Latest / Baba ji Vijay Vats / 1 Dec 24- परमात्मा और सृष्टि स्थिति प्रज्ञा का गूढ़ रहस्य। छठी इंद्रिय के अद्भुत प्रयोग का रहस्य!
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- 0:11धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र सभ्यता।
- 0:23जो जो स्वः मामका, पांडुवास शैव, किम, कुर्वत, संजय, संजय ने देखना
- 0:37शुरू किया। और धृतराष्ट्र पूछ रहे हैं संजय
- 0:45से कि यह धर्म के क्षेत्र में मेरे पुत्र और पांडव पुत्र ये
- 0:58क्या कर रहे हैं? संजय मुझे विस्तार से बरना करो।
- 1:11धृतराष्ट्र अंधा है, अंधा है और इतना डरा हुआ है कि देखना भी नहीं
- 1:31चाहता। कहा वेदव्यास ने कृष्ण दया पाय ने
- 1:40कि अगर आप इसको अपनी नग्न आँखों से देखना चाहते हो तो मैं तुम्हें
- 1:46दिव्य दृष्टि प्रदान कर देता हूँ। धृतराष्ट्र अंधा है और अंधा ही
- 1:56बना रहना चाहता है एक एक शब्द को ध्यान से समझना देखना नहीं चाहता।
- 2:11और पूछता है संजय से पहला प्रश्न मेरे पुत्र और पांडु पुत्र हे
- 2:20संजय इस धर्म नगरी कुरुक्षेत्र में धर्मक्षेत्र में।
- 2:31क्या कर रहे हैं? पहले थोड़ी सी बात मैं समझा दूँ
- 2:42क्योंकि ये तत्व की बात है, चौंकना मत।
- 2:52परमात्मा सबकी रक्षा नहीं करता, इस गलतफहमी में मत रहना कि
- 3:03परमात्मा सबकी रक्षा करता है। और सभी संतों ने तुम्हें ये इशारा
- 3:10भी किया है, लेकिन तुम भी अंधे हो, कानों से सुनता है, बुद्धि से
- 3:21अंधे हो, विवेक से अंधे। सभी संतो ने कहा कि परमात्मा सबकी
- 3:29रक्षा नहीं करता, तुम चौंक जाओगे, तुम कहोगे बिल्कुल परमात्मा रक्षा
- 3:36करता है, हमारी नहीं, परमात्मा तुम्हें जीवन के साधन देता है।
- 3:46रक्षा नहीं करता और अगर परमात्मा रक्षा करता होता तो दुनिया में ना
- 3:54तो इतनी गुंडागिरी होते, ना इतने अक्सीडेंट होते, ना इतनी भयंकर
- 3:58बीमारियां होती। कुछ भी तो ऐसा नहीं होता।
- 4:03जिसे हम अपशगुन कहते हैं अनिष्ट कहते हैं कि पहली बात ये दिमाग
- 4:12में रख लेना क्योंकि ये बहुत जगह काम आएगा सूत्र अब मैं गीता को
- 4:17शुरू कर रहा हूँ। परमात्मा सभी की रक्षा नहीं करता।
- 4:25इसको आप हृदय में बसा के रखना यह मूल सूत्र है और यही आपको किसी ने
- 4:31बताया नहीं तो तुम चौंकोगे परमात्मा सब की रक्षा नहीं करता।
- 4:43तो फिर रक्षा कौन करता है रक्षा तो मैं करते हो तुम्हारी ये दो एक
- 4:59परमात्मा एक परमात्मा की सृष्टि। एक सजन हरा एक सजना, ये दो चीजें
- 5:09हैं, बहुत गूढ़ विषय हैं, बड़ी शांति से सुनिएगा।
- 5:18या तो बिल्कुल सुबह सुबह सुनिएगा इसलिए मैंने इसे 5:05 पे सुबह
- 5:23सुबह लाइव करता हूँ तो 2 घंटे होते हैं धुल धमा से नहीं होता,
- 5:29कोलाहल नहीं होता सारी दुनिया चैन से सोई होती है।
- 5:38सूरज भी अभी जगा नहीं होता, सब शांति होती है या तो तब सुनना इन
- 5:50शब्दों को या फिर कोलाहल समाप्त होने के बाद जब थम जाए सारी
- 5:56रफ्तार। तक सुनना इसे कोलाहल के बीच में
- 6:03सुनोगे तो आंधी अधूरी सुन पाओगे और आंधी अधूरी, जो रह जाएगी तत्व
- 6:14उसमें ही रह जाएगा। इसलिए मैं तुम्हें कहता हूँ, घोर
- 6:21शांति में सुनना, निश्चिंतता से सुनना, सारे काम धाम करके आराम से
- 6:30सुनना बिस्तर पर गए हो। बस अब कुछ काम आज नहीं करना रात
- 6:37हो गई है तब मेरी वीडियो लगा लेना क्योंकि ये सूत्र इतने गहरे हैं
- 6:51कि इनका अगर एक अंश भी चूक गया। तो अर्थ का अनर्थ हो जाएगा और वो
- 7:01तुम्हारे दिमाग को खराब कर देगा। शांत माहौल में सुन आनंद से सुन
- 7:10जहाँ बिल्कुल शांति हो। तो मैंने कहा परमात्मा सभी की
- 7:18रक्षा नहीं करता वृक्षक तुम्हारे सारे शस्त्र कहते है, सारे धर्म
- 7:28उपदेशक कहते है। की परमात्मा सबकी रक्षा करता है
- 7:34और अगर रक्षा करता है तो फिर ये इतनी दुर्घटनाएँ बेनकर,
- 7:40बीमारियाँ, पीढ़ाई या गलत आकार ये हत्याएं ये ठग्गी थोरी, ये क्यों
- 7:48होती है? यह तो रक्षा करने का कोई ढंग न
- 7:55हुआ परमात्मा का लेकिन नहीं। तुम अपनी मूर्खता को परमात्मा के
- 8:02ऊपर मढ़ देते हो, पता तुम्हें नहीं है पर भाषा तुमने गलत कर दी,
- 8:08दोष देते हो परमात्मा? मैंने बताया सबसे पहले जगह और जड़
- 8:22के बाद। सारे जड़ और चेतन के चलाने का
- 8:33कारक सृजन हारा है। उसने बना दिया पृथ्वी अपना काम कर
- 8:42रही है। ग्रैविटेशन फोर्स डाल दिया, सभी
- 8:48गृह कार्य नक्षत्र बना दिए और सभी के भीतर बल डाल दिया।
- 8:54वह चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन परमात्मा के इसमें कोई योगदान
- 8:58नहीं है। एक शब्द बाबा नानक ने बोला।
- 9:06हम पढ़ते रोज़ हैं गुनते कभी भी नहीं बाबा लिखते हैं जो किछु पाया
- 9:15सो एक को बार उसने एक बार सर्जना कर दिया, उसमें डाल दिया।
- 9:24जो बल डालना था और खुद साक्षी हो गया उसकी सर्जना में एक बिंदु का
- 9:41अरब मा हिस्सा भी। न गलती है, न कमी है, कोई चूक
- 9:48नहीं की उसने इतना परफेक्ट है, उसका सिद्धांत इतनी परफेक्ट है।
- 9:54उसकी संघ रचना की उसमें गलती होती है।
- 10:05इस सिद्धांत को सबसे पहले एक तरफ रख लेना किसी किसी की सहायता करता
- 10:12है, सबकी सहायता नहीं करता है। बहुत से विचार तुम्हें मिल
- 10:23जाएंगे। जो लोगों ने कुछ क्षणिक जंप लगाया
- 10:28ब्रह्मात्मा में और उन्होंने अंग्रेजी में भी एक कहावत है गॉड
- 10:35हेल्प्स सोर्स हू हेल्प्ड देमसेल्व्स जो अपनी रक्षा खुद
- 10:42करते हैं। परमात्माओं की रक्षा करता है।
- 10:47खैर आधा अधूरा सिद्धांत है, इसके मतलब आगे निकलेंगे, हम शुरुआत
- 10:54करें धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र है। इस धर्म की नगरी में जो इकट्ठे
- 11:04हुए हैं मेरे पुत्र और पांडव पुत्र सभ्यता युजुत्सवः नाम कह
- 11:14पांडवा शैव किम कुरवत संजय। हे संजय ज़रा देख के बताना कि
- 11:26मेरे पुत्र और पांडु पुत्र इस वक्त क्या कर रहे हैं?
