Latest / Baba ji Vijay Vats / 4 Jul 25 - शांति का रहस्य! संसार vs अध्यात्म:जीवन में Back Gear क्यों जरूरी है? लड्डू गोपाल की सच्चाई!
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- 0:02अभिराम पुश्ते हैं। ग्वालियर से संसार और अध्यात्म
- 0:21इसमें फर्क कीजिए। दो मंजिलें हैं, दो रास्ते हैं,
- 0:40एक ही व्यक्ति ने तय करने होते हैं, दो मंजिलें हैं, दो रास्ते
- 0:49हैं। एक ही व्यक्ति ने तय करने होते
- 0:53हैं जैसे आपने गाड़ी देखी है। गाड़ी चाहे तो आप सीधी चला लो
- 1:03सड़क पे चाहे तो बैटगर में डाल लो।
- 1:11उल्टा चलने लगी गाड़ी वही है, बुर्जे वही है, ईंधन वही डाला है,
- 1:22लेकिन गाड़ी के चलने में फर्क है आमतौर से त्याधारण त्या।
- 1:32सीधी गाड़ियां चलती हैं लेकिन कभी कभी उल्टी भी चलानी पड़ती हैं।
- 1:44पूछा अध्यात्म में और संसार में? फर्क समझाइए संसार सीधी यात्रा है
- 1:58आपके लिए पहला गियर डालो, दूसरा, तीसरा, चौथा टॉप गेट।
- 2:11एक बैकगेर भी होता है। जब कहीं जरूरत पड़ जाए तो बैकगेर
- 2:23का इस्तेमाल करना पड़ता है। ऐसे ही तुम्हारी ज़िन्दगी की
- 2:28गाड़ी है। दो मंजिलें हैं तुम चाहे इस संसार
- 2:37को चुनो, तो सीधा गैर डाल देना, फिर भगाना टॉप गैर में डाल देना
- 2:47खूब भगाना। गंतव्य मिल जाएगा।
- 2:53मैंने कहा दो मंजिलें एक मंजिल मिल गई संसार की मंजिल आपने बहुत
- 2:59गाड़ी भगाई, एक दिन जब वहाँ पहुँचते समय लगेंगी जहाँ तो उजाड़
- 3:09है सब। कांटे हैं, बबूल है, चोभते हैं,
- 3:16चिंता है, चिता है, समस्याएं हैं, सभी बेकार है, विचार है, विषय है।
- 3:33फिर तुम घबरा हो गए। यह संसार की यात्रा है और पुत्र
- 3:41अध्यात्म की यात्रा बेक। यहाँ इतना भाग के टोक गैर में
- 3:50गाड़ी लगा के तुम पहुंचे वहाँ मिले कांटे तुम्हारी टायर को
- 3:57पंक्चर कर देंगे, धूप को पंक्चर कर देंगे, हाथ डालोगे?
- 4:03हाथ लहू लोहान हो जाएंगे, पांव को जख्मी कर देंगे।
- 4:10जहाँ हर स्थान पे इधर इधर पे काटे धोखा है।
- 4:27बाबू जी धीरे चलना प्यार में। ज़रा संभालना बड़े थोखे हैं, बड़े
- 4:44थोखे हैं इस प्यार में बाबूजी धीरे चलना।
- 4:53प्यार में ज़रा संभलना बड़े धोखे हैं बड़े धोखे हैं इस राह में
- 5:08बाबू जी धीरे चलना। और तुम टॉप के घर में डाल दो के
- 5:16गाड़ी पहुँच जाओगे अपने मुकाम पे ये भी मुकाम देखा झाड़फूंक से है,
- 5:24कांटे हैं गर्दो उबार है चिंता चेता आग ही आग चारों तरफ।
- 5:31समस्याएं ही समस्याएं ज़िन्दगी का एक पहलू है।
- 5:36इसे संसार कहते हैं। फिर जब तुमने अच्छे से भोग लिया
- 5:51फिर तुम बेक के डालो जो भोग लेता है।
- 5:56उसे संसार में संतुष्टि नहीं मिलती लेकिन भोगना अनिवार्य भी
- 6:03है। भोग लो, दो तरीके हैं, भोगने के
- 6:12आग में हाथ डालोगे जलोगे। या तो खुद डाल के देख लो या किसी
- 6:19को हाथ डालते हुए देख लो एक प्रत्यक्ष है।
- 6:24एक अनुमान है इसको पीड़ा हुई होगी।
- 6:28जल गया उससे भी समीकार व्यक्ति। सबक ले सकता है, लेकिन जो थोड़ा
- 6:38सा ज्यादा प्रैक्टिकल लोग हैं वो कहते हैं, हम तो खुद ही जलेंगे और
- 6:44देखेंगे। पीड़ा भोग तो फिर आपकी मर्जी है
- 6:51आप संसार में कूदो। बेक गैर में डालोगे?
- 6:59गाड़ी दूसरा मार्ग है अध्यात्म का।
- 7:03यह अध्यात्म का मार्ग है। गाड़ी बेक गैर में डालना बेक गैर
- 7:08भी होता है और उसे तुम ही तय करोगे।
- 7:14संसार का रास्ता भी तुमने तय किया, तुम इन्हें दर्द दिया और
- 7:22अध्यात्म का रास्ता भी तुम ही चुनोगे और तुम दबा देना तुम भी
- 7:26दबा दोगे अपने आप को ये दोनों रास्ते तुम्हारे।
- 7:32मंजलें दो रस्ते भी दो एक सीधा सीधा रास्ता राजपथ एक व्यक व्यक
- 7:40का रास्ता तो सीधा रास्ता राजपथ का संसार व्यक रास्ता अध्यात्म।
- 7:51लेकिन या तो भोग के देख लो या भोग हुए लोगों का प्रतीक्षीकरण कर लो।
- 8:00देखो जिसने आग में हाथ डाला, उसने कितना कष्ट पाया।
- 8:07दो तरीके हैं अनुमान और प्रमाण। जैसे तुम्हे सटिस्फैक्शन मिले,
- 8:13वैसे ही कर लेना, लेकिन संत कहते हैं कि तुम्हारा भ्रम मिट जाना
- 8:20चाहिए। संत कहते हैं, भोगों में दुख
- 8:26मिलता है फिर तुम भोग के देखो। या जिन्होंने भोंगा उनकी दुर्दशा
- 8:33देख के फिर जाना है, तुम्हारी मर्जी है, थ्री के दो ही हैं
- 8:45संसार और अध्यात्म का वेद क्या है?
- 8:51सीधी गाड़ी चलेगी। टॉप गैर में डालोगे?
- 8:53खूब फाको की दौड़ में जितना तेज़ दौड़ सके, उतना तेज़ दौड़ और फिर
- 9:04आगे जाके तुम पाओगे, गर्दों को समझदार रोकता नहीं, किसी को वो
- 9:10कहता है। यही रास्ता है कष्टम अगर कहते हैं
- 9:18भोगो अभी जागने की कोई आवश्यकता नहीं अभी भोगो और भोग के पांव सुख
- 9:26हैं। अगर नहीं सूख पाया तो फिर तुम बेक
- 9:38गैर लगा रहे हो। जीस शरीर को बचाया था, आभूषणों
- 9:46से, मेकअप से। सुंदर सुंदर अल्फाज़ सजा के
- 9:53दुनिया को ठगा था, शांति न मिले, सुकून न मिला, तृप्ति न मिले,
- 10:06संतोष न बजा और घर से तो तुम चले थे तृप्ति के लिए।
- 10:22तृप्ति मिली नहीं, भोजन भी मिल जाए, तृप्ति न मिले तो भोजन भोजन
- 10:29नहीं होता, बस संसार का भोजन ऐसा ही भोजन है, एक भोजन अध्यात्म का
- 10:40भी। परमात्मा का वो भोजन वास्तविक
- 10:46तृप्ति देता है। तुम्हें तो रास्ते दो मंजिलें में
- 10:52दो, लेकिन दोनों विपरित। संसार का रास्ता तुम्हें भोगना
- 11:02सखाता है, दौड़ना सखाता है और परमात्मा का रास्ता एक बार ठहरोगे
- 11:11फिर दूसरी दिशा में चल जाओगे, शरीर को सजाओगे।
- 11:20मेकअप करोगे लोगों को भरमाओगे और आखिर में पाओगे, कुछ नहीं मिला
- 11:28नाक मुड़ जाएगी हाथ लहू लुहान हुए पांव में काँटे चढ़ गए।
- 11:35सारा शरीर छिल गया। दर्द बहुत होता है।
- 11:40सारे शरीर में सुइयों की तरह कांटे चूक गए यह संसार फिर तुम
- 11:51पीछे दौड़ जाना, अपनी गाड़ी को बेक गियर में डाल लेना और ध्यान
- 11:58रखो, यह दो दिशाएं तुमने तय करनी। तुम एक दिशाएं, दो मंजिलें दो, एक
- 12:10मंजिलें तुम्हें तड़पती है तो फिर रास्ता दूसरा बचता है।
- 12:16संत कहता कोई बात नहीं जीस शरीर को सजाया था।
- 12:21मेकअप किया था फिर मेरा कहती है भलो भयो मेरी गागर फूटी भलो भयो,
- 12:35मेरी गगरी फूटी ये गगरी फूटी। अब ध्यान रखो, मैं बहुत से
- 12:44प्रश्नों के उत्तर दे रहा हूँ बीच बीच में ये सब प्रश्न है आपके
- 12:50अन्यथा मेरे भीतर से कोई जवाब नहीं आया करता भलो भयो, मेरी गगरी
- 12:56फूटी। ये शरीर तुम्हारी गागर है, किसके
- 13:01साथ तुम्हें बड़ा चिपका हट है, वो है शरीर अपना हो के शरीर अपने
- 13:11प्यारों का हो या शरीर, अपने दुश्मनों का।
- 13:21दुश्मनों के शरीर को मर जाने के बाद तुम सुखी होते हो।
- 13:25तुम चाहते ही हो जैसे ये मर जाता है, दूसरे भी ऐसा ही चाहते है
- 13:38तुम्हें आराम मिलता है, चैन मिलता है, सुकून मिलता है अपने दुश्मन
- 13:42के मर जाने से मेरे पास एक। कोई व्यक्ति मर गया था, उसका
- 13:48कार्ड पहले कार्ड ऑफिस था, उसके ऊपर लिखा था फला फला फला फला इस
- 13:59तारिक को दयावसहन हो गया। परमात्मा उनकी आत्मा को शांति दी।
- 14:07मैंने वो कार्ड के पीछे लिखा आत्मा कभी अशांत नहीं होती, आत्मा
- 14:12का स्वभाव शांति है, शांति मांगते क्यों?
