Latest / Baba ji Vijay Vats / 31 Aug 25 - क्रिया योग ही तुम्हें एनलाइटनमेंट तक लेके जाएगा! Real Story! बुद्धि से आस्तित्व की खोज!
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- 0:04बालु शाह, कर्नाटक से बाबा जी प्राण।
- 0:20बाबूजी आप अक्सर कहते हैं कि संत के पास जो फरियाद कर दी जाए, वह
- 0:32परमात्मा सुन लेता है? ऐसा क्या होता है संत के पास?
- 0:45कृपया इस गुत्थी को सुलझाने की चिष्ठा करें ताकि।
- 0:56हम भी संतत्वता को उपलब्ध होकर दुनिया का कष्ट निवारण कर सके।
- 1:12भावना बड़ी शुभ है। इस भावना के लिए तुम्हे साधू बात।
- 1:28संत के पास अनादि काल से अनंतकाल से दुखी लोग जाते रहे।
- 1:42समस्याओं से पीड़ित लोग जाते रहे। गरीब गुर्बे से राज्यतंत्र तक
- 1:57संतों के पास अपनी समस्याओं और पीड़ाओं का हल करने के लिए जाते
- 2:01रहे हैं। एक वक्त में।
- 2:05डॉक्टर भी जवाब दे देते हैं, कह देते हैं भगवान भरोसे हैं तब लोग
- 2:19आज भी संतों का सहारा लेते हैं। ऐसा क्या है सन्तु के पास?
- 2:33हमको भी बता दो बाबा किस तरह जीते हैं ये लोग बता दो यारो हमको भी
- 2:42जीने का अंदाज सखा दो यारो। पहली बात तो तुम्हें बता दूँ यह
- 2:54वीडियो थोड़ा विस्फोटक रहेगा। अतः वैसे तो सभी एक ने मेरे सभी
- 3:06वीडियो मेरे फ्लोवर से देखे। जो प्रतिक्रिया न करें, प्रश्न
- 3:13पूछे प्रतिक्रिया न करें। विस्फोटक है यह फिर तुम्हारी
- 3:23भावनाओं को चोट पहुंचेगी। मुझे पाप लगे।
- 3:34यद्यपि मैं पाप की अगली में बसम नहीं होता, नैनम सिदंती शस्त्रण
- 3:40नैनम पाप की पाप का मैं चैनम के लिए दंडता को न सो क्षति मारूंगा
- 3:48पाप मुझे लगता नहीं। लेकिन मेरे भगत ज नहीं।
- 3:58इस वीडियो को सुनें क्या कारण हैं?
- 4:04अब हम को भी जीने का अंदाज सीखा तो यार।
- 4:13लो समझो संत खोपड़ी से खाली होता है मतलब 12 नहीं होता, शून्य होता
- 4:28है ह्रदय से शून्य होता है। चेतन अचेतनमन दोनों खाली होते हैं
- 4:40और होता है एक सामूहिक अवचेतनमन सामूहिक अचेतनमन।
- 4:51उस पर उसका कोई वश नहीं है। वह तो सभी के भीतर चलता ही रहेगा,
- 4:57क्योंकि वो सबका कॉमन है सांझा है, लेकिन उसका स्वयं का कलेक्टिव
- 5:06अनकॉन्शसमन गायब हो गया है। ये थोड़ा सा समझना मुश्किल
- 5:12पड़ेगा, लेकिन इसको समझ लेना तुम, क्योंकि तुमने अभी चाहना है तो
- 5:23मान लेना कि अब चेतन कोलेक्टिव अचेतन खाली हो जाता है।
- 5:31चेतन खाली अब चेतन खाली अचेतन खाली और सामूहिक अचेतन खाली
- 5:47खोपड़ी से लेकर अस्तित्वदक राजपथ होता है।
- 5:55कहीं कोई उबड़ खाबड़ नहीं होता। कहीं कोई कांकड़, पत्थर, कांच
- 6:01नहीं बिखरा होता, राजपथ होता है, बड़े आराम से उतर जाता है, संत और
- 6:08बड़े आराम से बाहर आ जाता है। जीस स्थल पर जाने के लिए तुम
- 6:14बरसों बरसों से जन्मो जन्मो से तरस रहे हो, वह वहीं बैठा रहता
- 6:20है, करीब करीब और दिन में हजारों हजारों सेरे लगा देता है।
- 6:30तुम एक बार की तरस गए। वह भी कभी एक बारगी तरस रहा था,
- 6:38लेकिन उसको किसी ने अंदाज़ बता दिया जीने का जैसे मैं तुम्हें
- 6:44बता रहा हूँ, तुम सीख जाओ तो सीख जाओ।
- 6:51तुम ना सीखो कि किसी और चैनल पर चले जाना तुम्हें बांध के नहीं
- 6:59रखा। किसी को भी खोपड़ी से लेकर
- 7:06अस्तित्व तक बिल्कुल शून्य होता है खाली।
- 7:15खोपड़ी अगर खाली भी हो जाएगी तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
- 7:22हृदय अगर खाली भी हो जाएगा, भाव विहीन हो जाएगा, भाव शून्य हो
- 7:28जाएगा। और बुद्धि अगर विचार शून्य हो
- 7:31जाएगी, बेकार शून्य हो जाएगा विचार शून्य विकार शून्य और विषय
- 7:41शून्य विषय विकास और विचार ये तीन ही चीजें।
- 7:48जो रास्ते में अड़चन बनती है और साधक इसे हटा देता है और क्रिया
- 7:56योग का यह विज्ञान श्वास लेना, नाक से छोड़ना, मुँह से लंबे,
- 8:04लंबे सांस। उससे तुम्हारा अचेतन अब चेतन खाली
- 8:11होगा। धूल ऊपर आएगी चेतन में उसे निकल
- 8:15जाने देना, ऐस्क्रिट कर देना धीरे धीरे धीरे धीरे वह खाली।
- 8:28घट सा घट सा घट सा 1 दिन शून्य हो जाएगा।
- 8:34इसे ही शून्य बाद कहते हैं नागार्जुन का शून्य बाद और कुछ
- 8:42नहीं। किसी और तरीके से चेतन अवचेतन
- 8:50अचेतन को खाली कर देना जब कोई बाधा न रहेंगी।
- 8:59तुम्हारे चेतन और तुम्हारे अस्तित्व के बीच में शब्द थोड़ा
- 9:03सा गौर कर लेना। एक बार में समझे न आए वैसे तो आ
- 9:07जाएगी। बड़े सरल शब्दों में समझा रहा
- 9:09हूँ, लेकिन न समझ आए तो बार बार सुन लेना।