- 11:30यह पहला श्लोक है अंतः व्यक्ति प्रश्न पूछता है।
- 11:47फिर तुम पूछोगे, बाबा, वह सभी की रक्षा नहीं करता तो वह किसकी
- 11:53रक्षा करता है, के प्रश्न का जवाब मैं बाद में दूंगा।
- 12:02क्योंकि अभी अगर आपको इस प्रश्न का जवाब मिल गया तो आप बाकी बातों
- 12:07से चूक जाओगे। चलो हम शुरुआत करते हैं इसको
- 12:23शॉर्ट मैं बताऊँगा क्योंकि ये कहानी है।
- 12:30अभी गीता की सही शुरूआत नहीं हुई। अभी तो जैसे वीणा को बजाने वाला
- 12:37है, तारण को कस रहा हो, सर्कम को सजा रहा हो, प्रत्येक तार को खडका
- 12:47के देख रहा हो। और जब तार सध गए तो फिर वो समझ
- 12:53जाता है कि अब ये यंत्र वाद्य होने के योग्य हुआ।
- 13:03फिर वो उंगलियां फेहरानी शुरू कर देता है और फिर वीणा की सुंदर
- 13:08बनी। तुम्हारी कानों को बड़ी बढ़िया
- 13:12लगती है। अभी गीता शुरू हुई नहीं अभी साज
- 13:27सजाये जाते हैं। कसे जाते हैं तार अभी तार?
- 13:34इस योग्य नहीं हुए कि मधुर ध्वनि को जनकृत कर सके।
- 13:42पहले अध्याय के 47 श्लोक बस इस साँझ को सजाने में लग गए।
- 13:54संक्षेप में उल्लेख कर दूँ, संजय वर्णन कर रहे हैं कौन कौन हैं
- 14:04युद्धभूमि में नेतृत्व वह कौन कर रहे हैं और।
- 14:14पांडु की तरफ से दूसरे धड़ में कौन कौन हैं और कौन कर रहा है
- 14:20नेतृत्व? तुम्हें मैं बता दूं कि कुरु वंश
- 14:29की तरफ से है। कौरवों की तरफ से है भीष्म पिता
- 14:33मत। कमांडर इन चीफ और पांडवों की तरफ
- 14:40से बहुत से लोग जानते हैं द्रौपदी का भाई द्रौपदी का पुत्र।
- 14:54कमांड कर रहा था पांचाल नरेश द्रौपदी के पुत्र दृष्टि धूमन
- 15:06द्रौपदी के भाई पांचाल के भाई। नेतृत्व उसके हाथ में था।
- 15:14देखिए कितने धुरंधर थे। पांडवों की तरफ से कृष्ण को कमान
- 15:23नहीं दी गई। कृष्ण कहते मैं तो रथ चलाऊंगा
- 15:26सारथी एक बात समझ लेना ज़िन्दगी में जिसने भीतर की व्यवस्था चलानी
- 15:39हो, जिसके सिर के ऊपर सारा कार्यभार हो, उसे कोई औदा नहीं
- 15:46देना चाहिए। फिर से समझो इस बात को क्योंकि
- 15:52गीता गीता सिर्फ आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है।
- 15:57मैंने तुम्हें कहा कि आप बहुत कुछ आएगा, जीने के तरीके भी आएँगे।
- 16:01समाज के भी आएँगे। घरवार के भी आएँगे, स्वयं के भी
- 16:06आएँगे। मित्रों के भी आएँगे, प्रेमियों
- 16:10के भी आएँगे, दुश्मनों के भी आएँगे, सभी के तरीके आएँगे और
- 16:14बड़े गौर से सुनने होंगे। तुम्हें अपने अंतः में उतारने
- 16:20होंगे तो 1 दिन यह वृक्ष फलों से लग जाएगा।
- 16:30जिसके सिर के ऊपर सारा दायित्व हो उसको युद्ध नहीं लड़ना चाहिए।
- 16:42युद्ध लड़े, दूसरा और ब्योंत बाजी करे, वह जिसके ऊपर सारा कार्यभार
- 16:50है। अगर किस तरह से तुम लड़ोगे तो जीत
- 16:55जाओगे। कमांडर इन चीफ सिर्फ व्यवस्थापक
- 17:02होना चाहिए, मैनेजमेंट होनी चाहिए, उसके पास और व्यवस्था करे
- 17:10और जैसे जैसे व्यवस्था करे। बिहु रचना करें बाकी के लोग उस
- 17:17बिहु रचना पर अमल करें तो तुम निश्चित ही जीत जाओगे।
- 17:26कृष्ण के सर के ऊपर सारा कुछ था। लेकिन सेनापति बनाया गया दृष्टि
- 17:36उद्धव मन को, द्रौपदी के भाई को कृष्ण जैसे महर्षि के आगे कृष्ण
- 17:46कहता नहीं। मुझे सारथी बनने दो, कृष्ण जानते
- 17:55थे के अर्जुन के समीप रहना, अर्जुन के रथ को चलाना, मोड़ना,
- 18:05उसकी प्रत्येक अवस्था का ध्यान रखना, उसके मुख की तरफ बराबर
- 18:11देखना। उसके भीतर के उगते हुए घात
- 18:16प्रतिघात उनको निहारना जरूरी है इसलिए उसका सांनिध्य चाहिए और
- 18:25दूसरी बात। ये सब अंदर की बातें हैं।
- 18:31इन्हें बसा लेना। कृष्ण साहस से भरे हुए हैं,
- 18:39पॉज़िटिव एनर्जी से युक्त हैं। जिसकी षटयंत्र जागृत हो जाती है,
- 18:47उसका भय समाप्त हो जाता है, साहस का पुंज हो जाता है, वो साहस का
- 18:58एक खजाना है। जहाँ भी रहेंगे जिसके पास भी
- 19:05रहेंगे और साहस की तरंगें, लहर, विज्ञान यहाँ भी आता है।
- 19:12अर्जुन क्यों जीता अर्जुन? अर्जुन की महाबलिष्ठता के कारण
- 19:19नहीं जीता अर्जुन जीता। कृष्ण की पॉज़िटिव एनर्जी के कारण
- 19:27कृष्ण में आत्मविश्वास और इतना आत्मविश्वास के वह बड़े निर्दोष
- 19:36भाव से कह सकते हैं कि हे अर्जुन शंशाह मत कर।
- 19:41शंस्य आत्मा विनाशति शंश्य करने वाले का विनाश हो जाता है और उनके
- 19:48खुद के भीतर का शंश्य कब का लुप्त हो चुका है और जिसके भीतर शंश्य
- 19:55लुप्त हो जाते हैं उसके भीतर पॉज़िटिव एनर्जी।
- 20:00भर जाती है। क्यों कहा भगवान कृष्ण ने के
- 20:04आचार्य के करीब बैठ जा न जा के आचार्य उपासनम शौचम सैरियम आत्म
- 20:10विनम ग्रहव क्योंकि आचार्य पॉज़िटिव एनर्जी से युक्त है।
- 20:19आचार्य के भीतर से नेक बेनर्जी आती है।
- 20:26सच पूछो तो आचार्य अगर हजारों मील पर भी बैठा है तो भी मातृश को याद
- 20:35करना तुम्हें साहस से भर देगा। सिर्फ मातृस की याद इसलिए हमने
- 20:44क्या कहा? समर्ण करो समर्ण करने से पॉज़िटिव
- 20:52अंडर सी आएगी साहस आएगा। और पॉज़िटिव एनर्जी इज़ की टु
- 21:00सक्सेस वह चाबी है, जीतने की चाबी है।
- 21:07सफलता की चाबी है पॉज़िटिव एनर्जी बीरू डर्चना।
- 21:19साहस ही न हो जाना तुम बहुत वक्तों में संसार में ऐसे हो
- 21:26जाओगे जैसे निष्प्राण हो गए हो तुम्हारे प्राण किसी ने खींच लिए
- 21:32हो। वह साहस से भरा हुआ आचार्य
- 21:43तुम्हारी भीतर पॉज़िटिव एनर्जी को भर देगा और तुम फिर जैसे ही रात
- 21:49को सो के उठते हो फिर एनर्जेनेटिक हो जाते हो कहाँ बैठ के आई तुम?
