Latest / Baba ji Vijay Vats / 10 Mar 25 - SHIV SUTRA - मुक्ति की चाह भी मुक्ति की राह में बाधा है! परमात्मा तक पहुंचने का शिव सूत्र!
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- 0:03सुख की अभिलाषा को त्याग दे मोक्ष की अभिलाषा को त्याग दे और फिर
- 0:15देख सुख ही सुख। मोक्ष ही मोक्ष है।
- 0:23भगवान शिव कहते हैं पार्वती से सुख की अभिलाषा को त्यागता है
- 0:34मोक्ष की अभिलाषा को त्यागता है। तंत्र बड़ा अदब होता है, छोटे
- 0:45छोटे सूत्रों में बड़ी दूर ले जाता है।
- 0:57शिव कहते हैं पार्वती से अभिलाषा को त्याग करते हैं, इच्छाओं का
- 1:07त्याग करते हैं। तू क्या चाहता है?
- 1:17ये तेरा अपना पैमाना है और वो क्या चाहता है ये उसकी इच्छा है
- 1:31तो अपनी इच्छा को उसकी इच्छा में आड़े मत आने।
- 1:38अगर तू कोई अभिलाषा करेगा तो वह अभिलाषा परमात्मा की अभिलाषा के
- 1:50साथ बैठ जाएंगे। गंगा की धारा बह रही है और तू
- 2:01उसके विपरीत तैरक कौन जाने वो किस रंग में राजी है?
- 2:11कौन जाने? वो तेरे जीवन को कैसे चलाना चाहता
- 2:16है और वो ही हर किस्ती का तुम गलती खा जाते हो।
- 2:33जब तुम सोचते हो कि मैं मेरी कश्ती का कविया इसे पार ले जाऊंगा
- 2:45और तुम्हारी इस मनोवृत्ति में। तुम्हारे साथ तुम्हारे मार्गदर्शक
- 2:57तुम्हें उकसाते है, तुम ठीक कहते हो, अगर तुम नहीं करोगे तो फिर
- 3:06कौन करेगा? शिव कहते हैं हे पर्वती सुख की
- 3:17अभिलाषा को त्याग, मोक्ष की अभिलाषा को त्याग।
- 3:29सुख की अभिलाषा को देखते हैं, क्योंकि अभिलाषा ही तेरे सुख का
- 3:38बंधन अभिलाषा ही तेरे सुख की हत्या करती है।
- 3:42तू सुख का सागर क्षण है। अभिलाषा करने से उस सुख के सागर
- 3:53के ऊपर काले मेघ छा जाते हैं और एक बार की तुझे वो सुख का सागर।
- 4:05दिखाई पढ़ना बंद हो जाता है तो बंधा है कहाँ?
- 4:14मोक्ष की अभिलाषा को त्यागना बंधा है कहाँ मुक्त होने के?
- 4:26अभिलाषाओं ने इतने काले मेघ तेरे आकाश में मंडरा दिए हैं के अब तो
- 4:36तुझे मेघ ही मेघ नजर आती मेघ से परे।
- 4:44वो आनंद का खजाना वो मुक्ति का स्वरूप तुम्हें नजर नहीं आता सूख
- 4:56जाता है तुम इन मेघों के कारण। मन के आकाश को खाली कर दो मन के
- 5:13आकाश को इन बादलों से विघिन कर दो ये बादल।
- 5:21तुम्हें सुख को देखने में बाधा पहुंचाते हैं।
- 5:26ये बादल तुम्हें मुक्ति को मोक्ष को देखने में बाधा पहुंचाते हैं।
- 5:35ये तुम्हारे मित्र नहीं है। तुम समझते हो जब बरसेंगे ये बरसने
- 5:45वाले बादल हैं ये सिर्फ तुम्हारी आँखों के आगे कालक।
- 5:56लगा देने के बादल जब रस्ते बाधा पहुंचाते हैं इन बादलों से पार
- 6:09कोई सूरज भी उगा कोई सागर भी है। जो तुम्हारा इंतजार कर रहा है और
- 6:21ये बादल तुम्हे उस सागर को देखने नहीं देते, उस पार तुम जिसकी चाहत
- 6:29किए हो। शिव कहते है वो तुम स्वयं ही हो
- 6:36पार्वती सुख को कहीं पाने जाना, थोड़े मोक्ष को कहीं पाने जाना
- 6:50थोड़े है। तुम बंधे हो कहाँ हो, तुम दुखी हो
- 6:58कहाँ हो तुम मरते कब हो, तुम तो अमर हो, तुम दुखी होते कब हो?
- 7:13तुम तो आनंद स्वरूप हो, तुम जड़ता में आते कब हो?
- 7:24तुम तो खुद ही चेतना। तो शिव कहते हैं कि अभिलाषा को
- 7:31त्याग वो चाहे सुख की हो, चाहे मोक्ष की हो।
- 7:41इन्हीं अभिलाषों ने हमारा जीवन दूभर कर दिया है।
- 7:49हम जीते हैं, मरे मरे जीते हैं अभिलाषाओं का बोझ हमारे दिमागों
- 8:01पर इतना घनी भूत हो जाता है। कि हम चल भी नहीं पाते।
- 8:11ये बोझा ऐसा कि हम इसे छोड़ते हैं के सारे सृजन।
- 8:24उसकी ही इच्छा में हो रहा है सब कुछ सभी तारे सभी ग्रहण उसकी
- 8:38इच्छा में घूम रहे हैं। तू भी मानो।
- 8:45तू उसकी इच्छा से बाहर कहाँ गया? तेरी स्वतंत्र इच्छा हो कब से की?
- 8:57फिर शिव कहते हैं कि तू सुख का इच्छुक है।
- 9:06सुख का आशिक है कौन है जो सुख नहीं चाहता?
