Latest / Baba ji Vijay Vats / 6 Jan 25 - ध्यान के महासूत्र : जीवन बदलने वाले गहरे सूत्र! ओशो की सबसे बड़ी भूल? चौंकाने वाला रहस्य!
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- 0:22आपकी बेटी का लालच हम अपनी हार स्वीकार करते हैं, हम किसी लायक
- 0:33नहीं। ईश्वर ही जाने हमें क्यों बनाया,
- 0:45कृपया गुस्सा मत होइएगा, माँ नहीं है मेरी तो आपसे।
- 0:57सब कह देते हैं, क्षमा प्रार्थी हैं, हमें ब्लॉक मत कीजिएगा।
- 1:13इस दुनिया में हम कहीं फिट नहीं बैठते, मिस फिट हैं।
- 1:21भले ही आप हमें चोर बगोडा कुछ भी कहो, लेकिन हमें किसी भी तरह की
- 1:30कोई लड़ाई या युद्ध नहीं करना है। इस दुनिया में किसी चीज़ से किसी
- 1:42चीज़ के लिए हम अपने आप को योग्य नहीं मानते हैं।
- 1:54ये आलस है या हार का स्वाद? या माँ के मरने का सत्य अवलोकन
- 2:07हमें नहीं पता पर हमें ऑफिस में घुटन महसूस होती है।
- 2:19मेरा मन नाटक नौटंकी में नहीं लगता हमें लोगों से और उनकी फालतू
- 2:29बातों से तथा दुनिया और दुनियादारी से।
- 2:35घुटन पैदा होती है। हम अपने घर में शांति से जीवन
- 2:43बिताना चाहते हैं लेकिन कायरता अवश्य बिता नहीं पाते।
- 3:06कभी कभी ख्याल आता है कि मर जाए। आपकी वाणी हमें सुकून देते हैं।
- 3:26कुछ भी अच्छा नहीं लगता, लेकिन हम जिंदगी के एरिया में फैल हो चूके
- 3:34हैं। बहुत बेइज्जित हो चूके हैं सब समझ
- 3:40लिया। अब दुनियादारी और दुनिया में
- 3:48फंसना नहीं चाहते। बस वही करना चाहती हैं जिससे
- 3:54सुकून और शांति मिले। आप से मिलकर जिंदगी को एक सहारा
- 4:01मिला, आपकी बेटी दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ख है।
- 4:13बाबा जी बड़े बड़े सपने देखती है और मुँह के बल गिरती है।
- 4:27हमारी कोई औकात नहीं है, हम ख्याली पुलाव बना लेते हैं, मरना
- 4:46चाहते हैं आपकी बिटिया। ये बात कोई हैरानगी की नहीं है।
- 5:06बहुत अच्छी तरह से मैं जानता हूँ कि ऐसे ख्यालात ऐसा कोई व्यक्ति
- 5:17नहीं होगा। जिसने कभी जीवन में हार न मानी हो
- 5:25और सुसाइड कमिट करने की इच्छा न की हो।
- 5:30सैकड़ों जिससे कहते हैं कि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसने अपनी
- 5:35ज़िन्दगी में। दो चार बार मर जाने की बात न सोच
- 5:41रहा हूँ क्यों होता है ऐसा? व्यक्ति जीना चाहता है लेकिन फिर।
- 5:56मरने की इच्छा क्यों हावी हो जाती है और कुछ लोग तो मर ही जाते हैं।
- 6:08क्या है कारण? आइए आज हम इस वृहद प्रसंग में
- 6:16गहरे उतरेंगे। उठ जारे पंछ के अब ये देश हुआ
- 6:34बेगाना। चल पोड जारे पंछी के, अब ये देश
- 6:48हुआ बेगाना, चल पोड जारे। पंछे खत्म हुए दिन उस डाली के जीस
- 7:14पर तेरा बसेरा था खत्म हुए दिन उस डाली के जीस पर तेरा बसेरा था।
- 7:34आज यहाँ और कल है, वहाँ ये जो की वाला पेरा था।
- 7:48ये तेरी ये तेरी जा गिर नहीं थी छार घड़ी का।
- 8:07ले रहा था, आजा रहा है इस दुनिया में किसका आबोदाना?
- 8:25चल उड़े जा रे पंच के अब ये देश हुआ वे खाना चल पुड़े जा रे।
- 8:55वैसे भी इतनी जल्दी मरने की क्या है?
- 9:04मौ। तो कुदरत ही तुम्हें दे देती है
- 9:10इतना अध्याय क्यों है, लेकिन मैं जानता हूँ एक छोटे से जीवन में।
- 9:24इतना छोटा जीवन में कि तुम ठीक से नहा खा भी नहीं पाते, खेल कूद
- 9:35नहीं पाते, बचपन था खेलने कूदने के लिए कहाँ खेले।
- 9:46जवानी थी मस्ती मनाने के लिए कहाँ मनाई फ्रॉड अवस्था थी एकांत में
- 9:58गुजारने क्या है? कहाँ गुजार गया है?
- 10:09और वृद्धावस्था थी शांति और सुखद से आनंदमय बग्न प्रभु के स्मरण के
- 10:20खुद को यहाँ करने के। क्या हुआ है?
- 10:27मानवता को कुछ नहीं हुआ। तुम मरना चाहते हो और तुम अकेले
- 10:37व्यक्ति नहीं हो। आज मेरे पास 100 से ज्यादा ऐसे
- 10:42कमेंट। जो मरना चाहते हैं बाबा हम मरना
- 10:48चाहते हैं, जैसे मेरी परमिशन के लिए रुके हो।
- 11:03मरना क्यों चाहते हैं? शायद तुम ठीक से जानते नहीं।
- 11:16ऐसा अमूल्य जीवन, ऐसा शानदार जीवन ये बताओ।
- 11:30अगर मर गए तो फिर जिंदा हो पाने की क्षमता है तुम तो फिर मर जाओ,
- 11:44जो सास चला गया और तुम मृत हो गया।
- 11:50उसके बाद तुम अपनी इच्छा से मर तो गए, लेकिन अपनी इच्छा से अगर जीना
- 11:56चाहोगे बाद में गलती हो गई भाई ये तो मिस अंडरस्टैंडिंग हो गई थी मर
- 12:04गए क्या जीप आओगे? अपनी इच्छा से जो व्यक्ति जी सकता
- 12:09है उसे मरने का अधिकार है, लेकिन मैं जानता हूँ कि लोग क्यों मरते
- 12:18हैं? अपेक्षाएं घनी।
- 12:29अपेक्षाओं से भरा भरा चित और ज़िन्दगी उन अपेक्षाओं को पूरा
- 12:36नहीं करते हैं। तुम 00 से रह जाते हो।
- 12:48तो फिर अपने आपको हारा गिरा थका मादा पेसहारा टूटा, टूटा सा महसूस
- 12:57करता? वह स्थान होता है जब तुम चाहते हो
- 13:08की इससे अच्छा मर जाए सोचा था सूरज को छू लूँगा।
- 13:22तारों को छू लूँगा, तारों को तोड़कर धरा पे ले आऊंगा, ऐसा हुआ
- 13:30नहीं, और बटिया ऐसा होता भी नहीं। ये कारण है मरने के ख्यालात आने
- 13:46का तुम्हारी अपेक्षाएं बड़ी घनी जवानी की उम्र है।
- 13:57न जाने क्या क्या सोचा होगा। वक्त ने पूरा नहीं होने दिया।
- 14:08जो चाहा था वो सर्कमस्टैंसेस ने पूरा नहीं किया।
- 14:20वक्त ने किया क्या हसीं से तुम? तुम रहे न तुम हम रहे न हम।
- 14:39वक्त ने किया क्या? क्या क्या हसीं सीतम हम रहे ना हम
- 14:51तुम रहे ना तुम। वक्त ने किया।
- 15:04तुम्हारी अपेक्षाएं धनी हैं। तुम आसमान में बड़ा ऊंचा उठना
- 15:09चाहती हो और तुम्हारे पास जो साधन है वो इसका इजाजत नहीं देते, यही
- 15:22मरने का कारण है तो ज़रा। संतों के जीवन के तरफ भीख रख लो।
- 15:34कबीर के पास एक झुग्गी झोपड़ी पर वो ऐसी मस्ती से गीत गाता है।
- 15:46कि तुम्हारे राजा महाराजा की शान शोक फीकी हो जाती है।
- 15:56अकबर नहीं समझ पाता कि स्तंभू के तरह, मेरे कुचैले फटे हुए वस्त्र
- 16:06पहनकर कोई व्यक्ति नाच भी सकता है।
- 16:12और अकबर शहाना पोशाकों के अंदर भी दुखी है।
- 16:17हाँ, तुम्हें जीवन का सिलिका नहीं आया और संत तुम्हें जीने का
- 16:28सिलिका सीखाता है। संतों से सीख लो कैसे जिया जाता
- 16:35है? संतों की बातों में तुम्हें जीने
- 16:44का तरीका मिल जाएगा, शास्त्रों में नहीं मिलेगा।
- 16:52तुम ज़िन्दगी को जीने के तरीके शास्त्रों में खंगालते हो।
- 16:56मुर्दा शास्त्र तुम्हें कभी ज़िन्दगी की बात नहीं बता सकेंगे।
- 17:00वो मृदा है न बोल सकते हैं, न खा सकते हैं, न सांस लेते हैं, न दिल
- 17:05धड़कता है उनका। जीवंत गुरु से पूछो और उस गुरु से
- 17:14पूछो जो भीड़ में नहीं बैठा, जो एकांत में निकल गया है और खूब
- 17:27मस्त है, प्रसन्न है हरि गीत गाता है।
- 17:34यह मीरा की तरह अग्नि वरहा अग्नि में धधकती हुई अग्नि की ज्वाला से
- 17:46निकले हुए वो गीत। तुम्हारा कोई भी तराना उसके सामने
- 17:54फीका पड़ जाएगा। और मेरा कभी मरते ना हाँ न कह गए।
- 18:12आज हो न आए ली न हिमरी खबरिया। मोहे भूल गए, सांवरिया भूल गए
- 18:42सांवरिया। दिल को दिए क्यों लुक बिरहा के
- 19:04तोड़ दिया क्यों? महल बना के दिल को दिए क्यों दुख
- 19:22बिरहा के। तोड़ दिया।
- 19:30क्यों महल बना के आस दिला के ओह बेधर दे।
- 19:51आस दिला के ओबे दर दी। फिर लिखा है नजरिया।
- 20:08फिर लिखा है नजरिया मोह भूल गए सागर यह भूल गए।
- 20:39बस नहीं जाता है। इच्छाएं ज्यादा हैं तो रुलाई हैं
- 20:51तुम जो रो रही हो उतरे तो कहीं न कहीं हृदय के भीतर अवचेतन मन में
- 21:03घनी इच्छाएं भरी पड़ी हैं। तुम आसमान पे उड़ना चाहती हो और
- 21:11पर तुम्हारे पास है पंखों के बगैर आसमान नपेगा कैसे।
- 21:28इच्छाएं बहुत हैं तो रो लायी हैं, रोना ही पड़ेगा, इच्छाएं कम हैं,
- 21:37शहनशायी हैं, थोड़ी इच्छाओं को कम कर रहा हूँ।
- 21:47ज्यादा इच्छाएं रखने वाला व्यक्ति अपने अचेतन मन को भरने वाला
- 21:51व्यक्ति और रुलाई ही उसके हाथ लगती है।
- 21:59इसमें ना भगवान का कसूर है? ना सर्कमस्टैंसेस का कसूर है ना
- 22:06दुनिया का कसूर है? भगवान ने तो कबीर को भी बनाया है।
- 22:14भगवान ने तो नानक को भी बनाया है लेकिन वो तो ऐसी मस्ती में गीत
- 22:20गुनगुना रहे हैं। वो तो नहीं कहते तुने मुझे क्यों
- 22:23बनाया? वो तो ऐसे ही पीते हैं कुमारी में
- 22:32झूम जाते हैं और कहते हैं थोड़ी सी और पीला दें और ज़रा सी दे दे
- 22:40सा की। और ज़रा सी और और ज़रा सी दे जैसा
- 22:48की और ज़रा सी और कैसे रहूं चुपके मैंने पी ही क्या है?