- 21:57तुम उस तत्व के पास बैठ के आये जो कि पॉज़िटिव एनर्जी का पुंज है,
- 22:04जो भंडार है जहाँ पर जेनरेट होती है एनर्जी और वहाँ से
- 22:12डिस्ट्रीब्यूट होती है एनर्जी। और कृष्ण वही एटोमिक थर्मल पावर
- 22:20प्लांट है। उनके भीतर से सगा ही उत्पन होती
- 22:25रहती है। उनका करीब होना अर्जन को हरा नहीं
- 22:34हो सकता था। उनका करीब होना ही अर्जुन को जाता
- 22:39दें और वैध व्यास लिखते हैं। आखिर में जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ
- 22:51विजयश्री पान चुनती है। उन्हें उनके कहने का अर्थ तुम
- 23:00ज्यादा न समझ पाओगे। एक आचार्य कह रहे थे कि कर्ण हार
- 23:12गया, जबकि कर्ण बनी था। अर्जुन से बिल्कुल ठीक बात है।
- 23:18कर्ण के पास कवच थे, कुंडल थे, शस्त्र विद्या में ज्यादा निश्रण
- 23:25था, ज्यादा बलि था, कुंती पुत्र वा भी था और कर्ण ज्यादा बलि था
- 23:33लेकिन हार? बस उसके पास से बैठा था, वो शल्य
- 23:38बैठा था और शल्य शक से भरा हुआ था।
- 23:42शक्य शक से भरा हुआ व्यक्ति नेगेटिव एनर्जी से भरा होता है।
- 23:52क्यों बार बार कहता हूँ? नहीं करण तुम नहीं जीतोगे क्यों
- 23:59नहीं जीतूंगा। देखो भगवान बैठे उस रथ के ऊपर और
- 24:07मैं तेज चलाता हूँ, साथ हाथ पीछे जाता है जब के टस से मस भी नहीं
- 24:12होना चाहिए। और अर्जुन चलाता है बाण तो तीन
- 24:19हाथ बिछे जाता हूँ मैं तो कौन भली हुआ वो कहता वो तो ठीक है लेकिन
- 24:29जीस ढंग से वो शस्त्र चलाता है। उसका साहस देखने योग्य है।
- 24:38कितने हाथ पीछे जाता है? यह शरीर की शक्ति कामना करे।
- 24:45मैं उसके हाव भाव देख रहा हूँ जैसे निष्नाथ जैसे निपुणता के
- 24:51साथ। जीस साहस के साथ अर्जुन अपने वाण
- 24:54छोड़ता है और तुम डरे डरे से कपड़े, कपड़े से वाण छोड़ते हो।
- 25:02अब शैल ये ये नहीं जानते कि इसका डरना उसी के कारण है।
- 25:08शैल के कारण। शरीर का वीरूपन भीतर का लहर
- 25:15विज्ञान बन के लहरों की तरह छा जाता है और कर्ण की सारी पॉज़िटिव
- 25:21एनर्जी को चूस लेता है। ध्यान रखना अगर कहीं सारथी बनाओ।
- 25:29तो वीरू व्यक्ति को सारथी मत बना लेना तुम्हारा कमांडर इन चीफ
- 25:35साहसी होना चाहिए, तुम चाहे कमजोरी क्यों न हो, जीत जाओगे,
- 25:42क्योंकि लगातार आती हुई एनर्जी तुम्हें सहस से भरे रखेगी।
- 25:48और लगातार आती हुई शल्य से एनर्जी कर्ण की एनर्जी को घटा दी जाएगी।
- 25:56वो इन्क्रीज़ होगा, वो डिक्रीज होगा, कर्ण के हारने का कर्ण शल्य
- 26:05बने। वह हर चीज़ के अंदर शक पैदा कर
- 26:09देता है और शक पॉज़िटिव एनर्जी को क्षीण कर देता है, शक दुविधा में
- 26:19डाल देता है, शक शशय में डाल देता है और भगवान कृष्ण ने कहा है,
- 26:25शंश्य आत्मा विनय दी। बस वो ही काम से लेने का पहले से
- 26:33सजाया गया था। सारा फील्ड शल्य मामा था किसका
- 26:42अर्जुन का और लड़ा उधर से? लेकिन ये व्यो तो पहले ही कृष्ण
- 26:49ने बना दी थी, वह आएगा दुर्व्यधन को जाने दो, सेवा करने दो, तुम मत
- 26:55जाओ। वर्जन क्योंकि यह व्यक्ति खतरनाक
- 27:00है तुम्हारे लिए जीस किसी का भी नेतृत्व करेगा।
- 27:05उसको जमीन सुखा देगा क्योंकि यह शक से भरा हुआ है।
- 27:10कुछ समझ आया तुम्हें इस वर्ष अपनी संगत को ऐसी संगत रखना जिसके भीतर
- 27:20शक की संदेह की गुंजाइश न हो। पॉज़िटिव के माहौल में रहना
- 27:28पॉज़िटिव लोगों के पास जाना संगत का बड़ा असर होता है।
- 27:35हम बच्चे थे खेला करते दो यूनिट से बना दिए एक सामने एक दर्द।
- 27:45तो सहज बात है कि बच्चे जब खेलते हैं तो झगड़ा तो होगा, झगड़ा होगा
- 27:52कि तुने गलती की है। ये ठीक से बंटा इसमें गया नहीं
- 27:59तुमने इसको थोड़ा सा पुश किया है। थोड़ी सी बात के ऊपर झगड़ा हो
- 28:04जाता है तो शोर मचाने लग जाता है। उधर से भी शोर इधर से भी शोर जैसे
- 28:11मीडिया के शोर चलते हैं। आजकल निकलता विकलता कुछ नहीं, शोर
- 28:17शराबे में कुछ निकलता है क्या? तो फिर हमारे पास एक भीम था, उसे
- 28:24भीम कहा करते थे, उसको पता था कि मेरा काम कब शुरू होगा।
- 28:32जब शोर शराबा अपने अति पे पहुँच जाता तो जो व्यक्ति ज्यादा उछलता
- 28:37होता वह के झापड़। रसीद कर देता उसको जन्नाटेदार
- 28:41जापड़ पर वह गिर पड़ता आपने गिर पड़ता सारा शोर थम जाता, शोर सारा
- 28:55थम जाता। यह हमारे पास से पॉज़िटिव नरसी
- 29:00थे। ऐसे हम शोर को समाप्त कर देते
- 29:05हैं। हार गया।
- 29:11करण कमजोर नहीं था, सिर्फ आती हुई शिंघ लहरों के कारण करण हार गया।
- 29:19उसे पता नहीं था। कृष्ण जानते थे कृष्ण जानते थे,
- 29:23अगर ये पांडवों के पक्ष में आ गया तो ये बहुतों की बलियां ले लेगा।
- 29:31अर्जुन को तो मैं संभाल लूँगा, लेकिन बाकी।
- 29:37तो युधिष्ठिर को उसने कान में फूंक मारी कि देखो तुम शल्य के
- 29:42स्वागत के लिए जाना ही मत 2 दिन जायेगा क्योंकि वह लालची है के
- 29:51मामा जी आ रहे हैं। हमारी एक वोट और बच जाएगी लेकिन
- 29:55ये वोट खराब करेगा। तुम ऐसा ये वोट बड़ी खतरनाक है,
- 30:06शल्य की वोट तुम्हारी तरफ आ जाएगी, गिनती बढ़ जाएगी, लेकिन
- 30:10शल्य के भीतर से उठती हुई क्षीण उतरेंगे।
- 30:14कायरता से बरी हुई। ये तरंगें तो मैं भी कायर बना
- 30:20दूंगी। कोई डिस्टर ने वैसा ही किया,
- 30:29दुर्योधन को जाने दिया और वो भाग्य दुर्योधन के जल्दी करो।
- 30:36जाके शल्य को खान पान जैसा भी था राजसी होता है बढ़िया सेवा की
- 30:42उसने तम्बू वहीं काट दिया। यहीं रुको।
- 30:47आपकी अलग से सेवा होगी स्पेशल। शल्य प्रसन्न हो गया।
- 30:54हाँ पुत्र मैं तुम्हारे लिए लड़ूंगा, बस यही चाहिए था
