Latest / Baba ji Vijay Vats / 4 May 26 - अरदास vs समर्पण। भक्त अक्सर भगवान को उंगलियों पर नचाना चाहता है, जिसे वह भक्ति समझता है
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- 0:09बाबा जी प्राण संतोष सिंह अष्टया से बाबा जी मैं सिख हूँ।
- 0:27और हमारे धर्म में अरदास का बड़ा महत्त्व है।
- 0:36आप रहस्य उद्घाटन कमाल का करते हैं, कृपया करके अरदास का गहरा
- 0:44रहस्य। उद्घाटन करने का कष्ट करें।
- 0:54हरदास का अर्थ है कि परमात्मा से कहना कि तू जो कर रहा है, वह ठीक
- 1:04नहीं कर रहा है, तू ऐसा कर जैसा हम कह रहे हैं।
- 1:17हरदास का ये हस्त है कि तू जो कर रहा है वो ठीक नहीं कर रहा है।
- 1:29तू जैसे हम कहते हैं वैसा कर हरदास सदा अहंकार करता है।
- 1:39फिर वो अल्फाज़ बड़े विनम्र उपयोग करता है प्रार्थना अर्थ भाव से की
- 1:49गई प्रार्थना। जब अहंकार सरकमस्टैंस से करी जो
- 2:05होता है उसे स्वीकार नहीं कर पाता तो उस शिकायत का नाम हरदास।
- 2:17अरदास का मतलब तुमने गहरे पूछा। बता अरदास का मतलब है कि मैं जैसा
- 2:26कहूं वैसा कर। तुने कैंसर कर दिया, मैं कहता हूँ
- 2:36उसे कैंसर से मुक्त कर दे, यह एक प्रकार का विनम्र आदेश।
- 2:50यह कुनीन है जिसके ऊपर तुने शुगर कोट कर दिया है।
- 3:02मैं चाहता। हूँ अमीर बन।
- 3:08तुने कर दिया गरीब तो तू मुझे अमीर करदे।
- 3:19भगत तथा कथित भगवान को उंगलियों पर नचाना चाहता है तुम भक्ति का
- 3:34नकाब ओढ़ कर। इस प्रकार की अरदास करते हो और
- 3:43तुम कहते हो के मैं सीखूं संतोक सिंह जैसे सिखी की बात बाबा नानो
- 3:54तो कहते हैं तेरा कोना मीठा ल। तुम कहते हो इंडिरेक्ट्ली तेरा
- 4:03पाना कड़वा ला के मीठा नहीं लगता मुझे तुमसे जवाब मांगते हो, ऐसा
- 4:13क्यों कर रहा है? तू इसे ऐसे मत कर तू नहीं?
- 4:23जानता मैं जानता हूँ तू इसे ऐसा कर जैसा मैं कहता हूँ।
- 4:34तू इसे बीमार मत रख, तू इसे सुस्त कर दे।
- 4:41मैं जो कहता हूँ और मैं तेरा भक्त हूँ भक्ति के नाम पर यह कृपाण
- 4:52लेकर। तुम परमात्मा का गला काटने को
- 4:56उद्यत हो जाते हो, इसे तुम कहते हो।
- 5:01सिक्के। तुम्हारी अरदासी मात्र उसको दिए
- 5:09गए हुक्म। जबकि बाबा ने तो बिलकुल इससे
- 5:16उल्टी बात कही थी। बाबा कहते हैं कि हुकुम उसके
- 5:23हुकुम में चल तुम। उसको कहते हो कि तुम हमारे हुक्म
- 5:30में चलो। बाबा ने कहा, हुक्म में अंदर सबको
- 5:38यह सारा संसार उसके हुक्म में चल रहा है।
- 5:42बाहर हुक्म ना कोई। हुकम से बाहर कोई चल ही नहीं सकता
- 5:50और चलेगा भी कैसे? यह मूर्ख अहम्कार परमात्मा को भी
- 6:01अपने इशारों पर नचाना चाहता है। जयमुर का?
- 6:05उनका परमात्मा को भी अपने हाथ की कठपुतली बना लेना चाहता है।
- 6:14हुक्म में अंतर सबको बाहर हुक्म ना कोई नानक हुक्म जे बुझे ताहुं
- 6:21मैं कहे ना कोई। नानक कहते हैं कि उस भूकंप को जो
- 6:28बूझ लेता है, सब उसके हुकुम में हो रहा है, कभी कुछ उसके हुकुम से
- 6:36बाहर नहीं हुआ। तो फिर जब सब कुछ उसके हुक्म में
- 6:43हो रहा जो यह जान लेता है, वह नहीं कहेगा तू ऐसा कर तू ऐसा कर
- 6:52वह कहेगा तू कर जैसा होता है तेरा पाना मीठा लाग।
- 7:01मेरी तो यही अर्ज़ है कर होगी जो तेरी मर्ज हो।
- 7:09मैं तो बस यही चाहता हूँ। पल्टू कहते हैं कि वही कर जो तेरी
- 7:15मर्जी है क्योंकि उससे अतिरिक्त। कुछ हो सकता है इसलिए सनातन में
- 7:26से लीला का लीला का अर्थ है जो होता है उसकी रजा में होता है।
- 7:41उसकी रजा से बाहर कुछ होता ही नहीं और जो मूर्ख समझता है कि
- 7:51उसकी रजा से बाहर मैं करके दिखाऊंगा, बस उसे ही तो मूर्ख
- 7:56कहते हैं और मूर्ख की डेफिनिशन क्या है?
- 8:02और मूर्ख की परिभाषा क्या जो व्यक्ति कहता है कि उसके हुक्म
- 8:08में कुछ नहीं होता, मैं करके दिखाऊंगा।
- 8:12कोई यद भी वह कर नहीं पाता लेकिन उसका अलंकार।
- 8:19उसको चैन से बैठने नहीं देता। वह ना दिल में चैन पाता है ना रात
- 8:27को ठीक से सो पाता है। लेकिन बाबा कहते हैं।
- 8:37कि जब तुमने अपने हाथ की पतवार उसके हाथों में सौंप दी तो
- 8:46तुम्हारी नाव का खवैया वही होगा, तुम नहीं होगी फिर शिकायत करना
- 8:55व्यर्थ। और अगर तुम शिकायत करोगी भी तो
- 9:00करते रहना कौन सुनता है? कौन सुनता है तुम्हारी शिकायत को?
- 9:14जिसने आग का घोड़ा जिसके करीब तक तुम नहीं जा सकते, आसमान में सिथर
- 9:22कर दिया बिना की सिलेंडर के उससे तुम अपनी।
- 9:29बात। कह के मनमाओ।
- 9:34उसे लोग कह देते हैं नहीं, नहीं बाबा ऐसा नहीं है, मैंने कहा फिर
- 9:42तुम्हें पता होगा तुम बता दो। परमात्मा प्रेम के वश में आ जाता
- 9:50है। मैंने कहा ठीक है, तुम ज्यादा
- 9:54जानते होगे। यहाँ कुछ प्रेम प्रेम नहीं होता,
- 10:04परमात्मा ही प्रेम है और परमात्मा ही प्रेरक है।
- 10:11परमात्मा ही सृजन करता है। परमात्मा ही सर्जना है और
- 10:18परमात्मा ही अपनी ही सृजना के भीतर वह सृजन करता है।
- 10:23हर। अंश में विद्यमान है ईशा वास्य
- 10:26में सर्वगम ज्य कीर्ति जगत याम जगत।
- 10:32लेकिन तुम शब्दों को काट देती हो। शब्दों को काटने का अर्थ है कि तू
- 10:42नहीं जानता, मैं जानता हूँ कि शुभ क्या?
- 10:49तू जो कर रहा है वह अशुभ है, इसलिए जैसा मैं कहता हूँ बंदा बन
- 10:57कर वैसा कर क्योंकि मैं जो कहता हूँ मैं जानता।
- 11:01हूँ और तुम्हें पता नहीं। कि शुभ क्या है?