- 14:21शांति पहले से ही आत्मा को शांति ही आत्मकभी अशांत होती है।
- 14:27निर्लिप्त है कहीं भारतीय नहीं, अचल है, अटल है निष्कम लो है उसकी
- 14:34और वापस सुन के घर पे पहुंचा दिया ये लो अपना कार्ड।
- 14:41कई दिनों के बाद उस व्यक्ति को उलाह न आया।
- 14:44यह तो परंपरा की बात थी। आपने ऐसा क्यों किया?
- 14:51मैंने कहा, सत्य की आगे परंपराएं चलती नहीं।
- 14:55सत्य यही है कि आत्मा को शांति मिलने जैसा कोई शब्द आपका गलत है।
- 15:01आत्मशांत है पहले से तो भगवान उसकी आत्मा को शांति दे, ये शब्द
- 15:09ही बेकार है। इनका कोई आसन है सही सही शब्द डाल
- 15:18के? वही तक कार्ड पहुंचा देना जब कोई
- 15:21आगे मरे ऐसा मत किया करो ये झूठ हो के लफ्ज़े तुम यहाँ पे नहीं
- 15:31छोड़ते। जब शांति न मिले, संसार में शब्द
- 15:42गड़वे हैं, तुम्हें लगेगा संत तुम्हारी बाधा बनता है और जो भी
- 15:54बाधा बनता है वो तुम्हारा दुश्मन। तुम दौड़ते हो, संत बाधा बनता है,
- 15:59नहीं मिलेगा भाई काँटे हैं, काँच बिखरा पड़ा है और पांव भी
- 16:06तुम्हारे नंगे और दौड़ भी रहे हो। बड़े तेज मिलेगा पर तुम्हें लगता
- 16:13है कि यह व्यक्ति बाधा है? ये ईसा वादा है मंसूर वादा है
- 16:18बुद्ध वादा है महावीर वादा है या उल्टी?
- 16:22वाणी बोलते हैं भलो भयो, मेरी गगरी फूटी, ये शरीर का मोह छूट
- 16:28गया, शरीर फूट गया, शरीर तुम्हारे लिए मर गया और तुम कहते हो अच्छा
- 16:34होगा। हाँ संत ऐसा ही बोलता है तो संतो
- 16:41की बात आपको बाजा रखती है। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि आप संत
- 16:49को सूली लगाते थे। जो भी तुम्हारी दौड़ में बाधा
- 16:56बनता है उसको तुम दुश्मन मानने लग जाते हो और फिर उसको तुम रास्ते
- 17:05से हटाने का प्रयास करते हो क्योंकि वह बाधा है वह तुम्हारा
- 17:12शत्रु हो जाता है। जैसे सुबह सुबह ठंडी हवा रात भर
- 17:19सोये ना थे तू चिंता तो रहे और सुबह सुबह ठंडी हवाएं चने तुम्हे
- 17:26नींद आई बड़ी गहरी, फिर कोई जगाएगा जो जगाएगा।
- 17:34मैं तुम्हें दुश्मन जैसा मालूम पड़ेगा।
- 17:40ए सुहाना वक्त हवाएं ठंडी चल रही हैं, नींद आ रही है मुझे सुन लो
- 17:50जगाओ मत। जगाने वाला बाधा देता है और वह
- 18:04शत्रु जैसा मालूम पड़ता है। इसलिए तुम उनको रास्ते से हटा
- 18:12देते हो। राजनीतिक लोग यही करते हैं।
- 18:17मानसिक प्रवृत्ति से राजनीतिक लोग यही करते हैं।
- 18:21जिसने बाधा बन उसको रास्ते का काँटा हटा झक तुम्हारे प्रयास में
- 18:33बाधा डाल रहा है। और ध्यान रखना प्रयास से तुम्हारे
- 18:39कभी भी कामयाब नहीं होंगे। तुम उच्च जबरदस्त भी हो जाओगे,
- 18:44संतुष्ट न हो सकोगे तो ठीक कहता है कहने वाला।
- 18:57सुक्राथ महान विचारक यूनान का है। उसकी घरवाली बड़ी कलेक्शन थी।
- 19:08एक व्यक्ति ने अपने बायोग्राफी में लिखा, सुक्राथ की बाग।
- 19:14कि उसकी घरवाली संसार की सर्वोत्तम निक्कृष्ट पत्नी थी।
- 19:20यहाँ तक कह डाला उसे सुख्रात की घरवाली निक्कृष्टतम स्त्री थी
- 19:29धरती की। और देखो सुक्रात उसके भीतर काटते
- 19:34रहे। तुम तो पूछते हो कि मेरे घरवाले
- 19:37ने दो अलफाज़ गलत कह दिए और इत्ते से तलाक हो जाता है।
- 19:44मेरे घरवाले ने इत्ता सा गलत कह दिया।
- 19:48मेरे मायके की बदनामी थी। इत्ते से तलाक हो जाता है।
- 19:57गृहस्थ लोगों को सोकरतेस की जीवन गाथा अवश्य पढ़ने चाहिए लेकिन
- 20:08सुकरात तो सुकरात थे। ऐसा शानदार दार्शनिक धरती पे एक
- 20:15ही हुआ है जो अपने विचारों के लिए जो अपने दर्शन शास्त्र के लिए बलि
- 20:30चढ़ा दिया गया उसके विचार समझी ही नहीं।
- 20:38और संतो के विचार तुम्हे समझ नहीं आते, ऊपर से गुजर जाते हैं फिर
- 20:46तुम्हे फांसी चढ़ा देते हो, काट देते हो उनके अंग अंग जहर का
- 20:53प्याला दे देते हो। जो भी बाधा बनता है तुम्हारी
- 21:02संसार की यात्रा में तुम्हारी दौड़ को रोकने की चेष्टा करता है।
- 21:07उसको तुम रास्ते से हटा देते हो यह कांटा, क्योंकि तुम्हारे भीतर
- 21:15एक भ्रम है। कि अगर मैंने मंजिल पाली तो सुखु
- 21:20मिलेगा, चैन मिलेगा, मैं उस आनंद को पा जाऊंगा।
- 21:28संत कहते यह ब्रह्म है और संत इस बात को सुना सुनने की लिखा लिखी
- 21:36की। बात नहीं कहते।
- 21:39संत कहते देखा देख इन शास्त्रों से पड़ी हुई बातों को कहानियों को
- 21:51कह देने से कोई समझदार नहीं हो जाता उस स्तर पे।
- 21:57साझेदारी दो तरह की है। तुम्हारे संसार की तल्की और उस
- 22:01परमात्मा के तल्की वह समझदारी कुछ अजीबोगरीब है तुम्हारे संसार की
- 22:08साझेदारी से बिलकुल विपरीत संसार कहेगा इस शरीर को सजाओ, सुंदर
- 22:15सुंदर आभूषण डालो। सुंदर वस्त्र पहनो, वह जयंती माला
- 22:20डालो और प्रबलोभन करो, झूठ बोलो लेकिन संत कहते है ये रास्ता गलत
- 22:33है तुम्हारा। इसलिए संतों में और संसारिक लोगों
- 22:41में बनती नहीं। जो थक जाते हैं, ऊब जाते हैं,
- 22:48संसार से वो शरण लेते हैं। संतों की ये बात अलग है।
- 22:53लेकिन थके मांदे लोग ये सब वट वृक्ष के नीचे आराम करते हैं
- 23:01लेकिन सुखरात तो बिलकुल अजीब ढंग का व्यक्ति था।
- 23:07सहनशक्ति हो तो ऐसी। आजकल तो लोग कुछ और और सिखाए जाते
- 23:19है और अपेक्षा रखते है की तुम में बुद्धिमान को नहीं, वो उल्लू है,
- 23:31बुद्धिमान नहीं। तुम्हें सिखाएंगे लेबिन में कैसे
- 23:35हो? लेकिन प्रश्न तो फिर उठता है क्या
- 23:39लेबिन में रहने से शांति मिलेंगे? शांति मिलेंगे।
- 23:48जीस दिन तुमने दूसरे की। आजादी को छीनना बंद कर दिया।
- 23:53अब इन शब्दों को सर्कल में प्रेमी हो क जब प्रेम का तुम एक दूसरे की
- 24:06स्वतंत्रता में बाधा बनते हो तो तुम दुश्मन हो वही।
- 24:12जैसे राजनीतिज्ञों के रास्ते में बाधा जो बनता है उसका कांटा गोल
- 24:18कर देते हैं। ऐसे ही पति पता नहीं प्रेमी
- 24:24प्रेमिका कुछ ऐसा कर दिया जो प्रेमी को रास नहीं आया या
- 24:30प्रेमिका को रास नहीं आया। फिर लिव इन में रैप करोगे।
- 24:36क्या फिर अपना साझा साझेदार बदलो? इसलिए तुम्हारी पटती ही नहीं,
- 24:47किसी के साथ। तुम रोज़ साथी बदल लेते हो?
