Latest / Baba ji Vijay Vats / 27 Jan 26 - रहीम के दोहे का सच: बड़ा बड़ाई ना करे | सत्य: परम ज्ञान का पहला लक्षण | विवेक और संशय आत्मा
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- 0:16प्रणाम गुरुदेव गोविन्द शास्त्रीय रहीम का एक सर्द बाबा बड़ा बड़ाई
- 0:39ना करे। बड़ा न बोले बोल रहिमन हीरा कब
- 0:50कहें, लाख टका है मोल? और आप कहते हैं, और सभी संत कहते
- 1:10हैं, तुम जैसे हो वैसे ही प्रकट रूप में हो जाओ।
- 1:26क्योंकि जिसे तुम छुपाना चाहते हो, वह तो हर हर में तुम्हे देख
- 1:35ही लेता है। गोविन्द शास्त्री इस दुविधा को
- 1:44दूर करने का। कष्ट करें मैं त्रस्त हूँ।
- 2:01संतों के शब्दों को व्यख्यायित करके, मोरू मतियों ने।
- 2:17जितना नुकसान इस सृष्टि को पहुंचाया, उतना सच में मूड लोग ने
- 2:25नहीं पहुंचाया। गोविंद शास्त्री तुम कहते हो
- 2:38पुत्र मैं बड़ी पे बता बड़ा बड़ाई ना करें।
- 2:46बड़ा ने बोले बोल रही मन हीरा कब कहें?
- 2:53लाख टका है मोर गोविंद शास्त्री तुम बड़े हतआहत हो, मैं तुम्हारी
- 3:11व्यथाओं को समझ सकती हूँ। ये भूल विकास, दिव्य कीर्ति जैसे
- 3:22मूल व्यक्ति जब आध्यात्मिक वचनों को व्याख्यायित करने में लग जाते
- 3:36हैं। तब ये घृणित व्याख्यान ही पैदा
- 3:43होते हैं जो मानवता को कष्ट में दिखाई देते हैं।
- 3:53आचार्य प्रशांत हैं विकास। जब कोई भी बड़े से बड़े सिर भ्रम
- 4:05हो जाता है, इन लोगों को विद्यार्थी धनी हैं और ये कोचिंग
- 4:14आई एस की दे रहे हैं। तो कोचिंग देते देते इनके भीतर का
- 4:23अहंकार करता है। आई कैन एक्सप्लैन गॉड ऑल्सो।
- 4:31मैं परमात्मा को भी व्याख्या कर सकता हूँ, बस यहीं आपकी चूक हो
- 4:37जाती है। पर अज्ञानी तो अज्ञानी है वह
- 4:49विचारक क्या करे गोविंद शास्त्री तुम ठीक करते हो आइए मैं थोड़ा सा
- 5:02अपनी पोज़ीशन ले लू। और तुम भी थोड़ा ठहर जाओ सुनने के
- 5:10लिए ठहराव आवश्यक है, बड़े बुराइ ना करे, बड़े न बोले बोल।
- 5:26तो फिर बड़े क्या करें, चुप हो जाएं कृष्ण जब अस्तित्व का वो तल
- 5:37छूआ, जो अपरकार्थक है, जो असीम है।
- 5:47जहाँ तक विस्तृत नहीं हुआ जा सकता क्या चुप रह जा?
- 5:59यह तो बड़ा विशाल है, बड़े बड़ाई ना करे।
- 6:05फिर कृष्ण का करें। कृष्ण तो विस्तृत होने की
- 6:15पराकाष्ठा को छू लिए हैं, फिर क्या उन्हें ये नहीं बोलना चाहिए?
- 6:23अहम तुरंत? सर्वो पाप्य भवमुख स्वामी माँ
- 6:27सुचर चुप रह जाना चाहिए। मोड़ के मुखर होने से जितना
- 6:43नुकसान इस सृजना को पहुंचता है। समझदार के चुप रह जाने से उससे
- 6:53ज्यादा नुकसान इस संरजना को पहुंचता है और मैंने इनको बहुत
- 7:02वार कहा है कि कृपया आप बच्चों को।
- 7:09जो तालीम दे सकते हो वहीं तक मैं हो तो शुभ है अन्यथा अशुभ है।
- 7:23लेकिन कहाँ रुके अचार प्रश्न कहाँ रुके?
- 7:26विकास, दिव्यकृति अजामिल की कथाएं कहनी शुरू कर दी।
- 7:35अगर तुम सही अर्थ नहीं जानते और सही अर्थ कहाँ पैदा होता है जहाँ
- 7:44से ये शब्द बोलेंगे। उस आखिरी तलहटी पर जाकर यह शब्द
- 7:54उच्चारित किए रहने में और ये बुद्धिवादी लोग बुद्धि से
- 8:04व्याख्यात करने में जुट गए। फासला घटेगा गैस?
- 8:12गोविन्द शास्त्रीय तुम्हारा दुखी होना स्वाभाविक है, लेकिन इसमें
- 8:22रहीम का कोई सुर नहीं। रहीम ने ठीक बोला।
- 8:29अर्थ करने वाले चूक गए। क्यों चूक गए?
- 8:35जहाँ से व्यख्यायित नहीं हो सकता। यह शब्द वहाँ से व्यख्यायित करने
- 8:41की चूक कर बैठे। मेरे समझाने के बावजूद आज भी।
- 8:48आचार्य प्रशांत गीता के ऊपर भाषण कर रहे है।
- 8:58रोज़ की संख्या बढ़ जाती है। आज 3,00,000 हो गया, आज 4,00,000
- 9:03हो गया, आज 20,00,000 हो गया, आज सारी धरती हो गई।
- 9:14बड़े बड़ाई न करें। बड़े न बोले बोल तो क्या चुप हो
- 9:22जाए? नहीं नहीं चुप नहीं हो कृष्ण
- 9:27बोलते हैं, फिर क्या इन अर्थों को?
- 9:34समझने में गलती हो गयी। हाँ, शब्दों को समझने में गलती हो
- 9:40गयी। शब्दों को व्यख्यायित करने में
- 9:47कहीं बड़ी चूक हो गयी और इस बड़ी चूक ने बड़ी गलती की और इस बड़ी
- 9:55गलती ने धरती को नर्क बना दिया। इसलिए मैं कहता हूँ बड़े व्यक्ति
- 10:04जिनके प्रभाव के क्षेत्र में लाखों, लाखों, करोड़ों करोड़ों
- 10:09लोग आते हैं। उन्हें बड़ा संयम से कुछ कहना
- 10:13चाहिए। लीजिए हम इसके सही अर्थ पे आ जाते
- 10:26हैं तुम्हारी दुविधा में जल्दी ही दूर कर देता हूँ पुत्र तुम जैसे
- 10:37हो। उससे तिल भर भी इधर या उधर अपने
- 10:49आपको दिखाने की चेष्ठ न करो। कंप्लीटली वॉटेवर यू आर।
- 11:01बी इन दट सिचुएशन ओनली रिमेन इन दट सिचुएशन ओनली जो भी तुम खुश
- 11:12हो, अपनी घोंद अपने अस्तित्व से घरा इलर नहीं।
- 11:21और ज़रा उतरने अब तुलसी सत्य बोलते हैं लेकिन आपने तुलसी को भी
- 11:31गलत समझ लिया। तुलसी को व्याख्यात गलत किया गया
- 11:38था जबकि वह बड़ा सत्यवादी व्यक्ति था।
- 11:45बड़े बड़ाई न करें, बड़े न बोलें बोल तुम जैसे हो उससे ज्यादा बड़ा
- 11:53वक्त मत खो इट मीन्स बी ऑथेंटिक एवर।
- 12:03हर वक्त प्रामाणिक बने रहो अपने आप को कमतर भी मत दिखाओ अपने आप
- 12:15को वह तरभी मत दिखाओ अपने आप को। अस्तित्व गत स्वरूप में ही रहने
- 12:27दो। जैसे हो वैसे ही देख लेगा।
- 12:31कोई बड़े बड़ाई ना करे। बड़े ना बोले और।
- 12:49बड़े बोल नहीं बोलते, जीतने हैं उससे बड़े समझ लीजियेगा यहाँ चूक
- 12:58हो गई, ₹1 है मेरे पास और मैं कहूँ कि ये ₹100 है।
- 13:13यह ₹1 को बड़े करने की साजिश है। जेह झूट रहीम कहते हैं सत्य में
- 13:28निष्ठा बनाए रखो सत्य में। अरुण रहो, सत्यनिष्ठ रहो, इधर उधर
- 13:44मत हो, ना गटो ना भड़ो एक कृपया। ये तो आधार पे है ये भी मत कहो और
- 13:53एक कृपया ये ₹2 है या ₹100 है, ये भी मत कहो, बड़े बड़ाई न करें,
- 14:06बड़े न बोलें, बोर रही मन हीरा कल करें।
- 14:12लाखट का है कर गया ना रहीम कहते हैं हीरा कब कहता है कि मेरा मोल
- 14:31लाखट का है? और तुम उलझ जाते हो शब्दों में
- 14:41मैंने 1000 बार में कहा, पुत्र शब्दों में मत उलझा करो, ये
- 14:47शब्दों के अर्थों से तुम्हें उलझा लेंगे।
- 14:50ये कमीने लोग है, व्यापारी लोग है, रहीमन हीरा का का है, लोग टका
- 15:03है, रहीम कहते हैं कि हीरा अपना मूल्य तो नहीं बताता?