- 9:15प्रत्येक व्यक्ति सुख की चाहत को हृदय में परवाह करता है, सुख नसीब
- 9:22नहीं होता क्या? कारण?
- 9:26ये चाहत ही कारण है वो सुख की हो, वो मोक्ष की हो या किसी भी अन्य
- 9:39पदार्थ की हो। किसी भी चीज़ की इच्छा उस चीज़ को
- 9:49पाने में बाधा पैदा करती है। बड़ा अद्भुत सूत्र है।
- 9:56इच्छाएं बहुत हैं तो रुला ही है इच्छाएं कम है।
- 10:04शहंशाह ही है। इच्छाएं बिलकुल नहीं तो खुदा ही
- 10:10है, इच्छाएं बिलकुल नहीं अगर खुदा होना है।
- 10:24अगर आनंद का समुद्र होना है तो सभी इच्छाएं को त्याग ये इच्छाएं
- 10:32बड़ी संकीर्ण है। इच्छाएं बड़ी शूद्र है।
- 10:41और तुम बड़े विराट और इस बैराट के आगे जब सुधरा जाता है तो तुम्हें
- 10:55विराट दिखना बंद हो जाता है। तुमने देखा?
- 11:00छोटी सी आंख दूरदराज तक विराट आकाश को झांक लेती ये रात्रि की
- 11:11काली माँ से भरा हुआ आकाश। तारों की जगमगाहट से भरपूर
- 11:24परमात्मा की विराट की आरती उतारता हुआ तुम्हारी एक छोटी सी आंख देख
- 11:33पाते, लेकिन कभी ख्याल किया? इस आंख के भीतर अगर थोड़ा सा रेत
- 11:43का कण पड़ जाए, माँ मूली तो क्या होगा, आंख बंद हो जाएगी, रड़क
- 11:53पड़ेगी, दर्द हो कश्क बहे। और दिखाई पड़ना बंद हो जायेगा।
- 12:01देखिये एक छोटे से रेत के कण का जलवा छोटे से रेत के कण का परिणाम
- 12:14विराट आकाश तुम्हें दिखाई नहीं पड़ेगा इस छोटे से रेत के कण के
- 12:22कारण बस यही हालत तुम्हारी है। तुम्हारी आंख विराट आकाश को निहार
- 12:35सकती है। विराट आकाश के भीतर चाँद तारों की
- 12:40रौशनी और उसकी कायनात कैसे बंधी है उसका नजारा देख सकते है।
- 12:48लेकिन जब इस आंख में कणक पड़ जाता है, रेत का छोटा सा कणक।
- 12:57तो विराट आकाश दिखना बंद हो जाता है।
- 13:02मुझे लोग पूछ लेते है की अगर हम ब्रह्म है जैसा ऋषि उदभोष करते है
- 13:12अहम् ब्रह्मस्त्र शिबो हम। तो फिर दिखाई क्यों नहीं पड़ता?
- 13:21तुम्हारी आंख में रेत का कण पड़ता है।
- 13:28इस कण के कारण जैसे विराट, आकाश आंख को दिखाई नहीं पड़ता।
- 13:36एक छोटा सा रेत का कण पड़ जाए तो ऐसे ही तुम्हें शिवम अहम
- 13:44ब्रह्मस्त्र अनलहक ये दिखाई नहीं पड़ता।
- 13:52तुम्हारी आंख में कण पढ़ गया है। और यह कण तुम्हें आसमान की भव्यता
- 14:01को निहारने में बाधा बनता है। ये कण टूटे, ये कण बाहर निकले।
- 14:12तो आँख तो तुम्हारे पास है, आँख तो कभी लुप्त नहीं होती।
- 14:20आंख कभी विनिष्ट नहीं होती, बाधा है तुम्हारे आंख का काढ़।
- 14:34कैसे निकलू जंगल अपने मन के आकाश को खाली कर दो मुझे अभी कल?
- 14:54छोटा शब्द में सज गया, बाबा तरक की धार को थोड़ा कम तीव्र चलाओ,
- 15:08तरक की धार को कुंड बढ़ जाने दो, थोड़ा धीमे।
- 15:15इतनी तीब्र धारा रखोगे मुँह मुक्छु भाग जाएंगे मुँह मुक्छु
- 15:30सुनना बंद कर देंगे। नहीं, तुम गलत कहते हो।
- 15:40जैसे प्यास लगी है वो किसी भी शर्त के ऊपर पानी पीने को तैयार
- 15:51हो जाएगा। और जीसको जितनी तीव्र व्यास लगी
- 15:56है, वो उतनी ही कठिन शर्तों के ऊपर जल पान करने को राजी हो
- 16:02जाएगा। इसलिए कबीर कहते हैं जो घर बार
- 16:07अपने चले हमारे साथ। जे तो प्रेम मिलन की चाह सी सथड़ी
- 16:22दर घर में रह आऊं राजा पर जा जही रुचा।
- 16:29शी स देह ले जाए ये शब्द आपको इशारा किधर करते है?