- 31:01दुर्योधन को और यही चाहिए था कृष्णा को दोनों की इच्छा पूरी हो
- 31:07गई। तो टिकट, हम बाजी जो भी लड़ानी
- 31:11पड़ी वो पांडवों की तरफ से मनेजमेंट करने वाला भीतर कहा और
- 31:24बाहर से जो नजर आते थे वो दृष्ट दुमन थे।
- 31:29जार्जुन थे या भीम थे? ये सभी बाहर दिखते थे जो नहीं
- 31:34दिखता था। वह तो बोड़ों को चलाने वाला रथ को
- 31:37चलाने वाला सार्थी था और किसी को समझ ही नहीं आया के पांडव जीत
- 31:44कैसे गए? चार अक्षोहणी सेना का फर्क?
- 31:49और पांडव जीत गए। कैसे मारा इन्होंने सब इनको पता
- 31:57है। एक ही व्यक्ति ने आमूलचूल
- 32:00परिवर्तन कर दिया। वो कृष्ण के भीतर से आती हुई साहस
- 32:06की तरंगें। पांडवों को जीता और शर्ल जैसे एक
- 32:13नहीं थे, वो उससे भक्ति थे। शर्ल जैसे व्यक्ति जो भीतर से
- 32:19सासी नहीं थे, कायर थे, कमजोर थे, वो हरा गए।
- 32:27और द्रोणाचार्य और विषमता में भी अगर तुम कहो के साहस के पंज थे तो
- 32:32तुम गलत हो। कृष्ण के मुकाबले वो भी न भिड़ते
- 32:40थे। विषमता में कृष्ण को नमस्कार करते
- 32:43हैं, फिर अपना शस्त्र उठाते हैं। क्योंकि कृष्ण को वो देख चूके थे
- 32:51अगर पूजा के भक्त शिशु पाल का वध करते हुए उनके चेहरे की वरायता
- 33:00उनके भीतर का साहस निहार चूके थे और साहस है तो जीत है।
- 33:09और सहस नहीं है त्यौहार है। पहला अध्याय 47 चलो कहें इसमें
- 33:24महाभारत के युद्ध में। दो व्यक्तियों का ही रोल रहा अहम
- 33:31और अगर सच में पूछो तो दो ही व्यक्तियों का रोल रहा अहम शब्द
- 33:37को भी मैं खा जाऊंगा दो ही व्यक्तियों का रोल था सारे
- 33:43महाभारत में। कौन कौन द्रौपदी का संकल्प एक
- 33:53कृष्ण का साहस दो एक कृष्ण और कृष्णा द्रौपदी को कृष्णा भी कहते
- 34:01थे कृष्ण और कृष्णा का खेल। अर्जुन कहते हैं भगवान कृष्ण सर
- 34:18हे वासुदेव मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले चलो, मैं देखना
- 34:25चाहता हूँ मेरे विरुद्ध कौन लड़ना चाहता है?
- 34:30और मैं देखना चाहता हूँ कि मेरे पक्ष में कौन लड़ना चाहता है?
- 34:40कृष्ण रात को मध्य में ले गए, उसने अच्छी तरह से निहारा अपने
- 34:49योद्धाओं को तो वो जानते। कौरवों की तरफ से हमारे विरुद्ध
- 34:56पांडवों के विरुद्ध कौन लड़ रहा है ये जानना चाहता था दुश्मन कौन
- 35:01है? हमारे जब देखे एक एक देखे तो उसे
- 35:08नजर आया। वो ही महान व्यक्तित्व जिससे उसने
- 35:14वार्ण विद्या सीखे सारी विद्याय सीखी।
- 35:18गुरु द्रोण वही व्यक्ति जिसकी छत्रछाया में पला छोटा सा बच्चा
- 35:25था, भीष्म पिता। और अनेक महार्थ जिनकी वो पूजा
- 35:40करता था जिनको वो सम्मान देता था। और उसके ताया जीके बेटे, वो तो डर
- 35:56गया और ताया जीके बेटे भी। आपको पता है 101 थे।
- 36:05जब युधिष्ठिर ने मध्य सेनाओं के बीच में आकर कहा कि अब आखिरी बार
- 36:11है, मैं एक प्रार्थना करना चाहता हूँ जो व्यक्ति गलती से मेरी तरफ
- 36:21आ गया है, सिर्फ पांचों की तरफ। इस पांडाल में और उसका मन नहीं
- 36:26मानता। मन ये कहता है कि कौरव ठीक है, वह
- 36:32कौरवों के झुंड में जा सकता है और जो कौरवों की तरफ से लड़ रहा है
- 36:40और उसके भीतर। आवाज आती है कि मैं गलत स्थान से
- 36:44ले रहा हूँ। पांडव सही हैं तो वह कुरबों के
- 36:50झूठ से अभी मेरी तरफ आ रहा है। अभी वक्त है फिर युद्ध शुरू हो
- 36:57जाएगा। कोई नहीं इधर से उतर गया सिर्फ़
- 37:04एक कोरवों से कोरवों का ही भाई वह जो दासी पुत्र था, पुत्र तो
- 37:13धृतराष्ट्र का ही था लेकिन माता गंधारी नहीं थी।
- 37:18दासी थी माता। वह युद्ध सुख, वह निकला और पांडव
- 37:24के पक्ष में आ गया नहीं, मैं समझता हूँ कि तुम धर्म युद्ध लड़
- 37:30रहे हो और मैं समझता हूँ कि ये सभी अधर्म युद्ध लड़ रहे हैं, मैं
- 37:35मरूँ या जीवन, लेकिन मैं अधर्म की तरफ से लड़ नहीं सकता, इसलिए मैं
- 37:43तुम्हारा पक्ष लेता हूँ। इस खेमे में आता हूँ, उस खेमे को
- 37:48छोड़ता हूँ और अर्जुन देखता है सभी को देखता है।
- 38:00गुरु को देखता है गुरु पुत्र को देखता है अश्वथाना करण को देखता
- 38:09है, सारे समूह को देखता है, भाइयों को देखता है।
- 38:16जो धृतराष्ट्र के पुत्र थे और ममत्व जाग पड़ता है, ममत्व जाग
- 38:25पड़ता है और साहस खो बैठता है। भला जीस गुरु ने उसे बाण विद्या
- 38:33से खाई हो। सारी तो सिखार नहीं दी होगी, कुछ
- 38:39तो रखा ही होगा। शेष यह सोच के वह कांप गया।
- 38:47जीस गुरु से मैं वर्ण विद्या सीखा वह गुरु मेरे वृद्ध युद्ध करेगा।
- 38:55मैं कैसे जीत पाऊंगा? और वही भीष्म पिता माँ जिसकी गोदी
- 39:02में बैठ के में एक एक ग्रास खाकर बड़ा हुआ, उसकी छत्रता तरेह में
- 39:12पला बड़ा हुआ। उसकी छत्रछाया से अभय मुद्रा
- 39:17प्रदान कर उसको में मारूंगा, उसके विरुद्ध में लड़ूंगा।
- 39:28बस ऐसे मन में विचार उठ रहे थे। सागर के भीतर इतना कोलहल था जैसे
- 39:38समुद्र के भीतर पूर्णमासी को होता है।
- 39:43ऊंची ऊंची तरंगे उठ रही हैं। ज्वार बाटा ज्वार पेटासार कुछ।
- 39:54मन डर रहा था, अतीत में खो गया अर्जुन और उसके सामने चलचित्र की
- 40:04भांति सारा दृश्य दिख रहा था मैं इनको मार दूंगा।
- 40:13और देखता है के सामने विधवाएं खड़ी हैं।
- 40:15सवैत वस्त्र में वह सो धृतराष्ट्र के पुत्र, उनकी विधवाएं श्वेत
- 40:27साड़ी में खड़ी। अर्जुन को शराब दे रहे हैं, रो
- 40:36रही हैं, अखरियों में पानी है और जीवा पर हाई है आह।
- 40:45रोते चिल्लाते दिखता हुआ ये चलचित्र का समान दृश्य उसकी
- 40:49अंतरात्मा को कब आ गया? यह पूरा का पूरा भीतर से हिल गया।
- 40:58कैसे मरूंगा गुरू को और क्या वह मर पायेगा मेरे से?