- 11:12शुभ तो वही। है जो वह करता है।
- 11:19मैं भट्टंडा जाया करता था। हम चार पांच लोग भटिंडा रोज़ जाया
- 11:27करते थे। शनिवार को जाते हुए गाड़ी ले आते
- 11:33थे। और वापसी उसी गाड़ी में आ।
- 11:36जाते थे। मेरा काम थोड़ा सा ज्यादा होता
- 11:41था। मुझे ज्यादा देर लग जाती थी।
- 11:471 दिन मुझे देर हो गयी। वह जो चार व्यक्ति मेरे साथ जाते
- 11:53थे, उन्होंने अपना काम निपटा लिया था और मुझे अभी 2 घंटे और।
- 12:04मैंने उनसे कहा त्यौहार का वक्त है, तुम चले जाओ मैं बाहर की
- 12:13नहरों पर जाकर वहाँ पर गाड़ी रुकते थे, कोई ट्रैक रुक गया, अभी
- 12:19टेम्पो रुक गया। मैं वहाँ से कोई गाड़ी पकड़ लूँगा
- 12:25और अपने घर आ जाऊंगा, तुम जाओ वो सभी चले गए माता बेमारत और ज्यादा
- 12:34बेमारत और माँ ने कहा था कि तुम आज जल्दी वापस आ जाना।
- 12:44मैंने कहा ठीक लेकिन उसी दिन मैं लेट।
- 12:48हो गया मैंने। रिक्शा ली।
- 12:57और नहरों के पास बाहर एक बस स्टैंड छोटा हुआ करता था वहाँ
- 13:03पहुँच गया। श्रीगंगानगर की तरफ आबोहर की तरफ
- 13:08जाने वाली गाड़ियां वहाँ से होकर गुजरती थीं और मुखसर गौना तक जाने
- 13:16वाली गाड़ियां परली सड़क से हो के गुजरती थीं।
- 13:22उन दिनों पंजाब में गड़बड़ का माहौल था।
- 13:28कोई व्यक्ति गाड़ी वाला गाड़ी ठहराता नहीं था।
- 13:35कोई कोई व्यक्ति लौह। वश या किसी कारण वश।
- 13:41गाड़ी ठहरा लेता और अगर ₹10 की तह हो गया तो ₹50।
- 13:52जिसमें बैठना है, वैसे। एक ट्रक आ गया, वह रुका।
- 14:02उस दिन हम बहुत 1015 व्यक्ति हो गए थे।
- 14:09तो सभी उसे ट्रक की तरफ। लग गए।
- 14:16एक व्यक्ति की सीट बाकी थी। मेरे हाथ में तैची।
- 14:21थी। वीआइपी अल्फा मुझे याद है आज।
- 14:31मैं जब उस ट्रक में बैठने लगा। तो ड्राइवर कहने लगा सरदार जी आप
- 14:42मत बैठो, मैंने कहा भाई मैं सरदार नहीं हूँ, मैं तो ब्राह्मण हूँ,
- 14:53मेरी मासा बीमार है। और मुझे देरी हो गई।
- 14:59मैंने जाना जरूर है। तू 50 कहता है तू जितनी चाहि ले
- 15:05तू 500 ले लेना, लेकिन मैंने जाना जरूर है।
- 15:13मेरी इन बातों। से शिक्षक हो गया।
- 15:17या कोई वहम मुझसे बोला नहीं, नहीं मैं आपको नहीं लगेगा मेरे गले में
- 15:27रुद्राक्ष की माला, तुलसी की माला सख्तिक मणि की माला।
- 15:34रुद्राक्ष एक मुख्य रुद्राक्ष यह सब गले में डाला होता।
- 15:38था, आज भी मेरे गले में है। बहुत से लोग मुझे कहते थे बाबा ये
- 15:50अंगूठे हैं। मैंने कहा नहीं इतना पागल नहीं
- 15:58हूँ, मैं इससे कहीं ज्यादा पागल हूँ और मैं अपने कवच दिखा देता
- 16:04हूँ या ब्रेसलेट दिखा देता हूँ, फिर भी उसकी तसल्ली न हूँ तो मैं
- 16:09भीतर की माला निकाल कर दिखा देता हूँ पूरा पागल हूँ बिल्कुल पूरा।
- 16:15100% वह चुप हो जाता है शर्मसार तो मैंने उस व्यक्ति को रुद्राक्ष
- 16:29की माला, तुलसी की सब मतलब बहुत मतलब मैंने कहा देखो मैं तो
- 16:33ब्राह्मण हूँ। पंडित हूँ मैं ये मेरा ऐडेंटिटी
- 16:37कार्ड देखो आधार कार्ड देखो कहता नहीं तुम पंडित हो या कोई हो
- 16:47मैंने तुम्हें ले के ही नहीं जाना का तो 500 ले ली।
- 16:53या तो तुम ₹5000 दो तो भी मैं लेके जाऊंगा।
- 17:02मैंने उसका अपना बैग खोल के दिखाया।
- 17:06बैग में उस दिन ₹7,00,000 था उस जमाने की बात है।
- 17:13और बहुत से कागजपत्र शीरस है अच्छी कंपनियों के वो कहता चाहे
- 17:24तुम्हारे पास कुछ भी है, लेकिन मैं तुम्हें लेके नहीं छोड़,
- 17:32मैंने उसे कहा। के खतरा तो मुझे होना चाहिए कि
- 17:38तुम मेरा सामान ना लूट लो, डर तुम रहे हो वो मुझे कहता, सरदार जी
- 17:44तुम बहस न करो, मैं तुम्हें लेके नहीं जाऊंगा, मुझे चुप हो चुप
- 17:50होना पड़ा। एक पायदान पर मेरे पांव।
- 17:55था। ट्रक का एक हैंडल मैंने पकड़ रखा
- 17:59था दूसरे हाथ में मेरी अटैच की थी, मैं नीचे उतर गया।
- 18:08और उस ट्रक वाले ने किसी और व्यक्ति को बचा लिया चला मैं वहाँ
- 18:16दूसरे। किसी सवारी का इंतजाम कर।
- 18:19लेता हूँ। देखने तक 15 मिनट बीत गए।
- 18:27मुश्किल घड़ियों में वक्त धीरे चलता है।
- 18:37आसान घड़ियों में वक्त का पता नहीं चलता रात तुम गहरी सुसुप्त
- 18:45में होते हो तो 7 घंटे का बीतते समय।
- 18:51बड़ी तेजी से दौड़ता। है।
- 18:55वक्त आसान घड़ियों के और मुश्किल घड़ियों में तुम किसी हॉस्पिटल
- 19:02में बैठे। हो किसी मरीज के पास तो वक्त
- 19:07बिताई से बीतता नहीं। वक्त वो ही होता है, घड़ियाँ वो
- 19:14ही होती है लेकिन तुम्हें लगता है कि आज ये वक्त चल क्यों नहीं रहा?
- 19:26घड़ियाँ ठहर क्यों गईं? तो करीब 15 बीसमेंट से भी ज्यादा
- 19:37हो गया होगा। एक मैटड हो रहा है टेम्पो उसने
- 19:46आके रोक लिया। कुछ एक दो आदमी उसमें बैठ गए,
- 19:55मैंने उसे कहा मैंने किधर बाहर जाना है जाओगे उधर कहता हाँ बैठो
- 20:07₹10 लूँगा, मैंने कहा तू पैसे की बात है।
- 20:12मेरे माँ का बीमार है, मैं नहीं जाना है, मैं बैठ गया अभी थोड़ी
- 20:26देर 1520 मिनट चले हो गया। तो रास्ते में अंधेरा था, आवाजें
- 20:37आ रही थीं, शोर बोल था, चीखो पगार हो रही थी।
- 20:44मैंने ड्राइवर से कहा कि थोड़ा रोक के देख ना ले कौन है?
- 20:52क्या हुआ? अगर कोई सहायता की जरूरत पड़ी तो
- 20:57इनकी सहायता कर देंगे। पानी वगैरह है मेरे पास वो
- 21:03ड्राइवर बोला देखो बात ये है बा मुशकर मैं तुम्हें बिठा के ले के
- 21:08आया हूँ, तुम अनजान आदमी हो। तुमने अगर जाना है तो उतर जाओ
- 21:13मुझे पैसे भी मत दो, मैंने उसे मेहनत को शामिल करके कहा एक बार
- 21:20देख सो ले ऐसा लगता है कोई ड्रग है, तुम्हारा ही भाई होगा कोई?