- 9:17बुद्धि से अस्तित्व तक यानी जो तुम हो वास्तव में।
- 9:24वहाँ तक सारे कंकड़, पत्थर, कांच, बाधाएं सब हट जाएंगे, राज़ पथ बन
- 9:34जाएगा। जैसे हाईवे होता है कोई उबड़
- 9:40खाबड़ जमीन में। कोई अब रोग नहीं, रास्ते में नो
- 9:48वेरी यार, खाली है सब। ऐसा हो जाता है संत तुम में और
- 10:10संत में यही फर्क है तुम बुद्धि से लेके आखिरी तल तक भरे पड़े हो
- 10:18और कूट कूट के भरे पड़े हो। और इतने भरे पड़े हो कि अगर थोड़ा
- 10:25सा कुछ भी कह दे तो तुम फूट पड़ते हो, जैसे तुम फूट पड़ने को तैयार
- 10:32ही थे, इतना मबाद भरा पड़ा है तुम्हारे इस कोड़े में कि थोड़ा
- 10:39सा छू भर दे। और मवाद रिस्कने लगता है एक कहानी
- 10:51है गुरजेफ के गुरजेफ अपने शहर में जा रहे थे, धीरे धीरे जा रहे थे,
- 11:00मस्ती के आलम में जूं थे। संत इस शून्यवाद के कारण ही मस्त
- 11:07रहता है। तुम डोलते हो।
- 11:12विचारों के ऊहापोह के कारण के विचार तुम्हें निचाते हैं वासनाई
- 11:18तुम्हें भगाती हैं पूरा विषय। तो मैं भोगने को तत्पर करते हैं।
- 11:32यह तीनों चीजों को इसलिए संतो ने बाधा कहा।
- 11:38किसी ने शत्रु भी कहा लेकिन शत्रु कहना कुछ अतिशोक्ति हो जाएगी।
- 11:46इसलिए मैं बाधा कहता हूँ दीज़ अरे दी बैरियर्स, ऑस्ट्रक्शन ऑफ़ दी
- 11:54वे ऑफ़ गॉड, संत का चेतन अवचेतन। अचेतन देखें ध्यान से सुनें बड़े
- 12:12प्रेम से सरलतम ढंग से मैं समझा रहा हूँ क्योंकि ये तुम्हारे काम
- 12:18का चेतन अवचेतन अचेतन सब खाली। कलेक्टिव अनकॉन्शियस तो खाली है।
- 12:40जब सारा खाली होता है अचेतन तो उसके संग ही तुम्हारा कलेक्टिव
- 12:46अनकॉन्शियस भी खाली हो जाता है। बुद्धि से लेके अस्तित्व तक सब
- 12:57खाली होता है, राजपथ होता है। तुम्हें कहीं अड़चन नहीं आती,
- 13:10कहीं हम्पिंग नहीं होती। कहीं गड्ढा नहीं आता।
- 13:16राजपथ की तरह तुम मज़े से अपनी गाड़ी को ले जाते रहो।
- 13:28मैं रुक जाता हूँ ताकि ये बातें तुम्हारे भीतर उतर जाये।
- 13:37तुम भरे पड़े ये कैंसर का फूड़ा इतना बढ़ गया है विचारों का,
- 13:47वासनाओं का, विषयों का, विचारों का।
- 13:57के जैसे फूटने को तत्पर है तो जा रहा है कुर्सी रास्ते में एक उस
- 14:06शहर का सबसे बड़ा अमीर व्यक्ति जा रहा है अपनी अखाड़े में।
- 14:12बॉडी लैंगुएज बता देती है कि यह व्यक्ति भीतर से किस स्तर पर संत
- 14:21चलेगा, लड़खड़ाई चाल से चलेगा, मस्ती के आलम में चलेगा, अहंकारी
- 14:30व्यक्ति चलेगा। अकड़ा, अकड़ा चलेगा।
- 14:34पहली बात तो घर से रिहर्सल करके आएगा कैसे चलना, ऐसा चलना, ऐसे
- 14:47कदम रखना, ऐसे मुड़ना। ऐसे देखना सबरी प्लेन्ड होता है।
- 14:55वह चल रहा था अपनी आकड़ में और गुर से मस्ती के आलों में संयोग
- 15:04ऐसा हुआ कि बढ़ गया कंधा लग गया गुर जेफ का।
- 15:13उस शहर के सबसे ज्यादा अमीर व्यक्ति के साथ कहाँ गुरचिर फेंक
- 15:21गिर और कहाँ शहर का वो शहंशाह। स्वभाविक तौर से उस अमीर व्यक्ति
- 15:37ने सोचा कि इसने जान बूझकर कंधा मारा है।
- 15:43अहंकार की आकड़ कुछ ऐसी ही होती है।
- 15:54तो उसने गुर्जर से कहा डू यू नो हू एमआइ?
- 16:06क्या तुम जानते हो कि मैं कौन? टक्कर तो मार दी तुमने लेकिन
- 16:14जानते भी हो की टक्कर मारी किसे है हूँ?
- 16:20एमआइ गुरजिफ ने गौर से देखा पैनी ने कहा कि गुरजिफ।
- 16:30शीतलता भरी आँखों से जब निहारा एक अज्ञात स्पर्श कंपा गया इन अमीर
- 16:41लोगों में आत्मा नहीं होती ये कायर?
- 16:47साहस नहीं होता, ये कपेक उपाय होते हैं।
- 16:52बस तुम थोड़ा सा झांक भर लो और फिर संत का झाँका ये कहाँ
- 17:01बर्दाश्त करेगा? तो कप क्या सारा?
- 17:06लेकिन ये छुपा लेते हैं गाँधी को ये कहने वाले कि लड़कियों के
- 17:17कंधों पर हाथ रख कर चलता था ये बूढ़ा टल के ये बात भूल जाते हैं।
- 17:25कि जो प्रदर्शन करता है वह पापी नहीं होता।
- 17:31फिर सुनो जो प्रदर्शन करता है वह पापी नहीं, पापी वो छुपाता है और
- 17:39पापी वो जो छुपाने के लिए मीडिया का प्रयोग करता है।
- 17:45किसी तरह दब जाए, किसी तरह घुल जाए, किसी तरह दफन हो जाए, किसी
- 17:50तरह सत्य उखड़ न जाए, लेकिन सत्य कभी छिपता है, सच्चाई छिप नहीं
- 17:57सकती बनावट के आंसू से कि खुशबू आ नहीं सकती कभी।
- 18:03का गज के फूल और से ओह एमआइ शहर का सबसे अमीर व्यक्ति हूँ कहने का
- 18:17मतलब ये तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ने गुर्चे फिर लंबे छोड़े थे।
- 18:28उस शहर के सबसे ज्यादा अमीर व्यक्ति से चार इंच ऊंचे ही थे और
- 18:37भिड़ गए तो गुरु जी ने पूछा बड़े शांत लहज़े में?
