Latest / Baba ji Vijay Vats / 3 May 26 - एकांत कमरे मे बैठने की वो जादुई शक्ति जो आपको 'विराट' बना देगी। No Internet No Social Media
Transcript
- 0:09सुवर्ण सिंह राजस्थान से मैं अपने आप से घबरा गया हूँ, मुझे यह
- 0:29जिंदगी दीवाना कर दे। आज जैसी जिंदगी प्रत्येक व्यक्ति
- 0:45जी रहा है, निश्चित ही उसका अंत काबिलपन का है।
- 1:00अगर अब नहीं संभले तो निश्चित समझाओ कि तुम पगला के मरोगे, मैं
- 1:15अपनी। आपसे घबरा गया हूँ मुझे यह जिंदगी
- 1:23दीवाना करता है। सोशल मीडिया सोशल मीडिया पर
- 1:37हजारों करोड़ों अकाउंट्स? तरह तरह के रंग भरंगे लेख तरह तरह
- 1:52की आवाज़ें तरह तरह का। स्वार्थ कोई वेला था जीस वक्त में
- 2:13हम आनंद की जिंदगी जिया कर सकते है।
- 2:18काश वो तुम्हें आज सपने में भी मिल जाए तो शुभ है हमने वो जिंदगी
- 2:28वास्तव में जी है ठहरा हुआ समय। ज्यादा अंकाक्षी नहीं थी।
- 2:43सोशल मीडिया का ज़माना नहीं था। पढ़ने के लिए कुछ किताबें
- 2:49लाइब्रेरी में हुआ करती थीं। प्रो।
- 2:54किताबें ऑथेंटिक थीं। मुंशी प्रेमचंद का गौदान पढ़ लिया
- 3:05विलियम शेक्सपियर का दिया अटल स्टायगा अलेक्जैंडर पोप का।
- 3:17कोई अमृता प्रीतम की कहानी कथाएं या छुटकला ऐसा ही कुछ हमारे
- 3:34मनोरंजन का साथ। सुबह निकल जाते ठंडी हवाओं में
- 3:44नहर के किनारे क्रिया जो करते लंबा लंबा सांस लेते दौड़ भी
- 3:53लेते। आराम भी कर लेते, वहीं शिनान भी
- 3:57कर लेते। कोई हमें बुलाता न था।
- 4:07पुजारी मंदिर को बंद करके घर चले जाते और क्या भिया मुझे दे जाते,
- 4:15मैं जब भी घर जाऊं। फिर चाहे एक बजा हो, चाहे सांझ के
- 4:203:00 बजे हो, मुझे कोई डिस्टर्ब करने वाला नहीं था।
- 4:35तुमने जो लिखा है पुत्र। तुम इस लिखने के योग्य भी अभी हो,
- 4:44यही गनीमत है, अन्यथा यह लिखने के लिए भी कुछ समझदारी होनी चाहिए।
- 5:01अन्यथा ये खजाएं ये बर्बादियां तुम्हें उस मंजिल तक ले जाते है
- 5:15जहाँ तुम सुपुर्दे खाक हो जाते या जीते जी।
- 5:26तुम बेनष्ट हो जाते। आज प्रत्येक व्यक्ति सांस ले रहा
- 5:34है लोहार की धोकनी की तरह, लेकिन उसमें प्राण में।
- 5:48और हमें उस जमाने के लोगों को आज पीढ़ी को देखकर दुख भी होता है,
- 5:58तरस भी आता है कहाँ गई वो चैन भरी रातें?
- 6:07कहाँ गए वो सुकून भरे दिन, कहाँ गए वो मन मोह के दृश्य कहाँ गए वो
- 6:19आराम के लम्हे जो हम कभी गुज़ारा करते थे?
- 6:25कहाँ गया वो सच्चा प्यार कहाँ की वो मित्र था सब कहाँ है?
- 6:42चंद सिक्कों की खनखनाहट में शमशान की भेंट चढ़ गया सब।
- 6:53कब्रिस्तान हो गया सब आज तो राख भी ना बची ऐसा क्या मना क्या?
- 7:10कोई आश्चर्य की बात नहीं है अगर तुम ही अपनी ज़िन्दगी में और 10
- 7:18साल बाद ये कहो की ज़िन्दगी से ज़्यादा बढ़िया मृत्यु होती है।
- 7:29मुझे इसमें कोई संदेह नहीं क्योंकि जब वासनाएँ इतनी ज्यादा
- 7:36बढ़ जाती हैं और वासनाओं को एक अंश भी पूरा करने का वक्त नहीं
- 7:44मिलता। तो व्यक्ति क्या किया करता है?
- 7:51आत्मघात और आत्मघात की कगार पर मनुष्यता पहुँच चुकी है।
- 8:01तुम चारों तरफ़ देखना अगर तुम थोड़े से विश शांत हो।
- 8:07तुम प्रकृति की गोद में हो, तो तुम देखना इन शोर होल से भरे हुए
- 8:14बाजारों को तुम देखना कभी। कोठों पर स्त्रियों की अस्मत देखा
- 8:31करती थी। आज सरेराह बाजारों में स्त्रियाँ
- 8:35खुद ही अपनी अस्मत को लुटाने को तैयार बैठी क्या हो गया?