- 24:55एक जोड़ी की कहानी मैंने पढ़ी, नाम भूल गया अभी चर्च में से शादी
- 25:02करके निकला और जयकोढ़ पश्चिमी सभ्यता से आए।
- 25:10क्योंकि पश्चिम में सभ्यता के भीतर सहनशीलता नहीं, जो सहनशीलता
- 25:18की ऊंचाइयां पूर्व ने छुई। पश्चिम में उसका अंश भी नहीं छुआ
- 25:25गया। पूर्व ने बड़ी ऊंचाइयां छुई।
- 25:31और इसलिए तुम एक जन्म की बात करते हो सात जन्मों का रिश्ता तुम
- 25:37कहोगे बाप रे बाप अरे एक जीवन ही मुश्किल तुम सात जन्मों तक सात
- 25:44दोगे फिर आ तुम तो। अपूर्ण तो आत्महत्या कर ले और तुम
- 25:54जैसा डेकिटेटर सात जन्मो तक मैं कैसे गुजारूँ?
- 25:59ये जीवन किसी तरह धक्के देके जा रहा है।
- 26:08ये पूरे दिन है। चार समय से शादी करके आए।
- 26:12पादरे निषादी ग्रवादी। बाहर आए चर्च की सीढ़ियों भी नीचे
- 26:16उतरे हैं। आंधी सीढ़ियों तय की हैं, कुछ
- 26:24फर्क लगा चार ढाल में तो स्त्री बोली।
- 26:31तो फिर तलाक न हो जाए, हँसा मत कर आंधी सीढ़ियों तय की है, कुछ हुआ
- 26:44हुआ नहीं, वह हवाएं तो पहले ही हो जाता है तो आंधी सीढ़ियों तय
- 26:50करना। वो लड़की बोलती के तलाक ना हो जाए
- 26:57से कहता हाँ तुमने ठीक कहा, अपनी ना पटेगी तुमने दो इकट्ठी
- 27:04सीढ़ियाँ दो इकट्ठी सीढ़ियाँ पार कर अरे भाई उधर नहीं सोचो।
- 27:11इधर आओ, मेरे पास आओ इसलिए तलाक ठीक फिर पादरी के पास रे कहते हैं
- 27:22क्या कुछ बाकी कुछ कन्फेशन वगैरह? कहते नहीं बस अब तलाक की अर्जी
- 27:32पड़ी है। अरे अभी अभी तो वो कहते हैं, बस
- 27:36अभी अभी हो गया जो होना। इसने दो पलांगें इकट्ठी ले ली।
- 27:43ओड़ियों के ऊपर हमेशा एक प्लांट लेनी चाहिए।
- 27:48तो हमारी कब डिबाई? तो स्त्री ने कहा हाँ बिलकुल यह
- 27:56तो डिक्टेटर है, मैं तो दो की जगह तीन पलांकी लूँ मैं तो सीधी छिला
- 28:01की ही निकाल लूँ। फिर वो आदमी कहने लगा बिलकुल तलाक
- 28:07पक्का तुम्हारी इच्छा पादरी ने तलाक दी थी।
- 28:14बस एक इसी बात पे तलाक हो जाती है और हमारे पूर्व ने अपूर्व खोज की
- 28:22थी। पूर्व ने अपूर्व खोज की थी।
- 28:29यहाँ जन्मते हैं वाचस्पति मिश्र, जो भामिका को शादी करके लेके आते
- 28:37हैं और 30 साल ब्रह्मसूत्र के अनुवाद में लगे रहते हैं।
- 28:41जाती है। तुम यहाँ सुहागरात की सज्जा सजाते
- 28:47हो और वह व्यक्ति इतना तलीन है परमात्मा के रस में उसे याद नहीं
- 28:55है कि मैं शादी करके लेके आया भूल गया।
- 29:03ब्रह्मसूत्र लिख रहा था, पिता ने आके कहा तुम्हारी शादी कर दे, आज
- 29:09वर्षगाँठ है। तुम 20 के हो गए हो।
- 29:15हाँ कर दो, फिर से कोई बात नहीं तो ठीक है।
- 29:22फिर कब तैयार रहना? दूसरे दिन आए पिता जी चलो शादी
- 29:28करनी है तुम्हारे छोड़ दी कलम शादी करा के वापस आ गए, लाल चूड़ा
- 29:35पहने भामती आ गई। और भामती 30 वर्ष तक खाना दी
- 29:44जाती, हाथ धुला देती, पानी दे देती, सुबह नाश्ता खिला देती, रात
- 29:51का खाना खिला के दूध पिलाकर सो जाती है, दिया जला जाती दिया बजा
- 29:59जाती। 30 वर्ष से वैद रहे 1 दिन
- 30:10ब्रम्भाश्य संपूर्ण हो नजरें उठाईं किसी ने आ के दिया जला दी।
- 30:24ब्रह्मभाष्य संपूर्ण हो गया था और सोच रहे थे वाचस्मित मिश्र कि कल
- 30:33भोर होते ही छोड़ दूंगा। वर्ण प्रस्त हो जाऊंगा, वर्ण में
- 30:41चला जाऊंगा, विचार ही कर रहे हैं। इतने में बागमती ने आके दिया जला
- 30:49दिया, देखा है उन्होंने हाथ पकड़ लिया कौन हो तुम यहाँ मेरे कमरे
- 31:03में क्या करें? इस असभ्यता को लूट लिया गया।
- 31:14मैं काले से तो हमारे सहस्त्रो वर्ष का वह बनाया हुआ समाज छीन
- 31:28लिया। धार्मिककृति जाकर 30 वर्ष पहले
- 31:36मुझे शादी कर के लिए किया था। तब से आपका खाना दाना दिया जलाना
- 31:43बुझाना निरंतर में कर रहे हैं। याद आया जो ब्रह्मभाषी कर सकता
- 31:51है। उसकी यादाश्त बड़ी थी।
- 31:57हाँ याद आया बामवती तुम हाँ, मैं तो भूल गया बामवती मुझे।
- 32:13मैं तो संकल्प लिए बैठा। ब्रह्म शास्त्र ब्रह्म सूत्र तो
- 32:17संपन्न हो, मैं तो वाणप्रस्थ हो जाऊंगा, वणव में जाऊंगा तो मेरे
- 32:24साथ चलना चाहती हूँ तो चलो मेरी अर्धाखणी।
- 32:32यहीं रहना चाहती हूँ तो माता पिता छत्रछाया में बैठी रहूँ, मैं इतना
- 32:42कर सकता हूँ के शास्त्र का नाम तुम्हारे नाम पे है तुम्हारा नाम
- 32:49अमर हो जाएगा। ब्रह्मभाष्य भामती भामती ब्रह्म
- 32:54भाष्यसौत्र रख दिया गया भामती के नाम पे ये वैद्य वाचस्पति मिश्र
- 33:02के धर्मपत्नी का नाम भावमती था। हमारी ऐसी संस्कृति थी की सदृष्ट
- 33:14की नजर और आज ऐसी संस्कृति के आधा रास्ता।
- 33:21चर्च का उत्साह स्त्री ने दो पिलांगें वरली।
- 33:30बंदे ने घूर के देखा स्त्री के थी बतराक हो जाए और तो कोई रास्ता
- 33:37नहीं होता डिक्टेटरशिप तो मैं सहन नहीं करूँगा आदमी की अपनी बेहतर
- 33:48क्रोमोसोमिन। व्यवस्था है स्त्री की अपनी आदमी
- 33:55डिक्टेट करना चाहता है, स्त्री चुपके से सहन कर जाती है, लेकिन
- 34:03स्त्री आज स्त्री कहाँ रही स्त्री में वो?
- 34:09अस्त्रेणत्व खो गया स्त्री में आज अपरूषत्व आ गया भाई तुम्हारी
- 34:18दोनों सुसेने वाली हैं, इसलिए आगे आगे तुम देखो।
- 34:29तुम दिया जला के जोड़े ढूंढोगे जोड़े नहीं मिलेंगे इसलिए शादी
- 34:38करने से मना कर दिया, कौन करे झंझट?
- 34:44तुम्हारी गोला गिरी करो तुम्हारे भाई बहन तुम्हारे माता पिता और
- 34:53तुम्हारी गोला गिरी करो ये नहीं होता हमारे से धंधा तो फिर
- 35:02तुम्हारे बच्चे पे। पादु पोसु पहले मूत्र करो बड़े कर
- 35:07दो औरत में बच्चे छोड़ के चले जाओ क्या इस दिन के लिए शादी करते हो?