- 21:30तो मेरे कहने से ऊँचा हमने जा के देखा वो है ड्राइवर जो मुझे ले के
- 21:35नहीं आया था, जो कहता था तुम चाहे 500 क्या मैं तुम्हें ले के ही
- 21:46नहीं जाऊंगा? ट्रक उलट गया था ड्राइवर कि जो ये
- 21:57हाथ था। वो ट्रक के नीचे आ गया था, खिड़की
- 22:00के पार टूट गया था और सभी लोग मर गए थे जो उसमें सवारी बैठी चीखो
- 22:10चिल्लात कर रहे थे। कुछ मर गए थे इससे पहले कि मैं
- 22:17कुछ पूछता। तो टेम्पू वाला कहने लगा देखो अब
- 22:25हम इनकी कोई इमदाद नहीं कर सकते। वक्त खड़ा है तुमने रुकना है रुक
- 22:31जाओ, चलना है तो चलो मेरे साथ। मैं उसके साथ चला मजबूरी थी क्या
- 22:41करे? मैं टेम्पो में बैठ गया।
- 22:51अगले दिन पता चला वह ट्रक किसी अक्सीडेंट के कारण उलट गया था।
- 23:01और उसके सभी लोग? मर गए थे अब ज़रा सोचो अगर मेरी
- 23:11अरदास परमात्मा मान लेता उस वक्त मैं अक्सर ये कहता हूँ मैं 810।
- 23:19बार मौत के मुँह में से निकला हूँ।
- 23:23और परमात्मा ने हाथ दे के बजाया है क्योंकि उसने कुछ लीला खिलवानी
- 23:32है अपनी उसने खेलना है और जब बच्चा खेलना चाहता है।
- 23:41या परमात्मा खेलना चाहता है, वह किसी की फिक्र नहीं करा सकता।
- 23:50वह व्यक्ति मुझे घर तक छोड़ के गया।
- 23:58तुम मुझे कहते हो हरदास का गहरा अर्थ रहस्यत्मक असल में अरदास का
- 24:08सही अर्थ जब तुम वहाँ पहुँचोगे उस तल की जिसकी मैं बात करता हूँ अभी
- 24:14तुमसे अनछुवा है अभी तुमने उसे जाना नहीं टच नहीं किया।
- 24:21फिर तुम अपनी आँखों से देखोगे कि करता कौन तुम करते हो या वह वृहद
- 24:33सृजन हार करता है वहाँ से जाकर जो लौटा।
- 24:41वह कबीर हो, वह नानक हो। उसने कहा कि करता वही है, एक
- 24:45कोंकार सतनाम करता, पूरक करता वही है, तुम नहीं हो और जब तुम उसकी
- 24:55बजाय असत्य में जीने लगते हो करता तुम खुद बन जाते हो।
- 25:01अपनी जिंदगी के पतवार अपने हाथों में ले लेते हो तब तुम दुखी होते।
- 25:09रहो। इसलिए मैं।
- 25:14अरदास। का मतलब यह कहता हूँ तुम्हें।
- 25:18कि परमात्मा से कहना कि मैं सयाना हूँ, यद्यपि तेरा बनाया हूँ, ये
- 25:24तुम्हें पता नहीं है। अर्धास करने वाले सिर्फ।
- 25:29मानते हैं प्रेम से वश में हो जाता है, प्रेम से वह पलट देता है
- 25:36घटनाओं को। हम्म वह अपने खेल को कभी नहीं
- 25:44पलटता। मस्त हाथी।
- 25:47की तरह चलता। है।
- 25:51वह शहंसाही आलम, वह बेपरवाह? और वह ही करता, यह तुम्हें वहाँ
- 26:03जाकर पता चलेगा जहाँ जाकर तुम्हारे सभी भ्रम समाप्त हो
- 26:09जाएंगे। बाबा ने जपजी साहब ने कहा कच्च
- 26:14पकाई और थै पाई। नानक गया जा पे जाई अभी तक तो तुम
- 26:21मान रहे हो कच्चे जब तुम अपनी आँखों से देखोगे, उस करता को तो
- 26:28तुम पक जाओगे कच्चे पकाई ओथे पाई नानक गया जा पे जाई।
- 26:36वहाँ जाकर ही पता चलता है कि कौन करता है, उससे पहले तुम मानोगे और
- 26:43तुम्हारा मानना दो कौड़ी का है, तुम्हारा मानना अर्थहीन है, कोई
- 26:49मूल्य नहीं रखता। कहें, सोने की बात यह है नहीं
- 26:57देखा देखी बात यह देखनी पड़ती है, इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ।
- 27:12तो मंदिर जाओ, मस्जिद गुरुद्वारा जाओ, चर्च जाओ, गरजा भर जाओ, अगर
- 27:21तुम्हारे भीतर नास्तिकता छिपी हुई है, जो कि उस वक्त तक छिपी
- 27:26रहेंगी, जब तक तुम उस सृजन हार का दर्शन अपनी नग्न आँखों से निकल
- 27:31लेते। तब तक तुम।
- 27:37मूर्ख ही रहोगे। तुम अरदास करने के योग्य ही नहीं
- 27:42रहोगे। अरदास करने की क्षमता एक ही
- 27:47व्यक्ति के भीतर होती है, जो यह जान लेता है।
- 27:52कि कर्तव्य है, मैं कुछ नहीं कर सकता।
- 27:57फिर उसके अर्थ स्वर से जो आवाज़ गुजरेगी, जो उसके अर्थ स्वर पर
- 28:05उसे आरती कहते हैं, दुःखी हृदय से वह जो उपकार करेगा।
- 28:12वह परमात्मा के दरबार में सीधी पहुँच जाएँगी।
- 28:16यह बातें आपको बिल्कुल उलट दिखाई पड़ेंगी, क्योंकि बुद्धि समझने
- 28:21में असमर्थ है। तुम मुझसे कहोगे बाबा तुमने एक ही
- 28:27प्रवचन में। दो उलट बातें कहने बिलकुल बुद्धि
- 28:32को तो लगेंगी। बुद्धि को एक धागे के दो विपरीत
- 28:38छोर दिखाई पड़ते है, लेकिन वास्तव में एडजस्टमेंट में वह एक धागा।
- 28:44है। दो छोर तो बुद्धि कर लेती है उसकी
- 28:48नॉर्थ साउथ। वरुण दो छोर नहीं अस्तित्व में तो
- 28:55वो एक धागा है एग्ज़िस्टेंशियल तो वह एक धागा है बुद्धि उसको
- 29:01बाइफरकेट कर। लेती है, भेद बना लेती है।
- 29:08इसलिए संत सदा से कहते आए हैं कि हम नहीं जाना, वह करता है, हम
- 29:20नहीं जाना, तुम कुछ नहीं करते, तुम कुछ कर नहीं सकते अगर कुछ कर
- 29:26सकते। तो एक पानी की बूंद बना के दिखा।
- 29:30दो अगर कुछ कर सकते। तो हवा की एक एटम बना के दिखा दो
- 29:40रेत का एक ज़रा बना के दिखा। दो।
- 29:47तुम नहीं बना पाओगे, तुम इतने मजबूर हो तुम इतने लाचार हो,
- 29:58लेकिन अहंकार बहुत बड़े बड़े दावे करता है।
- 30:04और ये है दावे तभी करता है जब वो अपने आपको भूल जाता है कि मैं
- 30:08क्षुद्र हूँ, मैं विराट नहीं विराट होकर ही पता चलता है कि
- 30:16सत्य क्या है? कच्छ पकाई, ओथे पाई नानक गया
- 30:20जागते जाई। वहाँ जाकर ही पता चलता है अभी तुम
- 30:26कच्चे पकोगे वहाँ जाकर जब तुम्हें चारों तरफ से वेरात अपनी आगोश में
- 30:35ले लेगा, इसलिए उससे पहले तुम्हारी सब प्रयास व्रत।
- 30:49तुम्हारी सब साधनाएं व्यर्थ हैं, तुम्हें साधनाएं कोई फल नहीं
- 30:55देंगी। साधनाएं परमात्मा के साथ ठगी है।
- 31:02वो चाहे पांच नाम हो, चाहे राम राम हो, चाहे राधे राधे, वो
- 31:07तुम्हें गुमराह करेगी क्योंकि ये राह ही गलत है तुमने पहुंचना तो
- 31:13है, अपने पास सहारा लेते हो तुम बहकल का?
- 31:21भला अपने पास पहुंचने के लिए कभी व्हीकल की जरूरत पड़ी है?
- 31:27व्हीकल की जरूरत पड़ी है जो चीज़ तुम्हारे से कुछ डिस्टेंस पे है
- 31:35और तुम तुम्हारे से डिस्टेंस पे नहीं हो, तुम तो तुम्हारे पास ही
- 31:40हो। यही अष्टावक्र कहते हैं कि तुम ही
- 31:46हो यही संत कहते हैं तत्व मसीह श्वेत के तो हे श्वेत के तो तुम
- 31:55ही हो और वहाँ गया हुआ। संत ये उदघोष करता है अहम्
- 32:08ब्रह्मस्म मैं ही वहम हूँ वहाँ गया हुआ कोई मंसूर कहता है अनल
- 32:17हक। मैं ही खुद खुदा हूँ वे फिर उनकी
- 32:22कुरान माने या ना माने किताबें मानती हैं या नहीं मानती हैं, इस
- 32:28बात की परवाह संत नहीं मानता। क्योंकि संत जानता है।
- 32:36संत ने अपनी नगन आँखों से। देखा है।
- 32:42वह उस चीज़ को उपेक्षित नहीं कर सकता।
- 32:45इंकार भी नहीं कर सकता। कैसे करेगा?
