Latest / Baba ji Vijay Vats / 17 Feb 26 - ध्यान बार-बार क्यों भटकता है? अनहद नाद और सहज समाधि का रहस्य!!
Transcript
- 0:04सहज योग क्या है? बाबा सहज योग जाने तुम्हें कुछ ना
- 0:17करना पड़े। सहज से ही घट जाए ऐसा योग, ऐसा
- 0:24मिलन समझिएगा। शब्दों के मतलब को सहज योग क्या
- 0:35होता है? सहज घटता है जो तुम्हारे परिश्रम
- 0:42से नहीं घटता वो होता है सहज और योग मिलन दो चीजों का मिलन।
- 0:54जो सहज से घट जाए। दो चीजों का मेन उसे कहते हैं सहज
- 0:59योग, अनाहत ही सहज योग है जैसे रात का सन्नाटा।
- 1:16आपके परिश्रम से सुनाई नहीं पड़ता।
- 1:22आपके परिश्रम से उसकी उत्पत्ति भी नहीं होती।
- 1:30उसको पैदा करने में आपका कोई हाथ नहीं होता, सहज सहज गढ़ता है।
- 1:42जिसमें आपको कोई परिश्रम ना करना पड़े।
- 1:46वो सहज योग है बहुत से लोगों ने। इसकी व्याख्या कई भांति से की है।
- 2:00नाद शुरू हो जाए सहज योग्य शुरू हो गया अभी कल ही मेरे पास।
- 2:16एक बिटिया का फ़ोन आया नाद शुरू हो गया।
- 2:21बाबा कहीं जाने को दिल नहीं करता और फिर मैं भी पक्षना साधना करती
- 2:30थी। जैसे ही मैं सांसों पे ध्यान
- 2:33लगाती हूँ, हट जाता है, नाद की तरफ चला जाता है।
- 2:43मैं अनापान सती योग करती थी, लेकिन जैसे ही मैं उसकी तरफ
- 2:50अध्ययन करती हूँ। खिसक जाता है।
- 2:54ध्यान नाद की तरफ मन का यह स्वभाव है जिधर आपको आनंद मिलेगा ज्यादा
- 3:09उधर आप भी जाओगे। आपका मन लुत्फ लेना चाहता है।
- 3:18जहाँ ज्यादा लुत्फ मिलता है वहाँ मन गमन करता है।
- 3:29आपको विपश्यना में परिश्रम करना पड़ता है।
- 3:35त्राटक करने में परिश्रम करना पड़ता है।
- 3:41अनापान सती में परिश्रम करना पड़ता है।
- 3:45सहसरार में ध्यान करने से मूलाधार चक्र में, अनहतनाथ में।
- 3:53इन सब में ध्यान करने से आपका परिश्रम लगता है, लेकिन मन
- 4:05परिश्रम नहीं करना चाहता। मन चाहता है।
- 4:14मिल जाए, यूं ही मिल जाए, यूं ही मिल जाए।
- 4:22ऐसा होता है अनाहतनाथ बहुत से लोगों के मेरे पास कॉमेंट्स आते।
- 4:30बाबा मैं तो परमात्मा तप को भी नहीं मानता।
- 4:35जब से जन्मा हूँ कोई पाठ पूजा, कोई चालीसा, कोई व्रत, उपवास,
- 4:42तीर्थ, यात्रा, कवि, मंदिर, गुरुद्वारा, कभी मस्जिद।
- 4:50कहीं नहीं गया। मेरे अन्नादनाथ बड़े जोरों से खुद
- 4:54बखुद उछल गया। इसे कहते हैं ईश्वर कृपा और जब भी
- 5:02ये घटता है आपके प्रयास से ये घटता नहीं, यह शुरू होता है।
- 5:10उसकी कृपा से कर्मी आवय कपड़ा नदरी मोख द्वार ये मुक्ति का
- 5:24द्वार है अनाहतनाथ। मुक्ति का द्वार उसकी कृपा के
- 5:33बिना खुलता नहीं। जब उसकी कृपा बरसेगी तो मुक्ति का
- 5:43ये द्वार खुलेगा। आनंदनाद आपके बिना प्रयास से शुरू
- 5:48होता है। ये है सहेजे योग इसमें आपको कुछ
- 5:52नहीं करना होता। आप आस्तिक भी नहीं, आप कुछ नहीं
- 6:01किया भी नहीं कोई पूजा पाठ। दीपक भी नहीं जलाते, किसी यात्रा
- 6:08पे भी नहीं जाते। किसी देवी देवता का भी पूजन नहीं
- 6:12करते कोई यज्ञ हवन भी नहीं किया बैठकर माला भी नहीं फेरी।
- 6:21सहज से 1 दिन घट जाता है, ये शुरू हो जाता है।
- 6:27ये शून्य की आवाज़ अश्मात ही कानों में गूंजना शुरू हो जाती
- 6:33है। क्या करूँ बाबा?
