:16परिचायक है। वो मिला नहीं अभी तृप्त।
- 35:30मैं एक मुसलमान फकीर की बायोग्राफी पढ़ रहा था।
- 35:38वह रोज़ मस्तिष्क में जाता कुरान पढ़ता कुरान की आदतें पढ़ता।
- 35:48वजू करता सब कुछ करता जो बताया इस्लाम और इतना पक्का बिलकुल वक्त
- 36:01पे जाता और कोई काम धाम नहीं था। वहाँ पे बैठता और सांज वापस आ
- 36:11जाता, इतना पक्का रोज़ जाता है 1 दिन।
- 36:27वो फकीर ज्ञान है। थोड़ी बारिश पड़ रही थी, थोड़ी
- 36:37देर इंतजार किया मित्रों ने जब ज़्यादा देर हो गई दोपहर ही हो
- 36:45गई। तो सब एक दूसरे से खुश बसाने लगे।
- 36:53फकीर मरगज ये हो ही नहीं सकता क्योंकि बारिश अंधेरी तूफान ओले?
- 37:04कोई भी मौसम, सर्दी, गर्मी, तेज हवाएं, किसी भी मौसम में इस
- 37:10व्यक्ति ने कभी नागा नहीं किया था।
- 37:14सदा पहुंचा ही पहुंचा और कोई आया आया ना आया ये तो पहुंचा ही
- 37:19पहुंचा लेकिन आज ये नहीं आया। बाकी सभी आ गए।
- 37:23क्या हुआ? अवश्य ही पक्का है कि वो मर गया।
- 37:28अगर जिंदा होता तो आ ही जाता। चलो घर चले सब मौलवे इकट्ठे हुए
- 37:39उसके घर पहुंचे। फकीर के घर पहुंचे तो फकीर के
- 37:49कमरे का दरवाजा खोला। भीतर क्या देखते हैं?
- 37:52अजीब नजारा फकीर नाचे जा रहा है। हैरान हो गए मौलवी, ये क्या कर
- 38:05रहा है? या तो पागल हो गया है, मेरा नहीं
- 38:08है पूछा उससे क्या हुआ? क्यों नाच रहे हो?
- 38:20कहते पूछो मत जिसकी तलाश में बज्जू किया।
- 38:28कुरान पढ़ी आयते इतनी मेहनत की? आज वो ही मेरे घर आ गया।
- 38:38मैं जिसके घर रोज़ जाता था, आज वो ही मेरे घर आ गया।
- 38:45नाचरा ऐसा मीठा सर्बत पिलाया, ऐसा रस भरा सर्बत पिलाया।
- 38:56के नाचने को मन करता है। आज वो खुद ही मेरे पास घर आ गया।
- 39:07कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है, वो तुम्हारे घर पे ही आ जाएगा।
- 39:15ना किसी स्थानक में जाना ना किसी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च
- 39:20में जाना ना किसी धर्म अस्थान में जाना कोई भी हो मिलेगा पता नहीं
- 39:30कहाँ मिलेगा? जीस वक्त पहुंचोगे तुम्हें खुद
- 39:36पता नहीं कि तुम कहाँ हो गए भला कोई स्थान था बुद्ध को मिलने का?