- 16:35शी स चाहिहस वो मूक्षु भाग जाएंगे सर वो मूक्षु नहीं।
- 16:50मुक्शु अगर भाग जाए तरक्की तीव्र धारा को देख कर तो समझो वो शीश से
- 17:03कटवाने को तैयार है। वो घर जलाने को राजी नहीं है।
- 17:10बस और दूसरा कोई कारण है घर जलाने को राजी जीस दिन हो जाएंगे उस दिन
- 17:20को शिष्य मो। मोक्ष बन जाएंगे मोक्ष कभी भाग्य
- 17:24का। जैसे प्यासा कभी भागेगा नहीं।
- 17:30बस दिख जाए कि पानी यहाँ है। पानी से भरा मटका प्यासे को दिखना
- 17:39चाहिए और दिख जाए कि पानी से भरा मटका है।
- 17:45ताजा कोहरा। और पानी पिलाने वाला शाकिर भी है
- 17:56तो फिर तुम कोई भी शर्त बर्दाश्त कर लेगा।
- 18:06फिर तो अंजलि को बांध ही ले दो कुट पीला दे शाकिया दो कुट पीला
- 18:20दे शाकिया बाकी मेरे ते। रोड दे दो कूट पे ला दे बाकी मेरे
- 18:36ते रोड दे दो कूट पे ला दे साकी। जाना चाहिए कि यहाँ प्याले भरे
- 18:48पड़े मदहोश को नहीं होना चाहता, को नहीं उस खुमारी में डूब जाना
- 19:02चाहता। तुम दिन भर संसार के पचड़ों में
- 19:11उलझे उलझे सांझ मखानी की तरफ कदम उठाना शुरू कर देते हैं।
- 19:23मदहोशी, ये मदहोशी, तुम्हारी जरूरत है इच्छा नहीं।
- 19:38ये तुम्हारी आवश्यकता है नहीं तो आपको रात भर नींद नहीं आएगी, नहीं
- 19:52तो दिमाग ऐसे ही सोचता रहेगा ताने बाने बोलता रहेगा सारी रात आँखों
- 19:59में आँखों में गुजर जाएगी। सांज डाले तुम्हारे पांग उठते हैं
- 20:11मैखाने की तरह साफ है की तुम मद होशी के।
- 20:21आशिक हो तुम्हें मैं चाहिए मैं के प्याले चाहिए बस दिख जाने चाहिए
- 20:38कि यहाँ मैं है। अगर सच में प्यासी हो और दिख गया
- 20:47कि यहाँ पानी है और सच में चिंतित हो, सच में दुखी हो और दिख गया कि
- 20:56यहाँ मैं के जहाँ पैमाने छलकर हैं।
- 21:03तो तुम्हें सोचना कहाँ पड़ता है खुद बखुद तुम्हारे पांव उठने शुरू
- 21:10हो जाते हैं पर पता ही नहीं चलता कब तुम मैखाने के भीतर जाके बैठ
- 21:16जाते हो। ये तुम्हारी जरूरत है इच्छा की
- 21:27बात नहीं, इच्छाएं तो तुम्हारी पैदा की होगी।
- 21:36फिर समझे ना शिव के इस। सूत्र में गहरा चढ़े इच्छाएं
- 21:46ईश्वर प्रदत्त डिजायर्स अरे क्रिएटेड ब्य यू।
- 21:58परमात्मा प्रदत्त नहीं है ये इच्छाएं तुमने बनाई है परमात्मा
- 22:06प्रदत्त तो एक ही चीज़ है, वो है तुम्हारी जरूरत और तुम अभिलाषा
- 22:15करते हो। सुख की तुम्हें पता नहीं सुख
- 22:21तुम्हारी जरूरत है तुम अभिलाषा करते हो मुक्ति की मोक्ष की
- 22:30तुम्हें पता नहीं मोक्ष तुम्हारी जरूरत है और ध्यान रखना।
- 22:37जीस चीज़ की तुम्हें जरूरत है वो शिव कहते हैं कि तुम्हें अर्जुन
- 22:43करने की आवश्यकता नहीं है वो तुम हो यही अष्टावक्र कहते हैं यही
- 22:53दत्तात्र। सुख तुम्हें अर्जन नहीं करना और
- 23:02फिर अर्जित किया किया सुख तो अगले ही पर समाप्त हो जाता है क्षीण हो
- 23:09जाता है और कुछ देर के बाद। वो दुख में बदल जाता है।
- 23:18अर्जित किए सुखों का स्वाद तुमने चख लिया, कोई काम नहीं पड़ा तो अब
- 23:29अर्जित किए सुख की अभिलाषा को त्याग।
- 23:35तो अगर शिव कहते हैं कि सुख की अभिलाषा को त्याग दो तो उनके कहने
- 23:42का मतलब सिर्फ यही है अर्जित किए हुए तुम्हारे प्रयास से अर्जित
- 23:50किए हुए। सुख जो तुम्हें मिलेंगे, जो
- 23:54तुम्हें समझ में है कि ऐसा करूँगा तो सुखी हो जाऊंगा।
- 24:04बस इस समझ को समझ बाधा है। जो तुम ये समझते हो की ये विधि
- 24:16अपना लूँगा विज्ञान भैरवतंत्र की राधे राधे, झप लूँगा राम, राम झपक
- 24:23दूंगा पांच नाम झपूंगा विज्ञान भैरवतंत्र की।
- 24:29112 विधियों में से ये विधि कर लूँगा तो सुखी हो जाऊंगा तुम गलती
- 24:35में तुम्हारे द्वारा अर्जित किए सुख।
- 24:48तुम समझते हो कि हम इनके द्वारा सुखी हो जाएंगे, लेकिन तंत्र का
- 24:56सूत्र तो कुछ और बोलता है। तंत्र तो कहता है कि पहले अभिलाषा
- 25:02जगेगी सुखी होने को, फिर तुम विधि को अपनाओगे।
- 25:09पहले अभिलाषा जगेंगी फिर तुम विधि को अपना की कैसे इस अभिलाषा को
- 25:20पूर्ण किया जाए? कहावत है पहले बना प्रारब्ध पाछ्य
- 25:33बना शरीर तुम्हारा प्रारब्ध पहले जन्म लेता है और उस प्रारब्ध के