- 41:04उसने अवश्य ही कोई तकनीक, कुछ तकनीकें छुपा ली होंगी जो मुझे
- 41:10नहीं बतानी होगी। कौन बताता है पूरा?
- 41:14और वह जिसने बेचारे ने बिना किसी स्वार्थ के छोटे से बच्चे को शरण
- 41:22दी? और ग्रास खिलाया मुझे पाला मुझे
- 41:27इस योग के बनाया, उस विषम पिता को मैं मारूंगा, कँप गया सार पीतस
- 41:37रोम रोम थर थरने लगा कांपने लगा। बहुत कुछ स्क्रीन के ऊपर आया जो
- 41:52आया और कंपा गया जो आया और कंपा गया कपता ही रहा कपता ही रहा।
- 42:01और चरम बिंदु के ऊपर आता है। उसकी कंपकपाहट इतनी हो गई कि
- 42:08सर्दी के मौसम में उसके माथे और शरीर के ऊपर पसीना तरबतर हो गया
- 42:16था। इतनी घबराहट थी।
- 42:25वह कब रहा था थर थर कब रहा था सारा दृश्य जब देखा अपने ही
- 42:38बंधुओं को, अपने ही गुरु को। अपने ही दादा को, अपने ही गुरु,
- 42:45पुत्र को सभी अपने ही तो हैं। इन्हीं के बीच में से हम बैठ के
- 42:54हंसते थे। नाचते थे, गाते थे आज मैं इनका वध
- 42:58करूँगा। ये कौन से मुकाम पे ले आई है?
- 43:06कुदरत ये आज कैसा दृश्य मेरे सामने विधाता ने पेश किया मैं
- 43:17इन्हें कैसे मारूंगा? अपने ही भीतर के द्वन्द से अवलजता
- 43:23हुआ उस शोर शराबे में थर थर कांपता हुआ वह उसे पता भी न चला
- 43:35कब गाढ़ी धनुष उसके हाथ से? घर क्या और वह थर छराता हुआ रस के
- 43:47मध्य भाग में बैठ गया। कृष्ण ने कहा, पार्थ क्या हुआ?
- 44:00तुम क्यों कप रहे हो? इस सर्दी के मौसम में तुम्हारे
- 44:06शरीर तन बदन से ये पसीने की बूँदें तुम जैसे नहा गए हो पसीने
- 44:13में क्या हुआ तो थर थरती आवाज से। अर्जुन बोला सखा मैं युद्ध नहीं
- 44:25करूँगा, मैं युद्ध नहीं करूँगा। हे सखा?
- 44:37क्या मैं अपने ही गुरु का वध कर दूंगा?
- 44:42पर लोक में मेरा हश्र क्या होगा? क्या मैं अपने ही दादा का वध कर
- 44:46दूंगा? और क्या मैं संग्राम विजयी
- 44:52कृपाचार्य का वध कर पाऊंगा? महाबली का।
- 44:57कृपाचार्य बहुत ताकतवर थे, उसे संग्राम विजयी कहते हैं अर्जुन,
- 45:07क्या मैं कृपाचार्य को मार पाऊंगा?
- 45:09वी करण को मार पाऊंगा, कर्ण को मार पाऊंगा, अश्व थमा को मार
- 45:13पाऊंगा। और सोम दत्त का पुत्र भरिष्ण वाह
- 45:23ये सब मेरे सामने खड़े हैं, मेरा रोमा रोमा कप रहा है प्रभु बस एक
- 45:30ही। एक ही सुंदर बात थी।
- 45:36अर्जुन झूठ नहीं बोलता था, जो था, जैसा था वैसा वर्णन कर रहा था।
- 45:44अगर वहाँ कोई ऐसा होता, झूठ बोलने वाला तो पांडव कभी जीत न सकता।
- 45:54क्योंकि मन में कुछ और होता भीतर से कम रहा होता, बाहर से छाती
- 46:02फलाई होती और वह खुद ही दंड में पड़ता था।
- 46:13जो शक्ति को बदला नहीं सकता। परमात्मा के सामने वह पहले से ही
- 46:20हार चुका कृष्ण के सामने जीतने का एक यह भी फॉर्म बोला था के अर्जुन
- 46:30कृष्ण के सामने झूठ न बोला। जो कहा उसने वो सत्य कहा, प्रभु
- 46:38मैं कांप रहा हूँ मेरा रोवा रोवा थर थर कांप रहा है पसीना देखिये
- 46:46मेरा सारा शरीर पसीने से नहा गया है और यह उस कायरता के कारण है,
- 46:52प्रभु। कृष्ण ने कहा हे पार्थ तुम आज ऐसी
- 46:59कायरतापूर्ण बातें इस संकट आपातकाल स्थिति में क्यों कर रहे
- 47:06हो? इससे पहले तो तुमने कभी ऐसी बातें
- 47:09नहीं कि नहीं तो हम युद्ध की घोषणा ही आ करते?
- 47:15आज चाणक्य हो गया जो तुम ऐसी बह की बह की क्षीण सी टूटी फूटी
- 47:26बातें। लड़खड़ाती आवाज़ से बोल रहे हो
- 47:31क्या हो गया है तुझे आज ये अचानक कायरता तुम्हारे में क्यों प्रवेश
- 47:38कर गई? क्या कारण हुआ तुम्हारे सामने?
