Latest / Baba ji Vijay Vats / 4 Jan 25 - जो ऊर्जा विहीन करे, वह मार्ग गलत! वो चाहे काम हो चाहे राम! हर एक ज़िंदगी पर आधारित कहानी।
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- 0:16पुराने जमाने की बात है दूर कहीं वीरान जंगल में एक छोटी सी
- 0:32कुट्टियां डाल के कोई संत रहने लगा है।
- 0:44सारे दिन मगन बैठे रहते हैं, भजन गाने लगते हैं प्रसन्न आनंद
- 0:57मुद्रा में मगन। 1 दिन वहाँ से एक राह गिर गुजरा।
- 1:15सर्दी के लिए एक छोटी सी रस्सी बांधकर ऊपर चादर लटका दी गई थी और
- 1:25बाहर देखने के लिए एक छोटा सा दरवाजा रखा हुआ था।
- 1:30रोशन दान की तरह वो संत शारित में मस्त रहता हो।
- 1:44कैसे आनंद की साक्षात मूर्ति हो? रोने, रोने से आनंद जल रहा था
- 1:52उसका वह राहगीर पर्दा हटाया देखा इक विराट आनंद में मगन मूर्ति।
- 2:16कैसे सक्षा परमात्मा हूँ शांति का पुंज उसके रोम रोम से प्रकट हो
- 2:25रहा था। उसने जा के प्रणाम किया।
- 2:39संत ने आँखें खोलीं, शांत हो गए और राहगीर ने कहा प्रभु क्या मैं
- 2:55यहाँ आपके दर्शन के लिए रोज़ आ सकता हूँ?
- 3:03वह संत कुछ नहीं बोला। राहगीर ने समझा कि संत स्वीकृति
- 3:14दे रहा है। साइलेंस इस हाफ कॉन्सेंट।
- 3:23वह रो जाने लगा। उसको देखते हुए उस ग्राम के कुछ
- 3:31और लोग भी आते रहे। साथ में आ जाते हैं।
- 3:38और अद्भुत चमत्कार था क्योंकि उसकी कुटिया से दूर तड़प जैसे ही
- 3:48उनका आना होता चुम्ब की तरह वो खिचे जाते हैं उसकी कुटिया के आस
- 3:57पास। जैसे सुगंधों से भरे हुए सागर महक
- 4:10रहे हूँ, ठंडी हवाएं चल रही हैं। दूर दूर से आनंद उसके कुटिया के
- 4:20बाहर भी फैला रहता। संत की कुटिया के परिधि में
- 4:30प्रवेश करते ही एक अज्ञात महक अज्ञात कशिश।
- 4:41उनको घेर लेती और वो करीब गृह सुध वुध खोते खोते संत की झोपड़ी तक
- 4:50पहुँच जाते हैं जाकर प्रणाम करते हैं।
- 4:59देखते ही देखते विशाल भीड़ लगनी शुरू हो गई।
- 5:04कुटिया छोटी सी है। लोगों ने पूछा प्रभु आपके दर्शन
- 5:16के लिए? लोग बहुत आ रहे हैं।
- 5:23आपको कोई तकलीफ तो नहीं हो रही? संत मौन मुद्रा में आनंद के रस से
- 5:31भीगा हुआ। सुगंधियों से घिरा हुआ संत जैसे
- 5:40सारे दिन मुरली की भाँग देता रहता मस्त रहता।
- 5:55लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।
- 6:06छोटी सी कोटियां में लोग न समा पाते थे।
- 6:10लोगों ने बाहर बैठना शुरू कर दिया।
- 6:13दूर दूर तलक उनकी चर्चा होने लगी है।
- 6:21अद्भुत रशीला व्यक्ति है वह संत उसके दर्शन मात्र से जैसे सभी रोग
- 6:28कट जाते हैं, काटे भी जाते हैं। जैसे ही उस क्षेत्र में कोई
- 6:35प्रवेश करता, दुख दर्द को भूल जाता, उसका एक प्रभाव था जैसे
- 6:48उसकी परिधि में कोई भी। आता।
- 6:53अपने सारे जनता तनाव, कष्ट, गलेश, दर्द सब भूल जाता है।
- 7:02एक अज्ञा सी कृषि से उसे खींचती और उसे पता भी नहीं चलता वो कहाँ
- 7:10जा रहा है? क्यों जा रहा है?
- 7:17लोग बाग आते गए, भीतर जो बैठे और भीतर बैठे कभी उगते।
- 7:32खाना खाते वापस आ जाते वहीं बैठ जाते वहाँ जीवरा बड़ा लगता था।
- 7:40प्रफुल्ल मन से उसके पास ही बैठे रहते हैं।
- 7:47आस पास ही सो जाते। हैं।
- 7:54कोटिया के आस पास घना जब मावड़ा होता क्या कोटिया के आस पास कोई
- 8:05चमक थी, कोई दमक थी, कोई हम्मा को करती?
- 8:14आनंद ही आनंद, सुगंध ही सुगंध। ऐसा जलवा उस संत का कहाँ से आया?
- 8:24कौन है ये इसका कोई पता ठिकाना? कौन है कहाँ से आया है?
- 8:39लेकिन किसी को पता नहीं था। अचानक उस कुटिया में बैठे हुए एक
- 8:45व्यक्ति ने उसे निहारा था और बात। दूर तर्क फैल गई थी।
- 8:55उसकी हवाएं जो भी उसके प्रवेश क्षेत्र में आता, घर जाता अनायास
- 9:05ही वह अपनी सुधबुध खो देता और उसे पता ही नहीं चलता।
- 9:14कब वो उसके प्रवेश द्वार में उसके करीब आके बैठ गया?