- 6:38मेरा ध्यान हट जाता है। ये आर्टिफीसियल ध्यान है जो
- 6:43तुम्हें लगाना पड़ता है। जब अनाहतनाद शुरू हो गया तो आप
- 6:52लाख कोशिश कर लेना इतना रस इतना मिठास, इतना आनंद।
- 7:02उस अनिंस्ट्रक्टेड साउंड में भरा है।
- 7:06इतना प्यार का संगीत उसमें भरा है कि आपका ध्यान कहीं और ठहर ही
- 7:16नहीं पाएगा। और जिन विचारों को धकेलते, धकेलते
- 7:24लड़ते लड़ते झगड़े करते, आपने उम्र गँवा दी, वो विचार सहज से
- 7:35रुक जाते हैं। रोज़ मुझे प्रश्न आती हैं बाबा मन
- 7:42बहुत तंग करता है, परेशान करता है, ये करो, वो करो यहाँ चले जाओ
- 7:52वहाँ चले जाओ। ये खा लो ये कमा लो बड़ा परेशान
- 8:00करता है लेकिन जैसे ही अनहदनाथ शुरू होगा आप पाओगे, इसकी
- 8:10प्रगाढ़ता बढ़ी और धीरे धीरे धीरे धीरे।
- 8:16आपके सभी विचार समाप्त हो जाएंगे। आपको इतना रस आएगा कि मन कोई सवाल
- 8:26ही नहीं खड़े करेगा और मन कोई इच्छा और वासना भी खड़ी नहीं
- 8:31करेगा। सहज समाधि भली रहे साधो, सहज
- 8:40समाधि भली, जो सहज से घट जाए वह समाधि ही भली है जो तुम्हारे
- 8:49परिश्रम से घटे वो समाधि नहीं है। तुम्हारे परिश्रम से कभी समाधि
- 8:57घटती भी नहीं। भ्रम पाल दिए हैं तुम्हारे
- 9:05श्रेष्ठ पुरुषों ने, तुम्हारे आध्यात्मिक गुरुओं ने?
- 9:11ये भ्रम पालती हैं अगर किसी के भीतर आनंद नाँद शुरू हो गया,
- 9:24परमात्मा की कृपा बरस गई क्योंकि परमात्मा की कृपा के बिना।
- 9:31ये नाद शुरू होता ही नहीं और अगर उसकी कृपा भरस गई है तो आपके
- 9:38सामने कोई चाहे 100 साल से जप, तप, पाठ, पूजा और कोई अभ्यास करने
- 9:47वाला बैठा फीका पड़ जाएगा। उसने कभी आपके अन्नतनाद का 1 मिनट
- 9:57का नजारा एक से 40 वर्ष के जब तक पूजा पाठ में नहीं लिया होगा,
- 10:06धीरे धीरे अगर ये शुरू हो जाए। आप चाहोगे भी तो भी नाम न जब
- 10:13पाओगे ध्यान रखना देख लेना जब के फिर या तो आपका नाद शुरू नहीं
- 10:21हुआ। दोनों में से एक बात है अगर आपका
- 10:26नाद शुरू हो गया है। और फिर भी आपका ध्यान जप करने में
- 10:33जाता है तो एक बात स्पष्ट है कि आपका शुरू हुआ ही नहीं।
- 10:40कौन उस मदर झंकार को छोड़ना चाहेगा, एक पल के लिए भी नहीं?
- 10:48ऐसा मूर्ख कोई नहीं होगा। वहाँ से ध्यान हटते ही नहीं तो ये
- 10:57शब्द हाथ पांव से काम कर चीत, निरंजन नाप।
- 11:06ये जो आनंदनाथ की आवाज गूंज रही है, जब आपके सारे फर्ज आप निभा
- 11:17रहे हो, भीनी भीनी धीमी धीमी सुनेंगे।
- 11:25वो बकायदा शुरू है, चालू है एक बार शुरू हुई फिर नहीं अड़ती
- 11:33हटाना भी चाहो तो नहीं हटती तो आप जाप ना कर पाओगे तुम जाप करके
- 11:47दिखाना। अगर आपके भीतर आनंद आनंद शुरू हो
- 11:51गया है या फिर आपका नाद अभी शुरू हुआ है, आपको भ्रम पैदा हो गया
- 11:58है। नाद हुरु शुरू होने का एक ही।
- 12:09ढंग है परखने का कि आपका मन उस रस को जब पिएगा तो आपका मन सभी
- 12:17प्रकार के रसों से बेमुख हो जाएगा।
- 12:22परसों ही मुझे एक कमेंट आया बाबा अब तो जीने का भी दिल नहीं करता,
- 12:28वैराग्य पैदा हो गया, क्यों? क्योंकि इतना रस संसार के किसी
- 12:36वस्तु में हमने पहले चखा नहीं था। इसीलिए वैराग्य पैदा हो।
- 12:42और वैराग्य का अर्थ क्या है? बाज आए इस मोहब्बत से उठा ले पान
- 12:49दान अपना वैराग्य का क्या मतलब है?
