Latest / Baba ji Vijay Vats / 13 Mar 25 - भागवत पुराण में समुद्र मंथन का गूढ़तम विश्लेषण! मन का मंथन कैसे होगा? Puran Video 1st.
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- 0:15आज हम शुरू करें वो कहानी। यहाँ से प्राणों का आगाज हुआ।
- 0:34सागर मंथन सबसे पहले ऐसे तो कोई बनाने थे आपसे विनती है।
- 0:57क्या आप महज सुनते रहेगा? अर्थ बड़े गहरे आपके बोलने से
- 1:07डिस्पर्पेंस होती है। क्या है सागर मंथन?
- 1:21का? सबसे पहले आपको बता दूँ कि समुद्र
- 1:25का पान है जितना खारा होता है, बिल्कुल उतना ही खारा हमारा खून
- 1:39होता है। हमारे शरीर का प्राण बिंदु ब्लड
- 1:50रक्त कौन? जितना खारा समुद्र कपाएं उतना
- 1:59खारा। हमारा मैंने आपसे पहले भी कहा।
- 2:10रेशियो ने सत्यो को बचाने के लिए सिम्बोलिक रेप्रेसेंटेशन्स
- 2:18अब्रीविएशन का उपयोग किया है क्योंकि ये मरती है।
- 2:24भाषाओं पर विवाद हो जाते हैं। प्रतीकों पर विवाद नहीं होते।
- 2:36यह भी ठीक है भाषाओं को प्रत्येक व्यक्ति पढ़ने का।
- 2:44प्रतीकों को समझदार पड़ेगा जो जानता है ऋषि ने ठीक किया, लाख
- 2:55व्यक्ति गलत पढ़ ले, कोई बात नहीं एक व्यक्ति सही पढ़ ले।
- 3:02वो चलेगा। एक व्यक्ति लाखों को समझा देगा
- 3:09इसलिए उन्होंने प्रतीक चुने हैं। इन प्रतीकों का नाम है पुराण यानी
- 3:15पुरानी व्यवस्था। आज हम शुरू करें सागर ग्रंथन से
- 3:34मनुष्य के जीने का कोई अभिप्राय ही नहीं और रूचिकर भी नहीं होता,
- 3:46मगर उसके जीवन में आनंद न हो। इसको फिर समझी मानव जीवन का कोई
- 3:58अर्थ नहीं अगर तुम्हारे जीवन में आनंद नहीं।
- 4:07ढेर सी वस्तुएं पड़ी हैं बड़ी सी विश्वविद्यालय की डिग्रीज़ हैं
- 4:18तिजोरिया भरी पड़ी है सोने से हीरे ज्वार हाथों से सेवक है दास
- 4:25दासिया नौकरशाकर। सुख सुविधा के सारे सामान सभी
- 4:41प्रकार के पदार्थ हैं और पदार्थ जिन से खरीदे जाते हैं वह धन भी
- 4:48तुम्हारे पास है। लेकिन ऋषि कहते हैं, अगर आनंद
- 5:02नहीं है तो फिर मानव जीवन बेकार है।
- 5:17बड़ी से बड़ी डिग्री है तुम्हारे पास चक्रवर्ती सम्राट हो तुम ऊंचे
- 5:22से ऊंचे पद भी है तुम्हारे पास तुम इन्द्र हो गए हो, स्वर्ग के
- 5:28मालिक हो गए हैं, सारे सुख तुम्हारे पास हैं।
- 5:35कल्पवृक्ष तुम्हारे पास है, जो मांगते हो सब मिल जाता है, लेकिन
- 5:41चैन नहीं है आनंद नहीं है, बस इसी आनंद की खोज में पहला प्रतीक।
- 5:57दो ऋषियों ने गढ़ा और सागर बंद थे।
- 6:07अर्थ गहरे हैं, शांति से बैठ जाना और सुन्न।
- 6:28मन का विश्लेषण जब तुम करोगे इसे ही सागर मंथन कहते हैं।
- 6:44तुम्हारा शरीर सागर जैसा है। इसके भीतर की संरक्षण इसकी साल की
- 6:54व्यवस्था नमकीन खून सागर से मिलता है।
- 7:05इसको मथना। है।
- 7:08मंथन करना है। निरीक्षण करना है आत्मा निरीक्षण।
- 7:20संतो ने भी यही कहा। ऋषियों ने भी यही कहा आत्मा बने
- 7:25रहा। स्वाध्याय स्वय अध्याय स्वय का
- 7:35अध्ययन मिलेगा।
- 7:47कैसे अपने मन का अध्ययन करना होगा, निरीक्षण करना होगा, मथ न
- 7:57होगा। मन कैसे मथा जाएगा मंथन मन का
- 8:17मंथन शरीर का नहीं, मन का मंथन करना है, वही सागर मंथन है।
- 8:27सागर तुम्हारा शरीर है, इसके भीतर मन है उस मन का मंथन करना है।
- 8:42इस मन के मंथन में सारी शक्ति को लगा देना है, इसलिए सागर मंथन
- 8:53में। राक्षसवी और देवता भी दोनों को
- 8:58अपना बल लगाना पड़ेगा। हर प्रकार की शक्ति मन के मंथन
- 9:03में लगा देंगे। वो राक्षसवी व्रती के हम काम,
- 9:08क्रोध, लोग हो अहंकार। उधर न लगा के मन के मंथन में लगा
- 9:14देना। इसलिए राक्षस हुई लगती हैं सागर
- 9:20मंथन में और सागर मंथन में देव भी लगते हैं दया करना, करुणा करना,
- 9:28दान करना, पुण्य करना, उपवास करना।
- 9:32दूसरों की सहायता करना ये देवताओं का काम है।
- 9:39दोनों प्रकार की शक्तियां को लगाना होगा।
- 9:41सभी प्रकार की ओर जाओं को इनमें झोंकना होगा तो तुम्हारे मन का
- 9:48मंथन होगा। जैसे हम दूध से दही जमा लेते हैं,
- 9:55फिर उसका मंथन करते हैं, रिड़कते हैं और रिड़कने के लिए हम
- 10:01इस्तेमाल करते हैं हमारे जमाने में रस्सी से।
- 10:10हमारी माता दूध पिलोया करती थी, उसमें से घर से निकला करता था।
- 10:18माखन बस वैसे ही मन को मथ न है। और मन के मंथन से क्या निकलेगा?