- 9:24वक्त गुज़रना गया जब मावड़ा घना होता चला गया।
- 9:30और लोग बाग बाहर ही बैठे रहते। वहाँ से उठने का दिल न करता बस
- 9:39दैनिक कर्तव्य पूरे किये और वहीं बैठ गए।
- 9:45बहुत सालों तक ये सिलसिला चलता रहा।
- 9:50लोग भूल ही गए जो नए आए। लोग भूल ही गए कि हम किसलिए आये
- 10:02लोग जो भीतर बैठे आनंद का रस पीते रहते हैं।
- 10:08हँसते रहते गीत सुनते रहते उसके आनंद का लुत्फ उठाते रहते।
- 10:21शुद्धि बुद्धि उनकी खो जाती है। संत के आस पास के दायरे में जो भी
- 10:28आया वहीं का होकर रह गया। फिर भीड़ बढ़ती गई, भीड़ बढ़ती गई
- 10:39और बढ़ती गई और वहाँ लोग आते गए। फिर लोगों ने सोचा इतने लोग आते
- 10:50हैं। इनके लिए कुछ खाने का बंदोबस्त
- 10:53किया जाए। लंगर लगा दिया गया है।
- 10:58यही खा लो, यह संत बड़ा प्यारा है।
- 11:02यहाँ से उठने को दिल नहीं करता, घर मत जाया करो, वक़्त आया कि।
- 11:09लोगों ने घर। वहीं बना लिया।
- 11:16फिर तो नगरी बस गई, शहर बस गया। और 1 दिन लोग भूल गए।
- 11:28जो नए आते थे वो संत की कुटिया में प्रवेश न करते क्योंकि जो
- 11:38भीतर चला गया। सुध वुध खो गया अब बाहर आके बता न
- 11:47पाता और बस्तियां इतनी दूर तलक फैल गई।
- 11:55नगर के नगर बस गए। फिर जो नए आते वो तो नगर में बस
- 12:05जाते, लेकिन उस संत का ख्याल भूल गया।
- 12:11जीस पहले व्यक्ति ने उस संत की खुशबू की रसधार को पिया था, आनंद
- 12:19के सागर में झूमा था उसके सांनिध्य में आकर और वो कशिश उसे
- 12:24खींच के ले गई थी। कुटिया के दरवाजे का वो पर्दा
- 12:30हटाया था। और जैसे ही उसके चरणों में लोटपोट
- 12:34हो गया था, ऐसी कुमारी चढ़ी। जैसे ही उसे लगा कि मुझे मेरी
- 12:44मंजिल मिल गई इससे पहले। सिर्फ वो जीवन के दिन गुजार रहा
- 12:53था लेकिन जैसे ही इस अद्भुत सुगंध ने घेरा और वो खींचता ही चला गया,
- 13:04संत के चरणों में बिछ गया उसे जीने का।
- 13:12आनंद आने लगा। जीने की महक उसके भीतर उठने लगी।
- 13:20जीने का लुत्फ उसके भीतर आने लगा और फिर वो लोगों को बताने लगा।
- 13:28और आज ऐसी दशा हो गई कि नगर बस गए।
- 13:35उस संत की झोपड़ी के आसपास नगर बस गए, लोगों ने लंगर चलाए, कपड़े
- 13:47बांटे। बारिश में छात्रों का इंतजाम किया
- 13:51फिर पक्के शैड बना लिए और 1 दिन ऐसा आया कि वहीं लोगों ने छोटे
- 14:04मोटे व्यापार धंधे करने शुरू कर दिए।
- 14:08अब जो नए आते वो भूल गए कि संत के दर्शन करने पहला व्यक्ति उसकी
- 14:16कशिश में खींचा खींचा उसके चरणों में चला गया था।
- 14:23वह हर वक्त उसके पास बैठा रहता है।
- 14:26लेकिन उसके बाद वो खबर फेलती चली गई।
- 14:30लोगों ने अपने पड़ाव डाले हैं। पक्के हैं, कोई मर जाता तो वहीं
- 14:38फूंक देते, कहीं कोई बीमार हो जाता।
- 14:43वहीं उसका इलाज हो जाता, अस्पताल खुल गए, दुकानें खुल गईं, लोग
- 14:50व्यापार करने लगे, प्रचार होने लगा, योग का प्रचार होने लगा।
- 14:59वह जो भीतर बैठा सा। कौन है कहाँ से आया किसी को मालूम
- 15:05तो है नहीं। उसके बारे में बातें चलने लगीं,
- 15:11फिर लोगों ने ग्रंथ लिखना शुरू कर दिया।
- 15:15वह तो भीतर अब भी बैठा था, लेकिन लोगों ने उसके बारे में।
- 15:21ग्रंथ लिखने शुरू कर दिए। एक बात थी कि उसकी महक अब भी आ
- 15:29रही थी। झोपड़ी के बाहर भी जो लोग होते
- 15:33उन्हें भी उनकी खुशबू थी। जीवन का आनंद वो भी उठा रहे थे।
- 15:39लेकिन जो दूर तक बैठ गए दूर तलक बैठ गए।
- 15:43उन्होंने तो कभी संत का दर्शन ही नहीं किया था।
- 15:49फिर इतनी दूर दूर तक शहर बस गए, दुकानें खुल गई, व्यापार होने
- 15:57लगे। उसकी चर्चाएं होने लगी।
- 16:01संत कैसा कहाँ से आया? बहस बाजी होने लगी।
- 16:08जिसने नहीं देखा था वो बहस बाजी करने लगा।
- 16:14ऐसा कैसे हो सकता है? जवाब तलबी होने लगी।
- 16:18शास्त्रार्थ होने लगे। नव आगुन तक संत के दर्शन करना भूल
- 16:29गए। बाकी सब कुछ करना सीख गए।
- 16:38व्यापार चलने लगे, खाने पीने की चीजें बिकने लगी, जरूरत की चीजें
- 16:46नई नई खोजें, और वह तो परिपूर्ण साम्राज्य बन गया है।
- 16:56लोग धंधे कारोबार चलाने लगे और उस भीतर बैठे हुए संत के आनंद की
- 17:05महिमा लोग गाने लगे झूमने लगे। मस्त होने लगे।
- 17:11कुछ लोगों ने उसका प्रचार करना शुरू कर दिया।
- 17:17जिन्होंने देखा नहीं था, उन्होंने उसकी मूर्ति बनानी शुरू कर दी।
- 17:25जिन्होंने देखा नहीं था, उन्होंने उसके गुणगान करने शुरू कर दिये।
