Latest / Baba ji Vijay Vats / 21 Jan 25 - परमात्मा हमारी हर इच्छा पूरी क्यों नहीं करता?अध्यात्म मार्ग में हमसे कहां गलती हो रही है? गीता का ज्ञान!
Transcript
- 0:00दूसरे अध्याय का 50 महत्त्व बुद्धियुक्तों जहातिह ऊभे सुकृत
- 0:14दुष्कृत्य दशमा देओ गाय। यूजस्य।
- 0:21योग योगः कर्मशु को सलम। नमक पानी में घुल जाता है मिलता
- 0:31है, लेकिन अगर आप एक ग्लास पानी में।
- 0:39एक बूंद पानी की डाल दोगे वह घुलेगा या मिलेगा?
- 0:49मैंने आपको परिभाषा पहले बताई कि जो चीज़ घुलती है, वह फिर से अलग
- 0:55की जा सकती है। पानी में नमक को घोल दोगे वह अलग
- 1:01की जा सकती है, लेकिन पानी में एक बूंद पानी ही मिला दोगे तो फिर वो
- 1:11बूंद ढूंढे से मिलेंगे नहीं। वो गई।
- 1:17अज्ञात्मिक हो गई उसी बूँद को फिर से ना ढूंढा जाता है, ना जा सकता
- 1:25है वह अज्ञात्मिक हो गई तो समझिए यहाँ एक शब्द का प्रयोग कर रहे
- 1:36हैं कृष्ण। योग कर्मशु को सलम कर्मों में
- 1:43कुशलता का नाम योग है। योग कहा है योग योग का अर्थ है
- 1:56घुल जाना। मिल जाना नहीं, घोलने से शुरू
- 2:03करना होगा, मिलने पे अंत हो जाएगा जैसे आप कोई भी कर्म करते हो।
- 2:14कृष्ण कहते हैं, इतनी तर्लीनता से करो।
- 2:20एक कर्म ही बचे तुम न बचो, ध्यान से समझना इन शब्दों को तुम कोई भी
- 2:31कर्म करो 100%। अपनी शक्ति को इन्वॉल्व करके कर्म
- 2:40करो, आज तुम जैसा कर्म करते हो, उसमें तुम्हारी इन्वेस्टमेंट
- 2:49इन्वॉल्व होती, नहीं 100% आधा ध्यान इधर।
- 2:55आता ध्यान उधर तुम खाना भी खाते हो तो पता नहीं तुम्हारा ध्यान
- 3:02किधर किधर होता है ज़रा देखना कभी ठहर के देखना।
- 3:15खाना खाते खाते भी तुम्हारे मन में इतने विचार चलते हैं और जब
- 3:22इतने विचार चलते हैं तो तुम खाना खाने के कर्म में तलीन हो गए
- 3:31क्या? अभी विचार बाकी है?
- 3:37जब तल्लीनता आएगी तो उसकी निशानी समझ लो, तल्लीनता का लक्षण है,
- 3:48फिर तुम्हें विचार नहीं दिखेंगे दिखेंगे।
- 3:54याने आएँगे नहीं खाने खाने की प्रक्रिया में इतने तल्ली तुम हो
- 4:00जाओगे कि तुम्हें पता नहीं चलेगा कि कौन सा विचार आया क्योंकि
- 4:10विचार आएगा ही नहीं। इसे थोड़ी सी अन्य एक उदाहरण से
- 4:17समझने की कोशिश करेंगे। हम मनुष्य डरता है दिन भर मृत्यु
- 4:28न आ जाए तुम इसी मृत्यु के मारे मारे।
- 4:35कपते फिरते हो, मृत्यु न आ जाए मृत्यु न आ जाए।
- 4:44एक पल के लिए भी अपने आपको असुरक्षित नहीं छोड़ते लेकिन क्या
- 4:52तुम ये जानते हो? कि रोज़ तुम छः 7 घंटे असुरक्षा
- 4:59में जीते हो, जब तुम्हें मृत्यु की कोई परवाह नहीं रहती और सही
- 5:08जीने का आनंद उसी घड़ी में है। तो कृष्ण की बात यहाँ सटीक यहाँ
- 5:16समझाएगी ओह है नींद नींद में तुम अपने आप को पूरा पूरा छोड़ देते
- 5:25हो। नींद में तुम अपने आप को पूर्णतया
- 5:31समर्पित कर देते हो। विराट को कहीं मर ना जाऊं कोई
- 5:41चोरी ना कर ले, कोई डाका ना पड़ जाए।
- 5:48कोई लाभ, हानि, किसी तरह का कोई फिकर नहीं होता।
- 5:54तनाव, सोच, चिंता कुछ नहीं होता। तुम अपने आपको परिपूर्ण रूप से
- 6:06समर्पित कर देते हो। उस विराट को बिना कहे और कई बार
- 6:17तो निद्रा इतनी गहरी आती है कि तुम्हें पता ही नहीं चलता कि तुम
- 6:22सो गए। कृष्ण कहते हैं निद्रा की तरह
- 6:32समर्पण से भरा भरा अगर कर्म हो जाए तो वह तुम्हें निद्रा की
- 6:40भांति ही फ्रेश कर जाएगा। इतने आनंद और स्फूर्ति से भरे तुम
- 6:48उठो गए कि तुमने कभी कल्पना नहीं की थी?
- 6:54अभी तुम कर्म करते हो, उस कर्म में तुम्हारी शक्ति वेस्ट होती है
- 6:59लगती है। इसे करके देखना।
- 7:05जीस दिन इस तरह से कर्म होने शुरू हो गए।
- 7:10उस दिन कर्म एक योग बन जाएगा। योग यानी शक्ति का संचय है।
- 7:20उस दिन कर्म तुम्हारी शक्ति को खींचेंगे नहीं, तुम एनर्जीलेसनेस
- 7:29इसका एहसास नहीं करोगे, तुम एनर्जीफुल का एहसास करोगे।
- 7:42जैसे निद्रा में जब तुम छोड़ देते हो तो निद्रा का आनंद भी चखते हो,
- 7:52टाइम लेस्नेस का आनंद भी चखते हो। उस 6 घंटे 5 घंटे, 7 घंटे 10 घंटे
- 8:00जो जितना सोता है उसमें सब फिकर फाके खत्म कोई चिंता नहीं है, कोई
- 8:09तनाव नहीं है, कोई मृत्यु का भय नहीं।
- 8:16इतने घंटे तुम बिना मृत्यु के भय के रहते हो, भला कैसे होता होगा
- 8:25यह? और दिन में तुम ध्यान में जाते हो
- 8:30तो तुम कहते हो मृत्यु का ब्याह हमें सताता है शिलांग मार के बाहर
- 8:33आ जाते हो। अजीब वडंपना है दिन में ही अपने
- 8:42आप को छोड़ते हो तो भय लगता है बाहर आ जाते हो डरते हो?
- 8:511000 1000 सवाल मेरे पास आते हैं बाबा।
- 8:55यहाँ थोड़ा सा न खिचब हो रहा है तो इसको थोड़ा सा विस्तार से कहने
- 9:04का कष्ट करेंगे। ये कपाल की जगह पे खुजली हो रही
- 9:10है। यह क्या है, थोड़ा सा बताएंगे
- 9:26हमारी बागड़ी में कहावत है। बापू बापू कहा बड़ा सुख पाया बापू
- 9:40बापू कब आया बड़ा दुख पाया। गुरु कहलाना आसान नहीं होता गुरु
- 9:52कहना बड़ा आसान होता है। ये रात को मेरी बाएं हथेली में
- 9:59खारिश होने लगी। ऐसा सपना आया बाबा ये शुभ है कि
- 10:04ये शुभ है। अब भला मैं तुम्हे हथेली में
- 10:08खारिज उसका फल बताऊँ क्या होता है?