- 10:34मैंने तुम्हें एक व्यवस्था बताई, उससे कर लिया क्रिया योग करो
- 10:44ईश्वर ने तुम्हें। बहुतायत मात्रा में ऑक्सीजन दी है
- 10:50और ऑक्सीजन तुम्हारे प्राण वायु है।
- 10:53जीवन के लिए जीवन के लिए एकमात्र साधन कोरोना काल में कितने लोग मर
- 11:01के बिना ऑक्सीजन के? हमारी समस्या यह है कि जो चीज़
- 11:10हमें मुफ्त मिलती है, हम उसकी कीमत नहीं डालते बहुमूल्य वस्तु
- 11:18की हम कीमत जानते हैं। मुफ्त में मिली हुई चीज़ की हम
- 11:25कीमत नहीं जानते है जबकि परमात्मा जानता है कि जो बहुमूल्य है वो
- 11:36सबसे ज्यादा मात्रा में देना। हमारे वातावरण में 21% ऑक्सीजन
- 11:42है, बहुत होती है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम इस ऑक्सीजन को
- 11:53खत्म कर दो। इसको बचाए रखो इसकी शुद्धता को।
- 12:02बरकरार रखो मन का मंथन रिड़कनी भी चाहिए, रस्सी भी चाहिए वासु की
- 12:17नाग की रस्सी चाहिए। और दो तरफ़ों से रिड़कने वाली
- 12:24चाहिए। मन के अंदर जाने वाली शक्ति
- 12:34चाहिए। मंदराचल पर्वत मन के अंदर अचल भाव
- 12:43से दूषित हो जाए। मंद्राचल पर्वत उसके द्वारा यह
- 12:52मान रिड़का जाएगा बिलोया जाएगा और फिर जो निकलेगा वो तुम्हें बता
- 13:01देता हूँ। शुभ क्रिया योग करना अन्यथा
- 13:08तुम्हें पता नहीं लगेगा। जो चीज़ निकली वह थी क्या फिर
- 13:20आराम से बैठ जाना जीवन को जीने का शानदार तरीका।
- 13:37सबसे पहले क्या आएगा? जब सागर मंथन हुआ सबसे पहले निकला
- 13:46विश हलाहल तुम भी जब भीतर जाओगी तो सबसे पहले विश निकलेगा विश।
- 13:59जिसे देखकर तुम डर जाते हो, अब ध्यान से समझाना बात कोई गहरी बात
- 14:08है, अगर उतर गई तो फिर तुम्हारा जीवन हीरेसा शुद्ध हो जाएगा।
- 14:27हीरो पा हयो गांठ गठ आयो बार बार बापू।
- 14:45क्यों? खोले।
- 14:49मन मस्त हुआ। फिर क्यों बोल?
- 14:57मन मस्त। हुआ फिर क्या बोलना?
- 15:06तो कबीर कहते हैं जब हीरा मिल जाएगा, मन मस्त हो जाएगा, फिर
- 15:12बोलने का मन नहीं करेगा, ये पहचान है लक्षण तुम नाचोगे कूदोगे शांति
- 15:25से असल भाव से बैठ भी जाओगे। लेकिन अगर बोलोगे तो गीत गन गन ना
- 15:35होगे। भाई बोलना नहीं हो तो गाना और
- 15:40बोलने में बड़ा फर्क है। मैं रोज़ कहता हूँ देर इज़ ए लॉट
- 15:43ऑफ डिफरेंस बिट्वीन डायरेक्ट पेटिशन।
- 15:47रेपेटिशन एंड रिमेम्बर हैं तुम रिपीट करते हो कोई भी नाम, लेकिन
- 16:04हमें याद करना है और तुम दोनों को एक समझ लेते हो।
- 16:11नहीं गलती खा जाती हो। सारी मानवता इस गलती के कारण आज
- 16:16भटक रही है। रेपेटिशन नहीं कर रही रेमेम्बेर
- 16:24करना है तो स्वयं का मंथन करना है, तुम हो कौन?
- 16:32सागर मंथन का यही उद्देश्य है सागर तुम्हारा शरीर मंद्राचल
- 16:44पर्वत के भीतर जो मन के अंदर चला जाए, अचल भाव से ठहर जाए, ऋणिकनी
- 16:50बन जाए आत्माबनी ग्रह। स्वाध्याय, आत्मनिरीक्षण वह
- 16:58रिडकेगा तुम्हारे मन को और फिर बाहर क्या निकलेगा?
- 17:03अब सुनिए सबसे पहले आएगा हला हला पहली पहली चीज़ जहाँ से डर जाती
- 17:11हो। मेरे पास रोज़ कमेंट आते हैं बाबा
- 17:16ये हाथ ठहर गया, मैंने कहा ठहर जाने दो, मरोगे नहीं, ये लकवा हो
- 17:25जाएगा। मैंने कहा कोई बात नहीं मैं इससे
- 17:28पट लूँगा, तुम चलते चलो। छोटी छोटी बातों से हम घबरा कर
- 17:35बाहर आ जाते हैं। ये चिड़िया से क्यों रेंग रही
- 17:39हैं? ये स्वास्थ्य क्यों बढ़ गई है?
- 17:43हार्टबीट क्यों? ये कितना सांस आना चाहिए?
- 17:50हजारों तरह के प्रश्न रोज़ मुझे आते हैं कारण मैं जानता हूँ कारण
- 17:57एक ही है। पहले पहले आएगा हलाहल मृत्यु
- 18:06आएगी, मृत्यु का कम्पन आएगा। मृत्यु के कम्पन से तुम कांपोगे,
- 18:12डरोगे और डर से ये सब चीजें आई। डर है कि कहीं में मर ना जाऊं और
- 18:22कोई डर नहीं। प्रत्येक भय के पीछे मृत्यु का भय
- 18:29छिपा पड़ा है। मन को मथना है, आराम से बैठ जाओ,
- 18:49आसन पर बैठ जाओ। सभी तरफ़ सपोर्ट ले लो।
- 18:58सिराना लगा लो तकिया लगा लो, नहीं बैठा जाता, लेट जाओ।
- 19:09क्रियायोग होता है। कर लो अच्छी बात है, सहायता
- 19:13मिलेंगे नहीं होता, फिकर मत करो, किसी तरह बैठ जाओ भीतर उतरो, इसको
- 19:24मन का मंथन कहते हैं बाहर से सारी शक्तियां को।
- 19:30एकत्रित कर लो और अपने भीतर उतरो। बड़ी शक्ति चाहिए होती है।
- 19:35बेहतर जाने के लिए बड़े तूफान आएँगे, हवाएं बदलेंगी गर्म लुएं
- 19:45भी लगेंगी। ठंडी ठंडी हवाएं भी लगेंगी और
- 20:00तुम्हें सबको झेलना है। इसके लिए तैयारी करके जाओ।
- 20:11तो क्या निकला? समुद्र मंथन में सबसे पहले हलाहल
- 20:16विष पाइजन जहर मारता है और तुम्हारे लिए जहर एक चीज़ नहीं
- 20:27है। तुम्हारे लिए जहर सिर्फ वो नहीं
- 20:35जो की कोई द्रव्य की तरह हो वो पीलिया और मर जाओगे तुम्हारे लिए
- 20:39हज़ारों चीज़े जहर के सावन किसने थोड़ी सी लाल आँख से देख लिया?
