Latest / Baba ji Vijay Vats / 30 Dec 24 - परमात्मा के दर्शन का राज़! सच्चे दर्शन का रहस्य! अपने संशय मिटाने के प्रभावी तरीके!
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- 0:04बाबा जी प्रणब मेरा सवाल है, बाबा कम्युनिस्ट को परमात्मा से क्या
- 0:18मांगना? बड़ा सुंदर सवाल परमात्मा से
- 0:29मनुष्य को क्या मांगना चाहिए? और अगर इस प्रश्न का जवाब।
- 0:41तुम सही से ही पाल लेते हो तो तुम्हारे जीवन से सब आपाधापी,
- 0:49कष्ट, क्लेश समाप्त हो जाएंगे। प्रभु पूछ मुझसे प्रभु पूछ मुझसे
- 1:12मैं क्या चाहता हूँ? मैं तुमसे तुम्हें मांगना चाहता।
- 1:28हूँ। प्रभु पूछ मुझसे मैं क्या चाहता?
- 1:41मैं तुझसे तुम्हें मांगना चाहता हूँ क्या बोझ मुझ से?
- 1:59क्या मांगू उस परवर बिगाड़ है, समझने वाली बात है चित्र प्रश्न
- 2:13आप हल्का ले रहे हैं उतना हल्का है?
- 2:21बिल्कुल बुनियादी तल के ऊपर जो प्रश्न होते हैं वह प्रश्न है जो
- 2:30जिसने ये प्रश्न ठीक से समझ लिया? उसे कहीं और जाने की जरूरत नहीं
- 2:38है। प्रभु को प्रभु से भाग लो लेकिन
- 2:50ये सिर्फ वज़न है इसके घेरे में। क्या छिपा है वो तुम्हें पता है?
- 3:03भक्त प्रहलाद की बात हम जानते हैं।
- 3:06कहानी हमारे शास्त्रों में लिखी है, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से
- 3:12लिखी। प्रहलाद ने देख लिया था कि
- 3:21परमात्मा है तो ये बड़ी मजेदार बात है।
- 3:26कहते तो तुम भी हो के परमात्मा है और फिर परमात्मा है कि तुम उसे
- 3:34मंदर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च। धाम पर्वत की श्रृंखलाओं में
- 3:50नदियों में, तालाबों में, सरोवरों में।
- 3:56क्यों ढूंढ रहा है? जीसको यह पता है कि वह है उसके
- 4:04सारे प्रश्न करता है, यही तो होता है।
- 4:14पक्का यकीन हो जाना कि वह है और जैसे ही व्यक्ति को पक्का यकीन
- 4:23कहता हूँ, मैं यकीन तो आपको है, लेकिन किसी को यकीन है किसी को
- 4:30यकीन नहीं। किसी को ये यकीन है कि परमात्मा
- 4:35है जाना वाना कुछ नहीं और किसी को ये यकीन है कि परमात्मा नहीं है
- 4:43जाना वाना कुछ नहीं खोजा वगैरह कुछ नहीं, शब्दों की गुफ्तगू है।
- 4:52शब्दों के शब्दों को शब्दों से लड़वाकर मुर्गों की तरह तुम
- 4:58शास्त्रार्थ करते हो, हालांकि परमात्मा के विषय में शास्त्रार्थ
- 5:04करना बेकार है, फिर भी करते हो। एक बात को ये समझ लेना मेरे सारे
- 5:15शब्द भूल जाना, बस इस एक शब्द को याद रख लेना कुछ मत मांगो एक चीज़
- 5:27मांग लो परमात्मस क्या? वही जो मैंने कल बताया था
- 5:40परमात्मा से मांग लो कि तुम हो इस बात का यकीन करा दो पक्का।
- 5:53इस बात का यकीन करदो, हे प्रभु मेरे हृदय में कितु है, पक्का
- 6:03पक्का यकीन करदो कितु है। प्रहलाद का पिता नास्तिक है और जो
- 6:15नास्तिक होते हैं वो कहते हैं कि मैं ही परमात्मा हूँ तुम मुझको
- 6:22भाजी। तू नारायण नारायण मत कर तू अपने
- 6:28पिता को भज, तू अपने पिता का नाम ले हिरण्य कश्यप हिरण्य कश्यप कह
- 6:34मैं हूँ सर्वश्रेष्ठी को चलाने वाला जो कहते हैं कि मैं हूँ।
- 6:45झूठे होते हैं। परमात्मा ने कभी आज तक कहा कि मैं
- 6:50हूँ चलाने में बस वह तो चुपचाप चलाता रहता है।
- 6:58नियमों ने कभी कहा कि हम हैं चलाने वाले।
- 7:03कभी लॉ ऑफ ग्रेविटेशन ने कहा कि हम हैं जो सेब को या चीजों को
- 7:09नीचे उतरा देते हैं। तुम उसे खोज लो तो ठीक न खोजो तो
- 7:16ठीक वह चुपचाप अपना काम करता रहता है।
- 7:20सेराइजक न्यूट्रिन ने जब तक खोजा नहीं था, ये लव ग्रैविटेशन है वो
- 7:26फोर्स ऑफ ग्रैविटेशन सेब को नीचे केंच लेता है क्या इससे पहले?