- 10:18तुम उस समस्त हाथी की तरह हो जो जिधर चाहे उधर हो लेता है।
- 10:28तुम्हारा मन बिल्कुल ऐसा ही है रात को वही तुम सो जाते हो।
- 10:348 घंटे कोई मृत्यु का भय नहीं होता।
- 10:38कहाँ जाता है मृत्यु का भय? क्या करते हो ऐसा?
- 10:45क्या कोई चमत्कारी का द्रव्य संजीवनी बूटीक खाकर सोते हो?
- 10:51कोई नफा नुकसान नहीं सोचते, कोई चिंता तनाव नहीं सोचते और वही
- 11:00छोड़ते हो तुम दिन में अपने आप को ध्यान में।
- 11:06तो झट से छलांग मार के बाहर आ जाते हो अरे बाबा, ये तो भीतर
- 11:14विकार ही विकार भरे हैं। कैसे जाए अपने भीतर?
- 11:19तुमने कभी नहीं पूछा कैसे जाए नींद में?
- 11:22नींद में बिल्कुल उसी तल पे पहुँच जाते हो तुम जीस तल पर तुम ध्यान
- 11:28में अंतरम गहराइयों में पहुंचते हो बिल्कुल ऑन दी सेम स्पॉट तुम
- 11:38कभी नहीं डरे कभी उठ के नहीं बैठे।
- 11:44मौत से सोते हो और सुबह स्फूर्ति से बेहतर होता जा खुश तबियत
- 11:55प्रसन्न मुद्रा में उठते हो किया क्या तुमने सिर्फ छोड़ा?
- 12:02समर्पण किया उस विराट के हाथों में वो भी किया नहीं हो गया।
- 12:12प्रकृति तुम्हें एक सबक सिखाती है।
- 12:16अगर तुम सीख सको तो। प्रकृति तुम्हें सबक सिखाती है कि
- 12:22अगर तुम नींद की तरह जागते जागते भी इसी तरह मुझ पर छोड़ देगा तो
- 12:34उसी तल पर चला जाएगा। जीस तल पर नींद में गया।
- 12:39और नींद में किस तल पर जाता है? आदमी जीस तल पर ध्यान में जाता
- 12:44है। ध्यान की गहराई में जीस तल पर
- 12:47पहुंचता है। वह बिल्कुल वही होता है जो नींद
- 12:52की गहराई में तल होता है। सुसुप्ति में भी तुम वहीं होते हो
- 12:57और ध्यान में भी तुम समाधि में भी तुम वहीं होते हो।
- 13:01ये बड़े मज़े की बात है। एक जगह जाने से तुम डरते हो, एक
- 13:08जगह तुम मोज़ से चले जाते हो और ये दोनों घटनाएँ तुम्हारे ऊपर
- 13:14रोज़ घटते हैं। अब इसको क्या कहा जाए?
- 13:23कृष्ण कहते हैं योग कर्मशु कौशलम कर्मों में कुशलता का नाम योग है।
- 13:36आइए हम प्रसंग में गहरे चलें। दिन भर सभी तुम काम करते हो जैसा
- 13:47भी किसी का बिज़नेस है, जैसा भी किसी का कोई उपार्जन का ढंग है।
- 13:54घर परिवार चलाने का तुम उसमें काम करते हो, लेकिन आज तक वो काम
- 14:08योग्य नहीं बना। तुम पूछोगे, मैं कैसे कह सकता
- 14:18हूँ? मैं ऐसे कह सकता हूँ कि जीस दिन
- 14:21तुम्हारा कर्म की कुशलता योग बन गई उसके बाद।
- 14:33तुम्हें आनंद के लिए अलग से ध्यान की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
- 14:40यह अद्भुत सूत्र है कृष्ण का जीस दिन तुम कर्म करने में कुशल हो
- 14:48गए। यही कुशलता नहीं आती।
- 14:53तुम्हें बस बाकी सब तरह से कुशल हो।
- 14:56तुम्हें निंदा करने में चुगली करने में कुशल हो धन संग्रह में
- 15:06कुशल हो। कूड़ा कबाड़ा इकट्ठा करने में
- 15:11कुशल लेकिन कर्म करने में कुशल नहीं है।
- 15:19कर्मों की कुशलता जीस दिन तुम्हारे भीतर आ गई उस दिन तुम
- 15:26योगी हो। योगी तुम घुल गए, परमात्मा में
- 15:37परमात्मा में घुल गए और घुले हुए का अस्तित्व बाकी रहता है ये
- 15:43मैंने आपको पहले बता दिया। तुम नमक के जैसे हो जाओगे, पर
- 15:48मातमों में तुम घोल सकोगे। बीना बीना आनंद 24 घंटे उठोगे
- 15:55बैठोगे चलोगे? फिरोगे काम करोगे?
- 16:00बड़ी मस्ती शुरू रहेगा। यह वो अवस्था है।
- 16:07जिसे ब्रह्मानंद की अवस्था से पहले की अवस्था कहते हैं।
- 16:14जैसे नमक घुल गया पानी में लेकिन पानी नहीं हुआ, वैसे ही तुम
- 16:22ब्रह्म का स्वाद तो चखने लगे। नमक पानी का स्वाद तो चखता है
- 16:28लेकिन पानी होता नहीं है। बातों को गहराई से समझना उदाहरण
- 16:37हैं। इशारे हैं, शब्द हैं समझने की
- 16:42चेष्टा करना। तो तुम्हें बराबर समझाएगी।
- 16:50नमक पानी में घुलता है, पानी का स्वाद जगता है, हर वक्त पानी में
- 16:56रहता है लेकिन पानी हो नहीं जाता है।
- 17:03यही तुम्हारी अवस्था अगर हो जाए तो तुम धन्यभाग्य होए क्या कहा
- 17:14मैंने तुम धन्यभाग्य होए तुम भाग्यशाली नहीं होए।
- 17:23भाग्यशाली कब होगे जब तुम पानी ही हो जाओगे जब तुम बूंद बन जाओगे
- 17:32पानी की तो फिर तुम समुद्र में समा जाओगे बूंद समानी संबंध में
- 17:41अभी तुम बूंद नहीं हुए हो। अभी तुम नमक हो घुल सकते हो, आनंद
- 17:49ले सकते हो, जीवन का, उस ब्रह्मा का, उस विराट का आनंद तुम मान
- 17:55सकते हो, विराट में घुल सकते हो, लेकिन ध्यान रखना घुलने में इतना
- 18:00आनंद आएगा। में बहुत से व्यक्ति इस गोले में
- 18:06ही ठहर जाते हैं। उनको भगवान कृष्ण योग भ्रष्ट कहता
- 18:14है। कितनी सुंदर अवस्था है।
- 18:20भिन्नी भिन्नी महक उस बगीचे में हर वक्त बैठे रहना, चौबीसों घंटे
- 18:27ब्रह्म के पास रहना, लेकिन कृष्ण कहते हैं वह योग व्रष्ट हो बस वह
- 18:37संतुष्ट हो गया। ब्रह्म में घुलने से संतुष्ट हो
- 18:43गया लेकिन कृष्ण तुम्हें कोई और पड़ाव पे ले जाना चाहते हैं।
- 18:50बस एक कदम और दूर कृष्ण कहते हैं नमक मत बने।
- 18:59नमक बनने से तुम भ्रम का स्वाद चखोगे भ्रम में ही रहोगे।
- 19:05जैसे मीन जल में ही रहती है, लेकिन किसी दिन जल से अलग हो जाती
- 19:12है और तड़पती है और मर जाती है। तो तुम मीन की तरह पानी में
- 19:20रहोगे, पानी का लुत्फ उठाओगे, पानी तुम्हारा जीवन होगा, नमक की
- 19:27तरह घुल जाओगे, पानी का स्वाद चख हो गया मीन भी पानी का स्वाद चखती
- 19:34है, नमक भी पानी का स्वाद चखता है।