- 12:55बाज आए इस मोहब्बत से उठा ले पान दान अपना।
- 13:02अपना पान दान उठा ले इस महब से तोबा ये संसार से तोबा ये संसार
- 13:10के भूगों से तोबा ये संसार की कोलेक्शन से तोबा संसार के
- 13:17पदार्थों से तोबा। जीने का दिल नहीं करता, सही
- 13:26रास्ता है, बिलकुल सही रास्ता है इसको पीते जाओ, पीते जाओ जैसे ही
- 13:35जीने का दिल नहीं चाहता। वैसे वैसे तुम्हारे मोह भंग होते
- 13:40रहेंगे यानी आइडेंटिफिकेशन टूटती रहेंगी।
- 13:49अगर भोगों से टूट जाए आइडेंटिफिकेशन तो जो ऋषि गण।
- 13:57जो योगी सैकड़ों सालों में हजारों सालों में ये काम नहीं कर पाए, कर
- 14:05करके नहीं कर पाए, अभ्यास कर करके नहीं कर पाए।
- 14:16वह तुम्हें बिना किये उपलब्ध हो जाता है।
- 14:22ये बंधन टूट जाता है। इस नाद के शुरू होने से इसे सहज
- 14:34योग इसे ही कहते हैं। इसमें आपको कुछ करना नहीं पड़ा।
- 14:42अगर कुछ करना पड़ा है तो मुझे बता दो।
- 14:48तुम्हारी किसी मेहनत से ये पैदा नहीं हुआ।
- 14:52अस्मात इसकी गूंज फूटी भीतर से एक झरने की तरह और आपको इस गूंज में
- 15:01आनंद आना शुरू हुआ, रस आना शुरू हुआ और जीसको रस आना शुरू हुआ
- 15:11समझो। परमात्मा रस रूप है।
- 15:18परमात्मा खुद उतरने लगा आपके भीतर क्योंकि वह रस रूप है और तुम्हें
- 15:27उस रस की अनुभूति होनी शुरू हुई। यानी परमात्मा स्वयं तुम्हारे
- 15:33भीतर दस्तक दे रहा है। नाद गूंजेगा, उसकी कृपा से
- 15:41तुम्हारे कुछ करने से नहीं होगा और जैसे ही नाद शुरू हो जाए, तुम
- 15:49पाओगे। के आपका ध्यान कहीं और ठहरता ही
- 15:54नहीं? मधुर बंसरी की आवाज भगवान कृष्ण
- 16:01जब बंसरी बजाते थे तो गोपियां अपनी सुध बुध भूल जाती थी।
- 16:10रोटी पक रही है, सब्जी दाल गल रही है छोड़ छाड़ के भाग पड़ती थी
- 16:15भगवान कृष्ण की बांसली की तरफ आकर्षित हो जाती और वहाँ उसका
- 16:21मधुर संगीत का पान करती भूल जाती हम छोड़ के क्या आए इतनी मधुरता?