- 7:38लाफ ग्रैविटेशन काम नहीं कर रहा था कर रहा था बस हमें मालूम ना
- 7:44था। बस ऐसा ही परमात्मा अपना काम कर
- 7:50रहा है। तुम्हें पता हो ना पता हो।
- 7:59क्या मांगे हैं परमात्मा से? परमात्मा से मांग लो, हे प्रभु
- 8:09हमें दीदार दे दे, हमें दर्शन दे। और दर्शन के बिना सिन्ह से जाता
- 8:21नहीं हूँ जो मैंने कल शब्द कहा भगवान कृष्ण का अज्ञानस्य
- 8:29श्रद्धानस्य सिन्ह से आत्मा अनस्य।
- 8:34अज्ञान बना ही रहेगा, संशय बना ही रहेगा और तुम विनाश हो जाओगे,
- 8:41विनष्ट हो जाओगे। मूलभूत प्रश्न है कि तू है बस
- 8:51क्या है? हमने नहीं पता लेना।
- 8:54बस तू है इतना ही काफी होता है और अगर तुम्हें एक इस प्रश्न का जवाब
- 9:07मिल गया कि वह है, तो तुम देखोगे कि तुम्हारी सारी बाग दौड़।
- 9:13आपा धापी सब खत्म हो गए, ठहर गया सब कुछ।
- 9:21झील के पानी की तरह पर कुछ गतिमान नहीं है।
- 9:29फिर सब ठहर गया। ये हलचल यापधापी ये भाग दो ये सब
- 9:40इनके देश में एक ही अज्ञानता है, वो अज्ञानता है।
- 9:49परमात्मा का यकीन न होना की वह है और अगर ये अज्ञानता न होती तो उन
- 10:03पहाड़ों में माता के दर्शन के लिए नहीं जाते थे।
- 10:08तुम पत्थरों के ऊपर दूध नहीं चढ़ाते, सभी धर्मों के अंदर यह जो
- 10:16नकलची बंदा है, अपने अपने कर्म कांड करके आपको मूर्ख बना रहे हैं
- 10:24या मूर्ख खाना बनाते हैं। अगर तुम्हें पता लग गया कि वह है
- 10:36दीदार मांगो दीदार और दीदार इतना प्यारा शब्द है।
- 10:46कि यह अपने साथ तुम्हारे सारे दुखड़े, तकलीफें, पीड़ाएं, कष्ट,
- 10:52क्लेश, अभाव सब साथ बहा के ले जाता है दीदार इतना प्यारा शब्द
- 10:57है। तो विवेकानंद कहते तुम मुझे दखला
- 11:11सकते हो, हग गुरु मान हो जाता है, नहीं दखला तो नहीं हो सकता है,
- 11:23तुम अनुभव कर सकते हो। रामकृष्णा कहने लगे, हाँ मैं
- 11:28तुम्हें तक कर सकता हूँ। जब गुरु पत्र देखता है तो ये ठीक
- 11:35पत्र है, सही पत्र है। इसमें जो अमृत डा दूंगा, मैं वह
- 11:43जीवनदायक होगा। यह विश्व से भरा हुआ लोटा नहीं।
- 11:51इसमें जो अमृत डालूंगा, वह वितरित नहीं होता तो वह उसमें अमृत डाल
- 11:57देता है और ऐसा ही रामकृष्णा परमानंद ने किया।
- 12:02यह बात जुदा है। यउस मुकाम तक जाने के लिए मरना
- 12:08पड़ता है और मरने से घबरा गए, पूरे अपने अंतश को छू नहीं पाए थे
- 12:15और चेरला पड़े और संत इतने दयालु और अहिंसक होते हैं।
- 12:22संत कहते हैं, अच्छा। तुम्हारे माँ बाप भी हैं तो फिर
- 12:26बाहर आ जाओ, क्या मांगे परमात्मा से धन मांगे, यश मांगे, पदवी
- 12:38मांगे, पुत्रपुत्राजी मांगे, क्या मांगे?
- 12:46मुझसे पूछते है बाबा क्या मांगे? सवाल करने वाला अद्भुत व्यक्ति
- 12:55होगा अनुशा वह कह लेता कि मुझे तो ये चाहिए।
- 13:02ये बताओ कैसे मिलेगा धन चाहिए, पुत्र चाहिए, लोग मानते हैं लेकिन
- 13:12मुझसे कभी ये सवाल नहीं पूछा किसी ने?
- 13:15ये पहला व्यक्ति है जो मुझसे सवाल पूछ रहा है कि बाबा परमात्मा से
- 13:19क्या मांगे? अजीब मनोदशा रही होगी इस व्यक्ति
- 13:28की जब उसका दीदार मांगलो जैसे ही
- 13:47दीदार मांगलो के दीदार हो जायेगा तो तुम्हारी सभी शंकाएं समाप्त
- 13:55हो। दुख, पीड़ाएँ, कष्ट, क्लेश, अभाव
- 14:02सब खत्म हो गए एक दर्शन से। उतर गए हों।
- 14:14मेरे मन का संसा जब तेरा घर संपाल।
- 14:27दर्शन से हर होता है। तर्कों को तर्कों से लड़ाने से
- 14:36कोई हल नहीं। तुम शास्त्रों के हवाले देते हो,
- 14:42बेकार तुम शास्त्रार्थ करते हो। खुद का कुछ नहीं होता।
- 14:52शास्त्रार्थ में शास्त्र का होता है, एक शस्त्र को दूसरे शस्त्र से
- 14:59लड़ा देते हो मुल्कों की तरह। असल में मुसीबत क्या है तुम्हें
- 15:12पता ही नहीं और प्रश्न पूछने वाला बड़ा समझदार निकला फिर तुम ही बता
- 15:20दो। मांगे तो क्या?
- 15:28उसका दीदार नखरा और दर्शन जब हो जाएंगे तो तुम्हारे सब शिश्य खत्म
- 15:38हो जाएंगे। वही शिश्य की बात कृष्ण भगवान
- 15:41करते हैं अज्ञानस श्रद्धानश। संशय आत्मा बनिस्थिति नायम
- 15:58लोकोवस्ती न परो जिसके भीतर संशय समाप्त नहीं हुआ, वह न इस लोक
- 16:09में, न परलोक में। जहाँ भी।
- 16:15मैं सुखम शिश्यावन हाँ शंशाह आत्मा को कभी सुख नहीं प्राप्त और
- 16:22तुम रोज़ सवाल करते हो बाबा मैं दुखी चिल्लाते हो, रोते हो कष्ट
- 16:29में? सर, मैं जानता हूँ तुम कहते हो,
- 16:35मैं दुखी। और कृष्ण?
- 16:39कहते हैं कि सिहं स्यात्मा वनस्थिति श् स्यात्मा व्यक्ति को
- 16:43नायम लोको न परो न इस लोक में, न परलोक में कहीं भी चयन नहीं, कहीं
- 16:50चले जाओ। पहाड़ों वाली के पास ले जाओ, जो
- 16:55पहाड़ों में रहते हैं वो दुखी है, दुखी है अगर पहाड़ों वाली के पास
- 17:01सुख होता तो फिर वहाँ जाके तुम सूखी रह जाते अगर अमरनाथ में सुख
- 17:11होता। धाम में सुख होता तो वहाँ जाके
- 17:13तुम सुखी न हो जाते वहाँ पंडले हर वक्त बैठे रहते तुम कितने कितने
- 17:20धामों में जाते हो, बद्रीनाथ, केदारनाथ, सालासर तुम्हारा दुख
- 17:28मिटा। तुम्हारा दुख बेटा तो फिर इसका
- 17:36मतलब वहाँ दर्शन और बाबा का एक शब्द पर ले बांध लेना दर्शन के
- 17:46बिना सुख नहीं? दर्शन के बिना पीड़ा और अभाव मन
- 17:57का संसे उतरेगा कप संसे विहीन मुझे कैसे जिसके कृष्ण भगवान बात
- 18:03करते हैं जीसको कहते हैं कृष्ण? वह सनसेट उतरेगा।
- 18:12कैसे है अगश्य श्रद्धानश्य शमशादनादिनस्थ नायम लोकोवास्त?