- 39:43पीपल के वृक्ष के नीचे बैठे हैं सुबह सुबह का वक्त कोई मुहूर्त
- 39:48नहीं, कोई लगन नहीं। भोर का तारा उगा देखा, ज्ञान हो
- 39:56गया भला कोई जगा थी महावीर के पहुंचने की, निर्जन स्थान पे खड़े
- 40:06हैं खड़े होकर ध्यान कर देते। थोड़ा थक गए थे, बैठने की तमन्ना
- 40:14हुई पर अभी पूरे बैठे भी नहीं थे। गो दोहासन में पहुंचे थे जैसे गऊ
- 40:20को धोते हैं हम और गो दोहासन में बैठे थे और ज्ञान हो गया।
- 40:31और नानक नदियाँ में उतरे नहाने के लिए और ज्ञान हो गया।
- 40:39हम तो रोज़ उतरते हैं नदियाँ में हम तो बड़े कुशल तैराक हैं लेकिन
- 40:45ज्ञान नहीं होता। और लाउज से बैठे हैं ऊपर से पत्ता
- 40:51गिरा पतझड़ का मौसम है। सु का पत्ता गिरा और सु का पत्ता
- 41:01गिरा। लाउसे ने देखा ज्ञान हो गया, भला
- 41:06ये क्या? ये कोई घटना थी, कोई मंत्र था,
- 41:10कोई चार मंत्र, पांच नाम थे, कुछ भी ना था, सूखा पत्ता, ऊपर से
- 41:18ग्रह और ज्ञान हो गया बोध भाषण का ज्ञान हो गया, भोर का तारा देखा
- 41:24और ज्ञान हो गया। और नानक उतरे नदी में उज्ञान हो
- 41:28गया और कबीर तानाब की पूड़ी पर बैठ उद्यान हो गया।
- 41:33ये कोई स्थान थे, ये कोई समय था, कोई लगन था, कोई मुहूर्त था, कुछ
- 41:39भी ना था। ज्ञान न तो समय देखता है, ना
- 41:49स्थान देखता है, ना कोई धार्मिक अधार्मिक जगह देखता है यहाँ सदना
- 41:55कसाई जैसे तर जाती हैं। गणिका अणिका तर जाती तो वैश्यालय
- 42:01भी नहीं देखता। वह मंदिर भी नहीं देखता।
- 42:07वह शराब की दुकान भी नहीं देखता। वो मीट की दुकान भी नहीं देखता।
- 42:12वो पवित्र स्थान भी नहीं देखता। उसने पता नहीं जहाँ उतरना है उतर
- 42:16जाना ना वह भीड़भाड़ का इलाका देखता है।
- 42:20चांदनी चौक न वह निर्जन स्थान देखता है, जैसे महावीर को हुआ
- 42:28निर्जन स्थान जहाँ होना है वही होता है, उसको कोई स्थान नहीं,
- 42:39कोई विशेष जगह नहीं। कोई विशेष लगन नहीं, कोई मुहूर्त
- 42:44नहीं वो उतर जाता है। अगर आप मंदिर में बैठे हो, मस्जिद
- 42:50में बैठे हो तो ये मत सोच लेना कि वो उतर जाएगा।
- 42:54मंदिर में तो कम ही लोग उतरते हैं, भगवान थोड़ा डरते हैं।
- 43:03इसलिए पक्का ही हो जाता है जो मंदिर में बैठा।
- 43:18वो तो ना पहुँच पायेगा क्योंकि सीमाओं के घेरे में जब बैठता तो
- 43:24परमात्मा सीमाओं में बंधता कहाँ है?