- 17:32इन शब्दों का लेन देन प्रवाह चला। कुछ लोग थे जो आनंद से सराबोर
- 17:43उसके बाद से उठ के आए थे। वो जो बाहर आए तो देखा नजारा कुछ
- 17:50और था। कोई व्यवहार कर रहा है, कोई पुण्य
- 17:55दान कर रहा है, लेकिन उस भीतर बैठे संत के ऊपर कोई प्रभाव न
- 18:04पड़ता। वह दिन भर रात मस्त रहता।
- 18:10उसके बारे में किसी को कुछ पता न चला।
- 18:15लोग अंदाज़े लगा रहे थे। लोगों ने शास्त्र लिखने शुरू कर
- 18:19दिए। योग केंद्र खुल कर।
- 18:31धारणाएं शुरू हो गईं। मान्यताएँ शुरू हो गईं।
- 18:36जब किसी ने कुछ प्रत्यक्ष आँखों से नहीं देखा होता तो बुद्धि अपने
- 18:41मापदंड बना लेती है। उन्हें ही मान्यताएँ कहते हैं।
- 18:46संत कोई ज्यादा दूर न था। दूर दूर तक गांव बस गए थे, नगर बस
- 18:55गए थे, फिर भी कुछ ज्यादा दूर न था।
- 18:59अगर वे ना चाहते तो जब आ के चाहे मिल लेते संत तो वहीं उसने कुटिया
- 19:07नहीं छोड़ा। लोगों ने धंधे शुरू कर दिए हैं।
- 19:13योग केंद्र खुल गए। लोग परमात्मा से मिलने की तरकीबें
- 19:19बताते चले गए। लोगों ने योगों के बारे में बोलना
- 19:26शुरू कर दिया। और फिर वक़्त से छाया योग सिखाने
- 19:36वाले रोग जीन से बेचने लगे। ऐसे धंधे शुरू हो गए।
- 19:44ऐसे धंधे शुरू हो गए। रोपकार का रिवाज चल पड़ा, भूल गए
- 19:55लोग कोई बीमारों की सेवा कर रहा है, कोई धनपतियों की जेब काट रहा
- 20:04है। कोई गरीबों का लहू चूस रहा है।
- 20:09सब अपने अपने काम में मगन लेकिन उस संत की गरिमा और महिमा के करीब
- 20:19ना जा पाते हैं। जो उनके पास बैठा वो निहाल हो गया
- 20:30और जिन्होंने सिर्फ मात्र सोचा था सुना था उन्होंने नगर बसा लिए
- 20:37आविष्कार होने लगे। भर गया सारा क्षेत्र।
- 20:43संत तो आज भी वहाँ बैठा है और आज भी कभी कभार कोई एक व्यक्ति उस
- 20:55भेड़ में से निकल के संत की उसकी कुटिया में प्रवेश कर लेता है।
- 21:03उसके दर्शनों से निहार हो जाता है, सुगन्धियों को पी लेता है, उस
- 21:14सरस को पी के झूमता है। आज भी उस संत के आसपास वो ही
- 21:21परिदृश्य है। वो ही आनंद का रस का झरना वो ही
- 21:29सुगंधियों के बाग लबालब भरे पड़े हैं।
- 21:33आज भी झरने झरते हैं वो जहाँ बैठा है वो संत और वो कभी इल्ताने।
- 21:43वो कभी कहीं जाता है ना? लोग ही उसे खिलने पिलाने लगे।
- 21:51भोग लगाने लगे, मान्यताएँ फैल गईं।
- 22:01भ्रांतियां फैल गई। दूर बैठे लोग उसे भोग लगाते
- 22:06मूर्तियां तैयार हो गई। मंत्र बन गया, धर्मक्षेत्र बन
- 22:13गया। फिर उन्होंने उसका एक नाम रख
- 22:21लिया। धीरे धीरे दूसरे लोगों ने उसका
- 22:27दूसरा नाम रख लिया। लोग बाग भरते गए, तीसरे लोगों ने
- 22:37तीसरा नाम रख लिया। फिर तो नाम गुण, गाणी लग गए, उसको
- 22:43तो भूल ही गए। कहा उसकी सुगंधी जो मदहोश कर देती
- 22:50थी, आज शब्दों के जंजाल में उलझ के रह गए।
- 23:01ना वहाँ जाते हैं लोग नगर बसे हुए हैं, आसपास भीड़, बड़ी इकट्ठी
- 23:10मंदिर बहुत बनारी है, लंगर बड़े चल रहे हैं।
- 23:20कोई योग के नाम पर जेब काटने लगा। कोई नाम के नाम पर जेब काटने लगा।
- 23:30लोगों ने उस संत के नाम के ऊपर धंधे जला लिया है।
- 23:38लोगों ने अपनी दुकानों के नाम उस संत के नाम पर रख लिया।
- 23:42नाम कोई जानता नहीं है। उन्हीं के बनाए हुए नाम संत का तो
- 23:48कोई नाम नहीं है। संत का तो कोई नाम, किसी को पता
- 23:53भी नहीं है। वह तो एक।
- 23:57सुगंधी की भरपूर आनंद की भरपूर खुंघारी की बेसुध ही का आलम है।
- 24:18उसका कोई नाम नहीं है, लेकिन लोगों ने भ्रांतियां खड़ी कर ली
- 24:23हैं। अब उसको तो भूल गए, सुगंध को भूल
- 24:31गए, आनंद को भूल गए, खुमारी को भूल गए।
- 24:37उस रस को भूल गए, बागवा को भूल गए, बाग को भूल गए नामों पर चर्चा
- 24:47होने लगी बहसबाजियां चलती रही लोगों ने।
- 24:58उसके नाम पर धंधे करने शुरू कर दिए।
- 25:04उसके नाम पर राज़ करने शुरू कर दिए।
- 25:07उसके नाम पर सियास्ते चल रही है लेकिन सुगंध हो गई है।
- 25:16सब उपज गया हैलाव घना हो गया रस खो गया सुगंध खो गई वो खुमारी, वो
- 25:31बेसुध। का आलम आज न जाने कहाँ है, जीस
- 25:41तरफ देखो, शोर है जीस तरफ देखो भीड़ है जीस तरफ देखो।
- 25:52कोलाहल है लोग तो भूल गए उस कुटिया के भीतर की चुप्पी है उसका
- 26:02शीतल शीतल एहसास उसकी भीने भीने मंसरी बजते हुए।
- 26:13और हल्की, हल्की सुगंध उठती हुई नासा पुटों को सहलाती हृदय की
- 26:21धड़कनें रुक जाती हैं। ये सब कुछ भूल गए, फिर भी कुछ
