Latest / Baba ji Vijay Vats / 11 Apr 26 - आनंदमय कोष और सूक्ष्म शरीर का रहस्य: सतोरी का मार्ग। नए कर्मों को बनने से रोकने का विज्ञान
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- 0:09बाबा जी कोटि कोटि प्रणाम आपके वादसान सी जीरनानी अथाह विहाय के
- 0:17तीन प्रवचनों ने बहुत स्पष्टता दी।
- 0:24लेकिन। उनके कारण कुछ ऐसे प्रश्न उत्पन्न
- 0:30हो गए जिसकी स्पष्टता अभी होने ही क्या पांच कोष की अपेक्षा से।
- 0:45यह मानना उचित है कि आनंदमय कोष जिसे हम कहते हैं वह सूक्ष्म शरीर
- 0:53का ही हिस्सा है। दूसरा कर्म सिद्धांत के हिसाब से
- 1:00हर कर्म भोगना ही पड़ता है। क्या सूक्ष्म शरीर जिसमें ये सब
- 1:10जन्मो जन्मो के कर्मों का इकट् है, इनके भोगने के बाद ही गलता
- 1:16है? अगर ऐसा ही है तो कर्म भोगने में,
- 1:23फिर। जनमों जनम लग जाएंगे और नए कर्म
- 1:29शुभ या अशुभ बांधते ही रहेंगे। अंतहीन श्रंखला की तरह समझने में
- 1:38कहीं कुछ गड़बड़ हो रही है। दर्शना भलाशी, भारत भूषण
- 2:00कहीं कुछ? समझने में गड़बड़ हो।
- 2:03रही है। सबसे पहली बात समझ लें सिद्धांत।
- 2:13नियम लाश समझ में आते है समझे जा सकते हैं, लेकिन एक तत्व ऐसा है
- 2:29अस्तित्व वह समझ में नहीं आता। बहुत से लोग मुझे अस्तित्व के
- 2:36बारे में सवाल कर देते हैं, क्या मैं उन्हें हाथ जोड़ लेता हूँ?
- 2:44अस्तित्व समझ में नहीं आएगा। ये बिल्कुल ऐसा है जैसे तुम कहो
- 2:50कि गाजर में सागर हो भर। जब कोई ज्यादा जिद करता है ऐसी ही
- 2:56बातों की तो मेरे पास कोई ऑप्शन नहीं होता।
- 3:01मैं उसे ब्लॉक कर देता हूँ। लोग गुस्सा भी होते हैं, लेकिन
- 3:09मेरी मजबूरी है। सिद्धांत समझे जा सकते हैं और 1
- 3:19दिन साइंस विज्ञान आज नहीं कल कल नहीं परसों नर्सों।
- 3:28सभी सिद्धांतों को समझ ले तो कोई बड़ी बात नहीं।
- 3:31है लेकिन समझाएंगे सिद्धांत नियम लाश एक चीज़ फिर भी अछूती रह
- 3:44जाएगी जो समझ में नहीं आती। अस्तित्व अस्तित्व के बारे में
- 3:54कोई सवाल ना पूछें अस्तित्व के बारे में पूछना बिल्कुल ऐसा है कि
- 4:02मेरी गागर में सागर भर दो। मेरे पास ऐसा कोई फॉर्मूला है
- 4:07नहीं, किसी के पास भी ऐसा फॉर्मूला नहीं होता।
- 4:20पूछा कि क्या आनंद में कुछ। सूक्ष्म शरीर का ही हिस्सा है।
- 4:29देखिये याद रखना मेरे उन बातों को अभी ताजा ताजा तीन परवचन गए दे ही
- 4:36दे ही मैं कहता हूँ सूक्ष्म शरीर को।
- 4:42इस दे ही के भीतर ही शारय वासनय इक्षाएं लिप्तताएं आकांक्षाएं,
- 4:57कल्पनाएं, जन्मों की समृतियाँ। सब इसके भीतर भरा पड़ा।
- 5:05है। पांच कोष अन्न में कोष अन्न से
- 5:17बनता है। प्राण में कोष प्राणों से बनता है
- 5:25मन में कोष मन से बनता है। विज्ञान में कोश और पांचवां आनंद
- 5:36महकोश आनंद महकोश के ऊपर आकर। ज्ञानी आध्यात्मिक व्यक्ति यहाँ
- 5:55आके वह जाता है आनंदमय कोश। लोग कहते हैं ये साहुल।
- 6:05है यातना है। नहीं।
- 6:12आनंदा अनुभूति आनंदा अनुभूति जहाँ एकत्रित होती है, वह है आनंदमय को
- 6:23ध्यान से समझना बहुत गहरा फर्क मिलेगा तुम्हें।
- 6:29जैसे एक बल्ब चकरा। है।
- 6:33बल्ब से दूर बैठे हो उस रौशनी में तुम पड़ सकते हो और बल्ब के करीब
- 6:40तुम बलों को हाथ लगाओगे तो तुम्हारा हाथ जल भी सकता है।
- 6:47इतना हीटेड होता है। उस रौशनी के कारण देखता है वो
- 6:54रौशनी। लेकिन बल्ब का बाहर का काँच गर्म
- 7:00हो जाता है और। तुम अगर कहो की रौशनी गर्म होती
- 7:05है। तो ये गलत।
- 7:08यहाँ फर्क पड़ जाता है। मन्नू में कोष प्राण में कोष अन्न
- 7:19में कोष विज्ञान में कोष विचार तो ठीक है पांचवा आनंद में कोष।
- 7:27आनंद में कोश बिल्कुल वैसे ही है जैसे बल्ब जपता हो, बल्ब की रौशनी
- 7:36में सब कुछ पढ़ सकते हो। आप करीब जाके भी पढ़ सकते हो
- 7:41लेकिन अगर छुओ तो यह गर्म होगा आपका हाथ।
- 7:48जल भी सकता है आनंद में कोष बिल्कुल ऐसा ही है जहाँ आनंद की
- 8:00अनुभूतियों का संग्रह होता है। बड़ी भारी बात है समझना।
- 8:06हम जब आनंद की घड़ियों में होते हैं, प्रेम की घड़ियों में
- 8:12प्रार्थना की घड़ियों में अस्त्र पात होते हैं, किसी के वराहों में
- 8:17तड़पते हैं आनंद की घड़ियों में जब होते हैं वो आनंद जिसमें।
- 8:26कोष में इकट्ठा। होता है।
- 8:31आनंद का अनुभव जीस कोष में इकट्ठा होता है वो है आनंदमय कोष।
- 8:39जहाँ अन्न इकट्ठा होता है वो अन्न अन्नमय।
- 8:44कोष। प्राण इकट्ठे हैं, प्राण न कुश मन
- 8:51इकट्ठा है मनो में कुश। जहाँ युक्तियाँ इकट्ठी हैं
- 8:57विज्ञान में। कुश और जहाँ आनंद की अनुभूति
- 9:02इकट्ठी है वो आनंद में कुश। लेकिन आनंद में कुछ सब नहीं है,
- 9:11इसलिए मैं तुमसे कह रहा हूँ यह षट दर्शन, न्याय, वैशिक्षक, शंख,
- 9:21योग, मीमांसा और वेदांत। कोई बड़ी बात नहीं है।
- 9:29आने वाले संत सातवाँ दर्शन इस दर्शन को मान लें।
- 9:37कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि बहुत सी जगह के ऊपर।
- 9:42यह आपके खट दर्शन से मेल नहीं करता लेकिन मैं जो कहता हूँ तर्क
- 9:51पूर्ण करता हूँ जो देखा जो जाना वह तर्क युक्त भाषा में समझाने की
- 10:00चेष्टा करता हूँ। कोई बड़ी बात बड़ी बात है कि
- 10:07सातवाँ दर्शन मेरे दर्शन को मान लिया जाए, क्योंकि बहुत ही जगह के
- 10:14ऊपर यह थोड़ा सा भिन्न मालूम पड़ेगा।
- 10:21प्राण मकोश जीसको आम भाषा में आनंद मकोश जीसको आम भाषा में साउल
- 10:34कहा जाता है लेकिन वो साउल नहीं। साउल के बिल्कुल करीब होने के
- 10:41कारण उसकी जो आनंद की जो अनुभूति होती है, इकट्ठी कर्मों की तरह जो
- 10:50इकट्ठा होता है, वह आनंद में कोश है।
- 10:56इसलिए साउल से इसका कुछ लेना देना नहीं एग्ज़िस्टन्स परमात्मा
- 11:04तत्वों से इसका कुछ लेना देना नहीं, यह अलग है जब आप शास्त्रों
- 11:14को बहुत गहरे से अध्ययन करोगे। तो आनंदमय कोष की परभाषा दी होगी।
- 11:20आनंदा अनुभूति से जो बना हुआ है। अब देखिये क्या फर्क हुआ इस बात?