- 43:30परमात्मा खुले आसमान में उतरता है।
- 43:37और देखिये मैं आपको एक बात बताता हूँ, मजाक की नहीं है सच जब भी
- 43:43आपको संबोधि की घटना घटेगी तो आपके भीतर से एक विचार आएगा कि
- 43:54खुले मैदान में चले जाओ। इसका अर्थ तो मैं भी नहीं सक सका,
- 44:01लेकिन भीतर भाग उड़ता है के भाग यहाँ से बंद कमरे में नहीं आता
- 44:14खुले आसमान में आता है। मैंने जीतने प्रबुद्ध व्यक्तियों
- 44:19की जीवनी पड़ी, इतने प्रबुद्ध व्यक्तियों को सुना जीतने
- 44:23प्रबुद्ध व्यक्तियों से उनका पहुंचने का स्थान और पहुंचने की
- 44:31अवस्था सुनी तो मैंने यही पाया कि सभी को खुले आसमान के नीचे पर मत
- 44:38मुद्रा बंद चार दिवारी में किसी को नहीं उतरा।
- 44:42इसलिए पक्का देख लेना मंदिर में तो नहीं उतरेगा, मस्जिद में भी
- 44:46नहीं उतरेगा। आपके बनाए हुए पूजा स्थलों में तो
- 44:49वो नहीं आएगा ये मैं आपको। एक अनुभव युक्त बात बताते हैं कि
- 45:02जैसे ही आपको संबोधित होने के करीब होगी, आपके भीतर एक उमंग
- 45:08उठेगी कि निकल जाओ यहाँ से, मुझे तो ईश्वर को पता है।
- 45:16कि वह विराट, विराट, आकाश की छाया तले क्यों उतरता है, ये वह जानता
- 45:23है, लेकिन मैंने जीतने प्रबुद्ध पुरुषों से मौखिक संवाद किया।
- 45:30मुँह से पूछा। मुझे यही उत्तर मिला कि खुले
- 45:36आसमान की छत के नीचे बहुत है बैठ जाना मंदिरों में मस्ज़िदों में
- 45:47चर्चा घरों में। गुरुद्वारों में लेकिन जब वो
- 45:56उतरेगा, जब आप तैयार हो जाओगे, पूरे तो आपके भीतरे कोमंग जगह की
- 46:06के खुले में चली जा। कोई विशेष अवस्था को निर्धारित
- 46:13करता है। यह वह जानता है कि वो अवस्था
- 46:18क्यों चुनता है। मुझे हुक्म हुआ कि इस ईंट के ऊपर
- 46:24पाम रख लो, ये कोई बात नहीं। कोई आसन नहीं, कोई प्राणायाम
- 46:29नहीं, कोई सिर उल्टा नहीं करना है, कोई तेज धीमे दौड़ना नहीं है,
- 46:37कोई चलना नहीं है, कोई बैठना नहीं है, किसी मुद्रा को नहीं बनाना
- 46:40है, कुछ भी नहीं करना है सिर्फ ईंट पे।
- 46:47और मैंने ईंट पे पांव रख लिया तो दूसरी ईंट पे दूसरा पांव रख लो,
- 46:54ये तो कोई आसन भी ना था, कोई मुद्रा भी ना थी लेकिन वो उतरा।
- 47:08वो उतरता है दौड़ने की जगह पर नहीं उतरता, आप वातावरण खराब कर
- 47:22देते हो शुद्ध स्थानों का। लोग मुझे कहते हैं कि मंदिरों
- 47:28में, मस्ज़िदों में, गुरुद्वारों में लोग बैठे होते हैं, पवित्र कर
- 47:31देते हैं, सभी अपनी अपनी मांगों को वहाँ छोड़ आते हैं और जहाँ
- 47:41मांग होती है वहाँ पवित्रता नहीं होती।
- 47:43अपवित्रता। जहाँ मांग हटी वहाँ पवित्रता आई
- 47:50और आप जैसे ही अपने अपने धार्मिक स्थलों में जाते हो, आप अपनी
- 47:55मांगों को वहाँ परमात्मा के चरणों में दुरोहित कराते हो मांगे वहाँ
- 48:00रह गईं। आप मांगों को छोड़कर वापस आ गईं।
- 48:03तो आप वहाँ का वातावरण दूषित कर देते हो।
- 48:06अपनी मांगों के द्वारा मांगें दूषित करती हैं, उस क्षेत्र को तो
- 48:15पूछा है रुक्मणि व्यास। अगर मानना ही पड़े बाबा तो किसको
- 48:32मानें? मानना ही पड़े तो किसको मानें?
