Latest / Baba ji Vijay Vats / 18 Jan 25 - क्या परमात्मा है? अगर है तो दिखाई क्यों नहीं देता? सबसे बड़ा पुण्य क्या है?
Transcript
- 0:16वह नजर क्यों नहीं आता? आभा और मन्नू इलाहाबाद।
- 0:38आंखें नहीं हैं। आँखों के बिना वो नजर नहीं होता।
- 0:49अगर उसे देखना है तो आंखें पैदा करो।
- 0:58तुम कहते हो वो है नहीं ठीक कहते हो सत्यवादी हो ईमानदार लेकिन मैं
- 1:13कहता हूँ आँखें नहीं। आँखें नहीं है तो वह दिखेगा अपने
- 1:25और आँखें। ये वो आँखें जो जन्मजात मिल जाती
- 1:31है वो आँखें नहीं है। ये आँखें तो पैदा करनी होती हैं,
- 1:39बस यही तुम्हारी मशक्कत है, इन आँखों के बिना कुछ दिखाई भी नहीं
- 1:48पड़ेगा। दिखाई तो पड़ता है।
- 1:59देखने के लिए आँखों का होना जरूरी है यही मजनू ने कहा।
- 2:06शहंशाह ए आलम से शहंशाह बोले। लैला को मैंने बुलाया था मजनूं तू
- 2:21गलतफहमी में है और मुझे तुझ पे तरस आता है ये सुंदर जवानी।
- 2:33ये ऊंची काठी लम्बा कद, गोरा बदन शुडोल काया, ये उसके योग्य नहीं
- 2:44है। राजा बोला मैंने वो लड़की देखी।
- 2:52देखी है लैला काली कलूटी है ठिगनी है कुछ भी तो नहीं।
- 3:01है। तुझे गलतफहमी हो गई है।
- 3:07मजनू तू एक बार फिर से देख ले। मैंने उसे देखा है मजनूं अवश्य ही
- 3:20तुने गलती खाई है, मजनू बोला राजा।
- 3:28तुने लैला को राजा की आँखों से देखा है?
- 3:35लैला को देखने के लिए मजनू की आँखें चलीं राजा की आँखों से लैला
- 3:43का सौंदर्य दिखाई नहीं पड़ता। तुम कहती हो आभा मन्नू वह दिखाई
- 4:00क्यूँ नहीं भरता? आँखें नहीं आँखें पे थूकर।
- 4:15और ये जन्मजात नहीं, मिलती जन्मजात मिलती है लेकिन खोलती
- 4:21नहीं है। खोलनी तुम्हें पड़ती है इस आंख को
- 4:31जगा लो। तो वह सब कहीं दिखाई पड़ेगा।
- 4:41आज कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता, फिर सब जगह वो ही दिखाई पड़ेगा जिधर
- 4:48देखता हूँ उधर तू ही तू हर झर्रे में तू ही तो रुबरु?
- 4:58सोच ज़रा जे सूरज रब बना दाना अँखियाँ सो हुंदियाँ नजर खुजियाँ
- 5:10दाना तुम कहोगी की आँख तो है मेरे।
- 5:15पास। सोच ज़रा जे सूरज रब बणो दाना
- 5:23अँखियाँ सो हुंदियाँ नजर कुछियाँ दाना पर।
- 5:31भगत निरा लेने पर भगत निरा लेने पथरा चोला बुलंद ने जड़?
- 5:50अँखियाँ वाले ने पत्थरा चोला बुलंदे ने झड़े अँखियाँ वाले ने
- 6:05इन आँखों से दखाई, नहीं पड़ेगा तुम कौड़ी, आँखें तो हैं।
- 6:14वो आंख पैदा करेगी तो दिखेगा मिलती तो है वो आँखें जन्मजात
- 6:27लेकिन जगानी तुम्हे पड़ेगी। पत्थरा जो लब लेन देन है जड़े
- 6:34अँखियाँ वाले में ये उस आंख की बात हो रही है जिससे परमात्मा दिख
- 6:40जाता है और जो कहते हैं कि होता नहीं परमात्मा, वो ठीक कहते हैं।
- 6:56क्योंकि उनकी आँख जगी अंधे को जीस घड़ी आँख मिल जाएगी उस घड़ी को
- 7:05इंकार न कर सकेगा, वह देखेगा सूरज की रौशनी वह देखेगा सूरज की रौशनी
- 7:13में चमकती हुई यह दुनिया। इस संसार का सौंदर्य, फूलों के
- 7:20रंग, खिलती हुई धूप और छाया का खेल।
- 7:29लेकिन तब तक न दिखेगा जब तक आँख न मिले।
- 7:38आंख पैदा करो अगर आँख पैदा हो गई तो पत्थरों में भी वही दिखाई
- 7:46पड़ेगा पत्थरों से लब लेन देनें। जड़े अँखियाँ वाले ने तुम
- 7:59परमात्मा की फिक्र मत करो तुम संतों के वचनों पर यकीन करो, वो
- 8:08है। हमको किसी पागल कुत्ते ने काटना
- 8:15है जो हम बेवजह रोज़ बोलते हैं ना ही बुद्ध को काटा था महावीर को,
- 8:27ना ही शंकर को वो है। और हमारी वाणी की मिठास जो लिवड़
- 8:44तेबड़ के आई उस परमात्मा के साथ वो तुम्हें झूमने पर विवश नहीं
- 8:52करते। वो तुम्हें मस्त नहीं बनाती और
- 9:03तुम्हारे भीतर कोई खलावट नहीं पैदा करते।
- 9:12जीस एक बेहोशी के आलम में जाने के लिए तुम रोज़ सांझ शराब का सेवन
- 9:20करते हो, हैरानी की बात है कि तुम खुद उसके सागर हो, आदमी कितना
- 9:30करके आया है। कितने निमन सत्र को छू लिया है
- 9:35आदमी की चेतना ने कितना गिर गया है उसे दिखाई दो घड़ी की बेहोशी
- 9:57के लिए। उसे बाहर की शराब का सहारा लेना
- 10:01पड़ता है और वो खुद शराब का दरिया है।
- 10:08वो खजाना है और चुगता भरता है कंकड़ पत्थर।
- 10:17हीरे मोतियों का मालिक है, इसे क्या कहें, अंधापन कहें या भाग्य
- 10:29हीनता कहें, भाग्य हीनता कहें। कब तुम भाग्यशाली हो जाओ कब तुम
- 10:44भगवान हो जाओ, कब तुम्हारा भाग्य चमक जाए, कब तुम्हें आँखें मिल
- 10:49जाए और उन आँखों से नेत्रों से तुम निहार लो।
- 10:55उसकी सौंदर्य पर दिमाग को उसकी झरती झरती मूर्ति से करुणा रस को
- 11:09तुम लोग अपनी आँखों से देख लो। और उसकी माधुरी को पी लो, यही तो
- 11:17बाबा कहते हैं, सुनिए दुख पाप का नाश तुम अपने पापों से दुखी हो,
- 11:29पाप गलत मान्यताओं को मैं पाप कहता हूँ।
- 11:35मान्यता सही हो तो कुछ भी पाप न बस तुम अपने आप को जानो मैं हूँ
- 11:41कौन यही पुण्य है? दूसरा कोई पुण्य इस संसार में है,
- 11:47बाकी सभी पाप है, खुद को जानना ही पुण्य है।
- 11:55और खुद को जानना होता है, खुदी में आकर दूसरे का समृद्ध करने से
- 12:05खुदी का समर्द्ध नहीं होता। तुम खुद में उतर जाओ, गहरे चालांग
- 12:10ले लो तो लुत्फ आ जायेगा। आनंद की वो बहार तुम्हारे रोये
- 12:20रोये को घेर लेते है एक तूफान से घर जाओगे तुम आज इस बूंद के लिए
- 12:29मारे मारे फिर। और बड़े अफसोस की बात है, उसी
- 12:41अमृत का सागर हो तुम क्या कहने तुम्हें?