- 20:50किसने तुम्हें गाली निकाली है? किसने तुम्हारी बेइज्जती करती है,
- 21:01अपमान करती है, अशुब्द वाक्य बोलती है।
- 21:15शीतल भाषा का इस्तेमाल नहीं किया कटु शब्द बोलती है, इज्जत प्यारी
- 21:30धन प्यारा। शक्ति प्यारी गद्दी प्यारी बहुत
- 21:38सी चीजें तुम्हें मृत्यु जैसी लगती है, मृत्यु तो मृत्यु जैसी
- 21:47लगती है, मृत्यु के अलावा भी बहुत सी चीजें मृत्यु जैसी लगती है।
- 21:53बब्बर में गाता पड़ गया। तुम मर गया बेटा कोई बाहर कुकर्म
- 22:03कराया थू थू होने लगी, तुम मर गया।
- 22:14बेटी किसी से प्रेम करती उसके साथ वो आ गई।
- 22:21तुम्हारे लिए विश के बराबर हो क्या पुत्र ने तुम्हारी आज्ञा न
- 22:28मानी? विष के बराबर हो क्या?
- 22:33तुम जा रहे हो। पड़ोसी ने तुम्हे देख कर सिर्फ
- 22:36ताली बजा दी, तुम भड़क जाओगे बहुत सी बाते तुम्हे विश जैसी लगती है,
- 22:50मृत्यु जैसी लगती है और वह एक बात नहीं।
- 22:55वह तुम्हें भीतर जाकर देखना होगा तुम्हारे लिए प्रत्येक के लिए विष
- 22:59अलग भी हो सकते हैं एक विष तो वह है जो मार देता है, लेकिन
- 23:08तुम्हारे लिए एक विषय नहीं है तुम्हारे लिए बहुत से विषय हैं।
- 23:19राजा के लिए विष अगर जनता उसकी बात ना माने जनता भूलना बरसा
- 23:26ब्राह्मण के लिए विष अगर उसके पांव धो के ना पिया जाए पुरुष के
- 23:33लिए विष अगर स्त्री उसके पांव को ना छुए।
- 23:39प्रेमी के लिए विषय अगर प्रेम का उसको प्यार से न भूलें, जब तक
- 23:45देखोगे विषय ही विष दखाई पड़ेगा। तुम अपनी जिंदगी को अच्छी तरह से
- 23:50निरीक्षण कर लेना इसे ही मंथन कहते हैं।
- 23:58चारों तरफ से देखना कहाँ कहाँ विष पड़ा है भीतर कई बार तुम्हें
- 24:08लगेंगी बात विष जैसी मेरे पास लोग आ जाते हैं बाबा उसने मुझे ये बात
- 24:15कही थी। क्रोध तो बढ़ाया लेकिन मैं किसी
- 24:19तरह पी गयी। ये क्या पी गयी भाई ये विश पी गए।
- 24:38बहुत सी चीजें तुम्हारे लिए विश का काम करेगी।
- 24:44तुमने कोई फरमान जारी किया, बड़े ऑफिसर हो, पास हो और तत्क क्षण
- 24:52उसका पालन नहीं हुआ। आज्ञा का पालन हो।
- 25:00तुम्हारा मन कब से भर जायेगा? इसकी इतनी जुर्रत है?
- 25:12तुम जब अपने मन के भीतर देखोगे, प्रत्येक व्यक्ति के विष समान्य।
- 25:22प्रत्येक व्यक्ति के विषय अलग अलग होंगे।
- 25:27एक वृक्ष तो विष है, यह जैसे पोटाशम साइड में होता है।
- 25:38और कुछ लोग तो मैंने सुना पोटैशियम साइनड पर इन पर असर नहीं
- 25:41करता सूदखोर व्यक्ति रिशुदखोर व्यक्ति इन पे पोटैशियम साइनड असर
- 25:57नहीं करता मेरी बात को। आर्किक रूप से लेना तार्किक रूप
- 26:05से मत लेना अर्थ देखना क्या है? क्योंकि इतना जहर पी लिया है
- 26:15गरीबों का खून चूस चूस के। रक्त ही जहरीला हो गया है।
- 26:20पोटैशियम साइनाइड से भी ज़्यादा जहरीला तो पोटैशियम साइनाइड का
- 26:25खाक असर करेगा। बहुत वर्षों की बात है, मैं
- 26:33इंतकाल करवाने के लिए एक पटवारी का उपाश चल रहा।
- 26:42थोड़ा सा मैं भी बिगड़ैल हूँ, हाँ अगर कहा जाए तो मैं भी थोड़ा
- 26:49बिगड़ैल हूँ। बचपन से दूसरों को दोष देना अच्छा
- 26:56नहीं होता। पहले खुद का ही बता दूँ।
- 27:01तो मैंने उससे कहा कि ये रजिस्ट्री है इसका इंतकाल कर दो
- 27:08इंतकाल के पीछे दे दिए हैं मैंने जो सरकारी फीस होती है पटवारी
- 27:13कहता है अरे पे लगेंगे 200 बहुत बार की बात है, मैंने कहा वो कहे।
- 27:21कहता हमारे चाय पानी के मैं चाय पानी में मंगवा देता हूँ, कहता वो
- 27:26चाय पानी थोड़े वो तो ₹2 की ₹1 की चाय आ जाएगी और।
- 27:41कहता ₹200 मैंने कहा अच्छा फिर मैं कर रहा हूँ मैंने मंत्री जी
- 27:53से पूछा आप पटवारियों को तनख्वाह नहीं देते, क्या देते हैं?
