Latest / Baba ji Vijay Vats / 19 Feb 25 - क्या सिर्फ मानने से ही परमात्मा तक पहुँचा जा सकता है?अध्यात्म की शुरुआत कहाँ से करें? गीता का ज्ञान।
Transcript
- 0:08अर्जुन कहते हैं हे भूतेश हे जगत पिता हे जगदीश हे भूतभावन हे
- 0:24देवदेव। हे पुरुषोत्तम आप अपने आप को अपने
- 0:38आप से ही जान सकते हैं, दूसरा कोई आपको नहीं जान सकता।
- 0:49हे देवादिदेव आप जो कुछ कह रहे हैं, जो कुछ भी कह रहे हैं, मैं
- 0:58उसे सत्य समझ कर मानता हूँ कृपा करके।
- 1:04आप अपनी विभूतियों को सभी प्रकार की विभूतियों को पूर्ण व्याख्याित
- 1:15करके बताने का कष्ट करें। अर्जुन कहते हैं कि मैं आपको नहीं
- 1:29जान सकता। आप खुद ही बताइए।
- 1:37अपनी विशेषताएं को विभूतियों का अर्थ होता है विशेषताएं।
- 1:44स्पेशिलिटी अपनी विशेषताएं को आप स्वयं ही बताइए, प्रकृति कीजिए।
- 2:01एक चित्रकार घर से निकला। उसने एक ऐसी तस्वीर बनानी थी कि
- 2:10इस दुनिया में सबसे ज्यादा सुखी व्यक्ति कौन?
- 2:13दो 3 साल तक उसने प्रयास किया। आखिर में उसे सुखी व्यक्ति मिल के
- 2:31आ। वह जो जिसकी कोई इच्छा नहीं थी,
- 2:42वह जो जिसके भीतर किसी तरह की कोई वासना नहीं थी उसका रोमा रोवा।
- 2:51खुशी से नाच रहा था। चित्रकार ने देखा कि यह उपयुक्त
- 3:01व्यक्ति है, इसका चित्र बना लेना चाहिए।
- 3:07उस चित्रकार ने उसका चित्र बनाया, उसको सामने बैठा के उसका चित्र
- 3:11बनाया। खूब हू उसका चित्र बनाया रोवा
- 3:14रोवा खींच दिया ढाल दिया चित्र में और जब मूर्ति तैयार हुई तो
- 3:31जिसकी मूर्ति थी वो भी देख कर आश्चर्यचकित हुआ।
- 3:36अचंभित हुआ इतनी सुंदर उसका रोवा रोवा महक रहा था।
- 3:44चित्र के वीक में से हालांकि चेतना न थी, लेकिन चित्र भी महक
- 3:51रहा था। चित्रकार बोला आज मेरी तमन्ना
- 3:56पूरी हुई, मैं सबसे सुखी आदमी का चित्र बनाना चाहता था, आज मुझे
- 4:07मिल गया। तुम ही हो इस संसार के सबसे
- 4:14ज्यादा सुखी व्यक्ति। जिसका चित्र था वह अपना ही चित्र
- 4:21देखकर हतप्रभ रह गया। सेल्फ हिप्नोटाइज़ हो गया इतना
- 4:32सुंदर चित्र बा कमाल बनाया। बड़ी प्रशंसा हुई बड़ी प्रतियों
- 4:40भी कि सभी को सुंदर लगा और सभी ने अपने गर्व में लगा लिया।
- 4:56वर्ष बीतते गए वक्त ढलता गया। समय अपनी चाल चलता रहा।
- 5:05वो चित्रकार फिर भी घूम रहा था। किसी ने पूछा तुम्हारी तमन्ना
- 5:14पूरी हुई, अब तुम क्यों भटक रहे हो?
- 5:20चित्रकार बोला अब मुझे सबसे ज्यादा दुखी व्यक्ति की तलाश इस
- 5:29संसार का सर्वश्रेष्ठ सुखी व्यक्ति मैंने खोज लिया और चित्र
- 5:34बना दिया। अब मुझे तलाश है जो सबसे ज्यादा
- 5:39दुखी व्यक्ति है। इसी खोज में 30 वर्ष बीत गए जहाँ
- 5:57जाता सब व्यक्ति अपना दुखड़ा सुनाते।
- 6:03लेकिन ही उसके भीतर का कोई कोना कहता नहीं।
- 6:09ये भी कुछ सुखी है। सबसे ज्यादा दुखी तो ये नहीं है।
- 6:18सबकी करुणगाथनाएँ उसने सुनी। सबकी आत्मकथाएं उसने श्रवण की
- 6:26सबसे पूछा। सभी ने कहा मैं दुखी हूँ लेकिन
- 6:33चित्रकार को तसल्ली नहीं हुई है। चित्रकार बोला जब मेरी आत्मा
- 6:42पूर्ण मान जाएगी कि हाँ यह व्यक्ति सबसे ज्यादा दुःखी तब मैं
- 6:50उसका चित्र बनाऊंगा तो किसी व्यक्ति ने उसे मशविरा दिया के
- 7:00सबसे दुखी व्यक्ति। तो आपको कारागृह में मिलेंगे,
- 7:06क्योंकि उनके पास तो घूमने की आज़ादी तक भी नहीं है, वो तो बाहर
- 7:11भी नहीं निकल सकते। इतनी भी आज़ादी नहीं है और जिसकी
- 7:17आज़ादी खो गई हो, उसके पास शेष कुछ भी हो।
- 7:24वह बेकार हो जाता है। आजादी, सुख चैन सब छीन लेती है।
- 7:33अगर चली जाए और आजादी अगर मिल जाए तो सुख चैन सब आ जाता है।
- 7:45हमारे सनातन में इसी आज़ादी को मुक्ति कहा है मुक्ति संबोधित उन
- 8:01हथकड़ियों का टूट जाना, उन बंधनों का नाश हो जाना।
- 8:07जो हमारे ऊपर लद गए हैं और बड़े मज़े की बात है ये बंधन किसी ने
- 8:18नहीं फेंके ये बंधन हमने खुद ही फेंके हैं अपने ऊपर।
- 8:24हम खुद ही बंधे हैं, अपने कारण बंधे हैं यहाँ अर्जुन वही बात
- 8:31कहता है, हे प्रभु आपकी महिमा हे जगत बते हे विष्णुदेव।
- 8:43हे भूतभावन हे भूते हे जगतपति हे जगतधिपति।
- 8:49आप स्वयं ही अपने स्वरूप को स्वयं से ही समझ सकते हैं।
- 8:56कोई दूसरा नहीं है इसलिए आप ही बताइए।
- 9:04अपनी विभूतियों को कि आप में क्या श्रेष्ठताएं हैं, आप में क्या
- 9:10विशेषताएं हैं? क्या स्पेशिलिटी हैं इस सलोक में?