- 19:37लेकिन ना तो मीन पानी हो सकती है ना नमक पानी हो सकता है दोनों से
- 19:47अलग रहता है, जल दोनों से अलग रहता है, मीन से भी और नमक से भी।
- 19:56ब्रह्म का आनंद तो मिल जाएगा, ब्रह्म के करीबा जाओ सुसुक्ति में
- 20:03भी तुम ब्रह्म के आनंद में लेन हो जाते हो, कोई पता नहीं होता और
- 20:11उसका लक्षण है। बाबा नानक ने बताया।
- 20:16उसका लक्षण है नीरपो नीरबह जब तुम में होते हो तो तुम्हें कोई भय
- 20:26लगता है, तुम्हारा कोई बैर ही होता है, नहीं होता।
- 20:37यह लक्षण है ब्रह्मानंद का लेकिन नमक इसका स्वाद चख सकता है।
- 20:48नमक जब घुलता है, पानी में वो नरवय होता है।
- 20:53निर्भय भी होता है। कोई भय नहीं होता।
- 20:56उससे बस मिल गया, पानी में मिल गया, घुल गया, पानी का स्वाद चख
- 21:03लिया तो बाबा कहते हैं, निरपु निर्वय आकार मूरत अजूनी।
- 21:15सेपम सेपम यहाँ आकर मार खाएगा नमक बाबा कहते हैं भगवान परमात्मा
- 21:27आनंद खुद से ही प्रकाशित है, लेकिन नमक खुद से प्रकाशित नहीं।
- 21:36नमक पानी से प्रकाशित है, नमक पानी में घुल गया है पानी नहीं हो
- 21:42गया है, तुम्हारा लक्ष्य है पानी हो जाना।
- 21:51पानी में घोले रहना आनंददायक तो है पानी में घोले रहना ब्रह्मानंद
- 22:00को उठाना तो है भीना, भीना आनंद, खुमारी और खुशबू तुम्हारे प्राणों
- 22:10में। आती रहेंगी।
- 22:14तुम उस सुगंधी को पीते रहोगे, मानते रहोगे हल्की हल्की सी खुशी
- 22:22तुम्हारे रोए, रोए में छाई रहेंगी भ्रम का लुत्फ तो तुम उठाते
- 22:28रहोगे। लेकिन कृष्ण कहते हैं तुम सदा अलग
- 22:34ही बने रहोगे। नमक कहाँ मिलता है?
- 22:40पानी में नमक को जब चाहो तुम अलग कर सकते हो।
- 22:48पानी निकालो, सूरज की धूप में रखो, पानी उड़ जाएगा, नमक रह
- 22:55जाएगा साली में यही तो करते हैं ये टेबल शाल्ट बनाने वाले पानी को
- 23:04ले आते हैं, धूप में रख लेते हैं। पानी उठ जाता है।
- 23:08वाष्पो बन के थाली में नमक शीश रह जाता है।
- 23:14वो आपको खाने के लिए परोस देते हैं।
- 23:18जब चाहे अलग किया जा सकता है नमक लेकिन अगर तुम पानी हो जाओ।
- 23:30बारिश बन के टपक पड़ो, मूसलाधार बारिश बनकर समुद्र में टपक पड़ो।
- 23:38तो क्या वो बूँदें समुद्र में अलग की जा सकती हैं?
- 23:43कभी नहीं की जा सकती? जब बूंद समुद्र में मिल जाती है
- 23:49किसी भी ढंग से उस बूंद को फिर से खोजा नहीं जा सकता।
- 23:54अलग करना तो बड़ी दूर की बात है। यू कैनट इवन सर्च दैट तुम यहाँ तक
- 24:01के उसे। खोज भी नहीं सकते।
- 24:04कहाँ गई वो समां जाती है वो सामान्य फिर तुम्हें नहीं पता
- 24:14चलता वो कहाँ गई है बस वो समुद्री ही हो जाती है।
- 24:22मुझे लोग पूछ लेते हैं यह कबीर, नानक, कृष्ण, राम, मीरा जैसे लोग
- 24:29कहाँ जाते हैं? मैंने कहा जाते तो ये सागर में
- 24:36हैं बूंद की तरह लेकिन समाल जाते हैं।
- 24:41अगर तुम कहो कि कबीर की बूंद को निकाल लिया जाए, कृष्ण की बूंद को
- 24:49राम की बूंद को मीरा इनकी बूंदों को अलग फिर से कर दिया जाए तो
- 24:54असंभव है मुश्किल नहीं इट इस इम्पॉसिबल।
- 25:01जब कृष्ण कृष्ण हैं तो वो व्यष्टी हैं।
- 25:08जब कृष्ण समुद्र हो गए तो वो समिष्टी हो गए जब इन दो शब्दों को
- 25:14याद रखना जब कृष्ण कृष्ण की तरह रहेंगे।
- 25:21तो कृष्ण व्यष्टि में रहेंगे, फिर उनका अपना चरित्र होगा।
- 25:27अपने काम करने के ढंग, बोलने के ढंग, दुनिया में रहने सहने के
- 25:32ढंग, उनका चरित्र, उनका स्वभाव ये सब काउंट करेगा।
- 25:41बहु व्यष्टी है, लेकिन जब कृष्ण की बूंद समुद्र में समा गई और
- 25:52समुद्र हो गई बूंद समानी समुद्र में तो समष्टी हो गई।
- 25:59और जब व्यक्ति समस्ती हो जाता है तो उसका निजी चरित्र व्यक्ति
- 26:05समाप्त हो जाती है। उसका निजी कुछ नहीं रहता, सब
- 26:10समस्ती का हो जाता है। सब उस विराट का हो जाता है।
- 26:15वह विराट में जो मिला। तो विराट ही हो गया व्यस्ति जब
- 26:20समस्ती में समा जाता है बूंद जब समुद्र में समा जाती है तो समस्ती
- 26:26ही हो जाती है, समुद्र ही हो जाती है फिर उसको खोजना असंभव है।
- 26:33लेकिन अगर तुम। बूंद नहीं हो नमक हो रात्रि को
- 26:44सोते वक्त तुम बूंद नहीं होते। यह कमी होती है योगी योग में।
- 26:56नमक की तरह होता है जब चाहे अलग किया जा सकता है तुम रात को नींद
- 27:06में जाते हो, सुबह बाहर आ जाते हो न?
- 27:12तुम अलग कर लिए गए ना? तुम मिले तो नहीं तुम गुम तो नहीं
- 27:20हुए तुम फना तो नहीं हुए? तुम विदा तो नहीं हुए लेकिन रात
- 27:27को उतनी देर तक तुम विदा रहे उतनी देर तक तुम फना रहे।
- 27:33जब तक तुम समस्ती में रहे मिले नहीं, अलग बने रहे, नमक का सदा
- 27:42अलग रहता है तो नींद में सुसुप्ति में।
- 27:50तुम ब्रह्मानंद में तो होते हो, इसलिए उसे बेहतर नहीं, फ्रेश
- 27:55सूझते हो, ब्रह्मानंद के करीब होते हो और वही आनंद पीते हो जो
- 28:03नमक समुद्र में रह के पीता है। लेकिन नमक को अलग किया जा सकता
- 28:10है। जब तुम भोर भयी जगते हो तो फिर
- 28:17अलग हो जाते हैं ऐसा जब तुम भूत बन जाओगे तो फिर ऐसा नहीं हो
- 28:26सकेगा। अगर तुम चाहोगे भी अलग हो ना तो
- 28:30हो नहीं सकोगे और समुद्र कभी चाहेगा भी नहीं।
- 28:34बूंद होना ध्यान रखना समझती कभी नहीं चाहेगी बूंद होना इतने आनंद
- 28:45को छोड़कर। एक छोटी सी बूंद का आनंद हो जाना
- 28:51भला कौन चाहेगा? इतने बराट आनंद की अस्तित्व को
- 28:57छोड़कर एक छोटी सी बूंद का आनंद हो जाना कौन चाहेगा?