- 26:36पुराने लोग जीवित थे। उन्होंने अपने बच्चों को समझाया
- 26:45कि तुम जब भी कभी तनाव में आ जाओ, जब भी कभी उदास हो जाओ।
- 26:52तो उस संत की कुटिया में चले जाना वहाँ तुम्हें बड़ा सुकून मिलेगा।
- 27:03कोई दुख हो, कोई चिंता हो, कोई समस्या हो, कोई तनाव हो, कोई
- 27:07पीड़ा हो। कोई कष्ट हो, कोई क्लेश हो, कोई
- 27:11झगड़ा और तुम्हारी रास्तों की नींदें हराम हो जाएं, दिन की भूख
- 27:23खत्म हो जाए, दिन का चैन खो जाए। रात की नींद है खो जाना तो उसे
- 27:37कुटिया में चले जाना, धीरे से पर्दा हटाना सामने ही वो बैठा है,
- 27:45बस उसके पास जाकर बैठ जाना। और कुछ न करना, बस बैठ जाना और
- 27:59बैठने मात्र से तुम्हारे दुख, संताप, कष्ट, क्लेश, पीड़ाएँ।
- 28:07रोग, द्वंद सब नष्ट हो जाएंगे। वो ऐसी शय है और उसका जादू ऐसा
- 28:24विलक्षण है। कि बच्चा जब भी तुझे करना हो, यह
- 28:33संसार बड़ा भयंकर आपदाओं से से भरा पड़ा है, लेकिन ये सारा
- 28:43व्यापार है। लोग एक दूसरे को चकमा दे रहे हैं,
- 28:52एक दूसरे को मूर्ख बना रहे हैं और बच्चे कोई किसी को मूर्ख बना नहीं
- 29:01सकता। ये भ्रांति में है कि दूसरों को
- 29:10हम मूर्ख बना रहे हैं, लेकिन एक बात ये याद रखना ये खुद को ही छल
- 29:20रहे हैं। ये कपट किसी गैर के साथ नहीं कर
- 29:25रहे अपने साथ ही कर रहे हैं धोखा किसी गैर को नहीं दे रहे अपने को
- 29:33ही दे रहे हैं बस भूल गए हैं। उसे जो शक्ति और आनंद का पूंजी
- 29:45है, आज बड़े शास्त्र लिख लिए गए। शास्त्र से बरी बड़ी है सारी
- 29:57धरती। लोग उसको भूल गए, जो जीवंत स्रोत
- 30:08कोठिया के भीतर बैठा है, जहाँ जाने से।
- 30:18शांत हो जाता है। चित्त शम शम ना इधर ना उधर एक परम
- 30:28ठहराव को शम कहते हैं, वह सदा ही मौजूद है।
- 30:40लेकिन तुम भूल गए हो इस भरी भीड़ के भीतर इस कोलाहल भरे संसार के
- 30:55भीतर एक संत कुटिया में आज भी बैठा है।
- 31:05और तुम आओगे चले जाओगे, बहुत से आए चले गए और आएँगे वो भी चले
- 31:17जाएंगे। लेकिन वह जो कुटिया के भीतर संत
- 31:22बैठा है, वह विलक्षण प्रतिभा और प्रभा का मालिक वह दिव्य
- 31:28अनुभूतियों का सागर वह परमरस से भरा हुआ आनंद और हल्के हल्के।
- 31:39जहाँ मुरलियाँ बज रही हैं, उसके पास जाके बैठना, वहाँ जाना शोभा
- 31:55क्या है? जो वहाँ चला गया वह भाग्यशाली हो
- 32:02गया। नगर बसे हुए हैं, कारोबार चल रहे
- 32:09हैं, सब व्यवस्थाएँ कर ली हैं। जो मर गया उसके लिए कब्रिस्तान
- 32:16बना दिए गए। शब्दों की लड़ाई है आज।
- 32:23जो लोग उसके दर्शन के लिए आए थे उन्होंने आज पक्के मकान डाल लिए
- 32:31हैं। उसकी कुटिया के आसपास।
- 32:38और अजूबा है यह उसकी कुटिया के आसपास के महल बना के रह रहे हैं,
- 32:50कुटिया के बिलकुल पास बगल में ही उसकी कुटिया है तुम्हारे नगर के
- 32:56आस पास। और तुम कभी वहाँ से निकल के उसकी
- 33:00कुटिया में प्रवेश नहीं पाए और ध्यान रखना जब तक तुम अपने महल के
- 33:13बगीचों से निकल कर महल के। शानदार लबोलिवास से निकलकर उस
- 33:25कोठिया में न जाओगे, तुम्हें वो सुकून के भी साथ न मिलेंगे।
- 33:39जब थक जाओ, हार जाओ, तो तुम उस कोठिया में चले जाना, यह तुम्हारी
- 33:52जरूरत है। छक जाएगा जब राहों में बाहों का,
- 34:13सिरहना दूंगी बाहों का। सिराह न दूंग तेरे सुने सुने जीवन
- 34:31में मैं प्यार का रंग। भर दूंगी मैं प्यार करंगे भर
- 34:44दूंगी मैं बनूँगी पिया मैं बनूँगी पिया।
- 34:57तेरे पथ का दिया बनूँगी दिया तेरे पथ का दिया दिया पथ पे जलाने।
- 35:15दे साथी ना समझ कोई बात नहीं मुझे साथो आने दे।
- 35:33जीस पथ पे चला जीस पथ पे चला उस पथ पे मुझे आंचल तो बिछाने थे
- 35:50साथी ना समझ। कोई बात नहीं मुझे साथो आने दे
- 36:03साथी ना समझ कोई बात नहीं मुझे साथो।
- 36:12आने दे जीस पथ पे चला। जे राहें थकान वाले क्योंकि गलत
- 36:30है। गलत राहें थकाती और इस बात को एक
- 36:37मपदंड बना लेना जो तुम्हें थकाए वह मार्ग गलत है।
- 36:52जो तुम्हें थकाए वह मार्ग गलत है जो तुम्हें ऊर्जा से भर्ती, वह
- 37:03मार्ग सही है जो तुम्हें ऊर्जा विहीन कर दे।
- 37:09वह सही मार्ग है बस इसे आप एक मापदंड की तरह ले लेना देखना अपने
- 37:21जीवन में उतर के आज के लिए यह सूत्र आपको अपने जीवन में उतर के
- 37:27देखना। क्या करने से तुम थक जाते हो क्या
- 37:35करने से तुम ऊर्जा वे ही न हो जाते हो क्या करने से तुम्हारा
- 37:42रौमा रौमा पीड़ा से भर जाता है उसको त्याग दे न वे?