- 15:11लेकिन रहीम ने ये कब कहा कि हीरा ये नहीं कहता कि मैं हीरा नहीं
- 15:25हूँ। हीरा अपनी होत को अपनी
- 15:27एक्सिस्टेंस को यथास्वरूप 100% प्रमाणिक रूप से दिखाता रहता है
- 15:33कि मैं हीरा। कह ही रहा
- 15:53यह यह तो नहीं कहता की मेरा मोल लाख टका है, क्यों नहीं कहता?
- 16:06क्योंकि इसके पास कहने का साधन नहीं है।
- 16:11प्रकृति करने के वाद्य यंत्र नहीं है अन्यथा ये बोल पड़ता हीरा इतना
- 16:20सत्यवादी है। सत्यनिष्ठ है कि हीरा ज़रा भी चुप
- 16:26न करता। जब प्रमाणिकता को दिखा रहा है कि
- 16:31मैं ही रहा हूँ तो कहने में कब आई लेकिन इन लोगों ने धरती को झूठ
- 16:42सीखाकर। इसलिए मैं कहता हूँ कि सांसारिक
- 16:53व्यक्ति संसार की व्याख्या को छोड़कर अध्यात्म की व्याख्या में
- 16:59मत निकले। तुम नर्क बना दोगे सर।
- 17:03और आज जो धरती इतनी नर्क है, डिस्कशन के आदान वरदान में उलझी
- 17:13हुई है, उसका कारण मात्र तुम्हीं जैसे लोग हो जो अतीत में हो चूके
- 17:20हैं। रहीम ने ये शब्द बिल्कुल सत्य
- 17:28बोला हेरा है लाख टका है मोर आज लाख टका मोर है।
- 17:40किसी वक्त सोना मैंने 100 अट्ठाइस रुपए में खरीदा था।
- 17:452,00,000 10,00,000 मेरे भाई की शादी थी, मेरे पिताजी मुझे ले गए
- 17:50थे साथ कल को अगर सोना ₹3,00,000 हो जाए।
- 18:00क्या सोने को बोलना चाहिए था? तो मेरा भाव 100 अट्ठाइस रुपए, 10
- 18:04ग्राम और क्या सोना चहाते हुए भी बोल पायेगा कि मेरा मोल 100
- 18:17अट्ठाइस रुपए प्रति 10 ग्राम। क्या आपकी जड़ जमीन बोल पाती है
- 18:26कि मेरा भाव यह है? करोड़ रुपए स्क्वेयर फिट है या
- 18:34₹1000 स्क्वेयर फिट है कोई जमीन बोलती?
- 18:38क्यों नहीं बोलती, क्यों की उसके पास बोलने का वाक्यंत्रण जी वाय
- 18:48कांड सारा सिस्टम है बड़े पढ़ाई। जो हो प्रमाणिकता से वैसा ही
- 19:05बोलो, समझाने की चेष्टा तुमने और ही गोलगप्पा बना दिया।
- 19:20बड़े बड़ाई ना करें। बड़े ना बोले को जीतने हो उससे
- 19:26ऊंचे बोल न बोल अरे हम मन ही। रहीम कहते है की हीरा कब कैसा है
- 19:38मेरा लाख टका कल को 20,00,000 भी हो जायेगा और कल को 20,000 भी रह
- 19:43जायेगा और कल को 2% भी रह जायेगा। लेकिन हीरा ये तो नहीं कहते कि
- 20:01मैं हीरा नहीं हूँ और अगर किसी दिन हीरा बोलने लग जाये, ईश्वर न
- 20:09कर रहा है। तो समझ लेना अब वो हीरा रहा है,
- 20:17कुछ गड़बड़ को डालो अरे मन हीरा कब कहें, लाख टका है मोला हर चीज़
- 20:41को तुम झूठ में डाल लेते हो। जैसे की अपने आप को नीचा दिखाना
- 20:51एक क्वालिफिकेशन है, ऐसा है क्या अपने आप को नीचा दिखाना।
- 21:02जब मौन रहजान इस ऐट ए कॉलिफिकेशन क्या यह भी कोई विशेषता है क्या
- 21:19झूठ? बोलना भी कोई विशेषता है।
- 21:24रहे। मन गिरा कब का है, लाख टका है।
- 21:37बड़े पढ़ाई न करें, बड़े न बोले कुल मिलाकर गोविंद शास्त्री मैं
- 21:50अबरस रूप में आ जाता हूँ। बी ऑथेंटिक प्रमाणिक बने रहो।
- 22:00न कम, न ज्यादा हीरे की तरह हीरा दिखता तो है, हीरा है हीरा अगर ये
- 22:10नहीं कहता कि लाख तक का मेरा मोर है तो हीरा ये भी नहीं कहता कि दो
- 22:15कुड़ी मेरा मोर है। संतों के वचनों को गलत ढंग से
- 22:27व्यख्यायित करना, ऐसे लोगों के द्वारा इनके पीछे अपार जनसमूह था।
- 22:37धरती को नर्क बना के। राम सत्यवती और जो भी व्यक्ति उस
- 22:53तल पर पहुंचेगा उसका पहला लक्षण होगा सत्य।
- 23:07तुम इस शब्द को अपनी क्षति पे लिख लो, हृदय में संजोलो फूलों की
- 23:13तरह। जो भी व्यक्ति उस तल पर पहुँचता
- 23:28है जिसकी बात कृष्ण करती है, सभी संत करता है।
- 23:33उसके कुछ लक्षण प्रकट रूप में आए हैं, उसका पहला लक्षण है।
- 23:43वह सत्य बोलेंगे। सत्य का अर्थ सच नहीं, सच तो कल
- 23:52झूठ हो जाएगा आज हीरे का मूल लाख टका है, कल उसका मूल 20,00,000%।
- 24:05सच का मतलब शक्ति नहीं, अगर हीरा कुछ भी अपना मूल्य बताएगा,
- 24:18तुम्हारी जैसा मूढ़ नहीं है विकास तीव्र करती हीरा।
- 24:24अगर तुम्हारे जैसा मूड होता तो जरूर होता मेरा भाव लाग टका तुम
- 24:35मूड हो आध्यात्मिक तल पर जागड़। संसारिक अतल पर आकर तुम
- 24:43महाविध्यान हो, जिसका काम उसी को सच और करे तो थेंगा कच्छ।
- 25:03कितिवार का छोड़ रहा है अब पिट की राह रहीम कहते हैं बी ऑथेंटिक।
- 25:20प्रमाणिक बने रहो हर जो भी हो, कहते नगन हो जाओ नगनता में
- 25:34प्रमाणिक बात है उगाड़ो। छुपाओ माँ ऍम उगाड़ने में प्रमाण
- 25:47एकता है तुम छुपाने में यकीन रखते हो ये छुपाने की आदत?
