Latest / Baba ji Vijay Vats / 17 Mar 26 - मृत्यु का भय और साहस का विज्ञान 'मैं शरीर नहीं हूँ' की परम उपलब्धि! साहस और शांति का मार्ग
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- 0:11कुंदन लाल बाबा जी ट्रांसफर मैं आपके वीडियो को लगातार का रौना
- 0:25काल से लगातार सुन रहा हूँ। एक भी वीडियो मैंने मिस में किया,
- 0:37कभी कभी तो वीडियो मैं पांच पांच बार सुन लेता हूँ।
- 0:44आज आपने एक शब्द का। जो शब्द डिक्शनरी के हिसाब से
- 0:54उनके अर्थ विपरीत बनते हैं, समान अर्थक नहीं बनते, विपरीत बनते
- 1:04हैं। कृपया उनको समझाने की चेष्टा
- 1:10करें। उनमें कैसे तालमेल आप बिठा पाओगे?
- 1:19आपने कहा राजनीतिक व्यक्ति? बहुत जालिम होते हैं और राजनीतिक
- 1:29व्यक्ति बहुत कायर भी होते हैं। यह बात हमारे शब्दकोश में विपरीत
- 1:37अर्थक शब्दों में पड़ती। जो ज़ालिम होगा, वह कायर कैसे
- 1:44होगा और जो कायर होगा वह ज़ुल्म कैसे कर सकेगा?
- 1:52बाबू जी शब्द के फंस गए। अब इनको सॉल्व करने की कोशिश
- 2:00करें। लीजिए पुत्र शांति से बैठ जाइए।
- 2:21मैंने कहा राजनीतिक व्यक्ति जाल में होते हैं, दुष्ट होते हैं,
- 2:25करोड़ होते हैं और कायर भी होते हैं।
- 2:31बिलकुल ठीक मैं यूं ही अल्फाजों को नहीं बोल दिया करता अल्फाज़
- 2:40मेरे गहरे तलों से आया करते हैं, खोपड़ी से नहीं आया करता।
- 2:54बिल्कुल राजनीतिक व्यक्तियों से बड़ा कायर कोई नहीं होता और
- 3:02राजनीतिक व्यक्तियों से ज्यादा जले कोई नहीं होता दीजिए, इसको
- 3:10समझिए। बुध को आप जानते हैं और कौन है
- 3:28राजनीतिक है, अध्यात्मिक क्या है? वह कोई जालिमाना हरकत करते हैं।
- 3:46किसी को कष्ट देते हैं, तकलीफ पहुंचाते हैं, किसी को अध्यापकतल
- 3:56कुछ भी करते हैं, तुम कहोगे नहीं करते।
- 4:06हत्या भी नहीं करते, जुल्म भी नहीं करते और शांत भी बहुत हैं।
- 4:13अब इसकी परभाषा सुन लीजिएगा। जो व्यक्ति शांत होगा वह जुल्म
- 4:18नहीं कर सकेगा। क्योंकि उसकी शांति के भीतर इतना
- 4:25रस आश्वादन होगा कि वह अपने रस आश्वादन को भंग करना नहीं चाहेगा
- 4:32और जुल्म उसके रस को भंग कर देती है, इसलिए वो जुल्म नहीं करेगा।
- 4:42इसके बिल्कुल विपरीत आ जाओ। राजनीतिक व्यक्ति में रस नाम की
- 4:53कोई चीज़ नहीं होती। ना सुना होता है, ना चखा होता है
- 5:02उसका रस क्या है, वह कितना शांत है वो कितना आनंद प्रिय, इसकी
- 5:11ज़रा भी भनक राजनीतिक व्यक्ति को नहीं।
- 5:19इसलिए वह क्या करता है? वह जुल्म करता है, वह जुल्म नहीं
- 5:29करते, लेकिन जुल्म करने वाले अगली माल के करीब चले जाते हैं।
- 5:37कोई हथियार नहीं है उनके पास। अगली माल कहते खबर आगुंतक मुझे
- 5:47तुम पर तस पता नहीं क्यों आ रहा है आज मेरे हाथ कांपने लगे हैं।
- 5:54यद्यपि मेरा आखिरी शिकार बस एक ही व्यक्ति की हत्या मैंने और करने
- 5:59थे। और वो तुम आगे हो खुद ब खुद तो
- 6:05रुक जाओ, मैं तुम्हारी जान को बख्श हूँ तुम वापस चले जाओ, नहीं
- 6:13जानी क्यों मुझे तुम्हारे ऊपर तर्क बढ़ाता है।
- 6:20लेकिन बुद्ध जैसे उन्हें कुछ सुनाई ही नहीं पड़ता।
- 6:24धीमे धीमे कदमों से सूखे हुए पत्तों की चरचराहट के बीच में
- 6:31नंगे पांव चले ही आते हैं, चले ही आते हैं।
- 6:41ज़रा भी पथ से भटकते नहीं, सीधे चले आते हैं और सीधे चलते चलते
- 6:49जैसे जैसे करीब आते हैं अगली माल के हाथ थर रह जाते हैं।
- 7:00हाथ से का घर पड़ता है और अगली माल को पता ही नहीं चलता कब वह
- 7:10बुध के चरणों में गर पड़ा आंसू हैं के थमने का नाम नहीं लेते।
- 7:19जीवन में आज पहली दफ़े उसने शांति को चखा था।
- 7:26बुध के रोम रोम से शांति प्रवाहित होती है और शांति के साथ आनंद भी
- 7:32प्रभावित होता है। इस अपप्रवाह के भीतर अंगुली माल
- 7:36भी बह गया और रोते रोते इतना रोया कि बुध के पांव धोए गए।
- 7:55जालिम कौन था? अंगुली माल वीर कौन था?