- 18:50डू यू नो हू आर यू? क्या तुम जानते हो कि तुमको ये
- 19:00शब्द उसके भीतर तक चले गए? संत के शब्द तुम्हें इसलिए लड़
- 19:06जाते हैं। संत के शब्द बड़े गहरे से आते हैं
- 19:11और जीतने गहरी से आते हैं, उतनी गहरी जाति भी हैं।
- 19:19इसलिए संत से वार्तालाप इतना आसान नहीं होता।
- 19:25संत के शब्द परमात्मा से आते हैं। उन खाइयों से आते हैं जिनका कोई
- 19:33और छोर है। अटल गहराइयों से उगते हैं संत के
- 19:37पक्ष संत की वार्ता तो पूछा डू यू नो हूँ आर यू तुम जानते हो कि तुम
- 19:49कौन? प्रश्न बड़ा गंभीर था, व्रत ही
- 19:58सोचने पे मजबूर हुआ, मैं जानता हूँ मैं इतना सा जानता हूँ कि शहर
- 20:05का रिचेस्ट पर्सन ऑफ दी सिटी? सबसे अमीर व्यक्ति बस इतना सा ही
- 20:14जानता हूँ, इससे ज्यादा और कुछ नहीं जानता और ये जानता हूँ कि
- 20:21मैं शरीर हूँ और ये जानता हूँ कि मैं 52 हूँ।
- 20:24ये जानता हूँ कि मैं विचार हूँ ये जानता हूँ।
- 20:28कि मेरे लिए ऐसे वस्त्र पहन रखें। हिरे, मोती, जौहरात, सोने से
- 20:37जड़ित गहने इतना जानता हूँ। लेकिन गुरु सिर्फ तो मलंग है, आम
- 20:51पोशाक पहन रखी है ये शब्द कब आ गए, कोई जवाब न है मुड़ गया वह।
- 21:11अमीर व्यक्ति है चुपचाप चला गया। लोग इकट्ठा होने ही लगे थे कि वह
- 21:19चला गया और आपने राह पड़ा गुर। साँझ ढूंढ ढांढ के पूछ पाछ के
- 21:33उसके झोंपड़े जाते पांव पकड़ लिया मुझे नहीं पता आप कौन है
- 21:43महाराष्ट्र? लेकिन आपकी बातें हृदय के भीतर तक
- 21:48उतर गई। कौन हुआ गुरुसिया बोला सुबह तो आप
- 21:57पूछ रहे थे कि तुम जानते हो कि मैं कौन अब तुम मुझे पूछते हो कौन
- 22:04हुआ दोनों बार सवाल और दोनों बार उलट पुलट, मैं कौन हूँ ये जानना
- 22:12चाहते हो? तो फिर थोड़ी सी प्रोसेसिंग करनी
- 22:17बैठ जाओ, घर से छुट्टी लेकर आ जाओ, कामकाज छोड़ के आ जाओ, काम
- 22:25धंधा छोड़ के मेरे पास बैठना होगा।
- 22:28तो पता चल जाएगा तुम कौन हो और पता चल जाएगा।
- 22:33दोनों का पता चल जाएगा। हेनरी जॉन श्रिंकलेयर हाउस ऑफ
- 22:41लॉर्ड्स और एग्ज़िक्यटिव के अंदर भी और सदस्य रहे।
- 22:55गुरजियफ़ के पास रहे साधना की बड़ी अजीब साधना की गुरजियफ़ है
- 23:04इस सदी के महानतम व्यक्ति, उस सदी के महानतम व्यक्ति अगर मैं कहूं
- 23:12तो गुरजियफ़ के अलावा और कोई? अब थोड़ा सा ध्यान से सुन प्रवचन
- 23:19को और गहरा हो गया। गुर जी ऐफ़ की बद्धति थी कि जो
- 23:28व्यक्ति ज्यादा भरा हुआ उसके पास आता।
- 23:31उसे कहता उस कमरे में बैठ जा। ये लें शराब की बोतलें शराब पीता
- 23:39है, तुम कहोगे ये भी कोई साधना बिलकुल साधना है।
- 23:47शराब पीता रहे और जो भीतर है। मवाद का फोड़ा भीच के ही मवाद
- 23:57निकालना होता है। थोड़ा भरा पड़ा है तो डॉक्टर्स को
- 24:06चीरा लगा देता है और ज़ोर से भीचता है।
- 24:11सर मवाद निकल जाता है और अच्छी तरह से पूछता है, फिर उसको दबाता
- 24:17है जब तक ये खून निकलना शुरू ना हो जाए।
- 24:27शराब पीते जा, भूख लगे खाना कल शराब पी ले।
- 24:36क्या होगा व्यक्ति का कौन से सुमन देखिए मैं आपसे पहली बात बोल रहा
- 24:45हूँ। भांग का भी यही काम है।
- 24:48मात्र कद्रव्यों का भी यही काम जो हमारे भगवान शंकर तक भांग का
- 24:53गांजे का सेवन करते हैं। इनका और कोई मतलब नहीं है।
- 25:02चेतना के परम ऊंचाइयों के सतह तक पहुंचा हुआ वह व्यक्ति और सेवन
- 25:10करता, भांग का और गांजे का। लेकिन ध्यान रखना ये प्रारंभिक
- 25:18रूप है पहुंचने के बाद नहीं जब फूड़ा मवाज से खाली हो गया पट्टी
- 25:32करती गई घाव भर गया। फिर मरहम की जरूरत नहीं, दवा की
- 25:37जरूरत नहीं पड़ती की भी जरूरत नहीं, पर लिमोनरी बेसिस के ऊपर यह
- 25:45जो कूड़ा भरा तुम्हारी चेतन से लेकर अवचेतन और अचेतन यह निकालना
- 25:55जरूरी है। राजपथ बनाने के लिए एक सीधा मार्ग
- 25:59होना चाहिए। आगे तो परमात्मा है, इसलिए सबसे
- 26:08पहले चेतन को बेहोश करके अवचेतन और अचेतन का मलबा निकालना होता
- 26:17है। तुम भरे पड़े।
- 26:21वो भरे पड़े हों, चाहे विचारों से चाहे विचारों से चाहे विषयों से
- 26:28लेकिन भरे पड़े हों चाहे सूचनाओं। अब ये कौन बनेगा करोड़पति सूचनाएं
- 26:38ही तो होती है जिसके पास ज्यादा सूचनाएं ही हैं।
- 26:43वो ईनाम जीते रहता है, एक खेल है, संसार भी एक खेल है।
- 26:54कौन धनी होता है नंबर एक तुम भी यही खेल खेलते हो सभी लेकिन
- 27:04अध्यापकों का खेल संसार के इस खेल से बिलकुल विपरीत संसार का खेल
- 27:12है। कैंसर के इस संवाद के घोड़े को
- 27:18भरना तुम भरते रहते हो, गंधमंद ज्वाय जोड़तें रहते हो और ध्यान
- 27:26रखना ये जो भीतर इकट्ठा है तुम्हारे।
- 27:33वो चाहे गाली है, चाहे भगवान का नाम है।
- 27:40हाँ अब वो तेजात मत होना भाभी चलो अगर गलती से सुन लिया तो तुम गलती
- 27:47में आ गए शब्द हैं दोनों। भगवान का नाम भी शब्द है और गाली
- 27:59गलौज करना भी शब्द है। ईर्ष्या में बह जाना भी भावना है
- 28:11और प्रेम में बह जाना भी भावना है।
- 28:16विचारों से परे भावनाओं से परे, यह सब यह सब मलिदा है सब बेकार
- 28:28है, तुम कह सकते हो हम तो भगवान का नाम ले रहे हैं, लेकिन तुम्हें
- 28:36नहीं पता। ये भगवान का नाम बैरियर है।
- 28:43यह व्हाइट सीमेंट का काम करेगा और पका देगा।
- 28:50फिर तुम चाहोगे इसको खाली करना तो व्हाइट सीमेंट उखाड़ना थोड़ा
- 28:54ज्यादा मुश्किल होता है। क्योंकि वह तोड़ोगे नहीं, क्योंकि
- 29:01ये तो भगवान का नाम है। अरे अरे अरे पाप हो जाएगा, मैं
- 29:09पांच नाम कैसे तोड़ दूँ और आधे रात कैसे तोड़ दूँ वो तो जगत जननी
- 29:15अम्बा। महामाया है, इसको कैसे तोड़ दूँ?