- 35:23तो पूर्व ने जो चीज़ जो व्यवस्था जमाई थी, बड़ी प्यारी थी,
- 35:30व्यवस्था प्यारी थी, क्योंकि सहनशीलता थी आज सहनशीलता खो गई।
- 35:36हर व्यक्ति जल्दबाजी में इसलिए आज सच्चे गुरु नहीं मिलते।
- 35:45जो लिख दे के मेरे पास आ जाओ, बस सुबह आओ और शाम को ज्ञानी बन कर
- 35:53मेरे आश्रम से निकल जाओ। कहोगे ये ठीक ये सही है, ये गुरु
- 36:01ठीक है। सुबह आओ, शाम को ज्ञानी होकर वापस
- 36:05ले जाओ और फिर ज्ञानी भी ऐसा वैसा ही करते हैं।
- 36:11उनकी गुफाएं होती हैं, ऐसा मत करो, वो 1 दिन में तुम्हें ज्ञानी
- 36:19बना देते हैं। सब जान जा हो गए।
- 36:23एक साथ ये सबसे नहीं भाई इतना तो ठीक ही करते रहते है सर पश्चिम की
- 36:38शब्दता नहीं पूर्व की सभ्यता की हत्या कर दी।
- 36:42पश्चिम मन जल्दबाजी में पूर्व मन ठहरा हुआ है पर भारत भूमि के बड़ी
- 36:53से बड़ी एजाद यह ठहरा हुआ मन? पूर्व ने ईजाद किया ठहरा हुआ मन
- 37:03और पश्चिम का मन बड़ी जल्दबाजी में है अभी जल्दी करो अभी नहीं
- 37:09मिला तो कभी नहीं फिर हम चले हम पूर्व का मन करता है, कोई बात
- 37:14नहीं अब नहीं अगले जनम में हो जाये।
- 37:18अगला जन्म नहीं, अगले जन्म में तो नहीं और सही और नहीं और सही तो
- 37:23अगर है हरजाई तो अपना भी यही दोष है।
- 37:30पूर्व मन ठहरा हुआ है। पश्चिम मन जल्दबाजी में है, अभी
- 37:35हो जाए। तो पूर्व पश्चिम की नकल लेके आया।
- 37:44पूर्व ने अपना सहज मन खो दिया जो ठहरने में संतुष्ट था, जो आनंदित
- 37:53था और देखो। ठहरने से ही आनंद का रस पिया जा
- 37:59सकता है। तुम भागते भागते तो कुछ भी नहीं
- 38:03पी सकोगे। पानी भी नहीं पी सकोगे।
- 38:04भागते भागते पानी पीने के लिए भी ठहरना आवश्यक है तो इतना बड़ा रस
- 38:17का प्याला कैसे पी लो? बात के बात यह दौड़ने वालों के
- 38:25लिए नहीं है। रस या ठहरने वालों के लिए रस है।
- 38:35पश्चिम ने पूर्व का शांत मंच छीन लिया।
- 38:40ठहरा हुआ मंच छीन लिया और यही जहर फैला दिया पश्चिम ने।
- 38:47पूर्व को आज पूर्व संभाल ही संभल नहीं रहा और पश्चिम के पास तो धन
- 38:57है। अम्बार रखा है, मानव है, पूर्व का
- 39:06लुटा हुआ है लेकिन पश्चिम के बाद अम्बार रखा है।
- 39:13पूर्व के पास धन भी है। तुम मैराथन की दौड़ सीख गए हो?
- 39:24पश्चिम मैराथन की दौड़ दौड़ रहा है, लेकिन उसके पास ठहरने का उपाय
- 39:31वह चाहे तो ठहर सकता है। तुम चाहो तो ठहर नहीं सकती,
- 39:37क्योंकि पशुओं के पास दौड़ता है पश्चिम कमल लेकिन अगर ठहरना चाहे
- 39:45तो ठहरने की व्यवस्था है उसके पास गाना संपन्नता है तुम अगर चाहो।
- 39:52कि महीने भर के लिए एकांत कोठरी में बैठ जाएं तो पेट की आग कैसे
- 40:00बुझाओगे यही मुश्किल आते है। इतनहाई का आलम पुरुष आप का गम
- 40:26इतनहाई का आलम। गम न जीते हैं, न मरते बताओ क्या?
- 40:50करे हम अकेले हैं, चले आ जहाँ हो कहाँ?
- 41:08आ आवाज दें तुमको कहाँ हो अकेले में चले आ।
- 41:26जहाँ तुम बात चस्पति मिश्र की तरह 30 साल तक एक कमरे में नहीं रह
- 41:35सकते तुम्हारी मजबूती सब पूर्व बड़ा अमीर घर में सोने के सिक्के
- 41:44ऐसे पड़े रहते हैं। जैसे जमींदारों के घर में गेहूं
- 41:51का अम्बार जो चाइना से आए यात्री वो लिखते हैं हिंदुस्तान के बारे
- 41:59में सोने की चिड़िया गोल्डन पे। और इतना इतना सोना, हर घर में हर
- 42:08घर हम बाहर लगे हुए हैं। ढेर लगे हुए हैं सोने के चीन का
- 42:18यात्री फाहियान 399। ईस्वी से 413 ईस्वी तक भारत में
- 42:28रहा। 14 साल तक उसने हर गली, कूंचा
- 42:35खंगारला, भारत अखंड 700 अखंड भारत।
- 42:45और इतना शानदार डेवलप हम सोने की चिड़िया थे।
- 42:52आज आज तो गरीबी मुखरशी भुखमरी से जूझ रहे हैं।
- 43:06तब थे हम सोने की चिड़िया तब विशु पुरुबित और ध्यान रखो विज्ञान का
- 43:16और समृद्धि का परस्पर संबंध है यही चुक गए तुम इसको हाँ।
- 43:29विज्ञान का और समृद्धि का चोली दामन का संघ है जहाँ विज्ञान होगा
- 43:41वहाँ समृद्धि होगी। क्योंकि वहाँ रिसर्चर्स हो गए,
- 43:46इनवेंटर हो गए, वो खुशहाली को पैदा कर ही नहीं गए।
- 43:52आज हमने विज्ञान को दिया, आज हम सर्च नहीं करते बिना सर्च किये।
- 44:03जो हमारे क्योंकि आज हमारे वितरक भ्रमजज्ञा है, हमारे शास्त्रों
- 44:09में सब लिखा है जो दुनिया के किसी शास्त्र में लिखा नहीं लिखा तुम
- 44:13गलती हो, इस भ्रम को मटाना होगा। हम आज सबसे बुद्धू देश हैं।
- 44:22यह सत्य स्वीकार करना फाहियान आया 399 इश्यू में 413 तक रहा।
- 44:3014 वर्ष तक रहा। हर गरीब कूचों की उसने सैर की।
- 44:36हर घर में गया, हर घर में उसका स्वागत हुआ।
- 44:42उल्लेखता है कि वहाँ खाने के लिए यात्री का सम्मान होता है तथाकथ
- 44:48की तरह आया चला जाएगा मेहमान को अतिथि कह के अतिथि देवो बाबा
- 44:58देवता की तरह उसकी उपासना होती। तुम तो लड्डू गोपाल को बहु लगाने
- 45:03लग गए। ऐसी मूड था हिंदुस्तान ने पहली
- 45:11बार देखी जैसे जैसे व्यक्ति नॉन साइंटिफिक होता जाएगा।
- 45:24साइंस से दूर होते चली है इनवेंटर खो जाएंगे, याद रखना दृढ़ता भी
- 45:32घनी हो जाएगी। ये चोली दामन का संग है।
- 45:40तुमने छोड़ दी खोज सर्च इन्वेंशन्स तुमने बुद्धू पैदा कर
- 45:46दिया कल एक उल्लू कहानी सुना था नामदेव जी ठाकुर की बात न करते,
- 45:58भोग लगाते, शनान कराते। रखिए ऐसा डोर जब भी आया होगा तब
- 46:05भूखमरी बहुत होगी। आज हुई ऐसा अगर 80,00,00,000 जनता
- 46:11को खाने को अनाज देना पड़े तो उस देश को तुम समृद्ध कहो।
- 46:19ज़रा सोच के मुझे बता देना अगर 80,00,00,000 जनता को पेट भरने के
- 46:25लिए पांच किलो राशन देना पड़े महीने का, तो उस मुल्क को तुम
- 46:30समृद्ध मुल्क कहोगे, फिर क्या यह मीडिया का पाप नहीं?