- 8:06महात्मा बुद्ध वीर वो होते हैं जो मृत्यु से डरते हैं।
- 8:15जिनके भीतर गहरा साहस होता है और जो मृत्यु से डरते नहीं, उसका
- 8:22कारण भी होता है। अकारण नहीं होती ये बात वो जान
- 8:28लेते हैं कि जो मरेगा वह मैं नहीं हूँ।
- 8:33नै हनय ते हनय माने शरीर नैनम छदं ती शस्त्रण नैनम दहती पावका नै
- 8:42चैनम कलैजनत्याप नै शोचति मारुत जो इस सत्य को नगन आँखों से देख
- 8:51लेता है। उससे बड़ा साहसी और कोई नहीं आता
- 8:57और बुद्ध ने इसको अपनी आँखों से देखा है।
- 9:01इसे ही तो ज्ञान कहते हैं, इसे ही तो समाधान कहते हैं।
- 9:06सभी समस्याओं का समाधान हो गया। यही तो समाधि है।
- 9:14इसलिए बुद्ध से उम्मीद मत करना वे कभी कतलोग आरत करेंगे।
- 9:23वे कभी हिंसा करेंगे या कभी भी मत सोचना।
- 9:33और राजनीतिक व्यक्ति तो मूर्ख है। बुद्धू है उसने उस रस की एक बूंद
- 9:43कभी पी नहीं और यही गड़बड़ है सारी।
- 9:51जिसने भी वो बूंद पी बस वह सदा के लिए ठहर गया।
- 9:59उस बूंद का इतना प्रभाव है कि वह कितना भी ज़ालिम व्यक्ति हो उसको
- 10:08ठहरा देता है। बस एक बूंद पीने की जरूरत होती है
- 10:19लेकिन अंगुली माल ने उस बूंद को चखाना चखा नहीं इसलिए वो दुष्ट है
- 10:27गुजारी में। वो कतल गारित करता है और 999
- 10:32व्यक्तियों को मारकर उनकी उंगलियों को गले में डाल चुका है।
- 10:38एक व्यक्ति शेष है, उसने कसम खाई है कि मैं 1000 व्यक्तियों को
- 10:43मारूंगा और उनकी अंगलियों को गले में पिरो लूँगा।
- 10:49एक श्रेष्ठ था और आखिरी आ गया। बुध धर्म संकट में फंस गया।
- 10:57ये आदमी जैसे जैसे गरीब आता है। अगली माँ डरता भी है, थर्राता भी
- 11:06है, कांपता भी है, क्योंकि उन डेल्टा वेव्स के प्रभाव से आनंदित
- 11:20भी होता है। और उस आनंद के पर आलम में हाथों
- 11:28की पकड़ छूट जाती है, कापरे के ऊपर से वो हथियार नीचे गिर पड़ता
- 11:34है टन देखता है सारा शरीर कप रहा है।
- 11:42यह कंपनी है डेल्टा व्यूस का तुम देखोगे जब कभी मैं यहाँ शक्ति बात
- 11:49करता हूँ, वह व्यक्ति बुरी तरह कंपनी लग जाता है क्या होता है
- 11:59इतनी गहन शांति उसने कभी पी नहीं। आज प्रथम बार इतनी गहन शांति उसके
- 12:06भीतर गई, इसलिए उसके तंतु इतने कांपते हैं।
- 12:15रीपेर हो रहे हैं। और वह बड़ा आनंदित होता है।
- 12:27बस यही अवस्था थी अंगरी माल अंगरी माल भाज भी नहीं सकता जालिम था।
- 12:39लेकिन अब जालम नहीं रह रहे, बस तुम छह फुट की दूरी तक ज्यादा से
- 12:48ज्यादा जालम रह सकते हो। जितना तुम्हारा कद है, वहाँ तक
- 12:59तुम्हारी रेंजेस जाती हैं। वहाँ से जब आगे बुध आये तो उनकी
- 13:06रेंजेस ने प्रभावित करना शुरू कर दिया को वो रेंज उसके भीतर के
- 13:17हमारी स्किन के पर रोम जी ने कह देते हैं।
- 13:20वो पी गए। भीतर क्रांति घटित हो गई क्योंकि
- 13:30यह मामूली रोम के भीतर जाती हुई व्यवस्था या एनर्जी मामूली नहीं
- 13:38थी। यह बड़ी शांति की रस की आनंद की
- 13:47खुमारी की पी हुई तरंगें और जब ये खून के भीतर मिली, उसके होश फख्त
- 13:59हो गए। और बेहूशी का आलम ऐसा आया कि भूल
- 14:06गया कि मैं हूँ कौन? हाथ से कांपा छूट गया और वह मस्ती
- 14:14में खो गया और खुशहाली के इस। वक्त में वह बुद्ध के चरणों पर
- 14:24लोटपोट हो गया। इस आनंद का कमाल ही ऐसा होता है।
- 14:35बहुत रोया, बहुत रोया बरसों बरसों का रोना बुध ने कुछ नहीं कहा।
- 14:43हो जाने दो अरे चंद हो जाने दो, कैथल से सो जाने दो, सारे पांव
- 14:50भीग गए। जब भूत ने देखा अब ओरा शांत हो
- 14:58गया है, सफेद हो गया। बुध ने उसको उठाया गले से लगाया
- 15:07बुध कहते अंगड़ी मार आज तू ब्राह्मण हुआ, तुम ब्राह्मण का
- 15:16अर्थ जाति से मत लगा लेना। इन आप को गुमराह करके कहानियों
- 15:28बना के पितरों का नाम कह के पितरों को याद कराके इन खीर खाने
- 15:37वाले पाखंडियों को तुम ब्राह्मण मत कह देना।
- 15:41यह तो दुष्ट हैं, लोग ही हैं, ठग हैं, दरिंदे हैं, इनके पेट पहले
- 15:52से भरे हुए हैं। इनकी तौतें देखना तुम समझ जाओगे।
- 16:02मैं उन ब्राह्मणों की बात नहीं करता हूँ जिनको आप बसरादों में
- 16:05मिला के खाना खिलाते हो, वो ब्राह्मण हैं, अभी मैं उस
- 16:13ब्राह्मण की बात करता हूँ जो ब्रह्म के अणु में समा गया।
- 16:19जो ब्राह्मण जैसी गतिविधि करने लगा, जिसका स्वभाव पर आनंदमय हो
- 16:25गया। जिसके रोए रोए से शांति बहने लगी
- 16:32जिसकी आवाज में और कंठ में मधुर गायन चलने लगा।
- 16:38वह ब्राह्मण ना जाति से ब्राह्मण होता है, ना पैदाइशी ब्राह्मण
- 16:45होता है। ब्राह्मण तो एक अर्जन है जैसे आप
- 16:50डिग्री अर्जित करते हो, ऐसे ही ब्राह्मणत्व भी अर्जित किया जाता
- 16:56है। इसकी डिग्री किसी विश्वविद्यालय
- 17:00से नहीं मिलती इसकी डिग्री तुम्हें परमात्मा के दरबार से
- 17:04मिलती है। जब तुम खामोश हो जाते हो पर मौन
- 17:15में हो जाते हो। ज़रा भी सांस लेते हो तो धड़कनों
- 17:22से भी इबादत में खलक पड़ती है। जब ऐसी स्थितियां आ जाती है तो
- 17:31तुम सच्चे भ्रमण हुए। तुम्हारा रोमा रोमा उस रस को पी
- 17:36गया। खोमार में डूब गए और तुम मस्ती के
- 17:41सुरूर में गोरूर में सुरूर नहीं तुम नाचने लगे मेरा की तरह चैतन्य
- 17:50की तरह क्या मूर्तवत बैठ गए बुद्ध की तरह?