- 29:29यही तो कह रहे थे राम कृष्ण पर मैं महाराज माँ का गलकड़।
- 29:38वो कहते कैसी माँ तेरी कल्पना है तू जल्दी कर मैं कल चला जाऊंगा ते
- 29:46चलो फिर तोडू कैसी माँ तू आ गई तलवार कहाँ कहता काली कहाँ काली
- 29:54भी तो तेरी कल्पना की नाम भी तू तो?
- 29:58तुम्हारी कल्पना तुमने जैसे भगवान को देखा ना उसका नाम तुमने रखा
- 30:05कैसे? तुम्हारे बच्चा होता है तो उसका
- 30:09नाम रखते हो। बच्चे से पहले जब बच्चा होता ही
- 30:12नहीं, प्रेग्नेंट ही नहीं हुआ तो उसका नाम रख देते हो।
- 30:19नहीं रखते। जब भगवान देखा ही नहीं कौन है
- 30:22कैसा है रंग रूप बहस करते हो साकार है, निराकार है शगुण है
- 30:29नरगुण है ये बकवास सिंह है फिर। शकुन है, निरगुण है लेकिन मैं
- 30:38पूछता हूँ कि वो है मेरी इस बात का जवाब कोई नहीं है वो, मैं
- 30:47तुम्हारी बातचीत में घोड़ घोल मचा देता हूँ।
- 30:53जब तुम कहते हो वह सगुण है। वह निरगुण है और शास्त्रार्थ करते
- 30:57हो। इसीलिए वह सगुण है।
- 31:01वह नरगुण है, वह साकार है, वह निराकार है, तुम बहस करते होते हो
- 31:07इसीलिए मैं शंकराचार्य को मूर्ख कहता हूँ।
- 31:14बहस करोगे तो तुमने जाना नहीं, अगर तुमने जान लिया तो तुम बहस
- 31:24नहीं करोगे, यू वेल नॉट डिस्कैस क्यों?
- 31:30जिसका वो छोड़ नहीं जिसका बार बार नहीं, जिसका आदि अंत नहीं, जिसका
- 31:37माप तोल नहीं वह विशाल, वह विराट, वह अखंड जो कहीं शुरू नहीं होता,
- 31:45कहीं मध्य नहीं होता। कहीं अंत नहीं होता उसके बारे में
- 31:52तुम शास्त्र पर उसको तुम शब्दों में बांधोगे क्या वो इतना संकीर्ण
- 31:59तुमने मान लिया और मान लिया है तो उसका मतलब तुम नहीं जानना।
- 32:09जब कोई व्यक्ति किसी चीज़ को मान लेता है तो समझ लेना अभी उसने
- 32:14जाना मंडल मिश्र के साथ वह क्यों सा हस्त्र करने को अतुर है?
- 32:22हरा देता है उसको? सिर्फ वाह वाह ही करने के लिए
- 32:27झंडा ऊंचा रहे हमारा फिर तुम्हारे में और इन पार्टी के नेताओं में
- 32:32फर्क है। झंडा ही ऊंचा वो रखते हैं और झंडा
- 32:38ही ऊंचा कम रखते हैं पहलवान की तरह।
- 32:45मुझको जो हरा सकता है ये लो झंडी इसको पकड़ लो युद्ध करो मेरे से
- 32:52गोल करो इसीलिए मैं शंकराचार्य हूँ, अव्वल दर्जे का मूर्ख रहता
- 33:00हूँ। तुम कितना ही सम्मान दिए जाओ मुझे
- 33:04कोई फर्क नहीं पड़ता, तुम लोट पोट होए जाओ, मुझे गालियाँ निकालते
- 33:09रहो, कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं इतना जानता हूँ वह व्याख्यात नहीं
- 33:17किया जा सकता शस्त्रार्थ कैसी हो? और मुझे गाली निकालने वालो ये भी
- 33:23सुन लो गाली मेरे तक पहुँचती है मैं बहुत श्यम हूँ जहाँ कोई आग
- 33:32नहीं जाती शब्दों से दूर और तुम्हारी गाली शब्द।
- 33:41शब्द मेरे तक पहुंचते नहीं वो राम का नाम हो चाहेगा जी मैं उनसे
- 33:47बहुत दूर हूँ आराम जब राम मिल गया तो आराम आ गया तुम राम राम करते
- 33:58हो। मुझे आराम मिल गया है।
- 34:04मेरा वासा हीराम में है। जब राम मिल गया तो आराम मिल गया
- 34:16हम। और आए हैं यहाँ पर काम करने के
- 34:21लिए संत कहता है और आए हैं यहाँ पर काम करने के लिए राम राम जपो
- 34:32फला न करो, शिवलिंग पर दूध चढ़ाओ, ये करो वो करो महाकालीश्वर के।
- 34:39अरे क्यों घी फूंकते हो बाहर देखो तुम तुम्हारे मंदिर के बाहर
- 34:45हड्डियों के ढांचे बैठे, जिनके पेट खाली दूध को घी को।
- 34:56कपूर को इतने मुश्किल, महंगे, महंगे दर्पों को तुम पत्थर के ऊपर
- 35:01से बहा रहे हो, पागल हुए हो तुम उसका पेट नहीं भर सकते इसलिए मैं
- 35:14कहता हूँ यह जमात मूर्खों की समाज।
- 35:23जो ऐसे मूढ़ता के काम करते हैं, प्रथम प्रथम कर्तव्य बनता है
- 35:31तुम्हारा अगर तुम्हारे पास कुछ हाथ का द्रव्य है तुम्हारे।
- 35:37इस मंदिर के बाहर वो भूखे बैठे हैं, इनकी हड्डियों को देखो तन पे
- 35:42कपड़ा नहीं, हड्डियाँ निकली हैं ये दूध इसको मिला दो आशीर्वाद
- 35:49मिले चेतन है इसके भीतर बैठा हुआ। और पाथर पर चढ़ा देते हो।
- 35:58ऐसा मल मल के नहाते हैं, उस पिंडी को क्या कहते हैं?