- 11:26में जो मैं कह रहा हूँ आनंदमय कोष आनंदा अनुभूति से बना हुआ कोष।
- 11:35जो हमें अनुभूतियाँ हुई आनंद की वो उसमें संग्रहित है और ये
- 11:42पांचों कोश आपस में बड़े घनिष्ठ रूप से मिले होते हैं जैसे हमारे
- 11:48शरीर के सारे जंतु एक दूसरे से बड़े घनिष्ठ रूप से मिले होते
- 11:53हैं। चोट लगती है पांव के अंगूठे में
- 11:58और पता चलता है हमारे ब्रेन को। ये सब सूचनाओं के जो केंद्र है
- 12:03उसे क्षण पहुंचा देते है कि अंगूठे में चोट लगी।
- 12:09ये पांच वे इकट्ठे है। इनको अलग नहीं किया जा सकता।
- 12:17अब यहाँ समझे जब पांच वे इकट्ठे हैं तो यह सूक्ष्म शरीर का हिस्सा
- 12:23है। देही देही का हिस्सा है क्योंकि
- 12:30आत्मा देही से अलग है। आत्मा वो है जो इन सबको देखती है
- 12:39सभी कोषों को अनमय कोश मनमय कोश विज्ञान में कोश आनंद में कोश।
- 12:55इन। सबका पांच कोषों का दृष्ट।
- 12:57था वो है आत्मा। अगर तुम आत्मा को साउल को इन पांच
- 13:08कोषों में गिन लोगे, आनंदमय कोष में अगर तुम साउल को गिन लोगे।
- 13:14तो गड़बड़ हो जाएगा तो गड़बड़ मेरे कारण नहीं है।
- 13:21गड़बड़ इन दृश्यों की व्याख्यायों के कारण मैं तो सीधा कहता हूँ कि
- 13:31पांचों कोश। दीज़ अरे सेपरेट फ्रम साउल साउल
- 13:41इस समथिंग एल्स व्हिच इस ओब्सर्वर दृष्टा वो सिर्फ देख रहा है अनुभव
- 13:51कर रहा है। शायद समझा गया होगा अनुभव करने
- 14:01वाली साउल दृष्टा ओब्सर्वर जो जागता।
- 14:06है सोता नहीं। वह इन पांच कोषों का हिस्सा नहीं
- 14:17क्योंकि वो इन पांच कोषों को देखता है।
- 14:20जब तुम आनंद में होते हो तो ये देखता है।
- 14:28देखने वाला और वो जो आनंद की अनुभूति होती है वो जहाँ जीस कोष
- 14:33में संग्रहीत होती है, उसे आनंद में कोश कहते है।
- 14:37मेरे ख्याल में समझा आ गया होगा तुम्हें अगले सवाल को लें हम।
- 14:47यह आप ठीक से समझ लें। आज भी काम आएगा।
- 14:50अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद ये पांच चीजें मैंने बनाई विज्ञान
- 15:02में कोष में सभी प्रकार के। अंतरज्ञान खोपड़ी से संबंधित हो
- 15:11या हृदय से संबंधित हो, इसमें भावनाओं भी है, कृष भी है, द्वेष
- 15:18भी है, खुशी भी है और विचार भी है, अच्छे भी और बुरे भी है ये
- 15:24विज्ञान में। खुश है।
- 15:26अब हम आगे चले। कर्म के सरस्वती कर्म सिद्धांत के
- 15:33अनुसार प्रत्येक कर्म भोगना पड़ता है।
- 15:36बिल्कुल सत्य है। इस लाइन को आप टिक मार्क कर।
- 15:43दो। प्रत्येक कर्म भोगना पड़ता है।
- 15:47यह सत्य है आगे चलिये क्या सूक्ष्म शरीर जिसमें सब जन्मो
- 15:56जन्मो के कर्मों का इकट्ठा है, इनके भोगने के बाद ही करता है?
- 16:05यानी जैसे मैंने दे ही कहा, क्या वह तब गलता है जब सभी कर्मों का
- 16:15फल मोग लिया जाता है? बड़ा सुन्दर सवाल है।
- 16:26देखिए, उसके आगे खुद ही जवाब दे दिया।
- 16:33अगर ऐसा है तो सब कर्म भोगने में जन्मो जन्मो लग जाएंगे, और ये।
- 16:42भोगने वाले वक्त में नए कर्म भी आएँगे।
- 16:49क्या ये अंत हीन जंजाल बनकर न रह जाएगा?
- 16:56सवाल बड़ा पिचगिदा है, लेकिन मैं जवाब बहुत बार दे।
- 16:59चूका हूँ। मैं जानता हूँ भारत भूषण मेरी सभी
- 17:06वीडियो को सुनता है, लेकिन तभी मैं कहता हूँ कि सुनने में चूक हो
- 17:12जाती। है।
- 17:15एक थोड़ा सा शब्द नोट कर लेना। कभी काम आएगा?
- 17:26शिष्य बनना नहीं पड़ता। शिष्य व्यय जो सर्व स्वीकार करने
- 17:33के बाद बन जाता। है।
- 17:39नैचुरली बन जाता है, सहज बन जाता है शिष्य बनने की चेष्टा मत करना
- 17:46शिष्य तुम बन ही जाओगे जब तुम्हें हर चीज़ की सहज स्वीकृति होने
- 17:53लगेंगी। जो होता है वह ठीक होता है।
- 17:58एकोपड़ी से नहीं मानो जो होता है ठीक होता है।
- 18:04अनुभव से जो जाना जाता है उसके बाद ही व्यक्ति शिष्य बनता है और
- 18:12तुम समझते हो कि शिष्य बनो, सब बात को मानो।
- 18:18तो मानने से शिष्य हो जाओगे नहीं जो मान मान के जान लेता है, जो
- 18:27करता है परमात्मा करता। है।
- 18:30उस जानने के बाद शिष्य तो फलीभोत होता है, ऐसे ही महावीर ने श्राव
- 18:35को। तुम सुनते तो हो, लेकिन ऐसा भी हो
- 18:44सकता है कि तुम श्रावक ना हो। सुनने के बाद अगर प्रश्न उठता है
- 18:51तो तुम श्रावक नहीं? ना हो।
- 18:54श्रावक हो ना? अभी शेष है।
- 18:57इसमें कोई पक्षताप की बात नहीं है, कुछ गलत नहीं है, बस इतना है
- 19:04कभी और चलना होगा। श्रावक जीस दिन बन गए।
- 19:12शिष्य जीस दिन बन गए। उसकी एक पहचान है।
- 19:16जैसे ज्ञानी का रक्षण होता है, वैसे ही शिष्य की पहचान है, शराबक
- 19:23की पहचान है, उसके बाद प्रश्न नहीं उठेगा।
- 19:29अगर प्रश्न अभी उठता है, तुम अपने आप के खुद के मेज़रमेंट से ही।
- 19:35अपने आप को कसते रहा करो क्या प्रश्न उठता है, देखो ऐसा ना हो
- 19:41कि तुम प्रश्न तो उठे लेकिन बताओ ना?
- 19:46वह भी गलत हो गया। जैसे लोग को वासना ही तो उठते है
- 19:51लेकिन वह ब्रह्मचर्य का लेवल लगाए रखते है।
- 19:53हम तो ब्रह्मचार्य हैं, अक्रोधी हैं, लोग क्या कहेंगे?
- 19:58वो तो फिर झूठ हो गया ऑथेंटिफिकेशन न हुआ कॉन्फ्लिक्ट
- 20:08हो गया। जीस दिन शिष्यत्व फलित फलित होगा।
- 20:16श्रावक फलीभूत होगा। भीतर से उसकी पहचान बता रहा हूँ।
- 20:22कस लेना? सिर्फ हीन भावना से मत भरना।
- 20:29उस दिन भीतर से प्रश्न नहीं उठेगा, भीतर से नहीं उठेगा।
- 20:34दबाने की भी कोई आवश्यकता नहीं। अगर प्रश्न आए तो पूछ लो, लेकिन
- 20:40प्रश्न वो पूछना जो नियमों से संबंधित है मैंने पहले?
- 20:47भी बताया था। नियमों को समझा जा सकता है।
- 20:55अस्तित्व को समझा नहीं जा सकता। इसको गोल्डन शब्द में लिख के रख
- 20:59लेना, अपने पास अपने कमरे में रख लेना।
- 21:05लोग मुझे अस्तित्व के बारे में सवाल पूछते हैं।
- 21:11और फिर जब बहुत समझाने की चेष्टा करता हूँ, वह मानते नहीं।
- 21:15जवाब देते ही चले जाते हैं तो मेरे पास कोई ऑप्शन नहीं भाई
- 21:18सुनते जाओ। ऐसे प्रश्न करना मेरे पास वर्जित
- 21:22है। मैंने और भी बहुत कुछ बोलना।
- 21:25है वक्त का? ऊंट पटांग सवालों के जवाब देता
- 21:33रहा तो तुम्हारे ये प्रश्न आने वाली जेनरेशन के लिए घातक सिद्ध
- 21:39होंगे। क्यों उनका समय तुम खा जाओगे?