- 29:04ऐसा कोई मूर्ख ही होगा। कृष्ण ये बात कहते हैं योग कर्मशु
- 29:12कौशल योग की बात है, लेकिन योग की बात अल्टीमेट नहीं है।
- 29:23योग की बात। तुम्हें सभी रोगों से छुटकारा
- 29:27दिला सकती है। ऐसा नहीं एक रोग बाकी रह जाता है।
- 29:34क्या समस्ती तुम बचे रहते हो क्षमा करना व्यष्टी।
- 29:46समस्ती होना बाकी रह जाता है। नमक घुल जाता है, मिल नहीं जाता
- 29:58जैसे सुबह तुम से निकल के बाहर आ जाते हो।
- 30:03वैसे बूंद समुद्र से निकल के बाहर नहीं आ सकते और वो आना भी नहीं
- 30:10चाहेगी। नमक आना चाहेगा क्योंकि अलग है तो
- 30:16रात को तुम नमक की तरह होते हो और योग में भी तुम नमक की तरह होते
- 30:22हो। योगा कर्मशु कुशलम कर्मों में
- 30:32कुशलता का नाम योग है। कर्मों में कुशल कैसे हुआ जाए?
- 30:37क्या है विधि? 100% अपनी शक्ति को कर्मों में
- 30:46इन्वेस्ट कर दो जो कर्म करो पूरी तलिंगता से करो, ज़रा भी न बचे
- 30:55तुम ज़रा भी न बचो करने वाली। जब करने वाले ना बचोगे तो करता ना
- 31:03बचेगा। जब करता ना बचेगा, तो भौंकता ना
- 31:08बचेगा बस यही समझाना चाहते हैं। बहुत गहरा सूत्र महीन सूत्र है
- 31:15सूक्ष्म। और कृष्ण तुम्हें यही समझाना
- 31:20चाहते हैं कि एक बार नमक की तरह तो हो जाऊं, अभी तक तो तुमने सोने
- 31:29चांदी का गद्दी का मान मर्यादाओं का स्वाद लिया था।
- 31:37पदार्थों का स्वाद चखा था लेकिन पदार्थों से परे भी कुछ है और जो
- 31:46सच्चा आनंददायक है वो पदार्थों से परे ही है।
- 31:54कृष्ण कहते हैं पहले योग का स्वाद ले लें।
- 31:57वो है कैसे? वो कैसा है अभी तक तो तुमने आनंद
- 32:03को चखा भी नहीं। जब चखोगे नहीं तो भीतर वो मोक्ष
- 32:13कैसे जगेगी? कैसे धधकी गई वो अग्नि व्रह की
- 32:24ध्यान रखना विरह की अग्नि तब धधकती है जब प्रेमी प्रेमिका की
- 32:30आँखें चार हो। और एक अदृश्य अमृत की बूंद उनके
- 32:42भीतर उतर जाती है। दोनों में फिर वो उस अमृत की फिर
- 32:49देखभाल करते हैं लेकिन मिलता नहीं।
- 32:53तो नहीं मिलता वो क्षण होता है बिरहा का बिरहा के भीतर व्यक्ति
- 33:00जलता है क्योंकि बार बार तुम्हारा मन उधर खिस्ता है उस लम्हे में
- 33:08इतना आनंद था। इतना खिंचाव था, इतनी कशिश थी, वो
- 33:15था क्या वो दो नैना जो मिले दो नैनो से मिले बिजली सी चमकी कुंद
- 33:27गया कुछ। और एक मिठा सी हृदय में उतर आई।
- 33:34एक आनंद भीतर उतरा फिर आँखें आँखों से हट गईं, लेकिन दिल।
- 33:46ढूँढता। है।
- 33:49फिर वो ही फुर्सत के रात दिन बैठे रहे।
- 34:03दसबुरे जाना। किये हुए दिल ढूँढता है फिर वही।
- 34:19दिल वही ढूँढता है वही क्षण फिर आजा लेकिन वह क्षण आता है।
- 34:30जब वो क्षण नहीं आता उसे मीरा कहती है, बेरहा प्रेम दबाने?
- 34:41हेरी, मैं तो प्रेम दीवानी मेरो दर्द न जाने को हेरी में तो।
- 35:06प्रेम दीवानी मेरो दर्द न जाने को।
- 35:20वो जो कसक भीतर उतर गई थी। आनंद की बहारों ने तुम्हारे रोए
- 35:30रोए को घेर लिया था क्षण भर के लिए वो बिजली चमकी और खो गई
- 35:36अज्ञात में वो क्या था? उसी लम्हे को मन फिर ढूंढता है,
- 35:45बस उसी लम्हे को तुम्हारी आत्मा भी ढूंढती है।
- 35:51जब तुम्हारी आत्मा एकाकार थी, समुद्र से और विलज्ञ हो गई।
- 35:59बिरहा की आग जलती है। तुम्हें याद आती है उस आनंद की जो
- 36:12आँखों से आंखें मिली थी। और एक आनंद की लश्क आई थी।
- 36:24लोभुली दास, ता। हैलो फिर याद आ गई वो भूली
- 36:43दास्तां हैलो फिर याद आ गई। नजर के सामने घटा सी छा गई बबुली
- 37:09दास्तां। लो फिर याद आ गई नजर के सामने घटा
- 37:26सी छा गई। याद आता है।
- 37:34पुराना वो दास्तां याद आती है जब ये बूंद समुद्र में एक आकार थी
- 37:44नजर के सामने एक गटा सी छा जाती है।
- 37:50मुख्यात काश मैं फिर उन्हीं लम्हों में लौट जाऊं।
- 37:56बूंद की ये चाहत इसे ही बिरहा कहते हैं।
- 38:01इसे ही प्रेम की अग्नि कहते हैं तुम्हारी भी यही चाहत है।
- 38:09लेकिन तुम ढूंढ़ते हो मान मर्यादा में नाम अमर करना चाहते हो।
- 38:21सुमेरू पर्वत जितना धन इकट्ठा करना चाहते हो।
- 38:25सोने के अम्बार लगाना नहीं चाहते हो ग्रीस में कहावत कहानी पर चलते
- 38:33है बिडास नाम का एक व्यक्ति। उसमें कोई अद्भुत शक्ति ने प्रवेश
- 38:40किया। कृष की प्रचलित कथाओं में से यह
- 38:47एक बड़ी सुंदर कथा है। तुम चाहते हो सोने के महल खड़े कर
- 38:53देना। हिमालय पर्वत तो सुमेरु पर्वत
- 38:57खड़े कर देना सोने का कर दो ये कहानी।
- 39:03उसी सुमेरु पर्वत की तरफ इंगित करती है मिडास नाम का वो व्यक्ति।
- 39:08ग्रीस में उसमें अचानक एक किस्से दिया गया।
- 39:14अच्छा भला था चलते चलते उसने एक पात्र को छू दिया।
- 39:23जैसे कहते हैं कि पारस लोहे को टच कर दे और सोना हो जाता है।
- 39:32बस उसमें कुछ इस तरह की सिद्धि आ गई थी।
- 39:36ऐसी सिद्दियां होती हैं पारस मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है।
- 39:41मेरी जीवनी में तुम्हें पारस का वरदान मिल जाएगा।
- 39:44एक बहुत बुजुर्ग संत के पास यह पारस था तो उस मिडास में यह
- 39:53सिद्धि आ गई कि वह जीसको भी छू देता।
- 39:56लोहे को नहीं जीसको भी छू देता, वह सोने को हो जाता।
- 40:04तुम सोने को इकट्ठा करने की तजबीज बनाई जाते हो।
- 40:08क्या करें क्या विस्सात मटे भारत कभी सोने की चिड़िया था, फिर सोने
- 40:16की चिड़िया हो जाए क्या हो जाएगा? अगर जीने की कला ना हो तो सोने का
- 40:27क्या करोगे? सोना तो ना खाया जाता है, ना भूख
- 40:31मटती है ना तन का ढापा जाता है तन।
- 40:37सिर्फ दिखावे के लिए सोना होता है, सोने का कोई उपयोग नहीं होता।
- 40:43सोना का उपयोग सिर्फ यही है कि हमारी नजरों में कॉम्पिटिटिव है
- 40:49सोना। लोहे के मुकाबले बस हमने उसे मान
- 40:54दे दिया। और मनुष्य की नजरों में सोना मान
- 40:59रखता है तो सोना उपजा है तो मिडास जीसको हाथ लगा देता हूँ, वो सोना
- 41:05हो जाता है। कहानी दमदार है, इस कहानी से सबक
- 41:11ले लेना खबर दूर दूर तक फैल गई। कब तक जो उसको गले लगाने को बेताब
- 41:24थे? बड़ा प्यारा व्यक्ति था बहुत से
- 41:28लोग बहुत सी स्त्रियाँ बहुत से आदमी उसे गले लगाने को बेताब रहते
- 41:33थे। लेकिन एक स्त्री ने उसको गले
- 41:38लगाया, वो सोने की हो गई। स्टैच्यू बनकर ही वहीं खड़ी हो गई
- 41:44सोने की स्त्री बाकी तो घबराए ये क्या हो गया?