- 8:46कहाँ गया वो सब कुछ किसने बिगाड़ा ये माहौल, कुछ चंग सिर्फ रे लोग
- 9:06ऐसा छुआछूत का रोग फैलाया। कि वह किसी भी छुआछूत के रोग से
- 9:15ज्यादा जहरीला था। आप जिंदा तो हो लेकिन जीवन कहाँ
- 9:26है ये तुम्हें पता नहीं। एक पंचभौतिक तत्व का पुतला मातृ
- 9:35श्वास ले रहा है इसके अतिरिक्त और उसको कुछ नहीं सूझता।
- 9:45तुम्हारी ये बात बिलकुल ठीक है। ऐसी अवस्था में ऐसी ही तो पकार
- 9:52उठा करती है, मैं अपने आप से घबरा गया हूँ।
- 10:07मैं अपने आप से घबरा गया हूँ, मुझे है ज़िन्दगी।
- 10:23दीवाना कर दे मुझे, है ज़िन्दगी दीवाना कर दे कहाँ से ये फरेबे
- 10:42आरजू? मुझको कहाँ लाया तुम्हारी आरजू
- 10:52तुम्हारी आरजू एक फरेब है तुम्हारी वास ने धोखा है।
- 11:05ऐसे नहीं है कि वासनाएँ तो मैं धोखा देती हूँ, थोड़े अर्ध गहरे
- 11:15तुम्हारी वासनाएँ ही धोखा। कहाँ से ये फरेब है आरजू मुझको
- 11:23कहाँ लाया जिसे मैं पूछता था आज तक निकला वो इकस आया तुम जहाँ
- 11:33जाना चाहते थे सोचा था। कि वह सच होगा, लेकिन वह तो एक
- 11:41परछाई निकली, साया निकला जिसे मैं पूछता था आज तक निकला वो एक साया
- 11:51मेरी आरजू मुझे कहाँ लेके आके? सारी दुनिया आरुओं की कालिख में
- 12:04आज गुम हो गई है, इसलिए आज तुम स्वास्थ्य तो ले रहे हो लेकिन
- 12:12तुम्हें जिंदा कोई नहीं कह सकता। बस मात्र।
- 12:17जैसे लोहार की धोकनी जा घट प्रेम ना संचार है।
- 12:22100 घट जान मसान जैसे खाल लोहार की सांस लेतबीन प्राण लोहार की जो
- 12:31खाल होती है और सांस तो लेती है, लेकिन उसमें प्राण नहीं होता।
- 12:37ऐसे ही तुम उलझ गया हो तुम्हें पता ही नहीं जीस रास्ते पे तुम चल
- 12:46रहे हो वो रिश्ता जाता कहाँ तक है क्या है मंजिल?
- 12:56और कौन सा है रास्ता, ये तुम्हें खुद ही मालूम नहीं, कोई चला रहा
- 13:03है और तुम मात्र चले जा रहे हो फुटबॉल के कुछ खिलाड़ियों की तरह।
- 13:14जिंदगी तुम्हें लाटें मारती है और तुम इधर से उधर एक गोल से दूसरे
- 13:21गोल तक भटकते हुए रह जाते हो। बस यही तुम्हारी जिंदगानी है कहाँ
- 13:30से ये फरेबे आरजू मुझको कहाँ लाया?
- 13:34जिसे मैं पूछता था आज तक निकला वो इक साया खता दिल की है मैं शर्मा
- 13:45गया हूँ ये मेरे दिल का ही कसूर है ये मेरे दिल ने आजु की।
- 13:53और दिल को पता नहीं होता के आरजू कभी पूरी नहीं होती।
- 14:01यह वो मंजिल है जो कभी किसी ने पाई।
- 14:06आरजू के मंजिल रास्ते में ही फना हो जाया करते हैं।
- 14:13खता दिल की है मैं शर्मा गया हूँ मैं अपनी आप से घबरा गया हूँ,
- 14:21मुझे जिंदगी दीवाना कर दे, मांगने की जरूरत नहीं है, तुम खुद ही
- 14:27पागल हो जाओगे। बड़े ही शोक से एक ख्वाब में खोया
- 14:34हुआ था। मैं बड़े ही शोक से एक ख्वाब में
- 14:39खोया हुआ था। मैं अजब मस्ती भरी एक नींद में
- 14:46सोया हुआ था मैं, अजब मस्ती भरी एक नींद में।
- 14:50सोया हुआ था। मैं खुली जब आँख तो थर्रा गया हूँ
- 14:56खुली जब आँख तो थर्रा गया हूँ, मैं अपने आप से घबरा ज़िन्दगी
- 15:17दीवान कर दे पुत्र सन से। तुम जो भी कुछ कर रहे हो, वॉटेवर
- 15:33यू अरे डूइंग वह एक छलावा है, उसे तुम चाहे परमात्मा का नाम जपना कह
- 15:44लो चाहे संसार के सिक्कों को जोपना।
- 15:49जमीन जायदादों को कागजों की लकीरों के ऊपर खींच न कहलों या
- 15:56कुछ निगाहें किसी गद्दी पर ज़माना कहलों सब छलावा है।
- 16:08सब शलावा है और इसका परिणाम यही होना था जो तुमने मेरे आगे तश्तरी
- 16:21में रख कर पेश कर दिया। तो अब तुम्हें क्या करना चाहिए?
- 16:34सुबह से शाम तक बच्चे से बड़ा पे तक व्यक्ति मर जाता है जीस
- 16:45व्यक्ति ने। जीस इन्वेंशन ने इस बेरी का
- 16:55निर्माण किया जीस बेरी को हम इंटरनेट कहते सोशल मीडिया क्या
- 17:03तुम कहते हो ज़िन्दगी को आसान कर दिया मैं कहता हूँ।
- 17:09जिंदगी को बर्बाद कर दिया तुम कहते हो जिंदगी को आसान कर दिया,
- 17:16मैं कहता हूँ जिंदगी को वीरान कर दिया।
- 17:22तुम्हें पता ही नहीं एक छोटा बच्चा भी आज मोबाइल को सामने रख
- 17:27के बैठा। कालपनी के चित्र देखता है न जाने
- 17:36क्या कुछ चेतन अब चेतन अचेतन समूह का चेतन।
- 17:45मैं वो खुद ही झंझोड़ रहा है, ठूंस रहा है उसे पता ही नहीं ना
- 17:51उसे चेतन मन का पता, ना अवचेतन का पता ना अचेतन का पता ना सामूहिक
- 17:58अचेतन का पता। क्योंकि माँ बाप अपना पीछा
- 18:06छुड़ाने के लिए उसके हाथ में मोबाइल दे देते हैं, ऐसी ही
- 18:17ज़िन्दगी पीती है वो व्यक्ति कहाँ के।
- 18:28जो आनंद में बैठे झूमते थे मस्ती में और जिनके पास डालरों की खनकना
- 18:35थी, जिनके घरों में हजारों एकड़ों की रजिस्ट्री नहीं पड़ी।
- 18:45जिनके पास कोई औरदा न था, जिनके पास कोई डिग्री न थी लेकिन फिर भी
- 18:58वो संतुष्ट थे। आज।
- 19:04तुमने ठीक कहा, पुत्र जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार
- 19:20मिला। हमने तो जब कलियाँ मांगी कांटों
- 19:33का हाल मिला। जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार
- 19:49को प्यार मिला हमने मिला, जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को
- 20:19प्यार। मिला नहीं आज वो लोग खोए नहीं है
- 20:24तुम्हारे सामने मैं बैठा हूँ साक्षात मूर्त हमारे प्यार को
- 20:33वृहद प्यार मिला हमारे शुद्र प्यार को विराट का प्यार।
- 20:43हमारे शूद्र प्रेम को विशाल का प्रेम मिला हम शूद्र से व्रत अभी
- 20:54अभी गुम नहीं हुआ है बीज। कोई कोई दिया कहीं हजारों कोसो पर
- 21:02जल रहा है मुझे देख लो, क्योंकि आदमी सजा यहाँ रहता है।
- 21:19तुमने कितने प्यार भरे लोगों को विदा कर दिया?