- 18:00वह ब्राह्मण हो गए। ब्राह्मण का मतलब है उस विराट के
- 18:06भीतर तलीन हो जाना, ब्रह्म के भीतर तलीन हो जाना ब्राह्मण।
- 18:15जाति से कोई ब्राह्मण नहीं होता है।
- 18:19जाति से सूत्र पैदा होता है सूत्र यानी संकीर्ण संकीर्ण यानी नैरो
- 18:28माइंड। लेकिन।
- 18:35ब्राम्हणौत और बुद्धत्व एक अर्जन है।
- 18:41महत्त्व में कमाना होता है, इसका कोई तालुकात किसी प्रकार के।
- 18:56अनुष्ठान से नहीं, किसी तरीके से नहीं है, किसी फॉर्मूला से नहीं
- 19:02है, किसी युक्ति से नहीं है, किसी विज्ञान भैरव तंत्र के 112
- 19:07विधियों से नहीं। कोई विधि में ब्राह्मण नहीं बना
- 19:10सकते। याद रख लेना मेरी बात को आखिर
- 19:14में। तो फिर ये बोला क्यों?
- 19:16112 विधियों उसी ने बोली। शंकर ने बोली, बिल्कुल बोली।
- 19:23112 विधियों का मतलब ये था कि 112 विधियों करके तुम थक जाओ।
- 19:31और थक जाओ जब तुम गिर पड़ो, तुम कहोगे बस।
- 19:39और नहीं बस और नहीं गम के प्याले हो।
- 19:51बट जब तुम्हारा मन कुछ न करने को करे, तब तुम सच्चे न करने में आया
- 20:08क्योंकि तुम इतने समझदार आज नहीं हो, जैसे मैं कह देता हूँ न कुछ
- 20:13करने में आ जाओ। कुछ लोग समझ जाते हैं, कुछ नहीं
- 20:17समझते, फिर उन्हें थकाना होता हैं, ये हैं दूसरा ढंग हैं अच्छा
- 20:25तो फिर तुम दौड़ो, दौड़ के थक जाओगे, फिर आराम से बैठ जाओगे।
- 20:36अगर पहली विधि में समझा जाए सीधे सीधे तुम न कुछ करने में बैठ जाओ
- 20:42तो शुभ है वक्त बच जायेगा। अगर तुम प्रयासरहित नहीं सीधे
- 20:51सीधे हो पाते तो फिर 112 विधियों में से चाहे सारे ही आजमा लेना
- 20:58ज़ोर न जुगति छोटे संसार किसी युक्ति में कोई जोर नहीं जो
- 21:06तुम्हें मुक्त कर दे तुम्हारे वंदनों से।
- 21:09तुम्हारा बंधन क्या है? हू एम आर तुम्हारा बंधन क्या है?
- 21:20हू एम आर रिमेम्बर योरसेल्फ, हू आर यू?
- 21:30तुम खुद को शरीर मानता हो इसलिए मरने से डरते हो?
- 21:39अगली माल भी खुद को शरीर मानता है।
- 21:42अगली माल दूसरे को भी शरीर मानता है।
- 21:44अर्जुन भी खुद को शरीर मानता था। इसलिए भीष्म और उद्रणों को भी
- 21:48क्षण मानता था, लेकिन बुद्ध को पता चल गया।
- 21:54यही होती है समाज यही होता है ज्ञान में शरीर नहीं मारेगा, शरीर
- 22:01को मारेगा, लेकिन मुझे नहीं मरेगा।
- 22:05मैं तो आनंद हूँ, मैं खुशियों का खजाना हूँ मैं मस्ती से लबालब
- 22:11भरा, वह प्रेम का सागर हूँ मैं आनंद की मूर्ति हूँ मैं मदोसी का
- 22:20आलम हूँ मुझे न कोई मार सकता है। न कुछ दुखी कर सकता है।
- 22:27जिसने ये जान दिया वो भ्रम हो गया, लेकिन अंगली माल इसे नहीं
- 22:41जानता। अंगली माल कहता मैं 1000 आदमियों
- 22:44को मर 999 मर गए, एक रह गया। वो धा गया, फिर वह मार तो ना पाए,
- 22:54एक व्यक्ति को फिर समूचा खुद ही मर गया।
- 22:59ये बलट बड़ी उलट घटना थी, चला था हमारे ने मुद्द को 1000 में
- 23:06व्यक्ति को। और सोचा था, आज मैं अपनी शर्त से
- 23:09मुक्त हो जाऊंगा, लेकिन शर्त से तो मुक्त न हो सका।
- 23:13भ्रांति से मुक्त हो गया। शर्त से मुक्त नहीं हो सका कि मैं
- 23:201000 आदमियों का वध करूँगा और उनकी उंगलियों को गले में
- 23:25डालूंगा। इससे मुक्त तो नहीं हो सका लेकिन
- 23:29भ्रांति से मुक्त हो गया कि मैं शरीर नहीं हूँ, मन नहीं हूँ,
- 23:33विचार नहीं हूँ और अगर ये उपलब्धि हो जाए तो फिर ये सबसे बड़ी चर्म
- 23:41उपलब्धि है। और इसी के लिए बड़े बड़े योगी ऋषि
- 23:46मुनि तरसते हैं। काश तुम्हें वह मिल जाए, तो
- 23:54तुम्हें सांसारिक वस्तुओं के रसास्वादन की जरूरत नहीं रहेंगी।
- 24:00तुम जब चलोगे तुम्हारी चाल बेहन होगी तुम जब बोलोगे तो तुम्हारी
- 24:04बोल नहीं बेहन होगी तुम जब गाओगे तो उसमें सरूर लगोगे।
- 24:18बुद्ध को तो न पलट सका, बुद्ध को न मार सका, खुद बदल गया।
- 24:23इसे ही साधु संगती कहते हैं। इसे ही सत्संगत कहते हैं जो तुलसी
- 24:29ने कहा तात स्वर्ग अप वर्ग सुख धरीय तुला एक अंग तात स्वर्ग अप
- 24:42वर्ग सुख धरीय तुला एक अंग। तुलनता ही सकल मिली जो सुखलव
- 24:48सत्संग बस एक क्षण के लिए तुम अपने आपे में छलांग लगा जाओ, वह