- 22:59होश भी तक है बाकी और ज़रा सी दे दे सा की और ज़रा सी और उन्होंने
- 23:10कोई ऐसा प्रेम रस पे लिया है और ये प्रेम रस बाहर से नहीं आया।
- 23:19और ये प्रेम व्रश किसी ने गिफ्ट नहीं किया।
- 23:26कबीर भी उसी भगवान ने बनाया है जिससे तुम कहती हो कि भगवान ने
- 23:30हमें क्यों बनाया। नानक भी उसी भगवान ने अपनाया।
- 23:42ऐसी शानदार कलिकृतियाँ और तुम बेटी कहती हो कि जीने का कोई अर्थ
- 23:49नहीं, अर्थ तो बहुत है, अगर मरना ही है।
- 23:56तो मरने का भी तरीका होता है। पुत्री मरने का तरीका भी सीख लो,
- 24:03वो भी है मेरे पास। मैं जीने का ही तरीका नहीं सीखाता
- 24:10मैं मरने का भी तरीका सीखाता हूँ। वो सीखना वो सीख लो ये सीखना ये
- 24:18सीख लो मरो मरो है जोगी मरो मरो मरण है मीठा।
- 24:35ऐसे ही मरने मरो। अब मरनी भी कई तरह की होती है।
- 24:41अब मेरे पास परसों है, किसी का नौजवान का फ़ोन आया।
- 24:463035 वर्ष की उम्र है बाबा। आई एम गोइंग टु कमिट सुसाइड छः
- 24:57सात बार फ़ोन आया इतनी बार फ़ोन अक्सर आया नहीं करते हैं।
- 25:12तो जब इतनी बार फ़ोन आया तो मैंने उठाया।
- 25:14कई बार कुछ मायूसी भी हो सकती है। कोई ज़िन्दगी के ऊपर आफत भी आई हो
- 25:29सकती है। तो मैंने उठा लिया।
- 25:34उसने कहा बाबा बस हार गया, जिंदगी से आई ऍम गोइंग टु कमिट सो सैट
- 25:47मैंने कहा वो तू कर लो बेटा कोई बात नहीं।
- 25:50तुम्हारी ज़िन्दगी है लेकिन सुसाइड तो न ही हुआ है जिसे तुम
- 25:58सुसाइड कहते हो दट। इस मर्डर नॉट सुसाइड, तुम तो
- 26:05हत्या का पाप मोर लेने चले जाओ। इसलिए आत्महत्या को पाप कहा।
- 26:10हमारे शास्त्रों में क्यों? क्योंकि दट इस मर्डर शरीर तुम हो
- 26:16नहीं और शरीर तुम्हारा सच्चा सेवक है और सच्चे सेवक की हत्या कर
- 26:21देना। हत्या होती है या स्वयंमरण हुआ
- 26:25करता है। अगर सुर में हो तो खुद मरो स्वयं
- 26:31मरो, मरो मरो हे जोगी मरो, खुद मरो, शरीर को मत मरो, शरीर तुम हो
- 26:39नहीं और संत कहते है यह बात। जिन्होंने जान लिया अच्छी तरह से
- 26:48आँखें खुल गईं। उनकी जाग के देख लिया वास्तव में
- 26:53लाखों बार देखा हजारों बार देखा नहीं हूँ शरीर में फिर बोलते हैं,
- 26:59ऐसे तो बोलते भी नहीं हैं गोरख। गौरव कहते हैं कि खुद का मरना
- 27:09मीठा है, दूसरे को मारना मीठा नहीं है।
- 27:13एंड यू आर गोइंग टु कमिट नॉट सुसाइड बट मर्डर दूसरों को मारना
- 27:24आत्महत्या नहीं होती है, हत्या होती है।
- 27:28शरीर तुम हो न क्योंकि तुमने जाना नहीं और गलती में कहीं ऐसा न हो
- 27:37कि तुम स्वय की मौत की बजाय दूसरों को मार दो, यही यही करते
- 27:44हो? गोरा कहते हैं तुम मरो तुम मरो
- 27:52मरो हे जो की मरो मरो, मरण है मीठा वो मीठा है ऐसी मरणी मरो आगे
- 28:01बताते हैं मरने का विठंग है। अगर मरना ही है कम से कम मृत्यु
- 28:10के प्रति तो ईमानदार रहो, ज़िन्दगी के प्रति भी ईमानदार रहो
- 28:16और मृत्यु के प्रति भी ईमानदार रहो।
- 28:20ऐसी मरनी मरो। जीस मरणी मरगोरख जी उठा पुत्री
- 28:28तुम ऐसी मरणी मरो जीस मरने से तुम्हें अपने स्वय का बोध हो जाए।
- 28:38बड़ी शानदार मरने की प्रक्रिया है डांग है।
- 28:45लेकिन ऊहा पोह में जल्दबाजी में इन घबराए हुए मन में अधैरे से
- 28:53युक्त मन की ऊहा पोह में चिल्लाते हुए मन में।
- 29:00से कोई फैसला मत लो। भगवान कृष्ण ने कहा है शंश्य
- 29:04आत्मा बने शक्ति शंश्य आत्मा कौन होता है जिसका मन बड़ा शोर मचाता
- 29:10है? कोराहल से घरा घरा बराबर मन।
- 29:18शंस्य आत्मा होता है, शंस्य युक्त मन होता है और कोलहाल से भरे भरे
- 29:24मन से कभी कोई फैसला मत करना क्योंकि वो फैसला गलत होगा इसलिए
- 29:33मैं तुमसे कहता हूँ। कोई भी फैसला लेना है।
- 29:39शोर मचाते हुए मन से फैसला मत लेना, देरी कर देना, फैसला लेने
- 29:44में कोई बात नहीं लेकिन फैसला लेना ठहरे हुए मन से संशय युक्त
- 29:52मन से फैसला मत लेना। वह फैसला गलत होगा।
- 30:01ठहरे ठहरे मन से जिसकी संशायें बैठ जाती हैं वो ठहर जाता है मन।
- 30:10जो प्रदूषण से युक्त नहीं होता, कोलाहल से मुक्त होता है, कोई शोर
- 30:14शराबा नहीं होता उसके भीतर ऐसे ठहरे ठहरे मन से जो फैसला लोगे वो
- 30:22अति उत्तम होगा और तुम्हारे लिए हितकारी होगा।
- 30:28मरो। है।
- 30:29जो की मरो मरो मरण है, मीठा तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी।
- 30:37बिलकुल मरो हम तो सिखाते हैं अमरन हम कहाँ कहते हैं तुम जियो तुम
- 30:44जीना चाहते हो? संत कभी नहीं कहता तुम जीव
- 30:50क्योंकि यह भी कोई जीना है जीस जीने को तुम जीना कहते हो जी को
- 31:00जीना है, मृत्यु से भी बदतर है जिसे तुम जीवन कहते हो।
- 31:07और संत जिसे मरना कहते हैं वह अमृत से भी ज्यादा सुन्दर है
- 31:15इसलिए संतो के मरने क्यों नहीं मरते?