- 9:16यही कुछ है तुम्हें शायद यह सलोक। हल्का लगे लेकिन कृष्ण का कोई भी
- 9:26शलोक हल्का नहीं है। किसी विशेष कारण से कृष्ण बोलते
- 9:32हैं, अन्य से चुप रह जाते हैं। 30 वर्ष तक वो चित्रकार।
- 9:42घूमा गली गली, कूचा, कूचा घर, घर दरगाहिं मंदिर, मस्जिद सब खंगाल
- 9:54दिए उसने कुष्टाश्रम। सभी बुरी जगह हैं, सभी अच्छी जगह
- 10:02हैं। सब कोई कहीं नहीं मिला तो किसी ने
- 10:07कहा कि आप कारागृह में जाइए। दुखी व्यक्ति तो वहीं मिलेंगे
- 10:11जिसकी आज़ादी छिन गई। वह सबसे ज्यादा दुखी चला गया।
- 10:23एक एक से मिला। एक कारागृह में एक कारागृह से
- 10:30दूसरे, कारागृह में दूसरे से तीसरे, कारागृह में अंत में एक
- 10:35कारागृह में एक व्यक्ति मिला उसे। उसके चेहरे पर जायया थी,
- 10:47झुर्रियां थी, विकराल चेहरा था। चेहरे से जैसे मवाद बह रहा हो
- 10:57कुरूप का। निष्ठुरता उसको देखकर ही घृणा आती
- 11:08थी। बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो कुछ
- 11:17न भी कहें। तो भी बड़े प्यारे लगते हैं, पास
- 11:21से गुजर जाना ही काफी होता है। एक सुगंध ही फैला जाते हैं और
- 11:28बहुत से व्यक्ति ऐसे होते हैं जो कुछ न कहें और पास से गुजर जाए।
- 11:38आपको दूषित कर सकते हैं। भीतर से लासानी तरंगें निकल रही
- 11:45थी। उस व्यक्ति के ये सब तरंगों का
- 11:48काम है। जीसको मैं अक्सर व्याख्यात किया
- 11:52करता हूँ। जो व्यक्ति जितना गहरा अपने भीतर
- 12:00उतरा, उतनी आसानी तिरंगों से भरा होगा, उतना खुशहाल होगा, उतना
- 12:07उसका जीवन सरल होगा, सहज होगा, वह कठिन नहीं होगा, उलझा हुआ नहीं
- 12:15होगा। वह सहज होगा।
- 12:21आप तो आश्चर्य शकित होते हो कि इतना बड़ा आदमी इतना सरल बगीचे को
- 12:32खोद रहा है, फूल लगा रहा है। नन्हे नन्हे पौधों को पानी दे रहा
- 12:38है, हाथ में खुरपी है साधारण कुर्ता पायजामा बाल बिखरे पड़े।
- 12:55वह संसार का सबसे बड़ा अमीर व्यक्ति होगा।
- 12:59आप सोच भी नहीं सकते, वह सरल होगा, उसकी चाल बड़ी कोमल होगी।
- 13:14इसलिए हमने बुद्ध जैसे प्रिय व्यक्ति को नाम दिया।
- 13:17तथागत जैसे आए, वैसे ही चले गए। बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो अपने
- 13:26होने की प्रजेंस की। अनुभूति आपको करवातें हैं।
- 13:34देखो मैं हूँ। फोटो खींचो दुखी व्यक्तियों का
- 13:43लक्षण है। फोटो खिंचवाने का शौकीन व्यक्ति
- 13:51अक्सर दुखी होता है तो मैं भीतर की बात बताता हूँ लेकिन बुद्ध
- 14:00नहीं चाहते। मेरी कोई फोटो खींचे और बुद्ध ये
- 14:04भी नहीं चाहते कोई न खींचे। उनके भीतर कोई काम नहीं ही नहीं
- 14:08है तथ आगत जैसे आए, वैसे ही चले गए।
- 14:17हवा के झोंके की तरह कोई अपनी परिजन से महसूस करा के नहीं गया
- 14:23कि मैं हूँ, देखो मैं हूँ। ऐसा ही होता है।
- 14:29निरहानकारी व्यक्ति जो अपनी मौजूदगी को पता न लगने दे, ज़रा
- 14:37भी न पता लगे पास से गुजर जाए और उसकी भनक भी न पड़े।
- 14:46दुखी व्यक्ति की यह पहचान कि वह अपने होने को बताएगा कि मैं हूँ
- 14:55देखो, मैं हूँ और मैं ये कर रहा हूँ।
- 15:04वह जो छुपाने योग्य है वह छुपाएगा वह जो बताने योग्य है वह बताएगा
- 15:16असह्य जो होगा वह व्यक्ति। लेकिन बुद्ध सहज हैं, बुद्ध सरल
- 15:24रहें। बुद्ध की चाल ढाल उस हंस की तरह
- 15:31है जिसके पग ध्वनि का ज़रा भी पता नहीं चलता।
- 15:40निरहंकारी व्यक्ति की यही पहचान होती है, वो आते हैं और चले जाते
- 15:48हैं। मैं अक्सर ये शब्द गुनगुनाया करता
- 15:52हूँ अंग्रेजी के कभी अलेक्जैंडर पोप।
- 15:57ने सॉलिट्यूड के अंदर लिखा लेट मी लाइव उनसीन अन्नोन लेट मी लाइव
- 16:04उनसीन अन्नोन एंड उनलेमेंटेड लेट मी डाइ स्टील फ्रॉम दी वार्डर नॉट
- 16:12एस्टोन टेल्वियर आई लाइ। मुझे ऐसा जीने दो कि मुझे कुछ
- 16:21जाने ना मैं कौन हूँ? उनसीन, अननोन एंड उनले मेंटल लेट
- 16:28मी डाई और जब मैं मर जाऊं तो कोई शौक ना करे, कोई अफसोस ना करे।
- 16:36यहाँ तो जिन्हें हम गुरु माता ही कहते हैं वो कहते हैं कि मेरे
- 16:41मरने पर कम से कम 2,00,00,000 व्यक्ति हैं तो मज़ा आया।
- 16:44ये मरने का अहंकारी व्यक्ति के लक्षण हैं।
- 16:51जो भीड़ चाहता है वो अहंकार ही है, जो एकांत चाहता है वो
- 16:57नरहंकारी है। जैसे जैसे तुम नरहंकार होगे, वैसे
- 17:03वैसे तुम अपने भीतर उतरोगे जीसको भीड़ अच्छी नहीं लगती।
- 17:10जीसको अकेलापन सोहाता है जीसको अकेलीपन का रस आ गया सली छूट एंड
- 17:18अन्लीमेंटल लेट मी डाइ स्टील फ्रम दी वर्ड नॉट एस डॉन टेल व्हेर आई
- 17:25लाइ इस संसार से मैं चुरा लिया जाऊं।
- 17:31और कोई पत्थर शिला लेख न बताएं कि मैं यहाँ दफन हूँ मैं ऐसे जिऊ यह
- 17:38होता है जीना और मैं ऐसे मरूँ, यह होता है मरना जी व्यक्ति कैसा भी
- 17:46राह हो। लेकिन दूसरा परमात्मा का रूप था।
- 17:52मैंने जाना नहीं, इसे मैंने देखा नहीं।
- 17:57बहुत पहले यह विदा हो गया, लेकिन अपने होने की सुगंध छोड़ क्या अगर
- 18:07ऐसे लोग धरती पर आ जाएं? तो धरती को पता ही न चले और सारी
- 18:15धरती खुशबू से भर जाए। अहंकारी व्यक्तियों के कारण के
- 18:21मैं हूँ ये दुख और दर्द की लासानी तरंगों से भरा पड़ा है वातावरण।
- 18:30बुद्ध और अलेक्जैंडर पोप की तरह अगर व्यक्ति जनम लेने लगे इस धरा
- 18:37पे तो इस धरती को पता ही नहीं चलेगा कि दुख भी होता है।
- 18:47उस चित्रकार ने दुखी व्यक्ति की खोज की आखिर में एक कारागरी में
- 18:52खोज लिया उसने उसके शरीर का रो और वह दुख की गाथाओं का वर्णन कर रहा
- 19:02था। उसके शरीर का रो और वह बता रहा
- 19:06था। मुख मंडल का निराश, उखड़ा उखड़ा
- 19:15टूटा, टूटा विकृत चेहरा, उसके शरीर की मनोदशा।
- 19:26कोढ़ से ग्रस्त भय व्यक्ति को जला रहा था अपने आप को और अपनी गाथा
- 19:33भी कह रहा था। चित्रकार को बड़ा दर्द आया, सच
- 19:39में दर्द आया उसके भीतर आवाज़ उठेगी, यही है सबसे ज्यादा दुखी
- 19:44व्यक्ति। बना लो इसका चित्र उसने कहा आप
- 19:56मेरे सामने बैठोगे हाँ, बैठ जाओ, उनका किसी तरह यद्यपि बैठा नहीं
- 20:03जाता, सारा शरीर कोण ग्रस्त है? जहाँ कहीं बैठता हूँ लेटता हूँ,
- 20:11उठना पड़ता है, सारा शरीर दर्द से ग्रस्त है, मबाद जो रही है
- 20:18दुर्गन्ध फैल रही है। उसके पास बैठना भी मुश्किल था।
- 20:28चित्रकार ने कहा कोई बात नहीं, तुम मेरे सामने थोड़ी देर बैठ
- 20:33जाओ, मैं तुम्हारा चित्र बनाना चाहता हूँ।
- 20:37आज मेरी इच्छापूर्ण हुई, सामने बैठ गया, वो हिलता रहा, टूलता
- 20:44रहा। बैठा न जाए ठीक से करवट ले ले
- 20:50पासा पलट ले थोड़ा उठ के देख ले, बैठ के देख ले बड़े पोस्टर बदले
- 20:58उसने चेहरा मोहरा बनाता रहा है चित्रकार।
- 21:05और आखिर में एक घंटा लग गया। उसने सब बना दिया उसका रोवा रोवा
- 21:11बोल रहा था चित्र अपनी भाषा बोलने लगा।
- 21:17चित्र अपनी भाषा कहने लगा सर्वाधक दुखी व्यक्ति यही है इस संसार का।
- 21:26और जब चित्र गाथनायी कहने लगे, मुँह को होते हुए बोलने लगे वहीं
- 21:32होती है परमार्थ चित्रकारी की। उसने चित्र को पूर्ण किया।
- 21:51संतुष्ट हुआ, गहरी स्वांस भरी पानी का गलास पिया और वहाँ पर
- 22:03प्रहरी से बोला इसका नाम बताना क्या है?