- 13:05उस मधुवन में निकल जाओ, जहाँ राधा नाचती है, राधे राधे बुक करो।
- 13:19मधुवन में राधिका नाचे रे मधुवन में राधिका नाचे रे गिरधर की।
- 13:39मुरलीया बाजरे गिरधर की मोरलिया बाजरे मधुवन मेरा धिका नाच।
- 13:57रे मधुबन में राधिका नाचेरे उसको नाचते हुए देखो चेतना कितनी
- 14:13प्रसन्न है खुशी के आलम से शर्म? राधा नाचने पे विवश हो जाती है,
- 14:24ऐसी ही मीरा नाचती है, क्यों नाचती है चैतन्य से जब भर जाती है
- 14:35तो राधा नाचती है, राधा चेतना को कहते हैं।
- 14:40और उसे जपना नहीं पड़ता, उसे पीना पड़ता है।
- 14:47शराब, शराब, शराब एक जपने से तुम्हें मदहोश ही नहीं आती?
- 14:57ये तो गटकनी पड़ेगी गले से नीचे, तभी आएगा सुरूर तभी आएगा आनंद तभी
- 15:05तुम झूमोगे तभी राधिका नाची मधुबन में रास रचा महा रास रचाती है वो
- 15:15चेतना? तुम कहाँ सूख गए हो किन मूर्खों
- 15:24के आलम में गिरे हो तुम कोई साथ नहीं तुम्हारी ज़िन्दगी में भटके
- 15:32भटके तड़पे, तड़पे। तप्त गर्मी की सुर्खित विस्मय तुम
- 15:45जी कैसे रहे हो? हैरानी ये नहीं है।
- 15:55कि वह दिखता नहीं। हैरानी ये है कि तुम जी कैसे रहे
- 16:00हो उसके बिना तुम अपने बिना जी रहे हो।
- 16:08संतों की नजर से देखो। मजनूं की नज़र से देखो तो लैला
- 16:15नज़र आएगी। सन्तों की नज़र से देखो तो सब जगह
- 16:21तुम ही तुम हो नज़र तुम्हारे पास है।
- 16:30जो गाँव है जो गाँव से तुम बोल देते हो, वह तो है नहीं।
- 16:39कितनी बेचीदगी है तुम्हारी ज़िन्दगी में?
- 16:46बड़ी हैरानी होती है। कभी कभी हम भी उसी आलम से गुजरे,
- 16:54हमने भी उन्हीं गलियों की खाक छानी।
- 16:59हमने भी मुँह सिर लबेड़ा हम भी कभी मूर्ख थे।
- 17:10लेकिन बहुत सौभाग्यशाली क्षण आया। वह बरसा और ऐसा बरसा मूसलाधार बन
- 17:19के बरसा और बरसा और फिर रुखा ने। रोज़ बरसता गया।
- 17:29आज भी बरसा अब भी बरस रहा है। मुझे लोग कह देते हैं बाबा यहाँ
- 17:38लगातार बैठे बाहर जी नहीं करता। भला इस बरसते हुए आलम में
- 17:49तुम्हारे रेगिस्तान का स्वाद कौन चखना चाहेगा?
- 17:55ये भीगी भीगी सिरा है। ये अमृत की बरसती हुई छलकती बूंद
- 18:00है। इनको कौन छोड़ना चाहेगा?
- 18:07या तो गृहस्थी नहीं होगी, तुम कृत्रिम उपाय कर लेते होगे,
- 18:17अन्यथा कोई कारण नहीं। इस अमृत को बरसते हुए छोड़ कोई
- 18:25बाहर जा के हिल स्टेशनों को देखे यह संभव कैसे है?
- 18:40कबीर कहते हैं अमृत जल रहा है, नाचो भगतो और खुद नाचते हैं।
- 18:52भक्तों को कोई पता नहीं है। अमर तो होता क्या है ये भी पता
- 18:57नहीं, लेकिन नाचते हैं बस यही तुम्हारा हाल है, तुम कहते हो
- 19:05दिखता नहीं। संत कहते हैं वो ही तो है, कहाँ
- 19:12तालमेल बैठेगा? तुम दोनों में यही तालमेल बैठेगा।
- 19:20आंख पैदा कर लो अगर आंख नहीं तो कुछ नहीं।
- 19:28अगर आंख है तो सब कुछ है, हमें तो दर्शाया है बेबसी के उस आलम में
- 19:39हमें तो तरसा आया अपने होने पर है।
- 19:48और इस बेबसी के आलम से बाहर निकलने का मन भी हुआ।
- 19:57दृढ़ संकल्प भी हुआ नहीं रहेंगे हम इस आलम में।
- 20:06बस पुकारना रहो, 1 दिन वो कृपा करते, बाबा ने कहा इस रस को पीते
- 20:18रहो, सुनिए दुःख पाप का नाश एक एक बूँद इकट्ठे हो गए, घड़ा भर
- 20:24जाएगा। जैसी संगत वैसी रंगत संगत संत की
- 20:33करोगे तो बूंद झरेगी और बूंद झरेगी बूंद बूंद से घड़ा भर
- 20:39जाएगा। सुनने का यही तो मज़ा है, जैसा
- 20:48सुनोगे वैसा सुन सरकार बनेगा। संतों की वाणी का मिठास तुम्हारे
- 20:55भीतर जमा होता है ध्यान रखना इस बात का।
- 21:04संतों की वाणी का मिठास भी जमा होता है और ईर्ष्या की आग भी जमा
- 21:11होती है। भीतर घड़ा तब भी भरता है तब भी
- 21:16विस्फोट होता है और अमृत के भरा कुंड वह भी विस्फोट करता है।
- 21:24चुनना है तुमने तुम क्या चुनो तेरी आंखो के सिवा दुनिया में
- 21:43रखा। क्या हैं तेरी आँखों के सिवा
- 21:52दुनिया में रखा क्या हैं ये ये उठे सोहा चले।
- 22:05ये ढ ले शामझ ले मेरा जीना मेरा मरना इन्हीं पलकों के तले।
- 22:22तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है?