- 31:19मरने में कोई हम बाधा नहीं बनते। बिल्कुल मरो, हम तो सहयोग करते
- 31:29हैं, तुम्हारे संग चलेंगे, मरने में सहयोग करेंगे, तुम्हें धक्का
- 31:34देंगे। मेरे एक मित्र थे, बचपन की एक
- 31:45कहानी सुनाया करते थे। मुझे रामलीला में हम रोल किया
- 31:50करते थे। मैं राम जी का और वह रावण जी का
- 31:57लेकिन स्टेज के ऊपर तो झगड़े ही चलते हैं और बाहर बैठ कर हम दोनों
- 32:04चाय पीते हैं। मेरे शिशु भी थे, मेरे मित्र भी
- 32:08थे। ठहाके लगाते, बातचीत करते, कोई
- 32:17समस्या होती वो मुझसे कह देते। उन्होंने एक बड़े मजेदार प्रश्न
- 32:25का सुनाया। मुझे कहते बचपन के अंदर मेरे पिता
- 32:28जी। संस्कृत के अध्यापक थे।
- 32:32प्राइवेट स्कूल में अब समझदारों के प्राइवेट स्कूल में थोड़ी सी
- 32:37तन्खा होती है। परिवार बड़ा था।
- 32:47और मैं जिद करता हूँ अपने पिताजी से कि मैंने चूरन खाना है एक पैसा
- 32:56दो, तब एक पैसा बहुत होता था हमारे वक्त में एक पैसा हमें
- 33:01मिलता था खर्च के लिए और वह काफी था।
- 33:08हमारी मन चाही चूरन वगैरह कोई चीनी की सुस्वादु गोली, बस यही
- 33:20कुछ खाने का मन होता। और एक पैसे मैं आ जाता था।
- 33:28वह मुझसे कहने लगे कि मैं पिताजी से रोज़ एक पैसा मांगता था, अब
- 33:34प्राइवेट तनख्वाह थी, परिवार बड़ा था, उन दिनों में महंगाई नहीं हुआ
- 33:40करती थी। और पैसा भी नुआ करता था तो मैं
- 33:46रोज़ जो पैसा मांगता हूँ, पिताजी के पास होता है, एक पैसा दे देते
- 33:51हैं, आंधी छुट्टी होती तो घर आते हैं खाना खाने के लिए।
- 33:59तब ये मिड डे मेल वगैरह का रिवाज नहीं था।
- 34:05घर आके जब जाते हैं खाना खा के तो कहता मैं पिताजी से कहता पिताजी
- 34:11एक पैसा दो दो चूरन खाना। कई बार उनके पास नहीं होता कहता
- 34:21पुत्र आज तो है नहीं तो मैं चुप चाप चलाता संतोष था, जीवन में
- 34:30खाना मिल गया, चूरन ना मिले कि चलेगा लेकिन 1 दिन कई बार जिदा आ
- 34:36जाती। जिद आ जाती है।
- 34:39मैं कहता नहीं पिताजी आज तो मैं खाऊंगा, आज तो एक पैसा देना ही
- 34:45पड़ेगा तो पिताजी अंदर जाते ही एक ट्रक में सुरक्षित भंडारता वहाँ
- 34:50से एक पैसा दे देते हैं। कुछ वक्त खराबी कहा गया।
- 34:57जो सुरक्षित भंडार था, वह भी न रहा और उस महीने तनख्वाह भी न
- 35:02मिली और तंगी आ गई। अब बच्चे।
- 35:09को क्या पता होता? है माँ बाप तंगी में बच्चे की
- 35:15उम्र खेलकूद की उम्र होती है। घर खाना आया, खाने के लिए और खाना
- 35:20खा लिया और फिर वापस चला तो पिताजी के पास तंगी चल रही थी।
- 35:27मैंने कहा पिताजी एक पैसा चूरन खाना कहते।
- 35:33पुत्र अब तो नहीं है आज तो। तंगी का ज़माना है तनख्वाह आई
- 35:39हैं। रिज़र्व भंडार खत्म हो गया है तुम
- 35:45मुझे बताते वो कि मैं एक जिद करता, हमारे घर के पास ही रेलवे
- 35:52स्टेशन था रेल लाइन वहाँ से जाती थी बस थोड़ी दूर पे।
- 35:561 मिनट पैदल चले। ये जो अवस्थाओं का वर्णन किया है
- 36:08कहीं जाने को मन नहीं करता, बोलने को मन नहीं करता, संसार एक बोझ
- 36:15लगता है। यह बैरागी की निशानी है।
- 36:28इसको डिप्रेशन की तरह भी कई लोग देख लेते हैं।
- 36:36मैंने अभी शब्द बोला मरो हेजो की मरो मरो, मरण है मीठा ऐसी मरणी
- 36:47मरो जीस मरणी मर गो रख दी था। लेकिन मैं जानता हूँ साधकों की
- 36:56परेशानी क्या है, साधकों को समझ ही नहीं आता।
- 37:06शरीर का मरना तो समझाता है कि सुसाइड कमिट कर लो, लेकिन और
- 37:14मरना। वो कैसे होता है?
- 37:16शादी को उनको समझ नहीं आता है, यही गड़बड़ हो जाती है।
- 37:23मेरे पास बहुत से लोग आ जाते हैं। पोषों के सं्यास बाबा एक बात उलझ
- 37:32के रह गई मन में। क्या बेटा ओशो कहते हैं कि
- 37:39अक्टिंग करो क्रोज़ आ रहा है मुखिया बिछो दांत बिछो, क्रोध की
- 37:46सारी बनावट कर लो और थोड़ी देर में क्रोध आना शुरू हो जाएगा।
- 37:54क्या आपको लगता है मैंने कहा नहीं पुत्र मुझे नहीं लगता जो गलत है
- 38:03उसे गलत कहना ही होगा। ऐसी एक्टिंग तो हम रामलीला में भी
- 38:09बहुत किया करते थे। बहुत मुठिया बिछा करते थे और सच
- 38:16में बिछा करते थे दांत कड़ किडाया करते थे, क्रूज आता था लेकिन आता
- 38:24था क्षणिक। लेकिन यहाँ बात अध्यात्म की
- 38:30क्षणिक सुख और क्षणिक क्रोध की नहीं।
- 38:37अध्यात्म कहता है अखंड आनंद, अखंड खुशी।
- 38:48तो मैं कहता हूँ पुत्र कहीं से गलती हो गई?
- 38:52आप चाहे बड़ा मनो फिलॉसफर थे, फिलॉसफी के अंदर पीएचडी की।
- 39:03बाल की खाल निकालना जानते थे और बाल की खाल निकाल कर ही चले गए।
- 39:10समझा नहीं पाए थ्रोटिकल चीजों का वर्णन कर गए प्रैक्टिकल में वो
- 39:19ठीक उतरती नहीं अब क्या किया जाए? अभी मुझे नए साल कुछ ओशो सन्यासी
- 39:31बाहर से आए कुछ यहाँ के दूरदराज के लायंस क्लब के।
- 39:37जिन्होंने नया साल मनाना होता है, खूब नाचते हैं, ओला मचाते हैं और
- 39:43आप कौन सा नहीं नाचते होली पे कितने रंगों के बछार होती है
- 39:49कितने धूम धड़ाके करते हो आप कितने हँसते हो नाचते हो गाते हो,
- 39:54लेकिन क्या तुम सदा के लिए नाचते हो जाते हो?
- 40:001 दिन ही तो होता है और फिर ये क्षणिक सुख का स्वाद तो हम बोगो
- 40:09में भी चख लेते हैं। मुठिया बिचोगे खुशी का प्रकटाबा
- 40:16करोगे नाचोगे डांस करोगे हँसी भा खेल भा मेरी दृष्टि में इस शब्द
- 40:26का ठीक से व्याख्या नहीं हो पाए। उलट ले गए व्याख्याकार और मैं
- 40:37समझता हूँ कि भी गलत है। देखिए के पास बहुत बड़ी जमात है,
- 40:48लेकिन मेरे पास अनुभव है जमात के पास अनुभव नहीं है।
- 40:55और सब भी कहीं चूक गए और अगर चूक गए महान पर कौन सा नहीं चूक सकता?
- 41:01और मेरी दृष्टि में वो चूक गए। ऐसे अक्टिंग करने, क्रोध की
- 41:06मुट्ठी बीजनी और उछलना कूदना हँसीबां खेलीबां दरिबां ये कहीं
- 41:15गलती हो गई, कहाँ गलती हो गई, गलती यहाँ हो गई, तुम कहते हो
- 41:29हँसो खेलो, नाचो कुदो मौज बनाओ और ध्यान में रहो।
- 41:38ये कहना तो बड़ा आसान है। कौन चाहता है कि मैं ध्यान में ना
- 41:44रहूँ। ध्यान उखड़ उखड़ जाता है।
- 41:49कौन कहता है कि मन मेरे वश में ना हो, मन भटक भटक जाता है, सभी
- 41:55चाहते हैं कौन साधक नहीं चाहते? मन की भयंकर पीड़ाओं के कारण ही
- 42:05तो भागते हैं। ये लोग आध्यात्मिक लोगों के पास,
- 42:10आध्यात्मिक गुरुओं के पास और आगे महज उन्हें नकली ढांचे पकड़ा दिए
- 42:19गए हैं। बला क्रोध का प्रकट डबा करके कभी
- 42:27क्रोध आ सकता है। आएगा, लेकिन एक श्रेणी आएगा, कुछ
- 42:34देर के लिए आएगा। हम रामलीला में करते थे।
- 42:39थोड़ी देर के लिए क्रोध करते थे पुनः थोड़ी देर के बाद ही हम
- 42:43प्रसन्न हो जाते थे। उन्हीं लोगों के पास बैठ के चाय
- 42:48पान करते थे, जिन पर भड़के होते थे।
- 42:54ऐसे ड्रमे बाजी से अध्यात्म का कोई मेल जोल?