- 22:14उस प्रहरी ने उसका नाम बताया ई थॉमसन जब लिखने लगा उसके कलम रुक
- 22:35गई है ये तो। न कुछ जाना पहचाना लगता है।
- 22:44इथ फंक्शन कुछ ऐसा लगता है जैसे इस व्यक्ति से मेरा परिचय हो।
- 23:01उसके भाव बंगमाओं को देखकर वह दुखी व्यक्ति बोला।
- 23:04हाँ, हाँ, तुम जो सोच रहे हो वो वही है।
- 23:09मैं वही सुखी व्यक्ति हूँ जिसका तुमने चित्र बनाया था।
- 23:12आज से 30 साल पहले संसार का सर्वोत्तम सुखी व्यक्ति हूँ और आज
- 23:20संसार का सर्वोत्तम दुखी व्यक्ति मैं ही हूँ।
- 23:23ए थॉमसन जिंदगी बड़ी जटिल है जितनी सरल समझते हो जिंदगी उतनी
- 23:41सरल है जियो सहजता से जिंदगी है बड़ी जटल।
- 23:53लेकिन तुम इस जटिलता से जियो मत जियो तो सहजता से है ये जटिल, वही
- 24:02व्यक्ति जो परम सुखी होता है संसार का सबसे ज्यादा सुखी
- 24:06व्यक्ति 30 वर्ष में सबसे ज्यादा दुखी व्यक्ति हो जाता है।
- 24:15उल्टा नाम जपेते जाना बालमीक भय ब्रह्म समानु वह जो चोर, वह डाकू,
- 24:24वह हत्यारा, वह लूटेरा एक क्षण में तब्दील होकर ब्रह्म ज्ञानी हो
- 24:30जाता है। पलट जाता है सब कुछ यहाँ चीजें
- 24:35आपस में मिली हुई हैं तुम्हारी अलगाव बुद्धि तुम्हारी भेद बुद्धि
- 24:45उलट पुलट कर जाती है सब चीजों को यहाँ सब एक है।
- 24:51सबसे दुखी व्यक्ति और सबसे सुखी व्यक्ति यही कृष्ण कहते हैं कि
- 24:55मैं ही हूँ पाप भी, मैं हूँ पुण्य भी मैं हूँ दुखी से दुखी भी मैं
- 25:06हूँ सुखी से सुखी भी मैं हूँ। दुर्गंध भी में सुगंध भी में इतर
- 25:19की सुगंधी और मलमूत्र की दुर्गंधी दोनों ही मैं हूँ।
- 25:29लेकिन इन सबके बीच में एक संदेश दे जाते हैं जीने का कृष्ण कृष्ण
- 25:35कहते हूँ तो मैं ही, लेकिन तुम अपनी भेद बुद्धि से निर्णय करने
- 25:45की चेष्टा मत करना। अपनी भेद बुद्धि को इस्तेमाल न
- 25:53करना तुम सहज बने रहना तुम साक्षी बने रहना तुम्हें नहीं पता यहाँ
- 26:01चीजें कब बदल जाती हैं। विपरीत में साधु कब असाधु हो जाता
- 26:07है। दानी कब डाका मारने लगता है?
- 26:12तुम्हें पता भी नहीं चलता लुटेरा कब ब्रह्मग्यानी हो जाता है, कब
- 26:23हत्यारा अंगुली माल ब्राह्मण हो जाता है, तुम्हें पता नहीं चलता।
- 26:30यहाँ सब संसार अनंत एग्ज़िस्टन्स आपस में गुत्थी हुई है यहाँ अलगाव
- 26:40है ही नहीं, अलगाव दिखता है तुम्हारी बुद्धि को।
- 26:48अल्काभ है नहीं, यहाँ एक दूसरे से गुथा हुआ है सब कुछ ये अनंत
- 26:54ब्रहमंड अगर गुथा न होता तो कब का विकीर्ण हो गया होता?
- 27:01यह गुथा हुआ है, तभी ठहरा हुआ है यह शिक्षण।
- 27:08इसने गूंथना छोड़ दिया, उस अक्ष्ण ये विकीर्ण हो जायेगा, जखण्ड
- 27:16अखण्ड हो जायेगा और फैल जायेगा, वे नष्ट हो जायेगा।
- 27:21ईश्वर की संरचना बड़ी विचित्र है। यहाँ कब विपरीत में कन्वर्ट हो
- 27:28जाए कोई पता नहीं चलता इसलिए मान मत करना कि मैं सबसे सुखी हूँ।
- 27:35कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदली मिजाज़, वक्त का मिजाज़ यहाँ देर
- 27:44नहीं लगती बदलते। और सब वो उलट पलट हो जाता है।
- 27:50वह जो राज़ कर रहा था, वह भीख मांगने लगता है।
- 27:54वह जो लोगों के ऊपर तानाशाह बनके बैठा था, आज जेल की दीवारों में
- 28:00बंद हो जाता है। यहाँ कुछ नहीं पता होता।
- 28:05जो लोगों को मारता है आज वह कल अपनी ही गोली से बस में भूत हो
- 28:10जाता है। ऐसा ही हुआ हिटलर के साथ।
- 28:20वो सोलनी उसका गुरु था। और मसोलनी भी यही कुछ करता था।
- 28:26हिटलर से थोड़ा ज्यादा करता था। वो आदमी को मारता बड़ा दर्द देता
- 28:33फिर मारता कई व्यक्तियों को दूसरों को दर्द देने में आनंद आता
- 28:39है। कई व्यक्तियों को दूसरों को सुख
- 28:42देने में आनंद आता है बस इतना सा फर्क होता है कोई व्यक्ति सब होते
- 28:51हुए भी नम्रता से चलता है, झुक के चलता है, कोई व्यक्ति कुछ भी ना
- 28:56होते हुए अकड़ के चलता है। ये बिडम्बना है, इस जगत की बड़ी
- 29:03से बड़ी बिडम्बना है। गौर से देखें कृष्ण कहते हैं
- 29:12तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं और तुम माने बैठे हो कि मेरा सब है।
- 29:20और मृत्यु तुम्हारा भ्रम 1 दिन तोड़ देती है गुमान मत करना कि
- 29:34मैं सबसे दानी व्यक्ति हूँ और दुखी भी मत होना कि मैं चोर हूँ।
- 29:45मैं डाकू हूँ, मैं लूटी रहूं, पता नहीं वक़्त का मिजाज़ कब बदल
- 29:51जाएगा। तुम उसकी सर्जना में क्षण भर के
- 29:59लिए आए हो उसका क्षण? और तुम्हारे सोशल बराबर बीत जाते
- 30:06हैं तो हमें पता भी नहीं चलता टाइम का मेज़रमेंट यहाँ कुछ और
- 30:14उसके घर कुछ और। इसलिए जो व्यक्ति अपने भीतर उतरे
- 30:19उन्होंने समय शून्य तपाई समय है नहीं हम।
- 30:27न वहाँ समय था, न वहाँ देह का अभ्यास था।
- 30:32देह अध्यास खत्म और समय भी खत्म और जहाँ ये दोनों चीजें नहीं
- 30:38होतीं, वहाँ जो होता है। उसको आनंद कहते हैं, सुख नहीं सुख
- 30:45का विपरीत दुख है जहाँ देह अभ्यास नहीं और जहाँ समय का भान नहीं
- 30:59वहाँ आनंद होता है। उस आनंद की तुम्हें तलाश है,
- 31:04जन्मो जन्मो से, बस वो आनंद नहीं मिलता, तुम भटके भटके मारे मारे
- 31:12फिरते हो, तुम्हें वो आनंद कोई दिखा नहीं सकता, एक झलक मिल जाए
- 31:17उस आनंद की, उसे ही सतोरी कहते हैं।
- 31:23सस्तुरी की एक घटना मिल जाए। बाबा नानक को मिली मोदी खाने में
- 31:28तौल रहे हैं। 13 ब्याह के उलझ गए 12 तक सब ठीक
- 31:33चला, लेकिन जब तेरा आया तो अचानक ख्याल आया, वह उतर गया।
- 31:4013131313 मेरा कुछ नहीं तेरा ही तेरा और 1313 में सारा मोदी गाना
- 31:48खत्म सतोरे की आज पहली झलक मिले हैं।
- 31:59सब लूट गया वहाँ से हटा दिया गया। नौकरी छीन ली गई और बाबा नानक
- 32:10अपने ही मौज में घूमते रहे। साढ़े 17 साल के बाद।
- 32:18प्रबुद्ध हुए अनलाइटन हुए वह दिख किया जिसकी तलाश थी, वह मिल गया,
- 32:25उसका दर्शन हो गया। सब भ्रम खत्म हो गए।
- 32:30सब संशय दूर हो गए। इसलिए नानक कहते हैं।
- 32:37तुम्हारा संशय मानने से दूर नहीं होगा तुम्हारा संशय दर्शन से दूर
- 32:43होगा। मानने से शुरुआत तो हो जाती है
- 32:50आगाज़ तो अच्छा है अंजान। अंजाम जानने से होता है मानना
- 33:01आगाज़ के लिए अच्छा शुरुआत के लिए अच्छा अंजाम के लिए अच्छा नहीं
- 33:08अंजाम के लिए दर्शन कृष्ण कहते हैं।
- 33:15घोड़ों में मुझे समुद्र से निकले हुए उचाई सर्वा घोड़ा जाम,
- 33:24हाथियों में ऐरावत जाम, वृक्षों में पीपल जाम।
- 33:35क्या कहना चाहते हैं कृष्ण? ऐसा क्यों कहते हैं?