- 21:22अपने हाथों से कृष्ण गए, राम गए, कबीर गए, नानक गए, बुध गए, फरित
- 21:32गए, मीरा गई, राबिया गई। ऐसे ही तुम मुझे भी विदा कर दोगे।
- 21:47कल आएगा ऐसा जब क्षमा तो जलेगी, लेकिन उससे जलती हुई क्षमा में।
- 21:57हाँ हूँ, तो होनेवाला परवाना हो जायेगा।
- 22:03आजु की रात मेरे दिल की सलामी ले ले दिल की सलामी।
- 22:17ले ले आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले, दिल की सलामी ले ले।
- 22:36कल तेरी बज़्म से दीवाना चला जाएगा कल तेरी बज़्म से दीवाना
- 22:51चला जाएगा। समर जाएगी, परवाना चला जाएगा, समर
- 23:06जाएगी, परवाना चला जाएगा। आज आज की रात मेरे दिल की सलाह ले
- 23:24ले दिल की सलामी ले ले, फिर कल को हम भी चले जाएंगे।
- 23:37किसे ढूंढोगे कहाँ ढूंढोगे अभी वक्त है अभी तुम छायाओं में
- 23:48परछाईयों में खोये हुए हो। जिंदा गुरु बैठा है तुम मूर्तियों
- 23:57की पूजा कर जिंदा गुरु मौजूद है तुम मूर्तियों की पंचभौतिक तत्वों
- 24:12की पूजा कर। और जब यह प्राण इस पंचभौतिक तत्व
- 24:21में से निकल गए तो तुम्हारी आँखें खुलेंगी, फिर तुम सोचोगे।
- 24:35कहाँ जाए ना कोई रास्ता दिखाई पड़ता ना कोई मंजिल समझ में आता
- 24:45अंधकार है चारों ओर घोंप का अंधेर है?
- 24:49अमावस्या की काली रात है। गाने मेघ काले चाय हुए कुछ सोचता
- 24:59नहीं, कुछ दिखता नहीं एक छोटा सा चिराग जल रहा था।
- 25:11काश तुम उसके चिराग की रौशनी तले थोड़ी देर बैठ लेते, शायद
- 25:20तुम्हारे भीतर वो चिंगारी लग जाती और याद रखना जो भाँपड़ बजते हैं।
- 25:29वो पहले चिंगारियों से ही रखते हैं, चिंगारियों से ही ज्वालाएं
- 25:36फैला करती हैं और सब कुछ अपने दायरे में रिपेट लिया करती हैं।
- 25:48तुम जरूर पूछोगे पुत्र कि अभी मुझे क्या करना चाहिए?
- 26:02मुझे पता है तुम्हारे पास ठीक मात्रा में धन है और शोहरत की
- 26:14सलमान की डिग्री की वकबुलरी की। सूचनाओं की कोई आवश्यकता भी नहीं
- 26:23है जो तुम्हारा असली मुकाम है। जिंदगी का मत लगो इन आचार्यों के
- 26:33पीछे जो कहते हैं कि तुम्हारा कोई मकसद नहीं है फिर तो जिंदगी।
- 26:41एक बिना लक्ष्य के उसी वक्त समाप्त हो जाती है जब ये आचार्य
- 26:50में समझाते हैं गीता का मतलब उपनिश्चित का मतलब।
- 27:01और काश ये अपना काम करता इन्होंने जो पढ़ा था वही बांट दे।
- 27:11100 हाथों से इकट्ठा किया 1000 हाथों से बांट देते ज्यादा शुभ
- 27:16था। लेकिन मन की ठगियों के वशीभोज
- 27:23होकर इन्होंने ख्याति प्राप्त करने की सोच डालरों की खनक के
- 27:35आगे। इनकी आत्मा दिख गई और पता नहीं कब
- 27:43ये कुर्सी को छोड़कर उस बड़ी कुर्सी पर आसीन हो गए जीसको
- 27:55इन्होंने समझा था। कि यहाँ सुख ज्यादा है, ध्यान
- 28:01रखना सुख बुशियों में नहीं होता, सुख महलों में भी नहीं होता, बड़ी
- 28:11कारों में भी नहीं होता, बड़े बंगलों में भी नहीं होता।
- 28:15सुख बड़े नाम वे में भी नहीं होता।
- 28:19सुख बहुत ज्यादा बिकबलरी और बहुत ज्यादा सूचनाओं को इकट्ठा करने
- 28:24में भी नहीं होता। सच पूछो तो वह तो एक भार है दिमाग
- 28:30पर नूरांज का भार। जिन्होंने जाना उन्होंने महसूस
- 28:39किया। यह सूचनाएं एक भार है।
- 28:45ये सूचनाएं एक भीड़ है तो शांत होने की क्रिया।
- 28:53करता है। रात को सोते वक्त यह सूचनाएं
- 28:56तुम्हें जगाती रहती हैं। तुम इन चैन से नींद नहीं आती, तुम
- 29:03रात को सो लेते हो और तुम ये समझते हो कि हमने नींद पूरी कर
- 29:11ली, तुम धोखे में हो। ध्यान रखना ये के ऊपर सूचनाओं का
- 29:19बोझ है। तुम्हें पता नहीं होता तुम्हें
- 29:25पता नहीं होता कि जितनी ज्यादा सूचनाएं हैं।
- 29:30और तुम्हारे नूरांध पर भार और सोता है वह तंत्र जिसके ऊपर ये
- 29:38सूचनाएं पहुंचे बोझ को ही लिए कोई उतनी रिलैक्सेशन से नहीं सो सकेगा
- 29:46जो निरबोज कबीर सो सकेगा। जो निर्भोज नानक सो सकेगा, उतना
- 29:53बोझ लिए लिए ये सर नहीं सो सकेगा, आचार्य नहीं सो सकेगा यह ख्याति
- 29:59प्राप्त या यह पद आसीन सीएम पीएम नहीं सो सकेगा।
- 30:05इसे पता ही नहीं सच्ची नींद का सुख क्या हो?
