Latest / Baba ji Vijay Vats / 14 Aug 25 - निंदा करने से पहले ये कहानी सुन लो! Secret of Daan, Rebirth! आनंद vs अहंकार! Must Listen
Transcript
- 0:16राम शरण उपाध्य है बाबा जी, आप इतने संतो की निंदा होते है क्या
- 0:30आपको पाप नहीं लगती? आप कितने संतों की निंदा करते हो?
- 0:46क्या आपको पाप नहीं लगता? मैं किसी संत की निंदा नहीं करता,
- 0:59वर्ण प्रणाम करती हूँ, मैं जानता हूँ तुम्हें संत और संत का भेद भी
- 1:09पता है। ये प्रश्न उठेगा स्वभावित भी है।
- 1:23लेकिन मैं संत के निधन नहीं करता। प्रत्येक व्यक्ति के दो तल होते
- 1:35हैं। इस प्रवचन को ध्यान से सुन लेना।
- 1:44एक तल होता है। आचारणों का दूसरा तल होता है
- 1:54आत्मा का अस्तित्व का। दो तल होते हैं।
- 2:05पहला तल आचरण का और दूसरा तल अस्तित्व का अस्तित्व नर विकार है
- 2:19निरलेभ है अस्तित्व वह। जहाँ तक निंदा पहुंचती नहीं, जहाँ
- 2:34तक कोई शस्त्र नहीं जाता, कोई आग नहीं जाती।
- 2:43कोई बाढ़ नहीं जाती, कोई तूफान नहीं जाता।
- 2:50उसे कहते हैं अस्तित्व दूसरा होता है आचरण जो मैं निंदा करता हूँ,
- 3:05बस यही वेद तुम समझ नहीं पाए। आज मैं इसे खोल देता हूँ, मैं
- 3:14आचरण करता हूँ और वह आचरण जो सत्य में सही है।
- 3:27और अगर अचलने की निंदा मैं न करूँगा तो कौन करेगा?
- 3:36हाँ जी? एक शास्त्र की कहानी से शुरू करें
- 3:48अपनी बात को किसी जमाने में एक महावरिपरी क्रम में।
- 4:07दयालु प्रोबकारी राजा उसका नाम था राजा आज।
- 4:24तो भगवान राम के दावत दिलीप के पुत्र आज और आज के पुत्र दशरथ
- 4:38दशरथ के पुत्र भगवान राम। यपनशावरी ऐसी चली है, भगवान राम
- 4:49के परदादा थे राजा आज कहानी के एक शब्द को ह्रदय में परोले।
- 5:02तो आपको दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
- 5:14राजाज बड़ाद्यालृत प्रोप कार्य महाबली से पराक्रम भी थे।
- 5:22न्याय कार्य। 1 दिन वह अपने।
- 5:32घुड़साल में घुड़साल जहाँ घोड़े बांधे जाते हैं।
- 5:39गऊ शाल जहाँ घुऊ बांधे जाती है। धर्म, शाल जहाँ धार्मिक लोक धर्म
- 5:48के नाम पर आके विश्राम करते हैं। तो गुड़साल में खड़े थे वहाँ के
- 5:59करिंदों ने कामगारों ने घोड़ों को ठीक से नहलाया।
- 6:11जब घोड़ों के बदन पर इतनी गंदगी देखी, राजा आजि ने तो क्रोधित हो
- 6:18गए घोड़ों से बड़ा प्रेम था। सभी को बुलाया, दंडित किया।
- 6:36और गुस्सा भी हुए, दुखी भी हुए। डांट डपट भी थे।
- 6:54तुम यहाँ करते क्या? सारे थे घोड़ों की सेवा के लिए ही
- 6:59तुम्हें नियुक्त किया गया। और देखो तुमसे इतने इतने से घोड़े
- 7:07भी नहीं समझते तो तुम इनको खाना दाना कैसा देते होगे मैं कोई हर
- 7:19वक्त तुम्हारा निगरान तो रहता नहीं।
- 7:24आज आया हूँ मधुरतम बात और घोड़ों का ये हाल देखकर मुझे बड़ा दुख
- 7:31हुआ राजाज सहनशील प्रकृति के थे वेश।
- 7:44लेकिन घोड़ों की दुर्दशा देखकर उन्हें क्रोध भी आया और दुःख भी
- 7:48हुआ। वो झगड़ा ही कर रहे थे।
- 7:58अभी करीना के साथ कामगारों के साथ सेवकों के साथ।
- 8:09इतने में बाहर एक साधु साधु ने अलख जगाई, कमंडा लागेद किया अलख
- 8:23निरंजन निशान देह। अलख जगा दी भिक्षा डालो अब साधू
- 8:33को क्या पता है, ये गोशाल है किसी का घर फूका राजा ने जब ये आवाज़
- 8:47सुन क्रोध में तो था। इसलिए मैं तुम्हें कहता हूँ,
- 8:56क्रोध में कोई फैसला मत लेना। पहला सबक क्रोध के क्षणों में
- 9:06थोड़ी देरी कर देना, विलंब कर देना।
- 9:10कोई भी फैसला लेना वो नेगेटिव हो या पॉज़िटिव हो, क्रोध के क्षणों
- 9:21में विवेक हो जाता है। तो राजन जब आवाज सुनी देखा, बाहर
- 9:34बागम भर न बैठे, त्रिशूल उठाए भिक्षापत्र आगे किया त्रिपुंट
- 9:42सजाये एक योगी खड़े। इक्षण दे राजा को क्रोध है ये
- 10:02घोरसाला है इताब ही पता? नहीं।
- 10:07उसने घोड़ों के लीप उठाई और उसके भिक्षा पत्र में डाल दिया।
- 10:16ये ले भिक्षा कार्य करने से पहले एक क्षण रोकना।
- 10:31क्रोध में कोई कर्म पे ना हो जाए, क्रोध में कोई फैसला भी न लेना और
- 10:41क्रोध में कोई कर्म भी मत करना। या दूसरा उपदेश घोड़ों के लिए तो
- 10:58था? गुस्सा तो था इसे इतना भी पता
- 11:04नहीं हे गोणशाला ये कोई गार्ड तोड़ है।
- 11:12यहाँ तो घोड़ों की लीद ही मिलेंगे, लीद उठाई और वृक्षापत्र?
- 11:16में डाल दी। बेचारे योगी ने देखा राजा है।
- 11:36सूर्यवंशी राजा एक्स बालू को वंशी से है, जो भी
- 11:58चुप हो, कल्याण हो राजन। तीसरा सब शीतृता मत खो भीतर खे
- 12:22भीतर से तुम परम शांत हो तुम्हारा अंतः।
- 12:28अत्यंत निर्मल, कोमल, शांत है, वह शांत ही रहेगा और तुम वहाँ शांति
- 12:38के पास ही बैठे रहो शब्द ऐसे हो तुम्हारे।
- 12:47जो आघात भी करें तो सहेजे सहेजे आघात करें।
- 12:56तो योगी ने कहा, कल्याण में तू भावा राजन और योगी चला अपने आश्रम
- 13:06में चला दे। अब लीड का वो क्या करता दो बड़े
- 13:16दो उसके। कहीं पीछे जाके उसने लीद को फेंक
- 13:29दिया, इकट्ठा और कंडल को धो लिया, उस दिन भूखा ही रहा, फिर जाता तो
- 13:42धर न जाता, फिर कहीं और से भिक्षा नहीं लेता।
- 13:48ऐसे ही वर्षों में बीत गए। कितना वक्त लगता है?