- 42:59और मतलब मेल नहीं खाता तो इसका असली अर्थ क्या है?
- 43:05देखिए इसका असली अर्थ सुनिए क्या कहते हैं हँसीबो खेलीबो धरीबो
- 43:13ध्यान? और आज बहुत सी साधनाएं इसकी हो
- 43:18रही हैं और मैं जानता हूँ कि वहाँ ड्रामे बाजी हो के वापस आ जाते
- 43:23हैं। भीतर बदलाव किसके होता है?
- 43:29मेरे पास ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है।
- 43:31आज तक के ड्रामा करने से सच प्रकट हो गया।
- 43:37ग्रमाकरण से झूठ प्रकट होता है, झूठ को बल मिलता है और बाहर के
- 43:45किया हुआ उसको अगर तुम सत्य समझने लगे तो भीतर से जो प्रकटेगा कभी
- 43:52झरना बाहर से भी प्रकट हुआ है। झरना भीतर से प्रकट होता है।
- 44:00धरती का गर्भ चीर करता है झरना और वही तो झरना हमारे भीतर से बहेगा।
- 44:08बाहर से झरना कैसे फूटेगा? नहीं फूटता तो इसका असली अर्थ
- 44:13क्या है? जब जो गोरखनाथ जी ने कहा हँसी बा
- 44:19खेली बा दरि बा अंधया इसका मतलब कुछ हो रहा है उसका मतलब ये है जो
- 44:29आदमी ध्यानस्त हो जाता है। वो चाहे हँसे खेले कूदे, नाचे
- 44:39गाये कुछ भी करे उसका ध्यान भंग नहीं होता, वो सदा ध्यान में ही
- 44:44रहता है। बड़ा विराट फर्क पड़ गया।
- 44:49तुम कहते हो हँसने से खेलने से नाचने से कूदने से ध्यान प्रकट हो
- 44:55जाएगा और गोरख कहते हैं कि ध्यान प्रकट हो जाए तो हंसो, नाचो कूदो
- 45:03खेलो, गाओ मस्ती मनाओ, ज्ञान भंग नहीं होगा।
- 45:10इसके भीतर ध्यान प्रकट हो जाता है और भरे कोलाहल के बाजार के बीच
- 45:17में मौन खड़ा रह सकता है मौन गुजर सकता है और उसको बाहर की भीड़ का
- 45:25कोलाहल ज़रा भी स्पर्श नहीं करता है।
- 45:30यहाँ आकर मैं ओशो से बिल्कुल भिन्न नहीं हूँ।
- 45:34विपरीत कहीं चूक हो गई क्योंकि आकर हमें थियोटिकल चीजों को
- 45:44प्रैक्टिकल में लाना होगा। यह मजाक तो है नहीं, चुटकुला तो
- 45:50है नहीं कि हम बदल लेंगे। जीवन की चीजें हैं और जीवन की
- 45:57चीजें हम आजमा के देखेंगे और पूर्व न उतर सकें।
- 46:00आजमानी में तो फिर रहे ठूँठ के ठूँठ हम तो वहीं रह जाते हैं मेरे
- 46:11पास मित्र है बाबा हमने रात को बड़ा जश्न मनाया, खेले कूदे, नाचे
- 46:22गाये हाँ हूँ किया। तूफान उठा दिया।
- 46:30पड़ोसियों का भी जीना हराम हो गया और खूब मज़े से आए और सो गए।
- 46:39लेकिन अखंड धरा तो प्रकट न हुई फिर वो ही।
- 46:44ढाक के तीन पात। फिर वो ही फिर वो ही श्याम, वो ही
- 46:57गन, वो ही। तनहाई है, फिर वो ही शाम, वही
- 47:11गाना, वही तनहाई है। दिल को बहलाने, तेरी याद चली आई
- 47:29है फिर वो ही शान ओह ही गन ओह ही। तनहा ही है हाऊ कर लिए खूब ठहाके
- 47:49लगा लिए कैसा से सो गया? हल्का हो गया ठीक हो गया लेकिन
- 47:55बात तो ये है। क्या कहते हैं गौरख तुम हंसो और
- 48:02हंसते हुए इस शरीर को देखो कौन हंस रहा है?
- 48:07लेकिन एक्टिंग से तो यह पॉसिबल नहीं होगा क्योंकि एक्टिंग बाहर
- 48:14बाहर खोपड़ी तक रहती है। हृदय तक थोड़ा सा छू पाती है,
- 48:20लेकिन हृदय के गहरे तेलों में ये उतर नहीं पाती।
- 48:28इसे मैं एक सर्कस कहता हूँ, हँसी बा खेली बा दरिबा देहा लोगों को
- 48:36मूर्ख बनाने का ढंक। वो सब दे गए, पता नहीं कैसे दे गए
- 48:43और मुझे खुद हैरानी होती है क्योंकि मुझे कोई शंका नहीं है।
- 48:51उनके प्रबुद्ध होने में ज़रा भी कोई शंका नहीं यहाँ बिल्कुल मैं
- 48:58एकमत हूँ। ठहरा हुआ हूँ क्योंकि मैंने अपनी
- 49:02आँखों से देखा है, लेकिन महान पुरुषों से महान गलतियाँ भी तो
- 49:10होती हैं आपको शायद पता नहीं होगा।
- 49:18ओशो की सक्रिय साधना डायनामिक साधना से पहले जो साधना दी थी, वो
- 49:23डायनामिक नहीं थी, वो सक्रिय साधना नहीं थी, वो अक्रिय साधना
- 49:28थी, लेकिन अक्रिय साधना ने काम नहीं किया तो फिर उन्होंने सक्रिय
- 49:34साधना दे दी, बदल दिया ना? गलती थी न निष्क्रिय साधना काम
- 49:42नहीं की तो सक्रिय साधना दे दी। डायनामिक और डायनामिक ने भी कितना
- 49:50काम किया कि छ छ कर दिया हाँ हूँ कर लेते हो।
- 49:56क्रोध निकल जाता है, अच्छी है, सुखद अनुभूति होती है, हल्के हो
- 50:05जाते हैं, सब कुछ करने के भीतर से निकालने की छूट है जैसे हमारे
- 50:14यहाँ बागेश्वर दाम वगैरह। यहाँ यही कुछ होता है जो रजनीश
- 50:19आश्रम में होता था वो शो ध्यान केंद्रों में होता था, वो ही यहाँ
- 50:25होता है। कोई नई बात नहीं वहाँ भूत से
- 50:30पीड़ित होते हैं। मनो व्यथाओं से पीड़ित होते हैं
- 50:35और यहाँ ध्यान के लिए वही काम करते हैं।
- 50:38बस शब्द बदल दिए गए हैं। बात वही है, उछल कूद हाँ हूँ सिर
- 50:43सिर मारना वही कुछ है सर देखिये। ज़िन्दगी ज़िन्दगी है खेलने
- 51:01व्यक्ति व्यसित है व्यक्ति दुखी है इनको हम शब्दों से सुखी नहीं
- 51:07कर सकते ध्यान रखना। तो थ्रोटिकल प्रोसेसेस देके?
- 51:16अगर वो कारगर नहीं हैं तो शांत नहीं किया जा सकता और मैंने मेरी
- 51:27बात समझ में आई कि ठीक है। नहीं होगा।
- 51:33ऐसे ड्रामा से शुरू करेंगे तो सत्य तक पहुँचेंगे।
- 51:37कैसे निष्कासन हो जाएगा। हो सकता है थोड़ी देर के लिए,
- 51:43लेकिन निष्कासन के बाद झूठ सच कैसे बन जाएगा?
- 51:51यह मेरे अनुभव में बात सटीक फिट नहीं हुई, इसलिए मैंने उनसे कहा
- 51:58कि देखो भाई अगर तो आपको वहाँ कुछ मिलता है तो ठीक है अन्यथा आप ये।
- 52:08वो तो फिर है ही जो गो रखने का है जब ध्यान प्रकट हो जाता है भीतर
- 52:13से जब झरना फूट पड़ता है भीतर से, तो उसे रोक कौन सकता ध्यान का
- 52:22झरना भीतर से शीतलता प्रदान करेगा बाहर आएगा।
- 52:29तो फिर तुम नाचो कूदो गाओ, मस्ती बनाओ कुछ करो यही तो करते हैं
- 52:38कृष्ण कृष्ण का ध्यान। नाचने कूदने से रास रचाने से
- 52:48प्रकट नहीं हुआ ध्यान करना। कृष्ण ध्यानस्थ हैं, इसलिए महा
- 52:55रास प्रकट होता है। तुम उलट बात समझ कर मूर्ख बनाने
- 53:02की चेष्टा न करो। कैसे हो पाएगा?
- 53:14एक सर्क से एक नकल से एक बनावटी चीजों से शुरू करके तुम सत तक
- 53:22पहुंचते हो, ये कवायद कहाँ तक ठीक चलेगी?