- 48:37जो आपको ठहराने का सूत्र थे उसकी भाव।
- 48:42ये बिलकुल साफ स्पष्ट बात जो आपको दौड़ाने का यंत्र दे, मंत्र दे
- 48:50वहाँ से भाग खड़े होना, पांव को सिर के ऊपर रख कर खूब तेजी से
- 48:58भागना। नहीं तो ये लोग पकड़ लेंगे आपको
- 49:05जो आपको कुछ भी करने को कहें, वहाँ तो मत रुकना और जो आपको
- 49:13सिर्फ मत बैठना सिखाते हैं रुकना सीखा दें।
- 49:21ठहरना सीखा दे यही है सूत्र महात्मा बुद्ध कहीं से निकल रहे
- 49:39थे। रास्ते में एक गड्ढा था आनंद सात
- 49:46उस गड्ढे का पानी वर्षा का पानी भरा हो और गंधला पानी हो आनंद ने
- 49:56सवाल पूछ लिया, प्रश्न पूछ लिया। बनते मन को शुद्ध कैसे करें देखा
- 50:12एक छोटा सा खड्डा बारिश के पानी से भरा हुआ गंधरा मैला पानी।
- 50:22कहते हैं आनंद यहीं बैठ जाते हैं। इस पानी को अच्छी तरह से देख लो।
- 50:30आनंद ने देखा हाँ देखा पानी गंधना है।
- 50:37कहते हैं पानी गंधरा नहीं है, अभी ठहरो बैठ जाओ, बैठ गए, वार्तालाप
- 50:49करने लगे। थोड़ा वक्त बीता और जैसे ही वक्त
- 50:55बीतता है गंधला पानी आपने देखा ही होगा।
- 50:59माटी नीचे बैठ जाती है। और शुद्ध पानी ऊपर ऊपर रह जाता है
- 51:07तो बुध ने कहा चलो चलो आनंद हम वो पानी देख ले।
- 51:13गड्ढे का गए तो देखे गड्ढे के पानी की मिट्टी नीचे बैठ गई थी।
- 51:22स्वच्छ शुद्ध नॉर्मल पॉइंट ऊपर ऊपर आ गया था।
- 51:30आनंद कुछ समझे नहीं समझा प्रभु आनंद हमारा मन?
- 51:42ऐसा ही है। हमारी आत्मा जब दूषित हो जाती है,
- 51:50हमारा मन जब दूषित हो जाता है तो यह गंधरा ये माटी पानी में घुलकर।
- 52:01पानी के पारदर्शिता की स्थिति को बिगाड़ देती है।
- 52:10और जैसे ही तुम ठहरते हो तो तुम्हारे मन की माटी ये मैल।
- 52:18जैसे कल ही स्वाद आया था मन को निर्मल कैसे करें?
- 52:24ये मैल तुम्हारे ठहरने से धीरे धीरे नीचे बैठ जाती है और शुद्ध
- 52:30निर्मल जल ऊपर आ जाता है। बस आनंद यही है सूत्र।
- 52:41मन से मैल को अलग करने का ठहर जाओ, ठहरने से मन का मैल नीचे बैठ
- 52:54जाएगा, निर्मल हो जाएगा। शीशे की तरह पारदर्शी जल ऊपर आ
- 53:03जाएगा, स्पष्ट दिखेगी माटी नीचे बैठी हुई बातें ही कर रहे थे।
- 53:11इतने में एक किसान। अपने बैलों के साथ अपना वाहन लेके
- 53:28गुजरा। वो लकड़ी का गड्ढा कहते हैं हमारे
- 53:31पंजाबी। तो टोय के बीच में से गड्ढे के
- 53:36बीच में से जब वो निकला दूर चला गया तो ने कहा आओ फिर देखते है
- 53:47देखा तो वो पानी फिर गंध रहा हो गया ये क्या हुआ?