- 27:59क्या बात हुई बाबा बात ये हुई है। अच्छा तो मैं सस्पेंड कर दूं नहीं
- 28:07बच्चों का क्या कसूर फिर क्या करूँ किसे वार न कर दो कभी ऐसा मत
- 28:19किया कर जब तुम्हें तनख्वा देती है सरकार।
- 28:26तो तुम रिश्वत क्यों खाते हो? रिश्वत जहरीली होती है तो इनके
- 28:32खून, पोटैशियम, सायनाइड से ज्यादा जहरीले रिश्वतखोर और सूदखोर।
- 28:45इनके खून पोटैशियम सायनाइड से ज्यादा जहरीले होते हैं।
- 28:51कहानी है हजरत मोहम्मद ने घोड़े मरे सूद घोरों के ठीक किया यही
- 28:59चाहिए था। हालांकि सूद उसने।
- 29:05हजरत से नहीं वसूला था, लेकिन शांत में करुणा बहुत होती है पर
- 29:14ताप को वो देख नहीं सकता इसीलिए कोटा उठा लिया।
- 29:26मुझे लोग पूछ लेते हैं आज संसार में इतनी अशांति क्यों है?
- 29:33मैंने कहा रिश्वत खोरों के कारण इनके खून जहरीले हो गए।
- 29:41जैसा खावे अन्न वैसा हो गए मन। जैसा पीवे पानी, शाम को दारू
- 29:50पीनिया तो कड़वी होगी वैसी हो गई बानी और तुम जैसा अन्न खाओगे
- 30:00ईमानदारी से काम करोगे। नेक नीती से काम करोगे, पूरा
- 30:05हार्ड तोर के काम करोगे, लोग हैं से काम करने वाले तनख्वाह मिलने
- 30:16के बावजूद अगर रिश्वत लोगे, अच्छे महलों के लिए साथ तो जाएगा नहीं।
- 30:26लेकिन कभी कभी मुझे लगता है इन रिश्वतखोरों के साथ जाएगा और
- 30:35मैंने रिश्वतखोर मरता भी नहीं देखा, तुम अशांत करो।
- 30:44रिश्वतखोर व्यक्ति मेरी ज़िन्दगी में मेरे सामने नहीं मरा, वह
- 30:50जिंदा है मज़े से और मुछों को बैठ दिया है मैंने कहा भाई मुछे नहीं
- 31:00सिख लो कहता है क्यों नहीं सिख लो?
- 31:06जब तक खाऊंगा, तब तक ऊंची ही रहेंगे।
- 31:16तुमने पोटैशियम साइनाइड से ज्यादा जहरीला कौन कर लिया है?
- 31:23अति शोकती नहीं है। अगर तुम नफरत फैलाना शुरू कर दो,
- 31:30इसमें कोई हैरानीजनक बात नहीं है। लोग मुझे कह देते हैं क्यों?
- 31:36मैंने कहा इनके हैरानी की बात क्या है जब खाते ही हैं इसे जो
- 31:45खाओगे वही निकालोगे ना? मन का मंथन करना है और मन को जब
- 32:05मत होवे तो ऋषि कहते हैं सबसे पहले निकलेगा।
- 32:14विष कायर व्यक्ति घबरा जाग गया। डरपोक व्यक्ति बाहर निकल आएगा
- 32:30बाबा मैं गया था डर के मैं वपरा बुढ़म डरा।
- 32:37गयो किनारे बैठ भीतर जाने की औकात ही नहीं, मैं डर गिरा हर तरफ मौत
- 32:50का तांडव नृत्य दिखता, मैं तो बाहर छलांग लगा के आया हूँ किसी
- 32:57तरह बच के आया हूँ। अब फिर नहीं जाऊंगा तो मारी मर्जी
- 33:02भाई बात तो ये है ऋषि कहता है अगर अमृत चाहिए तो जिनको नहीं चाहिए
- 33:13और दान कमाओ कॉम्पटीशन लड़ो। वो गदियों का हो, वो आइएएस,
- 33:27आईपीएस, यूपीएससी वगैरह कुछ भी हो, कॉम्पटीशन हो फिर लड़ो।
- 33:46जिन्हें अमृत्य चाहिए, उनके लिए समुद्र मंथन की यह कथा है जिन्हें
- 33:58अमृत्य नहीं चाहिए, वो कृपा करके इसे मत सुनें।
- 34:07अभी छोड़ दे, अच्छा होगा, पता नहीं आगे चलकर तो विनाश ही विनाश
- 34:15है जिसे तुम मैं कहते हो अपना वजूद कहते हो बैम टेका।
- 34:23तो संभल जाओ अगर बड़ी कोठियां डालनी हैं, अच्छी चमचमाती कार्य
- 34:30लेनी है, अच्छा नाम कमाना है, अच्छी डिग्री चाहिए।
- 34:42अच्छी गद्दी चाहिए। पूजा प्रतिष्ठा, मान सन्मान
- 34:47चाहिए, धन वैभव, हीरे जवरात चाहिए, कल्पवृक्ष चाहिए जो मांगो
- 34:55वही मिल जाए। अगर ये ही चाहिए तो इस प्रवचन को
- 35:02मत सुनना। मुझे लोग पूछ लेते हैं बाबा आप
- 35:15ऐसी बातें क्यों की करते हो? मैंने कहा प्रिकाशन तो आवश्यक है।
- 35:25चेतावनी देनी आवश्यक होती है, शुभ होता है।
- 35:35जब बाबा ने मुझे हुक्म दिया, बोलो मैंने बोलना शुरू कर दिया जो तुद
- 35:43पा वे। सोई पलीकार तू सदा सलामत रंकार और
- 35:54बोला तो बहुत से लोगों ने सुना शुरू कर दिया।
- 36:01बाबा बड़ा मीठा बोलते हो, बड़ा मीठा गाते हो?