- 16:30खो जाती, वहीं बस इतनी मधुरता ही जाग जाएगी।
- 16:36तुम ये सारे कर्ज फर्ज भूल जाएंगे।
- 16:41सब्जी बना रही थी, रोटी बना रही थी अपने बाल बच्चों के लिए,
- 16:45परिवार के लिए। जैसे ही उसकी मुरली की धुन सुनाई
- 16:50पड़ी, कानों में भाग निकली उस तरफ और देखिये स्त्रियाँ तो स्त्रियाँ
- 16:59गोपियाँ तो गोपियाँ गायों तक पशुओं तक।
- 17:07चिड़ियों तक पंछियों तक कोयलों तक उसके आसपास वृक्षों पर बैठे उस
- 17:14मदर ध्वनि का पान कर रही थी गायें दौड़ के आ जाती उस मदर संगीत का
- 17:23रस मानने के लिए। एक अनूठा रस था उनकी इस बांसुरी
- 17:30की जनकाहट के बीच बस ये एक जनकाहट ही है।
- 17:38ये एक अमृत का रस ही है जो तुम्हारे भीतर पैदा हुआ।
- 17:44और तुम्हारे प्रयास से पैदा जो चीजें नहीं होती, वह परमात्मा की
- 17:49देन होती है और परमात्मा की देन सदा ही अमूल्य होती है।
- 17:54उसका कोई मोल तोल नहीं होता, कोई भाग नहीं होता, कोई दाम नहीं
- 18:01होता। प्रेम ऐसी ही अमोलक घटना है, बिना
- 18:08दान के मिलती है, प्रेम न बाड़ी उपजय प्रेम न हार्ट बिगाय, राजा
- 18:18परचा यही रूचाई शीश देह ले जाए। शीश दे दे यानी अपने अहंकार का
- 18:25त्याग करते हैं और ले जाए। जब प्रेम भीतर घटता है तो प्रेमी
- 18:34भलीभाँति जानते होंगे। दूर बैठे हजारों मील पे बैठे।
- 18:41प्रेमी की याद प्रेमिका की याद भीतर एक मिस्री सी बोलती रहती है
- 18:46जिसे हम रस कहते हैं। बार बार याद आए उसकी मन चाहता है
- 18:52उसमें डूबना रसधर मन के लिए। एक आनंददायक स्वर है।
- 19:04आपको मेहनत ना करनी पड़ेगी। मन को जीतने के लिए मन जीता गया,
- 19:14मन पर काबू पा लिया गया। जैसे ही ना भी शुरू होगा।
- 19:21तुम्हारा मन तुम्हारे काबू में आना शुरू हो जाये, कोई उपद्रव
- 19:26नहीं खिलारेगा मन दिन भर रात इस अमृत रस का पान करने में व्यस्त
- 19:33रहेगा। इसको कहाँ फुर्सत हो ज़मेलों में
- 19:39झंझटों में? ये खुद उगता या फिरता है और इसको
- 19:45एक अमृत का स्वाद मिल गया। अनोखा अजीब जो आज तक ऐसा स्वाद
- 19:50अमृत का कहीं से भी न मिला था। आज पहली दफा चखा है इसने।
- 19:58तो आज तो ये पान करेगा और धीरे धीरे उस रस में इतना विलीन हो
- 20:03जाएगा कि इसको तुम्हारी संसार की बातें अच्छी ना लगेंगी।
- 20:10बाबा मन नहीं करता किसी से बोलने का हाँ हाँ बिल्कुल ऐसा ही होगा।
- 20:18ऐसा ही होगा। जीने से व्रती हो जाएगी इस संसार
- 20:25से व्रती हो जाएगी इस संसार से वैराग्य जन्म जायेगा।
- 20:32कुछ भी अच्छा न लगेगा। जीस चीज़ के पीछे दुनिया भाग रही
- 20:37है ढूंढ रही है ये लड़ाई झगड़े ये मार काट धाड़ वो चीजें तुम्हें
- 20:47फीकी लगने लगेंगी। उसमें तुम्हें कोई रस ही ना।
- 20:51हो? मन उससे दूर भागेगा मन कहेगा बस
- 21:02मुझे तो उस जगह ले चलो जहाँ उसकी आवाज गुंजायमान हो रही है जहाँ वो
- 21:09अमृत बरस रहा है, चल हंसा उस देश। समुद्र जहाँ मोती चलो वहाँ चले ये
- 21:22गम की दुनिया में मेरा मन नहीं करता, अब रहने को तुम्हारा मन
- 21:27करेगा, मैं नहीं रहना चाहता ए मेरे दिल कहीं और चल।
- 21:36गम की दुनिया से दिल भर गया ढूंढ ले अब कोई घर नया नया घर मिला है
- 21:44तुझे नया रास्ता मिला है तुम्हें नया जीवन जीने का संगीत मिला है
- 21:50तुम्हें? न्याय जीवन जीवने की राह भीतर से
- 21:54उमड़ी है झरना फूटा है आनंद का, भीतर से मन चाहेगा उसका पान करना
- 22:02और तुम चाहो ना चाहो तुम्हें उसका साथ देना ही होगा।
- 22:09मन मित्र हो जाता है। यहाँ भगवान कृष्ण कहते हैं कि मन
- 22:15ही तुम्हारा मित्र और मन ही तुम्हारा शत्रु, इससे पहले मन
- 22:20तुम्हारा शत्रु था, नए नए बखेरे रोज़ खड़ा करता था।
- 22:27नई नई वासनाएं रोज़ खड़ी करता था। नई नई इच्छाएं संकल्प स्मृतियां
- 22:35रोज़ खड़ा करता था लेकिन अब वो कोई उपद्रव खड़ा नहीं करता।
- 22:41अब तो मन लागो मेरो राम। फकीरी में नहीं चाहिए।