- 37:49और जो करने से तुम ऊर्जा से लभा ल भर जाते हो।
- 37:55ऊर्जा का उफनता हुआ सागर हो जाते हो और लहरें उगती हैं आनंद की
- 38:03खुमारी के। और वो लहरें आनंद की लहरें हैं।
- 38:13शक्ति के वो लहरों का दूसरा नाम आनंद है एनर्जी की उस लहरों का
- 38:20दूसरा नाम। सूरत ही है, खुमारी है, कहीं और
- 38:28मत ढूंढ रहे हैं जहाँ तुमने नगर बसा लिया है बस उस नगर से थोड़ी
- 38:37दूर बाहर निकालोगे कदम। सामने ही वो कुटिया है, ज़रा देखो
- 38:44तो तुम मंत्र जाते हो मंदिर के प्रवेश द्वार से ही तुम्हें
- 38:50मूर्ति दिखती है फिर तो तुम्हारे पास ऑप्शन है तुम मंदिर में गए तल
- 38:58बजाया। औरती सामने है, जाके लिपट सकते
- 39:03हो, चरणों में बैठ सकते हो, चरणों को चूम सकते हो और चाहो तो साथ
- 39:11में परिक्रमा भी है। तुम उस परिक्रमा में भी उलझ सकते
- 39:16हो और जा परिक्रमा कभी खत्म नहीं होती।
- 39:22परिक्रमा तो जगकर को कहते है। एक परिक्रमा पूरी हो गई।
- 39:29दूसरी शुरू कर दो, दूसरी शुरू हो गई।
- 39:32शुरू करते ही चले जाओ परिक्रमा का मतलब जो कभी खत्म नहीं होती।
- 39:38चक्कर का मतलब जिसका कहीं अंत नहीं जिसकी कहीं आदि मूर्ति के आस
- 39:46पास यह चक्र है परिक्रमा का और तुम परिक्रमा के चक्कर लगाते
- 39:54लगाते हैं, इसे ही जीवन समझो। थक जाते हो?
- 40:05प्रकृति तुम्हें ले जाती है विश्राम में मैंने कहा जो ऊर्जा
- 40:11देता है जो तुम्हें शक्ति से भर देता है।
- 40:16आनंद के रस से सराबोर कर देता है। भिन्नी भिन्नी सर लहरियां वीणा के
- 40:23तारों की तरह मुरली के साँजों की तरह तुम्हारे प्राणों में गूंजने
- 40:29लगते हैं और तुम्हें ऊर्जा से भर देते हैं वो मार्ग से ही।
- 40:36जब तुम्हारी ऊर्जा को खपाये तुम्हें ऊर्जा विहीन बनाएं।
- 40:41एनर्जी लैशनेस करें बुरा गलत है। आज के लिए यही सबक नगर बसा लिए।
- 40:59आज पहलू ये है कि तुम महलों के अंदर मौझ से बैठे हो, भूल गए कि
- 41:08कहाँ बनाए थे, तुमने ये महल क्यों बनाए थे?