- 18:28न पर न सुखम, संचात्मा संशय आत्मा को कहीं भी सुख नहीं कहीं भी
- 18:43न्यायम लोको न इस लोक में न परो न पर।
- 18:51तो फिर परमात्मा से क्या मांगें? वही बाबा कहते हैं कि जब दर्शन
- 19:02होगा तो सिनसर मत होगा। और जब शिष्य समाप्त हुआ तो दुख
- 19:07समाप्त होता शंशय आत्मा को कभी भी सुख नसीब नहीं होता।
- 19:18कृष्ण के चौथिया दाई का 40। और तुम पूछते हो कि हम मांगे तो
- 19:26क्या मांगे? बिलकुल सही जवाब सही प्रश्न आज
- 19:32पूछा है पूछने वाले नहीं, बहुत से व्यक्तियों ने बहुत से स्वाद पूछे
- 19:40परमात्मा है नहीं है, जो कोई सवाल इतना मायने नहीं रखता।
- 19:47किसने बनाया ये सारी, ये सवाल इतना मायने नहीं रखता।
- 19:51कैसे बनाया कहाँ से ले के आया वो पदार्थ बेमानी है।
- 19:56बुद्धि की खुजलाहट है। मूल प्रश्न यही है।
- 20:06कि उसका दर्शन हो। कैसे मांगे, कैसे क्या मांगे?
- 20:12उससे ये रचना तो हम देख रहे हैं और समझ में आ रहा है।
- 20:23इस रचनाकार कोई होगा, एस्टीमेट है कोई तो होगा मूर्ति जो है
- 20:33मूर्तिकार तो होगा और अगर तुम कहते हो की मूर्ति ऊपर से गड़
- 20:39पड़ी। तो भाई एक बार गिर पड़ी, अब दूसरी
- 20:42बार क्यों नहीं गिरते? एक बार गिर गई, दूसरी बार फिर
- 20:50मूर्ति गिरती क्यों नहीं? बस एक ही बार गिरना?
- 21:00सयानी कहते हैं वो परमात्मा लगातार बना रहा है, सृजन कर रहा
- 21:07है, कभी हर्तन कभी थकता नहीं, वह परमात्मा सृजन हरा लगातार बना रहा
- 21:17है। उसने कभी बनावट बंद नहीं की।
- 21:24इतना फैलाव इतना फैलाव, लेकिन फिर भी वो बना रहा है बनाना उसका कर्म
- 21:31नहीं है बनाना उसका आनंद है और आनंद में चीजें बनती चली जाती है।
- 21:40तो सृजना सरसता से होती चली है, यह उसका आनंद है, यह उसका काम
- 21:49नहीं। एक गीतकार पैसे के बदले गाता है
- 21:54या उसका काम है? एक पैसे के बदले भागवत कथा सुनाता
- 21:59है, कहानियों सुनाता है, आपका मन प्रजाता है, ये आपको मूर्ख बनाता
- 22:04है लेकिन पैसे के लिए ये उसका आनंद नहीं है।
- 22:10ये उसका काम है। उसने थोड़े से सिक्के दे दिए।
- 22:16और तुम्हें कहानी सुनाती वही रटी रटाई कहानी जिसमें कुछ भी नहीं और
- 22:25तुम बड़े मज़े से सुनते हो, शौक से सुनते हो लेकिन बाबा नानक कोई
- 22:32पैसा नहीं लेते। किसी नृत्यांगना की तरह मीरा
- 22:38नाचने का पैसा नहीं लेते, किसी गायक की तरह कबीर गाने के पैसे
- 22:47नहीं मांगते, वो तो तुम्हें अगर तुम घर आके सुनते हो उसके तो
- 22:54तुम्हें। भोजन करके भेजें देखो आए हो तो
- 22:59कृपा करना, भोजन करके जाना, प्रभु भोजन करके जाना, मीरा का आनंद है
- 23:15नाचना, पग घुंघरू बांध। मीरा का आनंद है, नाचना कोई काम
- 23:22नहीं, तुम्हारा आनंद नहीं, तुम्हारा काम है और तुम इसलिए इस
- 23:30काम के पैसे ले लेते हो और हम ऐसे बूढ़ हैं।
- 23:38कि ऐसे लोगों को ही परमात्मा का प्रतिनिधित्व हम उनकी ही पूजा
- 23:46करनी शुरू कर देते हैं। यही हमारी बुद्धिहीनता है, यही
- 23:53हमारी मूर्खता है। हमने कभी नहीं पूछा।
- 23:57के उस परमात्मा से क्या मांग है? कितना सुंदर गाते हैं, बाबा कितना
- 24:05सुंदर गाते हैं, कबीर कितना गहरा गाते हैं, कितना रहस्य का वर्णन
- 24:10करते हैं उस परमात्मा का ठीक हम तुमसे लेते।
- 24:17उनका काम नहीं है, कुछ सिक्के ले लेना नहीं, नहीं, उनका आनंद है और
- 24:24जब आनंद में व्यक्ति गाता है तो उसे जो मिलता है वह तुम्हें दाम
- 24:30में नहीं मिलेगा। तुमने कभी देखा तुम अपने स्नान
- 24:36गृह में किसी वक्त स्नान करते वक्त जब पानी सिर पे घराते हो तो
- 24:43तुम अक्समात ही स्वर फूट पड़ते हैं।
- 24:45भीतर से गायन फूटता है, स्वर लहरी उठती है।
- 24:54और वह भीतर से आती है। किसी ने दान दिया तुम्हे?
- 24:58नहीं तो उस वक्त तुमने क्यों गाया?
- 25:02आनंद था गाना तुम्हारा आनंद था और बिना पुरस्कार के जब तुम गाते हो।
- 25:12वह आनंददाय का गीत बड़ा मधुर होता है,
- 25:26यही गाते थे। तानसेन और अकबर ने पूछा तुम्हारे
- 25:32गुरु को है तुम इतना मधुर गाते हो?