- 30:13जब कोई व्यक्ति उस मंत्र के वित्त प्रवेश करता है तो सूचनाओं की
- 30:19जूती बाहर उतार के आनी होती है। यह जूती।
- 30:27मंत्र में किसी काम की बाजार में काम पड़ती है।
- 30:35यह तुम्हें कांटो से बचाती है। सड़क पर पड़े हुए ठीक करो, उसे
- 30:42बचाती है, लेकिन मंत्र के भीतर। इनका कोई मतलब नहीं होता।
- 30:48इनकी कोई जरूरत भी नहीं होती। मंदिर में प्रवेश करते वक्त यह
- 30:55भूत यह छत पर यह सैंडल यह सब उतार के जाना पड़ता है।
- 31:05इसलिए जब तुम अपने भीतर के उस मंत्र में प्रवेश करोगे, इन
- 31:12सूचनाओं को ज्योति के स्थान पर उतार के आओगे, तभी तुम ठीक से
- 31:19भीतर प्रवेश कर पाओगे, अन्यथा तुम्हें रास्ते में वापस मरना
- 31:23पड़ेगा। बहुत से लोग मुझे कह देते हैं
- 31:28हमें नींद नहीं आती, वो सच बोलते हैं, बहुत से लोग हमें कह देते
- 31:34हैं, हमें ठीक आती है, लेकिन मैं देखता हूँ कि इनमें सोच नहीं भरी
- 31:39पड़ी। वो झूठ बोलते हैं।
- 31:42और बहुत से लोग कह देते हैं मज़े में सोते हैं, सुबह फ्रेश उठते
- 31:48हैं। वो बिलकुल ही खुद को ही गलती में
- 31:52रखते हैं क्योंकि यह सूचनाओं का बोझ निरांज के ऊपर भार है।
- 32:02और जीस तंत्र ने आराम करना होता है।
- 32:06यह सूचनाएं कहीं भागते नहीं। रात को आराम करते वक्त बाहर लिए
- 32:12लिए अगर सो जाओगे तो याद रखो वह भारत में रात को तंग तो करता ही
- 32:19रहेगा। और नींद में व्यवधान तो डालेगा
- 32:22ही। तुम्हें पता चले ना चले मैं
- 32:28तुम्हें कहता हूँ, अगर ऐसी ही पागलों जैसी हालत हो गई है तो बस
- 32:36अब एक ही काम बाकी है। फेंक दो सब कुछ तुम्हारे पास साधन
- 32:46है तुम मुझे छे वर्ष से सुन रहे हो अभी दो 3 दिन के बाद 3 मई को
- 32:55मेरा प्रथम प्रवचन आया। 2020 में छह वर्ष हो जाएंगे।
- 33:02निरंतर बोलते बोलते मुझे लंबे लंबे परोचन तुमने सुन लिए, जिनमें
- 33:13आनंद की महक तो थी। लेकिन आनंद नहीं होता इस शब्द को
- 33:20समझना फूल आती है सुगंधी बाहों से, लेकिन तुम फूल ही नहीं हो
- 33:31जाते। सुगंधी फूल से आती है तुम्हारी
- 33:36नशा फूटों के भीतर तुम्हारे रोए रोए को खुशहाल बना जाती है तुम
- 33:41नाचते हो, लेकिन मैं तुम्हें कहता हूँ इस सुगंधी से तर्प मत होना
- 33:50तुम फूल ही बन जाना जब तक। तब तक तुम अगर उससे पहले रुक गए
- 34:03तो हालात ऐसे ही होंगे। ना खुदा ही मिला ना वसा लेसन, ना
- 34:11इधर के रहे ना उधर के। क्योंकि जिसने अपने भीतर जाने का
- 34:19स्वाद एक बार चक लिया, उसे बाहर भी अच्छा नहीं लगता।
- 34:23दौड़ भाग और भीतर तुम पूरे पहुंचे तो तुम अधर में लटक जाओगे।
- 34:35जब बड़ी मुसीबत वाली स्थिति होगी तुमने मुझे बहुत सुन लिया और
- 34:45जिसने भी मुझे सुन लिया। मैं मुझे उस व्यक्ति को नेक मशवरा
- 34:58देना चाहता हूँ क्योंकि मैं। तो मैं भीतर से खुशहाल देखना
- 35:08चाहता हूँ। बाहर से मैं बाहर से तो कोई कितना
- 35:13भी खुशहाल हो जाए, वो खुशहाली एक साए की तरह होती है और साया 1
- 35:24दिन। विदा हो ही जाया करता है बाहर की
- 35:30खुशहाली तुम जोड़ोगे और लाखों बार तुमने सुना सभी संतोष से सुना सब
- 35:41यहाँ छोड़ के जाना होता है। यही तो तुम्हारा इम्तिहान है कि
- 35:47तुम परीक्षा में पास नहीं हो गए, परमात्मा ने तुम्हें संसार की
- 35:53पाठशाला में भेजा था, तुम उस पाठशाला के सभी कक्षाओं को
- 36:01उत्तीर्ण नहीं कर सके। वरन तुम अभी तक अन्नू उतेरण हो?
- 36:07कभी कहीं भटक गए, कभी कहीं भटक गए।
- 36:12मामला यह है कि तुम अधर में लटक गए।
- 36:21बहुत सुन लिया। लेकिन एक बात को ध्यान में रखना
- 36:29तुमने फूल की सुगंधगी सुनी, मैं तुम्हें कहता हूँ तुम फूल ही बन
- 36:36जाओ और जब तक तुम फूल नहीं बनोगे। तब तक तुम्हारा काम अधूरा है।
- 36:48मेरा तो काम पूरा हो गया। मैं तुमसे कहता हूँ ये सब लोग झूठ
- 37:00बोलते हैं और ये सब लोग विदा हो जाएंगे।
- 37:06और शायद मैं पहले विदा हो जाऊं, ये बाद में चले जाएंगे, लेकिन मैं
- 37:18भार मुक्त हो के जाऊंगा क्योंकि मैंने किसी को गुमराह नहीं किया।
- 37:24मैंने जो देखा जैसा देखा वैसे ही वर्णित कर दिया, लिख दिया, बोल
- 37:31दिया, समझा दिया, सुना दिया लेकिन ये लोग जो बोल रहे हैं वो चाहे
- 37:38कोई भी हो, ये अपने आप को धोखा दे रहे हैं।
- 37:44लेकिन तुम्हारा तो कोई कसूर न था खुद को कोई धोखा दे ले, यह उसकी
- 37:50स्वतंत्रता है, लेकिन तुम्हें क्यों धोखा धोखा दे?