- 24:58तुम्हारे 1000 जन्मों की एयाशी से ज्यादा आनंददायक फल होगा।
- 25:06धूलनता ही शक्ल मेरी जो सुख अल्लाह, वो सच, शक बस यही कमाल है
- 25:13उसकी और इसी कमाल को व्याख्यान करते हैं।
- 25:18सभी साधु और पीकर करते हैं। वो मदहोशी के आलम में पिए पिए मन
- 25:29ठहरता ही नहीं तुम्हें बताने को करता है जल्दी से लुटा दूंगा
- 25:36जल्दी से बता दूंगा शरीर का कोई भरोसा नहीं।
- 25:44जिसके पास अमृत है वो ना रहे और जिनको अमृत बनाना है वो ना रहे तो
- 25:51मेरे बैठे बैठे सभी पी जाएं। ये तमन्ना होती है संत तुमने कहा
- 26:03पुत्र कि ये दो विरोधी शब्द हैं नहीं ये समानार्थक शब्द।
- 26:10विपरीत आर्थिक नहीं क्योंकि शैतानिय तो वही करेगा जिसने उस रस
- 26:23का एक बूंद भी आजतक पिया नहीं बांटेगा।
- 26:29वो ही जिसने उस रस का एक बूंद कभी पी लिया है।
- 26:34स्थिति से प्रभात शायद मैं बताता हूँ बांटना चाहते हो तो स्थल पर
- 26:42निकल जाओ। यहाँ अमृत की खदान है।
- 26:51एक बूंद को चखो और फिर तुम पाओगे, तुम बांटते ही चले गए नहीं बांटना
- 27:00है तो खोपड़ी में उलझे रहो। तुम लाख किताबों को बांट दोगे
- 27:08लेकिन अंत में पाओगे। कुछ भी बांटा नहीं गया।
- 27:15तुम पाओगे मैं खाली का खाली ही रह गया जो बांटा वो बाटने योग्य था
- 27:24ही नहीं। मैंने अमृत्य समझ के बांटा था ये
- 27:30विष? बस यही भ्रांति होती है तुम्हारे
- 27:36आईएएस ऑफिसर्स में, तुम्हारे सात लोगों में, तुम्हारे आचार्यों
- 27:43में, तुम्हारे टीचर्स में, तुम्हारे गुरुबों में।
- 27:50तुम्हारे स्वामियों में हमारे मार्गदर्शकों में यही कमी होती
- 27:57है। वो समझते हैं बहुत बोले, लेकिन एक
- 28:02पल भी तो नहीं बोले। जब तुम एक पल रस के स्वादन से
- 28:11युक्त होके बोलोगे तो फिर समझो की तुमने सारा संसार बोल दिया सारा
- 28:18सागर बोल दिया। मांग के साथ तुम्हारा।
- 28:32मैंने मान लिया संसार मांग के साथ तुम्हारा मैंने।
- 28:48मांग लिया संसार। बस उसका साथ मिल जाये।
- 28:59तू लेना ता ही शक्ल मिली जो सुकला वो।
- 29:05उस सत्य के अस्तित्व को थोड़ा सा छू के बाहर आ जाओ, फिर तुम पाओगे
- 29:12तुम्हारे बोलने की गुणवत्ता बदल गई शब्द फिर चाहे वो ही हो, वो ही
- 29:19हो। शब्दकोश वही हो लेकिन उनकी
- 29:23गुणवत्ता बदल जाती है। और जब गुणवत्ता ही सुनने वाली
- 29:32चीज़ होती है, यही वो रस है जो पिया जाता है अन्यथा शब्द तो
- 29:39तुम्हारी तोथे हैं। किताबों में जो चीज़ लिखी गई।
- 29:44वो रस विहीन थोथा फो लक रस तो संत भी लिए तुम्हें जानकर हैरान की।
- 29:56सन्तों ने कभी रस नहीं लिखा, किताबों में लिख भी नहीं सकते।
- 30:03संतों ने लिखा, फलक को फलूदे को जो व्यर्थ था, जिसमें से रस की एक
- 30:11बूँद भी नहीं निकाली जा सकती थी, यह वह पीड़ा हुआ, गन्ना था, एक था
- 30:17जो हजारों बार पिट लिया गया। अब तो सिर्फ सूखा गन्ना ही बचा
- 30:22है। एक बूंद भी इसमें रस की है।
- 30:28तो यह मत समझना। संत जो बोल के गया उसमें रस होगा,
- 30:34ज़रा भी रस नहीं है, सारा नीरस है, फौक है रस को साथ लेके आ।
- 30:43रस तो उसके साथ गया कॉन्शसनेस में वृद्धि में जो साथ गया अनुपात
- 30:55वृद्धि में जो साथ गया वो रसी तो था संत रस को साथ ले जाता है फलक
- 31:03को यहाँ रख जाता है। लेकिन फलक में भी स्वाद है
- 31:11तुम्हारे साथ ये शास्त्र उनमें राजकोट बस ये फलक की तरह है।
- 31:20ये काम आ जाते हैं। जलाने के काम आ जाते हैं, खाना
- 31:27बनाने के काम आ जाते हैं, कोई चने भूलने वाली भट्ठी में कराए जा
- 31:33सकते हैं और इनसे काम लिए जा सकते हैं, लेकिन इनमें रस की बहुत मत
- 31:40तलाश करने लग जाना रस नहीं मिलेगा।
- 31:46रस तो संत पी गया, उसने ज़रा भी ना छोड़ा ऐसे ज़रा ज़रा ले गया।
- 31:54वो बड़ा स्वादिष्ट था और बड़ी जरूरत थी।
- 32:01तो रस तो जानना भी मत तुम सारे शास्त्र तुम्हारे निरस हैं, तुम
- 32:06कितना भी बड़ा शास्त्र कहो, कितनी ही पूजा करो, धूप दीप करो से
- 32:10उपचार, पूजन करो लेकिन हैं व्यर्थ इसमें रस नाम की कोई चीज़ नहीं सब
- 32:19भौके। सब रस विहीन है और रस विहीन ईख का
- 32:27तुमने करना क्या होता है तुम फेंक दोगे उसमें कुछ निकालने योग्य है