- 25:36तो अवश्य ही तुम्हारे गुरु बहुत मधुर बातें होंगे।
- 25:41उसने कहा गाते तो बहुत है, मेरे गुरु जो हुए है तो अकबर ने कहा
- 25:48मैं सुनना चाहता हूँ तो तान से नास पड़ा।
- 25:55वो मेरी तरह बिकवाल नहीं बिकाऊ नहीं मुझे दाम देके तुम सुन लेते
- 26:04हो ऐसे हरिदास दाम देके नहीं सुना जा सकेगा वह तो जब गायेगा।
- 26:13तो स्वर लहरी भीतर से फूटे की नानक की तरह गाएगा।
- 26:18हरिदास पहुँच रहे थे, वह पहुंचा हुआ इंसान तानसेन के नसीब में था।
- 26:32हम उसे मुँह मांगा दान दे देंगे, तो तानसेन बोले उनको दान की कोई
- 26:38जरूरत नहीं, वो तो जब गाएंगे, अपने आनंद से गाएंगे और पता नहीं
- 26:45कब गाएंगे तो फिर फिर इसके लिए इंतजार करना।
- 26:53उसकी झोपड़ी के आसपास बैठे रहे। कहीं कोई स्वर संगीत लहरी उठी 1
- 27:01दिन सहसाही अर्ध रात्रि में रात गूंज उठा भीतर से।
- 27:09और अतवर संत के मदवृक्ष हो गया हैं।
- 27:17ये तुम्हारे गुरुकार हैं। तानसेन कहते कहने के तो मेरे गुरु
- 27:22भी कार हैं लेकिन गाता तो वह अनंत है गुरु के भीतर से।
- 27:29इस ढांचे इस मुखौटे के भीतर से गा रहा है।
- 27:33वह सृजन करता वह सृष्टता बस इसलिए मैं कहता हूँ कि वह बिकाऊ माल
- 27:43नहीं, मेरी तरह है, तानसेन बिक जाता है।
- 27:48हरिदास विकता ने? वह तो परमात्मा गाता है, जब गाता
- 27:54है और उसका संगीत सुन के अकबर निहाल हो गया और उस दिन के बाद
- 28:04कहते हैं हरिदास का गीत सुनने के बाद।
- 28:11अकबर को तानसेन का गीत अच्छा नहीं लगा।
- 28:16जब तानसेन गाता तो उसके भीतर ओह मधुर संगीत वह मधुर आवाज हरिदास
- 28:22की, जो अर्धरात्रि में गूंजी थी। वह सुनाई पढ़ने लग जाती और ततक्षण
- 28:28तानसेन का वह भी फीका लगने लग जाता।
- 28:38क्या माँ के परमात्मा से बुनियाद मांग लेना, फाउंडेशन मांग लेना
- 28:46फाउंडेशन क्या है? ये तू है।
- 28:52बड़ी अजीब सी बात है अजीब है क्योंकि तुम्हारे मार्गदर्शकों ने
- 28:59तुमने ये बताया नहीं, असल में बताना यही चाहिए था, हमसे मत
- 29:06पूछो। सीधा उससे मांगो, लेकिन बिचौलियों
- 29:12को बीच में रिश्वत चाहिए, दलाली चाहिए, बिचौलियों को बीच में
- 29:19कमीशन चाहिए। इसलिए वो कहते हैं कि हम दर्शन
- 29:23करा लेंगे, हम तुम्हारे लिए पूजा प्रतीक्षा करते हैं।
- 29:28यहाँ रूमाला चढ़ा दो, हम कर देंगे फरियाद सिक्का यही रख दो तो हमारी
- 29:37जगह हम कर देंगे फरियाद और फरियाद निकलती है दुखी मन से और इनका मन
- 29:45दुखी नहीं है तुम्हारी तरह। इनका मन दुखी नहीं है।
- 29:49तुम्हारा मन दुखी है। तुम्हारे दुखों के कारण तो फरियाद
- 29:53तुम भलीभाँति कर सकते हो, जो फरियाद तुम कर सकते हो, वह है
- 29:57फरियाद। कोई पाठ ही नहीं कर सकता, कोई
- 30:02रागी नहीं कर सकता। घायल की गति घायल दुखी व्यक्ति ही
- 30:13फरियाद कर सकता है, जिससे गहरे तल से उस तल से तुम फरियाद कर सको।
- 30:18वाठी। गुरु गगन साहब कपाठी है, उस तल से
- 30:26फरियाद न कर सकेगा, क्योंकि वह उस तल से दुखी नहीं, तुम अपने तल से
- 30:33दुखी हो तो तुम्हारे लिए तुम ही फरियाद कर सकोगे।
- 30:40और तुमने पूछा है कि हम मांगे तो परमात्मा से क्या ये है?
- 30:48दुःख मिट जाए, अभाव मिट जाए, कष्ट क्रेश मिट जाए पीड़ाए मिट जाए,
- 30:52रोग मिट जाए संतप मिट जाए ये मांग लें नहीं।
- 30:59जब एक मांगने से सब सर्द जाता है, एक सर्द है, सब सर्द है तो फिर
- 31:05क्यों ना उस एक को साद लिया जाए? वह क्या है?