- 21:44इसलिए मेरी करबद्ध प्रस्थान है। ऐसा प्रश्न मत पूछना जो तुम्हारे
- 21:50जी का जिंजाल ना हो संसारिक सवाल भी तुम्हारे जी का जिंजाल बन सकते
- 21:56हैं। तुम इतने कर्जदार हो, लोग तुम्हें
- 22:00तंग करते हैं, वो प्रश्न मुझसे मत।
- 22:02पूछना। वो संसारिक प्रश्न तुम्हारी जी का
- 22:06सिम जानने को गाटा पड़ गया, प्रश्न पूछना अध्यात्म से संबंधित
- 22:15जैसे ये प्रश्न पूछा, भारत भूषण क्या ये कोष सूक्ष्म शरीर का
- 22:21हिस्सा है? या कर्मों के फ़िलिप्स पे ये
- 22:25प्रश्न है जवाब दे नहीं दोगे तो प्रश्न तब पूछना जब जी का जंजाल
- 22:33बन जाए, दिमाग तो लग जाए, सॉल्व ना कर सके?
- 22:38गुरु की आवश्यकता वहीं होती है। वह उलझी हुई गांठ के ध्वगे को
- 22:47उलझन से निकाल के स्ट्रेट कर देगा।
- 22:50ये रोजा का प्रत्येक कर्म भोगने के बाद ही समाप्त।
- 23:00होगा। पहली बात तो ये आप नोट कर लेना
- 23:05दूसरा प्रश्न पूछा है, मैंने भी कहा।
- 23:12सभी संतों ने कहा भोगने से ही नर झरा होती है।
- 23:20दे ही गल जाता है सारा पूरा का पूरा जैसे पतीले का पानी सारा
- 23:26वाष्क बन के उड़ गया और पतीला खाली हो गया, जलने लगा अब तो
- 23:33पतीला जलने लगा। पानी खत्म हो गया तो सब कर्म भोग
- 23:38लिए गए। दे ही गल गया और जब दे ही गल गया
- 23:42तो तुम पारदर्शी हो जाओगे, पारदर्शी हो जाओगे तो स्वयं को
- 23:52जान सकने की क्षमता हो जाएगी। लेकिन ये प्रश्न बीच में आड़े आता
- 24:03है और बिल्कुल सही प्रश्न है और सभी का प्रश्न है तुमने पूछ लिया
- 24:08बहुत अच्छा किया अगर गलने तक इंतजार किया जाए, दे ही का?
- 24:19सभी कर्मों का जो पिछले कर्म है, भोग कर ही समाप्त होंगे।
- 24:28देही के गलने का सूक्षम शरीर के गलने का इंतजार किया जाए तो उस
- 24:35गलने के प्रोसेसर में जो नए कर्म होंगे।
- 24:38क्या वो हमें नहीं बदलेंगे? बस यही गुरु का काम है।
- 24:43प्रश्न बिल्कुल ठीक है, गुरु का यही काम है, कर्म बनते क्यों हैं?
- 24:52यहाँ पे आ जाओ, पहले कर्म बनते हैं।
- 25:00तुम्हारे अज्ञान के कारण जब तुम करता होते हो तो मैं भाव से किये
- 25:10हुए कर्म। तुम्हारे कर्म बनते हैं जो
- 25:18तुम्हें बांध सकते हैं। जब तुम अकरता होते हो तो जो भी
- 25:28तुम कर्म करोगे वो तुम्हें बांधते हो।
- 25:32ये कैसे? संभव है।
- 25:34दो तरीके से संभव। एक तो सतोरी की झलक देख।
- 25:39लो। सबसे पहले जब तुम सतोरी की झलक
- 25:45देख लोगे ये बाबा नानक ने 17.5 साल की उम्र में सतोरी की झलक
- 25:51दिखी और 36 साल की उम्र में। उन्हें समाधि फलित हुई।
- 26:02कितने साल लग गए 18.5 साल लग गए सतोरी की झलक देखने के बाद?
- 26:14तुम्हारे नए कर्म नहीं बनेंगे। अब इसको आप अच्छी तरह से लिख ले।
- 26:22क्या है ऐसा सटोरी की झलक में सटोरी की झलक में ऐसा यह है।
- 26:33कि तुम स्पष्ट से देख लेते हो कि करने वाला मैं नहीं है और करने
- 26:41वाला मैं हूँ, यही तुम्हें मानता है।
- 26:47सटोरी की झलक में यही तुम्हें दिख जाता है कि करने वाला वह है।
- 26:54जिसे हम विराट कहते हैं, जिसे हम सर्जक कहते हैं, कर्ता कहते हैं,
- 27:02बाबा नानक ने उसे कर्ता कहा एकोंकार कर्तापुरक।
- 27:12वह करता है। सतोरी की झलक में ये दिख जाता है
- 27:18कि वह करता है मैं करता हूँ नहीं और जैसे ही सतोरी की झलक दिखी।
- 27:27तुम्हारा मैं भाव क्षीण हो गया तो दक्ष तुम्हारा, मैं गिर गया कर्म
- 27:32उसके बाद भी होंगे कर्म तो कृष्ण भी करते है, कर्म बुद्ध भी करते
- 27:37है समादृष्ट होने के बाद घटना घटने के बाद 40 वर्ष तक बुद्ध
- 27:45जीवद। और करीब 30 वर्ष तक महावीर जीवित
- 27:51रहता है। 72 साल की उम्र में महावीर ने
- 27:58निर्वाण प्राप्त केबल प्राप्त किया 80 वर्ष की उम्र में।
- 28:06बुद्ध ने निर्माण प्राप्त किया। समाधि की घटना के बाद 40 साल जिए
- 28:18बुध और करीब 3032 साल तक जिए बात नानक भाई।
- 28:2836 वर्ष की उम्र में स्वादिष्ट हुए 70 वर्ष की उम्र में 34 वर्ष
- 28:35तक जीवता है। यह जो स्वादिष्ट होने के बाद का
- 28:41वक्त है, उसमें कर्म तो होते ही है।
- 28:48और सही पूछो तो वही करम हम लिखते हैं संत जब पहुंचता है उसके बाद
- 28:54उसने क्या किया? मूर्ख लोग होते हैं जो पहले की
- 28:57बात पूछते हैं, मुझे आज आते हैं प्रसन्न बाबा उससे पहले आप क्या
- 29:01करते थे? मैंने कहा उससे पहले तो मैं आवारा
- 29:04करती। थी।
- 29:07हाँ, बिलकुल आवारा करती है और ध्यान रखना समाधि से पहले जो भी
- 29:19कुछ होता है वो आवारावर्दी ही होता।
- 29:21है। उसका कोई मतलब?
- 29:24नहीं होता। क्योंकि समाधिष्ट होने से पहले या
- 29:30सतौरी के झलकाने से पहले तुम जो भी करोगे उससे तुम्हारा दे ही
- 29:35मजबूत होगा। सूक्ष्म सिरे बढ़ेगा, घटेगा और दे
- 29:41ही का मजबूत होना बंधन का मजबूत होना है।
- 29:50दो तरीके हैं। शुरुआत की बात कह रहा हूँ, ध्यान
- 29:56से सुन या तो सटोरी की झलक दिख जाए।
- 30:00जो करता है वह करता है तो तुम्हारे जो कर्म बनेंगे।
- 30:08उसमें कर्ता भाव ना होने के कारण वो कर्म संग्रहित नहीं होते।
- 30:16वो दही को बढ़ाएंगे नहीं तो नए कर्म नहीं बनेंगे।
- 30:21तो भारत भूषण ने यही प्रश्न पूछा कि नए कर्म होते रहेंगे?
- 30:26पुराने भुगतते रहेंगे, नए होते रहेंगे, जुड़ते रहेंगे, घटते
- 30:30रहेंगे। फिर तो कभी भी ये तो अंत हीन जाल
- 30:32हो गया बिल्कुल ठीक है लेकिन अंत हीन जाल नहीं।
- 30:42होगा। जब नए कर्म बनने बंद हो गए, तब
- 30:49सटोरी के चलते दूसरा तुम सही शिष्य बन जाओ, श्राव का बन जाओ।
- 31:02घटना बड़ी प्यारी है, गहरी है। मैंने जो पहले इसका जिक्र किया का
- 31:09और श्रावक का वह जो ही नहीं किया, उसका कारण था।
- 31:13मुझे पता था मुझे आगे ये काम पड़ेगा जब तुम सुनते हो।
- 31:24कभी दत्तात्रेय बीच में फंस जाते है, कभी कबीर फंस जाते है, कभी
- 31:28नानक। फंस जाते है।
- 31:30वो चले गए। कभी कृष्ण फंस जाते है तो अगर कोई
- 31:36भी फंस गया बीच में जो मैंने बोला।
- 31:42तो तुम शिष्य नहीं होगे तो तुम शरावक नहीं होगे, महावीर बोलते
- 31:50हैं, बीच में फंस जाते हैं। कृष्ण तो तुम शरावक नहीं होगे।
- 31:58नानक बोलते हैं। तुम्हारे दिमाग में चलता है
- 32:04दत्तात्रेय यशंकर या कृष्ण तो तुम शिष्य नहीं और शिष्य का ना होना
- 32:14और श्राव का ना होना बंधन का कारण?