- 36:06सुर और लेह बा कमाल मैंने कहा बस यही है और कुछ नहीं है और भी बहुत
- 36:16खुश है बाबा कुछ सिर के ऊपर से गुजर जाता है।
- 36:25और चलते चलते मैंने अपने अनुभव बोलने शुरू कर दिया है।
- 36:36अनुभव बोला मैंने अपनी एनलाइटनमेंट का, जो आचार्य कहते
- 36:43हैं कि वो तीन है। बड़ा सुन्दर सगुफा जहाँ जाना न हो
- 36:58जो देखा ना हो तुम्हें भी बता दूँ एक शब्द प्रयोग कर लेना होता ही
- 37:04नहीं। कर्म अवस्था में चार वाक विश्वास
- 37:11नहीं करता, वह लूटना चाहता है और खाना चाहता है।
- 37:17इसलिए वह सिद्धांत देता है कि कर्म व्यवस्था नाम की कोशिश
- 37:20कीजिए। चार वाक कहता है।
- 37:24यदा जी वेद सुखी जीवित ये छोटा सा जीवन है 150 साल का कोई जीवन होता
- 37:30है क्या और उसका भी तो कोई भरोसा नहीं है मैं जाने किस घड़ी इस
- 37:38जिंदगी की शाम हो जाए। भस्म भूत से दे हत से जदा जी वेत
- 37:52सुखी जीवित ऋण कर्त्व गिरतं ऋण उठा लो कर्ज उठा लो, घी भेजो।
- 37:59बैंकरों से कर्जा लेलो विदेश। भाग जाओ।
- 38:07बस जीवन का यही लक्ष्य है तुम्हारे लिए और कोई लक्ष्य नहीं
- 38:12होता। क्या चारवाक की नीती है?
- 38:20कर्म व्यवस्था में वह विश्वास नहीं करता जानता नहीं विश्वास
- 38:25नहीं करता बस और इस विश्वास नहीं। बड़े बड़े महारथियों को मार दिया।
- 38:36जवानों ने मारे जवान, कैसे कैसे? जमीं खा।
- 38:51गई आसमान कैसे कैसे जमाने? मार जमा कैसे कह।
- 39:12ये ज़माना, विचार व कर्म सिद्धांत नहीं होता जो इसके पीछे लगा।
- 39:23ए। पापा चार में पड़ जाएंगे ना ऋण
- 39:31देने वाला, ना ऋण लेने वाला दोनों बस हो जाएंगे पुनर आगमनम कुतफ फिर
- 39:40कभी किसी ने आते देखा। बड़े बड़े सेठ मर जाते हैं, उधारी
- 39:48देकर वापस आए मांगने मेरे पर दादा आ गए।
- 39:54बात चल रही है आपको बता दिया, मैंने कभी देखा भी नहीं, शाल
- 40:00गर्म। मुझे कहते पुत्र बा मुश्किल जाकर
- 40:09मेरे खानदान में तुम आई मैंने बात बहुत की, मेरे परदादा, मेरे
- 40:21पिताजी कन्हैया लाल। मेरे दादा रामचंद्रन मेरे पर दादा
- 40:27शाल का पुत्र बा मुशकर दिव्य चक्षु बाला व्यक्ति मेरे परिवार
- 40:39में आया मैं धन्य हो गया। मैं भटकता फिर मैंने कहा दादू
- 40:49क्या बात है और मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?
- 40:54मैं तो पहचान तो नहीं पाया आपके लिए मैंने कौन सा देखा?
- 41:04कहे पुत्र मेरा एक काम करो, मैंने कहा मेरे अहो भाग्य तुम हो तो
- 41:15मेरे पर दागा ना, मैंने देखे नहीं हैं कोई ठग भग तो नहीं हो।
- 41:23मैं नहीं पुत्तर आँखों में आंसूता है, फिर बताओ मैं क्या सेवा करूँ
- 41:33तुम्हारी क्यों भटक रहे हो दादा पिता और मैं आ गया।
- 41:43पर मेरे पुत्र पोत्र हो गए। कितनी पीढ़ियाँ हो गई तुम भटक रहो
- 41:51हाँ पुत्र सज्जा ल लाये मेरा एक काम कर दो।
- 42:06बताओ मेरे मन पे बोझ है, मैंने कहा क्या पूछा है?
- 42:15मैंने किसी व्यक्ति से एक आना लिया था, उधार लुटा नहीं पाया
- 42:24फिर? पुत्र तुम लौटा दोगे उसे दादा एक
- 42:34आना हाँ दादा जब तुमने एक आना लिया था, अब उसकी कीमत तो बहुत
- 42:43ज्यादा बढ़ गई। एक आना ही मैडम कौन है वो?
- 42:51उन्होंने बताया, अच्छा ओह दादू एक आना एक आना तो नहीं रहा, अब तो एक
- 43:07आना चलता है। अब तो रुपया वगैरह भी मुश्किल चल
- 43:15पाता है। रुपए की कीमत क्या है?
- 43:17आज कुछ भी नहीं, आज तो बच्चे को भी ₹100 चाहिए?