- 25:41अनुसार शरीर जन्म लेता है प्रारब्ध।
- 25:44जाने, इच्छाओं कसम तुमने कोई इच्छा कभी की होगी वो प्रारब्ध
- 25:53बनकर आज तुम्हारे अचेत मन में ठहर गई और वो तुम्हारी अभिलाषा मुक्त
- 26:02है। उसे वासना कहते हैं।
- 26:07उन वासनाओं में उलझे, उलझे तुम समझते हो कि हम अपने अर्जन करके,
- 26:14सुख पैदा कर और उसमें तुम्हारे मार्गदर्शक सहायता करता है।
- 26:25ढंग बताते हैं। विधियों बताते हैं, ये कर, वो कर
- 26:31और रोज़ नए ढंग पैदा हो रहे मेरे पास तो कुछ प्रश्नों के अंबार
- 26:38लगते हैं। और ऐसे ऐसे प्रश्नों के अंबार
- 26:44लगते हैं जो इससे पहले कभी किसी ने सोचे भी नहीं थे कि हम ऐसे
- 26:52प्रश्न करें। तुम्हारी अभिलाषा बिल्कुल वैसे ही
- 27:04है जैसे फूल यह अभिलाषा कर कि मैं सुगंधित हो जाऊं, उसकी ये अभिलाषा
- 27:18गलत है। क्योंकि वो पहले से ही सुगंधित
- 27:23है। तुम भी अभिलाषा करते हो कि मैं
- 27:29अमर हो जाऊं, लेकिन तुम उस छोर को जानते नहीं जहाँ तुम अमर हो जहाँ
- 27:38तुम कभी मृत्यु हो। नैनम छिद्धन तीर्थयास्त्रणा नैनम
- 27:48दहाती तुम ऐसे नृत्य हो, तुम ऐसे शुद्ध बुध हो, तुम ऐसे शुभ हो।
- 28:01जिसका कभी अंत नहीं होता। वो तुम और तुम ऐसी अभिलाषा करो कि
- 28:09मैं ऐसा हो जाऊं तो फिर ये अभिभाषा वादा ही तो बनेगी क्योंकि
- 28:16तुम पहले से ही हो। तुम कहते हो कि सारी सृष्टि का धन
- 28:22मेरे पास आ जाए, लेकिन शिव कहते हैं कि तुम पहले से ही सृष्टि के
- 28:28मार्ग को जिन्होंने उदघोष किया हम ब्रह्मास्त्र उस उदघोष के पीछे
- 28:36इसका अर्थ का है सारे ब्रह्म की संरचना का मालिक में हम
- 28:43ब्रह्मस्त्र और मतलब क्या है तुम अगर कहते हो की सब जगह?
- 28:54सारा क्षेत्र मेरे नाम हो, सारी धरती सहारा कायनात मेरे नाम हो,
- 29:05छोटे छोटे टुकड़ों की रजिस्ट्री करवा लेते हैं और शिव कहते हैं।
- 29:13ये पहले से ही तुम्हारी यू आर फोमनी प्रेसेंट तुम ही व्यापक हो
- 29:23यू आर फोमनी पोटेंट सारी शक्ति तुम्हारी है।
- 29:34तुम्हारे सवाल और कुछ नहीं अपनिषद भरे पड़े भेद भरे पड़े, शास्त्र
- 29:43भरे पड़े एक तू ही है और दूसरा कुछ।
- 29:56एक ओह, ब्रह्म द्वितीय और नास्ती, लेकिन तुम समझोगे कब शर्त तो
- 30:04पुकार पुकार के करते है के विराट। के भीतर कण कण के भीतर समाए हुए
- 30:16तुम ही तो हो और तुम्हारे सिवा कौन है?
- 30:24कोई तुम ही तुम हो। जिधर देखता उधर तू ही तो है हर
- 30:40झर्रे में तू ही तो रूबरू है लेकिन ये पता कब चलेगा ये पता
- 30:47चलेगा जब आंख में से कणकणक। जब उस समुद्र के आग आग से सूरज के
- 31:01आग से मेघ मंडली चट जाएगी आसमान साफ हो जाएगा।
- 31:08तुम्हारा आसमान तो भरा पड़ा है। ज़रा भीतर जाके दिखाओ ऋषि क्यों
- 31:15कहते है, मनीषी क्यों कहते है, अपने मन के भीतर उतर के तो देखो?
- 31:27तुम्हें पता चलेगा तुमने कितना कचड़ा इकट्ठा कर दिया है और तुम
- 31:33इस कचड़े को हीरे मोती जोहरातों से भी ज्यादा कीमती समझे बैठे
- 31:39छाती से लगाए बैठे कोई छीन ना ले। इस भय के कारण रात रात जागते हैं।
- 31:54कोई चोर न चुरा ले कोई डाका न मार ले इस भय के कारण।
- 32:05तुम रात रात भर इसकी चौंकी तारीफ करते हो?
- 32:12लेकिन शिव कहते हैं यह वो तत्व है जिससे चोर चौरा नहीं सकता, जिसके
- 32:20ऊपर डाका पढ़ नहीं सकता। जो कटता नहीं, जो गलता नहीं, जो
- 32:29जलता है, जो सूखता नहीं, जो तुम अगर अमर तुम ही तो हो कृष्ण यही
- 32:39बात करते है। जीस तन इस आंख से कणक निकल गया
- 32:48आंख तो तुम्हारे पास है कणक बाहर से आया है, आंख तुम्हारी स्वयं की
- 32:56है। कणक बाहर से पड़ा है।
- 33:03यह फौरन मटेरियल है। यह वीजा अति या द्रव्य है, इसको
- 33:09हटाना होगा। और जब तक तुम इसको नहीं हटाओगे
- 33:16फिर चलाते रहना। तो की आंख में जब भी ये कणक पड़ता
- 33:22है, विजातीय अद्रव पड़ जाता है, आंख दर्द करती है अश्क वैसे तकलीफ
- 33:36होती है। बस ये जो तकलीफ तुम्हें खाये जा
- 33:40रही है, दिन भर रात इसे तुम्हें चैन नहीं आता जो रात भर जागकर तुम
- 33:48तारे गिनते हो और तुम शिकायत करते हो?