- 26:03तो मैं झूठा कर गयी। इसलिए संसार आज मूड के कारण इतना
- 26:17विकृत नहीं है जितना संतों के कारण विकृत है।
- 26:26जितना समझदारों के कारण भी करते हैं।
- 26:29क्यों? मूड तो बेचारा चुप है?
- 26:32मूड कहता मैं तू जानता ही नहीं और आप उसको भी बड़े मज़े की बात है,
- 26:41आप उसको भी पात्र बना लेते हो। उत्कृष्टता का पात्र बना लेते हो।
- 26:54अगर मूड कहे की मैं मूड हूँ तो आप उसको भी सम्मान देना शुरू कर देते
- 27:00हो तो सीधा वो रहेगा। उस दृष्टि से जीस दृष्टि से
- 27:17ज्ञानी है मलोकदास ज्ञानी है रहीं ज्ञानी है कवि उस दृष्टि से
- 27:26तुलसीदास मूड है। और देखिए अगर मूड अपने आप को मूड
- 27:34कहे, यह उसकी बड़ाई है। सत्यवादी बड़ाई की है।
- 27:45तुम क्या कहते हो, झूठ वादी? बड़ाई के योग्य होता है।
- 27:51तुम कहते हो आप कैसा रामचरित मान से लिखा?
- 27:58अक्षरों का तालमेल अक्षरों का भार चौभाई दोहा ऐसी शानदार का व्याप्त
- 28:12रचना किसी ने कही ही नहीं और फिर वो कहते हैं सत्य विवेक एक नहीं
- 28:19मोरू माया वसन विश्व और ब्रह्मजौरा अहंकार मम अति।
- 28:28मम मति अति थोरी महोबा। सुमन ना ना विधि डोरी, सत्य विवेक
- 28:43एक नहीं मोरे ये शब्द। ये शब्द उनके लिए तुम सम्मान जुटा
- 28:56लेते हो, जबकि वह वास्तव में सत्य बोल रहे हैं।
- 29:04मतमंद तुलसीदास मेरी मति। मंथ है भाई, आप सत्य को सत्य की
- 29:17तरह क्यों नहीं लेता? खुद बेईमान हो तुम और खुद बेईमान
- 29:27हो इसीलिए जैसा चश्मा आँख पे लगा है।
- 29:30यथादृष्टि तथा सृष्ट तुम्हें दुनिया भी वैसी ही रंगीन नजर आती
- 29:37है। पीला चश्म है तो पीली दुनिया लाल
- 29:40है तो ला काला चश्म है तो काली भी नहीं ऋषिदास कहती।
- 29:49मतमंद तुलसीदास हूँ, मैं मतमंद हूँ और तुम इसको एक सम्मान का
- 30:07कारण बना लेते हो? तो फिर तुम मती मंद ही तो होगे ना
- 30:13जीसको तुम पूजते हो वैसे ही तो तुम हो जाते हो।
- 30:17पूजने का अर्थ क्या है? कृष्ण की पूजा का एक अर्थ था के
- 30:24तुमने कृष्ण को आइकॉन बना लिया। तुम कृष्ण जैसा होना चाहती हो?
- 30:32और पूजते पूजते, पूजते, पूजते उनके गुणतत्त्व व आपके हृदय में
- 30:38प्रवेश कर जाते हैं और एक तुम 1 दिन तुम वैसे ही हो जाते हो जैसे
- 30:46क्वेस्शन्स। स्वरूप से नहीं, भावना से विचार
- 31:04से स्वरूप से कृष्ण को पूजने से कोई कृष्ण नहीं।
- 31:13इस भ्रांति में पूजा मत करना कि हम कृष्ण हो जाएंगे।
- 31:21कृष्ण जैसी सहनशीलता आ जाएगी, कृष्ण जैसा साहस आ जाएगा।
- 31:29विपरीत परिस्थितियों में डगमगाने का।
- 31:37कारण तुम खो दोगे डगमगाओगे तुम साहस और धीरज तुम्हारे भीतर आ
- 31:45जाएगा। राम जैसा अगर तुम राम को पूछते हो
- 31:48तो? और तुलसी को पूछो क्या तो मति मंद
- 31:55तुलसी दास मंद बुद्धि हो जाओ। इन्होंने कुछ भी तो गलत नहीं कहा।
- 32:06अगर पतंजलि अपने अष्ट्रांग योग के।
- 32:13प्रथम अंग यम, नियम्, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा,
- 32:18ध्यान, समाधि पहले अंग के यम के अंदर पहला शब्द बोलते हैं।
- 32:25सत्य यहाँ से शुरू करते हैं जब तुम अपने।
- 32:30आंत्रिक उस तल पर पहुंचते हो जिसकी व्याख्या करते हैं।
- 32:34संत तो सबसे पहले लक्षण जो पर्यटन होगा वो होगा सत्य।
- 32:42अब तुम सत्य ही होंगे और सत्य हो के।
- 32:47इसका लक्षण ये है कि तुम झूठ नहीं बोलोगे।
- 32:53बड़े मज़े की बात है तुम तो छूटों को माने कर देते हो?
- 33:03तुम कितने जब कितना बड़ा व्यक्ति है जो अपने आप को कहते है कि मेरे
- 33:09में कोई गुण ही नहीं है। अरे भाई, तू ठीक कहता है के मैं
- 33:13मैं अवगुण से युक्त हूँ, तुम उलटे क्यों मांगते हो?