- 46:40जो तुम्हे सच्चाई से अवगत नहीं कराता।
- 46:42मीडिया का काम क्या था? पर मीडिया भूल के आज कुछ जीवंत
- 46:48प्रकाश कुछ जीवंत दिए बहुत दूर दूर जगते हुए नजर आते।
- 46:57लेकिन जो मेन स्ट्रीम था जगह जगह दीपक थे वो खो गए आज वो दृढ़तानी
- 47:06स्वाभाविक है जहाँ सुमित है संपत्ति नाना जहाँ विपत्ति जहाँ
- 47:14जहाँ कुमतित हैं विपद्ना। सुमति है तो संपत्ति है, कुमती है
- 47:22तो विपत्ति है, साइंस है, रिसर्चर्स हैं तुम्हारी इनवेंटर्स
- 47:30हैं, तुम्हारी तो खुशहाली भी है। इन्वेंटर न रहे तो खुशहाली गायब
- 47:39दर दर दा हो जाएगा तो हम अगर सोने के चिड़िया थे तो इस बात को आप
- 47:49गांठमाद ले ले हमारे यहाँ ऋषि जिन्हें हम कहते हैं वो इन्वेंटर
- 47:57से वो संस्कार थे। साइंटिस्ट थे।
- 48:01आज हमने खोजना बंद कर दिया। आज हमने नकल करना शुरू कर दिया और
- 48:11जैसे ही खोज हमने छोड़ दी और नकल करनी शुरू कर दी।
- 48:20तो समझ लेना हम दरिद्र होने की राह पे चल पड़े।
- 48:24हमारी क्लास में एक बच्चा था, बिल्कुल मेरे से अगला नंबर उसका
- 48:29पीछे बैठता। किताब कभी खोल के नहीं देखी।
- 48:36फाइनल पेपर्स आ गए। मेरे मित्र थे, मुझे कहते है विजय
- 48:44थोड़ा सा इधर बैठ जा ना मैं नकल कर लूँगा मुझे आता कुछ मुझे भी
- 48:50पता है तुम्हे कुछ नहीं आता। तो उसने सारा पेपर नकल कर दिया।
- 48:57वो हाथ तेज चलता था लेकिन मैं दक्ष था।
- 49:02पूरी नकल करता चला गया। बस ये गलती हो गई।
- 49:08सारे प्रश्नों के उत्तर से ही थे क्योंकि मेरे से ही थे मैं वॅन
- 49:14हिट। तो उसने रोल नंबर भी मेरा ही रख
- 49:18दिया। यहीं से पकड़ा गया तुम नकलची बंद
- 49:25रहो। ये नामदेव की कथा कहने वालों कभी
- 49:33जड़ ठाकुर? बच्चे पैदा कर सकता है कहते नाम
- 49:40देव की माता एक कहानी सुनी है इस मूर्खों के तुम बड़े लाखों की
- 49:47गणना में सुनते हो तो मैं देखता हूँ इस उल्लू को कितने उर्लू के
- 49:53पुटवान है उसमें? इस उल्लू को इस कहानी को कितने
- 50:00उल्लू के पटुआ ने सुना देखता हूँ लाखों की तादाद में मैंने ठीक ये
- 50:05होना ही था एक दम जब रिसर्चेस बंद हो जाएगी वैज्ञानिक।
- 50:17बुद्धि मर जाएगी। ऋषि मर गए तो आज प्रचारक आ गए और
- 50:23प्रचारकों ने तुम्हारा जीवन दीन हीन कर दिया।
- 50:29इन प्रचारकों को कहीं और छोड़ आओ, देश निकालो भी तुम।
- 50:37किसी ऐसे मुल्क में छोड़ आओ जहाँ इनको अपने जैसा कोई भी ना लगे।
- 50:50यह गलत प्रचारक हैं। तुम्हारे और तुम अब तक इन्हें झेल
- 50:54रहे हो। ये हैरानी की बात है, इनमें आत्मा
- 51:00तो है नहीं। तुम इस गलती में मत बैठ जाना, ये
- 51:04कभी इनकी आत्मा जागृत होगी क्योंकि आत्मविहीन व्यक्ति हैं
- 51:10आत्म है नहीं इनकी जागृति का खाक। सुना रहा था।
- 51:17नामदेव जन्मे, उनके पिता नहीं थे, ठाकुर ही थे उनके पिता और नामदेव
- 51:30की माता यानी। नाम देव के न न माता के पिता वो
- 51:37भी ठाकुर के पास में करते थे। यह पागलपन पीढ़ी दर पीढ़ी चलता
- 51:41है। वंशबली जैसे पीढ़ी दर पीढ़ी चलती
- 51:46है जैसे पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है, क्रोमोसोमिक व्यवस्था जैसे पीढ़ी
- 51:52दर पीढ़ी चलती है। वैसे ये पागलपन ये मूड़ताएं भी
- 51:56पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है तो नाना जी मानते थे ठाकुर को भोग खिला
- 52:07देते थे ठाकुर को हालांकि पत्थर की मूर्ति कभी खाती ये चालाक लोग
- 52:14हैं जब भोग लगाते हैं भगवान को। तो पर्दा कर लेते हैं, आपको पता न
- 52:19चले केस ने खाया है। अगर पर्दा खुला रखेंगे तो आपका
- 52:26भ्रम टूट जाएगा। इसलिए पर्दा कर लेते हैं कभी
- 52:29पर्दा को गाड़ के देखना। जब पुजारी पर्दा करे तो घुस या ना
- 52:35भीतर। और पर्दे को उठा देना मैंने सही
- 52:38किया था। मैंने कहा रे उल्लू तो क्यों हमको
- 52:44उल्लू का पट्ठा बनाता है या क्यों?
- 52:48अरे इसने खाया तो कुछ है नहीं खा गया तू खुद कहता है इतना भगवान ने
- 52:54भोग लगा लिया, खा गया। तो लोगों को कुछ प्रमाणु भी तो
- 52:59देना होता है। देखो इतनी बुर्की ठाकुर नहीं खाली
- 53:03खा गया खोदे ऐसा ही तुम करते हो नकल चीज़ अंदर नहीं चाहिए, ऋषि
- 53:14चाहिए। इनवेंटर चाहे खोजी चाहे जहाँ
- 53:20रिसर्चर हैं जहाँ सुमतित है संपत्ति नाना वहाँ खुशहाली होगी
- 53:30हर एक प्रकार से जहाँ कुमा पीते हैं, आज विपत्ति है हमारी।
- 53:37क्यों कुमती है नकल है जहाँ तुम नकल करोगे, तुम सब नकल ही तो करते
- 53:43हो किसी वक्त कुछ बातें इसमें थी काम की, वो तुम भूल गए, वो आज भी
- 53:52सकते हैं लेकिन तुम भूल गए हो। तुम्हें पता नहीं जहाज है सब है,
- 54:02बिल्कुल ठीक है, ईंधन भी है, लेकिन पायलट तुम क्या करो जो
- 54:10पायलट राज़ जानता था, कैसे उठेगा, कैसे ऊपर उठेगा?
- 54:14कैसे रनवे पे दौड़ेगा वो नहीं है। आज रिसर्चर खो गए तो तुम कुमति
- 54:24में आ गए जहाँ कुमति पता न गाना और ऐसे ही तुमने आज लीडरशिप चुन
- 54:31ली मूर्खों के मूर्ख। तुम्हारी गलतियों को संभाल ले
- 54:43सुना रहा था कि नाना ठाकुर के भगत थे, बच्चा आके पूछता बेटी के मुझे
- 54:58भी? हुक्म करो सेवा करने के लेकिन
- 55:09नाना जी कहते हैं, जीस दिन मैं बाहर जाऊंगा।
- 55:12उस दिन तो मैं सेवा सौंप के जाऊंगा तो बात की बेटी भी ऐसी आगे
- 55:19बैठा भी ऐसा। और वो सुना रहे हैं मूड़मती के इस
- 55:25ठाकुर ने गर्भवती कर दी। इस ठाकुर ने सील की, मूर्ति ने
- 55:35गर्भवती कर दिया। आज तक धरती का कोई व्यक्ति
- 55:38साइंटिस्ट। हमारा बुलेट नहीं बना पाया,
- 55:41स्पर्म नहीं बना पाया और तुम अच्छी तरह से जानते हो स्टील की
- 55:45मूर्ति में स्पर्म स्पर्म तो तुम स्पर्म तो तुम अच्छे भले हो, तुम
- 55:53चाहते हो पुत्र तुम्हे हो जाती है पुत्री तुम ही नहीं ठीक से पैदा
- 55:57कर सकते हो। सेपरेशन ऑफ क्रोमसुम्स ऑफ एक्स
- 56:01एंड वै पद्धति है। लेकिन वो भी कहाँ कार्य करे 100%
- 56:07हो ठीक है तब के निश्चित है। सब चीजों को जानते हैं, सेपरेशन
- 56:14ऑफ एक्स वै को अच्छी तरह से जानते हैं थे कृष्ण जानते हैं।
- 56:19ये श्री कृष्ण के बेटे ही बैठे होते हैं, एक बेटी चाहिए।
- 56:22चारो मती उसने पैदा कर ली लेकिन ये आज करके तथाकथित ये मूढ़ मती
- 56:33हैं और तुम इनकी पूजा करते हो तो इसका साफ मतलब है कि तुम भी मूढ़
- 56:37मती हो। पढ़ें कितने तुम्हारा दिमाग कितना
- 56:41पढ़ा, इससे कुछ लेना देना नहीं, ये बुद्धि की बात है, समझ की बात
- 56:48नहीं है, ये बुद्धि की बात है तो कोई ज्यादा पढ़ा लिखा व्यक्ति
- 56:54अक्सर ज्यादा पागल होता है, ज्यादा मूर्ख होता है।
- 56:57क्योंकि उसने अपनी सारी शक्ति पड़ने लिखने में घमा दी।
- 57:02अब तार्किक शक्ति उसके पास बची नहीं।
- 57:05छोटा बच्चा ज्यादा तार्किक होता है।
- 57:07विशेष 1213 साल की उम्र के बाद बहुत तार्किक होता है बच्चा।
- 57:16तो नाना थे या नाना की बेटी थी और उसके बिना बाप के बच्चा पैदा हुआ
- 57:23नाम दे उसका नाम था। मैंने कहा फिर हराम का था।
- 57:30देखिए बिना बाप का तो अगर आज भी कोई हो जाए होते तो सभी बाप के
- 57:35हैं। लेकिन तुम जान बूझकर हराम के बन
- 57:38जाओ तो कोई क्या करे? नॉन बायोलॉजिकल बन जाओ तो कोई
- 57:42क्या करे? नॉन बायोलॉजिकल का मतलब सीधा होता
- 57:45है की ये हराम का है। इसके माँ बाप का कोई पता नहीं।
- 57:51अगर मेरी बात में कुछ संदे तो मुझे कमेंट अवश्य करना।
- 57:56तुमने शास्त्र पढ़ लिए उपनिश्चित पढ़ लिए गीता पढ़ ली कुरान पुरान
- 58:01पढ़ लिए, बाइबल क्रंथ पढ़ लिए लेकिन वो बुद्धि कहाँ से लेके
- 58:06आओगे जिसे ऋषि कहा जाता है वह रिसर्चर माइंड कहाँ से लेके?