- 22:33यह उठे सुआचल? ये झुके शाम ढले मेरा जीना मेरा
- 22:47मरना, इन्हीं पलकों के तले तेरी आँखों।
- 22:58इन आँखों के सवा दुनिया में रखा क्या है?
- 23:07अपनी जिंदगी का ये ध्येय बना लो इन आँखों को पैदा किए बगैर इस
- 23:15संसार से रुखसरत होना नहीं और रखा भी क्या है?
- 23:23बस ये आँखें ही हैं इनके सिवा और कुछ है भी नहीं।
- 23:30एक चरम चक्षुओं से तुम्हें जो चीज़ दिखती नहीं वो उस आंख से दिख
- 23:35जाती है और उस आंख से वो नजारे दिखते हैं।
- 23:40ये तुमने कभी कल्पना में सोचा नहीं होता है तुम जब देखोगे तो
- 23:47पाओगे अरे ये तो कल्पना की मूर्त में कभी आया नहीं ध्यान रखना
- 23:55कल्पना की मूर्त में सिर्फ वही चीजें आती हैं।
- 23:59जो तुमने प्रत्यक्ष देखी होगी, तुमने किसी को प्राइम मिनिस्टर
- 24:04बनते देखा होगा, फूलों की जड़ी लगती देखी होगी बरसात तो तुम भी
- 24:13यह कल्पना सजा दोगे, काश मैं भी बन जाऊं।
- 24:18जो तुमने देखा नहीं होता वह तुम कल्पनाएं कर सकते हैं।
- 24:23कभी न कभी तो देखा ही होगा अन्यथा कल्पना नहीं होती, लेकिन एक जक्षु
- 24:35वह भी है। जिससे वो दिख जाता है जो तुमने
- 24:40कभी देखा नहीं, किसी जीवन में नहीं देखा, कितने धर्म हुए आज तक
- 24:50तुमने उसका रस, एक बूंद का रस, उसका स्वाद चखा नहीं।
- 24:59और ये दुखद है। सबसे दुखद घटना अगर कोई है जंतगी
- 25:08में तो यही है तुम सागर हो अमृत का।
- 25:16और सागर बूंद के लिए तरस रहा है। ये विडंबना भी है।
- 25:22ये दुखद भी बहुत है। संत को ये सोचकर भी दया आती है,
- 25:29करुणा आती है, उसका हृदय व्यथित होता है।
- 25:36मेंगोरी तू कम तू हमार आ। में गोरी तू कांत हमरा में नदिया
- 26:03तू मेरा किनारा में गोरी तू। कंत हमरा मैं गंगा तू मेरा किनारा
- 26:22अंग लगा लो, प्यास भुजा दो। अंग लगा दो, प्यास बुझा दो, गंगा
- 26:36होकर प्यासी हूँ मैं मन की प्यास बुझाने।
- 26:46आई मन की प्यास बुझाने आई नदिया बनकर प्यासी हूँ तो है मेरा।
- 27:06प्रेम देवता तू है मेरा प्रेम देवता, नदिया होकर प्यासी हूँ मैं
- 27:22अंग लगा लो। प्यास बजा दो नदिया होकर प्यासी
- 27:31हूँ मैं लोगों की प्यास बजाने वाली गंगा खुद प्यासी है एक अजूबा
- 27:42हमने देखा। जल में रह के मेन है प्यासी कबीर
- 27:49ऐसे ही नहीं व्यतीत होते हैं। कबीर कहते हैं ये अजूबा है, ऐसा
- 27:57होना नहीं चाहिए लेकिन है इसलिए अजूबा है, जल में रह के।
- 28:05में नहर प्यासे और तुम तो समुद्र हो, अमृत कहें और अमृत आनंद से
- 28:20भरा होता है। और तुम आनंद की एक बूंद के प्यार
- 28:26से हो, यह हैरानी नहीं है, विस्मयजनक बात नहीं है, बिलकुल है
- 28:37अगर कोई चमत्कार है इस संसार में तो यह चमत्कार है।
- 28:45कि तुम अमृत के समुद्र हो और तुम एक बूंद के प्यार से हो।
- 28:55इस से बड़ा कोष अहमदाबाद हाँ कबीर भी कह देते है।
- 29:05कि ये अजूबा है, जल में है, मीन और प्यासी है।
- 29:13अंग लगा दो प्यास भुजा दो। अंग लगा दो, प्यास बुझा दो गंगा
- 29:26हो कर यहाँ सी हूँ मैं, मैं गंगा हूँ पतित पावनी गंगा।
- 29:40लोगों की प्यास हो जाती है लेकिन खुद प्यासी बस यही हाल तुम्हारा
- 29:49है, तुम अमृत के सागर हो। और भीतर से दो जुड़ी बात यह है एक
- 30:01बूंद के पैसे कहा नहीं ढूंढा तुमने बड़े दुःख की बात है,
- 30:15गद्दियों में ढूंढ़ते हो। काश गद्दियों में मिल जाता धन के
- 30:25अम्बार लगाते हो, हिमालय बना देते हो काश धन मैं मिल जाता पांव
- 30:34बुझवाते हो। संसार का चक्कर लगाते हो?
- 30:41लोग पांव दो दो के पीते हैं लेकिन चैन नहीं मिलता।
- 30:46काश मान सम्मान में वो मिल जाता। दुनिया भर के पदार्थ इकट्ठे कर
- 30:54लेते हो, बेचैनी बनी ही रहती है। काश वो पदार्थों में ले जाता।
- 31:07कितनी दयनीय दशा हो गई है तुम्हारी।
- 31:13और तुम्हें तो तरस नहीं आता संत को तरस आता है संत तुम्हारी इस
- 31:21दयनीय दशा को देख कर रोता है, तुम सोचते होगे।
- 31:29कि संत को क्या लालच है, संत क्यों बोलता है?