- 33:48कृष्ण कहते हैं, अगर तुम अपने आप को शूद्र समझते हो।
- 33:55तो इस गलतफहमी में मत रहो, इस मेंटालिटी में मत रहो क्योंकि
- 34:04तुम्हारे भीतर मेरा विभूति का अंश भी है।
- 34:10उसको तुम भूल गए। तुमने चमड़ा देखा, जो निकृष्ट है
- 34:19तुमने भावनाएँ देखी, जो थोड़ी सी उत्कृष्ट है, लेकिन तुमने वो
- 34:28चेतना नहीं देखी जो सर्व उत्कृष्ट है।
- 34:35कृष्ण का कुल मतलब इन चीजों में से कुछ अर्थ नहीं निकलेगा।
- 34:42जहाँ जहाँ विभूतियों का जिक्र कर रहे हैं कृष्ण, वहाँ वहाँ तुम्हें
- 34:50समझ कुछ नहीं आएगा। इशारों से कभी कुछ समझ नहीं आया
- 34:55खत्म, लेकिन इशारे बहुत कुछ समझा जाते हैं।
- 35:02अगर इशारों की स्ट्रेट लाइन में देखा जाए तो इन्द्रियों में
- 35:07श्रेष्ठ तू मुझे मान जान। और प्राणियों में श्रेष्ठ मुझे
- 35:12चेत न जान ये कृष्ण कहना चाहते हैं तुम्हें अपने को चमड़े की तरह
- 35:23मत जान अपने को शरीर के चमड़े की तरह मत जान।
- 35:31इस चमड़े के भीतर भी एक चेतना है तो मुझे उसकी तरह जानना है, कृष्ण
- 35:39की प्रबलंग कक्षा है कि तुम निकृष्ट में ना ठहरों वो हमारे
- 35:45तथा कथित पंडितों, पुरोहितों ने पूरा ज़ोर लगा लिया।
- 35:50कि वे तुम्हें विश्वास दिला दे, किस तरह के तुम नीच हो, तुम शूद्र
- 35:54हो, तुम स्त्री हो, इसलिए त्याज हो ढोल, गवार सूत्र, पशु नारी,
- 36:02शक्ल ताड़ना के अधिकारी। मूर्ख के शब्दों से मूर्खता का
- 36:15पता चल जाता है। तुम कितने भी मेकअप कर लो लेकिन
- 36:24तुम्हारे कृत्यों से तुम्हारे मेकअप का पता चल जाएगा कि चेहरा
- 36:28सही नहीं है। मैं अक्सर किसी पार्टी में कभी
- 36:36जाया करता हूँ तो गर्मी का वक्त मैं वहाँ देखता हूँ हमें तो पसीना
- 36:43आ गया। हम तो पूरा तौलिया ले के पूछ
- 36:45लेंगे, तौलिया उठाएंगे चल। हो गया साहब मैंने देखा बड़े घरों
- 36:55की लड़कियां स्त्रियाँ रुमाल होता है उनके पास रुमाल से ये क्या कर
- 37:04रहे हैं? पूछ क्यूँ नहीं लेती?
- 37:09मुझे समझ नहीं आया 1 दिन मैंने साथ वाले व्यक्ति से पूछा ये जो
- 37:16स्त्रियाँ बैठी हैं ये पसीनों को ऐसे कैसे साफ करते हैं?
- 37:23तो हंसने लगा कहता है ये बाहर जाके बताऊँगा यहाँ।
- 37:29भीड़ सुन लेगी बाहर आके मुझे कहने लगा कि यह लीपापोती है अगर शरमाल
- 37:40को इन्होंने थोड़ा सा फेर दिया ज़ोर से तो भीतर का वो लीपापोती
- 37:46खुल जाएगा। और पता चल जाएगा कि इसके भीतर की
- 37:53रंगत कैसी है। अभी तो अच्छी लगती है क्योंकि ढंग
- 37:59से लगाया सब कुछ अभी तो इतनी लेयर चिपकाई इन्होंने।
- 38:05देखने में सुंदर लगे यह दिखावा तुम्हें मार डालेगा।
- 38:11ऑथेंटिक भरने की चेष्टा करो। अध्यात्म यही कहता है पर अगर नकली
- 38:17नकली बने रहे तो नकली तो तुम हो गई, तुम शरीर हो ये नकली है।
- 38:25तुम मन हो ये नकली है। कृष्ण कहते हैं तुम ऑथेंटिक बनो
- 38:31और ऑथेंटिक क्या है? विभूति मेरा सर्वश्रेष्ठ रूप
- 38:35ऑथेंटिक है। इन्द्रियों में मैं मन हूँ।
- 38:42और प्राणियों में मैं चेतना हूँ, जीवों में मैं चेतना हूँ।
- 38:50कृष्ण का इशारा बड़ा अद्भुत है, वो सफीर पर बैठे लोगों को,
- 38:57प्रत्येक सफीर के। प्रत्येक बिंदु से समझा देते हैं
- 39:02कि तुम केंद्र की तरफ जा सकते हो। प्रत्येक बिंदु से तुम केंद्र की
- 39:08तरफ यात्रा कर सकते हो, जहाँ कोई ऐसा नहीं है जो केंद्र की तरफ
- 39:13यात्रा न कर सके, जो परमात्मा तक न पहुँच सके।
- 39:19यहाँ कोई सुदृढ़ नहीं है। कृष्ण कहते हैं, लेकिन सनातनी
- 39:23तुम्हारे तथा कथा टोपी वाले यह कहेंगे शूद्र है।
- 39:33मन्नू स्मृति को लागू करो यह जलानी योग्य पुस्तक है।
- 39:40और ये कहते हैं इसकी पूजा करो। संविधान की जगह हम मन्नू स्मृति
- 39:46को ले के आयेंगे, आज़ादी से तुम्हें हथकड़िया पहनाएंगे।
- 39:58बस यही कृष्ण कहते हैं ये मत होने देंगे नेकृष्ट को मत अपनाना
- 40:06उत्कृष्ट की तरफ हर तरफ चलते रहना तो हमारा हर कदम चर्रे व्यति
- 40:12चर्रे व्यति आगे बढ़ने के लिए होगा।
- 40:14आगे बढ़ने के लिए उच्च उच्च तुम प्रतिपल चलते जाओ और उस छोर पर
- 40:22पहुँच जाओ। कृष्ण कहते हैं कि ऊंची रोगियों
- 40:29के लिए मैं सुमेरु हूँ बड़ा प्यारा शब्द है।
- 40:37स्थिर रहने के लिए मैं हिमालय हूँ और अपनी ऊंची रोगियों के लिए मैं
- 40:44सुमिर हूँ। आपने देखा माला के ऊपर 100 नौवां
- 40:47मन का सुमिर होता है। और सुमेरु के ऊपर जब हम पहुँच
- 40:56जाते हैं तो ये विधान है कि उस माला को पलटना पड़ता है।
- 41:05फिर उस माला को पलट के उल्टी माला से जाप करना होता है।
- 41:11बस सुमेरु अंतिम है। कृष्ण कहते हैं, उस सुमेरु तक
- 41:18जाना है। जीस दिन तुम सुमेरु तक पहुँच गए।
- 41:22सुमेरु क्या है? अपनी चेतना को सच खंड में ले जाना
- 41:30अपनी चेतना को उस अमृत खंड में ले जाना है।
- 41:35अपनी चेतना को सहसरार में प्रतिस्थापित कर देना ब्रह्म
- 41:39रंत्र में प्रतिस्थापित कर देना उच्च से उच्च स्मेरूप तुम निम्न
- 41:46उलझे हुए हो कोई मूलाधार, कोई मणिपुर।
- 41:55स्वादिष्ट स्थान अनाहत् विशुथि ये सब नीचे के केंद्र हैं कृष्ण कहती
- 42:08हूँ, तुम मेरु की तरह ऊंचे हो। माला के उच्च मणके की तरह हो जाओ,
- 42:16ऊंची रोगियों में मैं सुमेरु हूँ, कृष्ण के इन विभूतियों का दर्शन
- 42:25जब करोगे पढ़ते पढ़ते तुम्हें कोई चीज़ समझ नहीं आएगी।
- 42:30ये कृष्ण क्या कहते हैं? ये तो पार्शलिटी का है, बिलकुल
- 42:34लगेगा तुम्हें मेरे पास ये लोग कह देते हैं भगवान की ये कृष्ण की ये
- 42:39गीता पार्शलिटी सिखाती है। अपने इन शब्दों में 10 में अध्याय
- 42:46में पार्शलिटी सिखाती है। मैं पीपल हूँ तो बबूल कहाँ जाएगा?