- 37:54यह तो बेईमानी है, तुम अभागे हो। अगर तुम मेरे पास आकर भी इस
- 38:07ज़िन्दगी में अंतिम वक्त में हू एम आर ये जान न सके कि मैं हूँ
- 38:19कौन? यह तुम्हारी वध किस्म की होगी।
- 38:30अगर तुम अपने को जाने बिना मर गए तो फिर पता नहीं यह मौका आए आए ना
- 38:45आए। कौन सी स्नेस का सफर तुमने जहाँ
- 38:51छोड़ा हो वहाँ से, तो तुम नहीं गिरोगे, लेकिन बात वहाँ से
- 39:00परिपूर्ण होने तक की है। मैं तुम्हें अंतिम पायदान के उस
- 39:08रुख में पहुंचा देना चाहता हूँ जहाँ जाकर तुम्हारा दिया जल जाए,
- 39:17औरों को भी जागृत करें, मैं ये चाहता हूँ।
- 39:26अगर तुम इतना जल ही गए हो अब और मैं देख रहा हूँ तुम में बड़ा
- 39:32प्रवर्तन आया है, तुम मस्ती के आगोश में हो, बहुत से लोग मीठी
- 39:41ध्वनि आनंदनाथ की सुन रहे हैं। बहुतों ने प्रतिक्रिया करना बंद
- 39:47कर दिया है या कम कर दिया है। बहुतों ने ज्यादा जोड़ना बंद कर
- 39:55दिया है। बहुतों ने मूर्खताएं मूडताएं बंद
- 40:00कर दी। तुमने अपनी कान्शस्नस को निश्चित
- 40:08ही बढ़ाया है, तो मुझे ज्यादा आनंद आता है जब मैं तुम्हें इस
- 40:21हालात में देखता हूँ पुनः पुनः तुम मेरे पास आते।
- 40:28और मैं तुम में ज्यादा सुधार पाता हूँ मुझे तुम्हारा और ज्यादा सफेद
- 40:34आनंद झूमता हुआ दिखता है तो मुझे भी संतोष होता है काश।
- 40:46तुम भी इसी संतोष को ग्रहण करने के योग्य हो जाओ तुम भी अपने भीतर
- 40:53का दिया जला लो अभी बुझता हुआ चिराग है ये जब तक मेरा दीप जलता
- 41:03है। तब तक तुम्हें बड़ी आसानी है
- 41:10क्योंकि तुम ऐसे प्रश्न भी आएँगे। तुम्हारी ज़िन्दगी में कभी कभार
- 41:15आते जिसका हर एक जीवंत गुरु ही दे सकता है, शास्त्र नहीं दे सकता।
- 41:23और जीवंत को याद रखना कभी कभी मिलता है।
- 41:30प्रत्येक व्यक्ति जो जीवंत है वह अपनी गद्दी क्यों देके जाता है
- 41:36किसी को इसीलिए। कि मेरे पास जलते हुए दिए की कमी
- 41:45महसूस न हो किसी को, लेकिन आज ये प्रथाएँ बन गई हैं।
- 41:53आज यह एक सत्य तथ्यात्मक चीज़ रीती रिवाज बन के रह गई।
- 42:04बाबा लोग हजूर पैदा कर रहे हैं और पता ना बाबा को है, ना हजूर को है
- 42:14घोर करयुग कलुष्टा से भरा हुआ अमावस्या की काली रात में।
- 42:20काले मेघ ना बरसते हैं, ना गरजते हैं, बस अंधकार देते हैं, हाथ को
- 42:29हाथ सुझाई नहीं देता और तुम सिर मारते रहते हो, आनंद की सुगंध
- 42:37कहीं तुम्हें दिखाई नहीं। देखो कहीं अटक मत जाना, मैं
- 42:45तुम्हारी व्यथा को बखूबी समझ रहा हूँ क्योंकि इन्हीं व्यथा में
- 42:50मैंने ना जाने कितने वर्ष गुजारे हैं।
- 42:57मैं इन व्यथाओं से भली महती पर सब देखा।
- 43:03मैंने इन्हीं नयनों से देखा, मैंने भाई की अर्थी उठी।
- 43:15फिर दूसरे भाई की अर्थी उठी, फिर पिता की अर्थी उठी।
- 43:19फिर माता की अर्थी उठी। फिर अपने ही नौजवान पुत्र की
- 43:23अर्थी उठी। ये सब मुझे देखना और मैं तुम्हें
- 43:31भी कहता हूँ। जीस गली, कुछे में।
- 43:35तुम चल रहे हो उन गली। कुछों की।
- 43:40रेत मैं कब का फांक चुका हूँ। तुम मेरी बात को ध्यान से सुनो।
- 43:49छोड़ दो ये मोबाइल। जो तुम्हारे हाथ में है, इनसे
- 43:53तुम्हें कुछ रस मिलने वाला है, ये तुम्हें सिर्फ सूचनाएं देंगे।
- 44:00आज कौन जीता आज? कौन हरा हम तो ये कर सकते हैं
- 44:05क्यों? हमने अपना मकसद पूरा कर लिया?