- 31:35और तुम तो बोलने के पैसे लेते हो तुम तो ब्लैकबोर्ड पर आने की घिस
- 31:41लेते हो, यह तो गाय ही चला जाता है।
- 31:47बेकरार दिल तू गाये जा बेकरार दिल तू गाये जा खुशियों से भरे।
- 32:05ये तराने जिसे सुन के दुनिया झूमोठे और झूमोठे दिल दीवाने
- 32:21बेकरार दिल। तू गाये जा वह गाता चला जाता है
- 32:32काश ये गाने के महक तुम तक पहुँच जाए जहाँ से उठा ये संगीत उसकी
- 32:39थोड़ी सी लहर तुम्हारे कानों में पड़ जाए और तुम्हारे हृदय को।
- 32:45छू जाए और तुम्हारा हृदय जाग जाए। तुम सोया हुआ सुख हृदय लिए लिए
- 32:54फिरते हो, तुम दुखी हो, तुम्हारे दुख से संत दुखी होता है, तुम
- 33:05नहीं तुम तो दुखी हो। तुमने तो सभी कड़ी कुंचे तलाश
- 33:12लिया है, कहीं नहीं मिला, कहीं नजर नहीं आया और तुम्हारी दशा पे
- 33:19संत दुखी होता है। संत हृदय नवनीत सम्मान वे पिघल
- 33:24जाता है। वैसे चिल्लाता है, वह पर्यटन भी
- 33:29करता है। बस ये बोलना उस पर्यटन का अंश है,
- 33:35उस पर्यटन का हिस्सा है। कहीं आवाज़ तुम्हारे कानों में
- 33:40पड़ जाए और तुम्हारा हृदय सुख जाग जाए।
- 33:47और तुम्हारा सुप्त हृदय इस आँख को जगाने में लग जाए तो क्या मज़ा
- 33:58आएगा जब वो आँख खुल जाएगी वो रास से पीओगे तुम अधूरे का?
- 34:10जिसकी तुमने कभी कल्प नहीं किये थे, ऐसे दृश्य तुमने सोचे न थे,
- 34:16तुम तो छोटे से दृश्यों से सांसारिक हिल स्टेशनों से हिल
- 34:19जाते हो, वैसे तो हिल स्टेशन हिलने के लिए ही होते हैं।
- 34:26तुम्हारा मन हिला हिला से रहता है।
- 34:29चलो हिल स्टेशन चलो, तुम इतनी सी बात से है इन पत्थरों को देखकर
- 34:39हिल जाते हो जो हिलने की चीज़ है वहाँ पहुंचते हैं वह मनोहर दृश्य।
- 34:50वह आभा से भरा हुआ वह सुन्दर वर्ग जब तुम निहारोगे तो मंत्र मग दो
- 35:05जाओगे दो घड़ी के लिए। तुम्हें पता नहीं लगेगा तुम कहाँ
- 35:14हो समय ऐसा वचलित हो जाएगा कैसे समय होता ही नहीं तेरे पास आते
- 35:32मेरा वक्त गुजर। जाता है तेरे पास आके मेरा वक्त
- 35:46गुजर जाता है दो घड़ी के लिए। गम जाने किधर जाता है तेरे पासा
- 36:02के मेरा बात गुजर जाता है दो घड़ी के लिए।
- 36:12गम जाने किधर जाता आता है तेरे पास आके वहाँ जाकर वक्त भी गुजर
- 36:24जाता है वहाँ जाकर अमृत की बूँदें भी पीने को मिलते हैं।
- 36:32वहाँ जाके ठहर जाता है, सब रुक जाती है।
- 36:36ये हवाएं जो जहाँ हैं स्टिल मूर्ति की तरह जब मंदिर की
- 36:44मूर्तियां हमने स्थापित की, उनसे हमने कोई सब करने सीखा।
- 36:50ये इस बात का इशारा था इंगित था सिम्बोलिक रिप्रजेंटेशन
- 36:56अब्रीविएशन कि देखो इसकी तरह तुमने सित्र बनाए जैसे जे मूर्ति
- 37:06सित्र है। ऐसे तुम अंतःस्थित रहो कितना मज़ा
- 37:14आएगा जब तुम उस स्थिति प्रज्ञा की अवस्था में ठहर जाओगे उस दिन तुम
- 37:23एक मात्र पुण्य घुमाओगे उससे पहले तुम सभी प्राप्त कर रहे हो।
- 37:28राम राम जप रहे हो राधे राधे जप रहे हो अल्लाह अकवर कह रहे हो
- 37:33वाहे ग्रुप सतनाम कह रहे हो सब बात है पुण्य का उस दिन होगा जीस
- 37:43दिन तुम स्थिति प्रज्ञा में ठहर जाओगे तुम ठहर जाओगे।
- 37:48और फिर सब टहल जायेगा और फिर तुम जीवन का रस, जीवन का लक्ष्य जीवन
- 38:01की मुग्धता है वहाँ जाके पता चलेगा तुम्हें।
- 38:06संसार तो रुलाता है, संसार वटकन है ठीक कहा बुध ने संसार दुख है।
- 38:20उसने यह कहा कि संसार से सुखना मिलेगा और तुम्हारी चाहत सुखी है।
- 38:27तुम्हारी चाहत उस स्टिल सिथर सुख की है जो कभी टूटे ना अखंड धारा
- 38:35सुख की बहती रहे तुम्हारे अंतः का कोना कोना पुकारना है उस सुख को
- 38:44लेकिन लाचार हो। वो कहीं मिलता नहीं लेकिन संत
- 38:50रास्ता भी बिताते हैं। वो मिलेगा तुम्हें तुम्हारे से ही
- 38:56मिलेगा तुम ही हो धीरे धीरे करके। संत तुम्हें बाहर से खींचता है और
- 39:11धीरे धीरे करके तुम्हें ही परमात्मा बना देता है।
- 39:18ये अद्भुत चमत्कार है संत का। कृष्ण कहते हैं मेरे अर्पण हो जा
- 39:27और आखिर में आके हम तवांग सर्व पाप्य भवमोक्ष श्यामी मासूच्चा
- 39:34अष्टावक्र कहते हैं तू ही परमात्मा है, विडंपना है।
- 39:42हम परमात्मा हैं और वडक्र हैं, नदियाँ होकर प्यासी हो मैं अंद
- 39:52लगा लो, गले लगा लो, प्यास भुजा दो नदियाँ होकर प्यासी हो।
- 40:07दुखद बात है कि तुम प्यासे हो, दुखद बात है, आनंद के सागर हो कि
- 40:15तुम प्यासे हो, नदियाँ हो के कोई प्यासी रह जाए, इससे बड़ी दुख की
- 40:24बात और क्या हो सकती है? इससे बड़ा छलावा और क्या हो सकता
- 40:28है? और तुम्हें इच्छा लिया है इन
- 40:32लोगों ने इन संतों ने, इन प्रचारकों ने, इन मूर्खों ने इन
- 40:43दुष्टों ने। सब जवाब दिखा के शब्दों में उलझा
- 40:56के ये शब्दों से तुम्हें परमात्मा दिखाना चाहते हैं।
- 41:01हद हो गई। हमे तो लूट लिया मिलके हुस्न
- 41:14वालों ने हमे तो लूट लिया मिलके हुस्न वालों ने काले काले वालों
- 41:27ने। गोरे गोरे गालोने हमें तो लूट
- 41:33लिया मिलके हुस्सिन वालों ने काले काले बालों ने गोरे गोरे गालोने
- 41:42राधे राधे करते रहो, राम राम करते रहो।
- 41:48सब ठीक हो जाएगा और लुक ये पठो कहाँ ठीक हो जाएगा कुछ भी तो ठीक
- 41:54नहीं है। दुनिया रोज़ बिगड़ती जाती है।
- 42:00दुनिया बद से बदतर होती जाती है, लेकिन तुमने चिल्लाना बंद नहीं
- 42:06किया। अफसोस बस इन्होंने तुम्हें लूट
- 42:13लिया मिल के हुसने बालों ने, काले काले बालों ने, गोरे गोरे गालों
- 42:23ने। शब्दों में तुम्हें उलझा के मार
- 42:28देना चाहते हैं, इन्होंने तुम्हारी आत्मा को मार दिया।
- 42:34वह आत्मा जो आनंद की मूर्ति है, आनंद के सागर हो तुम पहचानना है।
- 42:47जपना नहीं नॉट टू रिपीट टु रेकग्नाइज़ इस शब्द को नोट कर
- 42:54लेना। यू अरे नॉट टू रिपीट यू अरे टु
- 42:59रेकग्नाइज़ पहचानना है। दोहराना नहीं है तभी मिलेंगे
- 43:08शांति तभी टूटेगा अज्ञान। वो मस्ती का आला?