- 53:26और इसीलिए तुम फेक के रह जाते हो। ओशो का कोई भी शिष्य मेरे पास जब
- 53:32आता है मुँह लटकाया था। बस उसको एक भ्रम होता है कि मैं
- 53:39ओशो सन्यासी हूँ। जब मैं उसके औरा को चेक करता हूँ,
- 53:44तो टाइम टाइम फिर इस बात से मैं मुँह कर रहा हूँ।
- 53:57उसने स्वयं बोतल छू लिया था, प्रसन्नता कि उस पलहट्टी पे पहुँच
- 54:04गए थे खुद। लेकिन प्रसन्नता कि उस लाठी पे
- 54:09पहुँच के खुद दूसरों के लिए थ्योरी ठीक से कंस्ट्रक्ट कर
- 54:16पायेगा, यह जरूरी नहीं है पहुँचः व्यक्ति थ्रोटिकली गलत हो सकता
- 54:23है। प्रक्टिकली तो वो ठीक है।
- 54:27ओशो को मिला बिना शक मिला इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है, लेकिन
- 54:34ओशो ने जो थ्रोटिकल प्रयोग दिए उनसे मैं सहमत नहीं हूँ।
- 54:38कुछ प्रयोग से तो बिलकुल ही सहमत नहीं हूँ।
- 54:43और यहाँ आकर मैंने क्यों बोलना बंद कर दिया शुरू किया था मैं
- 54:48गोरखवाणी शुरू की थी मैंने हँसीबो खेलीबो दरिबो तो यार लेकिन जब
- 54:55मैंने पाया कि ऐसे नकल से तो थोड़ी देर के लिए ठीक है, रोज़
- 54:59पैदा होगा। नाचोगे नाच पैदा होगा, गाओगे गायन
- 55:05पैदा होगा और उस गायन में लुत्फ भी आएगा, नाचने में भी लुत्फ
- 55:12आएगा। हँसने में भी लुत्फ आएगा।
- 55:16लेकिन इट्स ओनली कैथस प्रोसेसर। तुम्हारे भीतर भी तो ऐसा कुछ दबा
- 55:24हुआ है, क्रोध भी तो दबा हुआ है, क्रोध निकल जाएगा, दुःख भी तो दबा
- 55:35हुआ है, वो निकल जाएगा, नाच भी तो है, भीतर गाना भी तो है भीतर।
- 55:41ये सब बाहर कैथल हो जाएगा। लेकिन तुम कहाँ पहुंचे उस तरफ तुम
- 55:47तो बाहर बाहर ही फिरते रहे और बात सुनिए आप मेरी नकल कभी भी भीतर तक
- 55:53नहीं जा सकती। यह है मेरा।
- 56:05नकल से शुरू करो की असर तक नहीं पहुँच पाओ के।
- 56:12इसलिए मैं बाबा की इस बात से सहमत हूँ।
- 56:17कि तुम्हारी कोई भी प्रोसेसर उस परमात्मा तक तुम्हें पहुंचाती
- 56:29नहीं ज़ोर न जोगती छोटे संसार तुम जीतने भी योग्य लड़ाते हो।
- 56:42जितनी भी साधना करते हो, परमात्मा तक पहुंचने की बाबा कहते हैं,
- 56:48उसमें कोई जोग नहीं। क्यों कहते हैं बाबा बाबा कहते
- 56:55हैं कि तुम खुद ही हो जोगता लड़ने की आवश्यकता क्या है?
- 57:03ओड़ियों का इस्तेमाल करने की आवश्यकता क्या है?
- 57:07भटके हुई है, खोजने का फायदा क्या है?
- 57:22तभी कहते हैं अगर वो चाहेगा हो जाएगा।
- 57:27अष्टावकर भी कहते हैं कि तुमने खोया नहीं है मात्र भूले और भूली
- 57:38हुई चीज़ खोई नहीं जाती बस। इस शब्द को गहरे में ले लेना तुम
- 57:52भूल गए हो और रिमिंड कराना होगा रिमेंबर कराना होगा, खोजना नहीं
- 57:59होगा। खोजा उस चीज़ को जाता है जिसका
- 58:04पता नहीं कहाँ है? उसका तो पुक्का पता है तुम ही हो
- 58:11तुम्हारे ही भीतर है कहाँ ठोर ठिकाना उसका कौन बताएगा क्योंकि
- 58:21वो तुम ही हो, तुम्हारे ही भीतर उतरना है।
- 58:24बाहर जाके तो तुमने देख लिया, लताड़ ही लगी, दुखी ही हाथ आया,
- 58:37खूब मंशा से गए थे, कुछ मिलेगा? खाली हाथ वापस आ गया।
- 58:46बाहर बहुत भटके, लेकिन उस भटकने में कुछ नहीं मिला।
- 58:51और देखिये ये हँसी व खेले व दरिबा ध्यान ये बाहर ही की तो
- 58:57प्रक्रियाएं हैं। ये कहाँ भीतर ले के जाएंगे आप
- 59:05बाहर रो चाहे हंसो, बाहर माथा ठोको चाहे नाचो।
- 59:17ज़रा भी तो वेद नहीं है, बाहर की प्रक्रियाएं सब बराबर है और
- 59:23थ्रोटिकल है, प्रैक्टिकल है, अपने भीतर के उतरना है।
- 59:33और हँसने से खेलने से, नाचने से, कूदने से बनावटी नाच से, कभी सोनल
- 59:42थानसिंह मेरा हुआ है कभी हस। कभी गाने वाला मोहम्मद रफ़ी नानक
- 59:55बन पाया। आवाज़ में तो उससे बहुत कम था,
- 1:00:02क्यों? क्योंकि नानक जीस स्तर से गाता
- 1:00:07है, वो भीतर से जलने की तरफ उठता है।
- 1:00:11और मोहम्मद रफ़ी जीस स्तर से गाता है।
- 1:00:14वो भीतर से जरना नहीं फूटता वो गले से जरना फूटता है।
- 1:00:18विशुद्धि चक्र से आता है जहाँ बड़ी मुश्किल पेश हुई।
- 1:00:22मेरे जीवन का कठिनतम दौर था इस शब्द के ऊपर आकर।
- 1:00:28हँसी बा केलीबा दरिपतिया नहीं हो सकता ऐसा इसलिए मैंने एक बार
- 1:00:39गोर्ख के प्रवचन शुरू किए लेकिन जल्दी ही मुझे समझा नहीं, ये तो
- 1:00:45बाहर भटकाने वाली बात हो गई। लोग भटक जाने के बाहर फिर फिर धन
- 1:00:52कमाओ के ध्यान कमाओ उन दोनों में खस्ताएं अगर कमाना ही है तो फिर
- 1:01:00धन कमाओ या ध्यान कमाओ बराबर है और इसे नकली।
- 1:01:09काम बना के इमिटेशन बना के नाचना कूदना भी नकली करके तुम अगर
- 1:01:17समझोगे कि हम असल तक पहुँच जाएंगे तो मैं समझता हूँ कि किसी मूर्ख
- 1:01:22व्यक्ति ने इस चीज़ का इजात किया है।
- 1:01:26नहीं कहा। गोरख के कहने का अर्थ गलत समझा
- 1:01:29गया। गोरख ने लिखा बिल्कुल ठीक गोरखध
- 1:01:34नहीं हो सकते। कहा गोरखध तुम मैं अपनी ज़िन्दगी
- 1:01:41की एक छोटी सी बात पहले बोल चुका हूँ।
- 1:01:46मेरे पास शून्य में से चीजें प्रकट करने की सिद्धि मैंने
- 1:01:51प्राप्त कर ली थी। जब मैं श्मशान साधना किया करता था
- 1:01:55तो शून्य में से वस्तुओं को प्रकट करने की सिद्धि मैंने सिद्ध कर ली
- 1:02:01थी। लेकिन संसार तमाशा बन लेता है।
- 1:02:07आज भी ऐसे लोग हैं और सारे लोग ही हैं।
- 1:02:09वो कोई बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुआ है।
- 1:02:14अभी भी वो लोग मुझे याद करा देते हैं।
- 1:02:16बाबा आपके मगाए हुए काजू, बादाम। भुजिया के पैकट दाल, लड्डू, शराब
- 1:02:27सब हमने पिए हुए और ऐसे ऐसे नाजुक मौकों पर उन्होंने मेरे से कामना
- 1:02:35की जब पंजाब में घोर विपत्ति का। कर्फ्यू लगा हुआ।
- 1:02:46हर 10 गज के ऊपर मिलिट्री खड़ी हुई।
- 1:02:50घर से बाहर नहीं निकलने देते थे। हम किसी तरह से बाहर निकल जाते
- 1:02:55थे, उनको पानी पिलाना, चाय पिलाना, उनको पता लग गया।
- 1:02:59ये भले मानस आदमी हैं, बैठेंगे। तो भजन गायन करेंगे तो वो मुझे
- 1:03:07निकलने दे देते हैं। हमें तो हम 2025 लोग एक जगह
- 1:03:11इकट्ठा हो जाते हैं। शून्य में से वस्तुओं को प्रकट
- 1:03:16करने की साधना मैंने सिद्ध कर ली थी।
- 1:03:19मुझसे कोई कुछ भी मांगता है। मैं उसे प्रकट कर देता शून्य में
- 1:03:26से आज मुझे हैरानी होती है और मुझे जायज हैरानी होती है जब कोई
- 1:03:37कहता है कि ऐसा कुछ होता नहीं। होता है।
- 1:03:44इससे मैं मुमकिन नहीं हो सकता क्योंकि होता है किसी ने लड्डू
- 1:03:50मांगे, लड्डू मंगा दी और आज भी रोका।
- 1:03:52दोनों लड्डू बोकाएं शराब मांगी, शराब मंगा दी।
- 1:03:59दाल मांगी, भुजिया मांगी, भरी सर्दी में आइसक्रीम मांगे,
- 1:04:08कर्फ्यू भरे कर्फ्यू में शराब मांगे, लेकिन बस पल भर में।
- 1:04:17शून्य से चीजों को प्रकृत करने की सिद्धि मेरे में आ गई, बस उधर
- 1:04:24मांगा और इधर मैंने चीज़ प्रकट कर दी है।
- 1:04:29लोगों ने इसको एक तमाशे की तरह लेना शुरू कर दिया।
- 1:04:37और आध्यात्मिक उन्नति करती गई है। इसलिए मैं कहता हूँ इन चीजों में
- 1:04:43उलझन आ जाना अलटिमेटली अंततः है। मुझे इसे छोड़ना पड़ा, लेकिन फिर
- 1:04:54भी करीब 4 साल तक। लोगों ने ये तमाशे खूब देखे।
- 1:05:01मेरे ही शहर के लोगों ने ये भी क्या था?