- 41:54अब मिडास दूसरे को छूना चाहे वो भागे, स्त्रियां दूर दूर भागने
- 42:01लगीं। पुरुष जो हाथ मिलाना चाहते थे,
- 42:05भागने लगे, छू अंतर हो जाते देख कर दौड़ लगा देते।
- 42:14यह क्या हुआ? तुम्हारे पास भी अगर ऐसे ही करा
- 42:18जाए तुम चाहते तो हो जिसे छू दूं वो सोना हो जाए, मट्टी को छू दूं
- 42:24वो सोना हो जाए। लेकिन इसका हाल देखना क्या हुआ?
- 42:31घर गया उसकी घरवाली कांपने लगी। हाथ जोड़ के खड़ी हो गई मुझे छूना
- 42:36मत। तब तक खबर उठ गई थी जब बच्चे उसके
- 42:42पांव हाथ लगाते वो भागने लगे वो बच्चों से प्यार करना चाहता, चूम
- 42:48न चाहता, बच्चे भागते। हद हो गई।
- 42:57सभी चीजें जो तुम सोचते हो तुम्हें पता नहीं अगर वो सच हो
- 43:04जाएं तो उनका नतीजा क्या होगा? तुम सोचते हो कि मैं मिट्टी को
- 43:09हाथ डालूं, सोना हो जाए, इस आदमी का हाल देखो क्या होता है?
- 43:16मिडास ने उस स्त्री को गले लगाया उस स्टैचू को जो आदमी उसके गरीब आ
- 43:23रहे थे, हाथ मिलाने को उन्होंने उस।
- 43:27स्त्री की दशा देख कर भाग गए क्या रे ये तो खतरनाक काम है और बाकी
- 43:35तो छोड़ो घर वाले जीसको छू दे ओह सोना, धर्मपत्नी।
- 43:46कांपने लगी। हाथ जोड़ के बैठ गई, अर्जुन की
- 43:51तरह कांपने लगी। देखिए मेरे मुझे छू मत देना और
- 44:00बच्चे तो भाग गए उसके करीब न आए वो बुलाए।
- 44:06अरे टीनू वेणु आजा अब कौन आये? बोले ही नहीं, साँस ही ना भरे,
- 44:18तुम सोच तो लेते हो, परमात्मा समझदार बहुत है।
- 44:25वो समझदार है, इसलिए तुम बच जाते हो।
- 44:30अगर वो तुम्हारी हर इच्छा को पूरी करने लग जाए तो नर्क बनते हुए
- 44:35जिंदगी को देर न लगे। तुम भूल जाते हो इसलिए परमात्मा
- 44:40को दयालू कहते है। तुम तो चाहती हो कि मैं माटी को
- 44:47हाथ लगाऊं, सो न हो जाए, लेकिन परमात्मा ही दयालु है, वो
- 44:54तुम्हारी इस मूर्खता को अंजाम नहीं देता, पूरे नहीं करता उसे
- 45:02पता है मूड है। अगर सच में मैंने इसकी इच्छा पूरी
- 45:06कर दी तो क्या होगा? वो अच्छी तरह से जानता है।
- 45:12फिर सोना जीवंत चीज़ सोना हो जाएगी।
- 45:17तुम कहते हो मिट्टी सोना हो जाए लेकिन तुम्हें नहीं पता।
- 45:22जीसको छुओगे वो मिट्टी क्या मनुष्य होगा तो वो सोना हो जाएगा,
- 45:30जिंदा मृदा हो जाएगा ये भूल जाते हो तुम तुमने दूसरा पहलू कभी सोचा
- 45:36ही नहीं होता तुमने सिर्फ ये सोचा होता है।
- 45:42कि मैं मिट्टी को हाथ लगाऊं तो सोना हो जाए तो मैंने कभी यह नहीं
- 45:45सोचा कि जीवंत आदमी को हाथ लगाऊं तो वह भी सोना हो जाएगा।
- 45:50अगर यह सिद्धि कहीं आ गई तो ऐसी सिद्धियां होती हैं।
- 45:53मैं नहीं जानता, लेकिन ऐसा हो गया।
- 45:57मिडास के साथ। ग्रीस में आदमी थाए उसको किसी ने
- 46:07संभाला नहीं न खाने को रोटी न पीने को पानी कुछ नहीं दिया किसी
- 46:16ने। ना कोई मित्र रहा ना कोई शत्रु
- 46:20रहा, शत्रु भी भागने लगे। तुम ये मत सोचना के शत्रु सामने आ
- 46:26जाएंगे। शत्रु को तो पता है क्या रे ये तो
- 46:32खतरनाक हो गया। ये तो बस सिर्फ हाथ ही लगाना है।
- 46:38लड़ाई झगड़ा तो करना ही नहीं है और हम तो गए काम से तुम्हारी सभी
- 46:47सोचें तुम्हारी सभी वासनाएँ तुम्हारी सभी इच्छाएं परमात्मा
- 46:53दयालु हैं इसलिए पूरा नहीं करता। अगर कहीं वो दयालुता पे उतर जाए
- 46:59सच में तुम्हारी जिंदगी नर्क बन जाए तुम खाने के लिए रोटी को हाथ
- 47:07लगाओ और वो सोना हो जाएगा कैसे खाओगे?
- 47:12सोने से पेट नहीं भरता। और सोना चबाया भी नहीं जाता।
- 47:15ध्यान रखना गले में अटक जाएगा। तुम मुर्मती हो इसलिए मैं
- 47:26चिल्लाता हूँ कि तुम मुर्ख हो, तुम ऐसी ऐसी डिमॅंड कर देते हो,
- 47:33परमात्मा के सामने रह तो पर्वतिका है।
- 47:39वह तो कृपा का सागर है कृपा निधान, वह तो रहम ओह करीब है रहिम
- 47:52है रहिम करता है, तो वह तुम्हारी इच्छा हर इच्छा पूरी नहीं करता।
- 47:58और तुम बाजिद हो कि हमारी हर इच्छा पूरी नहीं होती।
- 48:02मैं कहता हूँ तुम बाजिद होना छोड़ दो, तुम मूड हो बस तुम्हारी वही
- 48:10इच्छा पूरी हो इसलिए बाबा नान कहते हैं कर वही जो तेरी मर्ज़ी
- 48:15मेरी तो यही अर्जी। पल्टू यही कहते हैं जो तू धब्बा
- 48:22है सुई पलीकार तू सदा सलामत नरंकार समझदार व्यक्ति ही ये बात
- 48:32कह सकता है बाबा जैसा। नानक ही इस बात को कह सकता है
- 48:39क्योंकि नानक जानते हैं, मन तो मूर्ख है, मन तो न जाना क्या क्या
- 48:47उपराली करता है, मन तो न जाना क्या क्या सोचता है?