- 43:29और तुम कहते हो दादू में एक एक आना मोड़म हाँ पुत्र नहीं न उस एक
- 43:37आने की रेश्यो बैठाओ क्या है तो पुत्र उस वक्त एक आने का एक शेर
- 43:43घी आ जाता था। अब तुम जोड़ रहे हो हाँ अब मैं
- 43:47जोड़ लूँगा। उसने व्यक्ति का नाम बता दिया।
- 43:52बहुत वर्ष पहले की बात है ये जो कहते हैं ना, जो व्यक्ति एनलाइटन
- 44:03हो गया उसकी सात पुशते तर जाती है ऐसे तर जाती है।
- 44:15दादू ने हाथ जोड़े, परमात्मा का शुक्रगुजार किया।
- 44:24मेरे वंश में एक व्यक्ति हुआ अन्यथा हमारे जैसे लोगों का।
- 44:34छुटकारा मुश्किल था। तुम जाओ पुत्र, मेरी गति हो जाएगी
- 44:43ये चीज़ मुझे अटकाए खर्च है इनका दादू तू फिकर न कर मेरे संग तेरे
- 44:52सामने। उसको पैसे दे के आऊंगा, देखो ₹300
- 44:56का आता है घी ठीक उस वक्त की बात है, कहती है तो तुम्हारा एक आना
- 45:05₹300 हो गया। और तुम बताते हो कि उसने जन्म
- 45:12लिया इस रूप में और यहाँ भी है वो ठीक तो तुम संग संग आ जाओ, मैंने
- 45:26गाड़ी पकड़ी, वहाँ गया उस व्यक्ति के पास गया।
- 45:30निशांत ही कि मैंने कहा यह है कहीं कहीं अटक जाती है जीवनषण यह
- 45:43थे लेने देने के संबंध और यह था बंधन का मुख्य कारण।
- 45:50अब इसको ज्यादा गहरे में मत ले लेना है अन्यथा तुम चरम चक्षुओं
- 46:00के बाद जब दिव्य चक्षु फूलें। तो संतों ने लिखा कि उसकी साहस
- 46:08पुश्तें तर जाती हैं ऐसे तर जाती हैं कोई मुक्त न हुआ हो, किसी को
- 46:15जीवन न मिला हो, प्रकृति ने जैसे उपेक्षित कर दिया हो, प्रकृति ने
- 46:20जैसे गर्व उपलब्ध न कराया हो क्योंकि जब तक तुम।
- 46:24अपनी देह से मुक्त नहीं होते। मुँह से तब तक प्रकृति असमर्थ है।
- 46:35तुम अटके ही रहना चाहते हो इसलिए जीतने जीवेशन से भरे हुए लोग हैं
- 46:41प्रकृति तत्व क्षण उन्हें जीवन दे देते हैं।
- 46:44इधर मरे उधर जन्म हुआ तीरस भी नहीं होने देते।
- 46:49जीतने ज्यादा जीवेशणा से भरे लोग हैं।
- 46:53वो तो रसम चौथा भी नहीं होने देते हैं और कुछ शांति स्वभाव वाले
- 47:01ज्यादा चिपकाट नहीं होते। संतों ने समझाया होता है कि महू
- 47:07को छोड़ दो। जीते जी कुछ क्लिंगनेस कम की होती
- 47:13है। एक एक शब्द को ध्यान से समझ लेना
- 47:16ये आपके जीवन का सार सूत्र है, उसको प्रकृति 13 दिनों में।
- 47:25ज्यादा से ज्यादा गर्भ उपलब्ध करवा देती है और बहुत से लोग वो
- 47:33कर्म व्यवस्था के भारी इतने कर्म होते हैं।
- 47:38प्रकृति असमर्थ हो जाती है, प्रकृति हाथ उठा देती है नहीं
- 47:42मुझसे नहीं हो सके। इतनी गन्दी व्यवस्था से युक्त
- 47:47महिला में कहाँ ले के आऊं और इतनी अच्छी व्यवस्था से युक्त महिला भी
- 47:53नहीं, आज औरतें शराब पीती हैं, सिगरेट पीती हैं, बोध का वाएं।
- 48:05कैसे उतरेंगे? बुध में नहीं उतर पाएंगे।
- 48:17इसलिए मैं कहता हूँ बुध का रोज़ उतरना मुश्किल होता जा रहा है
- 48:25स्त्रियां कोख में? धारणकरण के योग्य नहीं हैं, न
- 48:30गर्व मिलेगा, न वो उतरेंगे, न मित्र आएगा, आना है लेकिन आएगा
- 48:39मुझसे। मैं उस व्यक्ति के पास गया गाड़ी
- 48:53पकड़ ली, वहाँ गया बाहर था मेरे कस्बे से बाहर तब एक कस्बा था आज
- 49:02थोड़ा शहर शहर के जैसे हो गया है। पता पूछा, दिशा निर्देश दिया मैं
- 49:14तो मेरे साथ ही था शालगराम जी कहते इससे लिया था, ये का नाम अब
- 49:23आगे घूमता घूमता, ये तो यहाँ आ गया।
- 49:25मैं यहीं पर हूँ। मुझे मुक्त कर दे पुत्र मुझे
- 49:34मुक्त कर दे, मैं उलझ गया करूँ क्या मेरे लिए ठहराव का कारण बन
- 49:45गया। मेरे लिए यह हथकड़ी बन गया।
- 49:49मैं मजबूर हूँ जब तक इसका नहीं चकाऊंगा कर्ज एक आना भी बहुत होता
- 49:55था। मैंने कहा देख दादू तेरे सामने
- 50:06इसे दे रहा हूँ ₹300 हाँ, ठीक है ये देख ₹100 ₹200 ₹300 ठीक हो
- 50:14गया। ये ले भाई ये ले ₹300 उसकी तो
- 50:26आँखों में आंसू आ गए किसी हॉस्पिटल के बाहर खड़ा था वहाँ
- 50:32क्लिनिक का नाम लिखा था। नाम नहीं पता हमको फिर तो तुम शहर
- 50:39भी पूछोगे बाहर खड़ा उसने मेरे पांव छुए, मैंने कहा क्या कर रहे
- 50:51हो, कहता मेरा पुत्र सख्त हो मारता।
- 50:59यहाँ ऐडमिट था, मुझे डॉक्टर इतना दुष्ट कितर पे 300 देगा तो उठा ले
- 51:05लाश, नहीं तो लाश नहीं उठाने दूंगा, भगवान ने भेजा है तुम्हें,
- 51:18मेरे पुत्र की लाश को मैं ले जाऊं कहाँ?
- 51:21यह है दुष्ट डॉक्टर मुझे लाश नहीं उठाने देते, मैंने कहा तू शोक न
- 51:30कर यह तेरे हैं मेरे को इस बात में वो कह के भाग गया अंदर।
- 51:42मैंने दादू से कहा, दादू और बता अब तो है, अब तो बता दे मैं चुका
- 51:53दूंगा, अटके मत रहें। आशीर्वादों का ढेर जिन्हें तुम
- 52:08कहते हो पितृ लोक से बैठे हुए पितृ आशीर्वाद देंगे।
- 52:13ये होता है कोई पितृ लोक नहीं होता है यही भटकते भरते है यही है
- 52:21एकमात्र जीवन की जगह। आशीषों की गठड़ी फेंक दी।
- 52:34मेरे ऊपर ये पित्री लोक के आशीर्वाद श्राद्धों में नहीं
- 52:41होता। किसी वक्त भी हो सकता है, वे यहीं
- 52:44हैं। बस इन चरणों में चक्षुओं को खोल
- 52:48लूँ दिव्य चक्षुओं को प्रस्त कर मैंने कहा, दादू अब बताते हैं
- 53:00कहीं और अटके हुए हैं कितने बरसों बीत गए।
- 53:06अरे दादू तुम्हारे बाद मेरे दादा रामचंद दादा के बाद मेरे पिता जी
- 53:16और अब तक तुम भटकते ही फिर रहे ले ज़रा करीबा।
- 53:25दादू करी भाई मैंने उनके चरसपश किये आशीर्वादों की बौछार मैं
- 53:34निहाल हो गया। यह होता है पितृ लोक।
- 53:44यह होता है पितृ रण समझा के जो किसी बंधन में बंधकर चरवाक तो
- 53:59कहते है ये होता ही नहीं। लेन देन?