- 36:03बोल मत देना ये कालीश्वर है अरे भाई रोज़ काल के मुख में मैं जाता
- 36:11हूँ। काल के पास ही नवास है मैं खुद
- 36:16काल तुम अगर ढकोसले बना लो, धर्म के नाम पर तो परमात्मा क्या
- 36:28बोलेंगे? परमात्मा तुम्हें प्रताड़ित कर
- 36:34सकता है, किसी इन्स्ट्रुमेंट के जरिए वो कर रहा है लेकिन तुम समझ
- 36:39पाओ तो ना तुम समझते नहीं बहुत रूपों में आता है वो तुम्हें
- 36:46प्रताड़ित करता है पाखंडियों को, लेकिन तुम पाखंड छोड़ते नहीं।
- 36:52गदियाँ आगे की आगे सौंपे जाती है, समझ उसमें होती है चेतना जगती
- 36:59नहीं उनमें बुद्धों को तुम तिरस्कृत कर देते हो बुद्धओं को
- 37:09तुम गद्दी पर बैठा देते हो? फिर उस देश का विनाश ही होगा और
- 37:14क्या बुद्धि से लेके अस्तित्व तक राजपथ बन जाए?
- 37:27खाली तो शराब पिलाके? जितना कचरा होता भीतर देखो जितनी
- 37:34मवाद होगी उतनी ही निकलेगी ना डॉक्टर ने तो हीरा लगा देना, पीने
- 37:41मत लग जाना। मैंने पीने का विकल्प ढूंढा है,
- 37:46मैं तुम्हें पीने के लिए कभी नहीं करता।
- 37:50मैं कहता हूँ ज़ोर से क्रिया योग करो, सांस लो, लंबे लंबे कुंडली
- 37:57पर प्रहार करो। जब श्वास को बाहर छोड़ो तो हुंकार
- 38:01की आवाज के साथ श्वास को बाहर छोड़ो, दोहरी चोट पड़ेगी।
- 38:08एक चोट पड़ेगी तुम्हारी सहेस्त्र एक चोट पड़ेगी तुम्हारी कुंड और 1
- 38:18दिन तुम्हारा सारा अचेतन अवचेतन खाली हो जायेगा।
- 38:30खाली हो जायेगा तो रास्ता राजपथ बन जायेगा।
- 38:35कोई वादा नहीं होगी। बड़े मज़े से तुम भाग भी सकते हो,
- 38:40गाड़ी भी चला सकते हो, कोई बैग, कोई घंटा नहीं, कोई हम पे नहीं।
- 38:46संत ऐसा हो जाता है जो खाली न हुआ वह संत न हो जो भाई भरा पड़ा है।
- 39:02जिसने कहा तुम जानते हो न कौन वो भरा हो, मैं बात से भरा हो।
- 39:08फिर गुरु जी अपनी सारी विवाद निकालते थे और एक हाउस ऑफ लॉर्ड्स
- 39:13में पहुंचा। प्रश्न है तो मेरा संत के पास कोई
- 39:29बात कहने से वह परमात्मा के पास बात कैसे पहुंचा?
- 39:35क्योंकि। देर इस नो बैरियर बिटवीन बुद्धि
- 39:44से लेके अस्तित्व तक खाली है एम्प्टी है शून्य है।
- 39:49इसे ही नागार्जुन का शून्य बात करते हैं।
- 39:52समझाने वालों ने पता नहीं किस किस तरह से समझाती है।
- 39:59शून्यवाद है तुम भरे भरे चित्त हो तुम जो कहते हो न बाबा बोझ रहे
- 40:06हैं भरे भरे ऐसा लगता है जैसे कोई अज्ञात बोझ है ये अज्ञात बोझ
- 40:14सिर्फ़ तुम्हारे चेतन के भरने का। जैसे फूड़ा भर जाता है तो करता है
- 40:20ना चस चस रात को चस चस करता है वो क्या खून करता है कभी चस चस वह
- 40:28शुद्ध खून कभी चस चस करता है। मवाद का फूड़ा भरा हुआ ही क्यों
- 40:34करता है जब फूटने को होता है? क्योंकि पूरा भर गया होता है रेडी
- 40:41टु भ्रष्ट। अब इसने फूटन है तो सारी रात भर
- 40:45दुखेगा चस चस करेगा और वही तुम कहोगे बाबा दुख बहुत होता है।
- 40:53दुनिया में दुख होता है दुनिया में कोई दुख नहीं है तुम्हारी
- 40:56मावात से भरे हुए फोड़े में दुख है दुनिया तो बड़ी शांत है उसी
- 41:02में संत बैठा देखो मौज में बैठे और परले कुछ नहीं।
- 41:12हस्ते क्या हस्ते? क्या पहले कुछ नहीं है मलंग और
- 41:21फिर भी मुस्कराये ये जो छिन जाए सब तो संत को परवाह नहीं होती
- 41:30क्यों? वह जीते जी जान लेता है, ये मैं
- 41:34हूँ, उसके विचारों को तुम आगाज करोगे वह मुस्कुराएगा क्या
- 41:45तुम्हें तार्किक ढंग से समझाएगा क्योंकि वह जानता?
- 41:50विचार में उसकी भावना कभी आहट होती नहीं क्योंकि वो कोई भावना
- 41:59ही बनाता है। वह सत्य में जीने वाला इंसान
- 42:03कल्पना में भावनाओं में जीने वाला व्यक्ति नहीं है।
- 42:06संत संत जीता है सत्य में। गृहस्थी जीता है कल्पना में 2047
- 42:22में सबको मकान मिल जाएगा। सबकी रोटी सबका पेट भर जाएगा।
- 42:30विश्व में एक नंबर हो जाएंगे। यह कल्पना पर ये कुछ गलत नहीं कर
- 42:39रहे। यह चला जाएगा, जो दूसरा आएगा वो
- 42:42भी यही कुछ करने को है। डंक बदल जाएंगे, रंग बदल जाएंगे,
- 42:48शब्द बदल जाएंगे। ईमान नहीं बदले, जो राजनीति में
- 42:58चला गया। मैं पहले कहता हूँ वह दुष्ट है
- 43:03नहीं है, तो हो जाएगा। विकृत व्यक्ति, विकृत मानसिकता से
- 43:11युक्त व्यक्ति ही राजनीति में जाता है।
- 43:15संत व्यक्ति राजनीति में जाता ही नहीं।
- 43:20दुर्गंध उसके नास्ता पूठ सहन नहीं कर सकते।
- 43:27वह बागों में खेलने वाली चिड़िया क्यों जाएगी?