- 44:12लेकिन तुम कहीं। ऐसा ना हो।
- 44:16कि हमारे आज के। चरित्र क्षेत्र को तुम अनुकरणीय
- 44:21बना लो। फिर तुम गलत हो जाओगे।
- 44:30हमारा वो वक्त जहाँ। हम पहुंचे थे उसके बाद हमने कैसे
- 44:35गुज़ारा वो वक्त? उसको याद करना आज भी हम भीतर।
- 44:42से बने। लेकिन अगर कोई हमें।
- 44:50प्रश्न कर दे की आप तो पहुँच गए। और हम तो भूखे बैठे हैं।
- 44:58तो? बात उनकी जायज़ है।
- 45:00बात कबीर की भी जायज़ है। लेकिन आपके लिए जायज़।
- 45:06नहीं। स्वर्ण सिंह तुम्हारे पास आज की
- 45:11घड़ी सब कुछ तुम छोड़ो, इस मोबाइल को छोड़ो ये।
- 45:24जो तुम्हारे घर में? एलईडी पड़ी।
- 45:28या ध्यान भटकाने के? तुम्हारे।
- 45:31जो भी कारण है घर में अखबार आता बंद कर दो बाहर।
- 45:36की सूचनाओं से। भीतर का वो दृश्य देखा नहीं जाता
- 45:41बाहर। की।
- 45:43सूचनाएं रोज़ हर पर बदल दो। लेकिन भीतर का वो।
- 45:48दर्शन? अपर्वतरिया कभी नहीं बदलता नॉन
- 45:53चेंज है वर्क वो शीतरह। वो कंपता भी नहीं।
- 45:59अकंप है वो कहीं आता जाता भी नहीं, वो ठहरा है और सदा ठहरा
- 46:07रहेगा। तुमने वहाँ जाना है ध्यान रखना,
- 46:15कभी टीचर भी पढ़ा था ऐसी। ही रातें काली की।
- 46:20थी लेकिन। जब वह उतीर्ण हो?
- 46:23गया। सभी परीक्षाओं में तो आज तुम्हें
- 46:26पढ़ाने चला है। तो फिर उसे खुद पढ़ने की आवश्यकता
- 46:29अब नहीं बची। तुम मेरे आज के।
- 46:34आचरण को मत देख लेना। भीतर जाने वालों मेरी इस बात को।
- 46:44सुनो। मैं अब दूसरे पहलू।
- 46:51पर आ गया। मैं उन लोगों की।
- 46:55दुविधा को दूर करने का प्रयास कर रहा हूँ जो।
- 46:59कहते हैं भूखे वजन। न होय गोपाल।
- 47:04ये लो अपनी कंट्रीमाला। नहीं बन पड़ेगा, लेकिन जिनके पास
- 47:13है। अपनी जीवन यापन।
- 47:17ठीक से कर सकते हैं। उनके लिए देरी करना।
- 47:22शुभ नहीं है। एक बात बता दूँ हजारों वर्षों में
- 47:31कोई एक व्यक्ति आता। है, जो जागृत होता है उसके बाद सब
- 47:40बहकावे होते हैं। उसके बाद।
- 47:46सब लूटपाट होती है। वो एक जला गया जो तुम्हें
- 47:55निर्लिवता से समझाता था। वह असली भाव चला।
- 48:02गया। वह असली माँ चली गई।
- 48:08महाराज गंगा सिंह की। माता मर गई थी।
- 48:16आस पास की स्त्रियाँ महाराज गंगा सिंह वह।
- 48:21बड़े कठोर दिल के आदमी थे। लेकिन।
- 48:25माता के प्रति बड़ा। स्नेह।
- 48:29राजाओं को कठोर होना। भी चाहिए, लेकिन उसका हृदय माता
- 48:34के समान कोमल भी होना चाहिए। मस्तिष्क उसका।
- 48:41राजा के समान कठोर ही होना चाहिए। यही राम ने दिखाया।
- 48:46सीता को बर्बाद देते वक्त लेकिन फैसला गलत था।
- 48:55तो आस पास की। स्त्रियां कहने लगीं राजा।
- 49:03तुम्हारी आँखों में। आंसू सोभा नहीं देता, हम हैं, हम
- 49:13तुम्हारी माता ही हैं राजा तुम चिंता मत करो।
- 49:21हम तुम्हें मासा प्रेम। देंगे।
- 49:24मासी करुणा बहायेंगे मासी वाट शल्य प्रेषित करेंगे तुम रहो मत।
- 49:39बहुत अनुने जीने। की।
- 49:44सारे शहर की। प्रौढ़ स्त्रियाँ आकर राजा को
- 49:49समझाने। राजा।
- 49:52तुम कैसे मत आओ तुम्हारा रोना शुभ नहीं?
- 50:01लगता हम बैठे हैं अभी हम तुम्हारी मात्र सुमान ही तुम्हें वात्र से
- 50:08प्रदान करेंगे। तो राजा गंगा सिंह ने।
- 50:18कहा। है मेरी माताओं तुमने ठीक वचन।
- 50:29बोला तुम मुझे मातृशमान वात शल्य प्रदान कर दोगी नहीं सुन दे।
- 50:42लेकिन मैं उसके लिए। रोता हूँ।
- 50:51जो मुझे गंगू कह। के बुलाती थी तुम?
- 50:56मुझे गंगू कह के नहीं बुला सकती माथे यही मेरी व्यर्थ का कारण।
- 51:06तुम मुझे फिर। भी राजाजी ही कहोगी क्योंकि तुम
- 51:10मेरी प्रजा हो। वह मेरी माँ थी।
- 51:17उसकी कोख ने मुझे। जन्म दिया था।
- 51:20माते। गंगू कहने वाली।
- 51:29विदा हो गई और मैं उस गंगू कहने वाली के लिए रोता हूँ, वात फिर
- 51:36तुमसे मिल जाएगा। इसमें तो मुझे ज़रा।
- 51:42भी शंका नहीं है। लेकिन गंगू मुझे कौन कहेगा?
- 51:55यही मैं तुमसे कहता। हूँ स्वर्ण सिंह।
- 52:03फिर तुम्हें ऐसे प्रेम। के बोल तो बोल देंगे लोग?