- 54:02इसलिए मैंने चारवाक का जिक्र किया और फिर ये गाथा आपको सुनाई।
- 54:10मैंने कहा अब तू ठहर जा दादू मैं तेरे लिए गर्व भी उपलब्ध करवाता
- 54:18हूँ। ये ज्ञान शिक्षकों का खुल जाना
- 54:25इसका लाभ पूरा हुआ ले किसी अच्छे स्थान पर तुझे जन्म दिलवाते था
- 54:34कहते ठीक है पुत्र मैंने अवस्था की।
- 54:43बहुत बढ़िया जगह के ऊपर उन्हें स्थापित कर दिया अब ये फिलॉस्पी
- 54:50इससे तुम समझी लेना सारा कुछ आने वाली पीढ़ियां।
- 54:59इसको एनालिसिस कर लेना और इसमें से रस निकाल लेना तत्व निकाल लेना
- 55:07सिरे की बात मैंने आपको बता दी है।
- 55:12चारवा कहते हैं बस में भूत से देहस्य पुनर्भाग मनम कुत्ता।
- 55:18तह तो चलेगी उसकी, लेकिन यहीं फिर रहा उसने देनी है अरे वो है
- 55:37जीसको कुछ पता नहीं सीधा कहो कि हमने ठंडी मारनी है, हमने लोगों
- 55:44का ले के मुकरना है। हमने लोगों का लेके मुकरना ही
- 55:48नहीं, उन्हें ज़लील भी करना है, नहीं मैंने लेने है।
- 55:54पुलिस स्टेशन में घसीटना है न्यायिक अवस्था में घसीटना है
- 56:01कोर्ट्स में। और जो लिए वो तो लिए ऊपर से
- 56:06वकीलों के और खर्चे करवाने है। मसल मैन साथ रखने डराना है,
- 56:13धमकाना है, पाप एक हुआ ऊपर से पाप करते ही जाना है।
- 56:32मार्क किस कहते हैं परमात्मा? मैंने कहा ठीक है, बिल्कुल है, जब
- 56:43तुमने देखा नहीं। ईमानदार तो हो ऐसा ही हुआ।
- 56:49मेरे पास एक प्रश्न गया। बाबा आचार्य कहते हैं लाइटनमेंट
- 56:54होती नहीं, मैंने कहा ईमानदार तो हैं अगर देखी नहीं तो बिल्कुल
- 57:01होती नहीं नहीं कहना चाहिए कि होती है ये कोई किशोरी थोड़ी है।
- 57:12जो 3,00,000 की घड़ी बांधने के लिए तुम्हारे दिमाग को खराब करते
- 57:16थे, सड़े हुए केले की तरह है ईमानदार इस व्यक्ति की जितनी भूरी
- 57:24भूरी प्रशंसा होनी चाहिए, होनी चाहिए।
- 57:28सच तो बोलता है और सत्य बेशकीमती होता है।
- 57:32आज की दुनिया में सच कौन बोलता है?
- 57:40एक मायने से इनकी पूजा होनी चाहिए।
- 57:44आज कौन या तो युधिष्ठिर सत्यवादी हो या फिर आज?
- 57:51आचार्य सत्यवती चारवाक को भी मैं सत्यवादी मानता हूँ।
- 58:03मार्कस को भी मैं सत्यवादी मानता हूँ, जैसा जानू वैसा बोलती हूँ
- 58:09शुभ। अगर ऐसे ही लोग धरती पर आते जाते
- 58:13रहे। तो खूब व्यवस्थाएँ समाप्त हो जाए,
- 58:17जिन्होंने नहीं देखा अपने विचार प्रकृति का, जिन्होंने देखा कबीर
- 58:23जैसे लोगों ने और कहते तुम कहते कागज की लिखी और मैं कहता आंखें
- 58:29देखी मैं भी कहता हूँ आंखें देखी। ईश्वर है, मैंने दिखाएं लोग कहते
- 58:40हैं प्रमाण मैंने कहा मेरा जीवन जीने का ढंग इससे बड़ा प्रमाण
- 58:45क्या होगा? जीतने महान पुरुष हुए चरवाक हुए
- 59:05मार्कस हुए, आज की घड़ी आचार्य हुए नहीं देखा तो कहा नहीं देखा
- 59:11वो नहीं होता पर थोड़ी सी गलती का अच्छा कन्फेशन होता।
- 59:19अगर कह देते कि मैंने कोशिश नहीं की जाना नहीं है, मुझे मिला नहीं।
- 59:27मैंने जिया नहीं उनसे तो ज्यादा शुभ होता, लेकिन ये भाषा भी ठीक
- 59:33है ईमानदारी की। भाषा लेकिन कबीर छाती ठोक के कहते
- 59:42हैं कागज कदम छोड़ मैं बिल्कुल अनपढ़ गवार हूँ, लेकिन मैं कहता
- 59:51हूँ आंखन देख। तुम कहते हो शास्त्र की लिखी बस
- 59:59इन्हीं लोगों के सहारे आज विश्व में ब्राह्मण खड़ा है।
- 1:00:06एक व्यक्ति के कारण ब्राह्मण खड़ा है।
- 1:00:14हमारी एक कहावत है धरती कांपती है जब धोला बैल, श्वेत बैल शिंग
- 1:00:22बदलता है, बड़ी प्यारी कहावत थी जब सत्य बोलने वाला थोड़ा फिरने
- 1:00:32लगता है। धरती कांकती है, सच में कोई धोला
- 1:00:40बैल नहीं है। अगर धोला बैल के सिंग और पृथ्वी
- 1:00:43खड़ी है तो धोला बैल किस के ऊपर खड़ी है।
- 1:00:51ये भी एक प्रतीक था। नहीं समझ पाए, कोई बात नहीं किया।
- 1:01:01जब कोई समझाने वाला आ जाए तब समझ में आ जाएगा, लेकिन इन बातों का
- 1:01:08रिकॉर्ड में रखा है नालंदा यूनिवर्सिटी की तरह फूंकने मत
- 1:01:13देना। इनको रिकॉर्ड बड़ी खोजें हुई।
- 1:01:24आज अवशेष रहते हैं। अवशेषों से क्या जान सकोगे?