- 1:05:10अध्यात्मिकता तो नहीं होती है ये तो सीधी अध्यात्मिकता थोड़ी होती
- 1:05:15है। सिद्ध होती है।
- 1:05:22बाहर की सांसारिक प्रकृति से वो चीजों का मंगवाना भीतर से इसका
- 1:05:29ज़रा भी संबंध नहीं और भीतर ध्यान होता है।
- 1:05:36अपने भीतर के उस अस्तित्व को खोज लेना जो तुम शर्म हो।
- 1:05:43दोनों में जमीन आसमान का फर्क है और दोनों विरोधी कोनों पर एक तरफ
- 1:05:52वो जहाँ मैं लड्डू मंगाया करता था।
- 1:05:55एक तरफ़ ये जहाँ मैं आज बोलता हूँ के सब तुम ही हो और मैं वो भी
- 1:06:03अनुभव से बोलता हूँ ये भी अनुभव से बोलता हूँ, मैं सदा ही कहता
- 1:06:06हूँ मैं जो भी कुछ बोलता हूँ, अनुभव के बिना नहीं बोलता हूँ।
- 1:06:14जहाँ गलती मुझे लगती दिखती है वो मैं स्पर्श से बोल देता हूँ, मुझे
- 1:06:20गलत लगता है, मुझे ठीक नहीं लगता। देखिये ठीक होगा आपके हिसाब से,
- 1:06:26लेकिन मेरे हिसाब से ये ठीक आता है।
- 1:06:30हँसीबा खेलीबा दरिबा ये ठीक रोते हैं, बच्चे मरने को दिल करता है
- 1:06:39बिलकुल और जो भीतर दबा पड़ा है वो तुम्हारे कैथो से निकाल देगा।
- 1:06:51जो भी कुछ दवा पढ़ाकर से निकाल देगा इस बात से कोई मुंकिर नहीं
- 1:06:57हो सकता लेकिन तुम उस तत्व को अचीव कैसे करोगे?
- 1:07:09सिर्फ कथोरेसिस करने से वह तत्व जाना नहीं जा सकता, वह तत्व तो
- 1:07:18अपने भीतर गहरे, गहरे, गहरे गहरे और उतर कर ही 1 दिन तुम उस तत्व
- 1:07:26में समा जाओगे। पहले वो जंक्चर पॉइंट आया था
- 1:07:34जंक्चर पॉइंट से थोड़ा ऊपर जैसे दी आनी शुरू हो जाती है जो मैंने
- 1:07:38आपको वार न किया होशियार यार जानी ये रास्ता ठगों का मैंने ठग।
- 1:07:48यहाँ ज़रा नजर चुकी तो मार्ग दोस्तों का यहाँ सब है जो तुम्हें
- 1:07:55असम्भव जैसा लगता है, वो है। लेकिन बात तो ये है कि जो शाश्वत
- 1:08:05आनंद की कामना हमारा अंतर करता है, तृप्ति के आलम में वो आनंद
- 1:08:14हमें नहीं मिलता और जब हमारा लक्ष्य नहीं पूरा हुआ।
- 1:08:24तो फिर संसार में हम जैसे आये वैसे ही चले जाएंगे।
- 1:08:32फिर किसी भी साधना का कोई फल न हुआ।
- 1:08:37इसलिए मैं इन साधनों को इस तरह नहीं लेता।
- 1:08:40जीस तरह वो सो लेता हूँ वो कहते हैं हँसो नाचो गयो, कैथ से सो
- 1:08:46जाएगा ये मैं मानता हूँ। मन हल्का हो जाएगा क्योंकि इस
- 1:08:51समाज के कारण इस कानून के कारण बहुत कुछ वृतियों को हमने दबा
- 1:08:58लिया है और दबी हुई व्रतियां बोझल कर देती हैं अचेतन को और वो अचेतन
- 1:09:10बोझल हुआ हुआ तुम्हें ऐसा लगता है जैसे पता नहीं?
- 1:09:14कितना बार तुम्हारी छाती पर रखा हुआ?
- 1:09:16मुझे रोज़ लोग कह देते हैं बाबा मुझे ऐसा लगता है जैसे छाती पर
- 1:09:22पता नहीं कितना बार रखा हुआ है। यह अचेतन मन का वो भार है जो
- 1:09:28तुमने दबा लिया है और तुमने कोई कम नहीं दबाया।
- 1:09:33तुमने बहुत गंवाया है इसलिए मैं कहता हूँ जब मैं बोलता हूँ और तुम
- 1:09:42मुझे सुनना चाहते हो, वास्तव में श्रावक बनना चाहते हो तुम शिष्य
- 1:09:49के भाव से नमन हो के मुझे सुनना चाहते हो?
- 1:09:57तो फिर तुमने क्या करना है सुनने के लिए तुम सारे काँट छांट को और
- 1:10:05अपने पूर्वाग्रहों को जो पहले तुमने पूर्वाग्रह तुमने मान रखे
- 1:10:13हैं तो ये ऐसा होता है। अब सत्य तो ये है कि जब हम शरीर
- 1:10:20से बाहर जाएंगे और वापस आना होगा तो बिलकुल ना भी से शरीर छोड़ना
- 1:10:29होगा। सूक्ष्म?
- 1:10:32दे ही को नाभि के रास्ते के इलावा कोई रास्ता ही नहीं और अगर पूर्व
- 1:10:39ग्रह से ग्रसित कोई व्यक्ति कहे के हम तो 1000 से निकलते हैं और
- 1:10:47वापस आ जाते हैं तो ये सिर्फ उनकी कल्पना है।
- 1:10:52पुलिस का प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे सामने आज कांच की मृत्युशैया के
- 1:11:00ऊपर पड़ी हुई लाश है। आशुतोष की यही कोशिश तो उन्होंने
- 1:11:05की थी। जिसे वापस नहीं आना होता।
- 1:11:09देखिए अंत समय में हम कहते हैं कि योगी कपाल को पार कर निकल जाता है
- 1:11:14क्यों? क्योंकि उसे वापस नहीं आना होता
- 1:11:18शरीर में तो अगर शरीर में वापस नहीं आना तो ये रास्ता है।
- 1:11:27तुम कपाल से जा सकते हो, लेकिन फिर ध्यान रखना फिर वापस से नहीं
- 1:11:32आ पाओगे। शरीर में ऐसा ही कुछ आशुतोष के
- 1:11:35साथ हुआ और मैंने दो 3 साल पहले वीडियो डाली।
- 1:11:39बड़ी गाली गलोच हुआ लोगों ने बुद्दी बुद्दी गाड़ियां दी।
- 1:11:45मैंने कहा भाई तुम गालियां न कर लो, तुम्हारा हक है, मेरा हक
- 1:11:52बोलना है और मैंने अपना अनुभव बोल दिया है।
- 1:11:57यह व्यक्ति कभी नहीं उठेगा, इससे ज्यादा मैं क्या बोल सकता हूँ?