- 58:17और जरूरत है सर्च करने वाले मन की बुद्धि की जहाँ सर्च करने वाली
- 58:27बुद्धि है जहाँ ऋषि हैं ऋषियों के काल में ये हिंदुस्तान चर्म पीक
- 58:32पे। गोल्डन स्पैरो था आज बुद्धू हो
- 58:38गए। आज इनमे जो लिखा है शास्त्रों में
- 58:42बस वो पढ़ के नकल बाजी करते हैं और प्रसारित कर देते हैं बुधुवाद
- 58:49है आज बुधुवाद। बुद्धिवाद नहीं है, तो सुना रहे
- 58:56हैं की ऐसे नामदेव बड़े प्यार से सुना रहे हैं।
- 58:59आप बड़े प्रेम से सुन रही है, जो जैसे जामृत है, बस पी लो फिर नहीं
- 59:04मिलेगा। ऐसे ऐसे लोग आज हमारे प्रचारक हो
- 59:14गए और सबसे ज्यादा दुखद बात ये है कि बहुसंख्य की जनता इनकी फलोवर
- 59:25होगी अनिजायी होगी। कुछ तर्क बुद्धि हो तो भी है ये
- 59:37ले चले हैं परमात्मा के रास्ते पे शब्द प्रयोग करें संसार के रास्ते
- 59:44का तर्क परमात्मा के रास्ते पे तर्क होना पड़ता है।
- 59:50ये समझना बात को संसार के रास्ते पे तर्क को उपजाना पड़ता है।
- 59:57ये दो रास्ते हैं लेकिन ये जाते हैं परमात्मा की तरफ़ उपयोग करते
- 1:00:01हैं। संसार का रास्ता कैसे चलेगा?
- 1:00:05गाड़ी को भगाते हो टोपघर में। रस्ता तय करना चाहती हो?
- 1:00:12बेक भरो भयो मेरी गगरी फूट तुम दंड में उलझ के रहते हो यही
- 1:00:23तुम्हारे दुख का कारण है तुम चाहते हो शान्ति।
- 1:00:30और शांति मिलती है। बेक अप और गाड़ी को दौड़ाते हो?
- 1:00:37तुम टॉप गैर में फिर तुम रोते हो चलाते हो?
- 1:00:43ये कांटों में कहाँ उलझता है। ये तुम्हारे जीने की व्यवस्था हो
- 1:00:48गई आज दंड में उलझी हुई ज़िन्दगी कहते के पूजा करती नामदेव की माँ
- 1:01:00ठाकुर की पूजा करती वो स्टील का होता है ना हमारा बना हुआ क्या
- 1:01:04कहते हैं उसे? बाल गोपाल के होता है लड्डू गोपाल
- 1:01:10लड्डू गोपाल के कहीं कोई अंग होता है मुँह कांड तो बना देते हो
- 1:01:15लेकिन होता है कुछ जीवन होता है उसमें ये वो ही आगे ना
- 1:01:20निरंकारियों वाली बात ये आकाश ही सब कुछ है मैंने कसी इतना कहा है।
- 1:01:28इसमें चेतना कहाँ, सत्य, चेत, आनंद और आनंद कहाँ तुमने तो हवा
- 1:01:34में लहरा के दिखा दी तलवार, लेकिन इस तर्क से ही तो सिद्ध नहीं हो
- 1:01:41जाएगा परमात्मा दो चीजों के कसाब से?
- 1:01:46तुम देखो आनंद कहाँ है, इसमें आनंद है, आकाश में नहीं है, चेतना
- 1:01:56है, आकाश में नहीं है, और आनंद चेतना का स्वभाव है।
- 1:02:02जब चैत नहीं तो आनंद भी नहीं होगा आनंद नहीं तो साफ मतलब चेतना का
- 1:02:06अभाव है तो ठाकुर में भी चेतना का अभाव है।
- 1:02:11और मैंने कहा पढ़े लिखे लोग भी इस गिरफ्त में आ जाते हैं।
- 1:02:14मेरे इच्छा जी, मैं कहानी सुनाया कर तू मेरे पास आ गई।
- 1:02:17गैलरी में मैं मस्त पढ़ा था, 10:00 बजे गए थे।
- 1:02:22वो तो कब के सनान ब्रह्म मूर्त में करके राम राम भी करे, मुझे
- 1:02:28कहते बेटा मैं चलाऊंगा, मैंने कहा अच्छा चाचा है बेटा तुम उठे नहीं?
- 1:02:37मैंने कहा बस। अभी तो रात की हुई उतरी है, तुम
- 1:02:45पीते भी हो क्या? हाँ बड़ी वजह से पीते हो क्या
- 1:02:49पूछते हो संग स्वाद ले ले के पिता मूंगी की दाल होती है।
- 1:02:59नमकीन गिरी होती है, खारा सोडा होता है, ऐसा पीता हूँ रात भर
- 1:03:05पीता हूँ भगवान कृष्ण ने कहा जब तुम्हारा संसार कस होता है, मेरा
- 1:03:12योगी जागता है, मैं रात को जगता हूँ।
- 1:03:18पीता हूँ, सारी रात पीता हूँ और तुम ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाते
- 1:03:23हो, क्योंकि तुमने रात को पी नहीं और तुम 10:00 बजे की बात करते हो।
- 1:03:28चाचा जान मेरी तो 4:00 बजे उतरेगी कहीं रात अपना तो अंदाज ही निराला
- 1:03:35है। 4:00 बजे से पहले उतरती हैं।
- 1:03:43फिर तो मेरे ठाकुर जी तुमने स्नान नहीं किया, मैं कह नहीं स्नान कर
- 1:03:48रहा हूँ। सारी रात स्नान ही तो किया लेकिन
- 1:03:53उस उल्लू उस उल्लू को समझ के आए। मेरे चाचा सखे चाचा रामानुजन जी
- 1:04:00महाराज अयोध्या में जाके कुटिया लगा के बैठ गए और देखिये मज़े की
- 1:04:06बात पंजाब नेशनल बैंक दिल्ली में मैनेजर थे।
- 1:04:10रिटायरमेंट के बाद हमारे चाचा जी भी वहाँ चले गए।
- 1:04:14पेंशन आती। खूब खाते और बांटते थे गरीबों
- 1:04:19में, संतो में साधुओं में आह हाँ हाँ क्या बात है दान करना शुरुआत
- 1:04:27थी ताकि दान करने से तुम सीख जाओ और आखिर में उसी को दान कर दो जो
- 1:04:35तुम स्वयं हो। लेकिन शुरुआत करनी होगी तुम्हें
- 1:04:39धन से धन को दान करो तो संस्कार पड़ते जाएंगे।
- 1:04:45जैसे तुम्हें जन्मो जन्मो से संस्कार पड़े कि मैं शरीर हूँ,
- 1:04:49मैं मन। ऐसे ही दान का संस्कार पड़ जाएगा
- 1:04:53और इतना दान करो इतना दान करो, दान करते ही चले जाओ, इसका
- 1:04:59संस्कार पड़ जाएगा और आखिर में तुम में इतना साहस आ जाएगा कि तुम
- 1:05:03एकदम अपने आप को दान करने में समर्थ हो जाओगे।
- 1:05:08ये हस से शुरू होनी थी बात। तो ये लोग पागलपन में तो मैं तो
- 1:05:15मेरे तो ठाकुर जी असमर्थ हो गए, स्नान नहीं किया, अब पवित्र हो
- 1:05:19गए। मैंने कहा फिर इसको पवित्र कर लो,
- 1:05:22इसका क्या बिगड़ता है? नीचे जाओ जा ले लो, स्नान करवा लो
- 1:05:28कितनी बात? दो पूछ लो इसको फिर फिर रख लो के
- 1:05:34तन नहीं है तो पूरा स्नान करना पड़ेगा कपड़ों के साथ कपड़े बदलने
- 1:05:38पड़ेंगे, धोती बदलनी पड़ेगी। इनके क्लेश बहुत होते हैं।
- 1:05:48इन तथाकथित आस्तकों के क्लेश होते थे।
- 1:05:53दाढ़ी को रंगों, त्रिपुंड सजाओ, कोई क्या कहे जो मूल रस है वो
- 1:06:04उपजा। और जिसके भीतर वो मूल रस उपज गया
- 1:06:10वो क्यों अपनी देह को दिखाता? फरेगा बाजारों इनको ईर्ष्या है
- 1:06:16तुम से तुम सो क्यों रहे हो? हमें तो नींद नहीं आती अरे उर्दू
- 1:06:21के पट्ठो हम जाग रहे हैं, तुम क्यों सो रहे हो?