- 32:50देखने के बाद इंकार होता ही नहीं। जब तक तुम बुद्धि से सोचे हो, उस
- 32:59परमात्मा को तब तक तुम इनकार भी कर सकते हो, ये सारे जो तुम
- 33:04शास्त्रार्थ करते हो। ये बुद्धि की अंधता के कारण होते
- 33:10हैं। दोनों शास्त्रार्थ करने वाले।
- 33:14समते हैं कि हम शास्त्रक्य। हैं लेकिन वह शास्त्रक्य नहीं वो
- 33:20मूर्ख। हैं, हमेशा बहस करेगा।
- 33:24मूर्ख जो जानता है वह तो चुप हो जाएगा, वह हाथ जोड़ लेगा, किसी
- 33:31तरह से पीछा छुड़ाने की चेष्टा करेगा।
- 33:35के प्रभु पीछा छोड़ो जलपान कर लो तुम पांव हाथ लगा लो, तुम जीत गए
- 33:45हो, मैं लोगों के सामने कह देता हूँ लेकिन मुझे।
- 33:53यार मुझको माफ़ करना मैं नशे में हूँ यार मुझको माफ़ करना, मैं नशे
- 34:11में हूँ। तुम मुझे क्षण करो, मैं तुम्हारे
- 34:16जर्ण पकड़ी हूँ, मैं हार गया, तुम जीत गए जलपान कर लो, खाना खा लो
- 34:26और मुझे आशीर्वाद दो तुम जीत गए हो।
- 34:31वो हर तरह से इस आला बलों को दूर करने की चेष्टा करेगा।
- 34:34वह जीतने की चेष्टा नहीं करेगा। मूर्ख व्यक्ति शास्त्रार्थ करेगा
- 34:39इस नीयत से कि मैं जीत जाऊं या हार जाए, लेकिन संत किसी से
- 34:46शास्त्रार्थ करने की चेष्टा ही नहीं करेगा।
- 34:50वह जानता है कि मटकी में समुद्र समा नहीं सकता।
- 34:56गागर की लिमिटेड है और वह लिमिट लेस लिमिटेड में कैसे आएगा?
- 35:07इसलिए चुप रहना ही बेहतर है। इसलिए पापा कहते हैं ज़ोर न जुगती
- 35:16छूटें संसार किसी युवती में कोई ज़ोर नहीं जिसके कारण तुम इस
- 35:26संसार के बंधन से मुक्त। हो जाओ।
- 35:30क्योंकि बंधन में तुम हो ही नहीं बंधन में तुम स्वप्न में हो और
- 35:39स्वप्न तब आता है जब तक तुम सोए होते हो जैसे ही आँख खुली।
- 35:49तो सपना टूट जाता है। इक खाब स देखा था मन इक खाब स
- 36:05देखा। था।
- 36:07हमने जब आँख खोली तो टूट गया मरने की खबर ओह जाने जिगर।
- 36:30मरने की खबर ए जा नी जिगर मिल जाए कभी तो मत रोना, हम छोड़ चले हैं
- 36:45महफिल। संत जानता है।
- 36:53आज नहीं कल ये घड़ा? फूटेगा?
- 36:58संत जानता। है।
- 37:01कि जीस, अब रात को तुम शब्दों में बांधना चाहते हो?
- 37:05यह बिल्कुल ऐसा है जैसे तुम मुट्ठी को हवाओं को मुट्ठी में
- 37:09कैद करो हवाएं कभी मुट्ठी में कैद नहीं
- 37:23यह तुम्हारा प्रयास व्यर्थ। है।
- 37:27जोरना जुगती छूट है संसार। कोई ऐसी युक्ति संसार में है
- 37:35विज्ञान भैरव बसंत के 112 विद्या तो अब बना दो काक पढ़ाया पिंजरा
- 37:44पड़ गया चारों वेद समझाए, समझा नहीं, रिया डेढ़ काटे।
- 37:50तुम अपने आप को अज्ञानी ही पाओगे 112 विधियों करने के बाद भी क्यों
- 37:58क्योंकि वह विधियों से मिलता ही नहीं विधियों तुम्हें दूर ले जाती
- 38:04हैं विधियों तुम्हारे लिए। व्हीकल का काम करती हैं और अवधि
- 38:15से मैं तुम्हें कहता हूँ अवधि से मिलता है।
- 38:19तुम सभी विधियों जब छोड़ दोगे तो तुम अपने पास आ जाओगे जब तुम
- 38:26प्रयास रहित अवस्था में होते हो। तो तुम अपने पास आ जाते हो और उस
- 38:33प्रयास रहितता की अवस्था में तुम परमात्मा में गोता।
- 38:37लगा लेते हो? यह कैसे होगा कैसे नहीं होगा, यह
- 38:46कृपा से होता है। इसलिए बाबा ने सारी जप जीके नौ के
- 38:51नौ शब्द कह के आखिर में क्या कहा? गुरु प्रसाद एक कोंकार सत्य नाम
- 38:57कर्तापुरम आखिर में क्या कहा? गुरु प्रसाद तुम्हारे किए से कुछ
- 39:03नहीं होगा। होगा तो गुरु प्रसाद से होगा।
- 39:11फाउंडेशन शुड बी स्ट्रम फाउंडेशन तुम्हारे पास है नहीं तुम्हारे
- 39:17पास फाउंडेशन है, शास्त्र पढ़ लिया, किसी ग्रुप से सुन लिया।
- 39:25किसी महाराज से सुन लिया, किसी आचार्य से सुन लिया, किसी का
- 39:31प्रवचन सुन लिया? बस यही तुम्हारी कुल जमापूंजी है
- 39:40और नान कहते से तुम्हें मिलेगा नहीं।
- 39:45अरदास करने से नहीं मिलेगा। क्योंकि अरदास तो उसको राह दिखाने
- 39:51का एक साजिश। है।
- 39:58कि तुम जो कर रहे हो वो ठीक नहीं। यू अरे गोइंग टु अलर्ट दी गॉड तुम
- 40:05परमात्मा को अलर्ट करना चाहते हो? चेताना चाहते हो वॉर्न, करना
- 40:10चाहते हो यू अरे नॉट डूइंग दी राइट मैं जानता हूँ कि सही क्या
- 40:17है तुम ठीक नहीं कर रहे हो। अरदास का ये मतलब है।
- 40:23जैसा मैं चाहता हूँ वैसा करो, तुम क्या जानो और तुम्हारा तर्क ठीक
- 40:31है, एक किसान के हन्द का ही परमात्मा है, तुने कभी बाही नहीं
- 40:38की तू खेत नहीं जोता? बीज नहीं बोया जिसने हल नहीं
- 40:46चलाया पानी नहीं लगाया ठंडी रातों में भाई खेती करना क्या जाने
- 40:54किसानी करना क्या जाने तू ऐसा कर? एक अदद छह महीने मुझे दे, मैं
- 41:06तुझे खेती करके दिखाऊंगा, मैं जानता हूँ तू नहीं जानता तुने कौन
- 41:11सा कभी हल चलाया है? तू तो बोझ से बेटर है अपने सच खंड
- 41:18में? परमात्मा कहती चलो यह सीज़न तुझे
- 41:29दिया, तू अपनी मर्ज़ी से कर किसान के पास जाओ।
- 41:37प्रतिभिज्ञा थी, उसने सारी प्रयोग किए, अच्छे से फ्लो किया, अच्छे
- 41:44से बीज डाले, अच्छे से पानी फर्टिलाइज़र स्प्रे रे जो कुछ
- 41:50चाहिए था दिया डीएपी वगैरह और खेत खेत भी लहलहा उठे।
- 42:00फसलों को अपने कद से ऊंचा जाते देख किसान की छाती चौड़ी हो।
- 42:08गई। किसान बोला हाँ अबकी बनाऊंगा
- 42:14बच्चों। ये देख तेरे हिसाब से भी चलता था
- 42:24जब चाहा जब मी बरसा तू तो ओलेगारा देता था, पक्की फसल पर अब के
- 42:33दिखाऊंगा तुझे। पहले बोनी रह जाती थी कणक गोडे
- 42:41गोडे तक आती थी। घुटने घुटने तक आते थे, अब कि
- 42:47दिखाऊंगा। मेरे कद से ऊंची निकल गई और फसल
- 42:52भर के ही बड़ी शानदार थी। लह लहाती हरी फसलें।
- 43:01फिर उसने पानी देना छोड़ दिया। फिर बैसाखी का वक्त आया।
- 43:08गर्मी पड़नी शुरू हुई, फसल पक गई। फसल पक गई तो सुनहरी हो गई।
- 43:18उसने फसल काटी, उसने कहा अब के दिखाऊंगा, पहले तो झाड़ निकलता
- 43:28था, 3035 अब के दिखाऊंगा। और जब उसको काट कर मशीन में डाला
- 43:44तो देखता है सिर्फ अकेली भूसी ही भूसी थी, तोड़ी ही तोड़ी पशुओं के
- 43:50खाने वाली। उसमें फल नहीं था, बलिया लगी थी
- 43:57लेकिन कण के दानी ऊंची बहुत थी। फसलें देखा जाना एक भी नहीं।
- 44:11तो माथे पे हाथ मारा, फिर वही शिकायत तुम शिकायत के अतिरिक्त
- 44:19कुछ कर ही नहीं सकते। तुम्हारी फरियादें भी एक अर्थ में
- 44:24गहरी शिकायतें हैं। फिर माथे पे हाथ मारा।
- 44:29ये तुने क्या किया परमात्मा परमात्मा ने कहा अब की तो मैंने
- 44:33कुछ नहीं किया, अब की तो सब कुछ तुने ही किया।
- 44:39फिर यह गाना क्यों नहीं बना? परमात्मा ने कहा यही तो राज़ की
- 44:45भक्त। दाना बनता है जब फसल कुदरत से
- 44:54लड़ती है, तूफानों की मार झेलती है, औरों की गड़गड़ाहट के बीच में
- 45:03ठंडी हवाओं से जूझती है। घनी बारिश का अतिवृष्टि का
- 45:11अल्पवृष्टि का सामना करती है। इन वक्त के थपेड़ों को लांघती हुई
- 45:22फसल जब गुजर जाती है। तो बीज बनता है फल के रूप।
- 45:28में। अगर नहीं लड़ोगे तो भोग की तरह
- 45:33बढ़ तो जाओगे, लेकिन फल नहीं लगेगा।
- 45:42मैं जानता था। हंसकर क्या होगा?