- 32:19फिर तुम जो भी सुनोगे वो तुम्हारे लिए गांठ बन जायेगा, मजबूत हो
- 32:23जायेगा और सूचना इकट्ठी हुई देही और बढ़ा सूक्ष्म शरीर और बढ़ा
- 32:31गांठ और ज्यादा मजबूत होंगे। सुनना ऐसा होना चाहिए जो तुम्हें
- 32:39मुक्त कर जाए। सुनना ऐसा होना चाहिए, जो
- 32:45तुम्हारे भ्रमों को खत्म कर दे, तोड़ दे और बहुत से भ्रम तुमने
- 32:53पाल रखे। वो सहज भ्रम तो तुम तोड़ देते हो।
- 33:00घर से बाहर निकलते वक्त दायां पैर बाहर नहीं निकालना बाएं निकालना
- 33:06है, दयां निकालना है, ये सब तुम्हारे भ्रम में है, तुम ये तो
- 33:09छोड़ दोगे, बड़ी आसानी से बड़ी आसानी से छोड़ दोगे।
- 33:16लेकिन बहुत सी ऐसी मान्यताएँ हैं जो तुम्हारे जी का हिस्सा बन गए।
- 33:22जीवन का हिस्सा बन गए देवी देवता भूत प्रेत, पित्तर गुरुदेवता।
- 33:37ये तुम्हारे जीवन का हिस्सा बन के दिन रात तुम इनकी पूजा करते हो और
- 33:43मैंने पिछले प्रवचन में कहा। था।
- 33:49यह एनर्जी है। यानी विद्युत और विद्युत के अगर
- 33:58तुम सौर 100 प्रचार पूजन करोगे, तिलक लगाओगे, अक्षत चावल लगाओगे,
- 34:05टीका करोगे? फूल बरसाओगे लगाओगे या बेवकूफ़
- 34:15नहीं होगे। बिजली को अगर तुम पूछोगे तो यह
- 34:22मुड़ता नहीं है, लेकिन तुम पूछते हो?
- 34:28इसका मतलब बात तुम्हारे गले से नीचे उतरी तुम बदले यहाँ से सुन
- 34:36जाओगे तुम घर जाके फिर कृष्ण भगवान की मूर्ति का के तुम टल
- 34:42खड़खड़ना शुरू हो जाओ, मंदिर में जाओगे टल खड़खड़।
- 34:48सायम की आरती करोगे, धूप द्वीप करोगे इनका कोई मतलब नहीं होता
- 34:56लेकिन तुम करोगे यह तुम्हारे जीवन का हिस्सा बन गया है क्योंकि
- 35:04तुमने मान लिया। है।
- 35:06ये देवी देवता इस रूप में होते हैं।
- 35:09देखिए मैं पहले भी बहुत बार कहा हूँ, मैं नहीं कहता कि देवी देवता
- 35:14नहीं होते हैं, भूत प्रेत नहीं होते हैं।
- 35:17मैं नहीं कहता मैंने खुद की अपनी वाइब्रेशन में मेरे भाई का आना
- 35:22मेरे पास। मरने के बाद सूक्ष्म शरीर में आना
- 35:27इसका उल्लेख किया हुआ है। तो मैं मानूंगा कि भूत प्रेत नहीं
- 35:34है, यह कैसे संभव? है।
- 35:37है, लेकिन जीस रूप में आप मानते हो उस रूप में नहीं है।
- 35:43एनर्जी पुंज है और मैं इनकी व्याख्या बहुत गहराई से पूरे
- 35:48पूर्व चुनाव में करूँगा, यह तुम्हारे दे ही का हिस्सा।
- 35:56है। क्योंकि सूक्ष्म शरीर में सभी
- 36:00मान्यताएँ। और तुम्हारी सूचनाएं जो तुम जानते
- 36:05हो तुम्हारा ध्यान जिन्हें तुम नॉलेज कहते हो तो सब भरा पड़ा है
- 36:11और इतना भरा पड़ा है जन्मो जन्मो का, कि गले से ऊपर आ गया है, गले
- 36:18से ऊपर आ गया है, तो जब तुम इतना खा लोगे।
- 36:22ये गले से ऊपर आ जायेगा तो वोमिटिंग होगी होगी ना?
- 36:27बस ये जो तुम्हारे अंदर देवीयाँ आती हैं, हनुमान आ जाते हैं, भैरव
- 36:31आ जाते हैं, ये लाल नाम वाले फालना वाले आ जाते हैं ये पीर खीर
- 36:36आ जाते हैं ये तुम्हारी उल्टी है बामन है वोमिटिंग के सिवा।
- 36:41और कुछ नहीं। किसी को जिन्न घेर लेता है, किसी
- 36:50को भूत प्रेत चंडाल घेर लेता है और दुकानदारों की मौज बन जाती है
- 36:59क्योंकि तुम्हें तो दिखता नहीं दिखता, उसे भी नहीं, लेकिन उसकी
- 37:04दुकानदारी है इसलिए उसे दिखता। है।
- 37:07हँस मत करो, उसकी दुकानदारी है। कोई हनुमान नहीं खड़ा होता।
- 37:16इस बाबा बागेश्वर के पास समझे बिलकुल साफ बोल रहा हूँ लेकिन
- 37:22क्योंकि दुकानदारी है इसलिए सिर्फ दिखता है।
- 37:28और तुम क्योंकि व्याधिग्रस्त हो तुम मान लेते हो व्यधिग्रस्त
- 37:33व्यक्ति से तो कुछ भी मनमारो ये शक्ति पुत्र हैं, एक और है वो मैं
- 37:41उसका नाम बार बार भूल जाता हूँ। वो ऑर्डर करता है, उम ठुम ठुम वो
- 37:53गिर गई, वो मर गई ले जाओ उसको कहाँ ले जाओ भाई कुछ नहीं दिखता
- 37:58उसको मैंने बड़े गौर से अपनी अंतरात्मा में झपके देखा है जब ये
- 38:04ऐसे। कलाकारी करते ना मैं देखता हूँ,
- 38:07कुछ नहीं होता, इसे कुछ नहीं देखता, थोथी कल्पना कल्पना की
- 38:15सड़ात होती है और कुछ नहीं। होता।
- 38:22कुषा है भारत भूषण अगर हम नए कर्म करते रहेंगे तो वो जुड़ते रहेंगे।
- 38:27पुराने भोगते रहेंगे, अंत हीन श्रंखला आ जाएगी।
- 38:29नहीं अंत हीन श्रंखला ऐसे कटेगी सतोरी की झलक देख लो दूसरा।
- 38:45अपने आप की भूमि तैयार करो। शिष्यत्व श्रावक बनकर उसकी मर्जी
- 38:57का मानना मतलब गुरु ने जो बोल दिया, ठीक है।
- 39:08अगर तुम इतने श्रद्धानु भी तो हो जाते हो तो वहाँ एक शब्द बोला है
- 39:14संतो। ने।
- 39:17गले से नीचे नहीं उतरता। नास्तिकों के नहीं, आस्तिकों के
- 39:23गले नहीं उतरता। नीचे कहते हैं गुरु गूके गुरु बां
- 39:27वरे पागल भी हो ना गुरु गूंगा हो तो चलो कोई बात।
- 39:32नहीं बां वरे गुरु करे हो दास गुरुज भेजे नर्क में।
- 39:42इस स्वर्ग की रखी वास ये गुरु के लिए नहीं।
- 39:49गा था तुम्हारे लिए गाथा। एक शब्द तुमने सुना होगा
- 39:55अंधश्रद्ध। मैं कहता हूँ वह भी बड़ी कीमती
- 40:00है। अगर हो जाए तो लेकिन कहाँ होती
- 40:06है? तुम श्रद्धा और विश्वास के बीच
- 40:09में झूलते रहते हो, श्रद्धा, विश्वास और अनुभव के बीच में
- 40:13झूलते रहते हो। किसी भी चीज़ को तुम उसकी पिक पे
- 40:19नहीं लेके जाते विश्वास को अगर तुम पीक पे ले जाओ श्रद्धा को अगर
- 40:25तुम पीक पे ले जाओ तो 100 डिग्री पे पानी उगल जाएगा ट्रांसफर्मेशन
- 40:29बिल हैपन हो जाएगा। वाष्प बन जाएगा।
- 40:35लेकिन तुम पूरी पूरी नहीं करते। मैं कहता हूँ बिलकुल श्रद्धा करो
- 40:41लेकिन अंध श्रद्धा करो और अंध श्रद्धा करो तो शो परसेंट करो,
- 40:46ऐसी श्रद्धा करो और फिर देखो चमत्कार।
- 40:53तुम श्रद्धा भी कहा करते अंध श्रद्धा भी तुम नहीं करते।
- 41:00तुम डरपोक अंध श्रद्धा के लिए बड़ा साहस चल रहा है, तुम कुनकुनी
- 41:10श्रद्धा के। से जीवन जी जीते हो आधे इधर आधे
- 41:20उधर 50% उबलते हो और 50% में तो ना खुदा ही मेला, ना वसाले सनम,
- 41:31ना इधर के रहे ना उधर के रहे। अंधश्रद्धा अंधश्रद्धारु को