- 42:55बबूल को कंडम ने क्यों किया नहीं, कंडम नहीं किया।
- 43:02कृष्ण कहते हैं कि नीचे से नीचा भी मैं हूँ, मलमूत्र भी मैं हूँ
- 43:06अमृत भी मैं हूँ, विश्व भी मैं हूँ।
- 43:10और इन दोनों के मध्य में भी मैं हूँ लेकिन तू ये प्रेरणा उस वक्त
- 43:17ये उस वक्त की बात है जब अर्जुन लड़खड़ा रहा है, कांप रहा है और
- 43:23वो कहता भगवान कायरता के वश में हुआ मैं।
- 43:29अवकायरता न्यूनतम तुम्हारे मन की न्यूनतम दशा कायरता है, जहाँ
- 43:38तुम्हारा रोआ रोआ कपता है, वह न्यूनतम दशा है तुम्हारी तुम
- 43:44मृत्यु के भय से कपते हो, जो है नहीं।
- 43:47कृष्ण की दृष्टि में मृत्यु है नहीं।
- 43:52कृष्ण की दृष्टि में मृत्यु उसकी है जो है ही नहीं।
- 43:59ये पंचतत्वों का एक समूह इकट्ठा किया गया।
- 44:02बिखर जाता है, स्कैटर हो जाता है इसे तुम मृत्यु कहते हो।
- 44:07लेकिन कृष्ण कहते हैं वह जो सदा से है, सनातन है, सदा रहेगा, सदा
- 44:14था, अब भी है तुम वो हो, तुम उसमें आसीन हो जाओ।
- 44:22सृति प्रक तुम निमंत्रण की ओर मत जाओ, तुम खाई की ओर मत जाओ।
- 44:29तुम सुमेरु की उच्च रोगियों को छू लो।
- 44:36ये पार्शियल्टी नहीं है। कृष्ण दोनों में अपने को बताते
- 44:41हैं। कृष्ण कहते हैं, दोनों में हूँ
- 44:44दोनों तो मैं हूँ ही। शुरू में ही कहते हैं आदि मध्य
- 44:49अंत ये तीनों में ही मैं हूँ लेकिन मैं विभूतियों का जिक्र
- 44:54करूँगा। मैं अपनी विशेषताएं का जिक्र
- 44:57करूँगा निम्रता भी क्या जिक्र करना निम्रता के भीतर तो तुम खुद
- 45:01ही हो तुम्हारी शक्ति। स्वभावते ही नीचे की तरफ बहती है
- 45:07उसकी तो मैं बात ही क्या करूँ स्वभावता ही तुम्हारी शक्ति नीमम
- 45:16तलों पे बहती है निम चक्रों पे बहती है।
- 45:20कौन है जिसकी शक्ति बोलाधार से ऊपर बहती है?
- 45:25ज्यादा से ज्यादा सर्दी स्थान तक होगी।
- 45:28इससे ऊपर कौन जाता है? कृष्ण कहते हैं, उनकी तो बात ही न
- 45:35करो उनके तो तुम अब व्यस्त हो, वो तो तुमने बहुत ही जी लिया और
- 45:41जन्मो जन्मो से, तुम उसी को जीते आये हो।
- 45:45और उसकी तो बात छोड़ो, उसके तो संस्कार तुम्हारे भीतर बहुत गहरे
- 45:48हैं। पहले से ही अब मैं बात वो करूँ
- 45:52जीसको तुम जानते नहीं कि कुछ उच्चस्त भी हैं तो इन विभूतियों
- 46:00से तुम्हें समझाने की चेष्टा करते हैं।
- 46:04के उच्च में आसीन होने की कोशिश करो।
- 46:09सारी साधना उच्च में आसीन होने की साधनाएं हैं इसलिए सारी विभूतियों
- 46:19का जिक्र करते हैं। थपेड़ों में पीपाल।
- 46:24हाथियों में अहरावत घोड़ों में उच्च श्रव प्राणियों में, चेतना
- 46:34इंद्रियों में मन सब में। बस इशारा है अगर तुम समझने लगे तो
- 46:50समझ न पाओगे। कृष्ण की ये बात खास तौर से कृष्ण
- 46:54की ये अध्याय समझना बड़ा कठिन है। बिल्कुल साफ लगेगा कृष्ण।
- 47:03भेदवादी हैं नहीं, कृष्ण भेदवादी नहीं, कृष्ण कहते नीचे हूँ तो मैं
- 47:12भी, लेकिन कुछ भी मैं हूँ तो मेरा नीचे स्वर मत देखो, ऐसे संस्कार
- 47:19तो तुम्हारे पहले से ही हैं। और नीचे क्या बनोगे और क्या जाओगे
- 47:27तुम मेरी उच्च भूतियों को देखो और वहाँ तक पहुंचने का प्रयास करो,
- 47:32मैं चेतना भी हूँ, मैं जड़ भी हूँ, मैं भटकने वाला मन भी हूँ।
- 47:41लेकिन तुम चेतना में उतरो, चेतना की उच्च दिशाओं को तुम छोड़ो, यही
- 47:50कहना चाहते हैं कुछ जीतने भी कंपैरिजन किये एक एक को खंगाल
- 47:59लेना। कहीं भी निमन्तरण का वर्णन नहीं
- 48:01आएगा। कृष्ण तो मैं निमन्तरण बात कहते
- 48:05हैं। उस क्षण में जब पहले से ही अर्जुन
- 48:09गड़बड़ाया हुआ है, निमन्तम बात कहना पाप है, बड़े जबरदस्त
- 48:17मनोवैज्ञानिक है सायकलॉजी। निमंत्रण की बात करना इसके कम्पते
- 48:26हुए मन को और कम्पायेगा ये पहले से ही कह रहा है कार्य वन्य दोषों
- 48:32पर स्वभाव प्रिछामिताम धर्म समूह जेता।
- 48:38यक्षरयाश्य अनिश्चित रोहित तन में शिष्यस्त अहम् शादी माम तुमसे कुछ
- 48:45सीखना चाहता हूँ मुझे मार्गदर्शन कीजिए, मुझे सिखाइए कि मुझे क्या
- 48:55करना चाहिए इस क्रिटिकल? जंक्चर से यह पूछ रहे हैं खंपते
- 49:04हुए अर्जुन को और नहीं खंपाना है खंपते हुए अर्जुन को उच्च दिशाओं
- 49:11में ले जाना है। शब्दों से लेकिन फिर भी जब अर्जुन
- 49:23नहीं समझेंगे, मैंने सुन लिया प्रभु और मैंने सत्य करके मान
- 49:30लिया मैं आपकी प्रत्येक बात को सत्य करके मानता हूँ अब यहाँ।
- 49:36मानना शब्द बड़ा प्यारा है अर्जुन कहते हैं, मैं आपके प्रत्येक वचन
- 49:44को मानता हूँ सत्य कह कर सत्य समझ कर अब ये मानने का भी क्या है?
- 49:51क्यों कहते हैं अर्जुन अर्जुन गलत शब्द नहीं बोलते, फालतू शब्द नहीं
- 49:55बोलते। एक भी शब्द फालतू नहीं बोलते।
- 50:03मैं आपके प्रत्येक वचन को सत्य समझ कर मानता हूँ और मुझे आपके
- 50:12वचनों को सुनकर बड़ी शांति मिल रही है।
- 50:15मैं बड़ा प्रसन्न हो रहा हूँ, आप कृपा करके बोलते ही चले जाइए,
- 50:22मुझे अच्छे लगते हैं। कांपते हुए व्यक्ति को इस प्रकार
- 50:31से बोलता हुआ व्यक्ति बड़ा अच्छा लगता है।
- 50:34जो उसकी भावनाओं को ऊपर ले के जाये, कंपन को रोक दे, ठहरा दे,
- 50:39उसे कफते हुए मन को अर्जुन क्यों कहते हैं?