- 45:48लेकिन तुम्हें तुम्हारी मर्जी करने दिया और बुद्धि सदा ही
- 45:55मनमानी करती है। सत्य को बिना जाने और बुद्धि सदा
- 46:00ही मात खाकर गिर जाती है। जिसने सृजना की जिसने बनाया सब
- 46:08कुछ उसको बुद्धि मूर्ख ठहरा देती है।
- 46:16अभी कल ही मुझे कोई कह रहा था एक आचार्य कहते हैं।
- 46:26यह तुम ही करोगे बल कमाओगे तो मिलेगा अन्यथा कुछ नहीं मिलेगा,
- 46:36तुम्हारे करने से ही कुछ होगा। अगर तुम कुछ करोगे मेहनत तो ही
- 46:47कुछ होगा मुक्ति वुक्ति कुछ नहीं होती।
- 46:58मैंने कहा वैसे तो ठीक है, फिर? क्योंकि मुक्ति तो सबने की बात।
- 47:05है। लेकिन यही शब्द अगर अनुभव से आए
- 47:16तो लिबरेशन बन जाते हैं। तुम्हारे भ्रम टूट जाते हैं
- 47:21वास्तु में। आखिर में तुम पाओगे बंधन कोई था
- 47:24ही नहीं बंधन तुम्हारे मन के जाल थे बंधन तुम्हारे मन के अपनी ही
- 47:36बनाए हुए जैसी मकड़ी अपनी ही अर्धगृद जाला बना लेती है, उसमें
- 47:40फंस जाती है। ऐसे ही बंधन तुम्हारे ही मन के
- 47:44बनाए हुए हैं। स्वयं के बनाए हुए जाल हैं और
- 47:48उसमें फंस गए। और तुम तो ठीक कहते हैं एक अर्थ।
- 48:02की मूर्ति वगैरह नहीं होती, लेकिन अगर उसकी कृपा होगी, तुम्हारे पी
- 48:14से कुछ नहीं होगा। उसकी कृपा होगी तो तुम क्या करते
- 48:23हो? इस पर कुछ भी निर्भर नहीं करता।
- 48:33मैं खरगोश शेर के आया था। जब मेरे से घटना घटी, जिसने
- 48:37जिंदगी का अमूल चोर बदल दिया, पहले मैं करता था।
- 48:46उस दिन के बाद मैं नहीं करता हो गया जिसने बजाए जिंदगी उसकी 13
- 48:57तुझको अर्पण क्या ला के मेरे यहाँ सच्चा समर्पण गठित होता है।
- 49:07खोपड़ीधारी कुछ भी बोले चले जाएंगे और वो ठीक भी है क्योंकि
- 49:15जब उन्होंने देखा ही नहीं, कम से कम जो जानते हैं वो ही बोलते हैं
- 49:21ना? सच्चे तो है न?
- 49:24ईमानदार तो है, न बस इतना ही बहुत है, लेकिन ईमानदार कितने भी हो
- 49:38अगर गैर अनुभवी हैं। तो तुम्हारे पल्ले कुछ नहीं
- 49:42पड़ेगा। शब्दों के अलावा तुम फौके शब्द
- 49:48लेकर क्या करोगे? उस किसान की तरह जीस फसल की कद तो
- 49:54बहुत बढ़ गया। किसान से भी ऊंचा चल गया।
- 50:01लेकिन वो फल न लगा जो रसीला था और फल में ही रस होता है।
- 50:07ध्यान रखना रस होता है, फल में रस भूसी में नहीं होता, तुड़ी में
- 50:17नहीं होता, वह पशुओं का खाद होता है।
- 50:22तुम्हारे लिए जो रस है, इसलिए संतों ने कहा पशु नहीं पहुँच
- 50:28सकता, पशु तो पाश में बंधा होता है, तुम मुक्त होते हो मानस के
- 50:40चोले में आकर। फिर तुम जानते हो क्या हम बंदे ही
- 50:49नहीं है, पशु भी मानता है कि मैं बंधा हुआ हूँ।
- 50:56तुम भी मानते हो कि हम बंधे हुए हैं।
- 51:03लेकिन सं ईदार संत यह देख लेता है कि वंदन मात्र सपना है फिर जब
- 51:14सपना टूट जाता है। पलके उठ जाती हैं तो सत्य दिख
- 51:20जाता है और तुम पाते हो कि जो स्वप्न देखा था वह गर्व था, वह
- 51:28ठीक नहीं था। बस यह बंधन मात्र सपना है, बंधन
- 51:37सत्य नहीं। सत्य तो तुम सदस्य मुक्त हो तुम
- 51:43बंधे कभी हो नहीं बंध सकते भी नहीं तुम दादू दुजा को नहीं दूजी
- 51:50मन की तो बंधन कोई नहीं है बंधन तुम्हारे मन का बनाया हुआ है।
- 51:57दौड़ गीटी शंशाह गया वस्तु ठोर की ठोस जब दौड़ मिट जाती है, रुक
- 52:06जाती है, तुम ठहर जाते हो तो भ्रम मिट जाता है और तुम पाते हो कि
- 52:15तुम बंदे कभी थे ही नहीं। तुम सदा से मुक्त बंधन होता ही
- 52:25नहीं, ये तो ठीक है भाई लेकिन बोलने का तरीका गहर अनुभव से आया
- 52:33है। अगर कोई आचार्य कहता है बंधन
- 52:36नहीं। तुम सदा से मुक्त हो ते उपनिषदों
- 52:41के शब्दों का अर्थ किए हैं, अनुभव से नहीं बोले और ये बड़ा भयंकर
- 52:48फर्क है। उन्हीं शब्दों को अनुभव से कह दो,
- 52:54उन्हीं शब्दों को गैर अनुभव से कह दो।
- 52:57शब्द तो बराबर होंगे लेकिन उनमें रस नहीं होगा और रस के बिना फल भी
- 53:05कोई फल होता है। रस के बिना फल भी कोई रस ले के
- 53:14आता है। जीवन लेके आता है नहीं लेके आता
- 53:20पहली। बात।
- 53:21तो क्या हम जो चाहे करें? नहीं, जब वह करवाता।
- 53:26है तो उसे करने दो। तो व्यक्ति क्या करे?