- 32:37ही नहीं यह नीरज से। इसलिए मैं रोज़ कहता हूँ तुम अपने
- 32:43शास्त्रों को गंगा में बहा दो। यह फूंक है सफेद कागजों पे लिखे
- 32:49हुए कालियक्ष जिसकी तलाश है न शास्त्र में मिलेगा न वर्ण में
- 32:56मिलेगा। ना हिमालय की कंधराव में मिलेगा
- 32:59वह मिलेगा तुम्हे तुम्हारे भीतर मिलेगा वहाँ तुम जाते नहीं तुम
- 33:05जाते हो मंत्रों में, गुरुद्वारों में मसीटों में गिरजाघरों में
- 33:09वहाँ वो मिलता नहीं, वो होता नहीं वो मिलता है तुम में तुम्हारे
- 33:16भीतर। और तुम्हारी भीतर तुम जाती नहीं
- 33:21डृत्य हो, क्योंकि कुकृत्य ही इतने किए हैं के परमात्मा बात में
- 33:26दिखेगा तुम्हारी कुकृत्य तुम्हें पहले पहले दिखेंगे, ऊपर ऊपर पड़े
- 33:31हैं और तुम उन कुकृत्यों को देखकर वापस आ जाओगी गौरा।
- 33:44जिंदगी ने कर दिया जब भी उदास जिंदगी ने कर दिया।
- 34:01जब भी उदास आ गए, घबरा के हम मंजिल
- 34:57आकर रोल। तुम जाते हो परमात्मा की तलाश में
- 35:06और तुम्हारा सामना होता है तुम्हारे पापों से पाप ही तो
- 35:10आएँगे ऊपर ऊपर वह तो बहुत गहरे अंतःस्थल में बैठा है तुम्हारे।
- 35:17वहाँ पहुंचने से पहले तो तुम्हारे सभी पाप निपट जाएंगे, वह अंत में
- 35:23आएगा। इतना रास्ता तय करने की हिम्मत हो
- 35:27तो भीतर उतर जाना। अगर इतना रास्ता तय करने की
- 35:32हिम्मत ना हो तो रूखे सूखे। संसार में ही गुजर बसर कर लेना,
- 35:41लेकिन उसकी याद तो हर वक्त आती है।
- 35:45वह हर वक्त बुलाता है और तुम हर वक्त खींचने की योजना बनाते हो।
- 35:50उस तरफ। लेकिन यह पाप तुम्हें डराता है
- 35:54तुम्हारा ही क्या हुआ? यह पाप तुम्हें कहता है तुमने
- 35:59उसका मारा, तुमने उसका छीना तुमने उसकी गोदी से इकट्ठा करके अपने
- 36:08बैंकरों में रखा। तुमने उसकी जमीन छीन ली, तुमने
- 36:15उसके वस्त्र छीन लिए, तुमने उसका घर छीन लिया, तुमने उसका धन छीन
- 36:20लिया। ये सब पाप पहले आएँगे, तुम्हारा
- 36:25अस्तित्व सब से बाद में आएगा। इसलिए तुम डरते हो अपने भीतर जाने
- 36:30से और कोई कारण भी नहीं है। हमारे बाप हमें दिख न जाए।
- 36:42इसी वास्ते तुम कह। सकते हो?
- 36:43ईश्वर है ही नहीं। खुद को बदलने में असमर्थ वाते हो
- 36:54और घोषणा करते हो परमात्मा है नहीं, मैं जानता हूँ तुम क्यों
- 37:03कहते हो। जो रात से बेहोर हो के दिन भर रात
- 37:11पीता, फिर उसको किसी श्रेणी में रखोगे, उसको पागलपन में रखोगे या
- 37:18मिर्गी के दौरे पड़ते हैं उसको? कुछ तो नाम दो उसको आखिर क्या
- 37:26दिमाग खराब हो गया उसका? वह क्यों इतना जंजत करता है?
- 37:33जबकि इस संसार में बड़े स्वाद हैं?
- 37:35चखने के लिए वह क्यों त्याग किये बैठा?
- 37:42यह त्याग हुआ है या त्याग किया है?
- 37:45तुम पाओगे के त्याग हुआ है, त्याग किया नहीं जाता, सच्चा त्याग हुआ
- 37:52जाता है, हो जाता है जैसे वैराग्य हो जाता है जैसे उदासी आ जाती है
- 38:00जैसे प्रेम हो जाता है। जैसे प्रार्थना भीतर से निकल आती,
- 38:05वैसे ही जहर करना नहीं होता या हो जाया करता, त्याग करने जैसी चीज़
- 38:16नहीं। फिर इनको तुम किस कैटेगरी मेरे को
- 38:29तुम तो बड़े आराम से कह देते हो इनलेक में तो होता ही मार्क किस
- 38:34कह देते है पर मातम है धर्म अफीम का एक नशा है, नीच से कहते हैं
- 38:40गाड़ी टैग। ब्रह्मास्त्र में मर गया है।
- 38:50बिलकुल तुम बोलने को स्वतंत्र हो लेकिन फिर आखिरी 11 वर्ष तक नीच
- 38:59से पागलखाने में क्या कर रहा? और कबीर अंत वेला तक भजन गायन में
- 39:08क्यों मगन रहते हैं मीरा अंत वेले में भजन गायन करती करती कहते हैं,
- 39:19कहानी है। ये कृष्ण की मूर्ति में समा जाती
- 39:25है, समाहित हो जाती है भजन गाते गाते बाबा नानक प्राण त्याग देते
- 39:35है। इनको किस कैटेगरी में रखो?
- 39:41अपनी देह की तिथि निर्धारित करके अपने प्रिय शिष्य गौतम को भिक्षा
- 39:47के लिए भेज दे। पीछे से शरीर का त्याग करने वाले
- 39:51महावीर के लिए तुम क्या कहोगे? बुध कहती है आप रुक जाओ, अभी कोई
- 40:01प्रश्न पूछने वाला है, अभी उसको प्रश्न का जवाब दे दूंगी, फिर
- 40:08देखो छोड़ू कौन? इनके बारे में तुम क्या कहोगे?