- 33:20क्योंकि तुम उल्ट हो, तुम्हारी खोपड़ी उल्टी जसतन, जय धरती सत्य
- 33:27को सत्य की तरह स्वीकृत करना शुरू कर दिया।
- 33:31उस दिन यह धरती न्यायप्रिय और सत्य में शक्ति हो जाएगी।
- 33:40उस दिन यह धरती प्रमाणिक रूप से सत्य हो जाएगी जिससे तुमने शब्दों
- 33:46को। ऊंट भटांग रूप से व्याख्याय करना
- 33:50शुरू कर दिया, तब तक ये धरती मूड बनी रह गई।
- 33:58अब देखए तुलसीदास कहते हैं, मेरे भीतर कोई सत्य का विवेक नहीं है।
- 34:05कितनी प्यारी बात है। जाने के मैं उस सतल पर नहीं
- 34:10पहुंचा। जीस सतल पर जाकर सत्य का
- 34:13प्रगटीकरण होता है जिससे पातींजलि ने कहा सत्य जिससे महावीर ने कहा
- 34:19सत्य जिससे बुद्ध ने कहा सत्य। कहते ना सत्य, हिंसा, सत्य,
- 34:27ब्रह्मचर्य, ग्रह ये पांच अंग नहीं होते तो तुलसी सही कहते हैं,
- 34:35उसे जमाने के तुलसी हैं ये आज के नहीं, ये 2025 26 के नहीं के झूठ
- 34:43बोलो। झूठ बोलो, झूठ ही बोलो आज ज़माना
- 34:51बदल गया है और फिर आप देख लो दुनिया की क्या हालत है सुबह से
- 35:02शाम तक। तुम चार से ही फूल के नहीं खा
- 35:09सकते हो, अगर चार खा सकते हो तो चार ही खा सकते हो, लेकिन जमा तो
- 35:19तुम चार से 4,00,00,000 भी कर सकते हो, उसमें कोई आ सकती है।
- 35:25यह जमा करने की प्रवृत्ति तुम्हें नर्क में धकेल गई।
- 35:31संत बिलख बिलखकर चिल्ला चिल्लाकर चले गए।
- 35:34तुम्हारी आँखों के सामने अपरग्रह अपरग्रह अपरग्रह मत जोड़ो, मत
- 35:40जोड़ो। क्योंकि यह भी एक प्रगटीकरण है।
- 35:46उस स्तर पर पहुंचने के बाद जो प्रगटीकरण होते हैं उनमें से पहले
- 35:52पांच हैं सत्य, अहिंसा, अस्ते, ब्रह्मचर अपग्रह।
- 36:04यह लक्षण है जो जोड़ता है वो सत्य तक नहीं पहुंचा।
- 36:12जो हिंसा करता है वो सत्य तक नहीं पहुंचा।
- 36:17क्यों चोरी करता है? सत्य तक नहीं पहुंचा।
- 36:24और तुम झूठ पटांग आज के राजनीतिक लोग पर ले पार से जीएसटी लगा
- 36:34देते, पता नहीं लगने देता, ऊपर से रियायत कर देते हो।
- 36:38रियायत का ढोल बजा देते हो युद्ध के समान और ऊपर से झूठ बोल देते
- 36:44हो हतो अश्वथम नरो गुंजरा गजो किवांझरो कुंजरा हाथी था या आदमी
- 36:59था? लेकिन अशोभच में मारा गया
- 37:15लक्षण बता देते हैं भाई ₹1 की चीज़ डेढ़ रुपए की हो गई लक्षण,
- 37:21बता देते हैं ₹58 का रुपया डॉलर कबाब 90 से पार चला गया।
- 37:32लक्षण बता देते हैं, तुम लाक छुपाने के?
- 37:46लाक छुपाए छुप न सकेगा असली नकली। चेहरा दिल की।
- 37:56बात बता देता है। असली नकली चेहरा।
- 38:02हमारे चेहरे से प्रगटीकरण हो जाता है।
- 38:12एक चीज़ जड़ हो गई, प्रत्यक्ष भ्रमण आ गया ना महंगाई।
- 38:32इस प्रकृति करण के तरीके ने धरती को नर्क बनाया और मूढ़ों ने इस
- 38:43धरती को इतना नुकसान नहीं पहुंचाया मूढ़ तो बेचारे मूढ़
- 38:47हैं। बिल्कुल सत्य बोल के गए और देखिए
- 38:54सत्य का प्रगटीकरण क्यों हो रहा है?
- 39:03मानते हैं और जो व्यवहार करते हैं उसे साफ दिखाई पड़ता है कि तुलसी
- 39:11उस सत्य के करीब गए नहीं। जीस सत्य पर जाने से व्यक्ति सत्य
- 39:18को उपलब्ध हो जाता है सत्य बोलने लग जाता है उसमें अहिंसा आ जाती
- 39:25उसमें अस्ति, ब्रह्मचर्य और अपग्रह ब्रह्मचर्य तो ऐसा कि
- 39:31रत्नावरि के पास। घोर बहते हुए तूफान में बारिश के
- 39:38अंदर सांप की पूस पकड़ के रत्नावली के कमरे में चले जाते
- 39:43हैं। ऐसे ब्रह्मचारी हैं हमारे तुलसी
- 39:48तो वो सत्य बोलते रहे। लेकिन तुम उनको सर पर बैठा लो ये
- 39:53कहकर कि ऐसा बंदा हमने धरती पे नहीं देखा, कवि हैं, ये बात अलग
- 40:00है। व्यक्ति को उतना ही सम्मान मिलना
- 40:06चाहिए जिसके वह योग्य हैं। कवि हैं।
- 40:11इसका सम्मान मिलना चाहिए। इतना बड़ा ग्रंथ लिख दिया, सटीक
- 40:19शब्दों के भार को तोल कर जहाँ चौपाई तुली जहाँ सोर उठा तुला
- 40:27जहाँ दोहा तुला। जहाँ कोई उपासना पद्धति तुली।
- 40:37उत्तरकांड के 100 आठवें तो है भगवान शंकर की जब आराधना करता है
- 40:44गुरु। हाहाकार कीने गुरु सुन दारूण शिव
- 40:50सा, कंपित मौ हे बलोक अति और कोपजा परता कर दंडवत सप्रेम द्विज
- 40:59शिव सन्नमुख कर जौर। पिन करत गदगद सर समझ गोर कर
- 41:10दीवार। नमामि शमीशान निर्वाण?
- 41:25नमामि समीक्षा निर्वाणरूपम विभम व्याप कं ब्रह्मवेदम सरोम निजम
- 41:45निर्गुणम। हम्म निरव पल्प निरीहम चिदाका
- 41:54आश्रम आकाश वासम भजहम निराका मोका मूलम तोरियम।
- 42:05घिरा ज्ञान गोतीत भीष्म। गिरिशम करारम्, महाकाल कालम
- 42:15त्रिपालम गुणगार संसार आरंभ तुषार त्रिशंकश।
- 42:25गौरम गंभीरम अनुभूत कोठी। प्रभा श्री।
- 42:31शरीरम सफर नमोल कलोल नी चारू गंगा, लसदवाल बालेन्दु काठे
- 42:41भुजंगा। नजावत।
- 42:44ओमनाथ बाज़ार, विंधम भजंती हलो के।
- 42:50परवानराणम नतावत सुखम शांति संतापनाशम।
- 42:59प्रभोपा ही आक नमामि। थोड़ा शॉट कर दिया, मैंने एस
- 43:14शब्दों के बाल को तोल दिया है छंद में बांध दिया है इस रचना के लिए।
- 43:22उनकी महिमा होनी चाहिए, लेकिन अगर तुम ये कहो कि तुलसीदास और स्थल
- 43:29पर पहुँच गए थे, फिर मलूक नहीं पहुंचे थे, यहाँ व्याघात उत्पन्न
- 43:38होता है। यहाँ दो विधा उत्पन्न होती है अगर
- 43:43तुलसी पहुँच गए जन्मे भेद बुद्धि बाकी तुलसी को वृंदावन के एक
- 43:54मंत्र में ले जाया गया कृष्ण की मूर्ति बंसरी के हाथ में।
- 44:05मंद मंद मुस्कान चेहरे पे मोर मुकटसर पे जा के प्रणाम करते हैं,
- 44:21लेकिन परिणाम सीध नहीं चुकाते। वृंदावन के संत कहते हैं महंत के
- 44:31प्रभु नमन हो जी शी से झुकाई अब देखिये मुहूर्त का प्रमाण के
- 44:41सामने। कहाँ कहूं छवि आज की भले बने हो
- 44:54नाज़ कहाँ कहूं छवि आज की भले बने हो नाज़ कृष्ण को गहरा।
- 45:06तुलसी मस्तक तग न हो लेकिन यह मस्तक तो नहीं ना पड़ेगा।
- 45:17क्यों? क्या कृष्ण अवतार नहीं है?
- 45:20क्या कृष्ण उस शक्ति के तन को नहीं छुए हैं क्या?
- 45:26दो कला ज्यादा संपूर्ण है। कृष्ण कहा कहो छवि आज की भले बने
- 45:35हो ना, क्या खाक भले बने जब तुम्हें इनका बनसरिया हाथ में
- 45:42लेकर मुर्ठी बजाना अच्छा नहीं लगा?