- 43:25अभी तो तुम फंसे हुए हो निकलो, बाहर और ध्यान रखना रेकॉग्नैज किए
- 43:34बिना शांति न मिलेंगे, रंग लो, मुँह को उससे शांति न मिलेंगे।
- 43:42रंगलो माथे को रंगलो दाढ़ी को नहीं शांति मिलेंगे यह ड्रामे बंद
- 43:47करो, बहुत हो लिया ड्रामे, बाजी बंद मेरा भाई यहाँ दुकान करता था
- 43:57स्टील एंड ब्रास मर्चेंट के। बर्तनों की दुकान करता था।
- 44:05उसके बिल्कुल सामने एक और बर्तनों की दुकान थी।
- 44:09दोनों दोस्त थे। आपस में उसका नाम था देवी तो भाई
- 44:18का वीजा लगाया यूएसए चला गया। ध्यान से सुन लें।
- 44:25इस कहानी को बड़ी असरदार है। सच कहानी है, जीवन कहानी है, मेरे
- 44:34भाई की कहानी है। यहाँ से चला गया यूएससी चला गया,
- 44:43लेकिन याद है कि आ रही है ओह देव बी देव बी बर्तनों वाला वहाँ
- 44:53अजूबे अजूबे शहर हैं जॉर्ज थॉमसन पता नहीं कौन कौन स्टैनफोर्ड लॉट
- 45:10वहाँ अजूबे से चेहरे अब भीतर शांति ना पड़े।
- 45:17शांति पड़े देव भी देखे तो देव भी बर्तनों वाला दिखे तो शांति पड़े
- 45:25आगे रोज़ दर्शन हो जाते हैं, अब तड़प रहा है वहाँ से उड़ के यहाँ
- 45:36आ गया। यहाँ आकर सीधा देबी की दुकान पे
- 45:45अरे देबी आगोश में ले लिया बाहों में ले लिया अरे तेरे बिना
- 45:52तुम्हारी काफी बेकार है। यही दशा तुम्हारी है सात समुद्र
- 46:02पार चले गए हो डेली ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन।
- 46:13बैठे रहे तो सबुरे जाना किये हुए उसी आनंद के क्षण को ढूंढता है।
- 46:22मन बहुत दूर निकल आया। खुद से खुद से दूर छोड़ दिया अपना
- 46:36मुकाम और तुम्हें पता भी नहीं कि अपना मुकाम छोड़ दिया इसलिए दुखी
- 46:42हूँ अपने मुकाम पे वापस लौट जाओगे तो परम सुखी हो जाओगे।
- 46:51क्यों सुखी हो जाओगे? तुम अमृत के समुद्र हो, बाहर अमृत
- 46:57है नहीं, भीतर अमृत है और ये दोस्ती में बाहर भटकाते हैं।
- 47:06इनकी सारी शिक्षा बेहद मुखी होने की शिक्षा है।
- 47:11संत तुम्हें अंतर्मुखी करना चाहता है।
- 47:16संत तुम्हारी व्यथा को देखकर रोता है, संत का हृदय रोता है क्योंकि
- 47:21माखन की तरह कोमल होता है। तुम दुखी हो और तुम्हारा दुःख
- 47:28तुम्हारे चेहरे मोरे पे साफ। दिखाई पड़ता है।
- 47:33ये भटका भटका सा चेहरा, ये लटका लटका सा चेहरा मुँह के ऊपर तो
- 47:3912:00 बज के 3.75 मिनट है, अभी मुझे कल ही एक ब्रह्मकुमारी थी
- 47:47बात सुना रहा था। वो मरी तो जा के उसने दर्शन किए
- 47:52नरक के सर के मैंने क्या नरक के दर्शन किया?
- 47:58हाँ देख लिया होगा नरक के योग्य ही हैं नरक के योग्य हैं तो नरक
- 48:04देख लिया होगा क्या बात है तो सुना रही है कि मैंने क्या कुछ
- 48:08देखा। अब इन हरामियों की मैं बात क्या
- 48:14करूँ? खंगाल लिया सारा विश्व न कोई नर्क
- 48:20है, न कोई शर्क है और यहाँ बोलने वाले बोले चले जाते हैं,
- 48:25चित्रगुप्त है, यमराज है। हिसाब किताब है, दंडाधिकारी है,
- 48:36दंड दिया जाता है, स्वर्ग नर्क में पटका जाता है तो भाई अगर
- 48:41स्वर्ग नर्क में सुख भोगने होते है तो यहाँ हॉस्पिटल क्यों भरे
- 48:46पड़े? राजशाही सुख क्यों है?