- 43:33गंदे नालों पे संत के पास कही हुई बात परमात्मा के पास सीधी पहुँच
- 43:45जाती है। देर इस नो ऑब्स्ट्रक्शन बिटवीन
- 43:47देम। सपाट मैदान है खाली रास्ते में
- 43:53कोई कूड़ा की तरह नहीं, सब हटा दिया गया अगर तुम किसी ढंग से
- 44:04इसलिए मैंने सबसे पहले क्रिया योग कहा क्रिया योग करके तुम ही तो
- 44:10हल्के होगे। बताने वाले को कुछ नहीं मिलेगा।
- 44:14इसमें बताने वाला सिर्फ चला जाएगा और करुणावश बोल के गया।
- 44:24बाबा ने मुझे 1976 में बताया 9 साल मैंने क्रिया योग किया और 85
- 44:31के। जो कहते हैं कि एनलाइटनमेंट होता
- 44:36नहीं, मैंने कहा तुम क्रिया योग फिर तुम मुझसे कहोगे बाबा होता
- 44:44है, अब मैं तुमसे कह रहा हूँ करो क्रिया योग करते क्यों नहीं?
- 44:52फिर शराब पीने की जरूरत नहीं होगी।
- 44:54तुम्हें सांझ फेकों तक जाने की जरूरत नहीं होगी।
- 44:57तुम्हारी पब, सूर्य जी डबते ही फेकों की तरफ नहीं जाएंगे, अपने
- 45:04भीतर उतरने को चाहिए। फिर उसकी याद आई।
- 45:12ईशान का खाया गया हुई। का ख्याल ला गया वो ही ज़िन्दगी
- 45:42का सवाल आ गया। हाँ वही ज़िन्दगी का सबला गया हुई
- 46:03शाम अंक। साँझ होते ही जब सूरज ढल जाता है
- 46:16तो तुम्हे ठेकों की याद आती है। संत अपने भीतर उतर जाता है तुम
- 46:24ठेकों में चली जाती हो? अपना भीतर खाली तुम्हारी कान में
- 46:35आवाज़ आई और तो कोई बैरियर नहीं रास्ते में सीधा परमात्मा से।
- 46:47जाकर बाहर लगेंगी। इसलिए संत एकांत में छुप के बैठ
- 46:57जाता है। दूर चला जाता है महलों से।
- 47:06जहाँ कहीं भीड़ भड़का, शोरगुल नहीं होता।
- 47:11शब्दों का तूफान नहीं मचता। जहाँ भीड़ की नारेबाजी नहीं होती,
- 47:18जहाँ जहाँ शांति है। आनंद की बरसात है शीतल ठंडी हवाएं
- 47:27बह रही हैं, कोई शोर नहीं है, ना बाहर, ना भीतर तुम्हारा मन बोलता
- 47:37है अगर तुम जाकर बाहर कुटिया में भी बैठ जाओ।
- 47:41चुप है चुप न हो भाई चाहे लाए रहा ले बता तुम होंटों को सी लो तो भी
- 47:50तुम्हारा मन बोलता रहता है और परेशानी तो मन की है के मन है के
- 47:57मानता है। ये बोले ही चला जाता है, बोले ही
- 48:05चला जाता है यही तुम्हारे दुख का कारण है और चस चस चस करता रहता
- 48:11है। ये फोड़ा है नवाज से भरा है।
- 48:17मत कहना मन बोलता है मैं तुम्हें सीधी सी बात बता देता हूँ।
- 48:23यह मवाद से भरा हुआ कैंसर आईटिस का पूरा है।
- 48:28इसको चीर दो, मवाद को निकाल दो। किसी अच्छे डॉक्टर के पास सर नाम
- 48:42जब कहने वाले तो तुम्हारे चेतन अवचेतन अचेतन को ओढ़ भरते थे।
- 48:55ठूंस ठूंस के भरते हैं। पहले से ही वो हो तो भरे।
- 49:05मुझे लोग कहते हैं अगर मैं जप लूँ तो मैंने कहा तुम्हारी आज़ादी,
- 49:11मैं कोई जप चैटर छोड़। तानाशाह थोड़ा मैं तुम्हारा
- 49:19तुम्हारे साथ हमदर्द है तुम्हारा हमदर्द हूँ, तुम्हारा सहानुभूति
- 49:26रखता हूँ तुम्हारे से तो बोलता हूँ मत जपो।
- 49:33पहले से ही तुम उल्टी करने को इतना खा लिया है तुम्हारा चेतन
- 49:40तुम्हारा अवचेतन तुम्हारा अचेतन भरा पड़ा है कूट कूट के भरा पड़ा
- 49:45है इसलिए तो थोड़ा सा कंधा लग जाता है।
- 49:50गुर चीफ का। और मवाद बाहर छलक पड़ता है।
- 49:54कोई यू नो हू एमआइ यह मवाद ही तो है बहुत जगह पे तुम्हारी मवाद
- 50:04निकलती है, कोई तुम्हारी दुखती रथ को छेड़ दे।
- 50:10तो तुम घंटों बोलते हो घंटों क्या बरसों तक बोलते हो, जन्मो तक
- 50:16बोलते हो, जब तक बीत नहीं जाते, ये मबाद भरी ही रहती है, दूसरे का
- 50:24इंतजाम मत करना, अपने फोड़े का इंतजाम कर लेना।
- 50:29यथा दृष्टि तथा सृष्टि तुम्हारा फूड़ा चस चस करना बंद हो जाए तो
- 50:34तुम दूसरे को दोष नहीं दोगे। दूसरे को दोष तो तभी दोगे जब तक
- 50:39तुम्हारा फूड़ा चस चस कर रहा है चस चस कर रहा है यह है का?
- 50:49संत भीतर बैठ जाए अकेला क्योंकि उसके भीतर कोई चस चस करने वाली
- 51:00मवाद नहीं है सुध कौन बेहतर? आनन्द की धरोहर है उसके पास चारों
- 51:10तरफ गुरुशन के लिए बगीचों की महक हवाएं ठंडी हैं।
- 51:24कितनी ही गर्मी हूँ। ठंडे मेघ हवाएं फेंक रहे, उसे कोई
- 51:36तकलीफ नहीं होती है। वह मज़े से एकांत में बैठ सकता
- 51:41है। लेकिन तुम तुम तो साथी ढूँढ़ते
- 51:44हो, तुम तो पार्टी ढूँढ़ते हो। तुम तो इकट्ठे ढूंढ़ते हो, तुम तो
- 51:56जमात बनाना चाहते हो, परिवार बनाना चाहते हो, समाज बनाना चाहते
- 52:03हो इसी समाज में तुम्हें खाना। समाज आत्मा को निगल जाता है।
- 52:13इतना तुमने जिगरा नहीं होता कि तुम समाज को उपेक्षित कर दो यह
- 52:21समाज ने? कितने अस्तित्वों को लिया है?