- 41:13इस डे बनाये थे करीब ही बैठ जाए जब मन करे तब उठे और जाके दर्शन
- 41:20कर लें बैठे थे, अस्थाई रूप से बैठे थे, अब स्थाई तुमने महल डाल
- 41:30लिया है। अस्थाई बैठे थे, वो ठीक था यहाँ
- 41:35तुम स्थाई होगी ना? यहाँ तुम्हारा कुछ भी स्थिर नहीं
- 41:42है सब कुछ अस्थिर है। सब कुछ अस्थाई है, लेकिन तुमने।
- 41:50स्थाई बना लिया है। उस कुटिया के करीब महल डाल लिए उस
- 41:58कुटिया के करीब मात्र बैठना था। जब भी उदास हो जाओ।
- 42:06थक जाएगा जब। राहों में बाहों का सिरह न दूंगी
- 42:24बाहों का सिरह न दूंगी। जब थक जाओ तो पास ही कुटिया के
- 42:36द्वार को पर्दा उठा लो, सामने उसको बैठे पांव कहें जहाँ से आनंद
- 42:46का उदगम होता है। शक्ति का उदगम होता है जहाँ से
- 42:54उठती हैं तरंगें बहने बहने बासुरे के ये नहाते उठते हैं जहाँ से
- 43:03जहाँ जाकर जिया ठहर जाता है जहाँ से।
- 43:11तुम वापस आने का मन नहीं करता है। बैठे थे इसलिए उसके संधि में
- 43:18लेकिन भूल गया और तुमने पक्के महल बना लिए।
- 43:28और फिर धीरे धीरे मैलों का सुख स्वाद, यहाँ के नरम चरम गद्दे
- 43:35तुम्हें भुला ही दिए कि तुम यहाँ करीब बैठे थे किस लिए जब उदास हो।
- 43:46जब संसार की तप सताए क्योंकि संसार तपाता है संसार का अर्थ ही
- 43:53यह है कि तुम्हें ऊर्जा विहीन करते हैं।
- 43:58संसार की प्रत्येक क्रिया तुम्हें ऊर्जा विहीन करती है और तुम उन
- 44:03क्रियाएं में ही। तुम रोज़ रोज़ ऊर्जाओं को खोते
- 44:07हो, कभी काम में खोते हो, कभी नाम में खोते हो लेकिन खोते हो और
- 44:19मैंने तुम्हें आज एक संदेश दिया। जीस काम से तुम्हारी ऊर्जा खो
- 44:27जाए, तुम निस्स तेज़ हो जाओ, वह गलत है और जिसके करने से तुम
- 44:37प्रफुल्ल हो जाओ भर जाओ। तुम्हारा पात्र ऊपर तक उफन न शुरू
- 44:45हो जाए, पूरा पात्र भर जाए उस आनंद के ओज से उस सुगंधी के उस
- 44:57भीनी भीनी सरलहरियों से। तुम मस्त हो जाओ, तुम खो जाओ और
- 45:05तुम्हारे भीतर एक अद्भुत संगीत का अनुभव है, उस उदगम स्रोत के पास
- 45:13बैठना तुम्हारा मकसद है। जहाँ तुम्हें निस्तेज़ता मिलती
- 45:21है, उन छोड़ दो, उन कामों को छोड़ दो, चाहे काम चाहे राम जो
- 45:32तुम्हारी ऊर्जा को भंग करे, उसे छोड़ दो, वो त्याग्य है।
- 45:40आज के लिए ये सब का क्या है जो तुम्हें ऊर्जा से भरते हैं?
- 45:46तेरे सुने सुने जीवन में मैं। प्यार का रंग भर दोगे मैं प्यार
- 46:04का रंग भर दो मुझे तेरे कदम। मुझसे तेरे कदम नहीं बिंदिया से
- 46:25कम माथे पे सजाने दे। साथ ही ना समझ कोई बात नहीं मुझे
- 46:40साथो आने दे जीस पथ पे चला। उसके संग संग चलो उसके संग संग
- 47:01चलो, उसकी हवाओं में नाचो, उसके आनंद को पियो, उसके रस का पान
- 47:08करो, उसके मदर संगीत को सुनो, उसकी खुशबुओं को सूँको मस्त हो
- 47:14जाओ। वह प्रेम प्याला है ही मस्त करने
- 47:18के लिए तुमने पक्के महल बना लिए, वो महल है तो करीब लेकिन तुमने
- 47:30द्वार दरवाजे बंद कर लिए हैं। उस उद्यान से उठती हुई खुशबू की
- 47:36महक एक तुम्हारे दरवाजे पक्के रोक लेते हैं, जो उस महक को भीतर नहीं
- 47:43आने देते। तुम तुम्हारे महलों में 00 से
- 47:48पड़े रहते हो काश। तुमने महलों के दरवाजों को खोल
- 47:56दिया होता है, उस महल को भीतर आने का रास्ता दिया होता है तो
- 48:07तुम्हें महलों में भी बैठे बैठे। वो सुगंधी छेड़ सकती थी।
- 48:14तुम्हारी तरंगों के ऊपर तुम्हारे साँझ को पटा सकती थी गीत गा सकती
- 48:23थी तुम झूम सकते थे उसे सुन के। सब है तुम्हारे आस पास कहीं कुछ
- 48:34खोया नहीं, कहीं कुछ खोता नहीं कहीं कुछ खोएगा नहीं तुम्हारे
- 48:42जागने भर की देर है खोल दो दरवाज़े।
- 48:47महलों में हो तो महलों के खोल दो झोपड़ी में हो तो झोपड़ी के खोल
- 48:55दो कच्चे मकानों में हो तो कच्चे मकानों के खोल दो और खुले आसमान
- 49:05में बैठे हो तो आँखों को खोल लूँ। देखो सामने कोन जब पर्दे हटा दो।
- 49:19रुख से ज़रा नकाब हटा दो। मेरे हजूर रुख से ज़रा नकाब हटा
- 49:40दो मेरे हजूर। ये नकाब जोड़ रखा है तुम।
- 49:49ये थोड़ा घूँघट उठा। ये नकाब उठा तो।
- 49:58घूँघट के पटखोल रे। तो है प्या, मिलेंगे घूंघट के पट
- 50:15खोलरे तो है, प्या मिलेंगे। पिया मिलन तुम्हारी जरूरत है, वह
- 50:38कंत है तुम्हारा तुम प्रेमिका हो उसकी।
- 50:49मैं गोरी तो कंत हमारा। मैं घोरितु कंत हमारा हेमदेवता।
- 51:35मानने के प्यास बुझाने आई। मन की प्यास बुझाने आए अंतर्घट तक
- 52:06प्यासी हूँ मैं। तू है मेरा प्रेमदेवता, तू है
- 52:20मेरा प्रेमदेवता इन चरण के। दासी हूँ मैं मन की प्यास बुझाने
- 52:38आई मने की प्यास बुझाने आई। अंतर्घट तक क्या सी हूँ मैं तू है
- 52:54मेरा प्रेम देवता, तू है मेरा प्रेम देवता।
- 53:05मैं गोरी तू कनक हमारा आह आह। मैं गोरी तू कंत हमारा, मैं नदिया
- 53:31तू मेरा किनारा मैं गोरी तू कंत हमारा।
- 53:42मैं नदी आ, तू मेरा किनारा अंग लगाओ, प्यास बुझाओ, अंग लगाओ,
- 53:58प्यास बुझाओ। नदियाँ हो कर प्यासी हो मन की
- 54:11प्यास बुझाने आए मन की प्यास। भुझाने आई अंतर्घट तक प्यासियों
- 54:31में तो है मेरा प्रेमदेवता। तू है मेरा प्रेम देवता, इन चरण
- 54:47की दासी में तू है मेरा प्रेम देवता।
- 55:03इन चरणों की दासी हूँ मैं मन की प्यास बजाने आई अंक लगा लो, प्यास
- 55:19बुझा दो। नदियां होकर प्यासी हो, भूल गए हो
- 55:28तुम जिसके पास तुमने सांनिध्य में बैठने की सोच कर आए थे वहाँ पक्के
- 55:41महल डाल दिए। और बखूबी जानते हो न ये महल
- 55:47जाएंगे साथ न लबो लबास इन महलों के न तुम्हारा इकट्ठा किया हुआ
- 55:57सारा पदार्थ तुम्हारे संग जाने को नहीं है।
- 56:05लेकिन भूल गया और भूलना कोई पाप नहीं होता है, तुम अपने आप को पाप
- 56:13मत समझो भूलना से है, जो प्रक्रिया है व्यक्ति है।
- 56:22भूला के गलती है, पाप में भूल गए हो कोई बात नहीं, तुम आओ, मैं
- 56:32बेताब हूँ तुम्हें आगोश में लेने के लिए तुम आ जाओ।
- 56:41मैं पुकार रहा हूँ कब से? अंग लगाओ प्यास भुजा दो अंग लगा
- 56:53दो प्यास भुजा दो। नदियाँ हो कर।
- 57:09नदियाँ तो हो लेकिन प्यासे हो। क्या है?