- 1:06:25जागो हमारे पंचबोध के शरीर को देखो, यही सबसे बड़ा पुण्य है और
- 1:06:32पूंजी की वेला है। रात को डेढ़ बजा है जितनी जल्दी
- 1:06:36उठ जाओगे उतना ज्यादा पुण्य तू चाचा जा नीचे गए जाकिर नहाई।
- 1:06:45कपड़े बदले, धोती दूसरी बांटी, अपने इष्ट को स्नान कराया, ठाकुर
- 1:06:51जी को वो स्टील की मूर्ति उसको जेब में रखा, अब मन को शांति मिल
- 1:06:56गई, मैंने कहा ये मन अशांत था, तुम्हारा और अशांत सदा मन ही होता
- 1:07:03है। अशांत आत्मा कभी नहीं होती, मन
- 1:07:07अशांत होता है। मन की शांति के लिए तुम सारे
- 1:07:10प्रयत्न करते हो और उसको कहते हो तुम अध्यात्मिक होते हैं, वो
- 1:07:16सांसारिक मन की शांति के लिए होते हैं।
- 1:07:19ये दायां पांव पहले क्यों उठा लिया?
- 1:07:22बायां उठाना था। ये बायां क्यों उठा लिया?
- 1:07:25दायां उठाना था इसी क्लेश में तुम उलझे उलझे आज ये कुमती है जहर
- 1:07:32कुमती है जहर तुम्हे रास्ते तक कभी नहीं जाने देते खोपरी में ही
- 1:07:40उलझाए रखेगी तुम। और तुमने लगाना है बैग गियर अपने
- 1:07:48भीतर उतरना है संसार की यात्रा बहरह की यात्रा है, बहरह गाँव और
- 1:07:56परमात्मा की यात्रा। भीतर का भीतर उतरना, बेहतर मुखी
- 1:08:07नहीं होना, अंतर मुखी होना दो ही रास्ते दो ही मंजिलें बाहर की
- 1:08:13मंजिल तुम देख लो रस नहीं मिले। नीरस, नीरस तुम वापस आ जाओ, फल
- 1:08:22लगेगा, बड़े ऊंचे, ऊंचे, बड़ी ऊंची फसल हुई है लेकिन उसमें खाने
- 1:08:28योग्य दाना नहीं निकलेगा। बहरी यात्रा है, संसार की अंतर
- 1:08:36यात्रा है। अपनी स्वयं की, परमात्मा की आनंद
- 1:08:40की रस्की सच्चे सुख खोज करने वाले मिट गए या तुमने
- 1:08:56मिटा दिए? आज ऋषि रहे नहीं तो ये मूढ़मती
- 1:09:01तुम्हें समझा रहे हैं। फिर ये नकल्ची मंत्र हैं
- 1:09:06शास्त्रों में जो लिखा उसे हूबहू प्रकाशित कर देते हैं विस्तारित
- 1:09:11कर देते हैं, ऋषि बचे नहीं, खोज ही बचे नहीं और खोज क्या है खोज
- 1:09:20है हर चीज़ को पढ़ो, कोई बात नहीं।
- 1:09:25लेकिन देखो ये सत्य है कैसे पता चलेगा अपने अनुभव से पता चलेगा आग
- 1:09:32जलाती है, कैसे पता चलेगा या तो आग में हाथ डालो या दूसरों को हाथ
- 1:09:37डालते हुए देखो जल जाएगा अनुभव से आनी चाहिए चीज़।
- 1:09:44शास्त्रों का अनुभव अनुभव नहीं होता, किसी व्यक्ति का अनुभव होता
- 1:09:48है तो ही मैं करता हूँ या तो जिंदा गुरु के पास चले जाओ जिंदा
- 1:09:54गुरु के हालात देखो कैसे जीता कैसे उठता, कैसे खाता पीता?
- 1:10:02उसका दिन भर का दिनचर्या है या तो जीवंत गुरु की शर्य में चले जाओ,
- 1:10:07उसके पास बैठ जाओ, नहीं तो तुम्हारे भीतर भी वही तत्व है जो
- 1:10:13ऋषि के भीतर है, वही तत्व है तुम्हारे भीतर है तत्व मशीर भेद
- 1:10:19के। तुम ही परमात्मा हो या अपने भीतर
- 1:10:25जहाँ बैठे हो वहाँ अपने भीतर उतर जाओ ना काबा जाओ, ना मक्का, ना
- 1:10:33तीर्थ जाओ, ना गंगा सागर बाहर वो मिलेगा नहीं।
- 1:10:39ना वनों में, ना पहाड़ों में, ना गुफाओं में, घर में मिलेगा वो भी
- 1:10:48घर ये घर नहीं, वो घर, तुम्हारा शरीर, घर भली भाई और गा कर फूटेगी
- 1:10:57इसके साथ महू खत्म हो जाये। ये गागर फूट जायेगा, इसके साथ मोह
- 1:11:03समाप्त हो जायेगा तुमने तो मोह को बड़ा विस्तारित कर दिया है।
- 1:11:08तुम अपने पुत्र पुत्रों से पुत्रियां से मोह नहीं करते,
- 1:11:12पत्नी से माता पिता से मोह नहीं करते, तुम तो राजनीतिज्ञों से भी
- 1:11:17मोह करते हो। तुम कहते हो मर जाए लेकिन ये झंडा
- 1:11:21झंडा नहीं छोड़ेंगे। ये मोह ही तो है और क्या है
- 1:11:27चिपको? चाहे किसी चीज़ से चिपको दीवाल से
- 1:11:30चिपको, खम्बे से चिपको सड़क से चिपको लेकिन चिपका हट तो चिपका हट
- 1:11:37है। क्लीनिंगनेस इस क्लीनिंगनेस इस
- 1:11:41क्लीनिंगनेस को छोड़ना पड़ेगा, इसलिए मैं तुम्हें कहता हूँ न
- 1:11:45शास्त्रों से चिपटा, क्योंकि शास्त्रों में तो कोरे कागज़ काले
- 1:11:52आकर भैस बराबर बोलते नहीं। शास्त्र?
- 1:11:58और जीवित गुरु की दशा को देखो सिर्फ जीता कैसे खाता पिता कैसे
- 1:12:04इन मूर्खों के जीवित गुरु मत समझ लेना ये तो रात को जगाते हैं तुम
- 1:12:10पिलाते कहाँ हैं? जगाते हैं जगाने और पिलाने में
- 1:12:14अपना फर्क? दो कुट पीला दे साकिया दो कुट
- 1:12:25पीला दे साकी, बाकी मेरे किरोड़ दे।
- 1:12:37दो कुट पीला दे शाह की बाकी मेरे तेरोड़ दे बाकी नहाले स्नान करवा
- 1:12:52दे। मुझे दो घूंट पीला दे।
- 1:12:55और बाकी का स्नान करवा दे ताकि मैं डूब जाऊं तीर्थ नामा जे से सब
- 1:13:00आवे उस शराब के सागर में डूब के लगा और वो बाहर नहीं है तुम्हारे
- 1:13:07भीतर है शराब का सागर बाहर तो जल के खारा जल भीतर आनंद का सागर है।
- 1:13:15उस सागर में डुबकी लगा लो, तीर्थ भीतर है बाहर तीर्थ नाम ज्योतिष
- 1:13:23पावे, उसकी आज्ञा के बिना उसकी कृपा के बिना तुम तीर्थ में इतना
- 1:13:28नहीं कर सकोगे और उसकी कृपा कैसे बरसेगी समर्पण से?
- 1:13:33तुम उसके जीवन की पतवार, अपने जीवन की पतवार, उसके हाथों में दे
- 1:13:37दो, जब वो संभालेगा, तुम्हारी जीवन की नैया को कवैया बन जाएगा
- 1:13:43वो तो समर्पण हुआ फिर जैसा भी करे जैसा भी सर्कमस्टैंसेस हो।
- 1:13:53यू एक्सेप्ट दैट दी इन्नर पोर ऑफ यूर हर्थ टोटली एक्सेप्ट बस यही
- 1:14:03है आज की साधना का ब्रा तुम दुखी हो पल भर में सुखी हो जाओगे।
- 1:14:12देखो ज़रा अपने जीवन की पतवार को नैया को परमात्मा के हाथों में
- 1:14:19सोप दो बेहिचक हो के कोई शिकायत शिकवा न करो कोई अरदास न करो
- 1:14:27तुम्हारी अरदास तुम्हारी शिकायतों का ही प्रारूप है।
- 1:14:31को नीर ने शुगर की चादर चढ़ा दी, तुम्हे शिकायत हुई और तुमने उसके
- 1:14:40ऊपर शुगर कोटेड करके तुम कहते अरदास, साईं बे मेरी अरदास, तेरे
- 1:14:47तन ये शुगर कोटेड। कुनीन की टेबलेट हरदास क्यों
- 1:14:53करोगे भाई? जब वह कण कण में व्याप्त है उसे
- 1:15:00सब सुनता है कोई ऐसा ज़रा है जो वह नहीं हो सब सब जगह वो ही है,
- 1:15:07हर जर्रे में तुम ही तो रो प्रो है।
- 1:15:09जिधर देखता हूँ उधर तुम ही तुम उसको सुनाने की जरूरत पड़ेगी वह
- 1:15:16अरदास करने की जरूरत पड़ेगी। तुम कहते हो जा चड़ मुल्ला बाग दे
- 1:15:21क्या बहेरा हुआ खुदा और तुम खुद रसाना का जबरदस्त करते हो?