- 48:53और छोड़ो राजशाही राजशाही सुख तो कुछ भी नहीं होता।
- 49:01यह जो एक बिखरी से दाढ़ी वाला है। पर आनंद में झूमता तुम्हारे
- 49:10स्वर्गों को मात देता है तुम्हारे स्वर्ग यहाँ आकर अशमान हो जाता है
- 49:23संत के सामने स्वर्ग भी। बड़ा शर्मिंदा होता है क्योंकि
- 49:30स्वर्ग का सुख संत के सुख के सामने कुछ भी ठीक कहते तुलसी दांत
- 49:38स्वर्ग अपबर्ग सुख धर ए तुला एक अंग।
- 49:45तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरीय तुला एक अंग तुलना ता ही सकल मिली जो
- 49:52सुख लव सत्संग वह जिसने सत्संग में जा के अपने उस सत्य।
- 50:03स्वरूप में जाके अमृत को पी लिया है तुम सारे पदार्थों के सुखों को
- 50:12गद्दियों को धन को पदार्थों को सारे संसार के क्षेत्रों को
- 50:17इकट्ठा कर एक तराजू में। और दूसरे तराजू में सत्संग का एक
- 50:28लेस मात्र कण क्षण धरीय तुला एक अंग तो लनता ही सकल मिले, जो सुख
- 50:41लव सत्संग। सत्संग का एक क्षण तुम्हारे सारे
- 50:49स्वर्गों को फीका कर देता है। मैंने कहा स्वर्ग आके शर्मिंदा
- 50:55होता है संत के आनंद के बहते हुए जड़ने के पास।
- 51:03स्वर्ग दंडवत हो जाता है स्वर्ग धरा को चुनता है कि शुक्र, शुक्र
- 51:14इस धरा के ऊपर संत विराजमान है। और तुम स्वर्ग और नरक की बात आज
- 51:22भी करते हो, तुम्हें शर्म नहीं आती अगर किसी ने पाप किया?
- 51:36तो यहाँ भी भोंगेगा नरक में भी भोंगेगा कहीं एक कर्म का फल दो
- 51:42बार मिलता है अगर किसी ने पुण्य किया यहाँ भी भोंगेगा स्वर्ग में
- 51:49भी भोंगेगा एक पुण्य फल का, कर्म का फल दो बार मिलता है।
- 51:57फिर ये बकवास कहाँ से ले के आया ये तुम्हें छलने की तरक्की में
- 52:06हैं। योजनाएं इन पाखंडों के बीच में मत
- 52:10रचना लूट लिया मिल के। हुस्न वालों ने काले काले बालों
- 52:19ने। गोरे गोरे गालों ने हमें तो लूट
- 52:25लिया मिलके हुस्न वालों ने काले काले बालों ने।
- 52:33गोरे गोरे गाय लौन। ये ऐसे मेकअप करके बैठते हैं
- 52:44जिससे तुम लुभाए मान हो जाओ और ऐसे सुंदर सुंदर शब्द कहेंगे
- 52:50तुम्हें कि सब लुभाने के चक्कर। आनंद का कुछ इनको पता भी नहीं तो
- 52:59मैं सच कहता हूँ तुम्हारी आँखों से भरे न जाने कितने लोग मुझे
- 53:06अपनी व्यथाएं सुनाते हैं और तुम्हारे सामने प्रवचन सुनते हैं।
- 53:13तुम्हारे सामने प्रवचन मेरे सामने व्यर्थ हैं।
- 53:18मैं वहीं से देखकर अनुभव पाकर तुम्हें बोल रहा हूँ और सत्य बोल
- 53:25रहा हूँ मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझसे तुम अमृत ले लो, तुम अमृत
- 53:44कुंड हो, तुम अमृत के सरोवर हो अमृत की एक बूंद के प्यासे हो।
- 53:56बड़ी दुखद बात है और फिर ये दोष से तुम्हें भटकते है।
- 54:03राधे राधे कर रहे हो नहीं मिलेगा भाई कितना ही जब लो।
- 54:10रोज़ मेरे पास इसी के मरीज आते है, कोई कहता है 35 कोई कहता है
- 54:1640 कोई कहता है। उम्र गुजर गई नहीं मिला और बुद्ध
- 54:23को 6 साल में मिल जाता है। महावीर को वरोसल समय मिल जाता है,
- 54:30कोई जाप नहीं करता, कोई राधे राधे नहीं करते, कोई राम राम नहीं
- 54:39करते, वो तो उस अमृत कुंड में उतर जाते हैं।
- 54:46महावीर भी उस अमृत कुंड में जाकर स्नान करते हैं।
- 54:49जीस तीर्थ की बात बाबा नानक करते हैं।
- 54:52सभी संत उसी की बात करते हैं। न जाने ये असंत कहाँ से आ गए।
- 55:03सभी संत उसकी बात करते हैं उस समर्थ कुंड के।
- 55:09तीर्थनामा जयते से पावे बिन पानी की नहाय करें।
- 55:17जब उसकी इच्छा नहीं होगी तो मैं गंगा में गोता लगा के कुंभ में
- 55:23गोता लगा के आ जाऊंगा। लेकिन कोई पाप न मिटेगा कोई
- 55:29दुःखला न मिटेगा वो ही है चाल बेढंगी जो पहले थी वो अब भी है
- 55:37ऐसे ही दुखी रहोगे कुम्भ में नहा के आने वालों के चेहरे देख लेना।
- 55:44ये हज यात्रियों के चेहरे देख लेना ये भी तुम अस्पताल में
- 55:51तड़पते हुए पाओगे ये क्या हुआ तुम्हारे कुम्भों का क्या हुआ?
- 55:58तुम्हारे हज यात्रियों का क्या हुआ तुम्हारे मक्के मदीने का,
- 56:02तुम्हारे तीर्थों का। ये कोरी बकवास थी, कोरी कल्पना
- 56:08थी। कोई गंगा का शिनान तुम्हें दुखों
- 56:13से मुक्त नहीं कर सकता। एक गंगा शिनान है वो जो भीतर
- 56:19तुम्हारी गंगा बहती है, उसमें शिनान कहीं कर लो।
- 56:24पर उसी की बात नानक करते हैं। तीरथनामा जेते सपावै बाहर का
- 56:31स्नान तो जब चाहे कर लें गंगा तो ये खड़ी उसमें जाके जो गंगा के
- 56:38किनारे बस्ती हैं, वो रोज़ गौता लगाते हैं।
- 56:42लेकिन दुख कहाँ उठता है तुम भरम मिटा देते हो?
- 56:53तुम कोशिश करते हो भरम मिटाने की, लेकिन भरम भी नहीं मिटता क्योंकि
- 56:59जब दुख आता है तो तुम्हारा भरम टूट जाता है।
- 57:06तुम लाग लपेटने की कोशिश करते हो कि मैं मृत हूँ अहम् ब्रह्मास्व
- 57:12शिबो हम शिबो हम गंगा तीर पर काशी किनारे तुम चिल्लाते हो, हाथ में
- 57:20मायला दिया मैं शिव स्वरूप हूँ सत्य चित आनंद हूँ।
- 57:26लेकिन सब आनंद धरा रह जाता है। जब तुम्हारा पेट दुखता है, फिर तो
- 57:38डॉक्टर ही भगवान होता है, जब कैंसराइट से ग्रस्त हो जाते है,
- 57:45फिर डॉक्टर ही भगवान होता है, फिर भूल जाते हो।
- 57:50कि हमने कुंभ स्नान किया, हमने गंगा स्नान किया इसलिए मैं कहता
- 57:54हूँ कुंभ में जाना, लेकिन कुंभ में जाने का कोई अर्थ है?