- 40:14इनको कौनसी कैटेगरी में रखोगे? पागले लगते तो है नहीं अब दीप
- 40:26बाबा कहने वाले अपने दीप के स्वयं बनो।
- 40:34ऐसे गहन तत्व की आनंद की बात करने वाला व्यक्ति पागल हो सकता है
- 40:38क्या? जिसने कभी ध्यान का एक पल भी
- 40:42गुज़ारा हो? मेरी बात समझ लो ये जो प्राणायाम
- 40:47करते हैं, प्रयोग करते हैं। ध्यान करने वाला आदमी कभी जीवन
- 40:52में पागल नहीं होता। उसे सीजफ्रेनिया नहीं होगा।
- 41:00वह मस्ती में जिए और वो मस्ती में मरे।
- 41:07तुम भी आज से ही शुरू कर दो न कुछ करने में जानो।
- 41:13अगर नहीं जा सकते हो सीधे सीधे तो पहले क्रिया योग करो आधा घंटा
- 41:18तुम्हारे सभी मसल्स रिलैक्स हो जाएंगे तो आराम से बैठ जाओ न कुछ
- 41:25करने में उतर जाओ अपने भीतर चले जाओ तुम्हें दिखेंगे तुम्हारे किए
- 41:30हुए पाप। कोई बात नहीं, तुमने ही तो किया
- 41:35आज नहीं कल भुगतो के इस जन्म में नहीं अगले जन्म में भुगतो के
- 41:40भुगतना तो तुम्हें ही पड़ेगा तो इसी जन्म में भुगतो तो इन पापों
- 41:48को देखो। देखो और देखते देखते अब यहाँ से
- 41:51गुजर जाओ, वह मिलेगा वह बिल्कुल आंतरिक छोर पे मिलेगा इन दी लास्ट
- 42:00कार्नर ऑफ़ योर हार्ट कायर व्यक्ति जाले में से लिया होता
- 42:07है। कि कायर ये फिक्र करता है कि कहीं
- 42:11ये मुझे मार ना दे इसलिए इससे पहले कि ये मुझे मार दे, मैं ही
- 42:18इसे मार दूँ। ये तर्क है उसका, इसलिए वो ज़लम
- 42:25करता है, वह तुमसे डरता है। कृष्ण तुमसे डरते बुद्ध तुमसे
- 42:33डरते, महावीर तुमसे डरते क्योंकि मौत से वो डरते और कायर मौत से
- 42:41डरता है बस यही फासला है दोनों। कायर जुल्म करेगा क्योंकि वह मौत
- 42:51से डरता है। इससे पहले कि तुम मुझे मार दो,
- 42:54मैं ही तुम्हें मार दूँ, कायर कहें ये यहाँ से पैदा होता है।
- 43:01ये ओरिजिनेटेड प्वाइंट है। यहीं से पैदा होती है तुम्हारी
- 43:06कायरता से पैदा होते हैं तुम्हारे जुल्मों वीर पुरुष तो क्षमा करना
- 43:16जानता है क्षमा वीरत से भूषण में। मैं तुम्हें मारना नहीं चाहेगा,
- 43:25वह वीर है ये कागजी वीर इनकी तो बात ही निराली है, इनकी बात मत
- 43:39किया करो। ये मृत्यु से भयभीत हैं, हर पर
- 43:45सोते, जगते, उठते, बैठते, खाते पीते, मृत्यु से भयभीत हैं और फिर
- 43:50भी मृत्यु आ जाती हैं। चचा जान ये दिन तो किसी तरह भीत
- 43:56जाता है ये रात क्यों आ जाते हैं? ये रात क्यों आ जाते हैं?
- 44:05जीवन तो किसी तरह बीत जाती है फिर ये मौत क्यों आ जाती है?
- 44:13जिससे सारी जिंदगी भर बची। आखिर में बहुत आ गई, फिर क्या खाक
- 44:19बचे? तुम्हारी सारी बचाई हुई
- 44:27चाणक्यनतियाँ फेल हो गईं तुम्हारे बिछाये हुए मोहरे फेल हो गए पल भर
- 44:33में कुदरक ने पल भर में सब छीन लिया तुमसे जो तुम कहते थे।
- 44:41यह मेरा है, यह मेरा है, यह मैं हूँ, कुदरत पल भर में तुमसे छीन
- 44:52लेती है, ना तुम रहती हो ना तुम्हारा कुछ रहता है जिसे तुम
- 44:58कहते थे मैं उसको चार भाई उठा के आग में पटक देते हैं।
- 45:05जिसे तुम कहते थे मेरा उसको तुम्हारे ही पुत्र पुत्रियां आपस
- 45:09में बांट ले तो फिर तुम्हारा था क्या तुम्हारे सिर्फ भ्रम फिर बाद
- 45:20में भी तो टूटेगा ही जीतेगी ही तोड़ दो।
- 45:25ज्यादा अच्छा न रहेगा। तो मैंने कहा कायर व्यक्ति जाली
- 45:32में होता है उसका कारण तो मैं बता दिया क्योंकि कायर समितता है कि
- 45:39इससे पहले के ये मुझे मारे, मैं ही इसे मार दूँ।
- 45:44वीरपुरूष किसी को मारता नहीं वीरपुरूष जानता है कि मैं वीर
- 45:48हूँ, मैं कभी मरूँगा नहीं इसलिए महावीर को वीर की संज्ञा दी गई।
- 45:54नाम तो उनका वर्तमान था, उन्हें वर्तमान नहीं महावीर कहा गया
- 46:00महावीर उनकी उपाधि। अलंकार और वह क्षमा करने में
- 46:09विश्वास करते हैं। क्षमा वीरत से भूषण वह बदला लेने
- 46:14में विश्वास नहीं करते। थोड़ा सा प्रश्न आया है ये मेरा
- 46:20मन किसी से बदला लेने में? जलता रहता है।
- 46:24फिर तुम खुद को ही दंडित कर रही हो।
- 46:26पुत्री बदला जिससे लेना है वो लिया जाए कि ना लिया जाए, ये तो
- 46:35कुछ पता नहीं, लेकिन तुम इस बदले की आग में खुद तो जल रही हो?
- 46:40तुम अपने आपको तो दंडित कर ही रही, बदला जिसे लेना है वो तो पता
- 46:46नहीं लिया जाएगा कि नहीं लिया जाएगा, लेकिन तुम खुद को तो दंडित
- 46:51अभी कर रही हो ना तो ज्यादा बेहतर होगा बदला लेने की भावना छोड़ दो,
- 46:58प्रकृति पर छोड़ दो। वह कभी खैर नहीं गुज़ारा करती तो
- 47:03मुझ पर विश्वास करो। आखिर किसी पर तो विश्वास करोगे?
- 47:10इतनी बड़ी सृष्टियों में ये चाँद तारे, ये ग्रह, नक्षत्र, वातावरण
- 47:17ये काश गंगा ही बनाने वाला कोई तो है।
- 47:20तुम इसको एक तर्क से नहीं तोड़ सकते, तो फिर उसको किसने बनाया?
- 47:27फिर एक संप्रभु सत्ता को तो मानोगे ही?
- 47:34फिर बुद्ध ठहर जाते हैं। जब हमने संप्रभु सत्ता को मानना
- 47:38है तो लाज अरे सुफ्फिसिएंट? प्रकृति को ही मान लो मान लो,
- 47:45किसी को भी मान लो, अगर मानना ही है तो किसी को भी मान लो, लेकिन
- 47:50जिन्होंने परमात्मा देख लिया उनका क्या होगा?