- 48:52क्या सिर में मरेगा सोना? जाती तो एक सुई का नोक भी नहीं।
- 48:59साथ में तू सुमेरु पर्वत खड़े करके सोने के लेगा।
- 49:03काम क्या करेगा? मार कर गोली करा ली जाएगी।
- 49:11बे मुहूर्त के उठा ली जाएगी जब तेरी डोली निकाली जाएगी।
- 49:20बहुत लोग मुझे पूछ लेते हैं कि परमात्मा दयालु कैसे हुआ?
- 49:25बलात्कार होते हैं, हत्याएं होती हैं, चोरियां, डाके होते हैं।
- 49:30मैं कहता हूँ वो ध्यालू है, बस तुम नहीं समझ सकोगे।
- 49:37इतनी ही दया है, उसने तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं की।
- 49:42बहुत लोग रोते हैं। हमारी यह इच्छा थी बाबा पूरी नहीं
- 49:46हुई। मैंने कहा अगर परमात्मा ने पूरी
- 49:49नहीं ना की। तो वो रहम मुकरिम है, वह बड़ा रहम
- 49:55करने वाला है, वह कृपा करता है। तुम पे जो इच्छा नहीं पूरी करता,
- 50:04अवश्य ही इसमें कोई न कोई तुम्हारा बुरा होगा।
- 50:09तो उसने तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं की, लेकिन कहीं सोचा होगा और उसकी
- 50:18इच्छा पूरी हो गई। पूरी होगी तो संकट में फराह अब
- 50:23करे क्या ना दोस्त रहा। दोस्त दोस्त न रहा प्यार प्यार न
- 50:40रहा एम् जिंदगी हमें तेरा। एक बार न रहा एक बार न रहा।
- 51:03दोस्त दोस्त न रहा। प्यार प्यार न रहा एम् ज़िन्दगी
- 51:08हमें तेरा ऐतवार न रहा अगर तुम्हारी कोई इच्छा पूरी नहीं।
- 51:17होती। तो बाबा नानक का ये शब्द याद रखना
- 51:26तेरा। पाणा मीठा लागे।
- 51:32और पूरे हृदय से कहना अगर तुने नहीं पूरी की ये इच्छा तो अवश्य
- 51:38ही तू तू विराट है और तेरी बुद्धि भी विराट है तेरी कारीगरी भी
- 51:45विराट है तेरी संग रचना भी विराट है।
- 51:48तेरी कलाकृति भी विराट है, तू भी बराट है, तेरी सर्जना भी बराट है,
- 51:56सर्जनहार भी विराट है, अवश्य ही तेरे दमाक में विराट है मेरा
- 52:03दिमाग अछूता है। मेरे सोचने में कहीं कोई गलती
- 52:08होगी जो तुने नजर नहीं की, अन्यथा अगर नजर कर देता तो फिर मड़ास
- 52:17जैसी हालत तुम्हारी भी होती सोने के पहाड़ तो खड़े कर दोगे।
- 52:25जीसको हाथ लगाओगे, सोने का हो जाएगा, लेकिन याद रखो रोटी भी
- 52:31सोने की हो जाएगी खाओगे क्या मर जाओगे, भूख से पानी पीओगे हाथ
- 52:40लगाओगे छोओगे सब सोना। दूसरा पहलू तुम कभी सोचते नहीं
- 52:51इसलिए तुम दुखी हो। संत दूसरा पहलू सोच लेता है अगर
- 52:59उसने मेरी इच्छा पूरी नहीं की। तो इसमें अवश्य ही मेरा निहित सुख
- 53:06होगा। अगर वो पूरी कर देता तो फिर मिडास
- 53:11की तरह मुझे भी रोना पड़ता। मैं भी चिल्लाता हे प्रभु फिर तुम
- 53:19कहते हो, मैं तो बुद्धिहीन था। मेरी तो बुद्धि शुधर थी, तुने तो
- 53:24सोच लिया होता फिर तुम वैसे ही उलाह में थकोगे फिर तुम उलाह
- 53:29नहीं, इस प्रकार से शिकायतें करोगे कि तू तो सोच लेता, तू तो
- 53:36बड़ा था वृहत्था विराटथा। सृजन हारा था सब तुने बनाया था तू
- 53:41जानता था मेरा क्या नुकसान होगा? फिर भी तुने पूरा कर दिया मुझे
- 53:46चीफ जज बना दिया मुझे पीएम बना दिया पता था जूते पड़ेंगे क्यों
- 53:58बनाया? परमात्मा तुम्हारी इच्छा अगर पूरी
- 54:02नहीं करता तो सब्र कर लेना। वह रहमू करीम है, कृपा निधान है,
- 54:13कृपा का सागर है और वो है। बस संत से अगर सीखनी हो तो एक बार
- 54:19सीख लेना, चमत्कार मत सीखना, चमत्कार देखकर प्रभावित मत होना
- 54:28सीखनी हो तो एक बार सीख लेना और इसके आगे तुम्हारे लाखों चमत्कार
- 54:33सीख है। एक बात सीख लेना वह जो करता है
- 54:40ठीक करता है और वह है ही इज़ ही इग्ज़िस्ट वह विद्यमान है।
- 54:52अगर उसकी आँखों में झाँक के तुम देख सको, गहराई से तो सबूत मिल
- 54:59जाएगा कि वो है अगर उसकी आवाज़ को गहरे से सुन सको, गहरे तलों से
- 55:07आती हुई उस पुकार को सुन सको। तो तुम्हें अहसास होने लगेगा कि
- 55:12वह है और सत्संग का यही महत्त्व था कि तुम्हें किसी ना किसी तरह
- 55:22सत्य पर यकीन हो जाए और ये सत्य है कि वो है मार्ग सत्य नहीं है।
- 55:30मार्कस ने खोजने मार्कस ने स्वयं के अहंकार की बलि नहीं दी बचा के
- 55:36रख लिया और स्वयं के अहंकार की बलि दिए बिना उसके दर्शन नहीं
- 55:41होते और मार्कस बिना अहंकार की बलि दिए कहता है कि वह नहीं है तो
- 55:47ठीक कहता है। अहिंकार की बलि नहीं चढ़ाई तो वह
- 55:52दिखे कवि ने उसका होना और उसके होने का सबूत न मिले।
- 56:06सिर्फ जच जाए, विश्वास हो जाए, श्रद्धा हो जाए, श्रद्धा,
- 56:11विश्वास, रूपिनो या व्यायाम बिना ना ना दिखे, ना अनुभव हो, ना
- 56:18प्रत्यक्ष हो, सिर्फ हृदय में जच जाए कि वह है वो जा कैसे जचेगा?
- 56:28संत के संघ से जचेगा संत की मीठी वाणी को सुन के जचेगा संत की
- 56:35बातों से समझाएगा संत के लक्षणों से कृत्यों से समझाएगा वो क्या
- 56:42करता है, वो क्या खाता है, वो क्या बोलता है?
- 56:46कैसे जीवन यापन करता है और क्यों करता है?