- 13:59मिनटों से घंटे और उनसे दिन रात उनसे महीने और फिर सालों गुजर गए।
- 14:18बा उसूल जिंदगानी चलती रहे बा तरती जिंदगानी चलती रहे राजा की
- 14:26और जोगी की राजा को शिकार करने का शौक।
- 14:38इसलिए अपने घोड़ों की कभी कभी परीक्षण कर लिया करता था।
- 14:43मेरे घोड़ों को सही दाना चारा मिलता है।
- 14:47सही शनान ध्यान होता है। इनका देख रेख होती है इनकी।
- 14:54उस दिन भी ऐसा ही हुआ। था।
- 15:00मैं आईने पे आया था, लेकिन सेवकों की लापरवाही देखकर गुस्सा हो गया।
- 15:19तीसरा सबक आ चुका है सेवक के ऊपर गुस्सा नहीं करना चाहिए सेवक।
- 15:35को कठोर शब्द कह देना चाहिए। गुस्सा नहीं करना चाहिए।
- 15:48सेवक पराधीन होता है सेवक तुम्हारे अधिकार क्षेत्र में है,
- 15:54उसकी रक्षा भी करनी चाहिए। वचन कटु बहुतू व्यवहार कटु न करो।
- 16:12घोड़े पर सवार होकर शिकार करने के लिए निकला राजा हज।
- 16:24शस्त्र पहरेदार भी से फौज भी दी। शस्त्र भंडार में सख्त कोई शिकार
- 16:34न मिला और घने जंगलों में गुम हो गया।
- 16:44रश्क हो गया, भटक गया इसी भटकाव में ढूंढ़ते ढूंढ़ते कि कौन सा
- 16:57रास्ता जाएगा राजधानी को अयोध्या को।
- 17:05वह तलाशी रहा था कि उसके सामने किसी कुटिया में से धुआं उठता हुआ
- 17:12दिखाई पड़ा। बस धोने का मतलब ये है कि यहाँ
- 17:16मानव रहता है। ये पहचान है लक्षण।
- 17:22जहाँ आग होगी वहाँ धुआं होगा और जानवर आग से गिरता है, बस धुआं तो
- 17:32आग भी होगी और आग है तो मानव है। सभी ने देखा।
- 17:47राजा ने कहा चलो वहाँ धुआं है, कोई व्यक्ति होगा, वहाँ वह रास्ता
- 17:53बता देगा तब तक भूख भी लग गई। राजा आज।
- 18:16उस। झोंपड़ी में पहुंचा देखा एक संत
- 18:21बैठ है आइनानंद मेले। अभिषेक शहर से भिक्षा मांग के
- 18:31लेकर आए थे। आज भिक्षा में बहुत ज्यादा मिल
- 18:37गया था और ईश्वर को याद कर। आनंद में बैठे है इत्थे मेरा जाग
- 18:55है पांव की आहट। को सुन।
- 18:59के। योगी की आँखें खोलें।
- 19:07राजा ने प्रणाम किया। राजा ने पांचवीं आशीर्वाद दिया
- 19:20योगी ने तुम्हारा कल्याण राजन? कहो कैसे राजा ने सब बात बता दी,
- 19:40रास्ता भटक गए, थोड़ा बता दो किधर से जाना होगा।
- 19:51और थोड़ी भूख भी लगती है तो संत कहने लगा रस्था को मैं बताऊँगा।
- 20:04पहले आप भोजन खाली है, जितना भोजन ले के आया था वो सारा उनके।
- 20:15आप अपने शोधा शांत कीजिए, फिर रास्ता भी बता देंगे।
- 20:23आज इतनी सी भिक्षा मिली कि कई लोगों का पेट भर सकता था।
- 20:33ईश्वर बड़ा गट गट के अंतर्स की जनक बड़े बड़े की पीर पचन पहले
- 20:44वनों प्रारब्ध पाछ्य वनों शरीर। तुम व्यर्थ से ही चिंता करते हो
- 20:57और चिंता तुम्हारी जायज भी है, जब तक तुमने वो अदृश्य हाथ नहीं
- 21:04देखे, जिसने सारी सृष्टि की सृजना की।
- 21:10तब तक तुम्हारा चिंतित होना स्वाभाविक भी है क्योंकि तुमने वो
- 21:15देखा नहीं जिसने सृष्टि को बनाया है, लेकिन जो संत उन अदृश्य आदतो
- 21:26को देख लेता है। वह चिंता नहीं करता।
- 21:35वह जानता है कि मेरा यहाँ कुछ नहीं जो है उसे बनाने वाले का है।
- 21:43सारा उसने बनाया और सबका मालिक वही है।
- 21:48मुझे भी उसी ने बनाया। यह संतों का ज्ञान है।
- 21:55कथा में संत ऐसा जानता है। इसलिए मैं।
- 22:06मार्कर्स जैसे लोगों, नित से जैसे लोगों को ईमानदार कह इतने ईमानदार
- 22:16हैं कि देखा नहीं तो कह देते हैं, बर्बाते नहीं किसी को।
- 22:27और बरमाना सबसे बड़ा पाप है। इस धरती पर अगर कोई बड़े से बड़ा
- 22:33पाप है, दूसरों को मार्ग भ्रष्ट कर देना, पथ भ्रष्ट कर देना, इससे
- 22:42बड़ा कोई पाप नहीं होता है। जब तुम जानती नहीं ज्यादा बेहतर
- 22:50होगा कि तुम हो जाओ और अगर तुम हो गए तो ज्यादा शुभ होगा।
- 23:02जो जानते नहीं उसे बोलना नहीं चाहिए।
- 23:09मौन रहना ज्यादा फलप्रद है। बोलने से कुछ न कुछ गलती होगी।
- 23:17सब कुछ गलत ही हो जाएगा। जब तुम जानती नहीं उस प्रमात्मा
- 23:21के बारे में। कैसे तुम उसकी व्याख्या कर सकते
- 23:26हो? मैं कल ही किसी व्यक्ति को कह रहा
- 23:32था अपने चैनल कर दो.कॉम बाबा थोड़ी सी आवाज़ समझाइए सेमरन को
- 23:40आप कैसे इंकार करते हैं? मैंने कहा मैं एक शब्द बोलूँगा उस
- 23:47शब्द को सुनकर तुम मुझे ये बताना कि तुम्हारे दिमाग में क्या छवि
- 23:55बने कहते ठीक? मैंने कहा ध्यान से सुन लो मेरी
- 24:05बात जो मैं शब्द बोलूं उसको सुनकर तुम्हारे दिमाग में छाया क्या बनी
- 24:12छवि क्या बनूँ जैसे मैं कह दूँ सेव तुमने सेव देखा तो सेव की
- 24:17छाया बन जाएगी। ठीक मैंने कहा तड़प व्याम, सेंगे
- 24:28तड़प व्याम सेंगे सोचता रहा तड़प व्याम सेंगे।
- 24:40थोड़ी देर सोचा, मुझे कहने लगा बाबा ये तड़प विहान सिंह इसको तो
- 24:48मैं जानता हूँ। ये तो कभी देखा नहीं।
- 24:52मैंने फिर देखा तो तुमने परमात्मा भी।
- 24:58तड़प ध्यान सेंग को तुमने कभी नहीं देखा क्या उसका सिमरण करोगे
- 25:05हाँ और ईश्वर को भी तो तुमने कभी नहीं देखा।
- 25:11फिर तुम उसका सिमरण कैसे कर पाओगे?
- 25:16खुल के ही सब काट वो धड़क गया सब जो उलझा हुआ था किसका सुमरन कभी
- 25:32देखा इस शोर को? जीसको याद कर रहे।
- 25:37हो याद हमेशा उसी की आती है जो कभी देखा जो कभी देखा ही उसकी याद
- 25:50करो की भी कैसे है। और जीसको देखा प्रेमी प्रेमिका को
- 25:59देखते आँखें चार होती फिर भूले से भूल न पाओगे कैसे पापा नानक कहते
- 26:07हैं। कि कहीं ऐसा ना हो बाबा भगवान
- 26:13ईश्वर परम समर्थ कि तुम मुझे भूल जाए सब ना जियाँ का एक दाता सो
- 26:22मैं विसरण ना जाए वह मुझे भूल ना जाए, मैं तो उसे भूल जाऊंगा।
- 26:29सोऊंगा खाऊंगा तब मैं भूल जाऊंगा उसे दुनिया में बड़े से बड़ा
- 26:38आश्चर्य अगर कोई है तो वह सिमरन तुमने जीसको देखा?
- 26:50जिसने पानी कभी न देखा हो, वह नीर नीर करता हुआ क्या समझेगा?
- 26:58क्या जो तुमने देखा ही नहीं याद किसको करके?
- 27:10क्या तुम्हारा याद करना वक्त की बर्बादी नहीं है?
- 27:16तुम ठीक से याद कर पाती हो। परमात्मा को किसी ने परमात्मा को
- 27:23शेर पर बिठा लिया। किसी ने उल्लू पे बैठा लिया, किसी
- 27:28ने गधे पे बैठा। लिया।
- 27:32ये तुम्हारी मान्यताएँ हैं। दर्शन तो बिल्कुल भी नहीं यह
- 27:42सोचना एकांत के लम्हों में आराम से बैठ के सोचना।
- 27:50जिसे कभी देखा ही नहीं उसको याद कैसे करोगे?
- 27:58जीसको कभी चखा ही नहीं, जीसको पिया ही नहीं, उसका स्वाद
- 28:04व्याख्यायित कैसे करोगे? लेकिन हैं ऐसे लोग जिन्होंने जखा
- 28:11नहीं और व्याख्या कर रहे हैं अष्टाव के गीता की, जिन्होंने
- 28:17पिया नहीं उस अमृत रस को और व्याख्या कर रहे हैं अमृत तत्वों
- 28:22की। जिन्होंने उस दल के ऊपर जाकर छूआ
- 28:31नहीं, आनंद के परमवंश को व्याख्या कर रहे हैं कृष्ण की क्या ये ठीक
- 28:39है? शांत हो गए।
- 28:45एकांत, अपने कमरे में बैठ जाना। या कैसी बियाबान जगह में चले जाना
- 28:53उजाव जहाँ कोई न हो सन्नाटा हो वहाँ सोचना हम किसे याद का है जो
- 29:04देखा। वह याद किया भी जा सकता है और जो
- 29:11भर भर के देख ली यह आँखें जो हृदय में उतर गया, फिर वह तो भलाई से
- 29:20बोलता भी नहीं। ऐसा भी होता है।
- 29:24ये दोनों ही बातें हैं। तुम सोच लेना सुमरण करने से पहले
- 29:29क्या तुम जानते भी हो उसे और बिना जाने पुत्र तुम याद करोगे किसे और
- 29:41तुम्हारा याद करना क्या वो ठीक भी होगा?