- 33:58हे तू मुझे फूल कर हे परमिता तुने मुझे भिसार दिया रात रात भर जाग
- 34:11कर तेरी याद में। मैं रात व्यतीत करता हूँ दिन भाग
- 34:20दौड़ में भी जाता है पर रात इस फिगर में गुजर जाती है क्या होगा?
- 34:33कल क्या होगा? कुछ अतीत की समृतियाँ तुम्हारे
- 34:40चित के ऊपर छायी रहती है और कुछ भविष्य की कल्पनाएँ तुम्हारे चित
- 34:47को उद्वेलित करते है तुम कभी? ठहर नहीं पाते तो शिव कहते हैं कि
- 35:00अतीत की स्मृतियों को बिसार दो, भविष्य की योजनाओं को पुरोहित कर
- 35:08दो, वर्तमान में आ जाओ। और फिर वर्तमान में आकर भी ध्यान
- 35:19रखना, वर्तमान को भी छोड़ देना, ये भी चिपकाहट का एक कारण न बन
- 35:29जाए। भविष्य से मुक्त हुए अतीत से
- 35:36मुक्त हुए तो वर्तमान से चिपक मत जाना जो भी है बस यही एक पल है।
- 35:50तो फिर ऐसे चिपक गए, फिर भविष्य से चिपके के अतीत से चिपके के
- 35:56वर्तमान से चिपके तुम चिपक गए तुम कहीं मत ठहराओ तुम सब छोड़ दो।
- 36:06अभिलाषा को छोड़ दो अभिलाषा को छोड़ने का अर्थ है ना भविष्य रहे,
- 36:13ना वर्तमान रहे, ना अतिथि रहे कुछ ना रहे वक्त समाप्त हो जाये
- 36:21टाइमलसनेस और जहाँ वक्त समाप्त हो जाता है।
- 36:26वह तुम पाते हो कि सारे बादल छट गए, सारे बादल दुःख के बेले हो
- 36:38गए। जैसे ही अभिलाषाएं मिट।
- 36:46और तुम अपने भीतर उतर के देख रहे हो तुम पाओगे अभिलाषाएं ही
- 36:54अभिलाषाएं और तुम्हारी बुद्धि विवेचना करती है तुम्हारी बुद्धि
- 37:02भेद करती है। तुम्हारी बुद्धि कहती है कि यह तो
- 37:07संसार का अभिलाषा है और फिर तुम्हारी बुद्धि एक चाल चलती है
- 37:16कि मुक्ति की अभिलाषा तो परामार्थिक अभिलाषा है, यह तो
- 37:22संसार से परे की अभिलाषा है। यह तो आध्यात्मिक अभिलाषा है।
- 37:28क्या इस अभिभाषक को भी छोड़ दे बिलकुल छोड़ दो पकड़ मात्र को
- 37:36छोड़ दो अभिलाषा एक पकड़ है। क्लिंगनेस है अभिलाषा चिपकाहट है
- 37:49अभिलाषा गोंद है, अभिलाषाओं को अलविदा कहना होगा।
- 37:59तो शिव कहते है कि सुख की अभिलाषा को त्याग दे मर्वती और मुक्ति की
- 38:08मोक्ष की अभिलाषा को भी त्याग दे और फिर देख।
- 38:19चारों तरफ सुख का ही संगीत बज रहा है, कहीं कोई दुख का नाम मंत्र भी
- 38:31नहीं है, दुख का अवशेष भी तो नहीं बचता?
- 38:39साला जब तुम जाग जाते हो, आँख बंद हो या आँख में किन कपड़ा हो तुम
- 38:47देख नहीं सकते आँख बंद करके तुम स्वप्न देख रहे हो या आँख में
- 38:54किनक पड़ गया और तुम्हें दिख नहीं रहा कुछ।
- 38:59दोनों स्थितियां समान दिख कुछ नहीं रहा।
- 39:04सत्य का कुछ नहीं दिख रहा। या तो परिकल्पनाएं दिख रही है या
- 39:10दिख ही नहीं रहा है। इन दोनों ही स्थितियों में तुम
- 39:16अंध। स्वप्न देख रहे हो, फिर भी अंधे
- 39:21हो वो स्वप्न भविष्य के हो, बहुत स्वप्न अतीत के है, फिर भी अंधे
- 39:29हो और अगर आंख में कनाक पड़ गया है।
- 39:37फिर भी दिखाई नहीं पड़ता, फिर भी तुम अंधे हो।
- 39:41ये किनक वर्तमान का है। वर्तमान में भी चिपक मत जाने
- 39:52वर्तमान में आ जाना भविष्य को। अतीत को छोड़कर त्याग कर वर्तमान
- 40:01में आ जाना, लेकिन वर्तमान से भी चिपक मत जाना।
- 40:07वर्तमान में ठहरना भी एक अभिलाषा है।
- 40:16बंधरों को तो त्याग करना ही है, मोक्ष की अगराशा को भी त्याग करना
- 40:26है अन्यथा तुम मुक्त न हो। तुम बंधे ही रहोगे क्योंकि ये