- 53:38जो होता है उसे होने दीजिए। तुम अपने कर्तव्य कर करते रहो,
- 53:49मुश्किल आती है जब तुम फल अपने हिसाब से मांगते हो, कर्म करने
- 53:54में कोई मुश्किल। मुश्किल जब आएगी जब तुम उन कर्मों
- 54:01का देखा जोखा अपने हिसाब से मांगोगे तुमने कर्म तो किए कि
- 54:06तुम्हें कैंसर आई थी सो जाए कुछ ही पुसले जन्म के किए हों।
- 54:14चाहे इस जन्म के किए हो, चाउ मनचूक खाने वाले कैंसराइट से
- 54:18ग्रस्त। होंगे और चाउ के फिर।
- 54:25चाहे पिछले जन्म के कर्म एक व्यक्ति एक घर से दूसरे घर में आ
- 54:31गया। किरायेदार घर बदलते ही रहते हैं।
- 54:38तो क्या वह जो कर्म करके आया था, दूसरे घर में जाने से उन कर्मों
- 54:43से मुक्त हो गया? नहीं हुआ कर्म उसके साथ जाएंगे,
- 54:51तुम जहाँ भी जाओगे कर्म तुम्हारे साथ जाएंगे।
- 54:58तो दो प्रक्रियाएं चलती हैं, जो कुछ होता है होने दो।
- 55:05इसका अर्थ एक अर्थ में संत यह कहता है कि कुछ तो यह तुम्हारे
- 55:12कर्मों का परिणाम है। अतीत।
- 55:17कुछ तुम्हारे अब के कर्मों का परिणाम है।
- 55:21कुल मिलाजुला के जो रिसाल्ट आया है, अब वह तुम्हारा कर्म बन के
- 55:26आया है तो संत कहता है कि इन कर्मों के फल को स्वीकार कर लो।
- 55:36क्योंकि यह कर्मों के फल परमात्मा के दिए हुए हैं और यह सारी सृष्टि
- 55:41भी परमात्मा की बनाई हुई है। तुम अगर खुशी से न मानोगे तो फिर
- 55:50तुम गैर खुशी से तुम्हें मानना पड़ेगा।
- 55:52मान्यता पड़े इसी कंडीशन पर आकर बाबा कहते हैं के करने वाला तो
- 56:05वही। है।
- 56:10तुम्हारे कर्म बीच में आड़े आते हैं, वह कैसे करता है और तुम कैसे
- 56:15करते हो? क्योंकि वह सर्कमस्टैंस अवेल करता
- 56:21है। ध्यान रखो अगर वह वातावरण में से
- 56:29ऑक्सीजन निकाल ले कम कर दे। तो तुम उसी तरह से काम नहीं कर
- 56:35पाओगे जो पूरी 2100% ऑक्सीजन में कर पाते हो।
- 56:42यह उसकी सर्कमस्टैंशियल व्यवस्था है।
- 56:46ऐसी ही और बहुत सी चीजें जो तुम्हें नहीं भी दिखती।
- 56:53सारी धरती पर गिरने बिखरती हैं और एक दूसरे को प्रभावित करती हैं।
- 57:04प्रत्येक व्यक्ति के शरीर से गिरने निकल रही है।
- 57:08वह एक दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं।
- 57:13इसलिए कोई भी व्यक्ति कभी भी कम्यून में बैठ के नहीं पहुंचेगा।
- 57:20पक्का है क्यों? क्योंकि सबके भीतर से निकलते हुए
- 57:26तिरंगे। एक दूसरे के भीतर प्रविष्ट हो
- 57:30जाएंगे और सब गाल बाल हो जाएंगे तो या तो सभी पहुँचेंगे या कोई भी
- 57:40नहीं पहुंचेगा। सभी पहुँच नहीं सकते इसलिए कोई भी
- 57:44नहीं पहुंचेगा। शब्द थोड़े गहरे हैं, कठिन हैं,
- 57:50भयंकर हैं। इनको बार बार रिवाइंड करते सुन
- 57:58तुम कुछ क्यों नहीं करते हो? क्योंकि तुम कुछ व्यवस्था के अधीन
- 58:02करते हो और अधीन व्यक्ति स्वतंत्र नहीं होता।
- 58:09तुम्हारे आसपास जो त्रंगायित हो रहा है, तुम उन तरंगों में वही तो
- 58:14कर पाओगे जो कर सकते हो उन तरंगों के अधीन होकर और तुम उन तरंगों को
- 58:20देख भी नहीं पाते। इसे ऐसा समझो कोरोना काल में।
- 58:30लोकशैया पर पड़े थे। हॉस्पिटल में यह गर्मी लेकिन
- 58:37कोरोना के सूक्ष्म तंतुओं के कारण तुम श्वास नहीं ले पा रहे थे।
- 58:47सर, ऐसा नहीं कि सर्कमस्टैंस में ऑक्सीजन 21 से गटके में रह गई थी।
- 58:54नहीं तुम्हारी भीतर की व्यवस्था नहीं, काम करना बंद कर दिया या कम
- 59:01कर दिया। अब सारा कुछ है, ऑक्सीजन है,
- 59:15लेकिन ऑक्सीजन तुम्हारे फेफड़े ले नहीं पा रहे।
- 59:18कोरोना के वायरस के कारण कोरोना के वायरस तुम्हें दिखते नहीं।
- 59:32तुम्हें पता था। नहीं कि कोरोना के वायरस हमें
- 59:42बीमार कर गए हैं, इसलिए हम सांस नहीं ले पा रहे थे।
- 59:48ऑक्सीजन की मात्रा घट गई। ऑक्सीजन की मात्रा घटने के कारण
- 1:00:01व्यक्तियों की जान चली गई। तुम बताओ तुम्हें सर्कमस्टैंस में
- 1:00:08बिखरते हुए वो कोरोना के वायरस दिखे।
- 1:00:14नहीं दिखे। यह एक पैनडेमिक था महामारी अब तुम
- 1:00:24उस स्थिति में क्या कर सकते हो ज्यादा से ज्यादा।
- 1:00:34तुमने ऑक्सीजन ग्रहण की लेकिन ऑक्सीजन वाले भी मर गए।
- 1:00:42तुम जीना चाहते थे, याने अरदास करते थे कि मैं जीऊं लेकिन क्या
- 1:00:48तुम्हारी अरदास स्वीकार हुई? नहीं हुई?
- 1:00:52फिर किसने किया, तुमने किया या परमात्मा ने किया?
- 1:00:57तुम तो जीना चाहते थे, तुमने तो नहीं किया, तुम जान बूझ कर तो मरे
- 1:01:02नहीं तो यह किसने किया? यह व्यवस्था नहीं किया परमात्मा
- 1:01:10ने किया। तुम्हें एक उदाहरण से मैंने
- 1:01:14समझाया कि तुम कोई भी काम करते हो, प्रस्तुति वश करते हो, अंडर
- 1:01:22सम सर्कमस्टैंसेस करते हो और वो सर्कमस्टैंसेस तुम्हें स्वतंत्रता
- 1:01:28से काम नहीं करने देता। तो फिर तुम परिपूर्ण स्वतंत्र
- 1:01:34कैसे हुए? यही साइंस भी कहती है कि तुम
- 1:01:42परिपूर्ण स्वतंत्र नहीं, यही एस्ट्रोलॉजिकल व्यवस्था भी कहती
- 1:01:48है। सारे भ्रमण की दूर दराज करोड़ों
- 1:01:56करोड़ों लाइट इयर्स अवे। फ्रम दी अर्थ।
- 1:02:04अपने प्रभाव बिखेरती हैं धरती के ऊपर।
- 1:02:07मनुष्य के तन पर मन पर तुम्हें वो दिखता भी नहीं प्रभाव जो तारे आज
- 1:02:17हैं नहीं, जो कब के खो गए, लेकिन उनकी किरणें धीरे धीरे चलती चलती
- 1:02:24आज तुम्हारे तक पहुंची हैं। वो अपना असत्व दिखाएंगे और तुम्हे
- 1:02:33वो दिखती है नहीं और तुम्हारी बुद्धि में पता नहीं किसने ये
- 1:02:38गसौड़ दिया कि जो दिखता नहीं वो होता नहीं।
- 1:02:44यही तो आचार है। जो मार्क्स कहता है, जो चार वह
- 1:02:53कहता है, जो तुम्हारे तथाकथित ज्ञानी कहते हैं, जो दिखता नहीं,
- 1:02:57वह होता नहीं, यहाँ दिखता क्या है?
- 1:03:03पॉइंट 0001% दिखता है। बाकी सब अंग दिखा यहाँ दिखता तो
- 1:03:11कुछ है ही नहीं इसलिए सब अज्ञात करता।
- 1:03:14है। तो संत की दृष्टि बड़ी गहरी हो
- 1:03:19जाती है। तुम चर्म चक्षियों से देखते हो?
- 1:03:26संत दिव्यदृष्टि से देखता है, संत को वो गहनतम चीज़ दिखती है जो
- 1:03:32तुम्हें दिखाई नहीं पड़ती। कोरोना के वायरस को तुमने नहीं
- 1:03:37देखा? वैज्ञानिक ने देख लिया
- 1:03:40माइक्रोस्कोप में। यह में साइंटिफिक व्यवस्था समझा
- 1:03:45रहा। था।
- 1:03:49तुम माइक्रोस्कोप से देख लेते हो, हर्बल टेलीस्कोप से देख लेते हो,
- 1:03:53जेम्स वेब टेलीस्कोप से देख लेते हो, संत अपने दिव्य शिक्षकों से
- 1:03:59देख लेता है। और संत दिव्य जिक्षो से देखकर
- 1:04:05बोलता है कि तुम कुछ नहीं करते, तुम कुछ नहीं कर सकते।
- 1:04:15सब कुछ होता है और जो होता है। उसे तुम स्वीकार कर लोगे तो सुखी
- 1:04:23जीवन जिओगे नहीं स्वीकार करोगे तो ऐसे ही अरदासें करते करते जिंदगी
- 1:04:30बीत जाएगी किसी की अरदासें कमी लगी नहीं अरदास महज शिकायत।
- 1:04:41तुमने उसका प्रारूप बदल लिया। हरदास का गहरा अर्थ ये है तुमने
- 1:04:46पूछा पुत्र कि तू जो करता है परमात्मा वो ठीक नहीं करता है।
- 1:04:52मैं जानता हूँ कि ठीक क्या है और गलत क्या है?