- 52:32समाज ऐसा जहर है जो खा लेता है। इसे वह तड़प तड़प के मर जाता है।
- 52:42जमीं खा गई आसमान कैसे कैसे? जमाने ने मार जमा, कैसे कै जमीन
- 53:14खा गई आसमान कैसे? कैसे जमाने के मारे जमा कैसे के?
- 53:33मैं गोडसे का कसूर नहीं मानता। गोडसे के राह भी हूँ।
- 53:39पथ प्रदर्शकों को जिम्मेदार माना उनचालीस वर्ष का ये नौजवान सही
- 53:46राह पकड़ लेता, सबर करना मिलता। इसकी जिंदगी में ये अपने भीतर छू
- 53:51लेता। साहस की जरूरत होती, साहस इसके
- 53:57पास है। घोट्सों को पूजा नहीं चाहिए मेरी
- 54:04बात सुन गोट्सों को साहस छर और साहस ही एक वो लक्षण है।
- 54:13एक वो गुण है जो तुम्हें अपने आप तक।
- 54:17छलांग मारने के लिए प्रेरित कर सकता है।
- 54:21निर्भर व्यक्ति छलांग नहीं लगा सकता।
- 54:25काश गोडसे को से ही घुरकर गया होता सावर करना मिला होता ऐसे लोग
- 54:33दूसरे के कंधों पे रखकर बंदूक। खुद से बजाते हैं और चढ़ाया करते
- 54:39हैं, खुद बच जाते हैं लेकिन बचते कहाँ हैं?
- 54:43मुझसे लोग पूछ लेते हैं परमात्मा का विधान समझ नहीं आया?
- 54:512,50,00,000 लोग मार दिए तड़पा तड़पा के गैस चैंबरों में हिटलर
- 54:56ने और इसको ज्यादा से ज्यादा कानून फांसी दे सकता है।
- 55:05वह सुसाइड कमिट कर दिया, बड़े आराम से मर गया।
- 55:09तो फिर इसको फल मिला कहाँ? मैंने कहा अगर इसको फल दे भी देते
- 55:15तुम मुसोलनी को तुमने फल दे भी दिया तो क्या दिया?
- 55:20पांच चार गोलियां मार दीं, लेकिन 2,50,00,000 बार फांसी लगना चाहिए
- 55:27ये बच्चे? इतना कम दुष्कर्म नहीं है इस
- 55:34व्यक्ति का और तुम्हारी कानून की व्यवस्था 2,50,00,000 बार दंड दे
- 55:46ही नहीं सकते। क्योंकि पहली बार वह मर जाएगा।
- 55:52दूसरी बार तो फांसी लटकाना महज एक औपचारिकता ही रह जाएगी।
- 55:58इसलिए तुम्हारे बस की बात नहीं है।
- 56:03वह उसके बस की बात है, जिसकी मैं बात करता हूँ और वह।
- 56:07वह वह है, यह कोई कबीर ही बोल सकता है, मैं भी इस पे स्टेम्प
- 56:22लगाता, तुम कहते कागज की लेखी और मैं कहता आंख।
- 56:32मेरी ये बातें शास्त्रों से नहीं मिलेंगी आपको मेरी ये बातें वहाँ
- 56:38से आती जीसको तुम खोज दो के वो है ये जो बोल रहा वो है वही तो बोल
- 56:48रहा हूँ। वही तो मेरे फेफड़ों में, मेरे दल
- 56:54में मेरे दिमाग में प्रवेश करता है और सारा वही तो बोलता है
- 57:02अल्फाज़ उसके भाग, उसके शब्द, उसके पदार्थ, उसका
- 57:09इंस्ट्रूमेंटेशन। व्यक्ति का तो कुछ होता नहीं तो
- 57:18तुम तो 2,50,00,000 बार इसको फांसी नहीं किया, इसको ये टुंडे
- 57:23पागे अंधे वे कल, परसों किसी अंधे का?
- 57:31क्योंकि तुम अंधों को ज्यादा मान देते हो, कोई चला कोई शंकराचार्य
- 57:37बोले कोई प्रेमानंद के बारे में अंधा तो हो गई है, जो बिना देखे
- 57:43बोले वो अंधा ही होता है। तो अंधे अंधों पर कमेंट कर देते
- 57:50हैं और दूसरे अंधे नाराज हो जाते हैं, लेकिन कमेंट भी अंधा करता
- 57:56है, अंधों के प्रति करता है और नाराज भी।
- 57:59अंधे होते है ये बड़े मज़े की बात है अजीब खेल अजब तेरी दुनिया अजब
- 58:05तेरे खेल। छछूंदर के सिर में चमेली का तेल,
- 58:12चमेली की बात है? खैर ये खेल चल रहा है।
- 58:16मुझे बाबा कहते हैं मैंने बहुत बार मैं अंधा उसे करता हूँ जन्म
- 58:25से। या हुशने से कर जिसने व्हिटलर
- 58:32जैसे गुनाह किया और एक जनम जन्मो जन्मो तक, मैं उसे अंदर रखता हूँ,
- 58:39बोका कमाल हो के। वाकई बड़ा जबरदस्त दंड है आंख गयी
- 58:47जहान। खया ना ये देखेगा लेकिन अंधे
- 58:55अंधों का गुणगान करते हैं चरण दो दो के पीते हैं चरणों में क्या
- 59:02भाई? चरण राज्य है तो राज्य तो यहाँ से
- 59:09उठा लो और पी लो पानी में घोल के इसी राज्य पे फिसल गया है और फिर
- 59:15ज्योति पहन रखी है इसने राज्य कहाँ आएगा?