- 40:34बंधन सच का बंधन नहीं, ये बंधन तुम्हारा बनाया हुआ तुम्हारी
- 40:42मानसिक प्रक्षेपण है, ये सत्य नहीं, यह तुमने बनाया है।
- 40:53और अगर तुम इससे चिपके रहे तो यह बरकरार रहेगा।
- 40:59इसकी चिपकाहट को छोड़ दो, यह समाप्त हो जाएगा सुख की।
- 41:10अभिलाषा को त्याग दे मोक्ष की अभिलाषा को त्याग दे दो ही चीजें
- 41:18होती है या तो तुम संसार का सुख चाहते हो या तुम अध्यात्म में
- 41:27मुक्ति चाहते हो। दो बड़ी इच्छाएं संसार में धनी
- 41:33कैसे हो जाऊं सारी दुनिया मेरे पांव कैसे पड़े मैं और मैं अकेला
- 41:43कैसे हो जाऊं? यह सांसारिक अभिभाषण और अध्यात्म
- 41:56की अभिलाषा है। मन का अवकाश जब सभी अभिलाषाओं से
- 42:05मुक्त हो जाता है। तो दमकता हुआ सूरज आपको दिखाई
- 42:15पड़ने लग जाता है और सूर्य तो सदा से है लेकिन तुम्हारी अभिलाषाओं
- 42:23के बादलों ने। इस सूरज को डाक दिया जाता है तो
- 42:30जैसे ही ये सूरज हट, ये बादल हटे हैं, सूरज तो सदा से है, सूरज को
- 42:39प्रकट नहीं करना है और ये ही कहते हैं शिव।
- 42:45कि तुमने सुख को पैदा नहीं करना, तुम्हारे सुख के पैदा करने के सभी
- 42:52साधन व्यर्थ हो जाएंगे आखिर में लेकिन तुम्हारे सुख का मूलभूत
- 43:01अस्तित्व कभी समृद्ध होने को? तुम्हारे सुख का अस्तित्व परम
- 43:08आनंददायिनी अस्तित्व तुम्हारा स्वयं का होना यह कभी समाप्त नहीं
- 43:17तुम सजा से मुक्त हो तुम बदे नहीं।
- 43:24ये ही कहते हैं तंत्र के सूत्र और ये जो तुम चिल्ला रहे हो ओके मैं
- 43:31बंधा हूँ मुझे मुक्त करो बस फिर ये अन्य अन्य विधियों को जन्म
- 43:39देंगे। फिर पखंडी गुरुआजन प्रत्येक गुरु
- 43:46जो तुम्हे कहता है कि हाँ तुम बंधन में हो, हाँ तुम्हे इस बंधन
- 43:52को खोलने की आवश्यकता पड़ेगी, हाँ तुम बंधे हुए हो।
- 43:59और जब ये बंधन टूटेगा तभी तुम मुक्त हो पाओगे, लेकिन तंत्र कहता
- 44:05है तंत्र सीधे सीधे उस तत्व में प्रवेश कर जाता है जो तुम सदा से
- 44:17हो। और वह कभी बंधा नहीं।
- 44:24वह कभी दुखी नहीं हुआ। जहाँ तक आग नहीं पहुँचती जहाँ तक
- 44:32दुख नहीं पहुँचता। वहाँ तक मृत्यु नहीं पहुंचती, कुछ
- 44:43नहीं पहुंचता वहाँ तक जो सबकी पहुँच से परे है तुम्हारे दुःख,
- 44:50दर्द, रोग, संताप, कष्ट, क्लेश। सुख बाहर रह जाते हैं।
- 45:01बना सूर्य जो ने कभी बादलों की परवाह किया है।
- 45:12पहला बादल कभी सूरज तक पहुंचे नहीं।
- 45:17जैसे बादल सिर्फ आसमान में रहते हैं, सूरज को ढक लेते हैं, माना
- 45:25लेकिन बादल सूरज को छू नहीं पाते, ढक सकते हैं।
- 45:32सूरज तक जा नहीं पाते, उसी तरह तुम्हारे गम के बादल, तुम्हारे
- 45:41दुख के बादल, तुम्हारी रोग के बादल तुम्हारी चिंताओं के बादल।
- 45:55तुम्हारे अज्ञान के बाद तुम्हारे आत्म तत्व तक कभी नहीं पहुँच
- 46:03पाते। अंतिम शब्द बोला कृष्ण कि वह तत्व
- 46:12कुछ ऐसा है। जो किसी अस्त्र शस्त्र से कर्तन
- 46:19है, कुछ ऐसा है जो आग से जलता हो, कुछ ऐसा है जिसे पानी गला नहीं
- 46:32सकता। और कुछ ऐसा है जिससे वायु सुखा
- 46:38नहीं सकती। कितना ही भीषण तूफान हो, कितनी ही
- 46:43भीषण बाढ़ हो, कितनी ही आग बरसाती, गर्म और।
- 46:52कितना भी गहरा तीखा शस्त्र हो, अस्त्र हो, तुम तक नहीं पहुंचता
- 47:02तो फिर जब तुम तक पहुंचता नहीं, तुम निर्भय हो, तुम्हें कोई भय
- 47:11नहीं। क्यों तुम अकाल मूर्ति हो?