- 1:04:59तो उस वक्त मैं भी जानता था कि यह जो ट्रक वाला छोड़कर मुझे गया है
- 1:05:05इसने ठीक नहीं दिया, लेकिन सिर्फ आधा घंटा बाद मुझे पता चला कि वह
- 1:05:15ठीक ठाक करने वाला। मैंने गलत सोचा था।
- 1:05:23किसान को छह महीने बाद पता चला कि वह ठीक था, जैसी फसल उगाता था।
- 1:05:30मैंने फसल उगाई तो मातृभूसी ही निकली और इसका पशु खाएंगे।
- 1:05:37लेकिन ये हमारे खाने के तो काम नहीं आएगा।
- 1:05:43ऐसा ही तुम रोज़ कहते। हो?
- 1:05:47तुम्हारे मार्गदर्शक भी कहते हैं सर, इस तरह की घपोड़पंथियाँ चलती
- 1:05:53हैं। तुम्हारे नाम पांच नाम, एक प्रकार
- 1:06:00की अरदास है और अरदास ही सब व्यर्थ हो जाए अर्दास एक शिकायत
- 1:06:11और उसका सीधा सीधा अर्थ यह है। कि तू नहीं जानता कि तू जो कर रहा
- 1:06:16है, वो ठीक नहीं कर रहा है, वो गलत कर रहा है तू मेरा कहा मान
- 1:06:22मेरे हिसाब से चल और वही कर जो मैं चाहता हूँ, तुम हुकुम बनना
- 1:06:28चाहते हो, तुम हुकुम मानना नहीं चाहते, बस यही कहते हैं नानक जो
- 1:06:35हाकुम बनने चलेगा, उसकी रोम रोम दुख से भर जाएगा, जो हुकुम को मान
- 1:06:46लेगा उसका रोम रोम खुशहाल हो जाएगा उसका रोम रोम आनंद से।
- 1:06:52अमृत को पीता हुआ नाचने लगेगा, झूमने लगेगा बस यही है सारी
- 1:06:59व्यवस्था तुमने गहनतम रहस्यत्मक उद्घाटन मांगा।
- 1:07:05मैंने तुम्हें सभी प्रकार से समझा दिया।
- 1:07:12और यहाँ कर्मों का कोई हिसाब परमात्मा मुझे अपने पिछले कर्मों
- 1:07:16का हिसाब दे रहा। था।
- 1:07:20जब मैंने निष्कर्म किया, गाँधी के जन्म में तुम्हारे बंधन काटे और
- 1:07:27परमात्मा ने मुझे बिना बताए मेरे बंधन काट दिए।
- 1:07:31और मुझे पता भी नहीं था कि मैं पिछले जन्म में गाँधी था, यह तो
- 1:07:39मुझे आफ्टर एनलाइटनमेंट जब मैं अपने अन्तश में गया और पिछले
- 1:07:44जन्मों में उतरा तो मुझे पता चला कि पिछले जन्म में मैं गाँधी था।
- 1:07:50तो समझ आया। कि परमात्मा ने मुझे यह फल क्यों
- 1:07:54दिया, इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ दूसरों के बंधन काटने की चेष्टा
- 1:08:00करो, कह नानक गोरु बंधन काटे बंधन चेपने की कोशिश मत करो, जो तुमने
- 1:08:08जाना नहीं। वह फैलाने की चेष्टा मत करो, कह
- 1:08:13नानक गुरबन्धन काटे बिछरता आन मिलायो ठाकुर तुम शरणई आए तो
- 1:08:25पिछले जन्मों का भी फल धीरे धीरे पखता है।
- 1:08:30तुम्हें पता है कुछ फल ऐसे बीज ऐसे हैं जो 2000 साल बाद भी
- 1:08:38फलीभूत होते हैं। अभी मैंने बताया था सातवीं
- 1:08:43शताब्दी में अंशु वर्मा नाम का, जब मैं नेपाल का राजा था।
- 1:08:47तो मैंने एक पाप कर्म किया था, बड़ा भारी।
- 1:08:51उसका फल मुझे इसी जन्म में आकर मिला।
- 1:08:54राजनीतिज्ञ बनकर अब हिसाब लगा लो। राजनीति कितनी अच्छी चीज़ है
- 1:09:04इसलिए मैं राजनीति। करता नहीं, राजनीति पे बोलता हूँ,
- 1:09:09व्यवस्था पे बोलता हूँ राजनीति करना नहीं चाहता, मैं कोई ओहदा
- 1:09:14नहीं लूँगा, अगर मैं कोई ओहदा लूँ तो समझ लेना मैंने जो बोला उसको
- 1:09:20फाड़ देना, आग लगा देना। कि मैंने जो कहा वो गलत कहा,
- 1:09:30मैंने जो कहा वो धोखा था फिर उसका मतलब क्या होगा?
- 1:09:36मैं कोई ओहदा नहीं लूँगा मैं व्यवस्था बताऊँगा आपको और मैं
- 1:09:41व्यवस्थाएँ ही बता। राज़ करने का तो मतलब ही नहीं
- 1:09:46पैदा होता। लंगर में बैठा हुआ व्यक्ति जो
- 1:09:50तृप्त हो जाए और फिर वह और खाने की मांग करे तो वह तृप्त हुआ
- 1:09:58नहीं, ये जानो। जो अमृत रस्ते, प्याले हर घड़ी पर
- 1:10:07पर के पीता है, वह तुमसे अमृत की डमांड का ख्वाब करेगा, वह तुम्हें
- 1:10:14संसारिक सुख तुमसे मांगेगा, जिसने उस अपरा का सुख जान लिया।
- 1:10:22वो अभूतपूर्व है जिसने उसका आनंद का रसुई लिया।
- 1:10:27वो तुमसे सांसारिक सुखों का स्वाद चखने को कहेगा नहीं वह कोई डिमॅंड
- 1:10:36नहीं करेगा। वह ठहर गया है।
- 1:10:41वह तृप्त हो गया है। उसकी सभी ईष्णाएँ मिट गई हैं।
- 1:10:46जी वेशणा भी मिट गई है, इसलिए वह अपनी प्रयोजन हित कुछ नहीं करेगा,
- 1:10:53कुछ नहीं कहेगा, क्योंकि उसके सारे हित सद गए हैं, मंजिल मिल गई
- 1:11:01है। ठहर गया है।
- 1:11:04जो व्यक्ति सेटेशन का मतलब होता है स्टे।
- 1:11:10वह ठहर गया है, वह दौड़ नहीं लगाएगा।
- 1:11:16उसी व्यक्ति को संत कहता है। तो बोलता हूँ अध्यात्म पर भी
- 1:11:23बोलता हूँ ये जानते हुए कि चलना तुम्हें ही पड़ेगा रास्ता मैं
- 1:11:28बताऊँगा मुझे बहुत लोग कहते हैं बाबा 6 साल हो गए सुनते हुए मैंने
- 1:11:37कहा तुम 600 साल तक सुनते रहो। जब तक तुम प्रैक्टिकल रूप से अपने
- 1:11:43भीतर नहीं उतरोगे, तब तक मेरा बोलना बेकार।
- 1:11:47है। तुम छोड़ भी दो मुझे सुनना।
- 1:11:55तुम प्रैक्टिकल करो अपने भीतर जाके जब भी मिलेगा जीसको भी मिला
- 1:12:01है अपने ही भीतर मिला। है।
- 1:12:05गुरु का काम इतना ही है कि तुम्हें मार्ग बता दे, राहत दिखा
- 1:12:10दे इस राह पे चलो बस वही गुरु होता है।
- 1:12:14वर्ण तो उलझाने वाले गुरु होते हैं।
- 1:12:19राम राम जपों के शाम शाम जपों के राधे राधे जपों के पांच नाम जपों
- 1:12:24सब भ्रम हैं उन लोगों के जिन्होंने अभी उस अमृत के रस का
- 1:12:29ब्याला पिया है और वो तुम्हें उलझाते ही रहेंगे।
- 1:12:33वो आके अपने हजूर छोड़ जाएंगे हजूर, फिर बाबा बन जाएंगे बाबा
- 1:12:37फिर हजूर छोड़ जाएंगे, लेकिन यहाँ कोई असिड की नहीं, यहाँ बाबा एक
- 1:12:44ही है, यहाँ हजूर सिर्फ वो ही बनेगा।
- 1:12:51अगर कोई लायक। होगा।
- 1:12:53अगर कोई उस स्थल पर पहुँच गया, जिसका दीया जल गया, वह गद्दी पर
- 1:12:58बैठने के युग है, वो तुम्हें उस रस को पिलाने में समर्थ है, वह बन
- 1:13:04पाएगा अन्यथा नहीं बनेगा। गुरु नानकदेव के दो पुत्र थे
- 1:13:08श्रीचंद, लक्ष्मीचंद। लेकिन अपने पुत्रों को उन्होंने
- 1:13:11गति नहीं दी क्योंकि दे वर नॉट एनलाइटन वर्शन सोचो उन्होंने गुरु
- 1:13:20अंगददेव को अजूर क्यों रहे? क्योंकि अंगददेव का दिया जल गया।
- 1:13:27था। और सच्चा गुरु कभी भी ऐसे व्यक्ति
- 1:13:33को हजूर नहीं बनाएगा, जिसका दिया जला नहीं।
- 1:13:38वह गुमराह करने के लिए नहीं आए। वह तुम्हें पानी के अंदर मीठा घोल
- 1:13:45के नहीं पिलाएगा और कहेगा कि अमृत है छको।
- 1:13:49ये तो सब तुम्हारे बहाने है पानी में चीनी तो हम रोज़ घोल के पीते
- 1:13:55हैं। वह अमृत कैसे हो गया?