- 22:50मुझे कुछ वैराग्य हो जाता है जो सुख पायो राम भजन में राम भजन
- 22:58शुरू हो गया भीतर से ये संगीत। ये आवाज ये अजपा जाप भीतर से शुरू
- 23:06हो गया। ये नाद रूपी जाप भीतर से पैदा हो
- 23:12गया। अब मेरा मन इस फकीरी में लग गया।
- 23:22जो सुख पायो राम भजन वो सुख नहीं अमीरी में, अमीरी में वो सुख नहीं
- 23:31सो झंझटें हैं, उसका खेंच लो, उसका छीन लो, उसे ठगी मार लो,
- 23:40उसका गला काट दो। उसकी जायदाद हड़प लो, उसका पैसा
- 23:46अपने खजाने में भर लो। ये सभी विकार नष्ट हो जाएंगे और
- 23:55तुम्हारे भीतर एक ऐसा रस उत्पन्न होगा, जिसकी कोई कीमत नहीं।
- 24:02मन बड़ी चीज़ को देखकर छोटी चीजों को छोड़ दिया करता है।
- 24:07अगर तुम्हारे हाथ में कंकड़ पत्थर है तो जैसे ही तुमने हीरों के
- 24:12दर्शन कर लिए, तुम्हें कंकड़ पत्थर छोड़ने नहीं पड़ेंगे।
- 24:18हीरे दिखते ही। तुम्हारे हाथ के कंकड़ पत्थर हाथ
- 24:23से छूट जाएंगे और तुम हीरो को हाथ में पर रोकें कौन ऐसा मूर्खों
- 24:31होगा? हीरो के होते हुए कंकड़ पत्थरों
- 24:35को हाथ में भरे रखे जेबों में भरे रखे।
- 24:40कौन ऐसा मूर्ख? होगा प्रभु।
- 24:47संघ जब प्रीत लगती है तो ऐसे ही भाव दशा होती है।
- 24:55ऐसे ही भाव दशा में डूब जाती है। मेरा ऐसे ही भाव दशा में डूब जाती
- 25:01हैं। चैतन्य।
- 25:02और ऐसे ही भाव दशा में महावीर और बुद्ध भी डूब जाते हैं।
- 25:10आनंद के खजाने में डुबकी लगाते हैं, आनंद के सरोवर में अमृत के
- 25:16सरोवर कुंड में डुबकियां लगाते हैं।
- 25:23और उन्हें उसके अलावा उससे बड़ा हीरा कुछ दिखता ही नहीं।
- 25:29सबसे बड़ा हीरा पा लिया हीरो पायो गांठ गठे आयो, बस छोड़ दिया सब
- 25:37कुछ धोती की गांठ में। बाधा हीरा और चल दिए अपने घर की
- 25:44तरफ चल हंसा उस देश समुंद जहाँ मोती है उस देश की तरफ तुम
- 25:57प्रस्थान करते हो ये। डोरी पकड़ के अनहर्तनाथ इस एक
- 26:05धागे को पकड़ लेना बड़ा बारीक धौगा है।
- 26:11इस धागे के एक छोर को पकड़ लेना बारीक है लेकिन बहुत मजबूत है
- 26:19ध्यान रख। कच्चा नहीं है।
- 26:22जो टूट जाएगा बहुत मजबूत है परमात्मा की तरह इसका एक लड़ाई
- 26:37पकड़ लेना। और उसको पकड़ के आगे बढ़ते जाना
- 26:44आप पाओगे बड़े से बड़े दरिया पार कर दिया।
- 26:48बड़े से बड़े आसमान तय कर लिए। बड़े से बड़े समुद्रों की गहराई
- 26:55को ना पाए। बड़े से बड़े आसमानों की ऊंचाइयों
- 26:59को न पाएं सिर्फ इस दिखने वाले कच्चे धागे के समान अनंतनाद के
- 27:06साथ इसका एक छोर पकड़ लेना बस। तो आप कहते हो कि मेरा ध्यान हट
- 27:19जाता है, खिसक जाता है, फिसल जाता है, निश्चित ही फिसलेगा तुम
- 27:26चाहोगे तो भी फिसलेगा बार बार फिसलेगा और देखो तुम्हें छोड़ना
- 27:32नहीं पड़ेगा। स्वास्थ्य पर ध्यान तुम्हें हटाना
- 27:37नहीं पड़ेगा। ये कोई मुश्किलात नहीं है।
- 27:40हीरों को देखकर जैसे कंकड़ पत्तर हाथ से खुल जाते हैं, मुठिया खुल
- 27:46जाती हैं। ऐसे ही तुम्हारा ध्यान फिसल जाएगा
- 27:50और उस आनंद नाक पर सिमट जाएगा। उसमें लीन हो जाएगा क्योंकि उसे
- 27:59सुख मिलता है। तुम्हारे इन कंकड़ पत्थरों में
- 28:05उसे कभी तकलीफ के अलावा कुछ मिला नहीं, श्रद्धा ही दुख पाया।
- 28:14संसार के सभी प्रकार के पदार्थों को भोगने में दुख ही पाया।
- 28:22सुख कभी नहीं पाया और वो सुख सुख नहीं था जो बाद में दुख दे गया
- 28:29है। दुख के वेश के ऊपर लिपटा हुआ सुख
- 28:36का एक कवर था। लिफाफा था, भीतर तो दुख ही लिपटा
- 28:43हुआ था। ऊपर दिखाई पड़ने पर सुख लिखा हुआ।
- 28:50ध्यान फिसलेगा कितना ही कोशिश आप देख लो।
- 28:58जैसे ही नाद का स्वर गहरा हुआ तुम कोशिश करके भी अपने ध्यान को कहीं
- 29:05ना ले जा पाओगे। फिर बार बार मुडके वही आएगा, बार
- 29:14बार मुडके अनंतनाथ पर टिक जाएगा ना विपश्यना पर टिकेगा ना अना पान
- 29:22सती पे टिकेगा ना? सहस्रार में टिकेगा?