- 47:16काल तुम्हे घेरता नहीं, काल तुम्हे छू भी नहीं पाता।
- 47:24घेरना तो बहुत दूर की बात है, काल तुमसे बहुत दूर छिटक जाता है।
- 47:36ऐसे हो तुम? कृष्ण भी ऐसा कहते हैं।
- 47:43दत्तात्रेय भी ऐसा कहते हैं, अष्टावक्ष भी ऐसा कहते हैं और शिव
- 47:50भी ऐसा कहते हैं। तो तुम ऐसे तत्व हो जो परम सूख के
- 48:01खजाने बस भूल गया हो दिखना बंद हो गया है जो आंख देख सकती थी।
- 48:12उसमें कणक पड़ गया है वो कणक को निकाल लो वो कणक है, कण है
- 48:22तुम्हारे चित के ऊपर छाये हुए ये अभिलाषाओं के बादल, वह अभिलाषाएं
- 48:29चाहे संसारित है। चाहे अध्यात्मिक खत्म कर देते
- 48:37हैं, शिव दो विभिन्न छोरों की बात करते हैं संसार के छोर पे सुख का।
- 48:49अभिलाषा त्याग दे और अध्यात्म के छोर पर मुक्ति का अभिलाषा, त्याग
- 49:00और दो ही छोर संसार का छोर तुम्हें लालच दिखाता है कि सुख
- 49:06मिलेगा। और अध्यात्म का सुख तुम्हारे
- 49:14शास्त्र तुम्हे क्या बताएंगे, क्या लोभ दिखाएंगे तुम वहाँ पहुँच
- 49:20तुम्हे सुख मिलेगा, लेकिन शिव कहते है।
- 49:29वहाँ तुम पहले से ही हो पहुंचोगे कैसे तुमने अपना स्वय कभी खोया ही
- 49:38नहीं तुमने अपने आप कभी गंवाया ही नहीं।
- 49:44पहुंचने का सवाल ही नहीं पैदा होता।
- 49:47फिर ये है क्या? ये है सिर्फ तुम्हारा स्वप्न
- 49:53स्वप्न भी होता है जब तलक तुम देखते हो ये तुम्हारी क्लिंगनेस
- 50:00है तुम्हारी चिपकाहट है। बस इसको छोड़ दो।
- 50:04ये जो चित्त भरा हुआ है, अभिलाषाओं से वो अभिलाषाएं अच्छी
- 50:10हैं, वो अभिलाषाएं डाका मारने की हैं, वो अभिलाषाएं दान करने की
- 50:17हैं, लेकिन शिव कहते हैं दोनों को ही।
- 50:22अभिलाषाओं से मुक्त हो जा न सुख की अभिलाषा कर और रही मुक्ति की
- 50:31अभिलाषा कर जैसे घड़ी तुम निर अभिलाषित हुआ हुआ हो गया।
- 50:43तो ये कणक निकल जाएगा आँखों से और तुम्हारी आँखें नरमल हो जाएंगी
- 50:50शुद्ध हो जाएंगी बस इसी को निर्मल कहा भगवान राम ने निर्मल मन जन
- 50:58सोई मोही पावा। मोहे कपट छल छिद्र न बाबा ये सभी
- 51:05कण है जो तुम्हारी आंख में पड़े हुए हैं, कपट, छल, छिद्र ये सब
- 51:14बैर, नफरत ये सभी कण है। कल एक प्रश्न पूछा क्या प्रेम से
- 51:27परमात्मा पाया जा सकता है? प्रेम भी कण है फिर तुम कहोगे सुख
- 51:40नहीं दुख। मुक्ति नहीं बंधन और नफरत नहीं,
- 51:47प्रेम नफरत के लागे दूसरा पहलू से के का प्रेम है उस प्रेम की तो
- 51:57बात ही नहीं करते कवि वो प्रेम तो तुम हो।
- 52:03प्रेम करोगे कैसे प्रेम तक तो पहुंचोगे प्रेम तो तुम हो प्रेम
- 52:12तुमने करना नहीं है, प्रेम करने जैसी चीज़ नहीं प्रेम गंतव्य जैसी
- 52:20चीज़ है। प्रेम तुम्हारी जरूरत है प्रेम
- 52:28तुम्हारा पड़ाव नहीं प्रेम तुम्हारी मंजिल है प्रेम करना
- 52:34नहीं है कहने में। शब्द ऐसे ही आएँगे जिन्हें फ्रेम
- 52:39किए होते करना नहीं है। प्रेम प्रेम तक पहुंचना है, प्रेम
- 52:47तुम्हारा गंतव्य है, प्रेम तक जाना है, तुम्हें तुम प्रेम के
- 52:54खजाने हो और वो। प्रेम ही आनंद देता है, नफरत दुख
- 53:01देती है, प्रेम आनंद देता है और तुम प्रेम के खजाने प्रेम करना
- 53:10नहीं, प्रेम तक छलांग लेनी है। तुम्हारे अपने आपे तक छलांग लेनी
- 53:19है, उसे प्रेम कहलो, उसे अमृत कहलो, उसे सुख कहलो उसे आनंद
- 53:25कहलो, उसे मुक्ति नाम तुम्हारा, राम कहलो अल्लाह कहलो कुछ भी
- 53:35कहलो। नाम तो लिखियों के नाम है लेकिन
- 53:43दोहराव नहीं है। करना नहीं है, ना दोहराव करना है,
- 53:51ना ही प्रेम करना है। तुम तो पकड़ छोड़ दो, तुम तो मन
- 54:00के आकाश को खाली करो, अभिलाषाओं से मुक्त करो, प्रेम करने की भी
- 54:07अभिलाषा है, इस अभिलाषा को छोड़ दो।
- 54:15अभिलाषाओं से अपने मन के आकाश को कार्य कर वो अभिलाषा तुम्हे कितनी
- 54:25ही अच्छी क्यों न लगता है, कितनी ही सात्वी का क्यों न लगे है,
- 54:31कितनी ही अध्यात्म का क्यों न लगे है।
- 54:36इच्छा मात्र को त्याग दो अभिलाषा मात्र को त्याग दो।
- 54:42शिव यही कहते हैं पार्वती और जीस वक्त तुम अभिलाषाओं को त्याग दो
- 54:51तो तुम पाओगे। ये तुम्हारा सारा मन अभिलाषाओं का
- 54:59एक पुंज है। इन्हीं अभिलाषाओं के पुंज ने
- 55:05इकट्ठा होकर तुम्हारे आनंद को ढक लिया है।
- 55:10और छांट दो। इन बादलों को जैसे ही बादल छट
- 55:16जाएंगे, प्रेम पैदा नहीं करना पड़ेगा, आनंद पैदा नहीं करना
- 55:24पड़ेगा, सारे संसार का मालिक होना नहीं पड़ेगा।
- 55:32सारे संसार में फैलाव करना नहीं पड़ेगा, तुम हो तुम सभी जगह
- 55:44विद्यमान तुम सभी जगह विराजमान। कोई ऐसा स्थान जहाँ तुम होर बिन
- 55:57नावें नाहीं कोथा जेता किता तेता नांव ये सारा पसारा ये सारी
- 56:08सृजना। सिर्फ इस धरती को ही मत सुन लेना
- 56:14सर्जना की बात हो रही है। जेता कित्ता जितनी सर्जना देत नाम
- 56:22उसको नाम कहते हैं बाबा और तुम नाम को झप रहे हो?