- 31:12एक का साधना वह एक का साधना है। उसके ऊपर श्रद्धा, उसके ऊपर
- 31:23विश्वास और विश्वास बुद्धि के तल का विश्वास नहीं, श्रद्धा।
- 31:34मन के तल की श्रद्धा नहीं, बुद्धि और मन से पार अस्तित्व की श्रद्धा
- 31:43और कैसे घटेगी? अब देखिए रेण कश्यप कहते हैं छोटे
- 31:50नन्हें प्रहलाद से। के तू नारायण नारायण मत किया कर
- 31:54तू मेरा बच्चा है, मैं ही खुदा हूँ, मैं ही परमात्मा हूँ और हम
- 32:01ब्रह्मस्म तू मेरा जाप कर तू हिरण्यकश्यप का नाम ले पुत्र तू
- 32:06मेरा बेटा है तू नारायण कजाप। बड़ी सुन्दर कहानी अपने भीतर बड़े
- 32:20गहरे रहस्य छुपाए बैठी है ये कहानी छोटा प्रहला।
- 32:29भक्त ऐसे ही नहीं बनता। दर्शन करने के बाद भक्त बनता है।
- 32:37तुम तो पहले भक्त बन जाते यही विडंपना है।
- 32:42जीसको अभी दिखा नहीं, वो उसकी भक्ति करता है, जो दिखा नहीं तो
- 32:50तुम अक्सर ही लोग कह देती हो, ये तो भगत है, भगत हमेशा पैदा होता
- 32:57है दर्शन के बाद। जब संशय उतर जाए, संशय विहीनता की
- 33:05अवस्था में व्यक्ति भक्त बनता है उससे पहले नहीं और तुम भर्ती करना
- 33:11चाहते हो। संशय होते हुए और पापा नानक कहते
- 33:18हैं कि संशय विहीनता से ही। भक्त हुआ जा सकता है।
- 33:25उतर गए हों मेरे मन का संसार। मन का संसा।
- 33:44उतर गए हो मेरे मन का? जब तै दरसन पायो, जब तै दरसन पायो
- 34:11ठाकुर तुम सरनाई। आयो ठाकुर, तुम सरना।
- 34:23ये आए चौथे अध्याय के श्रीमहमद भागवत गीता के चालीसवीं स्लोप का
- 34:30व्रत हैरान इसलिए मैंने कर भी कहा।
- 34:36कि अगर कोई व्यक्ति इस सिर्फ इस सूत्र के एक शब्द को हृदयस्थ कर
- 34:45ले कंठस्थ हृदय के पार उतर जाये और तुम शिनसे आत्मा हो जाओ किसी
- 34:53तरह किसी भी तरह। तो बस तुम्हें कुछ खोजने की जरूरत
- 35:00नहीं पड़ेगी। तुम्हारी सारी भागदौड़, आपाधापी
- 35:07सब खत्म हो जाएगी। तुम बैठ जाओगे, शांति से झील मोहन
- 35:11की तरह कोई तरंग नहीं। तुम शांत हो जाओगे, शीतल, गंभीर
- 35:24आनंद मुदितमन ये सब भागा दाढ़ी। तुम सारे दिन चाहे पैसा कमाते हो,
- 35:38चाहे शेरावाली के दर्शन करते हो, सब भाग दौड़ है, तुम्हारा भीतर
- 35:51कंपन करता है। प्रत्येक कक्षा।
- 35:56तुम्हें चैन से बैठने नहीं देता और ये एक कंपनी ही तुम्हें भगाता
- 36:02है। चलो बाबा के धाम से चलो शंकर के
- 36:09धाम, चलो चलो अमरनाथ की यात्रा। चलो फल देवता के धर्म और ऐसे ऐसे
- 36:16देवता बना रखी है, गधों के ऊपर बैठा रखी है, इन पर शर्म भी नहीं
- 36:26है। इनको खुद कहा जाए कि तुम गधों के
- 36:30ऊपर बैठ जाओ, नहीं बैठो। और माताओं को शीतला माता को गधे
- 36:35के ऊपर बैठा रखा है और बाकी क्या है क्या इससे ज्यादा तो हम
- 36:42बेइज्जत क्या कर सकते है? किसी को चूहे के ऊपर बैठा दे,
- 36:47किसी को उल्लू के ऊपर बैठा। अरे, तुम भर दो दृढ़ संकल्प आता
- 37:00है संशय खत्म होने के बाद तू हैं प्रहलाद इतने दृढ़ संकल्प।
- 37:09तुम बुद्धि से संकल्प करते हो, बड़ा शुद्र संकल्प होता है।
- 37:16पति शुद्र है, उसका संकल्प भी शुद्र होगा।
- 37:21छोटे छोटे संकल्प इसीलिए तो टूट जाते हैं।
- 37:26तुम कहते हो, मैं आज के बाद सिगरेट नहीं पीऊंगा।
- 37:28इतना बड़ा संकल्प है जो सिगरेट नहीं पीते, वो मर जाते है।
- 37:32क्या उनकी कोई दुर्दशा हो जाती है?
- 37:37100 रोग जो लगने थे वो नहीं रखते सिगरेट पीने से।
- 37:44दमकसी नहीं होती फेफड़ा क्राउन निकोटीन जहर तुम्हारे भीतर नहीं
- 37:48जाता भला पीने का लाभ क्या है या धुआँ भीतर बाहर हाँ ये पागलपन
- 37:55नहीं है क्या ये क्यों करते हो तुम्हें खुद पता नहीं।
- 38:02और तुम संकल्प लेते हो कि मैं सिर्फ नहीं दूंगा, मैं शराब नहीं
- 38:06दूंगा, जो तुम्हारे गुर्दे खराब करते हैं, जो अल्कोहल तुम्हारी
- 38:13जगह खराब करती है, तुम्हारे इतने अंग खराब कर देती है, मुख्य अंग
- 38:18को खराब कर देती है, हृदय को खराब कर देती है।
- 38:21जीघर जो तुम्हारी सबसे बड़ी फैक्टरी पर मात मैंने बनाई वह
- 38:25खराब कर देती है और फिर भी तुम शराब पीते हो लेकिन तुम संकल्प
- 38:32लेते हो ठीक है, इसके बाद मैं नहीं पीऊंगा लेकिन दो 4 दिन तक
- 38:36निभते हो फिर फिर वो है। वो ही बाहें, वो ही कुंवारी और
- 38:46तुम इतने छोटे छोटे संकल्प लेते और पूरे नहीं होते क्यों नहीं
- 38:49पूरे होते क्योंकि संकल्प सुद्र खोपड़ी से लिए जाते ये बड़ी छोटी?
- 38:59छोटी है तो संकल्प भी छोटे ही होते है इसलिए टूट जाते है।
- 39:04तुम्हारे चेतन मन से कितना बड़ा वैज्ञानिक कहते है की 10 गुना
- 39:09बड़ा तुम्हारा अचेतन मन है अनकॉन्शियस स्माइल वह कहाँ टिकने
- 39:16देगा तुम्हारे सूत्र संकल्प? और जो व्यक्ति अचेतन मन से संकल्प
- 39:23ले लेता है वह कब टिक पायेगा? तुम्हारे अस्तित्व के संकल्प के
- 39:29सामने ये तीन तरह के संकल्प होते हैं थोड़ा सा इनको भी बीच में
- 39:33लेते चले एक संकल्प जो तुम बुद्धि से लेते हो।
- 39:39पर तो उसे शंकर मैं तो मानता भी नहीं, पर तो पल भर के बाद टूट
- 39:44जाएगी। हमारे जैन मुनि कहते हैं कि एक फल
- 39:47चुन लो जो तुम नहीं खाओगे। तुम कहती हो ठीक है, वैसे भी हम
- 39:51खाते नहीं तब्दू नहीं खाएंगे तब्दू तो वैसे भी कौन खाता है
- 39:56पशुओं का खाना? कोई खाता है?