- 47:43मैं खड़ा हूँ? मैं कृष्ण मैं देवकेनंदन, मैं
- 47:51वासुदेव तुम मेरी तरफ देखो, साहस से परिपूर्ण पहला बाण मुझे लगेगा
- 48:01क्योंकि मैं सारथी हूँ। तुम्हारे तक बाण बाद में आएगा
- 48:06पहले मेरी छाती को बिंदेगा अर्जुन, तुम ऐसी बहकी बहकी बातें
- 48:12मत करो तुम कायरता से भरी हुई बातें मत करो कृष्ण बोले हे
- 48:22अर्जुन। तुने ही कहा था कि मेरे रथ को
- 48:28दोनों सेनाओं के मध्य में नहीं चलो ताकि मैं अपनी आँखों से देख
- 48:33लूँ कि मुझे किन किन से युद्ध करना है और युद्ध करने वाले मेरे
- 48:40से कमजोर कितने? मेरे समान बल वाले कितने और मेरे
- 48:46से ज्यादा बल वाले कितने ये मैं देख लूँ?
- 48:49कौन कौन से राजा बाहर से आए हुए युद्ध के लिए उतावले मेरे साथ
- 48:57युद्ध करने को तैयार? मरने मारने को तैयार कौन?
- 49:02कौन मेरे सामने खड़ा है, मैं ये देख तो लूँ और जब मैं रथ को बीच
- 49:09में मध्य सेनाओं के बीच में ले आया, तो तुम ऐसी बहकी बहकी बातें
- 49:14करते हो। अर्जुन बोला।
- 49:20ये सखा हमने तो इनसे संधि की विश्वकश भी की थी, नरम हो गया
- 49:28शब्दावली बता देती है आत्मिक कृष्ण तुम ही तो गए थे संधि के
- 49:36लिए। पांच गांव ही तो मांग गए थे, उनको
- 49:40भी इनकार कर दिया। भला पांच गांव कोई ज्यादा होते
- 49:43हैं, शांति कर लेते तो आज ही यह नौबत ना होती।
- 49:49मैं किस किस से लड़ूंगा और थर थर कांप रहा है।
- 49:56कृष्ण स्तिप्रग है। स्थितीप्रग ही देख सकता है कि
- 50:03इसकी दशा क्या है और समझ सकता है कि ये दशा क्यों है?
- 50:10कृष्ण से अच्छी तरह कौन देख सकता है कृष्ण साक्षी साक्षी से ज्यादा
- 50:21ईमानदारी से न्यायपूर्वक व्यवस्था से कौन देख सकता है?
- 50:28पहले कहता था मध्य में लिखनू दोनों सेनाओं को देख लूँ और अब ये
- 50:33कहता है। कि हमने तो संधि की भी पेशकश की
- 50:37थी। बात करने की ट्यूनिंग बदल गई, वो
- 50:47गवार बैठ गया और कांपने लगा। कृष्ण समझ कर यार कृष्ण कहते तुम
- 51:02ऐसे कार्यो की बातें अवकरने लगे अर्जुन कहता हूँ मैं क्या करू?
- 51:13सिर्फ एक जमीन के टुकड़े के लिए अर्जुन तो बैरागी हो गए थे, भागने
- 51:21को तैयार थे। हे सखा अगर मैं युद्ध को छोड़
- 51:28दूँ। छोड़ के भाग जाऊं?
- 51:33इससे अच्छा तो ये है कि मैं हिमालय में बैठ के तब करूँ अपने
- 51:39जीवन को सार्थक करूँ। क्या रखा है युद्ध वुद्ध में?
- 51:49टर्न बज गए। मेरे भीतर रोमा रोमा कायरता के
- 51:56कारण कांप रहा है, अर्जुन में दो गुण, सत्यवादिता, और ईमानदारी।
- 52:07ये दो चीजें अर्जुन को जीता दें अर्जुन मानता है हाँ प्रभु
- 52:18कार्यपण्य दोषो बहुत स्वभाव मेरा स्वभाव इस वक्त कायरता से युक्त
- 52:24है। मैं बेरू हूँ।
- 52:28भेरुपन की बातें मैं कर रहा हूँ मैं कायर के वश में आ गया हूँ
- 52:33मेरा रोमा रोमा कायरता से काँप रहा है कार्पण्य 200 पह स्वभाव
- 52:40परक्षामितवाम धर्म समूर्जयता। तुम्हें पूछ रहा हूँ, आप तो धर्म
- 52:49के श्रेष्ठ मार्ग से अवगत हैं? आप बताइए मुझे व्हाट शुड आई डू ऐट
- 52:57थिस क्रिटिकल जंक्चर इस विनाशक मोड़ पर?
- 53:07मुझे क्या करना चाहिए? भगवान?
- 53:11पहली दफे अर्जुन के मुख से कृष्ण के प्रति शब्द भगवान प्रयोग हुआ।
- 53:19पहली दफे अर्जुन के मुख से शब्द शिष्य प्रयोग हुआ था।
- 53:27यह श्रेय यानी रोहिता में जो मेरे लिए श्रेष्ठ कर हो।
- 53:33मुझे बताइए शिष्य से अहम मैं आपका शिष्य हूँ मैं आपके बताये हुए
- 53:40मार्ग पे चलूँगा क्षत्रिय हूँ लेकिन यह कायर था मेरे भीतर।
- 53:46अपनों को ही देखकर अगर कोई उनकी जगह कोई और होता तो ज़रा भी मैं
- 53:52संकोच न करता। मेरी वरीष्ठ बाहें अब तक कइयों को
- 53:57ढेर कर कर चुकी होती। लेकिन ये जो सामने खड़े हैं ये
- 54:04मेरे अपने हैं। और मुझे वो सारा परिदृश्य मेरे
- 54:09मनस पटल पर घूमता हुआ नजर आता है जिनको मैं मारूंगा, ये जवान हैं
- 54:16सभी अभी बचपन से निकले ही निकले हैं, इनके विधवा औरतें हैं इनके
- 54:23बच्चे। मुझे श्राप दिया गया है वो कर्ण
- 54:31क्रंदन, मेरी आत्मा सह न पाएगी शिष्य से अहम् शादी मामम परपन्न
- 54:42और अर्जुन बिल्कुल ठीक है। यही दशा होनी भी चाहिए।
- 54:46एक सामान्य व्यक्ति और अर्जुन झूठ नहीं बोलता है।
- 54:54अर्जुन शिष्य मान चूके हैं अपने आपको कृष्ण का स्पष्ट रूप से कह
- 55:01चूके हैं कि आप ही मार्ग दर्शाया प्रभु।
- 55:05आप मेरे गुरु मैं आपका शिष्य जस श्री है यानी रोहिता में जो मेरे
- 55:14लिए शुभ है। जो श्रेष्ठ गृह है वो मुझे बताइए
- 55:20बस यही। अगर तुम किसी वक्त संकटकाल में आ
- 55:26जाओ तो तुम्हारे माता पिता गुरु तुम्हारे से जो ज्यादा अनुभवी हैं
- 55:42उनसे जाकर सच सच बताते हैं। तुमने जो भी कुछ किया निश्चित ही
- 55:50तुम कंपोगे निश्चित ही तुम भीतर से कंपोगे डरोगे लेकिन छुपाने का
- 55:58भी कोई अर्थ नहीं रह जाता दूसरों को बताने से।
- 56:04कोई अर्थ निकल सकता है, कोई हल निकल सकता है और आम तौर पर निकल
- 56:10ही आता है। कोई ना कोई रास्ता अर्जुन में ये
- 56:17दो गुण है मैं नाम अर्जुन का ले रहा हूँ।
- 56:22मुखातिब आपसे हूँ। मेरे श्रोताओं से मैं मुखातिब हूँ
- 56:30जीवन में बड़े संकट कालीन समय आते हैं गबराना मत अगर तुम्हारे काबू
- 56:40से बाहर हो जाये सारी बात। तो फिर शरण लेना अपने बड़ों के,
- 56:48अपने माता पिता के, अपने गुरु पिता के जो तुम्हारे हित चिंतक
- 56:56हैं, उनको बताना कि मुझे यह रोग है और इसके कारण मैं दुविधा में
- 57:02फंस गया हूँ। मैं इस सेंसर से ग्रस्त हूँ, मैं
- 57:06कांप रहा हूँ, मान लिया अर्जुन ने कार्पण में 200 बहस कायरता के
- 57:14कारण मेरा रोम रोम कांप रहा है हे देवकी पुत्र।
- 57:25मुझे श्रेष्ठ मार्ग दिखाओ कि अब मैं क्या करूँ?