- 59:18चरण रज नहीं है। ये ज्योति रज है।
- 59:22जुपी के लगी हुई रजि आई अंधे अंधों को मान देते हैं संत का
- 59:32बाहर खोपड़े भीतर परमात्मा जिसे कृष्ण कहते हैं।
- 59:42अपनी प्रज्ञा में सिद्ध हो जा अर्जुन खाली होता है सब आवाज
- 59:51निकलता है गंद वंद निकल गया फिर कह दो शब्द मवाद।
- 1:00:00राधे हो राम हो पांच नाम हो कोई भी नाम हो सत्य नाम हो वह गुरु हो
- 1:00:09अल्लाह हो कुछ शब्द फिर सुनना शब्द मवाद।
- 1:00:19आज नहीं कल तुम्हे तकलीफ देंगे जितना जपोगे उतनी मवाद इकट्ठी
- 1:00:26होगी ये चस चस करेगा कूड़ा 1 दिन जब भर जाएगा और तुम कहोगे बाबा हम
- 1:00:33दुख ही हैं। दुख का कारण यही है आज तुम्हें
- 1:00:38बचाती है अगर तुम सुन सको तो अच्छी बात है मैंने तुम्हारा रोग
- 1:00:48तुम्हें बता दिया जो मूल रोग है शब्द मबाद।
- 1:00:55फिर शब्द तो शब्द होता है तो किसी को गाली निकाल दो तो शब्द है वो
- 1:01:00किसी को प्रशंसा कर दो तो शब्द है स्तुति कर दो, निंदा कर दो तो
- 1:01:06शब्द है, मवाद है, राम राम कर लो तो मवाद है।
- 1:01:17यह आध्यात्मिक मनोविज्ञान इस पर जो चला, जिन्होंने खोजा धन्यवाद,
- 1:01:28वही पा सकेगा किनारे बैठ कर कपे कपे।
- 1:01:35मैं वो पूरा बूढ़ा डरा गयो किनारे बैठ तुम सत्य को न जान पाओगे,
- 1:01:41गहरे उतरना पड़ेगा समुद्र में छलांग लाना पड़ेगी, साहस बटोरना
- 1:01:47होगा, डूब जाऊं, मर जाऊं कोई बात नहीं, इतना साहस जिसमें है।
- 1:01:54वो आए जो घर वारे आपने चले हमारे साथ ये तो।
- 1:02:33सीतलीधर सीतलीधर सीतलीधर। घर मेरे आ जय तो पिया मिलन की
- 1:03:02चाल, जय तो पिया। मिलन की चा संत खाली होता है तुम
- 1:03:16भरे हो वह तो तुम इतने भरे कि वह खुद भी उतरना चाहे तो नहीं उतर
- 1:03:23सकता यू अरे टू मच बीज़ी तुम व्यस्त हो मैं रोज़ कहता हूँ।
- 1:03:29तुम इतने भरे पड़े हो कि उसके आने की भी जगह बाकी है।
- 1:03:35तुमने द्वार, दरवाजे सब बंद कर दिए।
- 1:03:39तुमने थोड़े से सुराख भी तो नहीं छोड़े, जिसके भीतर से उसकी रौशनी
- 1:03:45प्रवेश हो सके। और फिर तुम कहते हो कि अँधियारा
- 1:03:49घना घना होगा जब तुमने कोई द्वार दरवाजा खोला नहीं छोड़ा और सब
- 1:03:59सुराख बंद कर दिए, सब से बंद कर दिए रोशनई आएगी कहाँ से?
- 1:04:07फिर तुम कहते हो ये धरा घना सा रहा शब्द मवाद है, शब्दों से ही
- 1:04:22गाली बनती है। शब्दों से ही परमात्मा का नाम
- 1:04:27बनता है। दोनों ही मवाद है, शब्द ही
- 1:04:35परमात्मा का नाम बनाते हैं और तुम आस्पवस्त हो जाते हो।
- 1:04:39तुम्हारा अहंकार संतुष्ट हो जाता है कि मैं तो पाठ करके आया हूँ।
- 1:04:46ये तो शुभ है लेकिन बाबा कहते हैं चुप है चुप ना हो जे लाए रहा
- 1:04:53लिवतार जे तुम्हारा मन बोलता रहा तो चुप ना हुआ तुमने परमोन में
- 1:04:59जाना है, परम चुप्पी में जाना है। चूक हुई है।
- 1:05:05कहने सुनने में चूक हुई है या इन लाल की लोभी पंडितों ग्रंथियों ने
- 1:05:14जानबूझ कर चुकी है जो नाम का अर्थ बदल दिया है।
- 1:05:20जब के बाबा साहब कहते हैं। जेता कित्ता देता?
- 1:05:25नाम है जितना पसारा है उसको मैं नाम कहता हूँ और उसी नाम को जब ये
- 1:05:35पसारा देख और उसका ध्यान कर देख ये किसी ने बनाया।
- 1:05:41बेना ना ही इज़ प्रेज़ेंट एवरीवेयर ईशा वस्य मिथम सर्वम यत
- 1:05:47किंची जगत के हम जगत कौनसा ऐसा शास्त्र है जो कहते है नाम से
- 1:05:52बताओ कोई शास्त्र है? क्या होगा तो पंडितों का अजहर मिल
- 1:05:59होगा। मूर्खों का नर्मित होगा और उनमें
- 1:06:04कोई निहत्वास होगा। अँधेरा घना छा रहा।
- 1:06:16तेरा इंसान घबरा रहा और शब्दों का अर्थों का अनर्थ हो रहा है संभलो
- 1:06:31ये अँधेरा घना छा रहा। तेरा इंसान घबरा रहा हो, हो रहा
- 1:06:48बेखब कुछ न आता नजर। सुख का सूरज छुपा जा रहा है तेरी
- 1:07:05रौशनी में जो दम तो अमावस्या को कर दे।
- 1:07:15ओणम तो अमावस को कर दे पूनम नेकी पर चलें और बदी से टलें।
- 1:07:34बाकी हँसते हुए निकले दम है मालिक तेरे बंदे हम।
- 1:07:51जो आवाज़ संत के कानों में पड़ेगी, वह सीधी परमात्मा के पास
- 1:07:57पहुँच जाएगी, उसे ही अरदास कहते हैं।
- 1:08:02तुम अरदास करते हो, करवातें हो लेकिन इनके अचेतन मन तुम्हें पता
- 1:08:09नहीं भरे पड़े। तुम्हारी अरदास भीतर जाएगी कहाँ?
- 1:08:14परमात्मा के तल को छूएगी कैसे? क्योंकि मन तो भरे पड़े हैं गंदगी
- 1:08:23जो सरोवर कीचड़ से भरा हो, तुम आशा कर सकते हो।
- 1:08:31तो उसमें से कुछ चीज़ ढूंढ निकालो।
- 1:08:37गंदगी से भरा हुआ ये तालाब सरोवर पहले साल करना होगा, फिर इसमें जल
- 1:08:46भरना होगा। फिर वो जल पीने के।
- 1:08:50का काम रहेगा। इसलिए संत के पास की हुई पर्याप्त
- 1:08:56परमात्मा के पास पहुँच जाती है और परमात्मा उसे सुन लेता है और
- 1:09:02परमात्मा तुम्हारी कष्ट को हर। हार लेता है इसलिए उसका नाम रखा
- 1:09:14है हरी जो हार ले तुम्हारे दुखों को हर्ष धन्यवाद।