- 45:46तो क्या खाक भले बने कहा कहो छवि आज की भले बने हो ना, आज तो बड़े
- 45:57भले बन गए झूठ बोलता है तुलसी। तुलसी मस्त करता भी न वे, जब बदन
- 46:06सुभान हो पात बेलभूति मटी ने कण कण में वह एक राम नजर नहीं आए कण
- 46:20कण छोड़ो। खुद श्रीकृष्ण में भी राम नजर
- 46:26नहीं है। ईशा वास्य मिलम सर्वभम यक्त कीच
- 46:33जगत ने आवश्यक है। ईश्वर जगत के कण कण में व्याप्त
- 46:39है, लेकिन इसे मैं मंदबुद्धि ना कहूँ तो और क्या?
- 46:44और अच्छा है, खुद ही स्वीकार कर लिया पति ममद दलसि दास अगर तुमने
- 46:56ऐसे ही शब्दों को छोटे शब्दों को बड़ाई का रूप देना शुरू कर दिया।
- 47:04तभी तो दुनिया इतनी विकृत हुई है, शब्दों का क्या है लक्सा ही बोल
- 47:11दो रोलो धोलो मगर मंच के आंसू बहालो थोड़ा ऐसे शब्द बोल दो।
- 47:20जो अपने आप को नीचा दिखाते हो तो लोग कहेंगे नहीं।
- 47:24ये है महान पुरुष रहीम कहते हैं रहीम आना हीरा कब
- 47:43कहें लापड़का है। बड़ा बड़ाई न करें।
- 47:50बड़े न बोले जीतने हैं, उससे ऊंचे बोलने में बोलता है और उससे नीचे
- 47:57भी बोलने में बोलता है, प्रामाणिक रहते हैं, ऑथेंटिक रहते हैं, जीते
- 48:03हैं, उते रहते हैं। और जब कोई व्यक्ति अपने उस आंतरिक
- 48:09तल पे पहुंचेगा तो उसमें ये जो पांच लक्षण प्रथम प्रथम नजर
- 48:16आएँगे। यह सभी संतों ने कहे वो चाहे
- 48:21पातिगली हो, बुद्ध हूँ, महावीर तीन धर्मों के।
- 48:27अग्रणी पांच बातें सेम, सत्य, अहिंसा, अस्त, ब्रह्मचर्य,
- 48:35अपिग्रह तीनों ने ही वो कल देख लिया था तो आपके रास्ते अलग हो
- 48:43सकते हैं। लेकिन केंद्र की परिभाषा।
- 48:47आग के रास्ते अनेक हो सकते हैं, लेकिन केंद्र की प्रभाषा अनेक
- 48:51नहीं होती। केंद्र की प्रभाषा एक ही रोगी
- 49:06इन तथाकथित समझदार कोचिंग देने वाले मूर्खों ने।
- 49:16मैंने कब से बोल रहा हूँ तुम अजामल की कथाएं कहनी शुरू मत कर
- 49:20देना जुलूस में जाएगा तुम्हारा क्योंकि मैं जानता हूँ उस स्तर पर
- 49:27जाकर बातें उलट हो जाती हैं। शीत शासन में हो जाती हैं।
- 49:33अब तुम चलते हो टांगों पर, फिर चलने लगते हो सिर पे कितना बदल
- 49:39गया तो मैं कॉशन किया था उनको सावधान।
- 49:49परमात्मा के क्षेत्र में विशुद्धि चक्र से जैसे ही आगे निकलो,
- 49:54परभाषाएँ बदल जाती हैं और बदल के जाती हैं विपरीत हो जाती हैं।
- 50:04अब तुम पैरों पे चलते हो फिर तुम शिरकत बल चलोगे?
- 50:08लोग तुम्हें कहेंगे बड़ा उल्टा पुल्टा है लेकिन नहीं तब तुम सही
- 50:13मायने में सही हो गया हमने देखा। बच्चा जब पैदा होता है तो उल्टा
- 50:18होता है, सिर नीचे होता है और जो कोई लाख में से एक बच्चा सीधा
- 50:25पैदा हो जाता है। उसका सिर ऊपर होता है।
- 50:29ऐसा ऐसा भी होता है, लेकिन सीधा हम उसे कहते हैं जो उल्टा पैदा
- 50:37होता है उसकी रचना की व्याख्या। मत करो मूढ़ो मैं अनेक बार बोल
- 50:51चुका हूँ उसकी रचना अव्यक्षायित है नॉन डिस्क्राइब एवर।
- 51:09तुम उनको शब्दों में बांध लेना चाहती हो और वह सागर तुम्हारी
- 51:16गागर में आएगा कैसे इतनी भी बुद्धि नहीं है तुम्हारे पास।
- 51:32रहीमन हीरा कब का है, लाख का है तुम शब्दों को पकड़ने के आदी हो
- 51:41गया और शब्दों को पकड़ के शब्दों को ही व्याख्याकृत करने के आदी
- 51:46होंगे एक्सप्लेन मिशन ऑफ वर्क्स। यही मार खा जाते हो फिर कहते हैं
- 51:59रहीम रही मन हीरा कब कहें ला टका है मोल?
- 52:04लेकिन वो कभी ऐसा तो नहीं कहते कि मैं हीरा न हूँ।
- 52:14बस बोल नहीं पाता अन्यथा ये भी कह देता कि मेरे ये मोड़ जमीन बोल
- 52:20नहीं पाती। अन्यथा वो जमीन भी कह देती कि मैं
- 52:23₹1,00,00,000 की स्क्वायर गज हूँ स्क्वायर याद।
- 52:30बोल नहीं पाती इसलिए बोलती नहीं और जो मूर्ख लोग अपने आप को सत्य
- 52:45में मूर्ख कहते हैं वो बोलते तो सत्य हैं लेकिन आपके लिए वो
- 52:49पूजनीय हो जाते हैं। अब देखिये कितने शंकराचार्य?
- 52:54तुलसी से प्रभावित है कितने बेचारे अरे भाई ग्रंथ लिख दिया
- 53:01कभी है फिर सस्ते, कभी और महंगे कभी भी होते है, देखिये और महंगे
- 53:09कभी वो होते है जिन्हें राज्यसभा के गद्दी चाहिए।
- 53:15सस्ते कभी वो होते हैं जो टके के भाव जो प्रेम के भाव प्रेम के मोल
- 53:22ही बिक जाते हैं वो सस्ते कभी होते हैं।
- 53:30मतलब प्रेम के मोल पे जाते हैं। कहत मलोकदास छाड़ दे परइया।
- 53:51तू मलोकदा छोड़ दे पराई या रामधन पाई के।
- 54:12फिर काकीसरण जाए, काकीसरण जाए। देना बंद हो देना ना मेरी सोच
- 54:37लीजिए मेरी सोच। लीजिये देना बंधु देना मेरी सुध
- 54:58लीजिये। मेरी सुध ली जी मेरी सुध ली जी
- 55:14देना बंधु देना ना। अगर तुमने शब्दों को पकड़ के उसको
- 55:36सत्य समझकर मान सम्मान देना शुरू कर दिया तो यहाँ धरती पर आज अगर
- 55:43मूड लोग फिर रहे हैं, सम्मान पा रहे हैं तो इसमें कोई।
- 55:49अति शुक्ति नहीं कोई हैरान की नहीं, कोई अचंभा नहीं होना चाहिए,
- 55:56क्योंकि तुमने काम ही ऐसे किया। आज अगर मोड़ व्यक्ति, नॉन
- 56:06साइंटिफिक माइंड वाले लोग। राधे राधे करते हो परमात्मा में
- 56:13जाएगा पांच छः नाम जगते रहो परमात्मा में जाएगा ऐसे मूडों को
- 56:20तुमने पुरस्कृत किया, सम्मानित किया तो आज धरती पर।
- 56:30अज्ञान का बोलबाला है। अगर तुम साइंटिफिक बुद्धि होते तो
- 56:39विचार करता है कैसे शोर से मोहन तक पहुंचा जा सकता है?