- 29:45यह महज कल्पना और महज अंदाजा ही होगा।
- 29:49बिलकुल कल्पना और अंदाजा ही होगा, क्योंकि जब प्रेमी प्रेमिका को
- 29:56अच्छी तरह से निहार लेते हैं तो याद करने नहीं पड़ते।
- 30:04फिर तो याद आती है जबरदस्ती आती है और फिर तो उसकी याद ऐसी आती है
- 30:16के भलाई से बोलती न। फिर तुम भुलाने की चेष्टा करते
- 30:22हो, और वह इतना प्यारा है, इतना रसीला है, इतना नृत्य करता हो
- 30:31इतना आनंद से भरा हुआ है कि तुम लाख कोशिश करो कभी प्रेमी अपनी
- 30:38प्रेमिका को बुला पाया। कभी प्रेमिका अपने प्रेमिका होला
- 30:42भाई क क्योंकि वह परम्परसी है, प्रेम का स्वाद ही ऐसा है और
- 30:52परमात्मा परम प्रेम। हमें तो यही था गुरु हमें तो यही
- 31:12था गुरु। घने यार हैं हमसे दो वो ही जैसे
- 31:33हमने। किस किस से निकाला था इस दिल से
- 31:45दो उछलकर कयामत। खिंचा लग गया उछल कयामत की चाल लग
- 32:07गया। वही शाम उनका।
- 32:17ख्याल लग गया वही ज़िन्दगी का सवाल।
- 32:30गया कोई शान का ख्याला वह परम चैतन्य परमरा स्वरूप परम आनंद
- 32:50उतरेगा। और तुम उसके आनंद को सह न पोग
- 32:59इतना रसीद कब आनंद है क्यों डरते हो?
- 33:10अब सर यहाँ से को ठीक से समझ लो प्रेमी क्यों प्रेमिका की याद को
- 33:16धकेलना चाहता है बाहर? ऐसे ही प्रेमिका भी करते है।
- 33:22क्योंकि। आनंद।
- 33:32अहंकार को खा जाता है और अहंकार को तो मिटने नहीं देना चाहते।
- 33:42अहंकार और आनंद का वय है। प्रेम।
- 33:47हुआ तो प्रेम में तो बड़ा आनंद है, प्रेम बड़ा रसीला है, रस
- 33:54उतरेगा, रस उतरेगा तो तुम्हारा अहंकार नित्य नाभुजा और अहंकार
- 34:03नहीं चाहता कि मैं कभी मरूँ, लेकिन प्रेम।
- 34:08प्रेम की शीतलता, प्रेम का आनंद, प्रेम का नृत्य, प्रेम की खुशी,
- 34:16तुम्हारे अहंकार को वक्ष्य करने का और अहंकार कभी वक्षण होना नहीं
- 34:22चाहता। यह द्वंद्व की स्थिति आ जाती है
- 34:26प्रेमिका और प्रेमी के भीतर क्या तुम्हें पता यह किसी ने बताया
- 34:35नहीं होगा कुछ मुझे अक्सर लोग पूछ लेते हैं जीस आनंद की तलाश में हम
- 34:42फिर रहे हैं। प्रेम के वक्त वही आनंद तो आता है
- 34:49लेकिन फिर हम उसको धक्के के मारते हैं।
- 34:53क्यों भूल जाना चाहते हैं? बस उसका मात्र यही कारण है।
- 34:57प्रेम तुम्हारे अहंकार को खा जाता है आनंद और अहंकार का।
- 35:04वैर है, आनंद का भक्षण है, भक्ष है अहंकार, आनंद का खाना ही
- 35:16अहंकार, आनंद का भोजन ही अहंकार। पर तुम्हारा अहंकार कभी मिटना
- 35:22चाहता हूँ, लेकिन बाबा ने कहा कर्मी आवय कपड़ा नजरी मुँह से
- 35:35वार। परमात्मा की कृपा से तुम्हें ये
- 35:43मानस तन मिलता है और उसकी कृपा से ही उसकी नजर से ही तुम्हें मुक्ति
- 35:52मिलती है। वह उतर जाता है किन्हीं लहों में
- 35:57तुम्हारे मित्र तुम्हें बिना बताए।
- 36:00तुम्हें पता भी नहीं होता कि वह उतर।
- 36:02जाएगा तुम जा रहे थे तुम्हें कोई खोज खबर भी ना थी कि अगले पल क्या
- 36:15होने वाला है, लेकिन आगे से कोई प्रेमिका मिल गई।
- 36:21आगे से कोई प्रेम ही मिल गया। आँखें चार हैं और वह प्रेम एक
- 36:29दूसरे के भीतर उतर गया। अब मुसीबत खड़ी हो गई तुमने
- 36:37अहंकार को ऐसा पाला था। माखन में श्रीखला के वह तो टूट
- 36:45गया है। आखिर चार क्या अहंकार के लिए मौत
- 36:53सिद्ध? होगी।
- 36:55अहंकार मरेगा और प्रेमी भी चाहेगा।
- 37:00और प्रेमिका भी चाहेगी कि किस तरह हम भूल जाएं, दोनों ही चाहेंगे
- 37:11क्योंकि न प्रेमी चाहता है मेरा अहंकार खत्म हो।
- 37:16न प्रेम का चाहती है मेरा अहंकार खत्म हो यही तो झगड़ा है तुम और
- 37:21क्या तुम कहते हो प्रेम रबा हो क्या?
- 37:26लेकिन अहंकार तो बचा रहा और अगर अहंकार बचा रहा तो प्रेम कैसे
- 37:34रहेगा? प्रेम रहेगा तो अहंकार खोएगा,
- 37:39प्रेम का भक्षण है, अहंकार प्रेम का भोजन है, अहंकार प्रेम खा
- 37:45जाएगा अहंकार को और तुम्हारा अहंकार किसी का भोजन बनना नहीं
- 37:49चाहता। ये दुविधा है जो तुम्हें चक्कर
- 37:52लगाने पे विवश कर देती है अदालतों को।
- 37:57तो तुम जल्दी से पीछा छुड़ाना। चाहते हो?
- 38:02तुम्हें वही स्त्री जो जान से प्यारी थी, आज चुड़ाई लगने लगी
- 38:11तुम्हें वही पुरुष। जो प्राणों से प्रिय था।
- 38:16आज लाद लगने लगा क्या तुम्हारे अहंकार को खा गया?
- 38:25प्रेम तुम्हारे अहंकार को खा जाता है, आनंद तुम्हारे अहंकार को भक्ष
- 38:31लेता है। किसी ने परमात्मा से पूछा था,
- 38:40प्रभु आपका भोजन क्या है? हम तो अन्न खा लेते हैं, पशु चारा
- 38:49खा लेता है, भगवान आप क्या खाते हैं?
- 38:58तो भगवान मुस्कुराए, भगवान कह के मैं अहंकार खाता हूँ।
- 39:06राजा अज और उसके कुछ मुख्यमंत्री उनके भूख मिट गए।
- 39:16सारा भोजन खा लिया उन्होंने पात्र खाली ठंडा जल था, घड़े में जल पी
- 39:26लिया। बड़े ही संतुष्ट हैं।
- 39:31राजा ने कहा। प्रकृति तो बड़ी सुहानी है,
- 39:38निरादी है यहाँ का अंदाज वातावरण बड़ा खूबसूरत है थोड़ा घूम ले।
- 39:50योगी ने कहा बिलकुल महाराज। आपका ही है राजा बाहर घूमने निकला
- 40:01ध्यान से समझना अब आपके प्रश्न का जवाब शुरू हो गया है।
- 40:12जब उस कुटिया के पीछे की ओर गए देख बहुत बड़ा ऊंचा पहाड़ और
- 40:22पहाड़ इतना ऊँचा पहाड़ और ऐसा लगा।
- 40:31कि जैसे वो पहाड़ लीद का उसने कहा पहाड़ तो मैंने देखे लेकिन पत्थर
- 40:40के होते हैं पहाड़ मैंने बहुत देखे लेकिन जीवन में प्रथम बार
- 40:48ऐसा पहाड़ देखा जो या तो गोबर का है।
- 40:51यह लीद का है। मैं झट से वापस आया, योगी का
- 41:00प्रणाम किया प्रभु ये पीछे, पहाड़ इतना ऊंचा ये कैसे बना?
- 41:11जो भी मुस्कुराए, योगी ने का राजन यह।
- 41:22पहाड़ लीद का। है।
- 41:25लीद का इतना पहाड़ किसने बनाया? कहानी राजन एक दफ़े में अयोध्या
- 41:39नगरी में गया था किसी द्वार पे जाके मैंने अलख जगा दी वे शान
- 41:48में। भीतर से कोई राजी निकला, राजन ने
- 41:57लीद मेरे भिक्षा पत्र में डाल दी। बहुत पुरानी बात वर्षों पुरानी
- 42:05बात है। फिर राजा बुरा योगी कहता में घर
- 42:15ले आए कोठिया के पीछे यहीं पर ढेर कर दिया है और राजन तुम जानते हो?