- 1:13:57खंडा चलानी से यह तुम्हारी धारणाओं में अमृत होगा।
- 1:14:03सत्य में अमृत नहीं है अमृत तो तुम्हारे भीतर उस तत्व का नाम है
- 1:14:08जहाँ जाने पर तुम वास्तव में अमर हो जाते हो।
- 1:14:12इस गोल को पीने से तुम अमृत थोड़े ही पी लोगे, सबकी दुकानदारियां
- 1:14:18हैं धर्म चाहे कोई भी हो। सब ने अपने अपने प्रखंड ईजाद कर
- 1:14:24लिए हैं। सब ने अपने अपने झंडे ईजाद कर लिए
- 1:14:30हैं। सभी अपने अपने झंडों को लेकर चल
- 1:14:34रहे हैं, कोई मूंछे कटवा लेता है, दाढ़ी रख लेता है।
- 1:14:39कोई लंबे केस रख लेता है, ये झंडे हैं, कोई मुंड मुंडा लेता है, ये
- 1:14:45झंडे हैं तुम्हारे तुम आध्यात्मिक नहीं हो, तुम पार्टीबाज हो, तुम
- 1:14:54राजनीतिज्ञ हो तुम्हें अध्यात्म का भी कोई पता नहीं है।
- 1:15:00बस तुम धार्मिकता का सिर्फ लभाजा होटल लेते हो आध्यात्मिकता तो वह
- 1:15:06रस बनाती है जो वास्तव में अमृत कर देती है तुम्हें जिसे पीकर
- 1:15:12वास्तव में तुम अमृत तत्व को प्राप्त।
- 1:15:14हो जाते हो। और वह तो मिलता है जो तुम आज अपने
- 1:15:22आप को समझ रहे हो उसके मिट जाने के बाद मिलता।
- 1:15:27है। तुम अपने आप को समझे हो शरीर मन।
- 1:15:36विचार भावना जब यह मिटेगा तो जो नया उत्पन्न होगा वह अमृत है अभी
- 1:15:47तुम उसके बारे में कोई खोज खबर नहीं रखे हो और जो खोज खबर रखे है
- 1:15:53गुरु वो रोज़ बोलता है। यद्यपि तुम उसे बुद्धि से नापने
- 1:16:01की कोशिश करते हो, सुनने की कोशिश करते हो, बेकार हो जाता।
- 1:16:05है। बुद्धि से नापने वाली वो चीज़ ही
- 1:16:09नहीं है विराट वो तो पीने की चीज़ है।
- 1:16:17इसलिए पियो और पी कर जूं अरदास। तुम्हारी शिकायत है।
- 1:16:32हरदास तुम्हारे कहने का डंग है परमात्मा को कि तुम गलत कर रहे
- 1:16:36हो, तुम ठीक नहीं कर रहे अपना तरीका बदलो तुम तानाशाह हो जाते
- 1:16:45हो परमात्मा के ऊपर तुम कहते हो तुम मत कर।
- 1:16:52मुझे करने दे और आखिर में तुम्हारा करना तुम्हें दुख दे
- 1:16:57जाता है। फिर तुम आखिर में छाती पीटते हो
- 1:17:02जब वक्त बीत जाता है जब तुम धराशायी हो जाते हो, जब तुम जमीन
- 1:17:08के ऊपर गिर पड़ते हो, कौन दे मुँह?
- 1:17:11और चार भाई उठाकर तुम्हें ये दफन कर देते हैं या दहन कर देते हैं।
- 1:17:19ऐसी ही तुम्हारी जिंदगानी में न जाने कितनी बीती और न जाने कितनी
- 1:17:24बीत जाएंगे। तुम कभी उस स्तर पर नहीं जाओगे।
- 1:17:30तुम इस नकली नकली चीज़ की फिक्र रहेंगी।
- 1:17:34तुम इसको बचाने की पूरी चिष्टा करोगे, कहीं ये खो न जाए और यही
- 1:17:40कोशिश तुम्हें वहाँ तक पहुंचने नहीं देगी।
- 1:17:47तुम कोशिश करना छोड़ दो। ज़ोर न जुगती छूटे संसार तुम्हारे
- 1:17:52किसी भी प्रकार की युवती में कोई ज़ोर नहीं तुम इसको बचाने की
- 1:17:59चेष्टा छोड़ दो तुम उसके वाने में रहो वह जैसे चलाये तुम्हारी
- 1:18:05जिंदगी की नैया को वैसे चलो। उसकी हामी के अंदर हामी रखो, उसकी
- 1:18:11जी हजूरी करो, तुम हजूर की हजूरी न करो, तुम बाबा की हजूरी न करो,
- 1:18:17तुम उस अज्ञात की जी हजूरी करो जिसने सर्व सर्व को बनाया है अपने
- 1:18:25शोभात। से।
- 1:18:32मोया बाज न मिल दा सजन मोया बाज न मिल दा।
- 1:18:46सजन वे उस मालिक दा प्यार मोय बाज न मिल दा सजन वे।
- 1:19:03मरना है, शरीर से नहीं मरना है, ब्रह्मा से मरना है, तोड़ना है,
- 1:19:14स्वप्नों को जागना है, आँखें खोलनी है, आँखें हैं तुम्हारे पास
- 1:19:21मरना है इस शरीर से नहीं, उस भ्रम से कि मैं शरीर हूँ।
- 1:19:27मैं विचार हूँ, मैं भावना हूँ इस गलत मान्यता से मरना है, शरीर को
- 1:19:40बलि का बकरा नहीं बनाना शरीर तो जुदा है।
- 1:19:48और इसको जुदा की तरह जान लेना है। जीस दिन तुम जानोगे शरीर, मन,
- 1:19:56विचार, भावनाएं, कल्पनाएं, वासनएं विषय ये सब मैं नहीं हूँ मेरे से
- 1:20:04दूर हैं। मैं इन से पार हूँ मैं वो तत्व
- 1:20:08हूँ जीसको इनकी आंच जलाती नहीं सेक नहीं पहुंचता जानू, तुम लाख
- 1:20:17फिक्रमन्द हो जाओ, लेकिन जीसको यह फिकर की आग छूती नहीं, मैं वो
- 1:20:24तत्व हूँ। जीस दिन तुम जांच जाओगे, जान
- 1:20:27जाओगे उस दिन तुम सही मायने में संत हो गए उससे पहले भटकन है,
- 1:20:38उससे पहले अरिदास सिंह करोगे, उसके बाद स्वीकार करोगे?
- 1:20:45उससे पहले तुम्हारी शिकायतें तुम्हारी अरदासिया बनकर मुखर
- 1:20:53होंगी, लेकिन उसके बाद तुम अरदास करोगे ना?
- 1:20:58जहाँ जाकर अरदासिया खो जाएं, जहाँ जाकर उसके बाने की स्वीकृति?
- 1:21:05हर हाल में मैं वैसे ही रहूंगा जो दृश्य तो मुझे दिखायेगा, मैं उसे
- 1:21:13देखूंगा और पूर्ण हृदय से स्वीकार करूँगा।
- 1:21:17इसे संत कहते हैं अन्यथा अरदास करना।
- 1:21:23तो तुम्हारे अहंकार से आता है। जब तक अहंकार रहेगा तब तक अर्दास
- 1:21:29आएगी। जीस सन अहंकार विदा हो गया उस सन
- 1:21:33अर्धासी विदा हो जाएगी उस सन आएगी स्वीकृति स्वीकृति हर हाल में हूँ
- 1:21:40राजी। तू अच्छा करे या बुरा करे सब मुझे
- 1:21:45मंजूर है खुदा धन्यवाद।