- 52:08लेकिन उस प्रेम में? ज्ञान की आभा नहीं होगी।
- 52:16उस प्रेम में विराट का दर्शन नहीं।
- 52:22तो मैं होगा क्योंकि। उन्हें स्वयं ही विराट।
- 52:26का दर्शन नहीं हुआ या। तो कोई ऐसा खोज।
- 52:30लेना। जो जीवंत शास्त्र।
- 52:34हो लेकिन जीवंत शास्त्र इमिटेट कर दिया करते हैं।
- 52:42ये ध्यान रखना होशियार जाने के रास्ता थग्यों का।
- 52:50यहाँ। ज़रा नजर सूखी।
- 52:52तो माल दोस्तों का निहित स्वार्थों के कारण भी लोग लाबा दे
- 52:57ओढ़ लेते हैं। मैं तुम्हें कहता हूँ।
- 53:01जीवत शस्त्र खोजना। अगर न मिले जो।
- 53:07कि नहीं मिला करता? 2500 साल के बाद एक जीवित शस्त्र
- 53:13आज आया है तुम्हारे। सन्मुख बैठा।
- 53:18बोलता है, फिर। न जाने कब।
- 53:23माँ प्रकृति जाएगी और वह। प्रकट होगा।
- 53:30तब तक तुम। एक आराम से अपने एकांत कमरे में
- 53:36बैठना जीसको तुम ढूंढने चले हो, याद रखना वो।
- 53:44तुम्हें तुम्हारे भीतर से। मिलेगा जब भी मिलेगा।
- 53:48बाहर से। कभी न किसी को मिला।
- 53:54कभी न किसी को। मिलेगा।
- 53:56बस ये बात मेरी सजा सुम्रण रखना। अगर तुम्हें कोई जीवंत।
- 54:05शस्त्र न मिले जो की मुश्किल। तुम एकांत कमरे में।
- 54:11बिना वक्त गंवाए अपने ही बेहतर उतरना शुरू हो जाना इस बाहर के
- 54:17परपंच को छोड़ देना। आज की ताजा खबर अब की ताजा खबर।
- 54:23ब्रेकिंग न्यूस सुनना बंद कर देना।
- 54:29फिर कोई मनोरंजन का। साधन नहीं।
- 54:34यह तपस्या बड़ी कठिन। है।
- 54:39और ध्यान रखो। सोना जब तप जाता है तो ही कुंदन
- 54:45बना करता है। तप और तपस्या का।
- 54:50साथ कभी मत छोड़ना सिंपल सादा भोजन करना।
- 54:58मिर्च के मसालों से ही। थोड़ा 150 कदम।
- 55:06चल लेना। बाहर की लाशानी तरंगें।
- 55:12ज्यादा मत पीना और फिर। अपने बंद कमरे।
- 55:16में एकांत कमरे में आराम से बैठ जाना।
- 55:20वह तुम्हें तुम्हारे भीतर से ही मिलेगा।
- 55:28जब भी मिला है। जीसको भी मिला है।
- 55:33एक ही तरीका है। और वो तरीका है अपने भीतर उतर के
- 55:37मिला है, किसी ने नहीं उसे मिलवाया।
- 55:42कोई माध्यम तो बन सका है, लेकिन कोई।
- 55:46संग नहीं गया। है।
- 55:49मेरे जाने के बाद या मेरे रहते हुए।
- 55:55भी तुम्हें अगर मिलेगा तो मिलेगा तो मैं तुम्हारे भीतर से फिर मैं
- 56:01रहूं या न रहूं। तुम्हें तुम्हारे भीतर से मिलेगा।
- 56:08तो छोड़ दो ये सब। फेंक दो इन मोबाइलों को।
- 56:16ये तुम्हारे लिए विषय। समान जैसा।
- 56:19विष पी लिया। वैसे एक एक।
- 56:22एक एक क्षण तुम अपना विश्व पीकर गुजार रहे हो?
- 56:30मुश्किल तो। लगेगा।
- 56:35लेकिन जो तुम पानी चले हो उसके लिए कुछ भी खोना कम है।
- 56:44जो पानी चले हो? वृहद विराट विशाल उसके लिए कुछ भी
- 56:49दांव पे लगा देना कम है। याद रखना नास्तिकों की बातों में।
- 57:00आ मत जाना। जी।
- 57:03तुम्हें उलझा के ऐसा मारेंगे खुद। तो डूबे हैं सनम।
- 57:11आपको भी ले डूबेंगे। लोग तुम्हें तर्कों से।
- 57:17समझाने की चेष्टा करेंगे। उस आनंद को?
- 57:22जो तर्कों में कभी आता है तर्क। बुद्धि की देन है।
- 57:28और बुद्धि गागर सी छोटी है और जिसकी तलाश है तुम्हें, वह महा
- 57:33विराट है वह इतना। विराट है कि।
- 57:37उसका कोई और है। तुम्हे मैंने समझाया था लोग
- 57:42कहेंगे ये अपने आप बन गया, लोग तुम्हें कहेंगे?
- 57:48अगर इसको किसी ने। बनाया तो उसको किसने बनाया?
- 57:52लेकिन ध्यान रखना इसका कोई जवाब नहीं है।
- 57:55यह तर्क का आखिर में अनुभव पे आके खत्म होता है।
- 58:01तुम्हे लोग। पूछेंगे?
- 58:18क्या बात हुई ये दुनिया वाले पूछें लगा हुई क्या बात हुई?
- 58:37ये बात किसी से ना कहे ना ये दुनिया वाले पूछेंगे।
- 58:52लोग पूछेंगे? फिर अगर यह सृष्टि परमात्मा ने
- 58:57बनाई तो परमात्मा को किसने बनाया? तुम चुप कर जाना।
- 59:05अगर यह सारा कुछ। मंगल ग्रह की तरह पड़ा होता।
- 59:10चंद ही चाँद की। सतह की तरह उबड़ पड़ा होता।
- 59:14तो शायद तुम समझ लेते की यह खुद बन गई।
- 59:19लेकिन आज। हर चीज़ सजी हुई है यह रोशन यह
- 59:26पंखा यह एयर। कंडीशन?