- 42:26दिया हुआ दान दिन दोगुना रात ही चौगुना बढ़ता है और दिया हुआ दान
- 42:40जीस भी राजा ने दिया था तब तक राजा बुरा भी हो गया था।
- 42:50थोड़ी पहचान शक्ल भी बदल गई थी। आज कुछ वस्त्र भी निराले ही पहने
- 42:58हुए थे, लेकिन योगी तीसरे नेत्र से जान गया था।
- 43:05राजा वहीं। दिन भर रात दोगना चोगना दोगना
- 43:13चोगना होते होते आज पहाड़ बन गया है, फिर इसका क्या होगा?
- 43:21फिर राजन ये बढ़ता ही है। बढ़ता ही जाता।
- 43:31फिर फिर राजन जिसने ये दान किया था उसको खाना पड़ेगा राजा के तो
- 43:41जैसे प्राण किसी ने। चूस लिया जैसे प्राण निचोड़ गए हो
- 43:50जैसे जान निकाल ली हो राजा तो घबराया कब वह दंडवत हो प्रणाम
- 44:00किया योगी के चरणों में। प्रभु वो राजा तो मैं ही था याद
- 44:05आया बहुत वर्ष पहले की बात है। क्रोध के वशी बहुत होकर मेरे
- 44:13कामगारों ने ठीक से काम नहीं किया था।
- 44:16मैं क्रोधित अवस्था में था और। किसी साधु विष्णु व्यक्ति में
- 44:25मुझे पुकार लगाई, अलख जगाई फिर शामदेही मुझे आज भी याद है और
- 44:34मैंने लीज की और भूख भरी। और भिक्षा पत्र में डाल दी।
- 44:43खूब हू आज वो वक्त याद आया, राजी मैं ही था योगेश्वर अब इसका क्या
- 44:59होगा? जो भी बोल रहा है राजा दान देने
- 45:10वाले को ही दान खाना होता है। मैं कैसा भी फली भूतों का खाना
- 45:16पड़ता है, ये तुम थे, मैं था। योगेश्वर मैं था वो तो हे राजन ये
- 45:33ततो में ही खाना पड़ेगा राजा थर थर कांप रहा है।
- 45:43राजसी पकवान 3600 प्रकार के राज्यसी पकवान खाने वाला गोबर
- 45:50कैसे खायेगा? वो भी इतना पहाड़ अब कहानी को
- 45:57ध्यान से सुन विधर के राजा। राजा भोज विदर्भ के राजा ने अपनी
- 46:09पुत्री इंदुमती का स्वयंवर रचा। सम्भर्ग में सभी राजा बनाये राजा
- 46:20आज भी आ गए दशरथ के पिता। और देवर्षि नार्दे भी पहुंचते सभी
- 46:33दूर दराज के राजा बुला लिए गए थे। विदर्भ के राजा भोज की पुत्र।
- 46:43महारुबवती थी। उसका नाम था इंदुमती।
- 46:49सभी राजा ललाई थे कि स्वयंवर में माला उनके गले में डालते हैं और
- 46:57नारद भी जाते थे के माला उनके गले में डालते हैं।
- 47:01यद्यपि नारद इतनी सुन्दर नहीं है। अभी नार्द कौन होता है, प्रश्न
- 47:08पूछता, थोड़े सूक्ष्मता से बता दूँ, संक्षिप्त रूप देख के बता
- 47:16दूँ। विस्तार भर कभी देखा जाएगा।
- 47:23वैसे तो अब प्रश्न उत्तर की श्रृंखला खत्म होने को है, लेकिन
- 47:32अगर कभी मौका मिला तो? नारद के बारे में।
- 47:39विस्तार से समझाने का प्रयत्न करूँगा नार्द कहते हैं मन को मन
- 47:46चाहता है मेरी मन चाही वस्तु मुझे मिल जाए पर तेक का मन यही लालसा
- 47:52रखता है। फलां ने गाड़ी खरीद ली।
- 48:00तो मैं भी खरीदूंगा। इसी कॉम्पिटिशन में दुनिया उलझ
- 48:04जाती है और अपना सुख गंवा बैठती है ये नारथ याने मन तुम्हारे
- 48:14संतोष को खा जाता है। और जिसके भीतर संतोष नहीं है,
- 48:21उसके भीतर शीघ्रता है और जिसके भीतर शीघ्रता है, वह दुखी है,
- 48:29इसलिए अगर सुखी रहना चाहते हो तो शीघ्रता को त्याग दो, स्थिरता को
- 48:35अपनाओ। यही है भगवान।
- 48:37कृष्ण ने कहा, अमनितों दम्बितों हिंसा शांतिराजवं अचारों वासम
- 48:47स्थैलम श्रद्धा अगर धीरज नहीं है तुम्हारे भीतर।
- 48:56धैर्य नहीं है, स्थिरता नहीं है। तुम अस्थिर हो तो यह अस्थिरता
- 49:03तुम्हें आनंद तक नहीं पहुंचने देगी और तुम्हारी खुशी को निगल
- 49:07जाएगी। तो नारद चाहते थे कि मेरे गले
- 49:13में। माला जल जाए, लेकिन मन इतना सुंदर
- 49:18नहीं होता, मन कुरु होता। है आत्म सुंदर होती है आत्म से
- 49:27सुंदर इस जगत में कुछ भी नहीं। इसलिए बुद्ध, महावीर इतने सुंदर
- 49:33तम लगते हैं। क्योंकि वो आत्म ज्ञानी है।
- 49:39आज तुम ज्ञानी के भीतर एक अलोक्य का प्रभाव का जन्म होता है।
- 49:49विधरभ के राजा भोज ने अपनी पुत्री हिंदुमती का स्वरंभ रचाया।
- 49:56राजा आज भी गए। नार्द भी गया।
- 50:01नार्द की इच्छा थी कि मेरे गले में वरमाला डाल दी जाए।
- 50:06कहानी है आपसे बताया कुछ सत्य भी है इसमें कहानी में जो सत्य है।
- 50:17वह बता दिया गया है सच में राजा आज की धर्मपत्नी इंदुमती।
- 50:22थी और इंदुमती ने राजा आज के सुडौल व्यक्तित्व को देखकर वरमाला
- 50:32उसके गले में डट दी। दोनों की शादी हो गई।
- 50:38मन छटपटाया नारद नार्द सदा छटपटाता है मन।
- 50:45कभी तर्प नहीं। होता है।
- 50:48और इसी अतृक्ति के कारण तुम संसार में भटकते रहते हो।
- 50:55नए नए जन्मों में नए नए शरीरों में तुम्हें जन्म देना पड़ता है,
- 50:59उसका मूल कारण अत्रपते तुम तृप्त नहीं होते।
- 51:04मन कभी तृप्त होता है नहीं, मन का स्वभाव है।
- 51:10मन अगर तृप्त हो जाए तो मन गया। जो व्यक्ति तृप्त हुआ उसने आनंद
- 51:16पा लिया। फिर वह चुप हो गया।
- 51:23आनंद पाकर कोई कैसे बोल सकता? है।
- 51:28आनंद चुप करा ही देता है, आनंद की शांति इतनी प्रगाढ़ होती है।
- 51:34की व्यक्ति बोलना चाहता हो अभी कहाँ बोल पता है मस्त हुआ फिर
- 51:43क्यों बोल? हंसा बायो, मानसरोवर ताल तलैया।
- 52:12मन मस्त हुआ फिर क्यों वो बोले मस्ती में आनंद है, आनंद मस्ती
- 52:26जैसी ही मिल जाती है, व्यक्ति का बोलने का मन नहीं होता।
- 52:32इसी अवस्था को पानी के लिए सभी आचार्य, सभी मुनि, सभी संत, सभी
- 52:41ऋषि तरस्य काश यह आनंद हमें मिल जाए।
- 52:48और ठहराव के बिना आनंद मिलता नहीं।
- 52:53इंदुमती ने राजा आज के गले में माला डाल दी।
- 52:58नारद छट पुटहरा मन सदा ही छट पुटता।
- 53:04है। दूसरे को क्यों मिल गई?
- 53:08मेरे में क्या कमी थी तुम्हारा मन सदा यही सोचता है, मेरे में क्या
- 53:14कमी थी मुझे क्या कहते हैं लोग? बाबा आपने मुझे शिक्षा क्यों नहीं
- 53:20दी? क्या कमी थी?