- 41:43निंदनीय शब्दों से दृष्टि से देखा जाता है, लेकिन ये मूर्ख लोग हैं।
- 41:50अंधश्रद्धा बड़ी कीमती है, होती कम है।
- 41:57होती नहीं है तुम अंत श्रद्धा कहते हो उसको जो आँखें मीच के
- 42:05पीछे लग जाए ठीक मैं कहता हूँ आँखें मीच के पीछे नहीं चल रही
- 42:09आँखें ही फोड़ लेनी है बस ऐसी ही श्रद्धा।
- 42:14कि तर्क उठे ही ना। अगर तर्क नहीं उठेगा तो खोपड़ी की
- 42:23ये चालाकियां समाप्त हो जाएंगी। अगर पूरी उठेगी अंत श्रद्धा तो।
- 42:31से सेनपों लाखों वे तय करने चले नाल हजारों सेनपों लाखों सेनपों
- 42:39तुम्हारे साथ नहीं चलेंगे तो बाबा ये कहते हैं कि अगर तुम अंधाई
- 42:43श्रद्धा से युक्त हुए होगे तो भी मिल जायेगा गहरे में यही कहते हैं
- 42:50बाबा। लेकिन वो ये नहीं कहते कि अंदर
- 42:54श्रद्धालु ही बन जाओ क्योंकि उन्हें पता है अंदर श्रद्धा होना
- 42:59मामूली बात है। बहुत टेढ़ी खीर है टेढ़ा मसला है
- 43:06यह भी नहीं तुम हो सकते। और सटोरी भी नहीं दिखी।
- 43:13तुम्हें शिष्य तो भी तुम्हारे में नहीं आया, श्रावक भी तुम्हारे में
- 43:19नहीं जन्मा तो क्या किया जाए? कैसे आने वाले कर्म होने बंद हो
- 43:26जाए? आने वाले कर्म सिर्फ बंद होंगे जब
- 43:30तुम्हारा करता भाव छूटेगा बस इसके ऊपर सारी ताकत लगा लो, कर्ता भाव
- 43:40का खो जाना, कर्ता भाव का खत्म हो जाना।
- 43:45रात्रि को जब तुम सुश्रुति में होते हो तो करता भाव बिल्कुल खो
- 43:50जाता है। क्या कोई कर्म बनता है?
- 43:53ज़रा सोच सोच के बताओ मुझे रात को गहन सुश्रुति की अवस्था में जब
- 44:01तुम्हें पता ही नहीं लगता। कहाँ हूँ कौन हूँ, कैसा हूँ, कौन
- 44:06आया, कौन गया? वे शुद्ध अवस्था में शिशुक्ति
- 44:11अवस्था में तुम सोए पड़े हो, उस अवस्था में क्या होता?
- 44:18है कोई तर्क होता है। नहीं उठता कोई प्रश्न उठता है
- 44:27नहीं उठता आनंद में जाना है, तो नींद से सबक ले लो, नींद में
- 44:40प्रश्न नहीं उठता जब तुम निस्स्य प्रश्न हो जाओ।
- 44:47नींद में बह नहीं होता। अगर तुम मूल मंत्र को देखोगे तो
- 44:54तुम्हें बड़ी जबरदस्त हैरानी होगी।
- 44:59एक उनका नींद में एक ही होता है। तुम्हें पता ही नहीं कौन?
- 45:07सतनाम करता पूरा नींद में कोई करता है तुम्हें पता ही है तुमने
- 45:13छोड़ दिया उस करता के ऊपर नींद में तुम करता नहीं होता करता कोई
- 45:19और होता। है।
- 45:33फिर रुकूं कोई भय होता? है नींद?
- 45:39में निर्विकार कोई विकार होता है। नींद में ब्रह्मज्ञानी जैसे
- 45:47निर्विकार होते हैं उस वक्त। अजूब नहीं पता नहीं होता तुम किस
- 45:57जोड़ने में हो सैपम खुद से ही प्रकाशित।
- 46:05हो? तुम्हें कोई नींद नहीं दे रहा।
- 46:12बस तुम खुद ही नींद में हो। ये सभी समाधि के भी सूत्र हैं।
- 46:24ये सभी नींद के भी सूत्र हैं, लेकिन एक चीज़ दोनों में फर्क।
- 46:29है। नींद में होती है।
- 46:38शुभ अवस्था समाधि में होती है। जागृत।
- 46:42अवस्था। नींद में मुर्छा होती है, समाधि
- 46:49में जागरण होता है और इन मूर्खों को जागरण कहा गया था।
- 46:53इन्होंने रात को जागना शुरू कर दिया।
- 47:01भगवान कृष्ण ने कहा जब सोता है संसार तो मेरा मुनि जागता है।
- 47:14इन्होंने रात को ढोल बूटने शुरू कर दिया।
- 47:18रात्रि के जागरण ने शुरू कर दिया भजन गाना शुरू कर दिया कब कहा
- 47:22उसने की भजन गाता है ये कहा कहा उसने की ढोलकण गाता है, वीणा
- 47:27बजाता है, मृदंक बजाता है। इको लगाता है लोगों को सुनाता है
- 47:31ये कहा क्या सहज शब्द के हैं? कृष्ण योगी जागता है जब तुम्हारा
- 47:39संसार सोता है मेरा योगी जागता है सिर्फ जागता है, डोल नहीं बजाता।
- 47:49भजन नहीं करता माँ माँ बाबा हनुमान हनुमान कह के नहीं
- 47:54पुकारता, कोई बकवास नहीं करता, ये सब बकवास है, तुम्हारी पुकार नहीं
- 47:59होती बकवास होती और तुम्हारी बकवास से कोई नहीं आता।
- 48:06ये सब तुम्हारे पाखंड हैं, मान्यताएँ हैं।
- 48:10गहरे प्रवेश कर गई हैं और तुम इन्हें धार्मिक कृत्य मानना शुरू
- 48:15कर दिया। धार्मिक कृत्य नहीं है, ये पाप
- 48:18है। तुम अपने से भी पाप कर रहे हो,
- 48:21दूसरों से भी पाप कर रहे हो, अपनों से पाप ऐसे कर रहे हो, वो
- 48:25रात भगवान ने जागने के लिए नहीं बनाई।
- 48:29जिसके लिए बनाई है वो जाग लेगा उल्लुओं के लिए बनाई जाग लेगा
- 48:37तुम्हारे लिए सोने के लिए बनाई है और तुम जबरदस्ती जागते।
- 48:41हो? और फिर अगर जागना है।
- 48:45तो भगवान कृष्ण की ही बात का अगर तुम हवाला देते हो तो फिर उस तत्व
- 48:50के पास पहुंचो जो दिन भर रात जागता रहता है।
- 48:57ऐसा उपाय करो कि जो दिन भर रात जागता है, एक तत्व भीतर है।
- 49:04उसके पास पहुँच जाओ, लेकिन तुम ये भी नहीं कर सकते तुम्हारा मैं
- 49:09टूटता। है।
- 49:11तो मैं तो टूटेगा अगर कर्मों को बनने से रोकना चाहते।
- 49:17हो? आगे कर्म नए ना बने, उनको रोकना
- 49:21चाहते हो तो मैं भाव को। टूटने देना होगा।
- 49:27कैसे टूटेगा बहुत सी चीजें? सबसे पहले मैंने बताया, सटोरी
- 49:34सटोरी की झलक दूसरा उसकी मर्जी में रखो, तेरा पाना मीठा लाकर।
- 49:45पहले पहले थोड़ी सी शिकायत आये, कोई बात नहीं मान लो जो होगा वो
- 49:52करेगा और तुम ना भी मानोगे तो भी वो करेगा, तुम ये मत भूल जाना।
- 50:04तुम अगर ये मानोगे कि वह नहीं करता, मैं करता हूँ, तो भी वह
- 50:11करेगा ये बहुत आंधी की बात। है।
- 50:14अभी तुम्हारी समझ में नहीं आएगा करता तो वही है।
- 50:20ये एक झूठ है कि तुम करते हो और इस झूठ के कारण तुम दुखी हो और
- 50:25झूठ के कारण ही तुम्हारे कर्म बनते हैं और कर्म बनते हैं तो भोग
- 50:30नहीं पड़ते हैं। अब इस झूठ को कैसे इससे छुटकारा
- 50:34मिले? और झूठ को छुटकारा मिले।
- 50:39दर्शन से अनुभव से अनुभव कैसी आए? या तो गुरु कृपा करते है, सिर के
- 50:53ऊपर हाथ रख दे तो मेरे से दोरे में पहुँच जाते।
- 50:58मैंने कर ही एक बात का जिक्र किया था।
- 51:04मेरे पुत्र ने पूछा के सत्य एक दर्शन छे?