- 1:12:04उन बातों को दो 3 साल हो गए। यह व्यक्ति नहीं उठा बल्कि कहते
- 1:12:09हैं एक सादिका की बलि और ले गया ये पूर्व ग्रह व्यक्ति को मार
- 1:12:18देते हैं। अब वो सादिका तो व्यर्थ में मारी
- 1:12:20गई ना बिचारे। पता नहीं ये सच है या झूठ है हाँ
- 1:12:28हम कौन सा जाते हैं, हम तो द्वार से बाहर नहीं जाते, लेकिन सुनी
- 1:12:33सुनाई बात है एक साधिका भी गुरु जो को वापस लेने गई थी।
- 1:12:39और अभी तक वो भी नहीं लौटी और फिर अगर गई थी तो वो भी नहीं।
- 1:12:43लौटेगी। गुरूजी तो लौटेंगे ही नहीं,
- 1:12:47क्योंकि उनकी साक्षात शीशे के उस ताबूत में पड़ी हुई मृत्युदेह
- 1:12:53मैंने देखी। बिला शर्क वह वापस नहीं लौटेंगे
- 1:12:59तुम ये धर्म का धंधा है, धर्म का धंधा है और शिष्य मूर्ख तो होते
- 1:13:10हैं। शिष्य पूर्व ग्रहों से ग्रसित
- 1:13:15होते हैं। और उनके पूर्वाग्रह ऐसे कठोर होते
- 1:13:20हैं कि स्टील भी मात खाये। स्टील टूट सकता है।
- 1:13:27शिष्यों का पूर्व ग्रह नहीं टूट सकता, बस इसीलिए हम पहुंचते हैं।
- 1:13:34लोग मुझसे पूछ लेते हैं बाबा? इतने साधन हैं इतनी सरलता से तुम
- 1:13:39बोलते हो इतनी सरलता से सभी संत बोले लोग पहुंचेगा बस एक ही कारण
- 1:13:46है पूर्वाग्रह इसमें बाधा बनते हैं।
- 1:13:49तुमने कुछ मान लिया और मान लिया जाना है नहीं, और तुम उन
- 1:13:55पूर्वाग्रहों से। युक्त हो गए तुमने वसा लिया अपने
- 1:13:59हृदय में कि ऐसा है, अब जिनके लिए आशुतोष लौटेगा उनके लिए तो वो
- 1:14:07लौटेगा लेकिन हमारे लिए कभी नहीं लूटेगा और तुम देख लेना नहीं
- 1:14:12लौटेगा। मैंने दो 3 साल पहले भी यही बोला
- 1:14:17कि वो नहीं लौटेगा, कहाँ लूटा, लूटा नहीं लूटा और इसको जो
- 1:14:27बुलवाने जाएगा वो भी नहीं लौटेगा, वो भी खो जाएगा क्योंकि वो गलत
- 1:14:33रास्ते से निकला है। मैं क्वेश्चन करता हूँ आपको आप
- 1:14:38समझ जाओ, समझना चाहती हूँ तुम नहीं समझना चाहती तो मैं लत तो
- 1:14:44मारता नहीं, तुम्हारे शब्दों से ही समझाना होता है करुणा वश तो
- 1:14:50आदमी को। शब्दों से ही समझाना होता है कि
- 1:14:54देखो बेटा आग है इसमें छलांग मत लगा देना, फिर भी तुम लगाओगे तो
- 1:15:02फिर जलोगे ये तुम्हारा काम है, हमने तो रोका तुम्हे।
- 1:15:11हँसिब खेलिबा तरिबा ध्यान? सैकड़ों व्यक्ति आत्महत्या करना
- 1:15:20चाहते हैं और मैं उनसे सभी से आज का प्रवचन उनके निमित्त हैं।
- 1:15:28तुम जिसे आत्महत्या कहते हो वो आत्महत्या नहीं है, वो हत्या है
- 1:15:34क्योंकि शरीफ तुम हो नहीं, मेरी बात को मानना है, मान लो, नहीं
- 1:15:39मानना है, मैं तुम्हे कोई ज़ोर नहीं डालता।
- 1:15:47मैं हिंसक नहीं हूँ, मैं परम अहिंसक व्यक्ति हूँ मैं सिर्फ
- 1:15:52अपने अनुभव को बोलना इतना ही दायित्व है मेरा तुम मानो ना मानो
- 1:16:00ये तुम्हारा ये तुम्हारा स्वतंत्र ख्यालात।
- 1:16:05तुम मानने को भी स्वतंत्र हो तुम ना मानने को भी स्वतंत्र हो मैं
- 1:16:11मानु ना मानु मुझे कोई मतलब ना मैं तुमसे सम्मान चाहता हूँ, ना
- 1:16:18मैं तुमसे किसी और चीज़ की कामना रखता हूँ।
- 1:16:28सिर्फ करुणा वश दुःखित प्राणियों को देखकर संसार में इतना दुख है
- 1:16:39और इस भ्रम के कारण दुख है। वो एक भ्रम नहीं हमसे टूटता।
- 1:16:44कमाल की बात है कि मैं शरीर हूँ, मन हूँ ये नहीं टूटता, देखो एक
- 1:16:51भ्रम ने सारा जगत नचा रखा है कठपुतली के तरह और एक भ्रम कैसा
- 1:16:57कि तुम इसको नहीं छोड़ पाते? ऊपर से कुछ ऐसी ऐसी साधनाएँ भी आ
- 1:17:04जाती हैं और इस साधना तो मैं भी व्यथित हुआ ये ओशो के द्वारा बताई
- 1:17:11गई साधनाएँ मैं नहीं समझता के कोई व्यक्ति ऐसे नकल से शुरू करके।
- 1:17:18हसेगा खेलेगा नाचेगा गायेगा कृत्रिम बनावटी रूप से शुरू करके
- 1:17:25असल तक पहुँच जाएगा। मेरे हिसाब से ये असंभव है।
- 1:17:31फिर भी अगर तुम नाचना चाहते हो, हँसना चाहते हो, कूदना चाहते हो,
- 1:17:35कूदो। एक फायदा तो अवश्य मिलेगा, कथक हो
- 1:17:39जाएगा, तुम्हारा तो हल्का हो जाएगा।
- 1:17:42मिला शक इसमें कोई संदेश? ऐसा लगता है लोग मुझे प्रश्न
- 1:17:50पूछने से डरते हैं। क्योंकि पीछे जो ये शब्द लिखते
- 1:17:55हैं ना कि बाबा मतलब मत कर देना। इसका स्पष्ट मतलब है कि तुम डरते
- 1:18:01हो, तुमने आज प्रश्न पूछने में भी हिचक दिखाई।
- 1:18:07सभी ने लिखा जितनो ने प्रश्न पूछा ना सभी ने लिखा बाबा गुस्सा मत हो
- 1:18:12जाना। ब्लॉक मत कर देना एक मेरी बात को
- 1:18:15आज ध्यान से सुन लो, मैंने ब्लॉक तो बहुत की है, लेकिन मैंने सिर्फ
- 1:18:21परमात्माओं को ब्लॉक किया है बहुमक्षियों को ब्लॉक नहीं किया,
- 1:18:26अब तुम चकित न हो जाना इन बातों से।
- 1:18:31मैंने भगवानों को ब्लॉक किया है मो।
- 1:18:37मोक्षुओं को ब्लॉक नहीं किया, जो मुक्त होना चाहते हैं उनको तो मैं
- 1:18:42लंबे हाथों से गल बकड़ी डाल लेता हूँ।
- 1:18:49उनसे तो मैं ईद मनाता हूँ, गले मिलता हूँ, वे तो योग्य है, मेरी
- 1:18:55बात को सुनने के उन्हीं के लिए बोल रहा हूँ।
- 1:19:00अगर तुम कहते हो कि मुझे ब्लॉक मत कर देना, तो प्रश्न पूछने से मैं
- 1:19:03सिर्फ़ तुम्हें ब्लॉक नहीं करूँगी।
- 1:19:09मैं भगवानों को ब्लॉक करता हूँ, एक शब्द सुन लो मेरा मैं मुक्षु
- 1:19:15इंसानों को ब्लॉक नहीं करता भगवान कौन जो पहले से जानते हैं, जो
- 1:19:23मुझे कहते नहीं बाबा ऐसा नहीं ऐसा होता है।
- 1:19:28ऐसा नहीं बाबा ऐसा होता है तुम गलत हो तुमने ऐसा तब कहा था, आज
- 1:19:36ऐसा कहा ऐसा कहा। मैंने 1000 बार कहा कि देखिए जीस
- 1:19:41भाषा में हम बोलते हैं वह भाषा अल्प है।
- 1:19:45कई बार विरोधी शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ता है।
- 1:19:49तुम्हें विरोधी लगेंगे। लेकिन तुम छोड़ दो ना उन्हें,
- 1:19:53क्योंकि ये बताने का हमारा प्रयास मात्र है।
- 1:19:55शब्द अल्टीमेट प्रोसेसर नहीं है, ये तो तुम्हें उलट लग सकता है और
- 1:20:01हमें भी लगता है उलट तुम्हें ये क्या लगता है?
- 1:20:06तो हम उलट बोल सकते हैं, तुम्हें लग सकता है लग नहीं सकता।
- 1:20:11हम बोलते ही उलटे हैं क्योंकि शब्दों की अपनी मर्यादा है,
- 1:20:16शब्दों की अपनी तुच्छता है, शब्द उससे आगे नहीं जा सकते।
- 1:20:22मजबूरी है शब्दों की। फिर जो परमात्मा बन जाता है तो
- 1:20:35मैं समझता हूँ कि इसको मेरी शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है,
- 1:20:41खुद ही परमात्मा है भला मैं परमात्मा को और क्या सीखाऊंगा
- 1:20:46पहले ही से परमात्मा है? तो देखिये ज़रा भी गलती नहीं
- 1:20:53खाता, मैं ब्लॉक करने में हूँ लेकिन करता हूँ भगवानों को
- 1:21:00इंसानों को नहीं। मो मूक्षों को नहीं, प्यासों को
- 1:21:03नहीं। प्यासों के लिए तो पानी सदा हाजर
- 1:21:08है, ठंडा शीतल जो खुद खूब गले तक पानी पे गया है उनको ब्लॉक कर
- 1:21:21देता हूँ भला कि मैं जानता भी हूँ।
- 1:21:29के ये हरामी भीतर से प्यासें ये जानता हुआ अभी ब्लॉक कर देता हूँ
- 1:21:37कि अगर जान ही खानी है, खुजली ही करनी है तो भाई किसी आचार्य के
- 1:21:42पास जाओ, वो अच्छे से खुजली कर देता है।
- 1:21:48अब उनके पास जाओ, मैं खुजली भी ठीक से नहीं कर सकता।
- 1:21:53वृद्ध हो गया हूँ, ऊपर से खाता पीता कुछ नहीं एक व्यक्ति कहने
- 1:21:58लगा बाबा तुम्हारे पास आना चाहता हूँ चार 5 दिन के लिए मैंने कहा
- 1:22:03भाई क्या करोगे चार 5 दिन? बाबा मैं देख रहे होऊंगा कि तुम
- 1:22:10वाकई ही दूध पीते हो और कुछ नहीं खाते।
- 1:22:13मैंने कहा भाई अगर मैं खाता भी होऊंगा जैसे अनशन वाले करते हैं,
- 1:22:19आम तौर से तो उसमें मैंने कब आप कर दिया तो नहीं खाते हो क्या?