- 57:19नदियाँ कभी प्यासी नहीं होती नदियाँ तो प्यास बजाया करती है
- 57:25फिर नदियाँ प्यासी क्यूँ कहीं भूल है ये पाप नहीं है।
- 57:34नदियाँ तो पापनाश नहीं हुआ करती है गंगा और गंगा खुद प्यासी हो
- 57:39जाए तो मदरा क्या होता है? गंगा भूल गई अपने गंगा तो बस एक
- 57:47ही सी बात है। तुम तुम्हारे गंगतो को भूल गए हो
- 57:53हो तो तुम गंगा तुम्हारे तुम तुम्हारे तीर्थत्व को भूल गए हो
- 58:00हो तो तुम तीर्थ हो तो तुम हज खुद काव मक्का मदैना तुम खुद।
- 58:18तुम भूल गए हो, तुम खोदी हो, मक्का तुम खोदी हो मदीना तुम कहाँ
- 58:27उलझ गए हो और ध्यान रखना ये तुमने बाप ने किया है।
- 58:35भूलना कोई भाव नहीं होता, ये सब भाव है, व्यक्ति का ह्यूमनेस्ट
- 58:42है, गलती कर देता है वो और भूलना एक गलती है, तुम भूल गए हो और
- 58:50गलती को ठीक किया जा सकता है। तुम इसे ठीक करो, भूल गए हो तो
- 58:59याद करो हो तो तुम गंगा ही हो तो तुम मक्का ही हो तो तुम देना ही
- 59:09तुम अपने मक्के को भूल गए हो। तुम अपने मदीना को भूल गए हो, तुम
- 59:19तुम्हारे स्वय को भूल गए हो, तुम ही हो परवर्दिगा तुम।
- 59:28ही हो, रहमो करी। तुम्हारी रहम से धड़कते हैं चाँद
- 59:34और तारे तुम्हारी रहम से चलती है ये दुनिया तुम कहाँ खो गए जागो
- 59:46होश में हो। अपने आपको ख्वाब मत करो।
- 1:00:00तुम ना जाने किस जहाँ में खो गए। भरी दुनिया में तनह हो गए तुम न
- 1:00:21जाने किस जहाँ में खो गए। हम।
- 1:00:30भरी दुनिया में तनह हो गए तुम ना जाने।
- 1:00:42तुम खो गए हो, लेकिन खत्म नहीं हुए हो।
- 1:00:52जो गुम हो गया वो ढूंढा जा सकता है।
- 1:00:57जो खत्म हो गया वो नहीं ढूंढा जा सकता और तुम खत्म नहीं हुए हो तुम
- 1:01:03तो वो हो जो खत्म कभी होते नहीं। तुम तुम मुस्तकलियो तुम वो शे
- 1:01:15नहीं जो खत्म हो जाओ। तुम वो शे हो जो कटते नहीं, जो
- 1:01:22टूटते नहीं, जो बैठते नहीं, जो सूखते नहीं, जो गलते नहीं, जो
- 1:01:26जलते नहीं, तुम हो। पहचानो अपना स्वयं जानो ये बंद
- 1:01:37आँखों से देखे हुए सपने बंद करो, आँखें खोल लो और आँखें खोलने पर
- 1:01:46तुम पाओगे कि भूल हो गई थीं। भूल होना स्वाभाविक है।
- 1:01:56तुम करीब ही बैठे हो तुम्हारे महल जहाँ वो बैठा है, उससे दूर नहीं
- 1:02:04है, बिल्कुल करीब हो। उपनिषद कहते हैं कि तुम उसके करीब
- 1:02:13वह तुम्हारे पास है और दूर से दूर भी है, तुम चाहो तो दूर हो सकते
- 1:02:20हो। इन नफरतों की आँख निर्देश और ईशा
- 1:02:32की आँख जैसे तुम किसी के साथ पीठ के साथ पीठ लगा के खड़े हो गए।
- 1:02:42तुम बहुत करीब हो। तुम्हारी पीठ उसके पीठ से लगी है,
- 1:02:47तुम्हे उसका एहसास है, लेकिन फिर भी बहुत दूर हो, बस तुम परमात्मा
- 1:02:54के साथ पीठ किये खड़े हो, तुम्हारी पीठ उसके साथ लगती है
- 1:03:01एरशा। हृदयेश इन नफरत की भावना मज़हब
- 1:03:06नहीं सीखाता धर्म से नहीं सीखाता जो तुमने सिखाए नफरत करना समझो वो
- 1:03:19आधार में कर समझो वो खुद बहक। गया है।
- 1:03:25उसने खुद राहें भूल गया हैं। ये किसी और मंथव से बोलता होगा,
- 1:03:32उसका निहित स्वार्थ और प्रयोजन कुछ और होगा।
- 1:03:36तुम तो बहुत करीब हो, इतने करीब तुम्हारी पीठ उसकी पीठ से लगती
- 1:03:40है, लेकिन क्या करें तुम्हारे मुखजोधा हैं।
- 1:03:45विपरीत दिशाओं में तुम्हारे मुख हैं, पेट के साथ पेट लगा के ज़रा
- 1:03:50घूम कर उसके सामने आ जाओ और सामने आओगे तो वह छलिया सामने ही