- 51:17योग्य है। बचपन से ही मेरे पास है, सब सुनता
- 51:22है, साधना रथ है। मैंने उसे दिखा दिया वह मुकाम जले
- 51:31देख ले करता वह है। लेकिन एक प्रश्न फिर रहेगा देख
- 51:41यार, वह करता है बात। खत्म हो गई।
- 51:46जैसे पता चल जाता है, वह करता है वह मौज में रहेगा, आनंद में
- 51:49रहेगा। लेकिन फिर।
- 51:55एक प्रश्न और है क्या? बाबा मुझे कह गए कि बुरा वक्त
- 52:02विपत्ति काल शुरू हो गया, मैंने बोला और विपत्ति काल 10 दिन के
- 52:07बाद मेरा चूकना टूट के बहुत बड़ी बात होती है।
- 52:11पहले जमाने में तो इसका कोई इलाज ही नहीं था।
- 52:15क्यों? मेरा टूट गया तो कल ही मुझे बेटा
- 52:24कहने लगा कि होके रहा ना वो? मैंने कहा हाँ बिलकुल होके रहा
- 52:31तुम उसे रोक सके मैंने कहा नहीं क्यों?
- 52:37क्योंकि मैं जानता था रोक तो सकता था इस भ्रम में तो मत रहना, लेकिन
- 52:46मैंने रोका नहीं, जो वह करता है ठीक करता है।
- 52:51ये शब्द उसने अलग से कहे और वह पागल नहीं था।
- 52:56लाउसे के ये शब्द वह करता है और जो करता है ठीक करता है और तीसरा
- 53:07जो करता है भले के लिए करता है, फिर मैंने उसे बदलने की चेष्ठा।
- 53:19बदल सकता। था।
- 53:21निस्संदेह बदल सकता। था।
- 53:24मेरे लिए बड़ा साधारण मतलब जंक्चर पॉइंट पे जाता ठीक हो जाता।
- 53:37संकल्प की भरमार है जंक्चर प्वाइंट में क्योंकि जंक्चर
- 53:40प्वाइंट आत्मा के परमात्मा के बिल्कुल करीब है और परमात्मा
- 53:45संकल्प का खजाना है समुद्र संकल्प के खजाने के पास जैसे जैसे तुम
- 53:53चले जाओगे। खोपड़ी के पास कोई संकल्प ज्यादा
- 53:56नहीं होता। बहुत कम कमजोर खोपड़ी से नीचे
- 54:01जाते जाते। हृदय के पास संकल्प होता है अगर
- 54:03तुम्हे कोई हृदय से बदवाइन दे दे, संकल्प ज्यादा होता।
- 54:07है। खोपड़ी से बदवाइन तो तुम रहो ही
- 54:10देते हो कुछ नहीं होता कुछ। हृदय से कोई बदवाह दे दे हृदय
- 54:16परमात्मा से ज्यादा और जंक्चर पॉइंट तो परमात्मा के बिलकुल ही
- 54:21कृत है। वहाँ तो संकल्प बहुत ही भारी होता
- 54:23है। गृष्ट घनत्व रूप में होता है वहाँ
- 54:32तुम। या तुम्हें प्रोसेसर बता रहा हूँ
- 54:33संटिफिक को ज़रा समझने की चेष्टा कर ले ना ऐसे किताबें वगैरह बनाने
- 54:39वाले थोड़ा सा को अच्छी तरह से नोट कर ले के मैंने ये संकल्प के
- 54:46बारे में बोल रहा हूँ। जैसे जैसे तुम उस मुकाम के करीब
- 54:53जो के तुम्हारा अपना है, उसके करीब पहुंचते जाओगे।
- 54:57संकल्प गहन होता जाएगा। क्यों?
- 55:03बिल्कुल वैसा है जैसे जैसे जैसे तुम बगीचे के करीब पहुंचोगे सुगंध
- 55:08गहरी होगी? क्यों बगीचा सुगंध मान है बगीचे
- 55:15के भीतर फूल ही फूल जितना दूर हो गए, उतनी सुगंध शायद इतनी दूर हो।
- 55:23तुम दो किलोमीटर के ऊपर बैठे हो तो सुगंध आएगी ना।
- 55:28बिल्कुल उसके पास से सड़क के ऊपर से निकल गए तो सुगंध आएगी, तुम
- 55:32ठहर जाओगे, बड़ी भीनी भीनी सुंदर खुशबू है, थोड़ा ठहर जाते है,
- 55:37आनंद लेते है और अगर तुम उस बगीचे के बीच में ही प्रवेश कर जाते हो
- 55:43तो फिर बाहर आने का मन भी नहीं करेगा।
- 55:48वह आनंद का सागर है। खुशबू का खजाना संकल्प का खजाना
- 55:55है। जैसे जैसे उसके करीब जाओगे,
- 56:01संकल्प गहरा कर सकोगे। बिल पावर बढ़ती जाएगी।
- 56:10उसके करीब जाने से बिल पावर को दिमाग से बढ़ाने की चेष्टा मत
- 56:14करना। बिल पावर बढ़ानी है तो धीरे धीरे
- 56:19अपने आप को उतारना अपने ही भीतर। विलपॉवर का खजाना ओशन ऑफ विलपॉवर
- 56:26मौजूद है और उसके करीब जाओगे तो विलपॉवर घनी होती जाएगी।
- 56:32जैसे अगर तुम्हे बिल्कुल दिखाई नहीं पड़ता तो बल्ब के करीब ले
- 56:36जाओ, जो तुमने पश्न है। ज्यादा सु स्पष्ट हो जाएगा दिख
- 56:42जाएगा बल्ब से दूर पड़ोगे तो शायद अल्फाज़ न पड़े जाए।
- 56:49बिलकुल बल्ब के पास ले आए तो पड़े जाएंगे बड़े आसान संकल्प का खजाना
- 56:58हो तुम। या अस्तित्व कह लो परमात्मा कह लो
- 57:02नाम कुछ भी दिल यहाँ कोई धर्म अधर्म की बात नहीं हो रही अल्लाह
- 57:11कह लो ईसा कह लो राम कह लो कृष्ण कह लो।
- 57:21एक ही अस्तित्व का नाम है। सब कुछ भी चुन लो जो तुम्हे
- 57:26प्यारा लगता है जो तुम्हे प्यारा लगता है, लेकिन एक बात ध्यान में
- 57:34रखना वह है संकल्प का खजाना। आनंद से भरा हुआ, सुगंधी से भरपूर
- 57:43खुशहाली देता हुआ मदहोशी से युक्त तुम्हें खुमारी में धकेल देगा,
- 57:49पूरा डक लेगा तुम्हें तुम मद से युक्त हो जाओगे, आनंदमयी हो
- 57:56जाओगे। संकल्प लेना है तो खोपड़ी में बैठ
- 58:02के संकल्प मत लेना, जो आजकल परंपराएं चली, लोग तो हिप्नोटाइज़
- 58:08करके पीएलआर कर रहे हैं। पास्ट लाइफ रिग्रेशन।
- 58:19अब इन बुद्धों को मैं क्या कहूँ? फास्ट लाइफ को देखने के लिए
- 58:26तुम्हारे संकल्प? काम न करें।
- 58:27कोई संकल्प उस बीज की दीवार को नहीं तोड़ सकता दो।
- 58:32जन्मों के बीच में जो परमात्मा ने कुदरत ने बना दी वो इतनी घनी है,
- 58:37इतनी सख्त है और दूसरा भी तो उठ नहीं सकता।
- 58:43इसलिए मैं इन्हें झूठे कहता हूँ। सरे आम झूठे कहता हूँ।
- 58:53एक संकल्प करने वाला व्यक्ति पिछले जन्म में ले जाना व्यक्ति
- 58:58मेरे पल्ले पड़ गया बाबा आप कहते हो कि संकल्प पिछले जन्म में नहीं
- 59:04जाया जा सकता, नहीं रहा जा सकता बेलाशक क्योंकि पिछले जन्म में
- 59:12व्यक्ति और नितांत गोपनीय है, वो नितांत गोपनीय है।
- 59:20वह तुम ही उसकी चाबी तुम्हारे पास है, पर महात्मा ने उस लाकर की
- 59:26चाबी तुम्हारे पास रखी है, कोई दूसरा नहीं खोल सकता।
- 59:30या मजाक बना रखा है लोगों ने ये बी के वाले लोग पता नहीं कहाँ से
- 59:37सीख। के आ जाते हैं।
- 59:40मेरे पास आ गया, मैंने कहा अच्छा बताओ मैं कौन था पिछले साल उस
- 59:48हरामी को पता था। उसने मेरा बायोग्राफी पढ़ा था, आप
- 59:53गाँधी जीते, मैंने कहा तू बकवास करता है, तुने बायोग्राफी पढ़ी,
- 1:00:00अच्छा तू बता तू कौन था खुद की तो वह झूठ बोल सकता है।
- 1:00:09थी तो वो झूठ तीसरा आदमी कैसे बता सकता है?