- 29:26नाही। त्रिकोटी में टिकेगा ना ना भी सल
- 29:31में, ना मूलाधार में ना अनाहत चक्कर में कहीं नहीं टिकेगा।
- 29:39कहीं ठिकाने की चेष्टा करना भी देखना ये परीक्षा है आपकी?
- 29:47नहीं टिकेगा इतना आनंद बरसेगा आपका ध्यान फिसल फिसल जाएगा वहाँ
- 29:55से, लेकिन थोड़ा धीरे से रखना अगर आज नाद शुरू हुआ है।
- 30:03धीरे धीरे इसकी तीव्रता बढ़ेगी और तीव्रता बढ़ने के साथ साथ इसका
- 30:09स्वाद इसकी मिश्री का स्वाद इसका मिठास गहन से गहनतम होता चला
- 30:17जाएगा और एक वक्त आएगा कि तुम चौबीसों घंटे।
- 30:22जैसे ये बज रहा है ऐसे तुम भी इसके साथ चिपके रहोगे ना चाहते
- 30:29हुए भी तुम चिपके रहोगे जैसे लोहा ना चाहते हुए भी चुंबक की तरफ
- 30:36खींचा चला जाता है। लोहे की क्या औकात है?
- 30:40जो एक विशाल चुंबक के सामने खींचा ना जाए लोहे को खींचना ही पड़ता
- 30:47है। नाद के शुरू होते ही तुम्हारा मन
- 30:51कहीं नहीं जाएगा। सभी प्रकार के जाप, तप, पाठ, पूजा
- 31:00सभी प्रसंग सभी भूल जाओगे, बस एक जगह केंद्रित हो जाओगे।
- 31:10मन को केंद्रित करने का प्रयास तो मूर्खता से ज्यादा और कुछ भी
- 31:14नहीं। ये तो अभ्यास है।
- 31:19एक स्थान पे लिखा है की परमात्मा अभ्यास और वैराग्य से मिलता है।
- 31:24मैंने कहा ये गलत है। अभ्यास और वैराग्य दो चीजें
- 31:29बिलकुल अलग अलग हैं, अभ्यास करना पड़ता है, वैराग्य हो जाता है।
- 31:41संबंध बनाना पड़ता है। प्रेम हो जाता है, प्रेम तुम्हारे
- 31:47संबंध बनाने जैसी चीज़ नहीं। प्रेम उस परमात्मा की दात है जो
- 31:52ऊपर से उतरती है आकाश से। और तुम्हारे हृदय पटर पर छा जाती
- 31:59है, अपना साम्राज्य स्थापित कर देती है तो मैं बंद होशी में झकड़
- 32:05लेती हूँ और तुम सर्वस्व भूल जाते हो और अपना सब कुछ न्योछावर कर
- 32:11देते हो। प्रेम ऐसी कमियां है, ऐसा रसायन
- 32:14है चुम्बक की तरह। लोहे की कोई औकात नहीं कि वो
- 32:19चुम्ब की तरफ खिंचा चला ना जाए सो बिलकुल चिंता मत करो, काहे पीछे
- 32:30पड़े हो तुम्हें फल मिल गया आनंद तुम्हारा लक्ष्य था।
- 32:36सुरूर भीतर से पैदा हो गई, ये बनश्री की खनकाहट ये अनंतनाद का
- 32:43अमृत, ये स्वाद तुम्हारे भीतर पैदा होना शुरू हुआ, अब तुम
- 32:48चाहोगे भी तो मन नहीं हटेगा। अड़ियल घोड़े की तरह डटा रहेगा
- 32:54नहीं। अपने कामगार के नित्य प्रतीक के
- 33:01आपके कर्तव्यों को निभाते हुए जैसे ही तुम्हे फुर्सत मिलेंगे और
- 33:10तुम झाकोगे पाओगे। अहिरनिश ये ध्वनि चर ही रही है।
- 33:22तुम ही कहीं गुम हो गए थे बड़े शोक से सुन रहा था ज़माना।
- 33:36तुम ही सो गए दास्ताँ कहते कहते बड़े शोक से सुन रहा था ज़माना
- 33:47तुम ही सो गए दास्ताँ कहते कहते। तुम ही सो जाते हो लेकिन मजबूरी
- 33:59है कर्तव्य पालन करना है बाल बच्चों के लिए रोज़ी रोटी का
- 34:06प्रबंध। करना है।