- 39:59कद्दू कद्दू नहीं खाये जो तुम पहले ही नहीं खाते।
- 40:07ऐसे संकल्प करती है खूब जब वैज्ञानिक कहते हैं कि दसमें
- 40:13हिस्से में से एक हिस्सा चेतन मन का है।
- 40:16और बाकी नौ हिस्से अचेतन मन के लेकिन अचेतन मन भी नौ हिस्से हैं
- 40:22उसकी भी सीमा है खोपड़ी की सीमा। उसके बाद अचेतन मन की सीमा लेकिन
- 40:27उसके पार एक और जीसको हम कहते हैं कलेक्टिव अनकॉन्शियस माइट।
- 40:39और उसके परे एक और है जिसे कहते हैं कलेक्टिव कन्शन्स सामूहिक
- 40:46चेतन पहले चेतन फिर अचेतन फिर सामूहिक अचेतन कलेक्टिव
- 40:56अनकॉन्शियस। और फिर कलेक्टिव कॉन्शस, इसलिए
- 41:02मैं कहता हूँ कि तुम्हारा शरीर और तुम्हारा मन एक पूरे यूनिवर्स एक
- 41:09शरीर की भती है। अगर यहाँ कोई भी चीज़ दर्द होती
- 41:14है तो उसका प्रभाव। समस्त विश्व के अस्तित्व के ऊपर
- 41:19पड़ता है। कहीं किसी मुर्गे की गर्दन मरोड़ी
- 41:22जा रही है, उसके दुख की पीड़ा तुम्हें भी होती है पता नहीं लगता
- 41:30बात रखें। कहीं कोई पेड़ काटा जा सकता है
- 41:37जाता है तो उसका दर्द, उसकी चिल्लाहट वह बोल नहीं सकता।
- 41:45लेकिन जो पेड़ काटा गया वह तुम्हें श्राप ही देके जाएगा और
- 41:50आज पेड़ जो तुम काट रहे हो वह तुम्हें श्रापित कर जाते हैं।
- 41:55इसलिए आज तू मर रहा है, ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है, ये पेड़ भी
- 42:02जानदार है। ठीक उसके हाथ पांव नहीं है, वो चल
- 42:06नहीं सकता। मैं बोल नहीं सकता लेकिन उसमें
- 42:10जीवन है। वह दुख तो दर्द तो मानता ही है।
- 42:17जब तुम आरी चलाते हो तो दर्द तो उसे होता है और वह अस्तित्व का
- 42:23अभिन्न अंग है और मैंने कहा अस्तित्व का कोई भी अंग दुखेगा तो
- 42:28सारे अस्तित्व को प्रभावित करेगा और तुम भी अस्तित्व के एक अंग हो।
- 42:36आज दुनिया कहती है कि हम दुखी है, हमें चैन नहीं, सुख नहीं, ठहराव
- 42:44नहीं। उसमें ये सब कारण कहीं मुर्गा कट
- 42:49रहा है। कहीं कुर्बानी के नाम के ऊपर बकरे
- 42:53कट रहे हैं। स्वाद खुदने लेना होता है, बनाते
- 42:59हैं ये लोग बकरीद खैर बकरे की माँ मनाएगी।
- 43:10अय्याशी ये करेंगे और मैंने कहा अगर एक भी जगह किसी अस्तित्व को
- 43:18दुख पहुंचता है, दर्द पहुंचता है, सारा अस्तित्व प्रभावित होता है,
- 43:23तुम्हें पता नहीं चलता कि तुम बहुत ऊंचे ऊंचे तलों पर विराजमान
- 43:29हो। लेकिन जो गहरे गए अस्तित्व में तो
- 43:33गहरे में पता चलता है कि कहाँ से आवाज आई, दर्द की कहाँ से
- 43:38चिल्लाहट की चीख उठी कहाँ कौन चीखा, कहाँ किसकी गर्दन पर उड़ी
- 43:48गई। और तुम तो कल में पढ़ पढ़ के
- 43:50तड़पा चड़पा के मारते हो और लिख देते हो आला तुम्हें ना दर्द होता
- 43:59है ना शरमाती है तुम दुष्ट हो कहलाते हो अपने आपको भक्त।
- 44:14हो तुम दुष्ट प्राणियों के जीवन को छीन लेना, तुमको ये अधिकार
- 44:24दिया किसने? तुम जीवन दे नहीं सकते, किसी को
- 44:28तो छीनने का भी अधिकार नहीं। ना थपेड़ों को काटने का अधिकार
- 44:33तुम्हें है ना? बकरों और मुर्गों और प्राणियों को
- 44:38काटने का अधिकार तुम्हें है। मनुष्यता ने एक कानून बना दिया
- 44:43मनुष्य को मारोगे तो सजा होगी, लेकिन यह कानून भी बनना चाहिए था
- 44:49कि अगर पुष्पों को मारोगे तो सजा होगी।
- 44:52और ज्यादा सजा होती है। विषय हरामी हो गया है।
- 45:04लेकिन ये सारी चीजें कब पैदा होती है?
- 45:10हमारे आचार और हमारे सद्गुरु समझाते हैं।
- 45:14मत काटो, वो ये नहीं कहते की इस अज्ञान को मिटा दो, इस संशय को
- 45:27मिटा दो, इतना तो बेचारे खुद ही नहीं जानते तुम्हें क्या पता?
- 45:34अद्यश्य श्रद्धानश्य संशय आत्मावनिश्ति वह संशय यह शब्द को
- 45:43खुद ही नहीं जानते जो कि बेस बेस के ऊपर है, जो गहरी।
- 45:49रूट्स में समाया हुआ है जो गहरे चलो बेआसी वो कहेंगे ये बंद कर दो
- 45:57लेकिन फिर भी अच्छा है जो भी कहते है शुभ कहते है कि चलो।
- 46:07वीडियो को नहीं काटोगे तो ग्लोबल वार्मिंग से बच जाओगे और इसके
- 46:11अतिरिक्त भरपूर ऑक्सीजन होगी और तुम्हें जीवन में सहायता मिलेंगे।
- 46:17तुम ज्यादा सवस्थ जीवन जीओगे सवस्थ जीवन एक प्रकार से सुखी
- 46:24जीवन भी होता है। एक प्रकार से कहता हूँ आएगा कैसे
- 46:37है? भक्त दर्शन से पहले भक्त नहीं
- 46:42होता, दर्शन करने के बाद व्यक्ति भक्त पैदा हो जाता है।
- 46:52तो वीरेंद्र कश्यप कहते हैं पर हिलास है कि बेटा मैं तेरा पा तू
- 47:00नारायण का नाम मत झप तुने नारायण को देखा?