- 59:30यह मैं बोल रहा मोबाइल। यह सारा इंटरनेट सिस्टम यह खबर
- 59:36देता है कि मैनेज किसी ने किया है।
- 59:42और वह मैनेज। किसको किया है वो किया है।
- 59:46प्रकृति को प्रकृति का मैनेजर है। और यही कबीर कहते हैं, तुम कहते
- 59:55कागज की लेखी तुम मैं ये ऐसी ही बातें करते हो जो खोपड़ी में आती
- 1:00:02है और मैं कहता, लेकिन मैं तुम्हें आश्वस्त करता हूँ।
- 1:00:10के उनकी बातों में ओरिजन मैं स्टेम्प लगा के जाता हूँ कि वह है
- 1:00:16मैंने देखा खरबों अरबों नास्तकों पर एक व्यक्ति इस अंधकार के भीतर
- 1:00:27जुगनों की तरह चमक बिखेरा। उस पर तुम्हें।
- 1:00:31यकीन करना। होगा।
- 1:00:32यह जुगनों की छोटी सी रोशनाई 1 दिन वृहद सूरज की रोशनाई में
- 1:00:41तब्दील हो जाएगी। तुम पाओगे।
- 1:00:46कि वह है। और जब तक तुम खुद ना देखो कि वह
- 1:00:50है तब तक शास्त्रों के कहने से, यहाँ तक कि मेरे कहने से भी।
- 1:00:58विश्वास न करना। चलना जरूर चलने।
- 1:01:03से भी रुक। मत जाना।
- 1:01:06और। उन लोगों का विश्वास।
- 1:01:07करके भी मत रुक जाना। बस मेरे ये शब्द में जलने में
- 1:01:13सहायक बने क्योंकि वह। इतना रसीला।
- 1:01:17है कि उसके स्वास्थ्य का वर्णन नहीं किया जा सकता।
- 1:01:22इंद्रियों से अतीत है वो। इन्त्रिया तीर्थ है, वो इन्त्रियो
- 1:01:27से वर्णन नहीं हो सकता, वो शब्दों से पार है।
- 1:01:30वो शब्दों में कहा नहीं जा सकता वो इसलिए मेरी सिर्फ इस बातों को
- 1:01:37आश्वस्त हो जाना कि वह है और मैंने देखा है।
- 1:01:46तुम एक कमरे। में बैठ जाओ।
- 1:01:50क्रियाएं करो, तुम देखो। तुम्हारे भीतर मस्ती आनी शुरू हो
- 1:01:54जाती। तुम ज़िन्दगी की आफतों।
- 1:01:59को आसानी से झेलना शुरू कर दोगे। ऐसा नहीं कि आप से नहीं आए।
- 1:02:07लेकिन आफतों को आसानी से झेलना शुरू कर सकोगे तुम यह कीमती बात।
- 1:02:15रोक तुम आएँगे। लेकिन।
- 1:02:17बात ये है कि। तुम्हारी इम्युनिटी बढ़ जाएगी,
- 1:02:20सहिंसाक्ति बढ़ जाएगी तुमने सहिंसाक्ति को बढ़ाना है।
- 1:02:25रुक नहीं जाना है तो। पुत्र, तुम बैठ जाओ।
- 1:02:34नथ्थिंग टु डू सुबह क्रिया योग करो, आराम से अपने छत पे चले जाओ
- 1:02:43बाग बगीचे में निकलो, तुम्हारे घर के पास है।
- 1:02:50ऊंचे ऊंचे सांस लो जब थक जाओ। तो आकर बैठ जाओ, नींद।
- 1:02:58आए तो सो जाओ। उठो से नाम ध्यान कर दो, नाश्ता
- 1:03:03कर लो। फिर फिर न कुछ करने।
- 1:03:07में बैठ जाओ, तुम्हारे पास साधन है, मैं जानता हूँ।
- 1:03:16और आज और। कल और परसों और नर्सों और धीरे
- 1:03:22धीरे तुम अपने ही अंत में उतरने शुरू हो जाओगे।
- 1:03:27और वह तुम्हारे अंत में ही विराजमान है जीसको तुम ढूंढ रहे
- 1:03:32हो जन्मो। जन्मो से।
- 1:03:40भटक मत जाना, भूल मत जाना। इसलिए।
- 1:03:48संतों ने कहा। है रिमेम्बर।
- 1:03:51भूल मत जाना, याद रखना, बार बार याद रखना, तुम ऐसे याद मत रखना
- 1:03:59जैसे ये आज के संत कह रहे हैं, ऐसे याद करने का कोई फायदा नहीं।
- 1:04:06तुम वहाँ जाकर। उसे देखना नग्न।
- 1:04:11आँखों से अपने ही अनुभव से वहीं चले जाना जहाँ वो विराजमान है
- 1:04:18उसमें स्थित हो जाना जो तुम्हारी प्रज्ञा।
- 1:04:26है। सर व्यापी।
- 1:04:29सदा अलेफा सबके भीतर व्याप्त है, वो और अलेप है, निर्लेप है।
- 1:04:41तोहे। संघ
- 1:04:55काहे? रे।
- 1:05:01वन को। जनजा।
- 1:05:06बन खोजो पदार्थ। में खोजो, मान सम्मान में खोजो,
- 1:05:10गदिये में खोजो पुत्र पोतरादि में खोजो, बरसनो में खोजो, दौड़ धूप
- 1:05:17में खोजो है नहीं वहाँ मिलेगा भी। घट घट में व्याप्त वह ओमनी
- 1:05:29प्रेसेंट सर्व व्यापी मुझे भी मत सुनो, मुझे भी सुनोगे।
- 1:05:41तो तुम्हें सुनने की लत लग जाए। अब तुम्हें मैंने सब बोल दिया।
- 1:05:46छः वर्ष में मैंने कोई कमी नहीं छोड़ी।
- 1:05:49परिपूर्ण हृदय से बोला परिपूर्ण प्राण मैंने झोंक दिए अब कुछ वाकि
- 1:05:55न रहा। इसलिए तुम सब छोड़।
- 1:06:00दो यहाँ। तक कि मुझे भी।
- 1:06:04छोड़ दो। और तुम बिलकुल मुक्त हो।
- 1:06:08जाओ। क्योंकि वह मिलेगा तुम्हें।
- 1:06:12तुम्हारे भीतर से। यहाँ।
- 1:06:17आने की जरूरत। तब तक थी जब तक तुम भूल भूल जाते
- 1:06:22थे तो मेरे पास। आकर तुम्हें।
- 1:06:25पुनह स्मरण हो जाता था कि हाँ, वो है, लेकिन अब तुम्हें स्मरण है,
- 1:06:33मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। अब तुम अपने भीतर।
- 1:06:38बैठ जाओ कुछ ना करो अपने रोज़मर्रा के काम और।
- 1:06:48फिर उसके बाद न। कुछ करने में निकल जाओ, 1 दिन
- 1:06:52आएगा जो तुम्हें निहाल कर जायेगा। जो?
- 1:06:57तुम्हें विराट कर जाएगा जो तुम्हें उस आनंद।
- 1:07:03से भर जाएगा वह सागर। तुम पे।
- 1:07:07बरसेगा और तुम्हारी बूंद को सागर के भीतर।
- 1:07:14अंतर निहित कर देगा मर्ज कर। देगा धन्यवाद।