- 34:09उनके सभी प्रकार के उपाय करने तुम्हारा कर्तव्य है, लेकिन जैसे
- 34:15ही तुम कर्तव्यों से मुक्त हो गई वेलजद भी मिली है फर्जा तुम तेरे
- 34:22मुख दीकता ले बैठा मेनू तेरा शबाब।
- 34:28ले बैठा रंग गोरा गुलाब ले बैठा ये उसका गोरा गुलाब रंग, ये उसका
- 34:39शबाब तुम्हें ले बैठेगा। जैसे ही फुर्सत मिले अपने
- 34:52कामकाजों से झांकोगे अहिरनिश को पुकार रहा है आजा।
- 35:04आ जाओ, मेरी गोद में बैठ जाओ, मेरी करीब बैठ जाओ, मेरे प्यार
- 35:13भरी लोरी सुनो और इसे लोरी की। दुलार से सो जाओ, आराम कर लो, थक
- 35:25गए हो गए मुद्दों से कई कई जन्मों के प्यासे हो सुधा शांत करो, थक
- 35:34गए हो, समाज जाओ, मेरे पास बैठ जाओ।
- 35:41आ जाओ, मेरे समीप बैठ जाओ, तुम चाहोगे भी बाबा, मेरा ध्यान उखड़
- 35:54जाता है। ये तो एक संजीवनी, अमृत संजीवनी
- 36:02रस है। ये खेंच लेगा।
- 36:05तुम्हें बड़ा विशाल चुंबक है। तुम कहीं भी ध्यान लगा दो फर्ज
- 36:12नभाते नभाते दुनिया के ये तुम्हें फेंचा चला जाएगा।
- 36:18हर वक्त तुम्हें अपना ध्यान भी कंट्रोल में रखना होगा।
- 36:22तुम गुम होते होते जाओ, संसार से तालुकात तुम रखना पाओगे, संसार
- 36:34तुम्हें अच्छा न लगेगा संसार की भीड़ बड़क्का संवाद।
- 36:44मन ना करेगा। कि मैं संसार से संवाद करूँ, नहीं
- 36:51संसार तुम्हारे लिए एक। स्वप्न की भांति।
- 36:56हो जाएगा कुछ नहीं है। सपना है।
- 37:00जिन्होंने भी कहा कि जगत एक सपना है।
- 37:03तो उन्होंने कुछ गलत नहीं कहा। सपना ही है क्योंकि इसमें मिलता
- 37:09तो कुछ है ही नहीं। देखो सपने से तुमने कभी कुछ पाया?
- 37:17सपने में तुम। हीरे जवाहरात के मालिक बन गए जगे।
- 37:23हीरे ज्वारा तो कहाँ थे? सपने में तुम बहुत।
- 37:29बड़े मालिक बन गए, पूंजीपति हो गए, जागे तो वो पूंजी कहाँ थी?
- 37:36सपने से कभी कुछ व्यक्ति पाता नहीं।
- 37:42सपना तो मात्र। सपना है तो जिन्होंने कहा कि ये
- 37:46जगत एक सपना है, उन्होंने गलत नहीं कहा।
- 37:51ठीक कहा क्योंकि सपने में तुम कुछ पाते नहीं, संसार में भी तुम कुछ
- 37:56नहीं पाते, लाख इकट्ठा करो। सपने।
- 38:01में कितना ही? इकट्ठा कर नींद खुलेगी, आंख
- 38:05खुलेगी, जागोगे पाओगे हाथ खाली? उठिया खुल जाएँगी।
- 38:14अंतःसर आपका भी यही होना है। आपका सपना 1 दिन टूट जाना है।
- 38:20आपने जो बनाए। ये विशाल।
- 38:27साम्राज्य जो आपने स्थापित किए। हीरे, जोहरा, जमीन।
- 38:33जायदाद रुतबा कुर्सियाँ। बैंक भर दिए।
- 38:40आपने। दास, दासियाँ।
- 38:45रानियों। पुत्रियां।
- 38:52ये तुम्हारा खजाना। रथ, घोड़े, हाथी।
- 38:57जहाज? बहुत खुश कमाया सपने में, लेकिन
- 39:01सपने में जो भी कुछ मिलता है, कभी जागकर तुमने पाया तुम्हारे हाथ
- 39:07में कुछ था? नहीं था।
- 39:12आंख खुली तो पाया नदारक सपना था। टूट।
- 39:19गया मेरा सुंदर। सपना।
- 39:24टूट गया बड़े खुश। होते हो?