- 47:05वो कहता हाँ देखा अरे कहाँ देखा बेटा?
- 47:10इतनी छोटी सी उम्र में तुने नारायण कहाँ देख लिया?
- 47:15लेकिन प्रहलाद कहता है मुझे सौगंध डाल दो पिता श्री मैंने नारायण
- 47:20देखें सच बोलता है बच्चा कोमल घरदा है, बाल घरदा है, सुलभ है,
- 47:28सहज है सर। वो कहता है, मैंने देखा है और
- 47:34प्रहलाद ने देखा है अन्यथा इतना छोटा बच्चा इतना बड़ा संकल्प कैसे
- 47:39कर सकता है? पहाड़ों की चोटियों से कराया जाता
- 47:42है, लेकिन वह थाम लेता है उसे वह जिसने सर्जना की।
- 47:53वह जिसने दर्शन दिए और दर्शन देते ही तुम्हारी सारी शंशा समाप्त हो
- 48:00जाती है। उतर गए हो मेरे मन का संसार जब
- 48:20तेरा दर सन पायो। पुत्र गयो मेरे मन का संत अभी तुम
- 48:31कुछ भी कर लो पाठ कर लो पूजा कर लो पहाड़ों पे शीरों वाले के
- 48:35दर्शन कराओ, पहाड़ों वाले के दर्शन कराओ, धामों में चले जाओ,
- 48:41गंगासागर का स्नान कर लो। सभी तीर्थों का स्नान कर लो, हज
- 48:46बन जाओ, हज कर रहे हो, मक्का जाओ, मदीना जाओ, कहीं जाओ, किसी तीर्थ
- 48:52स्थल पर जाओ, लेकिन जब तक तुम्हारा सनसनी नहीं गया ये बेसिक
- 49:02तीर्थ। तब तक तुम अज्ञानी और तुम्हारा
- 49:13विनाश होगा। बड़ा सुन्दर बोलते हैं, थोड़े से
- 49:19लफ्जों में कृष्ण। अज्ञा श्रद्धानश क्षण से
- 49:25आत्माभिनिश्चित जब तक शिनसे नहीं उतरता तब तक विश्वास नहीं होता और
- 49:38ये लोग कहते हैं विश्वास करो, कैसे करें, झूठा हो?
- 49:43कैसे करें भाई? बिना दर्शन के विश्वास कैसे करें?
- 49:50विश्वास तो आता है, दर्शन के उपरांत आता है श्रद्धा तो आती है,
- 49:57श्रद्धा कैसे करें और ये खुद गुरू श्रद्धा किये बैठे।
- 50:03लेकिन इनका संशय विलुप्त नहीं हुआ।
- 50:07वो ही कृष्ण समझाना चाहते है और गीता को पढ़ पढ़ के इन्होंने गीता
- 50:14का निचोड़ निकाल दिया, लेकिन मूल चीज़ को समझ नहीं पाए।
- 50:21अज्ञानी के अज्ञानी रहे का गप बढ़ाए वो पिच रो पड़ गया चारों बे
- 50:26समझाए समझा नहीं रे वो डेड के डैडी दादी को रंग लिया पीलिया कर
- 50:36लिया यहाँ पर पीला कर लिया क्या हो गया उससे?
- 50:40ये मेकअप ही तो है अरे ब्यूटी पार्लर की दुकान पे किया कि तुमने
- 50:46घर बैठकर पीला चिंतन किया। ये बातचीत एक ही है, कोई फर्क
- 50:52नहीं पड़ता काहे करते कारण क्या है ये समझा नहीं पाया।
- 51:02कह देंगे शांति मिलती है, इसका मतलब शांति नहीं है।
- 51:07अगर चंदन लगाने से शांति मिलती है तो इसका मतलब तुम्हारे भीतर शांति
- 51:12थी नहीं, चंदन लगा के ही शांति मिली तो फिर तुमने शांति का अर्थ
- 51:18जाना ही। शांति तो भीतर से आती है बाहर
- 51:22चन्दन लगाने से शांति नहीं होती, नहीं तो बाहर पट्टी करने के लेकिन
- 51:32मैं तुमसे कहता हूँ की तुम चोट विमुक्त हो जाओ ताकि पट्टी की
- 51:37जरूरत ही ना पड़े। अशांति नहीं होगी तो पीला चिंतन
- 51:46लगाने की जरूरत क्या है? श्वेत चिंतन लगाने की जरूरत क्या
- 51:50है? त्रिपंड सजाने की जरूरत क्या है,
- 51:54यह तो मेकअप है। यह तो ब्यूटी पर वाले ज्यादा
- 51:57मजेदार ढंग से कर सकते हैं। उनका पेशा है धंधा और पीली दाढ़ी।
- 52:04रंगों के लाल रंगों के काली रंगों।
- 52:09कबीर ने तो कभी नहीं रंगी मीरा ने तो कभी नहीं रंगी।
- 52:17वह तो कोई और ही रंग रंग लेते हैं।
- 52:22तुम चंदन का रंग, रंग ते हो और कबीर कोई और रंग रंग लेते हैं
- 52:29लाली मेरे लाल की। चित देखूं तित लाल लाली खोजन में
- 52:42गई मैं भी हो गई लाल वो तो इस लाली को लगाते हैं तुम्हारे चंदन
- 52:51के दिखावे की लाली को नहीं लगाते ब्यूटी पार्लर वाले।
- 52:58तुम अगर लगाते हो तो इसका अर्थ कुछ और है गड़बड़ है कुछ भीतर से
- 53:03लाली आती नहीं, भीतर से ये रंग झलक ताने जो तुम लगा के दिखाना
- 53:12चाहते हो। ये मरम पट्टी कोई घाव होगा भीतर
- 53:19अवश्य ही तभी तो लगाई पट्टी अन्यथा पट्टी लगाने की जरूरत क्या
- 53:23थी तो हिरण्य कश्यप कहते है पुत्र मेरा नाम लिया करो।
- 53:34सत्यन है नहीं नहीं, तुम भगवान नहीं हो, मैंने नारायण को देखा और
- 53:43कौन पिता चाहेगा के पुत्र मैं भगवान हूँ मेरा पुत्र मेरा नाम ना
- 53:48लगे किसी और का नाम नहीं। पहाड़ों से घराया जाता है।
- 53:54हाथियों के नीचे कुचलवाने की चेष्ठा की जाती है।
- 53:58आग के भीतर जलाने की चेष्ठाएं की जाती हैं।
- 54:01लेकिन ये कहानी है इस बात का ध्यान रखना।
- 54:04इस कहानी के भीतर बहुत से गहरे रहस्य छिपे पड़े।
- 54:13बस सबसे बड़ा रहस्य यही है जिसके भीतर का संशय मिट गया।
- 54:23इस एक संशय को मिटा दो राम राम राधे राधे करने की जरूरत नहीं।
- 54:28जितनी शक्ति तुम राम राम राधे राधे करने में लगाते हो शास्त्र
- 54:32पढ़ने में लगाते हो मैं कहता हूँ कुएं में फेंकता हूँ आग लगा दो
- 54:40तुम इस संशय को मिटाने के राह पर चल।
- 54:46जीस दिन संशय मिट गया उस दिन होली मना लेना वो है तुम्हारी असली
- 54:52होली उस दिन दीप जला लेना उस दिन वो है तुम्हारी सही दिवाली, अभी
- 55:01तो बहुत अँधेरा है, अभी दिवाली कहाँ?