- 50:52हे प्रभु आपके वचन बड़े मीठे हैं। मैं आपके वचनों को सत्य मानकर
- 51:02ग्रहण करता हूँ, यह मान ना शब्द बड़ा प्यारा है।
- 51:08इस माननीय शब्द के ऊपर बहुत बहस बाजी होती है।
- 51:12अर्थ किसी को पता नहीं। पोषों की तुलना किशोरियों से होती
- 51:19है किसी की तुलना किसी से होती है तुलनात्मक अध्ययन स्वयं अध्ययन
- 51:26कुछ नहीं, खुद कुछ नहीं जाना सिर्फ कबीर कह सकते हैं।
- 51:34मैं कहता आंखन देखी तुम कहते कागज़ की लिखी मान न और जान न इन
- 51:45दोनों में सदा से कन्फ़्यूज़न रहा है और हैरानी की बातें ये
- 51:50कन्फ़्यूज़न आपका दौर न होगा अब आइए।
- 51:53इस बात को समझ लें ये मुख्य बात है।
- 51:59अर्जुन कहते हैं, मैं प्रभु आपकी बातें बड़ी मीठी हैं, मैं आपकी
- 52:04प्रत्येक बात को सत्य मानकर ग्रहण करता हूँ कि ये सत्य हैं।
- 52:14जीस भी व्यक्ति ने उच्चतम शिखर छूने होते हैं उन्हें सत्य को
- 52:20मानना पड़ेगा। पहला मानना पड़ेगा ए अनार होता
- 52:26है, होता भी है लेकिन ये भी मत भूल जाना।
- 52:32ए अनार होता है ए सिर्फ अनार का होता है।
- 52:36इस कायदों को भी मत चिपकाना छाती से ए सिर्फ अनार का नहीं होता, ए
- 52:43और भी सभी का होता है जो ऐसे शुरू होता है।
- 52:49अब यश का भी है उतना ही है जितना अनार का है तो अर्जुन कहते हैं,
- 53:00मानने से ही शुरू होगा। अगर मानोगे नहीं तो ठहर जाओगे।
- 53:10गति के लिए मानना आवश्यक है। रोज़ बहस होती है, मान लो के मोर
- 53:18नहीं मोर के आंसू पी के गर्भवती होती है, मान लो ये गलत बात को मत
- 53:25मानो हम यही चीज़ कहते है तुमसे ठीक को मान लो।
- 53:31मैं तो अक्सर ही कहा करता हूँ कि किशोरी से कोई शादी न करेगा।
- 53:37जो बचिए की दलाश में हो जिसे बच्चा चाहिए कि बछिया चाहिए।
- 53:42मुझे वह इससे शादी मत करना बछिए वगैरह की कामना यह आपकी पूरी नहीं
- 53:49करेगी। क्यों?
- 53:50क्योंकि ये आपके आंसू पिए ऐसा मत कर और आंसुओं से कभी बच्चा पैदा
- 53:58हुआ, फिर तो बछिया खिला दिया, आपने फिर बछिया दौड़ेगा नहीं, ना
- 54:06ही आपको मुँह हो पाएगा। ना ही आपकी इच्छाएं पूरी होंगी।
- 54:12अगर बछिया चाहिए तो इससे तो शादी मत करना कम से कम।
- 54:22अब सुनिए अर्जुन क्यूँ कहते हैं मैं मान कर अर्जुन का प्रत्येक
- 54:26शब्द बड़ा कसौटी पर कसा हुआ है। अर्जुन जैसा शी से न होता तो
- 54:36कृष्ण जैसी प्रतिभा आपके पास न होती।
- 54:40यह अर्जुन ही था जिसने कृष्ण की प्रतिभा को बाहर खेच लाया।
- 54:48इसलिए कई बार ऐसे प्रश्न मेरे पास आ जाते हैं जो मुझे भी ख्याल नहीं
- 54:52होता कि ये प्रश्न कर देंगे, लेकिन बड़ा आनंदित होता है
- 54:59क्योंकि वो प्रश्न भीतर तक जाकर उस सत्य को खेच लेता है, प्रश्न
- 55:05ही खेच लेता है, मुझे कुछ नहीं करना होता है।
- 55:11अगर मानोगे नहीं, अब एक बात को समझ लो हम आगे चलें, वक्त तोड़ा
- 55:17रह के क्या करें? वक्त की अपनी सीमा है।
- 55:26मार्कस कभी नहीं पहुँच पाएगा उस उच्चतम तल पर जिसकी बात कृष्ण कह
- 55:32रहे हैं प्राणियों में मैं चेतना हूँ कभी नहीं पहुँच पाएगा मार्कस
- 55:43चारवाक निच से। उस उच्चतम शिखर पे नहीं पहुँच
- 55:50पाएगा जीसको सुमेरु कहते हैं कि अपनी उस प्रज्ञा में स्थित नहीं
- 55:59हो पाएगा कभी और इसलिए यह दुखी ही रहेगा तुम देख लेना।
- 56:04मार्कसवादी हमेशा दुखी ही रहेगा। दुखी उस अर्थ में कामनाएं कभी
- 56:12पूरी नहीं होती। आनंद इन्हें मिलेगा नहीं, क्योंकि
- 56:18आनंद मानने से शुरुआत होती है। बड़ी हैरानी की बात है।
- 56:25आज मैं कुछ विपरीत बोलता हुआ दिखाई पडूंगा, हैरानी मत करना मैं
- 56:30अक्सर कहता हूँ, मेरे विरोधी शब्दों से हत अपप्रभ मत हो जाना
- 56:37विरोधी शब्दों से ही समझाया जाता है।
- 56:40रात और दिन दोनों मिलते हैं तो 1 दिन बनता है।
- 56:45ये 24 घंटों में रात की काली माँ होनी जरूरी और दिन का उजाला होना
- 56:51भी जरूरी है। अगर मानोगे नहीं?
- 56:59तो आगे न बढ़ोगे कदम आगे नहीं बढ़ेंगे।
- 57:02इसीलिए मारकर मर जाते हैं, अध्यात्म की ओर कदम नहीं बढ़ाते
- 57:08क्योंकि मान लेते हैं, मान लेते हैं असत्य को वो हैं नहीं और अगर
- 57:17तुमने ये मान लिया कि वो हैं नहीं।
- 57:20तो तुम खोज भी न पाओगे किसे खोजोगे जो है ही नहीं आगे कैसे
- 57:26बढ़ोगे तो कृष्ण बड़ा प्यारा शब्द बोलते हैं कि तुम मान ले जो मैं
- 57:33कहता हूँ उसको सत्य मानकर जान फिर जान ले।
- 57:40मानने से कदम उठेंगे, मानने से चाल चलेगी, ठहराव नहीं आएगा और
- 57:49उसके बाद जानना भी आ जाएगा। अगर तू चलेगा, खोजेगा तो पा भी
- 57:55लेगा। खोजा ही नहीं।
- 57:58तोपारी का क्या खा खा ये मानना शब्द बड़ा प्यारा है मार्क्स कभी
- 58:10नहीं पहुँच पाएंगे मैं स्टेम्प लगाता हूँ, इस बात पे।
- 58:15इन अर्थों में मैं आस्तिक जो मानते हैं।
- 58:18किसी भी रूप में मानते हैं, वह तोड़ दिए जाएंगे।
- 58:22किसी वक्त, कोई दुर्गा के रूप में, कोई काली के रूप में, कोई
- 58:27हनुमान के रूप में, कोई राम के रूप में, कोई कृष्ण के रूप में,
- 58:32किसी रूप में मानता है, कोई अल्लाह, कोई ईसा।
- 58:40कोई हश्र जो मानते हैं वो पहुँच भी जाएंगे।
- 58:45किसी को भी मानते हैं कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन मानते हैं जो
- 58:53मानता है वो यात्रा भी शुरू कर देगा।
- 58:56क्योंकि उसने माना और माना सत्य को इसलिए मैं सदा ही कहता हूँ
- 59:01सत्य को मान लेना कोई गलत नहीं होता असती को मान लेना गलत होता
- 59:06है। चारवाक ने माना यहाँ लेना देना
- 59:11कुछ नहीं पड़ता भस्मभूत से रहस्य। पुनर आगमनम कुत्ता जदा जीवित सुखी
- 59:20जीवित है, ऋणम कृतवाग्रता में भी व्यर्थ है कोई लेने देने का संबंध
- 59:30नहीं, किसी को वापस नहीं करना पड़ता तर्क बड़ा अच्छा है जो मर
- 59:35गया। लेने वाला देने वाला कौन मुरेगा
- 59:38किसको मुरेगा तर्क सुन्दर है और अक्सर आप तर्कों से ही सहमत होते
- 59:46हो क्योंकि आप बुद्धि हो आप अपने आपको बुद्धि माने बैठे हो, जो गलत
- 59:54है। तो कृष्ण कहते हैं मानना ही है तो
- 59:58आत्मा को मानो बुद्धि को क्यों मानते हो?
- 1:00:03निककृष्ट को मानोगे तो उत्कृष्ट तक आपकी यात्रा ना होगी।
- 1:00:10तुम मन को मानते हो मेरे विचार इसमें?