- 47:54कबीर तो कहता है मैं कहता हूँ आंखन देख तुम कहते हो कागज़ की
- 47:59लेखी? और मैं कहता हूँ और वही शब्द मैं
- 48:03बोलता हूँ मैंने देखा है अब क्या कहोगे मेरे बारे में मैं कहता हूँ
- 48:12देखियो रोज़ देखता हूँ हर पल देखता हूँ हर झर्रे में वो ही
- 48:16हैं। बात बात में डाल डाल में हर छाल
- 48:22में वो ही तो है मुझे क्या कहोगे जिसने देख लिया वो परमात्मा वो
- 48:31कैसे मानेगा? लात आर सुफ्फिसिएंट क्या विधि है
- 48:37तुम्हारे पास? कोई व्यक्ति नहीं किसने परमात्मा
- 48:43को अपनी ही नग्न आँखों से देख लिया, वह चाहता हुआ भी दुत्कार
- 48:49नहीं पाएगा। क्यों कोई दिखता ही इतना प्रेमी
- 48:52स्वभाव का इतने प्यारे ढंग से? दिखाई पड़ता है के भोले नहीं
- 48:59बोलते हो। याद न जाए बीते
- 49:23बीते दिनों की जा के न आए जो दिन। दिल क्यों भुला आये उन्हें
- 49:52बीते दिनों की दिन जो पखेरु होते पिंजरे में मैं रख लेता हूँ दिन
- 50:09जो पखेरु होते। पिंजरे में मैं रख लेता पालता
- 50:20उनको जतन से पालता उनको जतन से खाने को।
- 50:31मोती। दे ता सीने से रहता लगा याद न
- 50:43जाए। बीते दिनों की जाके न आए जो दिन
- 50:58दिल क्यों भुलाए, उन्हें दिल क्यों भुला?
- 51:09याद न। जब एक बार देख लिया जाता है तो
- 51:22फिर भलाई से बोल दो ना तुम लाख चाहो वह नहीं भूल पायेगा।
- 51:30याद किया तो तुम भूल सकते हो लेकिन आँखों से देखा वो कभी नहीं
- 51:37भूला जाता कभीर आँख से देख लेते हैं मैंने नग्न आँखों से देखा पलक
- 51:48कैसे भूल जाऊं। नानक ने नगन आँखों से देखा, मीरा
- 51:53ने नगन आँखों से देखा कैसे भूल जाए तुम गलती नहीं हम तुम्हें ठीक
- 52:06ईमानदार घंटे। ईमानदार ऐसे गिनते हैं कि जो
- 52:11तुमने देखा उतना ही तुमने बैठा ही किया।
- 52:15बेईमान लोग वो होते हैं जिन्होंने जाना नहीं देखा नहीं और कहते हैं
- 52:22कि हाँ, हमने देखा। लेकिन यहाँ गलती रह जाती है, उनकी
- 52:28आवाज चमक धमक कहाँ होती है, कहाँ होता है वो शीला अंदाज कहाँ होती
- 52:36है, वो खुशबू कहाँ होता है? वो मदमस्ती का हाल कहाँ वो आँखों
- 52:45में चमक? कहाँ वो आनु से पी हुई आँखें नहीं
- 52:51होती, वो झूमता हुआ जीरा नहीं होता, वो बस यही पहचान है तुम
- 52:58उनको कुछ भी कह दो उनको कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 53:04दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है हमने देखी है जन्नत की
- 53:10हकीकत, लेकिन दिल के बहलाने को ग़ालिब वे ख्याल अच्छा, तुम अपने
- 53:19आपको ठीक कहने के लिए कोई भी तर्क इस्तेमाल कर सकते हो।
- 53:24लेकिन जो आँखों से देख लिया उसपे कोई तर्क का काम नहीं करता।
- 53:30इसलिए बाबा नानक ने कहा। मेरे मन का संसार उतर गए हों मेरे
- 53:56मन का संसार। जब तेरा घर सुन पा ठाकुर ठाकुर
- 54:14ठाकुर तुम सरना। हाय।
- 54:21यो ठाकुर, तुम शरिनाई। मन से भरम तम समाप्त हो जाता है
- 54:38जब आँखों से दिख जाता है खोपड़ी लाख विचार का।
- 54:43खोपड़ी तो आज कुछ सोचती है कल कुछ सोचेगी मन लोभी मन लाडची मन चंचल
- 54:51मन चोर मन के मते नचा दिए फलक, पलक मन और लेकिन ये जो आँखों से
- 54:59दिख गया। और भूले से भुलाया नहीं जाता।
- 55:06उसको क्या कहोगे आप तुम्हारे पास कोई अल्फाज़ नहीं बस उसे तुम ये
- 55:13कह सकते हो वो है नहीं, बस यही है कम से कम इतना भाई मान तो नहीं।
- 55:23देखा तो है नहीं और तुम कह दो की हाँ देखा है, लेकिन ध्यान रखना
- 55:28इंकार भी करने की क्षमता नहीं है तुम्हें तुम इस योग्य नहीं हो की
- 55:32इंकार करो, क्योंकि वह है। देखने वालों देखने वालों ने देखा
- 55:58है धुआँ। किसने देखा दिल मेरा जलता वा
- 56:11किसने देखा दिल मेरा? जलता हुआ कल चमन था, कल चमन था आज
- 56:26एक सेहरा हुआ, देखते ही देखते। ये क्या हुआ?
- 56:38कर चवन देखने वालों ने देखा है धुआँ लेकिन तुम्हें याद करना
- 56:46चाहिए ये धुआँ आग के बिना उठा नहीं करता अगर धुआँ है तो आग भी
- 56:52कहीं ना कहीं है। तो देखने वाले धुएं को देख लेते
- 56:58हैं और समझ लेते हैं कि आग है नहीं, यही गलती खा जाती है।
- 57:03दुआ होता ही वही है, यहाँ आग होती है, इस बात को तुम खौफड़ी धारी
- 57:11समझ न सको। जबकि ये सत्य है प्रमाणित सत्य
- 57:18पुराने जमाने में राजा भटक जाया करते थे तो देखते थे वहाँ धुआँ
- 57:23है, धुआँ है तो व्यक्ति भी होगा, धुआँ है तो आग भी होगी और आग के
- 57:30बाद सिर्फ प्रणी तो नहीं रहते? मनुष्य रह सकता है कबीर को या संत
- 57:41को उपेक्षित करने की चेष्टा मत करना चुप जाओगे, चूक जाओगे।
- 57:53बस तुम जितना देखा है उतना ही बोलते रहो, बहुत अच्छे रहोगे।
- 58:02अनीसा बाद में ताकि अगर ना कतिया ना जाए।
- 58:08जे को कहे पछताए, फिर तुम बाद में पछताना पड़ेगा क्योंकि उसका सही
- 58:14प्रारूप है, वह है और वह हमने देखा है और हम सिस्टम लगा के चले
- 58:22कि वह है धन्यवाद। छोटा सा प्रश्न रह गया आप बाबा
- 58:38बोलते हैं राजनीति के ऊपर बड़े साहस से बोलते हैं भला राजनीति और
- 58:46परमात्मा को इस परिपेक्ष में। कैसे बराबर तो लोगे आप?