- 1:01:30कुछ थोड़ा बहुत हाथ में आता है। जो हाथ में अभिषेक चाहते हैं उनको
- 1:01:40भी कोई बताने वाला होना चाहिए। बख्तियार सी जी ने 1199 में
- 1:01:47नालंदा यूनिवर्सिटी को आग लगाते हैं।
- 1:01:53कहानी लंबी हो जाएगी। आग क्यों लगा दी?
- 1:01:59क्योंकि नालंदा यूनिवर्सिटी के एक आचार्य ने उस मरते हुए बख्तियार
- 1:02:05को दवाई दे दी थी और बचा लिया था। उसने नालंदा यूनिवर्सिटी के सभी
- 1:02:14किताबों को आग्रह किया। सिर्फ इसलिए कि यह इतना समृद्ध
- 1:02:24साहित्य क्यों है? इनके पास हमारे पास क्यों नहीं?
- 1:02:29ईशा और देश की अग्नि? उनकी चिंगारियाँ बरसम कर देती
- 1:02:36हैं, लेकिन तुम इतिहास के पन्नों को खंगाला मत करो, सीख ले लो कि
- 1:02:44तुम मत आग लगाना और इन जेब और इन जेब करने वालों।
- 1:02:53वही तो तुम कर रहे हो, उसने किया हिंदू, मुसलमान, हिंदू, मुसलमान
- 1:03:00तुमने भी तो वही किया, फिर औरंगजेब में औरतों में फर्क क्या
- 1:03:06हुआ? वो ही है चाल बेढंगी जो पहले थी
- 1:03:14वो अब भी है। औरंगजेब ने और रुतेक बहादुर का
- 1:03:21शीश काट लिया। हिंदू मुसलमान करते हुए और वही
- 1:03:27हिंदू मुसलमान की आग तुम भी फैला रहे हो तो तुम में और औरंगजेब में
- 1:03:34फर्क क्या है? तुम आज के औरंगजेब हो, वो उस वक्त
- 1:03:41का औरंगजेब था। 1199 में बख्तियार खिलजी ने
- 1:03:49नालंदा यूनिवर्सिटी को आग लगा दी। और तुम्हें जानकर हैरानी भी बहुत
- 1:03:54होगी इतिहास के पन्नों में दफन पड़ा है ये सारा दृश्य मैं तो बोल
- 1:04:00रहा हूँ मैंने इनमें से कुछ अंश अपनी आँखों से देखे हैं।
- 1:04:11हमारे पास बहुत कुछ था। सोने की चिड़िया इसका मतलब सोना
- 1:04:16ही नहीं था। हमारे पास हमारे पास एक शुद्ध
- 1:04:19संपदा थी जिन्हें हम रिसर्चर्स इन्वेंशन कहते हैं।
- 1:04:24डॉक्टर्स को साइंटिफिक रिसर्चर्स भरा पड़ा था।
- 1:04:29तीन महीने किताबों को आग लगी रही। देखिये कितना साहित्य होगा?
- 1:04:37तीन महीने तक किताबों को आग लगी रही।
- 1:04:44अब देखिये कितनी रिसर्चर्स को उसने गोल कर दिया।
- 1:04:51लेकिन भड़क अगर तुम भड़क गए तो फिर वैसे ही हो गया।
- 1:04:58उसने भी भड़क के ही ये किया जिसने जान बचाई।
- 1:05:02आचार्य ने अपने वैदिक ग्रंथों से उसी को मार दिया।
- 1:05:09यह साहित्य हमारे पास क्यों है? ये इच्छा की अग्नि मैंने पहले कहा
- 1:05:15था। जमाने ने मारे जमा, कैसे कैसे?
- 1:05:29जमीन खा। गई आसमान कैसे कैसे ज़माने नमार
- 1:05:48कैसे कैसे? आज तुम जो रिसर्च करोगे, जो की है
- 1:05:54जो करोगे, तुम्हें नहीं पता कितनी बार पहले भी हो चूके हैं, लेकिन
- 1:06:01इस ईर्ष्या और देश की अग्नि ने वसु में बहुत कर दिया सब कुछ।
- 1:06:06तुम ऐसा मत करना, तभी मैं कहता हूँ इतिहास को पढ़ना न उसे सबक
- 1:06:14लेना पढ़ोगे तो ईशा में जलोगे और तुम बदला लोगे।
- 1:06:26और बदला लेना हमारी सभ्यता संस्कृति हमें नहीं सिखाती।
- 1:06:31क्षमा करना क्षमा वीरत से भूषणों में यह हमारी संस्कृति हमें
- 1:06:37सिखाती है तो अपनी संस्कृति को जीवंत रखना और 1 दिन पाओगे।
- 1:06:46फिर हिंदुस्तान कई नालंदा यूनिवर्सिटीओं को खड़ी कर लेगा।
- 1:06:58वक़्त बहुत बीत गया है और यह प्रसंग तो बहुत लम्बा है।
- 1:07:05इतने ज़्यादा तुम सुन भी न पाओगे। इस अध्याय को आज मैं यही समाप्त
- 1:07:13करता हूँ अपने परदादा जी की कथा इससे आगे समुद्र मंथन की बात।
- 1:07:24अगले प्रवचन में होंगे। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे
- 1:07:37नाथ नारा जन वासुदेव। हेतुमात स्वामी सखा हमारे हेतुमात
- 1:07:55स्वामी सखा हमारे हेनाथ नारा। यन वासुदेव, श्रीकृष्ण, गोविन्द
- 1:08:12हरे, मुरारी हिनाथ, नारायण वासुदेव।
- 1:08:24श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारा जन वासुदेव हे खुदा हर
- 1:08:41फैसला। तेरा मुझे मंजूर है ए खुदा हर
- 1:08:56फैसला तेरा मुझे। मंजूर हैं, सामने तेरे तेरा बंदा
- 1:09:12बहुत मजबूर हैं। अरे ला?
- 1:09:36में खुदा हर फैसला। तेरा मुझे मंजूर है, सामने तेरे
- 1:09:52तेरा बंदा बहुत मजबूर है। धन्यवाद।