- 56:48शोर से परम शोर तक पहुंचा जा सकता है।
- 56:53ठहराव से परम ठहराव तक पहुंचा जा सकता है।
- 57:01शोर से परम शोर तक पहुंचाना शोर से मौन तक कैसे पहुंचोगे?
- 57:12अविकल ही मुझे एक व्यक्ति कह रहे थे, बाबा क्षमा करना, आपकी वीडियो
- 57:17को मैंने प्रसारित कर दिया, लेकिन उसका अर्थ गलत था।
- 57:21मुझे पता नहीं क्षमा कर दूँ। मैं भूल और उन्होंने पांच नाम के
- 57:30साथ बढ़ा दिया। मैंने कहा अपनी क्लीनिंगनेस को
- 57:34तोड़ लो बाहर से तो तुम आप ही में आ जाओगे।
- 57:40वो कहते हैं, पांच नाम इसीलिए होते हैं।
- 57:45पांच नाम क्लीनिंगनेस को तोड़ते हैं, पांच नाम एनर्जी को ज्यादा
- 57:51करते हैं। एनर्जी तो मौन से ज्यादा होती है।
- 57:56चुप हो जाओगे एनर्जी होना बंद हो जाएगा तो तुम में शक्ति का प्रवाह
- 58:03ज्यादा हो जाएगा। पांच नाम लेने से एनर्जी लेस्सनेस
- 58:10आ जाती है। पलक झपकने से भी शक्ति होते हो।
- 58:16तुम अब मैं बोल रहा हूँ और जानता भी हूँ।
- 58:23केस बोलने से मैं लगातार निरंतर एनर्जीलेसनेस हुआ जा रहा हूँ।
- 58:32एक वक्त आएगा जब मैं पूर्णतया तक जाऊंगा, मैं जीभ उठाने के योग्य
- 58:38भी नहीं रहूंगा और एक वक्त ऐसा भी आ जाएगा।
- 58:43जब मैं पूर्णतः एनर्जी लेसनेस में आके मुर्दा हो जाऊंगा, फिर मुझे
- 58:48कोई जगाएगा मैं जागूंगा नहीं? यह होती है एनर्जी लेसनेस की
- 58:55पूर्ण अवस्था मृत हो जाना तो तुम एनर्जी लेसनेस को?
- 59:01कॉन्सेंट्रेशन बता रहे हो? यह मूड मतियों ने धरती को नर्क
- 59:08बना दिया और यही गलती हमने की। हमने तुलसी को सम्मान दिया, जबकि
- 59:17तुलसी तो खुद ही बोलते हैं। कविता विवेक एक नहीं हो रहे सत्य
- 59:27कहूँ लिख कागज को रे मैं कोर कागज पे लिख के देने को तैयार हूँ कि
- 59:33मैंने देखा देखा कुछ नहीं। मैं निहायत अध्यानी मेरे विवेकन
- 59:51विवेक किस से कहते हैं? आइए थोड़ा सा इसपे विचार करें और
- 59:55हमने ऐसे ही लोगों को मान दिया। कृष्ण ने कहा है महान व्यक्तियों
- 1:00:14को अपना आचरण ऐसा खिलना चाहिए के उसके अनुकरण करने वाले लोग
- 1:00:21अनुकरणीय लोग वैसे ही बनेंगे। ये ध्यान रखें विवेक कृष्ण कहते
- 1:00:36हैं, शंश्यात्मा अनिश्चित विवेक होता है।
- 1:00:41यहाँ शंश्य रहितता होती है बुद्धि की वो अवश्य।
- 1:00:48जहाँ आपने निर्णय लेने की क्षमता प्राप्त कर दी है।
- 1:00:55संशय युक्त बुद्धि वो होती है जो अनिर्णय की स्थिति में रहती है,
- 1:01:03निर्णय लेने में अक्षम होती है। वह संशय शहीद होती है, उसमें
- 1:01:11निर्णय नहीं आता इरादे बांधता हूँ इरादे बांधता हूँ, सोचता हूँ
- 1:01:22इरादे बांधता हूँ सोचता हूँ, तोड़ देता हूँ।
- 1:01:27इरादे बांधता हूँ, सोचता हूँ तोड़ देता हूँ, कहीं ऐसा न हो जाए कहीं
- 1:01:35वैसा न हो जाए। यह निर्णय न लेने की क्षमता है।
- 1:01:47इसे ही कृष्ण भगवान शश्यात्मक कहते हैं।
- 1:01:51और उसका परिणाम भी बता दे, जो निर्णय लेने की क्षमता नहीं रखता
- 1:01:59और कौन नहीं रखता निर्णय लेने की क्षमता जो वह अपने अंतशी तल्को
- 1:02:06जिसे क्षतिप्रज्ञता कहते हैं, भगवान कृष्ण वहाँ जाकर।
- 1:02:10स्थित नहीं हो जाता वह सही मायने में निर्णय लेने में अक्षम होता
- 1:02:20है गहरी बात है बार बार रिपीट करना समझ जाओ।
- 1:02:29संशात्मक भिन्न स्थिति और कहते हैं, ऐसा व्यक्ति जो निर्णय लेने
- 1:02:37की क्षमता नहीं रखता, उसका 1 दिन विनाश हो जाता है।
- 1:02:44इधर जाऊं, उधर जाऊं किधर जाऊं? यह निर्णय न लेने की अवस्था है।
- 1:02:55बुद्धि और अगर तुम इस अवस्था में हो तो सावधान 1 दिन तुम लुप्त हो
- 1:03:05जाओगे। अतः तुम प्रयास करके उस स्तर तक
- 1:03:14पहुंचने की चेष्टा करो जहाँ संख्या खत्म हो जाती है।
- 1:03:23उतर गए हों मेरे मन का सन सा उतर। गय।
- 1:03:45हो, मेरे मन का संसार जग तिरोधर सन पा हो।
- 1:04:01ठाकुर? तुम सर ना ये आह।
- 1:04:10उतर गयो मेरे मन का संसार बाबा नान कहते हैं दर्शन के बिना संशय
- 1:04:17समाप्त नहीं। मानने से मात्र मानने से संशय
- 1:04:23समाप्त नहीं होता। हृदय के किसी कोने में संशय छुप
- 1:04:28जाता है जैसे कोई समभ निकल आया हो और तुम लाठी लेके उसके पीछे भागो।
- 1:04:39वह किसी कार्नर में छिपाजाये जाते हैं।
- 1:04:42बर्तन बाबा नानी कहते हैं संशय समाप्त होता है, सिर्फ तब दर्शन
- 1:04:56होते हैं जप। जब संचय समाप्त होता है तब दर्शन
- 1:05:05होते हैं। यह एक क्षण में दोनों घटनाएँ
- 1:05:09गढ़ती हैं। इसे कैसे ही प्रकट कर।
- 1:05:18ओहो थर गए हो मेरे मन का संसार ओह थर गए हो।
- 1:05:35मेरे मन का सन सा। मन का सन सा जब तेरा घर सन।
- 1:05:51पा ठाकुर। तुम में सरेनाइया फिर।
- 1:06:03व्यक्ति उसकी शरण में चला जाता है तो पहले क्या होता है?