- 53:52आनंद ने पूछा। बुध कहते इस पानी में अगर घजोल
- 53:57मार दोगे इस पानी में अगर तेजी से घजोल हाथ फेर दोगे तो सारा पानी
- 54:08धरा हो जाएगा। तुम्हारी तेजी।
- 54:11तुम्हारे मन को विकृत कर देती है उस गंदे पानी की तरह जो निर्मल था
- 54:19और आपके गजोल मारने से हाथ फेरने से वो मैला हो गया मन जहाँ ठहर
- 54:29जाए वहाँ तुम भी ठहर जाना। तुम्हें स्पष्ट दिखाई पड़ेगा।
- 54:35पारदर्शी जल की तरह अपना मुखड़ा दिखेगा।
- 54:39उसमें नीचे बैठी मिट्टी भी दिखेगी, उसमें साफ सु स्पष्ट नजर
- 54:46आएगा। और जैसे ही तुम दौड़ोगे वो दौड़ने
- 54:58का सबब चाहे कुछ भी बने, चाहे धार्मिक हो, चाहे सांसारिक हो।
- 55:11जो दौड़ने का सबब बना वो चाहे बड़ी गद्दी चाहिए, मान सम्मान
- 55:17चाहिए, धन चाहिए, वैभव चाहिए या खुशी चाहिए, आनंद चाहिए, परमात्मा
- 55:27चाहिए जहाँ दौड़ें। वहीं परमात्मा को खोया जिसने भी
- 55:44आपको दौड़ाने की चेष्टा की उससे सावधान वो गुरु है।
- 55:56जो आपको ठहराने का काम करे, जो आपको ठहराने की व्यवस्था दे।
- 56:08गुरु सदा ही ठहराता है क्यों? कारण?
- 56:13कारण जीसको तुम ढूंढना चाहते हो वो तुम खुद ही हो।
- 56:25दौड़ने से मिलेगा नहीं, ढूंढने से भी नहीं मिलेगा, खोजने से भी नहीं
- 56:32मिलेगा कैसे मिलेगा? ठहरने से मिलेगा जैसे गड्ढे का
- 56:41पानी ठहरने से कुछ देर इंतजार किया।
- 56:46माटी नीचे बैठ गई। शुद्ध निर्मल जल ऊपर आ गया।
- 56:50उसमें आप अपनी तस्वीर देख सकते हो।
- 56:53इसी तरह जब आपके मन का मल ठहरने से शांत हो जाएगा तो आपके अपने
- 57:01स्वभाव के दर्शन हो जाएंगे। उसमें आपको अपना चेहरा मोहरा नजर
- 57:07आएगा। दौड़ते दौड़ते उस माटी।
- 57:13मिले पानी की तरह हो जाओगे, जिसमें से आपको अपना चेहरा नजर
- 57:17नहीं आएगा। आत्मबोध उसी पानी में होगा जो
- 57:23ठहरा हुआ होगा। ठहरे हुए पानी में आप अपना चेहरा
- 57:33जैसे झील में देख पाते हो। शांत झील में।
- 57:36अपना चेहरा आप बिलकुल साफ देख पाते हो लेकिन जैसे ही झील का
- 57:40पानी भी थोड़ी लहरों से युक्त हो जाता है तो आप अपनी अक्ष को भी
- 57:47हिलता हुए देखोगे। जैसा है आपका चेहरा मोरा बिलकुल
- 57:55वैसा नहीं दिखेगा। आप हिलते हुए देखोगे क्योंकि हिल
- 58:01रहा है झील का पानी। जैसे ही झील का पानी ठहर गया,
- 58:07आपको अपना चेहरा बिल्कुल साफ स्टेबल सो सूत्र है थिरियम।
- 58:17भगवान कृष्ण ने गीता में भी कहा है अमनित्वम दंभित्वम हिंसा
- 58:23शांतिरार्जों आचार्यों, उपासना, शौचम, स्थेरियम।
- 58:36जिसके स्थिरता स्वभाव में है जो तुम्हें सिधर होना सीखाता है वह
- 58:48गुरु बनने के योग्य है। वहीं ठहर जाना।
- 58:52जो आपको ठहरने की व्यवस्था करे। आपको ठहरने की उपदेश से आपको
- 58:58ठहरने के सारे सूत्र बताये धैर्यम आत्म विनिग्रह जैसे ही तुम ठहरोगे
- 59:10तैसे ही तुम आत्म विनिग्रह करने के योग्य हो जाओगे।