- 39:28स्वप्न में इतना कुछ हो गया, इतना कुछ हो गया लेकिन मौत आती है धरती
- 39:35पर भीछ जाती। कुछ।
- 39:38नहीं बचता। लाख बचाने की कोशिश करो।
- 39:45कुछ नहीं बचता। सब।
- 39:49छीन के लिए। जाती है मौत तुम्हारे हाथ से और
- 39:53वो सपना ही तो होता है। कुछ।
- 39:56था भी क्या क्या लेकर तुम? आए थे।
- 40:04कुछ नहीं लेकर आए। तुम्हारा कुछ है भी नहीं, शरीर तक
- 40:09भी तुम्हारा इसलिए जो थे वैसे ही चले जो कि क्यों?
- 40:15धर दी नी चदरिया। बड़े जतन से उड़ी थी बहुत जतन
- 40:20किया इस चदरिया को उड़ने का लेकिन मौत?
- 40:27के वेला में। जूं की तूं धर दी नी चदरिया।
- 40:35सब कुछ यहाँ छोड़कर। जाना पड़ता है।
- 40:38अलमाई सांप गुंजिया तियाँ कर चलियाँ सरदारी बहुत।
- 40:46सरदारी कर ली। ये ले चाबियां देख खजाने तुझे।
- 40:54माबारिक हमारा तो कुछ। था ही नहीं।
- 40:58भ्रम था आज टूट गया बैरागी जन्मेगा जीने।
- 41:07की भी। जीवेशणा टूटेगी?
- 41:11जगत सपना लगे। गा ये सत्य।
- 41:15है ऐसा ही। कुछ होना है तुम बिल्कुल सही
- 41:19रास्ते पर चल रहे हो, ज़रा भी इधर उधर जाने की चेष्टा मत करना।
- 41:28भटक। हीरा पाया गांठ।
- 41:32गठ आया और चुप करके जैसे गूंगा गुड़ को खा लेता है, उसका स्वाद
- 41:39वर्णित हो ही नहीं सकता। इसी।
- 41:43तरह बस। आए हो चले जाओ।
- 41:49आए थे खाली। हाथ।
- 41:55लेके जाओगे। सिंहासन?
- 41:59सब्र का सिंहासन। सबर, तृप्ति तुम्हारे।
- 42:06साथ जाएगी। संतोष का दंत हमारे साथ जाएगा।
- 42:12नहीं तो खाली हाथ जाओगे। रोते?
- 42:16पीटते जाओगे। यहाँ का संसार छोड़ोगे बड़ा कष्ट
- 42:20होगा, हृदय विदीणा अवस्था में आ जायेगा।
- 42:24दुखित मन से त्याग कर। और अगर तुमने इस।
- 42:31फुर्ती को साध लिया। इस फुर्ती का संघ रखा भीतर ईश्वर
- 42:37ने नाद को उत्पन्न कर दिया तो फिर कहीं भी ज़ोर लगा लेना।
- 42:43मैं कहता। हूँ छोड़ दो।
- 42:46लेकिन मुझे कहना पड़ेगा ये तो मैं कहता हूँ क्योंकि।
- 42:51शब्दों की भाषा। ऐसी ही बोलनी पड़ती है, हमारी
- 42:55मजबूरी है। नाद पैदा हुआ।
- 42:59नहीं स्वर जंकृत हुआ नहीं आपके भीतर अनहतनाद का और संसार छूटा
- 43:05नहीं देख ले ना कहीं ध्यान जाएगा ना कहीं ध्यान अटकेगा।
- 43:16वहीं हो जाओगे। जो तुमको उसी।
- 43:21घर में लौट। जाओगे जीस घर में तुम आए थे
- 43:26बिछुड़ के बस एक दो। सपना देखा था।
- 43:32बुरा सपना देखा था आज टूट गया। मेरा सुन दर सपना टूट गया,
- 43:39धन्यवाद।