- 55:07सनसे के होते हुए दिवाली कहाँ? चिराग दिल के जलाओ।
- 55:26बहुत अँधेरा है, चिराग दिल के जलाओ, बहुत अँधेरा है।
- 55:48बहुत अँधेरा है। जब तक संशय नहीं मिटता चिराग
- 55:55जरालों को संशय को मिटा दो संसयात्मा विनिश्चित।
- 56:07जब दिन संशय मिटेगा उस दिन होली रंग खेल लेना खूब मन भर के जीस
- 56:13दिन संशय मिट जाए वही धवली दीप जगा लेना।
- 56:18मन भर के ऐसे दीयों की गिनती करते।
- 56:23तुम दीपक कितने ही जलाते जाओ, दीपावली तो कभी नहीं मानेंगे,
- 56:27तुम्हारे हृदय का कोना तो अँधेरा पड़ा है।
- 56:31चिराग दिल के। जलाओ दिल के चला चलाओ।
- 56:42अँधेरा है। और बहुत प्रकार के उपद्रव किए गए,
- 56:52उत्पाद दिए गए, कष्ट दिए गए। बालक को प्रहलाद लेकिन भगवान
- 57:02प्रकट हो रहे हैं। किसी को नहीं दिखे।
- 57:05भगवान जलते हुए खम्भे के ऊपर नरसिंहा अवतार में चलती हुई एक
- 57:15केढ़ी नजर आई। भक्त प्रहलाद को देखती है, तुमको
- 57:26नहीं देखती इसलिए भक्त प्रहलाद के दिल के अंधेरे में जाते हैं, उसका
- 57:32संशय समाप्त हो जाता है। वह बड़ी दृढ़ता से कह सकता है।
- 57:36पिताजी नहीं तुम नारायण नहीं हो, नारायण तो कोई और है, मैंने देखे
- 57:41हैं नारायण। क्षण से मिट गया वो चाहे बालक हो,
- 57:54चाहे वृद्ध हो, चाहे ब्रो चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष, उसी दिन
- 58:01दीपावली, उसी दिन होली, उससे पहले कोई दीपावली, उससे पहले तुम्हारे
- 58:07सब रंग फीके तुम्हारे सब जश्न। घटिया नकल ड्रामा खेलो कौन रोकता
- 58:17है सब दीपावलियां झूठी? जीस दिन चिराग रोशन होगा भीतर।
- 58:31उसी दिन दीपावली मनेगी। उससे पहले दीपावली नहीं मांगती।
- 58:37होती ही नहीं तुम मनाये जाओ पूछा है क्या मांगे परमात्मा से?
- 58:48परमात्मा से मांग लो, देख कुछ ऐसा करो तुमने बहुत ही चमत्कार किए
- 58:54हैं, कुछ ऐसा करो जिससे मेरे मन का संदेह मिट जाए।
- 59:01उतर गए हो? मेरे मन का संसा मन का संसा जब
- 59:26तेरा दरू संपाद। दर्शन के बिना नहीं, दर्शन के
- 59:34बिना नहीं मिटे का संस्कार और शंख आत्मा बनुश्यति।
- 59:43और जैसे ही तुम्हारा संशय समाप्त हुआ, तुम्हें कहीं जाने की जरूरत
- 59:49नहीं। तुम जहाँ बैठे हो वह शांत हो,
- 59:54वहाँ आनंदित हो मनोरमस्त हुआ। फिर मांगने को बचा ही क्या?
- 1:00:07जब मन मस्त हो गया फिर मांगने को कुछ नहीं बचता और मन मस्त कब होता
- 1:00:13है? जब संसार उतर गया यह संसार की
- 1:00:16काल्ख मिट गई। मांगो बिल्कुल मांगो।
- 1:00:22वह देवनहार है, तुम मांगनहार हो, उससे मांगो, बस एक चीज़ मांगो,
- 1:00:30तुम गलत चीजें मानते हो, तुम एक चीज़ मांग लो, बस सब सध जाएगा।
- 1:00:37तुम मांग लो, तेरे ही दर्शन दे देखो।
- 1:00:44मेरी आँखों से झरझर आंसू बैठने लग जाये, सावन की तरह ऐसा कुछ करो या
- 1:00:56तेरे दर्शन कुछ? मेरे सब संस मट जाए और जैसे ही
- 1:01:02संस मट गए उसके लक्षण हैं, तुम में ठहराव आ जाएगा, झील की तरह
- 1:01:11ठहर जाओगे, तुम तुम्हारी सारी उमंगें, तुम्हारी सारी तरंगें।
- 1:01:18तुम्हारे सारी मांगें समाप्त हो जाए और तुम निरो उद्देश्य, कोई
- 1:01:28उद्देश्य बाकी ना बसे सहज अपने में ही ली उस अमृत का नृत्य,
- 1:01:36नृत्य, नृत्य। पान करते रहोगे जो बड़ा सीधा है,
- 1:01:41हीरा पाया गांठ गट गया उसके स्वाद का वर्णन नहीं किया जा सकता, उस
- 1:01:49अमृत को पी लो, अपने में ही मगन हो जाओ।
- 1:01:56उस रस का आश्वासन करते है ना कछु लेना, ना कछु लेना।
- 1:02:07कबीरा मगन। न कछु लेना, न कछु ले ना।
- 1:02:34न कछु दे न कबीरा मग्न मग्न कबीरी।
- 1:02:49में। मन लाग्यो मेरो राम लाग्यो मेरो
- 1:02:59यार, फकीरी मैं। फकीरी।
- 1:03:10मैं। मंडुला में रोना धन्यवाद।