- 1:15:27क्या बहेरा हो गया? क्या सुनता नहीं उसे दिखता नहीं।
- 1:15:30उसे वह कण कण में रमने वाला राम तुम्हारी अंतर्दशा को नहीं जानता
- 1:15:43जानता है, लेकिन तुम नहीं जानते की वह कण कण में है।
- 1:15:48बस इसको जान लो के वो कण कण में है या अपने जीवन की पतवार उसके
- 1:15:55हाथों में सौंप दो परिपूर्ण रूप से सौंप दो इतने श्रद्धान भी तो
- 1:16:02हो जाओ उसके क्षणों में कोई शिकायतें शिकवा, अरदास प्रार्थना।
- 1:16:08न हो तुम्हारे भीतर से ज़रा ज़रा वो जानता है क्योंकि जरे हरे में
- 1:16:16वो है दीन दुखी की फरयाद वो सुनता है।
- 1:16:26भले हो बुरे हो, सुखी हो, दुखी हो घट घट के अंतस की जानत भले बुरे
- 1:16:35की पीर हो जानत वह घट घट का वासी कण कण में रहने वाला राम।
- 1:16:43किसी तीर्थ में नहीं मिलेगा, अयोध्या में नहीं मिलेगा, राम
- 1:16:46मंदिर में नहीं मिलेगा और तुम्हारे भीतर मिलेगा राम मंदिर
- 1:16:49तुम्हारे भीतर गुरुद्वारा तुम्हारे भीतर चर्च तुम्हारे भीतर
- 1:16:56मस्जिद तुम्हारे भीतर। वहाँ जाके पियो मस्जिद होती गसली
- 1:17:10शाहिद शराब पीने से मस्जिद में बैठ कर पी रहा था, मुरला ने रोक
- 1:17:16दिया, अरे यहीं लग गए हाँ हाँ, चलो बाहर चलो कहीं और पियो।
- 1:17:25यहाँ परमात्मा का घर है, अल्लाह का घर है।
- 1:17:32उसने कहा फिर बता दो जहाँ अल्लाह का घर ना शाही शराब पीने से
- 1:17:39मस्जिद में बैठकर या फिर यहीं पीने से मुझे या वो घर?
- 1:17:44जहाँ खुदा का घर ना हो शाहिद शराब पीने से मस्जिद में बैठकर या वो
- 1:17:53जगह बता जहाँ खुदा का घर ना हो कोई स्थान ऐसा नहीं है और ये
- 1:18:01मूर्ख क्या जानें। ये मूल भी क्या चा की वो हर जगह
- 1:18:07विद्यमान है। बस तुमने तो पढ़ लिया, नकल कर
- 1:18:09लिया। कुरान में लिखा है लिखा है लेकिन
- 1:18:12तुमने जाना नहीं जाना, बस फिर ऐसी ही बेवकूफियां पैदा होगी।
- 1:18:20नामदेव बिना बाप के पैदा हुए कभी हुआ है?
- 1:18:25यहाँ हमारे अवतार पुरुष तक पैदा हुए अवतार तक पैदा हुए, ये कबाड़ा
- 1:18:31बाद में हुआ। सारा कोई भी बिना माँ बाप के पैदा
- 1:18:38हुआ। माता कुशाल्या पिता दर्शन भगवान
- 1:18:43कृष्ण पैदा हुए माता देवकी पिता परशुराम पिता जमदग्नि, माता
- 1:18:56रेणुका, माँ बाप सभी के थे हमारे अवतारों तक के माँ बाप।
- 1:19:01पर यहाँ पशु पशुओं तक के माँ बाप होते हैं मूडानंदों तुमने
- 1:19:05कहानियों कहानी कहनी शुरू कर दी, तुमने सर्च किया ऐसा हो सकता है
- 1:19:12नहीं हो सकता है कोई सीकर नहीं है इसके पीछे।
- 1:19:21स्पर्म और अंडाणु का मिलान होगा और स्पर्म आएगा।
- 1:19:25पुरुष से अंडाणु आएगा। स्त्री से माँ बाप का होना जरूरी
- 1:19:29है। नॉन बायोलॉजिकल नाम का कुछ भी
- 1:19:32नहीं होता। ये नथिंग इस देर नॉन बायोलॉजिकल
- 1:19:37हराम का कह सकते हो। पुरुष और स्त्री के संयोग से
- 1:19:44व्यक्ति पैदा होगा, यही सत्य है। तुमने खोजी खो दिए तुमने ऋषि खो
- 1:19:49दिए, आज मूड पैदा हो गए। ये मूडों का ज़माना है, सिर से
- 1:19:54चले जाओ, नकलची बनता है जैसा शास्त्र में पढ़ लिया।
- 1:20:00खोज ही पैदा करना जो किसी भी बात को शास्त्र में पड़ेंगे, अपने
- 1:20:07भीतर डुबकी दिखाएंगे, खोजेंगे, खोजेंगे और अगर गलत पाएंगे तो
- 1:20:12कहेंगे साहस होगा कि गलत अगर ठीक होगा तो धन्यवाद देंगे के शास्त्र
- 1:20:18में ठीक। ऐसा ही होना चाहिए।
- 1:20:22परख कर चीज़ आनी चाहिए रिसर्च से चीज़ आनी चाहिए जहाँ सुमति जहाँ
- 1:20:29ने रिसर्चर सुमित वहाँ संपत्ति ना ना बहु प्रकार की संपत्ति।
- 1:20:38जहाँ कुमती यह नगलाबाज यह दाढ़ी को पीला की हो, इनको मूड को मूडतम
- 1:20:46लोग सुनेंगे कोई पंजाब नेशनल का वेंजर हो जाने से समझदार नहीं हो
- 1:20:55जाते। जब उसने मान्यताओं को मढ़ लिया
- 1:21:00अपनी बुद्धि बे तो उसकी बुद्धि ही मनेजमेंट करती थी नेशनल बैंक का
- 1:21:06दिल्ली तो मैं अपनी चाचा को मूड कहता था।
- 1:21:09अरे मूर्ख तुझे इतना पता नहीं। ये स्टील के दांतों को ठाई, पर
- 1:21:21उसको ठाकुर कहता है तेरे मैं ज़रा भी चेतनता नहीं है, जड़ को बूजे
- 1:21:29जड़ हो जावे और फिर तुम कहते हो की ये सारा संसार भारतवर्षो जड़
- 1:21:36हो गया। जड़ हो गए।
- 1:21:37भाई जब पूजा जड़ की करते हो, चेतन की पूजा करो, राधा चेतनता है,
- 1:21:47इसका जप नहीं करना, चेतनता को बढ़ाना है, कान्शस्नस को बढ़ाना
- 1:21:52है और फिर तुम झूमोगे। नाचोगे ने दीवाना राधा राधा के
- 1:22:04जाप की संख्या को नहीं बढ़ाना है। कॉन्शसनेस लेवल को बढ़ाना है,
- 1:22:13क्योंकि राधा, चेतनता का? समानार्थी राधा चेतना को कहते है
- 1:22:24राधा राधा के जाप को नहीं। संख्या को नहीं बढ़ाना स्टेट को
- 1:22:31बढ़ाना है। कान्शस्नस लेवल को जाना है।
- 1:22:35और जैसे जैसे अब यह बात सुनें जैसे जैसे तुम्हारी कान्शस्नस का
- 1:22:40लेवल बढ़ेगा, चेतनता के बढ़ने के साथ साथ आनंद भी बढ़ेगा।
- 1:22:47और आनंद जब उतरता है हृदय में पग में घुंघरू बांध रहते हैं।
- 1:22:55मेरा नाचने लगती है, राधा नाचने लगती है।
- 1:23:01कॉन्शसनेस लेवल के बढ़ने से आत्मा का आनंद बढ़ता है।
- 1:23:08जाप को नहीं बढ़ाना ये महज शब्दों की कोरी लुफ्फाजी।
- 1:23:14कॉन्शसनेस लेवल को बढ़ाना है, स्तर को बढ़ाना है, चेतना के स्तर
- 1:23:21को बढ़ाना है, उससे आनंद की मात्रा भी बढ़ेगी और तुम नाचोगे
- 1:23:27तुम्हारा शरीर नाचेगा। मधुवनु में राधिका नाचे रे मधुवनु
- 1:23:44में राधिका नाचे रे। गिरधर की मुरलीया बाजरे गिरधर की
- 1:24:02मुरलीया बाजरे मधुवन में राधिका। नाच रे मधुबन में राधिका नाच रहे,
- 1:24:22गिरधर की मुरली ना? बाजरे।
- 1:24:29मधुवन मेरा भी, का नाचे रे धन्यवाद।