- 1:00:15खंडित करती है। मेरी भावनाओं का आनन्द कर दिया
- 1:00:17तुमने भाई भावनाओं बनाई क्यों थीं ये गलत भावनाओं तुमने बनाई ही
- 1:00:23क्यों थी? दंड देने के अधिकारी?
- 1:00:25तो तुम हो, जिसने गलत भावनाओं मानी, क्यों मानी?
- 1:00:32किसने कहा था मानी? मार्क्सस को किसी ने कहा था कि
- 1:00:37परमात्मा नहीं है, ये मान लो नहीं, उसके खुद की पैदाइश थी तो
- 1:00:43फिर भुगतना भी तो उसे पड़ा। क्या वो आनंद में मरा नहीं, बड़ा
- 1:00:47दुखी हो के मरा नीच से कैसे मरा, बड़ा दुखी हो के मरा।
- 1:00:55कैसे मरा उदास रहता था ईशा के पास लेकिन नास्तिक था और नास्तिक बस
- 1:01:05हाथ धोता ही मर गया। जब हाथ धो के आता तो उसे लगता ये
- 1:01:11लहू से लिपटे हुए हैं। इस इन पर ईसा का लहू लगा हुआ है।
- 1:01:16फिर धोने चला जाता फिर वापस आता, चारपाई पे बैठता फिर हाथों को
- 1:01:26देखता अरे ये तो खून लगा हुआ है। दिन भर रात यही काम और 24 घंटे के
- 1:01:32बीच बीच में ईसा विदा हुए और उदास भी विदा हो गया।
- 1:01:36लेकिन तड़पता हुआ विदा हुआ। ईसा मज़े से विदा हुए ईसा क्षमा
- 1:01:44करते हुए विदा हुए। ईशा मरते दम पर कहें ओह गॉड फॉर
- 1:01:50गिव देम बिकॉज़ दे डोन्ट नो व्हाट दे अरे डूइंग लेकिन तड़पता हुआ
- 1:01:59मरा जुदाश उसने गलत माना मानने का यह बड़ा लाभ है।
- 1:02:08मानने से गति मिलती है। सही दिशा में सही चीज़ को मानना
- 1:02:16आपको शुभ की तरफ उचाई की तरफ ले जाएगा जो बच्चा ए अनार होता है।
- 1:02:23बी बॉल होती है, सी कैट होता है, इसको मानेगा नहीं फिर आगे नहीं
- 1:02:28बढ़ पाएगा। वह डॉक्टरेट करने के सपने न देखे,
- 1:02:34मानना के जान ना इस पर बहस मत करना सीधी सी तुम्हें मैं
- 1:02:40डेफिनिशन दे देता हूँ। सत्य को मानना जो संत कह के गए
- 1:02:46हैं असक्ति को मत मानना, जो नास्तिक कह के गए हैं उनको मत
- 1:02:51मानना और भरा पड़ा है हमारा साहित्य अध्यात्म में, खासकर
- 1:02:57जिन्होंने मान और जना जिन्होंने नहीं माना।
- 1:03:02कहाँ जान के गए वो? वो तड़पते तड़पते भटकते भटकते,
- 1:03:08अंधे अंधे आए और अंधे अंधे चले गए।
- 1:03:13उन्होंने शक्ति को खुली आँखों से निहारा ही नहीं तो मानने और जानने
- 1:03:19के बीच में कोई बहस का विषय नहीं होता।
- 1:03:22बस सिर्फ़ एक ही मैं तुम्हें डेफिनिशन आज दे रहा हूँ, जो सत्य
- 1:03:27है उसे मान लेना और सत्य हमारे प्रबुद्ध महर्षियों ने शस्त्र भरे
- 1:03:34पड़े हैं उसको मान लेना। तुम शिव स्वरूप हो, इसे मान लेना
- 1:03:45तुम परमात्मा स्वरूप हो, तुम आत्म शुरू हो, इसे मान लेना।
- 1:03:49अष्टावक्र कहते हैं कि तुम शरीर नहीं हो, इसे मान लेना तुम मन
- 1:03:53नहीं हो, इसे मान लेना चमड़ा नहीं हो, इसे मान लेना, लेकिन मानने से
- 1:03:59तुम्हारी गति होगी। उस तरफ की यात्रा शुरू होगी और ये
- 1:04:04पहला पड़ाव भी अगर चूक गए तो अंतिम पड़ाव कभी नहीं आएगा।
- 1:04:10यह बड़ा हितकर है और अनिवार्य है। मानना बड़ा शुभ है, बड़ा जरूरी
- 1:04:18है, आवश्यक कदम है। पहला कदम है, लेकिन आवश्यक है
- 1:04:25मानने से शुरू करना मानने से यात्रा शुरू होगी।
- 1:04:30नए मानने से तो यात्रा ही शुरू नहीं होगी।
- 1:04:35जो लोग किसी चीज़ को जानते नहीं बड़ा आसान है कह देना के होता ही
- 1:04:40नहीं। अब कुछ आचार्य कह देते हैं,
- 1:04:42अलाइकनमेंट होता ही नहीं, तो ये पहुँचेंगे कैसे?
- 1:04:48जो कहे प्रेम होता ही नहीं वह नफरती फैलाएगा?
- 1:04:55उसको कभी प्रेम के दर्शन नहीं हुए हैं।
- 1:04:59पूछो मजनू से पूछो हीर से जो प्रेम में तड़पे ति दो नी मेनू
- 1:05:15आँखों रजा ति दो नी मेनू आँखों रजा हीर ना खे कोए।
- 1:05:23रांझण रांझण करती मेहता आप पे रंजन वही प्रेम में ऐसा हो जाता
- 1:05:30है, बदल जाता है सब यह प्रेम का प्रण जिसने माना ही नहीं कि प्रेम
- 1:05:39होता है वह नफरत ही फैलाएगा। क्योंकि और कुछ होता ही नहीं,
- 1:05:43प्रेम का विपरीत नफरती होता है, नफरती फैलाएगा और जो नफरत फैलाई
- 1:05:49समझ लेना उसको प्रेम की अनुभूति कभी हुई ही नहीं जीसको एक बारगी
- 1:05:56प्रेम की वो मीठी झड़क मिल गई। वह नफरत नहीं फैलाएगा।
- 1:06:01यह है पक्का मानने से शुरू करें और मानना सत्य को मानना कसौटी पर
- 1:06:11खरा सभी शास्त्रों में लिखा तुम शरीर नहीं हो।
- 1:06:17देख लेना सभ्य स्यान एक मत मूर्ख अपना अपना सभी सयानों ने कहा
- 1:06:25अष्टावक्र ने कहा यू अरे नॉट बॉडी नॉट माइंड सभी सयानों ने कहा
- 1:06:34अध्यात्मवादियों ने कहा तुम शरीर नहीं हो।
- 1:06:37इसलिए तो मान के चलना नहीं है और ये सत्य भी है।
- 1:06:42सत्य को मान लेना शुभ होता है। तभी यात्रा शुरू होगी।
- 1:06:46मानने का ये है फायदा और मानना एक आवश्यक कदम है अध्यात्म के मार्ग
- 1:06:54पे। पहला कदम मान न ही होना चाहिए
- 1:06:58अन्यथा कदम न उठेंगे। जितनी मान्यता गहरी होगी, गहरी
- 1:07:08होगी, उतनी चाल तेज होगी। कल मैंने बोला श्रद्धा को बढ़ा
- 1:07:16लेना। 1 दिन मान्यता श्रद्धा में तब्दील
- 1:07:21हो जाएगी। तुम मानते मानते झुकोगे अपने भीतर
- 1:07:25जाओगे और चमत्कार तुम्हारे जीवन में घटित होंगे, वो सच में ही
- 1:07:32परिवर्तित कर देंगे तुम्हारे जीवन को।
- 1:07:35खेल खेल में तुमने माना था और सत्य सत्य में तुमने देख लिया
- 1:07:41हँसीबो गायबो खेलिबो धरिबो दयान गाओ, हंसो खेलो मानो।
- 1:07:56और उससे ध्यान हो जाएगा, लेकिन शुरुआत मानने से करो, मानने से
- 1:08:05शुरुआत करोगे? 1 दिन गंतव्य के ऊपर पहुँच जाओगे।
- 1:08:13भगवान कहते हैं, भैभी मैं हूँ जो अर्जुन कहते हैं, कार्पण्य दोष हो
- 1:08:20वह स्वभाव कायरता के स्वभाव के कारण मेरा शरीर रोम रोम कप रहा
- 1:08:27है। प्रिछा में काम धर्म समूह चिता
- 1:08:37यक्षरयासा निश्चित्रो हितन में शिष्य से हम झुक जाता है वो और जो
- 1:08:43झुक जाता है वो पालिता है शादी माँ ऍम तूम पर पन्नामा।
- 1:08:52मुझे बताइए कि सत्य को जानने के लिए पहले मानना पड़ता है सत्य को,
- 1:09:02सत्य को मानो फिर सत्य तक पहुँच जाओगे।
- 1:09:11मैं अकेला ही चला था जाने में मंजल मगर मैं अकेला ही चला था
- 1:09:18जाने में मंजिल मगर लोग साथ आते गए और कारवां बनता क्या तुम अकेले
- 1:09:27चला? मान के चलना प्रमाण जुटते जाएंगे,
- 1:09:33उसके होने के और तुम्हारी श्रद्धा बढ़ती जाएगी।
- 1:09:37मैं अकेला ही चला था। जाने बे मंजल मकर लोग साथ आते गए
- 1:09:43और कारवां बनता। क्या चमत्कार हो गए?