- 57:59मैंने पिछले ही प्रोविशन में बोला था वो जय कुंभ में जो मुक्ष हो और
- 58:05जो किनारे पे पहुँच गया हो। और जिसे सिर्फ कृपा की आवश्यकता
- 58:09हो और अगर देशी घी में सुवर की चरबी मिला के ही जाना है पाप
- 58:19मुक्त होने के लिए तो मत जाना नहीं होगे।
- 58:22पाप मुक्त भ्रम बना रहेगा। और ये भ्रम दुख देखा और तुम उसकी
- 58:32कचहरी से बच नहीं सकते। हमारे पंजाबी में एक गाना आया,
- 58:41रब्ब न ठगियाँ के मारे बंधया मैंने उस गायक से पूछा बात सुनो?
- 58:50क्या परमात्मा से ठगी बज सकती है? तुम कहते हो रब्ब नाल ठगियाँ
- 58:57क्यों मारें बंदे आ क्या परमात्मा से ठगी चल सकती है?
- 59:05पहले ये बताओ अगर चल सकती है तो फिर चला सकते हैं।
- 59:10तो दो घड़ी के लिए मौन हो गया, जैसे उसके सर के ऊपर हथौड़ा लगाओ।
- 59:17कहते नहीं बाबा उससे तो ठगी नहीं चलती तो फिर तुमने गीत क्यों
- 59:24बनाया? जब उससे ठग गई, चलती ही नहीं तो
- 59:29तुमने गाना क्यों गाया? कहता मूर्खों को सुनने के लिए बस
- 59:38मूर्खों को सुनने के लिए राधे राधे करते रहो पता है नहीं
- 59:44इन्हें? ये बेचारे हैं पहले ही इनको और
- 59:50मार देते हैं। ये लोग ये संत नहीं है क्योंकि
- 59:54इनका हृदय विकल्ता है और तुलसी कहते हैं संत हृदय नवनीत समन निकल
- 1:00:01जाता है वह वह तुमसे टग्गी नहीं मारेगा।
- 1:00:17तुम्हें देखकर दया आती है, संत को दया आती है तो वो अपना अनुभव कहता
- 1:00:24है, अपना अनुभव कहता है और अपना अनुभव अमृत दाई है।
- 1:00:32क्योंकि उसने उस अमृत को छुआ है, पिया अठखेलियां की हैं, नाचा है,
- 1:00:38खेला है, उस अमृत में नहाया है इसलिए वो अमृत का बखान कर सकता है
- 1:00:48जिन्होंने अमृत देखा ही ना हो। अमृत का बोतल छुआ ही न हो,
- 1:00:54तुम्हें क्या खाक बताएगा? मैं कोई तानाशाह दिया।
- 1:01:09संत कभी तानाशाह हो भी नहीं सकता। अहिंसा परमो धर्म।
- 1:01:16संत अहिंसक होता है, मैं तुम्हें तब्दील नहीं करना चाहता, लेकिन
- 1:01:24इतनी इच्छा तो जरूर है कि तुम्हारा ये लटका हुआ चेहरा।
- 1:01:32इस पर लावण्या की झलक आ जाए तो क्या बुरा है?
- 1:01:40जो चीज़ तुमने खोई ही नहीं भूल गए हो वो याद आ जाए तो क्या बुरा है?
- 1:01:48नहीं, ऐसा नहीं है अब्बा। वह दिखता नहीं, ऐसा नहीं है वह
- 1:01:57दिखता का, वह तो प्राणों को तृप्त कर जाता है, वह तो पिया भी जाता
- 1:02:02है। तुम दिखने की बात करते हो, वह तो
- 1:02:06अलमस्त भी बना देता है। तुम कहीं भूल में हो आंख नहीं रब
- 1:02:13तेरे तो वख नहीं पर वेखन वाली आँख नहीं आँख भी तो चाहिए आँखों से ही
- 1:02:21तो दिखेगा और आँखें नहीं तो कुछ भी नहीं।
- 1:02:29इसलिए मेरे इन अंतिम शोदों को ध्यान से सुन लेना।
- 1:02:35यू अरे नॉट टु रिपीट यू अरे टु रीकग्नाइज़ सभी संत कहते हैं तुम
- 1:02:45आनंद के समुद्र हो, तुम झरने हो। झर झर रहा है अमृत और तुम बूँद के
- 1:02:54प्यास हो एक सुख के लावण्य के क्षण के लिए तुम ज़िन्दगी तक लुटा
- 1:03:06देते हो। कितना सस्ता है तुम्हारा जीवन?
- 1:03:13तुम हो तो नदिया और कहते हो मैं प्यार से हूँ बस संत तुम्हें यही
- 1:03:21कहता है रेकग्नाइज़ हर सर। खुद को पहचान स्वयं को पहचान यह
- 1:03:32दुख असली दुख नहीं है यह दुख नकली दुख है कीर्तिरम दुख है तुम दुख
- 1:03:39हो नहीं अफसोस यही होता है संत को।
- 1:03:45वह कुछ बदलना नहीं चाहता, सिर्फ तुम्हारी दिशा बदलना चाहता है।
- 1:03:53उसमें कोई मशक्कत नहीं लगती। तुम अमृत के समुद्र हो और तुम
- 1:04:03दुखी भी हो। तो संत ये कहता है जब तुम आनंद के
- 1:04:10सागर हो तो दुखी कैसे हो सकते हो, क्योंकि जब उस अमृत को मैंने पिया
- 1:04:20सब दुःख तुरोहित हो गए। समाधि लग गई, समाधान हो गया।
- 1:04:25दुःख अगर गए उसी अमृत के समुद्र तुम हो ये नीच ऊच तो व्यापारियों
- 1:04:34ने बनाई व्याख्या जो चाहे कर दो, लेकिन बात तो लोग और लालच की है।
- 1:04:48कहीं कुछ व्यक्तियों ने षड्यंत्र किया है, जैसे सारे धन को लूटने
- 1:04:54का षड्यंत्र है, संसार का वैसे ही कुछ लोगों ने।
- 1:05:02अपने ज्ञान का लाभ उठा के अपनी सूचनाओं का लाभ उठा के तुम्हें
- 1:05:08गुमराह किया है नहीं, दुख तुम्हारे पास फटक भी नहीं सकता।
- 1:05:16तुम अमृत के कुंड हो। तुम अमृत के समुद्र हवा झरना झर
- 1:05:21रहा है। हर वक्त हर घड़ी ये देखिए अनंतनाथ
- 1:05:26की आवाज उस गिरते हुए झरने की आवाज ही तो है कौन गिर रहा है ये
- 1:05:34आवाज कहाँ से आ रही है यह अनन्स्ट्रिक्टेड साउंड?