- 1:06:12शंशाहीनता आती है। शंख हींगता हो या दर्शन या उसी पल
- 1:06:23दोनों घटनाएं घटती हैं, उसी क्षण में दर्शन होता है और दर्शन करते
- 1:06:29हुए क्षणों में ही। तुम्हारा संशय विलुप्त हो जाता
- 1:06:34है। जैसे आंख खुलते ही तुम्हें संसार
- 1:06:38दिखने लग जाता है। आंख खुलते ही जागरण हो जाता है।
- 1:06:45जागरने लगते हो तुम। यह एक घड़ी का मसला है, घटनाएं
- 1:06:49बहुत हैं। उतर गयो मेरे मन का संशय जब तेरा
- 1:06:54दर्शन पाया दर्शन करने से संशय विहीनता आती है वह शंशा जीसको
- 1:07:03भगवान कृष्ण कहते हैं कि उसका विनाश होना अवश्य भावी है।
- 1:07:08संशय आत्मा विनश्यति। या महंगे, कभी प्रचार कितना ही कर
- 1:07:14रहे हैं, लेकिन देखो अपने परिवार का पालन पोषण करेंगे, जिएंगे कुछ
- 1:07:22पुरस्कार ले लेंगे, कुछ धन बटोर लेंगे और यहाँ से विदाई ले लेंगे।
- 1:07:28बस इतना सा काम तो सभी कर लेते हैं।
- 1:07:31वो चाहे मूड हो, चाहे महंगा, कभी हो, चाहे तुलसी हो, चाहे सूरदास
- 1:07:38हो, मीरा हो जो कृष्ण हो, विदाई तो 1 दिन ले ही लेता है, लेकिन
- 1:07:45बात तो ये है कि वह अनुकरणीय छोड़ के क्या गया?
- 1:07:53कृष्ण सर्वोत्तम अनुकरणीय गीता छोड़ गए 100 दास अनुकरणीय प्रेम
- 1:08:06की बौछारें छोड़ गए मीरा अनुकरणीय विरह की आग छोड़ गई है।
- 1:08:16में ऐसा जनती। प्रेम के दुःख हो नगर ढूंढोरा।
- 1:09:04ऐसा जान ति प्रीत के दुःख हो। नगर ढिंढोरापित सी प्रेम ना कइयों
- 1:09:33को। तुलसी कहते हैं, मेरे में विवेक
- 1:09:46नहीं है, बुद्धि है लेकिन बुद्धि व्यग्र है, बुद्धि चलायमान है,
- 1:09:56ठहरी नहीं है। बुद्धि इधर उधर भटकती है।
- 1:10:02ऊपर नीचे भटकती है इरादे बांधता हूँ सोचता हूँ तोड़ देता हूँ कहीं
- 1:10:08ऐसा न हो जाए कहीं ऐसा न हो जाए विवेक नहीं आया बुद्धि कभी तो
- 1:10:18विवेक एक नहीं मोरे। देखिये इसमें कविता तो मिलेंगे आप
- 1:10:25शध तो मिलेंगे बार बराबर मिलेगा, लैब वाधता भी होगी लेकिन क्षमा
- 1:10:33करना पहले ही कह देते हैं यह सत्यवादिता है।
- 1:10:41यह अहंकार हीनता है, बताइयेगा यह सत्यवादिता, अहंकार हीनता में।
- 1:10:57प्रवेश कर जाता है। नृत्य पहले सत्य बोलो इसीलिए
- 1:11:05ऋषियों ने पहले अहंकार को नहीं रखा अहंकार हीनता पहले नहीं रखी,
- 1:11:09वो पतंजलि हो, वो बुद्ध हो, वो महाबीरों।
- 1:11:13वो नानक हूँ। आध सच जुग आध सच है कि सच्च
- 1:11:17नानकों से भी सच सत्य को पहले रखा।
- 1:11:22अहंकार हीनता को बाद में रखो क्योंकि सत्य से अहंकार हीनता आती
- 1:11:28है। फिर तुम अगर अहंकारी होगे।
- 1:11:33तो भी सत्य बोलोगे कि मैं अंकार से भर गया हूँ।
- 1:11:40अगर तुम कायल होगे तो क्षत्रिय होते हुए भी अर्जुन की तरह बोल
- 1:11:45पाओगे। सत्य कर बने दोषोपात स्वभाव पर
- 1:11:50शामी तो आम धर्म से मूढ़ चेता। यश्री ऐसा है ना शैतेन्द्र गुरु
- 1:11:55की तन्मय से हम शादी में हम तो हम पर का नमा हे प्रभु मैं कायरता के
- 1:12:04दोस्त से ग्रसित हो गया और मेरी बुद्धि।
- 1:12:11ठहरती नहीं है चलाएमान मुझे क्या करना चाहिए?
- 1:12:16इस क्रिटिकल जगचर पराग प्रचामितम धर्मसमु विजेताः यश्री है
- 1:12:32स्यनिश्चित। से सत्य अहंशा दी माँ माँ प्रपणम
- 1:12:39मैं आपकी शरण में हूँ, मैं शरणागत हूँ तो मार कबित विवेक एक नहीं हो
- 1:12:47रहा सत्य को। संपूर्ण हृदय से स्वीकृत कर लेना।
- 1:12:57यह कोण था तुलसी गुण? इसके लिए सम्मान तो मिलना चाहिए,
- 1:13:05लेकिन तुलसी को सर्वोपरि सम्मेलन मुड़ता है।
- 1:13:13फिर क्या हीरे को ये नहीं कहना चाहिए कि मैं हीरा हूँ?
- 1:13:20ये तो कहना चाहिए कहना क्या चाहिए?
- 1:13:23उसका होना ही प्रमाण है कि मैं हीरा हूँ।
- 1:13:29तो रहीम कहते हैं कि हीरे को अपना मोड़ नहीं बताना चाहिए लेकिन हीरे
- 1:13:35को अपनी प्रमाणिकता तो छुपा सकता ही वो नहीं अगर चाहता तो भी नहीं
- 1:13:42छुपा सकता। हमने यही गलती की।
- 1:13:46मानवता नहीं, यही गलती है। जिसने निम्न स्वर से शब्द बोले जो
- 1:13:52झोंक गया वह चाहे पखंडी हो, हमने उसको सम्मान दिया।
- 1:13:56हमने उसको राजगद्दी दी, जिसने विनम्रता पुरो के झूठ बोला।
- 1:14:03जिसने आपको ठगा जिसने आपको धोखा दिया जिसने आपके साथ प्यार से
- 1:14:10संवाद, आपकी भावनाओं को, आपकी जरूरतों को, अपनी आपकी जरूरतों को
- 1:14:17अपनी गद्दियों के लिए इस्तेमाल किया।
- 1:14:21उसको हमने सम्मानित किया। उसको हमने गल्तियाँ दे दी।
- 1:14:25बस यहीं से गाढ़ी मुड़ खा लेती पुत्र अगर हम ऐसे ही मन के जहरीरे
- 1:14:38और जुबा के मुखे। या नीमन स्वर्ग कहने वाले
- 1:14:42व्यक्तियों को सम्मानित करते रहे तो आज जो दशा है है तो वह भी
- 1:14:49भयंकर दशा। आज हम डूबने की कगार पे आ गए हैं,
- 1:14:54बस डूबे नहीं। अभी अगर हम ऐसे ही।
- 1:14:59शब्दों को चिपकना शुरू हो गए और अंत स्थल में न झाँक सके व्यक्ति
- 1:15:06तो हम आज नहीं कल डूब जाएंगे आज डूबने की कगार पे हैं कल डूब
- 1:15:11जाएंगे देखिए हमारी रहनमाओ ने। अरब जनता को बहकाकर झूठे वायदे
- 1:15:25बोलकर गद्दी हथाई की वो सम्मानित होनी चाहिए या प्रताड़ित होनी