- 1:09:49ऐसी घटनाएं होंगी जो तुम्हारी श्रद्धा को बढ़ा देंगी।
- 1:09:54यही क्वेश्चन कहते हैं जो नास्तिक हैं।
- 1:09:57मैं उनको ज्यादा नास्तिक बना देता हूँ।
- 1:10:00ऐसे ही प्रमाण जुड़ा देता हूँ और जो आस्तिक है, उनको मैं ज्यादा
- 1:10:05आस्तिक बना देता हूँ। वैसे ही प्रमाण जुटा देता हूँ, बस
- 1:10:10मैं तो तुम्हारी इच्छाओं को पूर्ति करने हेतु हूँ, मैं
- 1:10:17तुम्हारी सभी इच्छाएं को पूर्ण करता हूँ फल तुम चखोगे।
- 1:10:25तुम्हारी इच्छाओं को बढ़ावा मैं दे देता हूँ तुम जीस देवता में
- 1:10:31श्रद्धा को रखे हो मैं उसी देवता में तुम्हारी श्रद्धा को बढ़ा
- 1:10:35देता हूँ मानने से शुरू करना, सत्य को मानने से शुरू करना।
- 1:10:45असथ्य को मानने से शुरू मत करना ये है असली फॉर्मूला मानने जानने
- 1:10:53के अंदर बहस मत करना मान बिल्कुल मान जानना तो कभी शुरू होता ही
- 1:10:59नहीं मानने से ही शुरू होता है सदा।
- 1:11:03लेकिन सत्य को मानना मानने में दो चीजें हैं सत्य असत्य, सत्य जानो
- 1:11:10क्या है अगर अध्यात्म में चलना है तो अध्यात्म की पुस्तकों में देखो
- 1:11:16भरे पड़े हैं उनको मानो और फिर चलो पहुँच जाओगे।
- 1:11:23मैं अकेला ही चला था, जानबे मंजल पकड़ लोग सदाथे गए और कारवाँ बनता
- 1:11:30गया चमत्कार होते रहेंगे, तुम्हारे पक्ष में परमात्मा
- 1:11:34चलेगा, तुम्हें दृष्टांत देता रहेगा और तुम्हारी स्थिरता बढ़ती
- 1:11:39रहेंगी। क्यों गुरु के द्रोही हो जाते हैं
- 1:11:45लोग जब तक मानते हैं कि गुरु ठीक है, तब तक ईश्वर उनकी श्रद्धा को
- 1:11:52बहता रहता है। ज़रा सी श्रद्धा आई के गुरु व्रत
- 1:11:57है। तो परमात्मा उसकी श्रद्धा को
- 1:12:00कृष्ण कहते हैं। मैं उसकी ये श्रद्धा को बढ़ाना
- 1:12:03शुरू कर देता हूँ। वह तुम्हारी वृत्तियों को
- 1:12:10बढ़ाएगा। तुम कामग्रस्त हो तो मैं
- 1:12:16कामग्रस्त कर देगा ज्यादा। तुम ब्रह्मचारी हो, तुम्हें
- 1:12:21ज्यादा ब्रह्मचारी करते हो? वह तुम्हारी सहायता करेगा, सिर्फ़
- 1:12:27उसका अपना कुछ नहीं है, जो तुम चाहते हो जीस देवता की पूजा तुम
- 1:12:32करते हो उस देवता में तुम्हारा विश्वास पढ़ा देगा।
- 1:12:36ये परमात्मा का काम है इसलिए सत्य को मानकर चलना अगर असत्य को पाना
- 1:12:47चाहते हो तो असत्य को मानकर चलना अगर दुखी होना चाहते हो तो असत्य
- 1:12:54को मानकर चलना दुख मिल जाएगा। अगर सुखी होना चाहते हो तो सत्य
- 1:12:59को मान के चलना सत्य तुम्हें सुख तक पहुंचा देगा, आनंद तक पहुंचा
- 1:13:05देगा। यही है थीम विभूतियों का और कृष्ण
- 1:13:11के सारे दसवें अध्याय के। मैं जे हूँ मैं जे हूँ मैं जे हूँ
- 1:13:18जलाशयों में मैं सागर हूँ अपनी विभूतियों का वर्णन करना इसमें
- 1:13:30तुम पाओगे। कृष्ण कहते हैं, मैं सर्वश्रेष्ठ
- 1:13:33में हूँ। हूँ तो निकृष्ट भी।
- 1:13:37मैं तो भयभी हूँ इसलिए तू भयभीत मत हो क्योंकि मैं साहस भी हूँ।
- 1:13:46तू साहसी बन, साहसी बन। और तू अपना गांढ़ी धनुष जो फेंक
- 1:13:54दिया वो उठा ले और इनकी छातियों को छल नहीं करते तू रणभूमि में
- 1:14:03वीर ही जीता करते हैं, कायर नहीं। भगोड़े कभी नहीं जीता करते, तू
- 1:14:09युद्ध कर मामनुष्म। युद्ध च्व ऐसा उपदेश ने दिया ऐसा
- 1:14:17उपदेश देने वाले को तुम भगवान मान भी नहीं सकते डेक्कन भगवान हैं
- 1:14:25मानने से शुरू करो भय भी हूँ मैं। अर्जुन कहता है मैं भयभीत हूँ
- 1:14:34कृष्ण कहते हैं कोई बात नहीं, भय भी मैं ही हूँ, लेकिन तू इसे भय
- 1:14:39से कह मत, साहस भी तो मैं हूँ। तू साहस को अडॉप्ट कर और उठा अपने
- 1:14:47राणी धनुष को और कसले प्रतिंचा को?
- 1:14:52और वाणो की शैया पे सलाह दे विषम को और सलाह देता है वह जीत जाता
- 1:15:00है ये सब मेरे मारे हुए लोग हैं, मैं मार चुका हूँ इन्हें इनके
- 1:15:06कर्म ही ऐसे थे। मैंने सामूहिक रूप से एक स्थान पे
- 1:15:10इकट्ठे करने की व्यवस्था बना के इन सब को मार दिया अब तू श्रेय ले
- 1:15:14ले उठ जा जी तो तेरी होगी कृष्ण पहले ही कहते हैं विजय श्री तेरे
- 1:15:25पांव चुमेगी तूट? ये मुकुट अपने शीश से धारण कर रे
- 1:15:31अर्जुन श्री कृष्ण गोविंद हरे है मुरारी।
- 1:15:45हे नाथ नारायण वासुदेव पूछो न कैसे मैंने?
- 1:16:08पूछो ना के से मैंने। एक फल दें से एक युग बीता, एक फल
- 1:16:32जैसे एक युग बीता। युगविते मोहिनी ना पूछो ना कैसे
- 1:16:55मैंने रे। वेता पुतजले दीपक हित मन मेरा।
- 1:17:17होत जले दीपक इत मन्नू मेरा फिर भी न जाए मेरे घर का अँधेरा।
- 1:17:37उत्जले दीपक इत मन मेरा मन मेरा। आ मेरा वो तू जल दीपक इत मन मेरा
- 1:18:06फिर भी ना जाए मेरे। घर का अँधेरा तड़पत तरसत अमर गँवा
- 1:18:26पूछो ना कह सी मैंने। रहन बेटा पूछो ना कैसे मैंने रहन
- 1:18:43बेटा। पितमात स्वामी सखा हमारे पितमात
- 1:19:01स्वाम सखा हमारे। हे नाथ नारा यन वसुदेव श्री कृष्ण
- 1:19:16गोविंद हरे मुरारी हे नाथ? नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण
- 1:19:37गोविंद हरे मुरा ह नाथ। नारायण वासुदेव पितुमात स्वामी
- 1:19:55सखा हमार पितुमात स्वाम सखा। हमारे हे नाथ नारायण यन वासुदेव,
- 1:20:14श्री कृष्ण गोविंद आरे मुरारी हे नाथ नारायण वासु देव ओह धन्यवाद।