- 56:52इसलिए संत के जीवन को गहराई से देखना और जीतने गहराई से तुम
- 56:58देखते जाओगे। उतने ही तुम आस्ते होते जाओगे।
- 57:03तुम्हें एक चीज़ का भरोसा हो जाएगा।
- 57:09इसलिए भगवान कृष्ण ने कहा संत का संघ करना, संत के दायरे में रहना
- 57:19तो तुम बिना कुछ किए बिना कोई प्रयास के।
- 57:24तुम भी संत हो जाओगे अमानितुम् दंभितुम् हिंसा शांतिराजुम
- 57:37आचार्यों, उपासनाम, सोचुम, स्तिरम, आत्मा।
- 57:45आचार्यों, उपासना, संत के संघ बैठ जाना, संत के दायरे में बैठ जाना,
- 57:53संत के कहीं आसपास बैठ जाना। इसलिए सतसंग का इतना महत्त्व था।
- 58:05सतयुग से कलयुग आया, बात बिगड़ती चली गई।
- 58:15सतयुग निर्भीक था, सत्यथा। सत्य का बोल बाला था बिगड़ता गया
- 58:25बिगड़ता गया कहते के सत्य में चार धर्म के पांव त्रेता में दो रह गए
- 58:35और तीन रह गए द्वापर में। दो रह गए।
- 58:47सतयुग में चार थे, त्रेता में तीन रह गए, पावर में दो रह गए।
- 58:54कलयुग में धर्म का एक पांव रह गया।
- 59:01बस उस एक पांव से दुनिया चलती है, धर्म का एक पांव बचा है, बाकियों
- 59:12ने चरण झूम लिए हैं पाप के। अधर्म सतयुग में चार पांव थे,
- 59:23बड़ी ईमानदारी थी, व्यक्ति भीतर ही रहता था, बैहर्मुखी कम ही होता
- 59:31था, उन मुनि मद्रा में रहता था हर वक्त।
- 59:36सतयुग की यह महम्मत थी। हर व्यक्ति अंतर्मुखी रहता था और
- 59:42जो जितना अंतर्मुखी होगा, उतना सुखी होगा।
- 59:47जो जितना अंतर्मुखी, उतना ही सूखी।
- 59:56उसके बाद भगवान राम आए, त्रेता आया तो पांव चार से गट के तीन रह
- 1:00:08गए और फिर दो फिर आया तो पांव दो रह गए।
- 1:00:20अब कल ही योग आ गया है। धर्म का एक कोण है बाकी सब चरण
- 1:00:27चुम्बक बंद है तो इन्हें मिडास की कहानी अवश्य सुननी चाहिए।
- 1:00:37जोड़ोगे। लेकिन जो जोड़ोगे वो खा भी सकोगे,
- 1:00:45माटी को छू दूँ, सोना हो जाए हो जाए लेकिन कभी सोचा कि रोटी
- 1:00:53खाऊंगा तो वो सोने के हो जाएंगे। फिर क्या करूँगा?
- 1:00:59सोने से तो पेट नहीं भरता, सोना तो चबाया भी नहीं जाता।
- 1:01:04सोना तो भूख भी नहीं मिटाता फिर क्या करोगे?
- 1:01:19ये भूल जाते हो तुम दूसरा पहलू सिक्के का तुम देखते नहीं।
- 1:01:28परमात्मा बड़ा दयालु है, जो तुम्हारी हर इच्छा पूरी नहीं करता
- 1:01:35वह दयालु इसीलिए है। कि तुम कमतर बुद्धि हो, कमतर कहा
- 1:01:41भी तो क्या कहा? नेग्लिजिबल भी कहा तो क्या कहा?
- 1:01:46तुम हो ही नहीं इस विराट को देखो पूछो वैज्ञानिक से किस विराट में।
- 1:01:57मेरा कितना प्रतिशत है? तो वैज्ञानिक ताली मार के हंसेगा
- 1:02:07क्या बताये? जीरो लगाते थक जाएंगे पॉइंट के
- 1:02:11आगे तुम्हारी कोई औकात नहीं यू अरे नेगलिजबल और तुम कहते हो बस
- 1:02:19मैं हूँ, मैं हूँ तो नमकीन है। इसे ही अहंकार कहते हैं और बिना
- 1:02:29इसको खोए अगर मार्कर्स कहता है कि वह नहीं है तो बिल्कुल ठीक कहता
- 1:02:35है। सटीक, ईमानदार, लेकिन ईमानदार
- 1:02:41व्यक्ति सुखी होगा यह मुश्किल ही नहीं असंभव है अगर ईमानदार
- 1:02:51अहंकारी है, सुखी नहीं। लाख ईमानदार हो मार्क्स लेकिन
- 1:03:02अहंकारी हो और सुख उसके पास नहीं बरकेगा दुखी ही रहेगा।
- 1:03:10अहंकार का होना दुख का होना है। जीस दिन अहंकार खो जाएगा, उस दिन
- 1:03:17सुख की आहट होगी फिर धीरे धीरे सुख आएगा, अभी तुम सुखी नहीं हो
- 1:03:29बुद्धियुक्तो जहातिह। उभय सुकृत दुष्कृत अपने जीते जी
- 1:03:38जब्त प्राण हैं। शरीर में जीते जी सुकृत और
- 1:03:43दुष्कृत पाप और पुण्य दोनों से दूर हो जाओ बड़ा प्यारा शब्द है।
- 1:03:51तुम कहोगे कैसे दूर हो जाए अपने जीते जी सुकृत और दुष्कृत अच्छे
- 1:04:01कामों से और बुरे कामों से दूर हो जा जीते जी हो जा, मर कर तो सभी
- 1:04:10हो जाते हैं। मरकर तो न पुण्य होता है, न पाप
- 1:04:14होता है, कर ही नहीं सकता है। मरकर तुम दान भी नहीं कर सकोगे और
- 1:04:22मरकर तुम मत्य भी नहीं कर सकोगे। मरकर तुम श्रेष्ठ वाणी भी नहीं
- 1:04:28बोल सकोगे। और मरकर तुम गाली भी नहीं निकाल
- 1:04:31सकोगे। ध्यान रखना दूसरे ही बोलेंगे राम
- 1:04:34नाम सत्य है तुम नहीं बोल पाओगे बुद्धि युक्त चाहती है उबे सुकृत
- 1:04:41दुष्कृत्य जीते जी अपने जीते जी। अच्छे कामों और बुरे कामों से दूर
- 1:04:52हो जा, त्याग दे उनको कैसे त्यागेगा रस्मध्य गाय चु जस्व।
- 1:05:09श्रोता कर्मेश्वर कौशलम योग कर्मों में कुशलता को कहते हैं
- 1:05:18भगवान कृष्ण कर्मों की कुशलता क्या है तुम्हारी 100% शक्ति?
- 1:05:26कर्म में इन्वेस्ट हो जाए, कर्म ही बचे करता न बचे करता लीन हो
- 1:05:35जाए और लीन हो जाए तो उसका स्वाद चखेगा फिर कर्म।
- 1:05:45करना तुम्हारे लिए सुखद होगा। तुम कभी देखना कोई भी कर्म करो,
- 1:05:52कंप्यूटर पे बैठे हो, पूरी तलीता से काम करो, फिर देखना कितनी
- 1:05:59ताजगी आती है अगर तुम आधा ध्यान उधर होगा आधा उधर होगा।
- 1:06:05तुम्हारा ध्यान तो बेशर्फ होता है माला तो कर में फिरे जीव फिरे मुख
- 1:06:15माँ मैला हाथ में फिरती है, जीव मुख राम राम राधे।
- 1:06:24माना तो कर में फिरे जीव फिर मुखमा मनीराम चहुदिस फिरे मनीराम
- 1:06:32बच्चों में उलझा है पत्नी में उलझा है माता, पिता में उलझा है
- 1:06:41दोस्तों में उलझा है दुश्मनों। में उलझा है मनेराम जाऊं दिस फेरे
- 1:06:48ये तो सुमरण नाम है तकबीर कहते हैं ये नहीं है योग योग किसे कहते
- 1:06:57हैं योगा कर्मसु को सलम। कर्मों में कुशलता कुशलता से
- 1:07:04तल्लीनता से, कर्म कर जो भी कर 99% शक्ति भी अगर तुने व्यय कर दी
- 1:07:141% भी रख ली तो वो योग न हुआ तुमने देखा?