- 53:22बताओ मन का स्वभाव है? देखने वाला कयामत की नजर रखता है।
- 53:34वह जानता है दीक्षा किसको चाहिए? उसकी कयामत के गद्ध जैसी निगाही
- 53:41है तुम्हारे मन के। निगाह की तरह वो अंधा नहीं है।
- 53:49गुरु परम सुजाखा है। गुरु के दो आँखें और एक तीसरी
- 53:56दिव्य जक्षु तुम्हारी तरह अंधा नहीं।
- 54:01है, मन की तरह अंधा नहीं है, मन अंधा होता है।
- 54:08और अंधा व्यक्ति छटपटाता है। मन छटपटाया नार्द छटपटाए और नार्द
- 54:15छटपटाए तो शराप दे दिया है। किन्हीं दुःख के क्षणों में निकला
- 54:21हुआ शब्द शराप कहलाता है। जैसे गंधारी दुख के क्षण में थे।
- 54:30तुने श्राप दे दिया। हे वासुदेव जैसे मेरी आँखों के
- 54:37सामने मेरे शोपत्रों का बंद हुआ है वैसे तू भी।
- 54:41अपनी नस्ल को बर्बाद होते हुए अपनी आँखों से देखें और कृष्ण हँस
- 54:48पड़े। कृष्ण ने हाथ जोड़े ए मस्तुमहाते
- 54:56बस गांधारी में और कृष्ण में यही फर्क है।
- 55:00गाधारी का कुल नष्ट हो गया और कृष्ण का कुछ भी नष्ट नहीं होगा,
- 55:05क्योंकि कृष्ण का कुछ ऐसा ही नहीं है जो नष्ट हो सके।
- 55:11कृष्ण के पास जो है, वह कभी नष्ट होता नहीं।
- 55:14है। कृष्ण के पास जो है, वह जलता
- 55:18नहीं। उसके घाव नहीं होते, उसको वेग
- 55:22नहीं होता वायु का उसको तूफान उड़ाता नहीं, बाढ़ बहती है, कृष्ण
- 55:32जाते हैं। जानते हैं के गानधारी का श्राप।
- 55:38वो। मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा इसलिए
- 55:45वो कह देते हैं, लब्बों पे हँसी एवं मस्तुमाते ऐसा ही होता है और
- 55:54देखिए जीस 100 पुत्रों की मृत्यु के बट।
- 55:58गांधारी इतनी शोकाकुल थी, पूरा यदुवंशी नष्ट होते देख कृष्ण ज़रा
- 56:06भी व्यथित नहीं होते, बस यही अंतर है मान का और आत्म तत्व का।
- 56:17आत्मतत्व दुखी नहीं होता है। मन बात बात पर दुखी।
- 56:22होता है। अगर तुम दुखी हो तो मन से
- 56:27आत्मतत्व की यात्रा करो। यही एक इलाज है, यही एक उपाय है।
- 56:33यही एक औषध है और यही एक रास्ता। है।
- 56:39मन से आत्म तत्व की साधना कराओ, मन से चलो स्थिरता तक पहुंचा वटकन
- 56:53से चलो सैरियम तक पहुंचो। 1 दिन अपने राजमहल के बाहर राजा
- 57:07आज और इंदुमती दोनों घूम रहे थे। आसमान में से वीणा बजाते हुए नारद
- 57:15निकले। देखा, इंदुमती परम रूपवती थे और
- 57:27राजा आज भी कुल कम न थे। रघु वंशमय।
- 57:37सभी महान से महान हुए, सुंदर से सुंदर हुए, ये है डीएनए ही कुछ
- 57:47ऐसा था नार्वे को द्वार पर नार्वे ने जट से पारिजात में जाके एक
- 57:59पुष्प मंगवाया। पारिजात शर्क को कहते हैं शर्क का
- 58:05फूल जो विनाश कर दे हिंदुमती के ऊपर फेंक दिया।
- 58:12मन जस से घृणा करता है, उसका विनाश जाता है इन सबकों को याद
- 58:18कर। लेना।
- 58:20मैंने बोला हुआ है इनको बार बार सुनते रहना मन सहन नहीं कर सकता,
- 58:26जिसे मैं चाहता था वो किसी और की अमानत हो जाए।
- 58:40तुम अगर हमको नाचो तो कोई बात नहीं, तुम अगर हमको नाचो तो?
- 58:55कोई बात नहीं तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी।
- 59:09तुम किसी और को चाहोगी? तो मुश्किल होगी या प्रेम नहीं
- 59:18प्रेम स्वतंत्रता देता है। यह प्रेम नहीं है, तुम अगर हम को
- 59:26न चाहो तो कोई बात। नहीं है तुम।
- 59:29किसी गैर को चाहोगे तो संगत डाल दिए।
- 59:34फॉर राधी सिंगर डाल दिए तो मुश्किल होगी, फिर बर्दाश्त नहीं
- 59:38होगा। तुम किसी और की बाहों में बाहें
- 59:41डाल लो तो फिर मुश्किल होगा। तुम हमें न चाहो तो कोई बात नहीं,
- 59:50मन का ऐसा ही स्वभाव है। तो नार्थ ने पारिजात पुष्प रे के
- 59:57हिन्दुमती के ऊपर फेंक दिया हिंदुमती प्रतिक्षण मर गए नार्थ
- 1:00:05ने श्राप दिया था स्वयं। भर के वक्त।
- 1:00:12कि तुम्हारा पति अल्प आयु होगा, लेकिन ये तो हिंदुमति मर गई,
- 1:00:18परंतु नार्द का श्राप वह से नहीं गया।
- 1:00:21हिंदुमति से इतना प्रेम करते थे राजा आच के उसका प्रेम का विक्षो
- 1:00:31सहन नहीं कर सके। जो कहानी वाल्मीकि के रामायण से
- 1:00:36शुरू होती है, हंस और आंसनिक वो ही कहानी यहाँ हुई।
- 1:00:48हिंदुमती का मृत शरीर को देख कर राजा आज बेहोश हो के घर पड़े
- 1:00:58उन्नाद का श्राप हिंदुमती तुमने मेरे गले में बरमाला नहीं डाली,
- 1:01:07तुम किसी और को चाहोगी तुम मुश्किल?
- 1:01:15इंदुमती को खत्म कर दिया इंदुमती से इतना लगाव इतना प्रेम राजा आज
- 1:01:21बेहोश हो के घर पड़े और मर गए। मैं चाहता हूँ कि उस मौन में उतर
- 1:01:30कर आनंद भ्रम। लेकिन तुम्हारे प्यार के कुछ कम
- 1:01:37जो मुझे बाहर खींच ही लाता। है।
- 1:01:41और बोले पर विमर्श कर देता है। राजाजी ने कहा, योगेश्वर ये तो
- 1:01:48मैं ही। था।
- 1:01:51अब क्या? योगेश्वर ने कहा, राजन मैं
- 1:02:00तुम्हें एक सूत्र बताता हूँ और बुरा बताओ तो योगेश्वर ने राजा आज
- 1:02:14के कान में। एक योजना बता दी।
- 1:02:19राजा चले गए, अयोध्या में चले गए अब आगे की कहानी सुनना।
- 1:02:27आज एक कमेंट आया, पापा आपके प्रवचनों को जो एक बार सुनने लग
- 1:02:34गया। आपके चैनल को छोड़ नहीं सकता।
- 1:02:40मैंने सोचा था आज ये ये कैसे हो सकता है?
- 1:02:45लेकिन समझा के देखिए अब इस कहानी को आप छोड़ कैसे पाओगे?
- 1:02:51इतना शानदार मॉडल ले लिया कहानी ने।
- 1:02:54ये सूक्ष्म भी करीब करीब आने लगते हैं।
- 1:02:59कहीं चुक ना जाए, कहानी का पीक नहीं।
- 1:03:04चुकता। राजा आज अयोध्या में चले गए।
- 1:03:19दूसरे दिन अयोध्यावासियों ने न्याय दृश्य देखा।
- 1:03:24अपने शाहना रस के ऊपर सवार राजा आज और उनके बगल में।
- 1:03:36नगर की मशहूर वेश्या बैठी इस बात को ध्यान से समझ लेना राजा आज के
- 1:03:50बगल में नगर की मशहूर वेश्या बैठी।
- 1:03:56और राजा जी शराब पी रहे हैं, खूंठ भर रहे हैं, रथवान रथ को खैच रहा
- 1:04:06है, घोड़े लगे हैं, सात सात घोड़ों का रथ रथवान चला रहा है।
- 1:04:14रिथवान को कहा गया है तू पीछे मत झांकना, ठीक राजा शराब पी रहा।
- 1:04:26है और वैश्य को। छेड़छाड़ करता है।
- 1:04:37नगर के बीच में घुमालें इस रथ को रथवान ने नगर के बीच में घुमाना
- 1:04:47शुरू कर। दिया है।
- 1:04:48प्रथम बार यह दृश्य देखा अयोध्या वासियों ने।
- 1:04:54जब प्रथम बार ऐसा दृश्य देखो आदमी औरतें घरों से बाहर निकल आए राजा
- 1:05:01पागल। हो गया है।
- 1:05:04क्या अपनी धर्मपत्नी के मरने पे इतना शोक संतप्त हो गया?