- 57:31मैंने सब राजाओं को देख लिया। इन्हें इनसे मैं भलीभाँति युद्ध
- 57:38कर सकता हूँ। दूरदराज से आए हुए बलशाली से
- 57:42बलशाली लेकिन अपनों से युद्ध कैसे करो यहीं पे आके मैं हार जाता हूँ
- 57:53यहीं पे आके मेरे शस्त्र ढीले हो जाते हैं गांडिव हाथ से खिस ख
- 57:58जाता है। वसुदेव हे देवकीनंदन मेरे हाथ
- 58:06गांडिव का भार संभाल नहीं पाते, कैसे लड़ पाऊंगा?
- 58:11मैं? इन महारथियों से ठीक बोला अर्जुन
- 58:16ने सवस्थ जो मनोव्यथा थी। वो कह देनी चाहिए अगर मनोवेसा न
- 58:23कहोगे तो फिर फिर तुम्हें हल भी न मिलेगा।
- 58:30बहुत से लोग गुरु के पास जाकर भी छुपा लेते हैं।
- 58:33बातों को दो गले होते हैं। भीतर कुछ और होता है बाहर बताते
- 58:42कुछ और है उनका हल कभी भी ना हो सकेगा तुम चाहते हो धन तुम चाहते
- 58:52हो पदवी तुम चाहते हो प्रशंसा। और तुम गुरु से कहते हो कि मुझे
- 59:01चाहिए आनंद मुझे चाहिए परमात्मा तुम गुरु को दुविधा में डालने में
- 59:09चले हो, ये ठीक गुरु दुविधा में आएगा नहीं अगर गुरु गुरु है।
- 59:18तो यह भी समझ ले ना कि गुरु तुम्हारी दुविधा में फंसेगा नहीं,
- 59:25तुम जो बोलोगे वह स्पष्ट स्पष्ट उसकी ट्रांसपेरेंसी में देख लेगा
- 59:31कि इन शब्दों के भीतर सत्य क्या है, छुपा क्या है?
- 59:38रोग क्या है और बतला क्या रहा है? निपुण वैद्य ये जान लिया करता है
- 59:49और ऐसे शब्द जो ईमानदारी से भरे थे।
- 59:55लेकिन कायरता से युक्त थे। कृष्ण ने वचन सुने और कृष्ण समझ
- 1:00:04गए कि यह शिष्य तो वास्तव में है। और शिष्य है।
- 1:00:13इसने स्वीकार भी किया और है भी रोमा रोमा कप भी रहा है और कायरता
- 1:00:18के कारण कप रहा है। ये छाती फलाके नहीं कहता कि नहीं,
- 1:00:25मैं हूँ तो बलवान लेकिन क्या करूँ?
- 1:00:34लड़ने का मन नहीं है पहले बड़ी हेर फेर की अर्जुन क्या ऐसा नहीं
- 1:00:41हो सकता? मैं बड़ों में निकल जाऊं, मैं तब
- 1:00:46कर रहा हूँ। रखा भी क्या है इस जिंदगी में मोह
- 1:00:50माया का जाल है, गद्दियों को भोग भी लूँगा तो क्या होगा?
- 1:00:55भीतर से सन्यासी बोलने लगा जैसे भागवत कथा को सुनाने वाले कहते
- 1:01:06हैं फीस लेके आया करते हैं। लिफ्ट लगी होती है इनकी दुकानों
- 1:01:16पे के सबका के इतने पैसे गीत गाएंगे इतने पैसे और इतने दिन
- 1:01:25कराओगे तो इतने पैसे? और फिर तुम्हें कहते हैं कि मोह,
- 1:01:34माया सब बेकार है, साथ नहीं जाएंगे तो भाई तुम्हारे साथ
- 1:01:39जाएंगे, इनके साथ नहीं जाएगी तो तुम्हारे साथ जाएगी।
- 1:01:47ये छल करने वाले लोग खुद को भी छल रहे हैं और तुमको भी छल रहे हैं।
- 1:01:57मैं अर्जुन की बात कर रहा हूँ अर्जुन ईमानदार है।
- 1:02:04परमात्मा के सामने बेईमानी का कोई अर्थ भी नहीं है।
- 1:02:10पाठ करना भगवान का, भागवत का और झूठ बोलना भाई अगर मोह माय में
- 1:02:17कुछ नहीं है तो मैंने ऐसे भी भागवत की कथा कहते हुए लोग देखे।
- 1:02:23जो प्रास्रमिक रूप में एक रूपया भी नहीं लेते थे।
- 1:02:30मुझे एक बात बताइए, नानक जब गाते हैं तो क्या वो मोहम्मद रफ़ी की
- 1:02:37तरह फीस लेते हैं, गायन के कोई पैसे लेते हैं?
- 1:02:43क्यों गाते हैं? मीरा जब नाचती है तो क्या वो किसी
- 1:02:48आर्टिस्ट की तरह नृत्यंगणों की तरह अपना मेहनताना वसूल करती है?
- 1:03:01क्यों? फिर दोनों के नाच में और दोनों के
- 1:03:04गायन में फर्क क्या फर्क है? बात तो एक ही है बल्कि मीरा
- 1:03:16ज्यादा सुंदर नाचती है, जो नाच भीतर से आए।
- 1:03:20सहजता से आई परमात्मा के दरबार से आई और ज्यादा शुद्ध हुआ करता है
- 1:03:26और ज्यादा लचीला हुआ करता है और जो गायन परमात्मा के दरबार से आई
- 1:03:32वह तानसेनों को मान्य दिया करता है।
- 1:03:36वह तानसेनों को हरा दिया करता है। भीतर का संगीत।
- 1:03:43अपने आप में अद्भुत है और वो मेहनताना नहीं मांगा करता।
- 1:03:51ये आज सारी दुनिया इस कगार पे खड़ी है।
- 1:04:01यूट्यूब चैनल खोल लो मन में जो आये वो बकवास करो, सीवर लगाओ उसकी
- 1:04:12फीस निर्धारित कर दो ये व्यवसाय कब से हो गया धर्म?
- 1:04:23नानक कबीर गाते थे, मीरा नाचती थी, उन्होंने कभी परिश्रम की
- 1:04:34डिमैंड ही नहीं दी। कारण?
- 1:04:38उनके भीतर से आता था, नाच उनके भीतर से आता था और अंगों को थरका
- 1:04:45जाता था। भीतर से आती हुई गायन की थर्क
- 1:04:58द्वीना की सुर। भीतर से आती और गले से प्रकट हो
- 1:05:04जाते नाचना मीरा का आनंद है व्यवसाय गाना प्रभु की शलाजा करना
- 1:05:19कबीर और नानक का। आनंद है, व्यवसाय नहीं और व्यवसाय
- 1:05:28करने वालों और इन व्यवसाय करने वाले लोगों को सुनने वालों फैसला
- 1:05:37तो तुम्हें करना ही होगा। क्योंकि व्यवसाय के बातों में
- 1:05:42आओगे तो ये तुम्हें व्यवसाय करना ही सिखाएंगे और आनंदित व्यक्ति के
- 1:05:52गायन के भीतर अगर तुम रस्म में उतरोगे तो वो तुम्हें आनंद के
- 1:05:57भीतर ही ले जाएगा। ये दो रास्ते हैं तुम्हें पता ही
- 1:06:00नहीं चलता। तुम्हें दोनों का भेद ही मालूम
- 1:06:04नहीं पड़ता कि दोनों में भेद क्या है?