- 1:00:14कौन कहाँ था जिसने खुद को देख लिया।
- 1:00:17है। वो बता सकता है कि मैं कौन बुद्ध
- 1:00:22बता सकते हैं कि मैं कौन था? महावीर बता सकते हैं मैं कौन था?
- 1:00:29लेकिन चारवा मार्कर सुने हैं, बता सकते हैं मैं कौन सा क्योंकि वो
- 1:00:32उतरे ही नहीं। अभी तो बाहर से कह सकते हैं कि
- 1:00:36पिछला जन्म होता ही नहीं। ये प्रोसेसर बढ़िया है।
- 1:00:43शब्द बहुत बढ़िया। है।
- 1:00:46जीस चीज़ में कष्ट ना करना हो आचार्यो की तरह कैसे वो होता ही
- 1:00:51नहीं, परमात्मा भी नहीं होता। पिछला जन्म भी नहीं होता।
- 1:00:56एनलाइटनमेंट भी नहीं होता, कोई खुशी भी नहीं होती दुख ही दुख
- 1:01:01होता है तो फिर ये जीवन जी कहाँ रहे हो तुम?
- 1:01:10संकल्प जितना गहरा होगा, उतनी जल्दी तुम अपने अस्तित्व में
- 1:01:18प्रवेश करो संकल्प से विकल्प में उतरोगे।
- 1:01:27तुमने सुना होगा पहले सब विकल्प समाधि लगते है।
- 1:01:32सॉरी संकल्प फिर सब विकल्प समाधि लगती है।
- 1:01:38पहले संकल्प समाधि लगती है, वहाँ संकल्प नहीं होता।
- 1:01:46शुरू होगा, संकल्प से जाओगे विकल्प में विकल्प का मतलब है
- 1:01:52जहाँ संकल्प पूर्ण हुआ उसके आगे कोई संकल्प बचा नहीं संकल्प का
- 1:01:59जहाँ चरम आ गया संकल्प का जहाँ दी एंड हुआ।
- 1:02:05उससे बड़ा कोई संकल्प नहीं है। परमात्मा से बड़ा किसी का संकल्प
- 1:02:08कोई होता नहीं। है।
- 1:02:10इसलिए कहते हैं परमात्मा ने संकल्प किया एको हम बहू श्याम और
- 1:02:14हो गया सृष्टि ऐसे ही उत्तपन हुई। खैर, ये मान्यताएँ हैं, लेकिन है
- 1:02:21वो संकल्प का रूप, इसमें कोई शक नहीं।
- 1:02:27और तुम अगर उसके करीब पहुंचोगे अपने भीतर उतर के पहुंचा जाएगा
- 1:02:32बाहर कहीं नहीं है, वो अपने ही भीतर उतरना पड़ेगा और उसके लिए
- 1:02:37बहुत शक्ति की अनिवार्यता हो। इसलिए मैं रोज़ कहता हूँ शक्ति को
- 1:02:43बचाओ, शक्ति को बचाओ, मुर्दा ना तो अपने पिछले जन्म में जा सकता
- 1:02:51है, ना आनंद को प्राप्त कर सकता। है।
- 1:02:59मुर्दे के लिए सब। बेकार है, कुछ भी नहीं कर सकता,
- 1:03:03कुछ पा नहीं हो सकता। कर्मों को आने वाले कर्मों को
- 1:03:08कैसे रोका जाए कि नए कर्म ना बने। प्रश्न यहाँ अड़ गया था कि भारत
- 1:03:13भूषण का उसको मैं खोलने का उपाय बता रहा हूँ तुम्हें?
- 1:03:21सबसे पहला सतोरी की झलक देख लो दूसरा इस योग्य हो जाओ के शिष्य
- 1:03:29हो जाओ जो गुरु कहता है ठीक। बुद्धि से वो समझा नहीं जाता और
- 1:03:40बुद्धि को छोड़ दो बुद्धि बीच बीच में क्लोल करेगी, बाधा डालेगी,
- 1:03:53स्पष्ट शब्दों में कह दूँ अंत भक्त हो जाओ अधूरे अधूरे नहीं
- 1:03:59भाई। तुम्हारे सभी अंधभक्त अधूरे हैं?
- 1:04:07पिछवाड़े पे चार पड़ेंगे ना लाठियां बदल जाएंगे।
- 1:04:15अंधभक्त बनना है तो पूरे पूरे गुणों मंसूर के आत्मा में काट दिए
- 1:04:19जाते हैं। ईसा को लटका दिया जाता है।
- 1:04:24उनकी अंधभक्ति समाप्त नहीं होती। है।
- 1:04:28अंधभक्ति का दूसरा नाम होता है परम।
- 1:04:31श्रद्धा? और परम श्रद्धा उत्पन्न होती है।
- 1:04:37दर्शन के बाद अनुभव के बाद ये करिया हैं।
- 1:04:43अब मैंने जोड़ दूँ तो तुम्हें समझाई लेकिन अंध श्रद्धा और
- 1:04:48पूर्णआंध श्रद्धा तुम्हें बड़ा हे शब्द लगता है?
- 1:04:53कहिए तो बड़ी खराब बात कह दी, त्याग ये बात कह दी।
- 1:04:59मैं कहता हूँ अगर श्रद्धा ही रखनी है तो ऐसे अंध श्रद्धालु बन जाओ
- 1:05:05और मैं जानता हूँ जानता हूँ इसलिए मैं कहता हूँ कि अंध श्रद्धालु
- 1:05:11जैसे ही तुम होगे। तो सभी प्रकार की शंकाओं को
- 1:05:19त्यागकर ही श्रद्धालु हो गए। और जब शंकाएं बिल्कुल शून्य हो
- 1:05:25जाएंगी तो तुम परमात्मा हो गए। शंकाओं का शून्य हो जाना,
- 1:05:33तुम्हारा परमात्मा हो जाना है। परमात्मा कोई शंका नहीं होती
- 1:05:37इसीलिए वो परम संकल्पवान है। ज़रा भी शंका आ जाती परमात्मा के
- 1:05:42मन में जब उसने कहा सोचा एको अहम भू श्यामी।
- 1:05:51तो शंका जीरो थी, जीरो संकल्प था 100% तो मैं तुम्हें कहता हूँ,
- 1:06:00तुम अंधइसरता भी 100% कर शब्द उल्टे प्रयोग कर रहा हूँ बात वही
- 1:06:07कह रहा हूँ। शंख का शून्य हो जाओ, श्रद्धा से
- 1:06:20ही पहुंचना है, विश्वास से ही पहुंचना है तो मैं कहता हूँ 100%
- 1:06:27करो, जो करो, विश्वास करो तो 100%।
- 1:06:31श्रद्धा करो 200% लेकिन यही तुम कर नहीं सको कि तुम कोई भी काम
- 1:06:39करो, मैं तुम्हें कहता हूँ वो 100% करो, पाप भी अगर कोई व्यक्ति
- 1:06:45100%। कन्डेन्सेशन से करता है, संकल्प
- 1:06:50से करता है तो पाप नहीं होता है, वह पुण्य हो जाता।
- 1:06:57है। ये बातें थोड़ी गहरी हैं।
- 1:07:01तुम्हारी समझ में नहीं आएंगी। तुम इतना ही समझ लो के सितोरी की
- 1:07:06झलक देख लो। अपने आप को योग्य बना लो, अपनी
- 1:07:09भूमि को योग्य बना लो बीज बोने के बीज तो वह बोतेगा वृक्ष भी बन
- 1:07:19जाएगा फिर भी लग जाएगा। कर्ता भाव समाप्त हो जाता है जब
- 1:07:32तुम्हारी श्रद्धापूर्ण हो जाती। है।
- 1:07:37श्रद्धापूर्ण होने का मतलब शंका शून्य, शंका जीरो हो जाती है,
- 1:07:45श्रद्धा सो हो जाती है। वहाँ नया करम नहीं बनेगा।
- 1:07:53गुरु की शरण में चले जाओ तैयार हो के देखिए अगर कोई गटर कहे, कह जा
- 1:07:59घी जो है मेरे में उल्टा दो तो गुरु इतना पागल।
- 1:08:03नहीं होता, गुरु समझदार है। उसे पता है गटर के काम नहीं आएगा,
- 1:08:09ये और घी भी खराब हो जाएगा। इसमें कोई कृप्रणता नहीं है,
- 1:08:19लेकिन गटर के अंदर घी को फेंकना घी की बर्बादी।
- 1:08:22है। बस इतना वो जानता है।
- 1:08:26बहुत से लोग मुझे कह देते हैं बाबा मेरे सिर पे हाथ रहो तो मैं
- 1:08:28रख देता हूँ होगा कुछ नहीं, पहले कह देते हैं क्यों?