- 1:05:11है। हिंदुमती मर चुकी थी, राजा गज का
- 1:05:15के घर क्या था? राजा भी मरा नहीं था।
- 1:05:18ये बीज की कहानी है। शास्त्रों में इस कहानी का उल्लेख
- 1:05:28बात सुर आप पा सकते हो झूम रहा है।
- 1:05:37शराब पिया शंट बोल रहा है और नगर निवासी बहुत उल्टा पुल्टा बोल रहा
- 1:05:45है अरे रानी क्या मरी राजा का दिमाग खराब हो गया, आज पता चला।
- 1:05:56कितना नैतिक पतन हो गया? इस व्यक्ति का कैसा चरित्र है इस
- 1:06:06व्यक्ति का? राजा आज तो बिल्कुल गर्क।
- 1:06:09हो गया। इसने रघुवंश का नाम खत्म कर दिया।
- 1:06:25ज़रा भी तो शर्म रिहाज नहीं है, ज़रा भी तो मर्यादा नहीं है इस
- 1:06:32व्यक्ति में। जीस रघुवंश की गाथा कहते कहते लोग
- 1:06:41गाथा थक जाती थी जबान उस रघुवंश का हाल देखो क्या है 1 दिन खूब
- 1:06:51गालियां निकालीं, दूसरे दिन फिर वो ही हाल।
- 1:06:57तो जनता ने कहा अब जनता कोई लोकतंत्र तो है नहीं, जो बदल
- 1:07:02देंगे। राजा है, राजा थोड़े बदला जाता
- 1:07:05है, अगर चूच पार्टी करेंगे, गर्दन उड़ा देगा, चुप हो के दरवाजे बंद
- 1:07:13कर लेते। दूसरा दिन तीसरा दिन देखा।
- 1:07:18लोगों ने माथे पर हाथ मारा, अब क्या किया जाए जब राजा ही ऐसा
- 1:07:25दुष्ट हो जाए, मर्यादाहीन हो जाए तो प्रजा कैसी होगी सरेआम रोज़
- 1:07:33नई? वैश्य को बुला लेता।
- 1:07:39ऐसी कार्यस्थानिया करता गालियां पे गालियां, गालियां पे गालियां।
- 1:07:45लोगों ने सोना बंद कर दिया, दिन भर रात राजा को कोसते रहे,
- 1:07:50गालियां निकालते रहे बुरी बुरी। मर्यादाहीन हो गया है राजा तीसरे
- 1:08:03दिन राजा अज योगी के पास गए। वहीं जाके देखा।
- 1:08:19गोबर का पहाड़ गायब था। लेकिन थोड़ा सा लीड अभी बचा।
- 1:08:25था। जल्दी से राजा ने देखा और योगी के
- 1:08:32पास गया चरण पकड़ लिया। प्रभु ये गायब हो गया बस 1 दिन और
- 1:08:37ऐसा कर लूँगा तो गायब हो जाएगा योगेश ने कहा रुको राजा रुको, वो
- 1:08:51तो दान का फल था। यह मूल दान है।
- 1:08:55ये तो तुमने दान दिया था, मुझे यह नहीं खत्म होगा, यह तो तुम्हें
- 1:09:02खाना ही पड़ेगा। राजा ने कहा, ये मैं कैसे खाऊंगा?
- 1:09:093600 प्रकार के स्वादिष्ट भोजन करने वाला राजा?
- 1:09:14लीड कैसे खायेगा कोई उपाय? बताओ प्रभु आपके उपाय बड़े काम कर
- 1:09:20गए। मैंने शराब नहीं, पानी में रंग
- 1:09:24घोर लिया था और वैश्य को समझा दिया था।
- 1:09:29मैं उल्टा बुटा करूँगा। और तुमने मुस्कुराना है हाओ बाप
- 1:09:36दिखाने हैं बस ऐसे जैसे कि वाकई मैं वैसा गामी हूँ सब समझा लिया
- 1:09:45गया था ऑल वास प्री प्लेन्ड। न शराबी न वैशा जा रही वैशाथी
- 1:09:59यद्यपि नगर वधुएं थीं ख्याति प्राप्त।
- 1:10:02थी। सभी जानते थे ये वैशाएँ लेकिन
- 1:10:10राजा ने लिप्त थे। बस एक ड्रामा।
- 1:10:16था। और ड्रामा काम करके योगेश्वर की
- 1:10:24बताई हुई सूत्र काम करके। वो पहाड़ जो था लोगों में बंट गया
- 1:10:30अयोध्या वासियों ने और गोबर खा लिया लेकिन देखा तो थोड़ा सा भी
- 1:10:40पड़ा। था।
- 1:10:43पर राजा आज बोले जोगीश्वर। तुमने मेरी लाज रखी, तुमने मेरी
- 1:10:51जिंदगी बचा ली, अब बाकी क्या करू? योगेश्वर कहने लगा राजन ये तो
- 1:11:05तुम्हें खाना ही पड़ेगा, ये मूल है।
- 1:11:08मूड तो खाना ही पड़ता है राजा कहता है तो दिल नहीं करता है,
- 1:11:13कैसा खाऊंगा इसको उह, उल्टी आई के तो देखो उल्टी आए कुछ आए ये तो
- 1:11:23खाना ही पड़ेगा। नहीं राजा नहीं खा सकेगा जोगेश्वर
- 1:11:33कोई मार्ग बताओ तो योगी बोले देखिए एक मार्ग है राजा अगर
- 1:11:41कामयाब हो जाता है तो। फिर कान में फूंक मार दी।
- 1:11:48राजा फिर चला थोड़ी दूर जाते। करीब 10 किलोमीटर दूर जाते एक
- 1:11:59छोटी कोटी जा वहाँ एक संत बैठे थे।
- 1:12:05इतने प्रख्यात न थे कोई आता जाता भी न था अपनी मस्ती में बैठे रहते
- 1:12:17भजन गाते रहते प्रभु के। गीत गाते रहते।
- 1:12:24आनंद में मग्नमस्त झूमते रहते गाते रहते नाचते रहते राजा गाय
- 1:12:35देखे इस संत तो नाच रहा है। थोड़ा थम जाने का संत थोड़े गद्दी
- 1:12:48पर बैठे राजा ने जाकर पांव। पकड़े गए।
- 1:12:52साधारण वेश में था, बता दिया गया था सारा साधारण वेश में गया।
- 1:13:03वह संत था। संत के पांव पकड़।
- 1:13:08लिया। संत ने आशीर्वाद दिया।
- 1:13:15कल्याण वस्तु होगा। कैसे आए?
- 1:13:25साधारण व्यक्ति की तरह गया था प्रभु बड़ा दुख है, मैं अयोध्या
- 1:13:31के भीतर नागरिक हूँ। और अयोध्या का राजा बड़ा
- 1:13:36दृश्यकर्मी और कपटी हो गया। आज कल रघुवंश की लाज को बट्टा लगा
- 1:13:41दिया है। काला तिलक दब्बा है।
- 1:13:44ऐसा व्यक्ति मर क्यों नहीं जाता बात?
- 1:13:50क्या है किस लिए? आए हो?
- 1:13:56बात क्या है? प्रभु हृदय बड़ा दुखता है।
- 1:14:01वह सरे आम शराब पीता है। वह सरे आम वेश्यों के साथ रथ में
- 1:14:07घूमता है और उसे ज़रा भी ले जा नहीं आती।
- 1:14:11कोई उपाय कीजिए, प्रभु। संत थोड़ी देर के लिए शांत।
- 1:14:22हो गए। राजा भी संत की तरफ देखता रहा।
- 1:14:28क्या बोलते है? संत अपने भीतर गए थोड़ी देर के
- 1:14:35लिए आनंद गाना हुआ। लावन चेहरे से ढपने नहीं देखा।
- 1:14:43जब आँखें खोल के तो बोले राजन बह लीद तो तुम्हें ही खानी पड़े।
- 1:15:01राजन वो लीद तो तुम्हें ही खानी पड़ेगी, मैं नहीं खा सकता वो लीद,
- 1:15:12वह मूल है? तुमने जो दान किया था दान तो
- 1:15:19चुगता हो। गया।
- 1:15:21लेकिन मुर्द तो तुम्हें खाना ही पड़ेगा।
- 1:15:24उसने पांव पकड़ लिया। है।
- 1:15:26आप अंतयामी हैं, आप त्रिकाल दृश्य हैं, मुझे कोई न कोई रास्ता बताइए
- 1:15:31प्रभु मैं लीद तो नहीं खा सकूंगा? 3600 प्रकार के स्वादिष्ट भोजन
- 1:15:38खाने वाला रघुकुल वंशी वह लीद कैसे?
- 1:15:43खा सकता है प्रभु। कोई तो उपाय होगा?
- 1:15:47उसने कहा उपाय है ऐसा करो। वो लीद वहाँ से उठा लो, उसको धोने
- 1:15:59में डाल दो, हम पाथी नहीं बनाते, गोबर के पाथी बना दो, धोने में
- 1:16:08डाल के आग लगा दो बे भस्म हो जाएगी।
- 1:16:16उस वस्म को थोड़ा थोड़ा सभी चख लो, खुद थोड़ी सी खा लिया करो और
- 1:16:27थोड़ी सी अयोध्या वासियों को खिला दिया करो।
- 1:16:32लीद नहीं खानी पड़ेगी लीद की बसुंखा ऐसे तुम्हारा पीछा, छूट
- 1:16:37जाएगा बड़ा सरल रास्ता? था।
- 1:16:42ऐसा कर लिया गया। थोड़ी सी राजा ने भी आज हम जो
- 1:16:48खाते हैं धोने में। वह गोबर होता है जो प्रसाद के रूप
- 1:16:54में हम चखते हैं, जीवा को लगाते हैं, तिलक करते हैं और भगवान शंकर
- 1:17:01सारे शरीर पर लेपन करते हैं। सुबह शाम का वह धोने के लिए भी
- 1:17:07होती है। थोड़ी लकड़ी होती है।
- 1:17:12थोड़ा गोबर होता है। ऐसे पीछा छूटा राजा आज का क्या
- 1:17:25समझाया योगेश्वर ने क्या समझाया? योगेश्वर ने समझाया, पहली।
- 1:17:35बात। वह पहाड़ कैसे गायब हुआ?