- 1:04:01देखेगा। भूला हुआ घर वापस आ जाए तो भूला
- 1:04:17नहीं होता, ऐसे ही तुम भूल गए हो तुम देखो आँखें खोल के उसके
- 1:04:28सांनिध्य को पहचानो। उसके रस को पियो, उसके आनंद के
- 1:04:34सागर में गोते लगाओ। नहाओ अच्छी तरह से मल मल के नहाओ
- 1:04:42अपनी सारी मैल उतार दो निर्मल हो जाओ।
- 1:04:50उसके भीतर नहाने से सब रोग कट जाते हैं, सब दुविधाएं बढ़ जाती
- 1:04:56हैं, चिंताओं की ज्वालायें समाप्त हो जाती हैं।
- 1:05:01उसका ये स्वभाव है ज़रा आप पेट से पेट को डालो।
- 1:05:09रसाव ने तो आओ। छली है।
- 1:05:15छुप छुप छलने में क्या राज़ है छुप न सकेगा परमात्मा।
- 1:05:28मेरी आत्मा कीजिए, आवाज़ है ज़रा सामने तो आओ चलिए।
- 1:05:41सामने ही है। बस पीठ को पीठ से हटाना है।
- 1:05:47और मुख को मुख के सामने ले आना है।
- 1:05:50यही बुल्ले शाह कहते हैं बुल्ले रब्दा की पाणा ओह द्रो पुटना के
- 1:05:56दर्दना पेट से हटाओ पेट को ये नफरतों की आँख बजाओ इन आँखों से
- 1:06:04तुम्हें दूरियां पैदा होंगी। दूरियां जलन पैदा करती हैं और जलन
- 1:06:11आग होती है और आग बड़ा सताती है। ये फफोले तुम्हें दिन भर रात जीने
- 1:06:19नहीं देते हैं। जीने का तरीका सीख ल।
- 1:06:27पेट से पेट हटाओ, मुख के सामने मुख ले आओ और उसके गले से लग जाओ।
- 1:06:37झूम लो मैं उस जुबान को। जीस प्यार तेरा नाम झूम लूँ मैं
- 1:07:02उस जुआ को। जीस पे आय तेरा नाम सबसे अच्छे
- 1:07:17तेरी सुबह हो सबसे रंगें। तेरे शान तुझपे दिल कोरुआ हे हे
- 1:07:36मेरे प्यारे वतन हे मेरे। बिछुड़े चमन तुझ पे दिल कुरवा तो
- 1:07:57ही मेरे आरजू। तू ही मेरे आबरू, तू ही मेरे शान
- 1:08:18है मेरे। माँ का दिल बन के कभी सीने से लग
- 1:08:33जाता है तो माँ का दिल बन। के कभी।
- 1:08:43सीने से लग जाता है तो और कभी नन्हे सी बेटी बनके या दाता है
- 1:09:00तो? जितना ज्यादा ता है मुझको उतना
- 1:09:12तड़पाता है तू तुझपे दिल कुरवा। तू ही मेरी आरजू, तू ही मेरी
- 1:09:32आवुरु, तू ही मेरी शान। एम् मैं प्यारे।
- 1:09:45वतन एम् मेरे बिछड़े। चमन तुझ पे दिल कुरवान।
- 1:10:02ए मेरे वो तुम्हें पुकार। रहा है तुम्हारा वतन तुम्हारा
- 1:10:11चमन, तुम्हारे इंतजार में बाहें फैला है तुम्हें चूमने को तैयार
- 1:10:18है। वो तुम्हें बुला रहा है, तुम जाते
- 1:10:23क्यों नहीं? तेरे दामन से जो आयें उन हवाओं।
- 1:10:38को सलाम झुमलों में उस जुबां को जीस ब्याह, तेरा नाम।
- 1:10:58सबसे अच्छे तेरी शुभ हो सबसे रंगें तेरी शाम तुझ पे दिल कुरवा।
- 1:11:18है मेरे प्यारे वतन है, मेरे बिछुड़े चबरा तुझपे दिल कुरवा
- 1:11:40श्री कृष्ण। गोविंद हरे मुरारी हेनाथ।
- 1:11:52नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद, हरे मुरारी।
- 1:12:09हे नाथ नारायण वासुदेव? श्री?
- 1:12:15कृष्ण गोविंद आरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण
- 1:12:27गोविंद। हरे मुरारी एनाथ नारायण वसुदेव
- 1:12:41पितमात स्वामी। सखा?
- 1:12:47हमारे पितमात स्वामी सखा, हमारे हेनाथ नारायण वासुदेव, श्रीकृष्ण,
- 1:13:05गोविंद। अरे मुरारी मुरारी मुरारी मुरा
- 1:13:22मुरा। मुरा अरे श्री कृष्ण गोविंद अरे
- 1:13:38मुरारी? नाथ नारायण, वासुदेव।
- 1:13:47श्री कृष्ण। गोविंद आरे मुरारी वितुमात स्वामी
- 1:13:56सखा हमारे। पिता महत स्वामी सखा हमारे ईनाथ
- 1:14:08नारायण वासुदेव, श्रीकृष्ण, गोविंद हरे मुरारी।
- 1:14:18हे नाथ नारायण वासुदेव? धन्यवाद।