- 1:08:35क्योंकि गटर के ऊपर हाथ रखने से कुछ नहीं होगा तो मैं।
- 1:08:42प्राप्त करने की वो भावना ही नहीं है।
- 1:08:46तुम तो किसी से आशीर्वाद भी नहीं लेते, पूरा पूरा झुकते।
- 1:08:51अगर तुम्हें झुकना ही आ जाए तो आशीर्वाद ना मिल जाए।
- 1:08:56तुम्हें झुकना ही तो तुम्हें आता नहीं।
- 1:09:02गर्दन में गुल्ला फंसा रहता है। झुकते कहो दंड व्रत भी हो जाओ तो
- 1:09:08गर्दन का गुल्ला नहीं निकलता। पीठ का गुल्ला नहीं निकलता।
- 1:09:16पीठ सीधी रहती है स्टेक और तुम्हें सगाया भी यही जाता है।
- 1:09:22योग के अंदर सिखाया जाता है कि पीठ को स्ट्रेट रखना मैं सदा कहता
- 1:09:26हूँ पीठ को स्ट्रेट मत रखना, रिलैक्स रखना जैसे होती है झुकती
- 1:09:31है झुक जाने दो ये स्टेट विटेट कुछ नहीं ना कुंडलिनी जटी।
- 1:09:38और कुंडली जगेगी तो स्टेट देख के ऊपर नहीं जाएगी।
- 1:09:42वो इतनी महान शक्ति है, वो चली ही जाएगी।
- 1:09:48अगर झुके भी होगे तो भी चली जाएगी।
- 1:09:52अगर स्टेट भी बैठे होगे तो भी वो काहे कष्ट देना है इस शरीर को?
- 1:09:57तो जैसे भी बैठते हैं आराम से बैठ जाओ, सुख पूर्वक बैठ जाओ अब हम
- 1:10:05विषय अगर नए कर्म बनते रहे पिछले हम भोंकते रहे तो फिर ये अंत हीन
- 1:10:13जंजाल ये खत्म कैसे होगा? खत्म होगा।
- 1:10:19नए कर्म बनना बंद हो जाए भोगना तो नहीं बंद होगा क्योंकि प्रारब जो
- 1:10:25यहाँ तक आ गया वो तो तुम्हें भोगना ही पड़ेगा, ये तो बंद नहीं
- 1:10:30किए जा सकते नए कर्मों को बनने से।
- 1:10:36रोका जा सकता है कैसे? समर्पण से उसकी शरणकति बार बार
- 1:10:46भगवान कृष्ण कहते मेरी शरण में आ जाओ क्यों कहते हैं शरण में चला
- 1:10:51गया तो नए कदम बनने बंद हो जाएंगे।
- 1:10:56फिर तुम नहीं करोगे, वह करेगा बाबा कहते हैं तेरा पाना मीठा
- 1:11:02लागे जो तुद पावै, सोइपलिकार क्यों?
- 1:11:07कहते हैं कि जो तुम करते हो, मुझे मंजूर है, उससे मैं कर्म नहीं
- 1:11:13बनता। कर्ता भाव से कर्म बनता।
- 1:11:18है। उसके भाड़े में रह कर अगर तुम
- 1:11:22जिंदा रहना शुरू हो जाओ, कर्म करना शुरू हो जाओ तो कर्म नए नहीं
- 1:11:27बनेंगे। उसकी रजा में रहना शुरू कर।
- 1:11:35दो। राजी हैं हम उसी में जिसमें तेरी
- 1:11:38रजा है अपनी तो यूँ भी वह वह है और यूँ भी वह वह है तुम्हें कोई
- 1:11:45फर्क न पड़े वास्तव में फर्क न। पड़े।
- 1:11:49तुम्हारा नुकसान हो जाए। तो भी शुभ।
- 1:11:52तुम्हारा फायदा हो जाए तो भी शुभ ज़रा भी एक लकीर भी न आये भीतर
- 1:11:59लाभों में खुशी के नुकसान में धोके ऐसी भावना अगर हो जाए इसे ही
- 1:12:05कहते हैं। अंधश्रद्धा समर्पण से उत्पन्न
- 1:12:09होती है अंधश्रद्धा समझें। अंधशर्ता का आगाज होता है।
- 1:12:14समर्पण से, समर्पण के बिना अंधशर्ता उत्पन्न नहीं होती।
- 1:12:24ये बहुत बेसिक चीजें हैं, ये तुम्हारी समझ में नहीं आएगी,
- 1:12:27जिसने देखी वो बता सकेगा, वो समझा सकेगा।
- 1:12:31अब मसला यहाँ आके फंसता है के नए कदम बनते रहे और पुराने हम भोंकते
- 1:12:37रहे तो कब तक चलेगा सिलसिला हम मुक्त कभी होंगे ही नहीं और बात
- 1:12:44तो मुक्ति की है, लिबरेशन की है नहीं तो मुक्त हो जाओगे।
- 1:12:50पुराने कर्मों को भोगने से तो हम नहीं रोक सकते, वो तो भोगने ही
- 1:12:54पड़ेंगे। नए कर्मों को बढ़ने से हम रोक
- 1:12:58सकते हैं तुम्हें दो तीन उपाय मैंने बतला दिए सस्तोरी की झलक
- 1:13:04देख लो। इससे योग्य हो जाओ।
- 1:13:10शिष्य बन जाओ, श्रावक बन जाओ, श्रोता बन जाओ शंश्य हीन हो जाओ
- 1:13:25तुम्हारे भीतर किसी प्रकार की कोई।
- 1:13:28संदेह न उठे, संदेह शून्य हो जाओ, वह जो करता है उसके करने में 100%
- 1:13:36राजी हो जाओ हृदय से भीतर से अगर ये कर सकते हो तो नए कर्म बनने
- 1:13:45बंद हो जाएंगे। तुम जियो, उसकी मर्जी में जियो,
- 1:13:52उसकी नाव में चढ़ जाओ पतवार उसको दे दो कि तू चला और जिधर ले जाए
- 1:14:03और भटकाए तो भटक जाओ। तुम पहुँचाए तो पहुँच ही जाओ,
- 1:14:11उसकी मर्जी से अगर तुम उसकी नाव में सवार हो जाओ पतवार उसके हाथ
- 1:14:16में दे दो तो नए कर्म बनने बंद हो जाएंगे, तुम कुछ नहीं करोगे,
- 1:14:21क्योंकि पतवार उसके हाथ में। तो नाव जिधर जाती है तुम्हारी
- 1:14:26मर्जी से नहीं जाती, पर उसकी मर्जी से जाती है पतवार उसके हाथ
- 1:14:30में है। पतवार के बिनाही मेरी नाव चल रही
- 1:14:46है पतवार के बिना ही मेरी नाव चल रही है।
- 1:15:04हैरान है, ज़माना मंजिल भी मिल रही है, हैरान है।
- 1:15:20ज़माना मंजिल भी मिल रही है हड़ताल नहीं मैं कुछ भी सबका।
- 1:15:39हो रहा है। मेरा आप की कृपा से सब काम हो रहा
- 1:15:58है। करते हो तुम कन्हैया करते हो तुम
- 1:16:10कन्हैया मेरा नाम हो रहा। है है मेरा आप की कृपा से सब काम
- 1:16:32हो रहा है। तुम साथ हो जो मेरे किस चीज़ की
- 1:16:46कमी है, तुम साथ हो जो मेरे। किस चीज़ की कमी है?
- 1:16:59किसी और चीज़ की अब दरकार ही नहीं है।
- 1:17:13तेरे साथ में गुलाम अब तेरे साथ में गुलाम अब गुलफाम हो रहा है
- 1:17:30तेरे साथ में। गुलाम अब गुलफाम हो रहा है, करते
- 1:17:46हो तुम कन्हैया? हाँ करते हो तुम कन्हैया, मेरा
- 1:17:58नाम हो रहा है मेरा आपकी आपकी। आपकी कृपा से सब काम हो रहा है
- 1:18:23धन्यवाद।