- 1:17:44क्योंकि अयोध्या नगरी के निवासियों ने झूठी निंदा की।
- 1:17:49निंदा सच नहीं थी, उन्होंने जांचे परखा नहीं, सिर्फ बाहर से देखा और
- 1:17:56गालियां निकालनी शुरू कर दी। अगर तुम अंधे होकर किसी की निंदा
- 1:18:00करोगे तो उसके दोस्त तुम खा जाओगे।
- 1:18:04खाने पड़े यह पहला सबक। तुम्हारे प्रश्न का जवाब मैं अंधा
- 1:18:13हो के निंदा नहीं करता, मैं जानता हूँ पहले पूछ लेता हूँ बाबा बाबा
- 1:18:19ये बंदा कैसा बाबा कहते पाखंड फिर मैं बोलता हूँ, उससे पहले मैं
- 1:18:25नहीं बोलता। मैंने कबीर के बारे में नहीं बोल
- 1:18:31दिया, नानक के बारे में नहीं बोल दिया, मीरा के बारे में नहीं बोल
- 1:18:38दिया। बहुत से संतो की कतार रे दास है।
- 1:18:49मैंने उनके बारे में कभी ऐसे शब्द नहीं बोले।
- 1:18:54पहले बाबा से कन्फर्मेशन करता हूँ।
- 1:18:57वह जो पहाड़ गायब हुआ, अयोध्यावासियों की गलत निंदा के
- 1:19:03कारण वह जानते नहीं थे। बिना जाने सिर्फ बाहर से अक्टिंग
- 1:19:09देखकर राजा तो अक्टिंग कर रहा था और बड़ा शानदार सूत्र था ये तुम
- 1:19:15भी समझ लो निंदा करनी तो अच्छी तरह से देख कर करना।
- 1:19:20ऐसे ऐसे वैसे देख दुख के। निंदा मत कर लेना, निंदा करना,
- 1:19:27अच्छी तरह जान पहचान की निंदा करना।
- 1:19:30जब तुम पूरा अस्वस्थ हो जाओ तो निंदा करना और तुम्हें सही समझाया
- 1:19:35सन्तों ने कि किसी की भी निंदा मत करो, क्यों?
- 1:19:39क्योंकि तुम्हारी आँखें नहीं परखनी करी।
- 1:19:44यह संत है या नहीं है, लेकिन मैं निंदा करता हूँ, सरेआम निंदा करता
- 1:19:53हूँ, अंधा नहीं हूँ, मैं बाबा से पूछ के निंदा करता हूँ।
- 1:20:02ओके करा के फिर निंदा करता हूँ। अगर मैं कहता हूँ ये दुष्ट हैं तो
- 1:20:08दुष्ट हैं। अगर मैं कहता हूँ ये झूठे हैं तो
- 1:20:12मैं नहीं कहता जी झूठे हैं। बाबा कहते हैं ये झूठे हैं, इनको
- 1:20:18खंडित करो। लोगों को इनसे।
- 1:20:24पीछा छोड़ा हो? तो मैं बोलता हूँ सच के नेता और
- 1:20:30झूठ के निंदा आप समझ गए कैसे गायब हुआ वो पहाड़ झूठ के निंदा से
- 1:20:36उदयवासी जानते नहीं थे। यह शराब नहीं है।
- 1:20:40पानी में रंग बोला गया है और वह बेहोशी का नाटक नाटक था, असलियत
- 1:20:47नहीं थी और वह वैश्य सिर्फ समझाई हुई थी, दृष्टिकारक नहीं थी।
- 1:20:59वह बुलाई गई थी। इसी अक्टिंग में शरीक होने के लिए
- 1:21:05धोखा खाया, निंदा करने वाले धोखा खाया तो थोड़ी थोड़ी लीध सबके
- 1:21:11हिस्से में आ गए और वो पहाड़ छंट गया।
- 1:21:16पूरी अयोध्या नगरी थोड़ी थोड़ी लीध खा गई।
- 1:21:20और जो मूल उसे खाना पड़ना था उसका निदान ऐसे किया कि भस्म बना दो।
- 1:21:26उसके भगवान शंकर भी तो लेपन करते हैं।
- 1:21:33वो गऊ का गोबर होता है, यह यह घोड़े का गोबर है।
- 1:21:40दूसरा अगर कोई संत निंदा करते हैं तो आपके पास खत्म हो जाएगा।
- 1:21:52अगर वास्तव में यह व्यक्ति निंदा के योग्य न होता।
- 1:21:56सच्चा होता तो मैं तुम्हें बताऊँ क्या होता?
- 1:22:00इसकी किडनी ठीक हो जाती। जीस बात के कारण यह भोग रहा मैं
- 1:22:06जानता हूँ तुमने प्रश्न क्यों पूछ इसकी किडनी ठीक हो जाती और मेरी
- 1:22:13खराब हो जाती है। इसका गोबर मैं खा लेता हूँ लेकिन
- 1:22:22होशियार यार जानी ये रास्ता ठगों का होशियार यार जानी ये रास्ता
- 1:22:29ठगों का यहाँ ज़रा नजर चुकी तो माल दोस्तों का।
- 1:22:34मैं ऐसा पागलपन कभी नहीं करता। निंदा करता हूँ तो अच्छी तरह देख
- 1:22:40कर बाबा मुझे उत्साहित करते हैं, उत्प्रेरित करते हैं, केस दुष्ट
- 1:22:48के बारे में बोलो? तो मैं बोलता हूँ और सच पूछो।
- 1:22:52तो मैं नहीं बोलता, वही बोलता है। मैंने 1000 बार कहा मैं मात्र
- 1:22:58यंत्र हूँ, बोलता तो वही सर्व ईश्वर बोलता तो वही मैं नहीं
- 1:23:07बोलता, मेरे शरीर का उपयोग करता है यंत्रों की द्रह।
- 1:23:11और मुझे पता है कि मैं हूँ नहीं क्योंकि मैंने तो एक जर्रा तक
- 1:23:18नहीं बनाया और मैं एक जर्रा या वायु का एक कण या पानी का एक कण
- 1:23:24तत्व बनाने के समर्थ नहीं रखता। मैं इतनी सृष्टि को बनाऊंगा, कैसे
- 1:23:29मैं पंचभौतिक शरीर? यह इतने वजन का बनाऊंगा, कैसे
- 1:23:33मेरे में इतनी क्षमता? कहाँ मैं भलीभाँति जानता हूँ?