- 1:07:2299% पर भी पानी उबलता नहीं है उबलता है सो पर आकर एक डिग्री भी
- 1:07:31कम हुआ ट्रांसफर्मेशन विल लाटो है अपन?
- 1:07:37वह लिक्विड वाष्पना बनेगा। कमी क्या सिर्फ 1% की 99 के ऊपर
- 1:07:47लिक्विड 100 के ऊपर वाश पर ट्रांसफॉर्म हो गया?
- 1:07:54स्वरूप ही बदल गया। कहाँ तरल था?
- 1:07:59बह सकता था। अब वो उड़ सकता है, वाष्प बनकर
- 1:08:05बादलों में झूम सकता है, बरस सकता है, ऊंचाइयों को छू सकता है,
- 1:08:11अठखेलियां कर सकता है, आसमान में तारों को छू सकता है।
- 1:08:19ट्रांसफॉर्मेशन होती नहीं, तुम अक्सर रोते हो?
- 1:08:25दुख से सुख आता नहीं, तुम अक्सर रोते हो, कृष्ण के इस सूत्र से
- 1:08:32सीख लो। क्योंकि नियम कभी बदलता नहीं।
- 1:08:40अगर तुम में ट्रांसफॉर्मेशन नहीं हुई, कहीं तुम में गलती है।
- 1:08:49कहीं 1% छोड़ो पॉइंट 1% भी कम है, तो ट्रांसफर्मेशन विल नॉट हैपन
- 1:08:57करता भाव अगर बिल्कुल लक्षणिक ज़रा सा भी बना रहा तो भी पूर्ण
- 1:09:04रूप से तुम भाष्प नहीं बनोगे। बड़ा सुन्दर श्लोक है और संसार
- 1:09:14में दक्षता प्राप्त करने वाला है तुम्हें उस परम तत्व को ले जाना
- 1:09:24संसार में झूमना नाचना गाना। ऊंचाइयों को छूना तुम तो सिर्फ
- 1:09:32अमीर बनना चाहते हो, यह तुम्हें अमीर छोड़ तुम्हें आनंदित भी कर
- 1:09:39देता है। यह तुम्हें वो भी दे देता है जो
- 1:09:44तुमने सोचा नहीं था। और अगर तुम उसकी इच्छा के विपरीत
- 1:09:48चलोगे, उसकी इच्छा के उसके विधान के विपरीत चलोगे तो याद रखना फिर
- 1:09:59दशा उसी की हो गई जैसे मैं फिर सब सोने का बन जाएगा।
- 1:10:07क्या सिर में मारोगे सुन भूख लगी रह जाएगी और तुम भूख से ही मर
- 1:10:15जाओगे न दोस्त रहेगा, न दुश्मन रहेगा, न पत्नी रहेंगी न बच्चे,
- 1:10:22सभी डरेंगे तुमसे। और आज तुम यही हो, तुम्हें पता
- 1:10:28नहीं सब तुमसे डरते हैं जीसको तुम कहती हो प्रीतम बाबू डरती है
- 1:10:36तुमसे तुम थोड़ा हाइप्नोटाइज़ करके देखना।
- 1:10:44मैंने देखा है कि हिप्नोटाइज़ कर के है जो लोग कहते हैं बस हम ना
- 1:10:49जी सकेंगे एक दूसरे के बिना जब उन्हें हिप्नोटाइज़ किया जाता है
- 1:10:53वो कहते हैं छितर उठा लूँगी जूती है नोक वाली नहीं बाहर से कुछ
- 1:11:00चेतन कुछ सोचता है। अवचेतन में कुछ और भरा होता है और
- 1:11:06अवचेतन के पार अचेतन में कुछ और भरा होता है।
- 1:11:13तुम सिर्फ चेतन को ही अपना मैं मानते हो?
- 1:11:18यह सब कुछ नहीं है। यह ऑथेंटिक नहीं है।
- 1:11:22चेतन। चेतन के भीतर भी बहुत कुछ है और
- 1:11:26भी राहतें हैं बसल की राहत के सिवा कर्मों में कुशलता 100%
- 1:11:34कर्मों में इन्वेस्ट हो जाए फिर देख तमाशा इन्वेस्ट कर अपने आप
- 1:11:41को। फिर देख तमाशा आनंद का आता है कि
- 1:11:49नहीं आता है? सुख दुख में दुख सुख में बदलते
- 1:11:55देर नहीं लगती। बस ये कारीगरी तुम्हारे कर्मों
- 1:11:59में कुशल भाग्य है। तुम कर्मों में अकुशल हो तो
- 1:12:08तुम्हारी सुख तुम सोने को हाथ लगाती हो, माटी हो जाता है और जब
- 1:12:14तुम कर्मों में कुशल हो जाओगे तो तुम जो मांगते हो वो तो मिलेगा।
- 1:12:22उससे अलग भी मिलेगा क्योंकि जब तुम उसपे फेंक दोगे तुम्हारे तो
- 1:12:28हाथ छोटे हैं, तुम्हारी मांग तुम्हारी छोटी सी खोपड़ी करती है
- 1:12:35और जब वो देने पे आएगा दादा दे लें दा थकपा।
- 1:12:40जुगा जुगांतर खाई का सच्चा दाता तिलना तमाह है, उसके भीतर तमाह
- 1:12:48नहीं है, उसके भीतर लालच नहीं है, बिना मांगे वह तुम्हें मोती दे
- 1:12:53देगा, लेकिन तुम मांगते हो क्या मांगते हो?
- 1:12:58माटी मांगते हो खाक मांगते हो आखिर में तुम भी माटी हो जाते हो
- 1:13:06तुम्हारा कमाया भी माटी हो जाता। है।
- 1:13:10श्री कृष्ण गोविंद हरे। मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव,
- 1:13:29श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी। हे नाथ नारायण वासुदेव सोच ज़रा
- 1:13:45जे सूरज रब बना दाना अँखियाँ सो हुंदियाँ नजर कुजना।
- 1:13:58सोच ज़रा जे सूरज रब। बनौंदा ना अँखियाँ सो हुंदियाँ
- 1:14:06नजर कुछ औंदाना पर फगत निराले। ने पर पगत निराले ने पथरा चुला
- 1:14:27भूले देने जड़ अखियां वाले ने। श्री कृष्ण गोबिंद हरे मुरारी
- 1:14:46हिनाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण गोबिंद।
- 1:14:55हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव पितुमात स्वामी सखा हमारे।
- 1:15:14विथ मातृ स्वामी सखा हमारे हे नाथू नारायण वासुदेव व श्री कृष्ण
- 1:15:31गोविंद। हरे मुरारी हे नाथ नारा यन
- 1:15:40वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:15:52चिनाथ नारायण वासुदेव प्यार की मर्जी के आगे यार की मर्ज़ी के
- 1:16:10आगे। यार का दम भरकदे यार की मर्जी के
- 1:16:24आगे यार का? दम भर के दे यार का दम भर के दे
- 1:16:40ये तो उल्फत कर चुका है ये भी उल्फत।
- 1:16:49करक दे श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव
- 1:17:04श्री कृष्ण गोविंद। हरे मुरारी हिनाथ नारायण वा सुले।
- 1:17:27धन्यवाद।