- 1:15:35चाहिए उन्होंने वो वायदा नभाये? हर हाथ रोजगार के लिए तरस रहा है।
- 1:15:49हर फिर रोटी के लिए तरस रहा है और भीख की रोटी कोई भी स्वाभिमान
- 1:16:05व्यक्ति खाने को। तैयार तो नहीं होता लेकिन मजबूरी
- 1:16:11में पेट मांगता है, खानी पड़ती है।
- 1:16:15स्वाभिमानी व्यक्ति स्वाबलंबन की रोटी मांगता है।
- 1:16:23वो कहता ही नहीं मुझे। रोटी नहीं चाहिए, मुझे रोजगार
- 1:16:28चाहिए सवस्थ शरीर मैं गुलाम बनकर जीना नहीं चाहता।
- 1:16:34मैं अपनी आजादी को आपके पास गरबी नहीं रखना चाहता, कृपया मुझे
- 1:16:40रोजगार दीजिए और हमारे हर हैं नुमाओं ने।
- 1:16:44हमसे वायदा किया था, हम 2,00,00,000 रोज़ वायदा न करते,
- 1:16:54यह उस व्यक्ति के लक्षण है। जीसको मैं समझा रहा हूँ जिसने वो
- 1:17:00तल छुआ नहीं जिसने वो तल छू लिया, वह झूठ नहीं बोले।
- 1:17:10झूठ बोलना चाहेगा भी तो झूठ नहीं बोलेंगे क्योंकि उसका अंत स्थल
- 1:17:19उसको रोक देगा। नहीं नहीं नहीं नहीं भाई झूठ
- 1:17:23नहीं, यह वो तल है जो व्यक्ति को असत्य बोलने से।
- 1:17:37इसलिए ऋषियों ने सबसे पहले शब्द रखा सत्य, सत्य, अहिंसा,
- 1:17:42सत्यब्रह्मचारा प्रिय ग्रह सब रास्ते बंद कर दो एनर्जी लेसनेस
- 1:17:47में जो आपको लेके जाते हैं। ये सभी रस्ते आपको एनर्जी
- 1:17:53लेस्सनेस में लेके जाते हैं फिर वो चाहे जाप हो, पाठ हो, पूजा हो
- 1:17:57ये सब एनर्जी लेस्सनेस के उपाय में अल्लाह कहलो राम कहलो रहीम
- 1:18:04कहलो, राधा कहलो कृष्णा कहलो शबद बोलने से।
- 1:18:11एनर्जीलेसनेस आती है पलक की झपकने से आती है जीवा के ऊपर नीचे होने
- 1:18:19से आती है तुम कहते हो तुम्हें सब कुछ, मनवांछित फल मिल जाएगा राधे
- 1:18:24राधे बोलते रहो इसलिए मैं इनको। हराम ही कहता हूँ हरामखोर चोर
- 1:18:33हरामखोर कित्ते चोर हरामखोर बाबा नानक नहीं निकाली निकाली।
- 1:18:49कितने चोर हरामखोर, कितने जबर? जाहेकर ज़ोर?
- 1:18:55कितने लोग जबर से ज़ुल्म से राज़ कर रहे हैं?
- 1:19:10बात क्या है? बात ये है पाप के कारण गुर्दे
- 1:19:16खराब हो गए डायलीसिस के लिए पैसे चाहिए सस्ता मार के लोगों को भटका
- 1:19:22दो पागल बना दो महंगे कभी बन जाओ या कुछ भी कुछ भी।
- 1:19:29हाँ, कुछ भी चलेगा किसी भी तरह के राम भक्ति करो और अरबों पे बटोरों
- 1:19:41महंगे कभी बन जाओ एक रामकथा का नाम भूल गया बापू।
- 1:19:49बाप नाम कैसा भरारी बता दिया आपको हमने थोड़ा भूल जाते हो।
- 1:20:00उन्होंने राम कथा कहा, जीवन में कोई प्रभाव पड़े, ज़रा भी फर्क
- 1:20:06नहीं आया। फर्क आता है तो पूरा ही आता है।
- 1:20:11एक दम से फरक होता है सिक्के को पलटों के एक दम से पढ़ अगर हमने
- 1:20:24ऐसे ही मुँह के मीठे और हृदय के खोटे लोगों को सम्मान देना शुरू
- 1:20:31कर दिया। क्योंकि हृदय को तो हम जान नहीं
- 1:20:34सके हम इतने त्रिकालदर्शी तो हैं नहीं लेकिन कोई तो त्रिकालदृश्य
- 1:20:42होगा भाई परमात्मा की सृष्टि में क्या सभी अंधे हैं?
- 1:20:47नहीं कोई तो होगा उसकी बातों को थोड़ा ठहर के सुन लो।
- 1:20:53उसमें कोई लोह नहीं, वो तुमसे कुछ नहीं मांगेगा, ना गद्दी ना
- 1:21:06सन्नमान ना धन कुछ भी तो नहीं मांगेगा, लेकिन उसकी बात तो सुन
- 1:21:13लो। वो तुम्हे सत्य व चलाने आया है,
- 1:21:20लेकिन तुम्हारे पास सत्य सुनने का वक्त ही नहीं है।
- 1:21:24फिर झूठ सुनने का वक्त कैसे आ जाता है?
- 1:21:27फिर तुम डेरों में बैठने का वक्त कैसे निकाल लेते हो?
- 1:21:33तुम हृदय से बेईमान हो, तुम बदलना नहीं चाहते, तुम्हारा अहंकार मरना
- 1:21:39नहीं चाहते। वसु का बात यह है अगर तुमने ऐसे
- 1:21:45ही धंधेबाजों को। पुरस्कृत करना शुरू कर दिया तो आज
- 1:21:55वैसे धरती नर्क बन गई। बस डूबने ही वाली है।
- 1:22:05मेरे इशारों को समझ लेना पहला पहला लक्षण सत्य है।
- 1:22:14जो झूठ बोलता है उसे गद्दी पे मत बटन और गलती से अगर बैठ गया है तो
- 1:22:23उसको कालर पकड़ के नीचे उतार लेना, तुम्हारी संख्या
- 1:22:27146,00,00,000 है याद रखना। उसके साथ कितने भी लोग हों, लेकिन
- 1:22:32झूठे व्यक्ति के साथ सच में कोई व्यक्ति नहीं हुआ करता।
- 1:22:36सिर्फ गुलाम हुआ करते हैं पैसे के वक्त तो उठो, जागो अपनी प्रज्ञा
- 1:22:49को जगाओ। चिंगारी मैंने लगा दी है आग तुम
- 1:23:04फैला दो। यह एक पुण्य का कार्य है गोविंद
- 1:23:14शास्त्री अगर तुम शब्दों में ऐसे ही बहकते रहे तो सत्य तक कौन लेके
- 1:23:25जाएगा तुम्हें? हजारों साल?
- 1:23:30नरगिस अपनी बेनूरी बेरोती है। बड़ी मुश्किल से होता है चमन में
- 1:23:36तीदा भर पैदा तो फिर दीदा भर की बात नहीं सुनोगे।
- 1:23:40क्या? फिर दीदा भर में कोई आपको नुक्स
- 1:23:47से नजर आया? अगर नुक्स से नजर आया तो वो भी
- 1:23:51बता दो। तुम्हें कोई लूट कसूट करता है
- 1:23:56क्या वो तुम्हें बहकाता है क्या वो नहीं वह सिर्फ तुम्हें सत्य
- 1:24:04बदला नहीं आया है तुम बहरे भी नहीं हो तुम अंधे भी नहीं हो
- 1:24:10थोड़ा कानो को खोल लो। थोड़ा आँखों को खोलो सुनो जागो।
- 1:24:17सोने वालो सुनो मेरी कहानी। जागो।
- 1:24:30सोने वालो सुनो मेरी कहानी।