- 1:06:07बस वो भी गा रहा है बल्कि ज्यादा बढ़िया गा रहा है, गा रहे हैं,
- 1:06:15नानक भी गा रहे हैं, कबीर भी। लेकिन तुम भेद नहीं कर सकते
- 1:06:23क्योंकि तुम्हारे पास वो गुणवत्ता है नहीं।
- 1:06:28रस कहाँ आता है तुम्हें कर? मेन्द्रिय ग्रहण इन्द्रिय प्रसन्न
- 1:06:36हो जाती है, बस। आनंद का तो दूर दूर तलक नामो
- 1:06:42निशान नहीं मिलता है। ऐसा ही अर्जुन बातें करते हैं।
- 1:06:51भावना नहीं उठी भीतर से बैरग्य नहीं जन्मा के छोड़ दूं।
- 1:06:58और तप करूँ अपने आपको जानू और मुक्त हो जाऊं बंधनों में बंधा
- 1:07:05बंधा कब तक ऐसा करता रहूँगा? कब तक राज़ दरबारों को भोंकता
- 1:07:10रहूँगा? ये भीतर से नहीं आया।
- 1:07:13ये डर के कारण आया बाहर से महारत ही खड़े हैं।
- 1:07:19उनको देख कर अर्जुन थर थर काँपता है और बात करता है सुन्यस्त निकल
- 1:07:30जाऊं जहाँ से मैं चला जाऊं। बड़ी शांति मिलेंगे।
- 1:07:37यहाँ तो बहुत अशांति है, शो है यहाँ से निकल जाऊंगा लेकिन कृष्ण
- 1:07:45कहाँ जाने देते हैं? कृष्ण के वाणों की चोट से तुम वचन
- 1:07:55पॉप गए, एक बार कृष्ण की शरण में आ जाओ।
- 1:08:04उसका आघात तुम्हें जख्मी कर ही देता है।
- 1:08:10छुप गए और फिर एक बाण चला के कहाँ गयो।
- 1:08:31इकतानु सुना के कहाँ गयो इकतानु सुना के।
- 1:08:49छुप? गयो फिर इक बाण चलाके कहाँ गयो
- 1:09:02तान सुना के। कहाँ गए होएक तान सुना के गो कुल
- 1:09:22ढूंढा मैंने मथुरा ढूंढी। गोकुल ढूँढा मैंने मथुरा ढूंढी।
- 1:09:46कोई नगरिया न शोड़ी रे शुध विश्व। प्ले वो कला, वो कला एक
- 1:10:24मांसरीवाला। सुध भी सिराग्यो अमरी रे मखनू चोर
- 1:10:44जो। नन्द के सॉरी जो कर गया मन की
- 1:10:56चोरी रे। सुध विसरा गयो मौरी बोकारा।
- 1:11:19एक भान सूरी वाला तुम। भी ऐसी ही बातें करते हो।
- 1:11:29भय बीत हुए हुए तुम ना जाने क्या क्या कह देते हो वो ही अर्जुन
- 1:11:34कहता है ये सब मर जाएंगे। आदमी मर जाएंगे, स्त्रियाँ विधवा
- 1:11:42हो जाएंगी, वर्ण शंकर ओलादें पैदा होंगी हे प्रभु और वर्ण शंकर
- 1:11:52ओलादें कैसे अपने पितरों के लिए साथ कर सकेंगे?
- 1:11:59और पितृ लोक में बैठे हुए पितृ भी संतुष्ट न हो सकेंगे।
- 1:12:06श्राद्ध न करने के कारण वो भी अपने पितृ रोग से घर जाएंगे।
- 1:12:11देखिए ये बात कहाँ चली है? कहाँ खड़े हैं कृष्ण और अर्जुन और
- 1:12:18यह मन कैसी कैसी कल्पनाएं करता है?
- 1:12:22वरुण शंकर पैदा होंगे, सरजना होगा, तर्पण न होगा।
- 1:12:32और इनके पूर्वज पितृ लोग से घर जाएंगे।
- 1:12:37मन कैसी कैसी शंकाएं उत्पन्न करता है अपने बचाव में असल में अर्जुन
- 1:12:46का अहंकार मिटना नहीं चाहता और मिटने के डर से वह भी।
- 1:12:52वह इन चीजों की खोज किए है उसे पता नहीं पृथ्वी रोग होता है नहीं
- 1:12:58होता उसने कभी देखा नहीं उसे कुछ पता नहीं है, लेकिन बहुत ही
- 1:13:06शास्त्रों में पढ़ी लिखी लोगों से सुनी सुनाई बातों को यहाँ ले के आ
- 1:13:11रहा है। और क्या है तत्व बोलने का अहंकार
- 1:13:22को बचाओ? अहंकार को बचाने के लिए मनुष्य
- 1:13:26क्या क्या योजनाएं अन्वेषण घटता है?
- 1:13:31वो ही अर्जुन गढ़ रहा है और इतनी बात कह के अर्जुन रथ के बीच में
- 1:13:46बीच बैठ जाता है। धनुष तो हाथ से पहले ही गिर गया
- 1:13:50होता है। मैं युद्ध नहीं करूँगा, मैं
- 1:13:55संयुस्त हो जाऊंगा, तप करूँगा बहुत जन्म बीत है, मेरे मात हो ए
- 1:14:04जन्म तुम्हारे लेख अब याद आता है परमात्मा।
- 1:14:09लेकिन परमात्मा अगर प्यार से याद आए वो अलग बात होती है।
- 1:14:17मोमुख सूत अगर सत्य से याद आए तो बात कुछ अलग होती है और अगर बह से
- 1:14:24आए तो बात कुछ और होती है। तुम भी मोमुख सूत की बातें करते
- 1:14:28हो। लेकिन संसार से डरे डरे मुझे पता
- 1:14:35चलता है, आते हैं परमात्मा की शरण के लिए और कुछ देर बाद कहते हैं
- 1:14:42कि बाबा हमारी तो इच्छा पूर्ण नहीं हुई।
- 1:14:47हमने तो तानसेन को धूल चिटानी थी, हमने तो गायक बनना था, हमने तो
- 1:14:53अमीर बनना था, हमने तो इंडस्ट्रियलिस्ट बनना था, हम तो
- 1:14:57राजनेता बनना चाहते थे और आये थे ये कह के के मैं मोमक्ष हूँ,
- 1:15:04प्यास लगी है, पानी दे दो। गला सूख रहा है, प्रण कप रहे है,
- 1:15:10पानी पानी पुकार रहे है, जल मिलेगा।
- 1:15:17ये दोबली बातें है, अहंकार करवाता है और कृष्ण उसका हल बताते है।
- 1:15:27कि तू संशय में मंत्र है, तू अहंकार से युक्त दोगला हो गया।
- 1:15:37तुझे पता ही नहीं तू क्या बोल रहा है और किसके सामने बोल रहा है
- 1:15:42जहाँ झूठ नहीं चलता। तेरा अहंकार दोगली बातें करता है,
- 1:15:49बात करता है, परमात्मा की इच्छा है तेरी संसार को बचाने की, मैं
- 1:15:54सब जानता हूँ अर्जुन और फिर यहाँ से गीता शुरू होती है।
- 1:16:02श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।
- 1:16:21श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव पितमात।
- 1:16:38स्वामी। सखा हमारे पितमात स्वामी सखा
- 1:16:50हमारे अनाथ नारायण वासुदेव। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे
- 1:17:08नाथ नारायण वसुदेव श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:17:19हे नाथ नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ
- 1:17:33नारायण वासुदेव। धन्यवाद।