- 1:05:43फ्रम व्हेर इट इस कमिंग यह सन्नाटे की आवाज यह वह अमृत के
- 1:05:51झरने की आवाज है तो मैं नहीं समझ पड़ता बिल्कुल सुनाई पड़ेगा खेतों
- 1:05:58खलिहानों में निकल जाओ। रात के घने सन्नाटे में तुम्हे
- 1:06:03साफ सुनाई पड़ेगा रात के घने सन्नाटे में अपनी छत पे निकल जाओ
- 1:06:10तुम्हें ये झरता हुआ सब मरम पड़ेगा जब कोई झूठ है।
- 1:06:22मुश्किल तो तब होता है जब तुम्हारी तथ्य कहते हैं।
- 1:06:25डॉक्टर कह देते हैं इट इस टी नीटर्स मैंने कहा फिर सारे
- 1:06:30अस्तित्व को टी नीटर्स हो गया है। पूरा अस्तित्व वो टी नीटर्स के
- 1:06:35रोग से ग्रस्त है। ये तो सारा ही चू चू कर रहा है तो
- 1:06:42चुप हो जाते हैं तुम्हें बहकाने की चेष्टा करेंगे, बस इससे एक ही
- 1:06:53बात साबित होती है। कि ये मौन में गए पर मौन का रस
- 1:07:00इन्होंने चखा। दिन में सर्कस में उलझे रहते हैं,
- 1:07:06रात को जागते रहते हैं उस आनंद को पिया कब इन्होंने ये बात मेरे गले
- 1:07:14से उतरती है। दिन में सर्कस करते रहते हैं, वो
- 1:07:22झुक गया, ये झुक गया, वो झुक गया और रात को रात को फेरे ही दिखाते
- 1:07:30हैं तो उस रस को को पीते हैं, झूठे रूखे हैं।
- 1:07:41ये जो तुम्हें सिखाते हैं उससे तुम्हें मिलेगा नहीं आज सुन लो
- 1:07:47फिर सुन लो रोज़ कहता हूँ कब से कहता हूँ मुद्दतें भी नहीं नॉट टू
- 1:07:52रिपीट, बट टू रिकग्नाइज़। जिसकी तलाश है तुम्हें वो तुम हो
- 1:08:02जिसकी तलाश है तुम्हें वो तुम हो अमृत की तलाश है तुम्हें कौन नहीं
- 1:08:11चाहता मैं अमर हो जाऊं सभी चाहते हैं।
- 1:08:15लेकिन जिसे अमर करना चाहते हो वो तुम हो नहीं और परमात्मा इतना
- 1:08:21मूर्ख नहीं, तुम्हारी इच्छा को शरीर पर थोप दिया फिर सुनना इस
- 1:08:29बात को कौन नहीं चाहता, मैं अमर हूँ।
- 1:08:35प्रत्येक चाहता है अमर और तुम परमात्मा से ये इच्छा करते हो कि
- 1:08:41वो तुम्हारी इच्छा को पूरी करे कि मैं अमर हो जाऊ तो परमात्मा इतना
- 1:08:47बेवकूफ नहीं कि तुम्हारी इच्छा को पूर्ण कर दे और शरीर को अमर कर
- 1:08:52दे। वह तो जानता है ना कि तुम शरीर
- 1:08:56नहीं हो तुम खुद अमर होना चाहते हो, जाके देखो भीतर उतर के देखो
- 1:09:06तुम अमर हो। मनुष्य जितनी उहा करता है, अमर
- 1:09:14होने के लिए मेरा नाम बना रहे है। इतिहास में मुझे लोग याद रखे और
- 1:09:22इच्छा भी करता है मैं अमर हो जाऊं और क्या कुछ नहीं?
- 1:09:25कबाड़े करता, होर्डिंग्स लगाता है अपना चेहरा मोहरा दिखाने के लिए।
- 1:09:31लेकिन परमात्मा कहता है अरे पगले तू अमर होना चाहता है ना तो फिर
- 1:09:39ये जो हार्डिंग तुने लगाई ये तो है नहीं, मैं इन्हें अमर कर दूं
- 1:09:47तो तेरी इच्छा पूरी नहीं होगी। तेरी इच्छा पूरी करनी है तो तू
- 1:09:53बेहतर जाकर देगा। अगर तू अमर नहीं है तो मैं
- 1:09:59तुम्हें अमर कर दूंगा। यह शरीर तो तू है नहीं जिसका
- 1:10:04होल्डिंग तुने लगा रखा है। तू अपने आपको समझे है मूर्खता के
- 1:10:09कारण। तो मैं तो मूर्ख नहीं हूँ, मैं तो
- 1:10:14समझदार हूँ, मैं तो रचयिता हूँ एम कंस्ट्रक्टर एम्बेडर एम कैरिएटर
- 1:10:23तेरा दिमाग खराब हो गया है तो मेरा थोड़ा ये।
- 1:10:31तुम्हारी इच्छा को पूरी करम तो सही तो करूँ जब तुम हो ही नहीं
- 1:10:37शरीर तो इसको अमर करके तो मैं अमर कैसे कर पाऊंगा?
- 1:10:44अंत में तुम यही जानते हो। कि मैं शरीर नहीं हूँ, मैं अमर ही
- 1:10:51हूँ मैं दुख नहीं हूँ मैं आनंद ही हूँ मैं वो झर झर करता हुआ आनंद
- 1:11:02का जरना ही तो हूँ? श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:11:21हे नाथ नारायण वासुदेव ठोकर जहाँ मैंने खाई।
- 1:11:34इन्होंने पुकारा हमें। ये हमसफर हैं तो काफी है इनका
- 1:11:44सहारा मुझे ठोकर जहाँ मैंने खाई, इन्होंने पुकारा मुझे।
- 1:11:58ठोकर जहाँ मैंने खाई इन्होंने पुकारा मुझे, यह हमसफर है तो काफी
- 1:12:10है इनका सहारा मुझे। ये उठे सुबह चले ये झुके शाम ढले
- 1:12:29मेरा जीना मेरा मरना। इन पलकों के तले श्री कृष्ण
- 1:12:43गोविंद हरे मुरारी। हे नाथ नारायण वसुदेव श्री कृष्ण
- 1:12:56गोबिंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वसुदेव।
- 1:13:09श्री? कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ
- 1:13:17नारायण वसुदेव पितुमात स्वामी। सखा हमारे पितुमात स्वम सखा हमारे
- 1:13:41हेनाथ नारायण वासुदेव। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे
- 1:13:55नाथ नारायण वासुदेव धन्यवाद।