- 1:22:25हम तो खाते हैं बाबा। तो फिर मैं भी कहता होगा तो
- 1:22:29तुम्हें क्या कहता हूँ एक सत्य को उजागर कर रहा हूँ कि नहीं खाता
- 1:22:35हूँ तो नहीं खाता हूँ झूठ मैं बोलता हूँ तो तुम्हारा शरीर कैसे
- 1:22:41चल रहा है अब आगे की बातें मत पूछो।
- 1:22:45यह तो बहुत गहन में चले गए। तुम यह सत्य है कि मैं दूध पीता
- 1:22:51हूँ और मैं परीक्षा नहीं दूंगा, मैं कोई तुम्हारा बुरा मत हो,
- 1:23:01मूर्ख के बनते हो, मैं खाता हूँ तो खाता हूँ तो मैं क्या मतलब?
- 1:23:06कोई पाप है क्या? रोटी खाना नहीं खाता तो नहीं
- 1:23:10खाता, मेरी मौज है, अब नहीं खाते महावीर तो उनकी परीक्षा दे के
- 1:23:15जाओगे मानना पड़ता है ना कि महीने में एक बार भोजन करते हैं।
- 1:23:23और जो शर्त लगा के चलते हैं, अगर वो पूरी होती है तब उसी घर से वो
- 1:23:30भोजन ग्रहण करते हैं तो क्या उनकी परीक्षा लोगे क्या?
- 1:23:33जो तुमने ग्रहण किया वो यही सोचा था तुमने उसकी परीक्षा लेने का
- 1:23:39कोई औचित्य बनता है यह हमारी। निजी जीवन की बातों को हस्तक्षेप
- 1:23:46करने जैसा है। हम खायेंगे, खायेंगे नहीं,
- 1:23:50खायेंगे, नहीं खायेंगे तुम्हारे से इसका क्या मतलब?
- 1:23:55हमने कभी तुम्हारे पर्सनल जीवन के अंदर इंटरवेरेन्स किया, लेकिन एक
- 1:24:00बात सत्य है, झूठ नहीं बोलते। बिल्कुल दो घी पीते हैं बिना शक
- 1:24:07लेकिन तुम्हें विश्वास नहीं दिलाते हम ये हमारा दायित्व नहीं
- 1:24:12बनता किसी भी प्रकार से, हाँ अगर तुम खाना चाहते हो, सिर्फ दूध
- 1:24:20पीना चाहते हो। तो पीके देख लो, पता चल जाएगा
- 1:24:23तुम्हें, लेकिन अगर मर खर गए तो मेरी कोई उम्मीदमारी नहीं ये
- 1:24:30ध्यान रखना इस बात का जिंदगी। मौत कभी भी मिल सकती है, लेकिन
- 1:24:56जीवन कल न मिलेगा। मरने वाले सोच समझ ले कल को
- 1:25:19तुम्हें ये। फल ना मिलेगा, मौत कभी भी मिल
- 1:25:26सकती। है।
- 1:25:29लेकिन जीवन कल न मिलेगा। अगर मर जाएगा तो जीवन नहीं
- 1:25:35मिलेगा, मरने वाले सोच समझ ले। हम रोकते नहीं है तुम्हें कल को
- 1:25:44फिर ये पल ना मिलेगा इस जीवन को अगर तुम तरसोगे तो तुम्हें जीवन
- 1:25:51देने वाला कोई नहीं होगा। इस बात को ध्यान में रखना है।
- 1:25:57अगर मरना चाहते हो तो या तो। गोरख के मरने को स्वीकार कर रहा
- 1:26:03हूँ और वो मरना बड़ा सुख गायक है। अपने अहंकार को मारो अहंकार तुम
- 1:26:13हो, तुम जो हो उसका मरना ही आत्महत्या होता है।
- 1:26:21शरीर तुम नहीं हो उसका मारना आत्महत्या नहीं, हत्या होता है अब
- 1:26:28तुम्हारी इच्छा है तुम मेरी बात को मानो मानो नमन संत कह गए हैं
- 1:26:36तुम शरीर नहीं हो। लेकिन तुम्हारे ऊपर कोई तानाशाही
- 1:26:40थोड़ी करके तुम नहीं मानोगे तो नहीं मानोगे भाई तुम मान लोगे तो
- 1:26:48मान कर चल पड़ोगे और देख लोगे शरीर होके नहीं वो जो चला है उसने
- 1:26:54पाया पी है। जो चला ही नहीं, उसने पाया भी
- 1:26:59नहीं तो बिटिया ने प्रश्न पूछा है कौन है, क्या नाम है?
- 1:27:08ये नहीं बताऊँगा निहाये तो गोपनीय प्रश्न होते हैं इस तरह के।
- 1:27:14लेकिन बस इतना ही कहना चाहूंगा जो प्रश्न बिटिया कर लिया, लेकिन और
- 1:27:20भी सैकड़ों प्रश्न हैं, इसी तरह के हैं उस बच्चे से मैंने पूछा
- 1:27:29अपराध क्या किया तुमने? तो उसने अपराध बताया और अपराध
- 1:27:35बड़ा बच का न था। तभी मैं कहता हूँ न पूर्वा ग्रहों
- 1:27:41से ग्रसित न होना जिसे आज तुम पाप समझते हो, कल का ज़माना उसे
- 1:27:50एक्सेप्ट कर लेगा। ये लेविन के भीतर रहना कितना बुरा
- 1:27:56समझा जाता था किसी वक्त आज लेविन के भीतर रहना आम बात हो गई है।
- 1:28:02और अगर कोई व्यक्ति तब मर गया इसी कारण से तो आज वापस थोड़ी लौटेगा।
- 1:28:09तो मैंने उस बच्चे से कहा देखो। ऐसी गलती करना हो तुम्हारी मर्जी
- 1:28:15में तुम्हे रोकता नहीं मैंने कोई तुम्हारे जीवन का ठेका नहीं दिया
- 1:28:20है लेकिन ये अपराध जो तुम अपराध की श्रेणी में रखते हो ये अपराध
- 1:28:25है नहीं, यह तुझ सी बात है। ये तुम्हारे समाजों की बनाई हुई
- 1:28:32बात है, इसलिए इसको इतना बड़ा दांव मत लगाओ।
- 1:28:39आज आग है, कल ठंडी हो जाएगी, लेकिन जीवन करना मिलेगा मरने
- 1:28:48वाले। सोच समझ लें कल को फिर ये पल न
- 1:28:53मिलेगा, वो तो कभी भी मिल सकती है।
- 1:29:00मरने से पहले मेरी ये बात को याद रख लेना।
- 1:29:04इससे पहले के तुम अगला क्षण मृत्यु का हो, मेरा ये शब्द अवश्य
- 1:29:09गौर कर लेना। मौत कभी भी मिल सकती है लेकिन
- 1:29:16जीवन कल न मिलेगा। मरने वाले सोच समझ ले कल को फिर
- 1:29:24ये पल न मिलेगा। ये समझ के अच्छी तरह से जो
- 1:29:32तुम्हारा मन करता है वो करो, लेकिन ये तुम गलत करोगे क्योंकि
- 1:29:43यह आत्महत्या है या नहीं? आत्महत्या तो वो चीज़ है जीसको
- 1:29:47करने के बाद तुम परम सुखी हो जाओगे, लेकिन ये करने के बाद ये
- 1:29:54तो हत्या है ये करने के बाद तो तुम सुखी नहीं होगे, तुम दुखी हो
- 1:29:59जाओगे इसलिए अगर मेरे से पूछना चाहते हो।
- 1:30:04तो यह आत्महत्या नहीं है, ये हत्या है, हत्या करना चाहे तो तुम
- 1:30:10किसी की भी कर सकते हो, अपने भी कर सकते हो, ये शरीर तुम्हारा
- 1:30:14गुलाम है, तुम्हें मिला है। रथ की तरह इसको खत्म करना चाहते
- 1:30:19हो, कर दो इसमें मुझे कोई? लेकिन तुम्हें इतना बताता हूँ कि
- 1:30:25ये शरीर तुम नहीं हो इसलिए आत्महत्या तो नहीं होगी, हत्या
- 1:30:32जरूर हो जाएगी। हत्या करनी है तो कर दो भाई और
- 1:30:37हत्या का पाप लगा करता है। आत्महत्या का पुण्य लगा करता है
- 1:30:42ये शब्द बड़े उल्टे जान पड़ेंगे तुम्हें आत्महत्या के लिए तो मैं
- 1:30:47तुम्हें उकसाता है, तुम कहो मैं अपना अहंकार समाप्त करने को राजी
- 1:30:54हुआ हूँ मैं तुम्हें दोनों हाथों से।
- 1:30:59अघोष में ले लूँगा, आत्महत्या के लिए राजी हो जाओ ये आत्महत्या तो
- 1:31:04है ही ना, ये तो हत्या है। धन्यवाद।
- 1:31:14श्री कृष्ण गोविन्द? हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव
- 1:31:30श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी। हे नाथ नारायण वासुदेव पितुमात,
- 1:31:47स्वामी सखा हमारे। पितुमा हाथ स्वामी सखा हमारे एनाथ
- 1:32:03नारायण वासुदेव। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे
- 1:32:20नाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद।
- 1:32:28हर मुरारी ए नाथ नारायण वासुदेव। धन्यवाद।