- 56:35बिन नावे नाहीं को था उसमें डूब जाना है, उसमें मिट जाना है और
- 56:45तुम जहाँ भी हो वहीं मिट सकते हो। किसी विशेष गुरु की मिटने के लिए
- 56:56आवश्यकता नहीं जहाँ है तुम मिटोगे तुम्हारे झुकने के कारण तुम अकड़े
- 57:07हो। तुम्हारा अंकार तुम्हारी अकड़ है
- 57:15और तुम्हारे अंकार को मिटा तुम ही सकते हो।
- 57:19गुरु तो मिटाएगा तो तुम और ज़्यादा मजबूत हो के खड़े हो
- 57:24जाओगे या भाग जाओगे या और ज़्यादा मजबूत हो के खड़े हो जाओगे।
- 57:31ये तो तुम्हारे मटाई से ही मटेगा ये अकड़ तो कुछ ऐसी है ये भ्रम तो
- 57:39कुछ ऐसा है तो तुम्हे स्वयं ही मटाना पड़ेगा ये अकड़ तो कुछ ऐसी
- 57:48है। के झुकना तुम्हें ही पड़ेगा
- 57:52समर्पण कोई और करे भोजन कोई और खाये और तृप्त तुम हो आनंद को तुम
- 57:59महसूस करो, यह नहीं हो सकता झुकना तुम्हें ही होगा यू विल हैव टु गो
- 58:08डाउन? तो मैं ही झुकना दूंगा और जहाँ
- 58:12झुकोगे वहाँ पाओगे, उसी के कदम फिर तुम्हारे पास गुरु है नहीं
- 58:20है। कहीं भी झुको लेकिन झुको, धन्ना
- 58:25पत्थर के आगे झुक जाते है। में प्राण भगत मूर्ति का आगे झुक
- 58:33जाता है। झुकने की कला आनी चाहिए परमात्मा
- 58:41झुकने की कला में ही विद्यमान झुकने की कला।
- 58:47तुम्हारी सब आशाओं को समाप्त कर देती है।
- 58:55अभिलाषों को समाप्त कर देती है जीस घड़ी तुम झुकना सीख गए
- 59:01तुम्हारा चित खाली हो जायेगा। झुकने के वक्त तुम अपने ही भीतर
- 59:08गहरे गहरे, गहरे और गहरे और गहरे उतरते चले जाओगे जहाँ जहाँ से तुम
- 59:16गहरे गहरे उतरते चले जाओगे, तुम वही जनक के उदाहरण पाओगे कि जनक
- 59:23जहाँ जहाँ से गुजरे। वहाँ वहाँ से नरक समाप्त हो गया,
- 59:29स्वर्ग स्वर्ग आ गया, खुशबू उतार गई सारी तरफ तुम ही हो तुम उतरो
- 59:38अपने भीतर, जहाँ से तुम गुजराओगे। वहाँ से सारी अभिलाषाएं समाप्त हो
- 59:45जाएँगी और फिर बोले शाह के लिए छोटी सी पंक्ति से बोले आ रब्दा
- 59:57कीपण उठना। बात तो इतनी सी है उलझालो जन्मो
- 1:00:09जन्मो तक उलझाये हुए हो, कितने जनम बीत गए, तुम झुके।
- 1:00:21तुम अभिलाषाओं से मुक्त नहीं हुए और तो और परम सुख को पाने का सुख
- 1:00:30भी तुम्हारे लिए बंधन मुक्त होने का सुख भी तुम्हारे लिए।
- 1:00:41बंधन हो गया यही शिव कहते है सुखी होने की अभिलाषा को त्याग दे,
- 1:00:54मोक्ष होने की अभिलाषा को त्याग दे और फिर देख।
- 1:01:01हर तरफ़ सुख ही सुख है, अभिलाषाओं को मिटा दे जिधर देखता हूँ उधर तू
- 1:01:16ही तू है वो सुख का खजाना। भूसख का सरोवर जिधर देखोगे उधर ही
- 1:01:24बहोगे हर झर्रे में तू ही तो रुक उसके सिवा कुछ ना बहोगे बस झुकना
- 1:01:36सीख जाओ। ये झुकना तुम्हारी सभी अभिलाषाओं
- 1:01:40को खत्म कर देगा। अभिलाषाओं के कारण तुम अकड़ते हो,
- 1:01:48बेसिक काज है ये तुम अभिलाषा करते हो, अभिलाषा पूरी करने के।
- 1:01:57भीतर तुम अकड़ते रहो और यह अकड़ाव तुम्हारी आँख का कण है, जोगना सिख
- 1:02:08ले, फ्लेक्सिबल हो जाओ, बैंक हो जाओ, वो हो जाओ उसके चरणों में और
- 1:02:15सब जगह उसके चरणों। आवश्यक है कि गुरु के चरणों में
- 1:02:21ही तुम बैठे हो ये गलती मत खा जाना मैं तुम्हें एक नया सूत्र
- 1:02:27देता हूँ तुम जहाँ झुक गए वहाँ पाओगे गुरु के चरणों में ही तुम।
- 1:02:36जहाँ झुक गए झुकना एक कीमियां झुकना अलकैमी है झुकना रसायन
- 1:02:50विद्या है बस झुक के देख लो। जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ले जी
- 1:03:01झुकना बहुत बड़ी भला है, झुकने से तुम्हारी सभी अभिलाषाएं समाप्त हो
- 1:03:07जाएंगी और तुम वही हो जाओगे जो सदा से हो।
- 1:03:13आध सच जुगाद सच है भी सच नानक वो से भी सच धन्यवाद।