- 58:54मैं जानबूझकर बोलता हूँ राजनीति में पुत्र, क्योंकि राजनीति बोलकर
- 59:00मैं तुम्हें साहस भर देना चाहता हूँ और राजनीति में बोला गया
- 59:06साहस। क्योंकि राजनीतिज्ञ अक्सर कायम
- 59:11होते हैं। मैंने पहले भी कहा, राजनैतिज्ञता
- 59:15को जब मैं साहस से बोलेंगे तो तुम्हारे भीतर भी साहस पन होगा और
- 59:23यह साहस तुम्हारे अंतिम बेला में काम आएगा।
- 59:26अंतम पड़ा अभी काम आएगा। पॉइंट ऑफ नो रिटर्न पे काम आएगा।
- 59:30जब तुम्हें कूदने की जरूरत पड़ेगी तो तुम विवेकानंद की तरह
- 59:35चिल्लाओगे नहीं चीख नहीं मारोगे। इस साहस की तब जरूरत पड़ेगी इसलिए
- 59:41पहले से ही मैं तुम्हें परिपक्व कर रहा हूँ।
- 59:44साहस के लिए जहाँ से भी साहस आई। वहीं से इकट्ठा कर लेना चाहता हूँ
- 59:51तुम्हारे लिए क्योंकि साहसी वो एक मात्र कीमियां हैं जो अंतिम वेला
- 59:57में तुम्हारे काम आने वाली है। दायें बाएं ऊपर नीचे जैसे भी हो
- 1:00:05तुम्हें मैं साहस से युक्त कर देना चाहता हूँ।
- 1:00:11इसलिए चाहे मेरे राजनीतिक प्रवचनों से साहस आए, चाहे मेरे
- 1:00:19आध्यात्मिक प्रवचनों से साहस आए, लेकिन ध्यान रखना तुम्हें कायरता
- 1:00:25नहीं आनी चाहिए। तुम साहस को बटोर लेना और तुम
- 1:00:31साहस को अपनी आत्मा में स्टोर कर लेना, क्योंकि यही है एक रसायन
- 1:00:39जिसकी जरूरत पड़ेगी आखिरी लम्हे में जब मैं कहूंगा कूद जाओ जब।
- 1:00:46जम्प ऐट दी लास्ट जंक्चर तो जम्प करने के लिए बड़ी बड़ी साहस की
- 1:00:54आवश्यकता होती है और मैं तुम्हें साहस से भरपूर कर देना चाहता हूँ
- 1:01:00ताकि साहस की गगरिया भर जाए। और इतनी भर जाए कि ऊपर से छलकने
- 1:01:07लगे। इसलिए मैं कहता हूँ मुझे मर
- 1:01:10जीवड़ों की जरूरत है, किसी दे नहीं के मैंने कोई राजनीतिक पद
- 1:01:19प्राप्त करना है, नहीं। फिर तो मैं भी उनकी तरह ही हो
- 1:01:24गया। किसी राजनीतिक पद की ज्योतरी
- 1:01:28मैंने तो तुम्हारे भीतर साहस पैदा करना है।
- 1:01:32मेरा असली मंतव्य तो ये है कि किसी भी तरीके से कुछ भी करके
- 1:01:38तुम्हारे भीतर साहस पैदा करना है और साहस?
- 1:01:44मरने का साहस, साहस इतना साहस गेट दी।
- 1:01:49लास्ट जंपिंग बोर्ड व्हेर देर इस नो रिटर्न उस जंपिंग बोर्ड पर
- 1:01:59खड़े होकर जहाँ से वापस आया नहीं जाता।
- 1:02:02पॉइंट ऑफ फुन्नो रिटर्न वहाँ तुम निसंकोच बिना थर्राए कूद सको,
- 1:02:11नरेंद्रनाथ की तरह, विवेकानंद की तरह तुम चलाओ मत गुरुदेव मेरे माँ
- 1:02:19पापी हैं। मेरे भाई बहन भी हैं।
- 1:02:22चूक गए वो तो, लेकिन तुम मत चूक जाना, ये कॉशन है इसलिए मैं
- 1:02:28तुम्हें बार बार हर बार, हर वक्त साहस से युक्त कर देना चाहता हूँ।
- 1:02:34कायर न कभी पहुंचा है, न कभी पहुंचेगा, वह तो गुलामी ही करता
- 1:02:38रहेगा। उसके तो मुकद्दर में गुलामी ही
- 1:02:44रखी, वो भाग्यहीन व्यक्ति है, जिसने अपने जीवन में साहस नहीं
- 1:02:51कमाया, इसलिए मैं तुमको साहस सीखाना चाहता हूँ।
- 1:02:58साहस। और सिर्फ साहस यही जरिया है।
- 1:03:04यही वो धागा है फौलादी जो तुम्हें अध्यात्म के चर्म शिखर पे भी ले
- 1:03:10जाएगा और जो तुम्हें चर्म शिखर पे जाके कूदने के लिए विभास्य करेगा,
- 1:03:17वह भी तो साहसी होगा। फिर जीस भी तरह से, अध्यात्म से
- 1:03:25राजनीति से या किसी भी तरीके से तुम्हारे भीतर साहस को पैदा करना
- 1:03:30यह मुख्य गुणतत्व है, यह जरूरी लाजिम है।
- 1:03:36इसलिए मैं इसको किसी भी कीमत पर चूकना नहीं चाहता।
- 1:03:41मैं इसको पैदा ही करता चला जाना चाहता हूँ।
- 1:03:47जो मिल गए हँसी को मुकधारी समझ लिया।
- 1:03:56जो मिल गया, उसी को मुख का दर समझ लिया।
- 1:04:04यह भी बड़े साहस का काम है। जो खो गया मैं उसको बुलाता चला
- 1:04:12गया। जो खो गया मैं उसको बुलाता चला।
- 1:04:19गया और फिक्र को धुएं में। उड़ाता चला गया बर्बादियों।
- 1:04:31को शो। मनाना फिजूल था।
- 1:04:39बर्बादियों का शो मनाना फिजूल था, बर्बादियों का जश्न मनाता चला
- 1:04:52गया। बर्बादियों।
- 1:04:55का जश्न मनाता चला गया। और फिक्र को धुएं में।
- 1:05:02उड़ाता चला गया। कौन बर्बादियों का जश्न मना
- 1:05:08पायेगा, जिसमे होगा साहस? जिसमें वो का धैर्य जिसमें वो
- 1:05:15कावसला, वह प्रभातियों को जश्न में तब्दील करने का यह एक कला यह
- 1:05:22एक रसायन विद्या है, इसलिए मैं राजनीति में बोलता हूँ कि तुम
- 1:05:28साहसी हो, उसको तुम राजनीति के विषय को भी अच्छी तरह से सुना हो।
- 1:05:33यह मसला साहस का है, राजनीति का नहीं।
- 1:05:36राजनीति तो महत महत एक ढंग बन गई है।
- 1:05:46राजनीति तो महज एक बहाना है। बर्ना सही तो तुम्हारा हौसला
- 1:05:52बढ़ाना है धन्यवाद।