- 1:23:38अच्छी तरह जानता हूँ, अगर मैं गलत निंदा करता और अगर तुम भी गलत
- 1:23:46निंदा करो तो उसका पाप तुम्हें भुगतना पड़ेगा।
- 1:23:52अगर मैं इसकी गलत निंदा कर देता और ये ठीक होता या ज्ञानी होता या
- 1:23:56अंतिम तट पर छलांग लगा गया होता, यह उस अंत स्थल पे पहुँच के सत्य
- 1:24:03को जान गया। होता तो फिर मेरा हाल बेहाल होता।
- 1:24:10लेकिन होशियार जानिए रास्ता मैं बोलता हूँ तो मुझे मज़ा नहीं आता,
- 1:24:19किसी की निंदा का रस नहीं लेता, मैं निंदा बोलता हूँ आपके लिए
- 1:24:27आपका भ्रम टूटे। आपकी मान्यताएँ टूटे।
- 1:24:32आपने जो पाखंड व्रतियाँ इनके कहने से अपनाई, जो इन्होंने राह गलत
- 1:24:38दिखाया, उस गलत राह को तोड़ दूंगा और यह आदेश यह मेरा नहीं है।
- 1:24:46यह आदेश उसका है। जिसने सृजन किया सृष्टि।
- 1:24:50का? और मैं बस बीच में नहीं आता हूँ,
- 1:24:54मैं एक तरफ सो जाता हूँ। मैंने कहा, जब मैं राम जी का रोल
- 1:24:57करता। हूँ।
- 1:25:00तो पर्दे पर्दे उठने से पहले राम और लक्ष्मण दोनों सी सुनवाते हैं
- 1:25:07पर्दे के पीछे। रोज़ का काम था हमारा तो हम सी
- 1:25:12सुनवाते मैं राम जी से कहता राम जी।
- 1:25:18आप आ जाओ। अपनी लीला को खुद ही खेलो, मैं एक
- 1:25:24तरफ हो जाऊंगा। तुम खेलो, जैसा खेलना चाहते हो,
- 1:25:29मैं बीच में नहीं आऊंगा और मैं बीच में आता भी नहीं।
- 1:25:33सारी लीला भगवान खेलते हैं, राम खेलते हैं, मैं एक तरफ फट जाता
- 1:25:40हूँ और सारी लीला खेल दी जाती, मैं सिर्फ यंत्र की तरह।
- 1:25:47सिर्फ यंत्र की तरह उसके हाथ का यंत्र हूँ।
- 1:25:50मैं वह जैसा बुलवाता ये यंत्र बोलते थे मैं तो ब्रॉडकास्टर।
- 1:25:58हूँ। बोलता तो वही है, आवाज उसकी और।
- 1:26:04ये यंत्र भी उसका मेरा यहाँ कुछ नहीं मैंने जान लिया है ना मैं
- 1:26:12हूँ ना मेरा है कुछ यहाँ जो है उसका और वह जैसे चाहे जीस मार्ग
- 1:26:21में चाहे जीस तरह चाहे इसका उपयोग करें।
- 1:26:27बस यही है बुनियादी तत्व बिना जाने, किसी की निंदा करना।
- 1:26:35उसके अपराधों को तुम खुद पर मड़ डूबे यही हुआ अयोध्यावासियों के
- 1:26:42साथ। इस कहानी का अमर बड़ा शानदार और
- 1:26:46दूसरा दूसरा तो संत कहता कि ये उपाय नहीं है कोई ये पुत्र
- 1:26:53तुम्हें खाना पड़ेगा। राजन तुम्हें वक्षण करना होगा
- 1:26:58क्योंकि तुमने दान किया ये ओरिजिनल है।
- 1:27:03ऑथेंटिक दान है तुम्हारा ये इसे मैं नहीं कह सकूँगा।
- 1:27:10तुम चाहते हो मैं तुम्हारी निंदा करूँ नहीं करूँगा।
- 1:27:16बस ज्ञानी जानता है, ज्ञानी जानता है।
- 1:27:23ज्ञानी निंदा करता है। ज्ञानी तो निंदा का निहरे राखी है
- 1:27:30आंगन कुटीर सवाय जो निंदा करता है, उसी से तुम दृढ़ होगे।
- 1:27:40जो तुम्हारी निंदा करता है उसको सामने बैठा दो।
- 1:27:46बिन वारी साबुन बिना शकला मैल धुल जाय और तुम्हारी सारी मैल दौड़।
- 1:27:54वैसे तो कबीर के भीतर निर्मल चित्र होता है, मैल होती नहीं।
- 1:27:59लेकिन थोड़ी बहुत दूर आने जाने वाले लगा जाते हैं।
- 1:28:04ये लासानी तरंगे फेंक जाते हैं, जो आते हैं नमस्कार किया, प्रणाम
- 1:28:09किया, कुछ सुन लिया, प्रवचन सुन लिया।
- 1:28:13वह अपने साथ कुछ मैल ले के आते हैं, उस मैल को दो देता है कौन?
- 1:28:18निंदक निंदा करने वाला तो कबीर कहते हैं, निंदा करने वाले को
- 1:28:31आँगन की कुटी में बैठा लेना, उसके लिए भोजन का इंतजाम करना, वह बड़ा
- 1:28:37काम का व्यक्ति। वह तुम्हारे रोज़मर्रा के मैल को
- 1:28:42धो लेगा जो भीतर का मैल है, बाहर का मैल तो पानी से धुल जाता है,
- 1:28:48लेकिन भीतर का मैल कौन धोएगा? निंरक तो मैं जानता हूँ अज्ञात।
- 1:28:56अवश्य। अंधा हुआ हुआ मैं एक लफ्ज़ भी
- 1:29:00नहीं करता हूँ, एक सूत्र है तुम इसको चाल की तरह न चल पाओगे
- 1:29:11क्योंकि जो जानता है वह आपकी निंदा नहीं करेगा।
- 1:29:15वे आपसे कह देगा राजन यह लीद तो तुम्हें ही खानी पड़ेगी?
- 1:29:22कितना ही वेश बदल के चले जाओ सेठ स्याणप वहाँ लखोव का ना चले ना
- 1:29:28तुम्हारी स्याणप वहाँ काम नहीं करेगी तुम्हारी स्याणप सिर्फ।
- 1:29:34संत के पास काम नहीं करती तुम्हारी स्याणक काम करती है
- 1:29:38अज्ञानी के पास अज्ञानी के पास उसकी कोई पेस नहीं चलती जीसको
- 1:29:47ज्यादा घमंड हो उसको अपनी चुनरी पे लगे हुए दाग।
- 1:29:54धोने के लिए इस्तेमाल कर लेना वह निंदा करेगा।
- 1:30:00तुम्हारी चादर पे लगे हुए दाग धो। देगा।
- 1:30:05लादा सुनरी में दा। लगा सुनरी में दाग छिपाओ कैसे लगा
- 1:30:26सुनरी में दाग? छिपाऊं कैसे लगा चुनरी मैदा
- 1:30:37छिपाऊं कैसे छिपाऊं कैसे घर जाऊं कैसे।
- 1:30:50घर जाऊं कैसे लगा चुनरी में दा चुनरी में दा गजपाऊ कैसे लगा
- 1:31:07चुनरी में दा? उसके घर से आए थे बिना दाग चुनरी
- 1:31:12बिल्कुल साफ सुथरी थी यहाँ दाग लग।
- 1:31:16गया। वो दाग साथ लेकर उसके घर में जाया
- 1:31:21नहीं जा सकता। नैरुमाला माने सोई मोई बाबा मोहे
- 1:31:26कपट है शैलचित्र न बाबा। दाग लेकर जुनेरी का तुम जाना
- 1:31:32सकोगे यह दाग धोकर ही जाना पड़ेगा यह सिद्धांत।
- 1:31:39है। दाग लिए।
- 1:31:46ओनली दे विल एंटर इन मैं गॉड्स किंगडम हूँ विल बी इनोसेंट जस्ट
- 1:31:50लाइक ए चाइल्ड इनोसेंट होंगे जो बच्चे के समान उनके चुनौती पे बात
- 1:31:58नहीं होगा। जाऊं कैसे?
- 1:32:05घर जाऊं कैसे लगा? चुनरी में दाग छिपा भी नहीं
- 1:32:18छिपाऊँ कैसे साफ दिखता है घना दाग है कल।
- 1:32:26लगा चुनरी मैंदा अगर छिपाऊं कैसे लगा चुनरी मैंदा, छिपाऊं कैसे।
- 1:32:44घर जाऊं कैसे लगा सुनरी में आ? मर्चना मूर्ख नहीं और जो स्थल को
- 1:33:01छू लेता है। वह सयाना हो जाता है सब है सयाना
- 1:33:09एक। मत।
- 1:33:13जो उस तल को छूता। है।
- 1:33:16वह मूर्ख ही रहता है। मूर्ख अपनों अपनी इसलिए मूर्खों
- 1:33:21के सिद्धांत। बड़े अलग अलग।
- 1:33:27होंगे। केन्द्र के प्रति आनंद के प्रति
- 1:33:34सभ्य स्याने एक मत केन्द्र के प्रति सब के मत एक मुघे।
- 1:33:41किसी भी दशा से वह कोई दिशा से वह कोई क्यों न आए, किसी भी सफीर के
- 1:33:48किसी कोने से वो क्यों न आए? लेकिन केंद्र के बाबत उनका मत
- 1:33:55समान होगा। सब सयाना, एक मत मूरख अपनों अपने।
- 1:34:01मूर्ख अपनी अपनी बात कहे, यही पहचान है, मूर्ख व्यक्ति की निंदा
- 1:34:06करता है। समझदार सैन्य व्यक्ति निंदा नहीं
- 1:34:10करता और निंदा करने का कारण है तुम्हारी मूड भ्रांतियों को
- 1:34:14तोड़ना क्योंकि इन भ्रांतियों को संग ले जा जाके।
- 1:34:19ये कालस है, चुनरी पे लगी हुई ये उठानी ही पड़ेगी, ये हटानी ही
- 1:34:25पड़ेगी, ये साफ करनी ही होगी और आज मैंने साफ करने का तरीका
- 1:34:30तुम्हे बता दिया। है।
- 1:34:39हीरो पायो। कांठ गठि हाययो हीरोपायो गांठ गठि
- 1:34:57हायो। बार बार वह को क्यों खोले?
- 1:35:11मन मस्त हुआ फिर क्यों बोले मन मस्त हुआ।
- 1:35:21फिर क्या वो वो जब मन मस्त? हो जाता है तो तुम बोलना चाहते
- 1:35:29हुए भी बोलना क्या बोलूं, क्यों बोलूं?
- 1:35:35वह मिल गया जिसके मिलने से सब मिल जाता है।
- 1:35:42अभी तो तुमने वो खो दिया है जिसके खोने से चैन खो गया, आनंद खो गया,
- 1:35:49आराम खो गया, रातों की नींद खो गई, वे चैन हो, दौड़ रहे हो, ठहरे
- 1:35:56हुए नहीं हो, सुविधा खो गई। शान्ति खो गई, सब खो गया, मलिन हो
- 1:36:02गया और एक के पाने से वह एक के पाने से सब पा लिया जाता है एक
- 1:36:09साध है सब साध है सब जाए ऐसे दीनानाथ को किस वृद्ध को बखाये?
- 1:36:19धन्यवाद।