Latest / Baba ji Vijay Vats / 24 Feb 25 - क्या शास्त्रों से सत्य तक पहुंचा जा सकता है? अखंड आनंद में कैसे प्रवेश करें?
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- 0:06सोम प्रकाश बाबाजी रायदास ने बिना शास्त्रों के कैसे परमात्मा तत्व
- 0:25की प्राप्ति की है? और हम गुरु को कैसे तलाशें?
- 0:47आध्यात्मिक मार्ग में जीत कैसे प्राप्त हो तीन सवाल हैं।
- 1:01आध्यात्मिक मार्ग में जीत कैसे प्राप्त हो हार जाओ, हारना सीख
- 1:13लो। बड़ी उलटी बात लगेंगी।
- 1:20जिसने हारना सीखा, वह जीत गया, जीतने की आकांक्षा ही तुम्हें
- 1:31हरवाते थे। अध्यात्म पर तुम संसार में काम
- 1:41करते करते संस्कार पाली हो के जीतने से ही मिलता है।
- 1:52यूपीएससी का एग्ज़ैम लड़ोगे? कॉंमपिटेटिव एग्ज़ैम लड़ोगे,
- 1:57जीतोगे तो उदा मिलेगा। संसार में रहते रहते तुमने यह
- 2:08संस्कार पर लिया है। के जीतने से ही अध्यात्म में
- 2:16परमात्मा मिलेगा, लेकिन परमात्मा और संसार हैं तो एक ही।
- 2:29दोनों को पाने के रस्ते अलग अलग हैं, संसार मिलता है, संकल्प से
- 2:41परमात्मा मिलता है समर्पण से। आध्यात्मिकता में जीत कैसे पाएं?
- 2:53जीत की अंकाक्षा छोड़ दो, हारना सीखो, हारना सीखो, जो हारना सीखो,
- 3:02जानबूझकर हारना सीखो वैसे तो तुम रोज़ हारते हो।
- 3:11लेकिन वो मजबूरी बस हारते हो चाहते तो तुम जीतना हो लेकिन हार
- 3:16जाते हो, वो हार होती है मजबूरी के मैं कहता हूँ सहर्ष सहर्ष
- 3:25हारना सीखो जैसे तुम किसी बच्चे के साथ खेल रहे हो।
- 3:30और हार जाते हो जानबूझकर हार जाते हो।
- 3:37ऐसा ही आध्यात्मिकता में जानबूझकर हारना सीखो।
- 3:44ये जो उल्टे वचन कहे गए थे ईसा के द्वारा।
- 3:49वे इसी चीज़ की तरफ इशारा करते हैं।
- 3:58दे विल बी फर्स्ट इन माई गॉड्स किंगडम हू विल बी लास्ट इन द
- 4:04क्यूब? जो कतार में आखिरी खड़े होंगे वो
- 4:10मेरे परमात्मा के दरबार में सबसे प्रथम हो जाएंगे।
- 4:19लव से कहते हैं जहाँ बैठ गया वहाँ से मुझे कोई उठा नहीं सका।
- 4:30शिष्य तो झुंड मारकर इकट्ठा हो गया।
- 4:35सभी चाहते हैं जहाँ बैठ जाए, तख्तों, ताश में बैठ जाए, वहाँ से
- 4:41कोई उठाने की जरूरत ना कर सके। बताओ क्या है फॉर्मूला?
- 4:51तो बोला उससे कहने लगी मैं सदा वहाँ बैठ जाता था, जहाँ लोग जूते
- 4:56उतारते थे वहाँ से तुम्हें कौन उठाएगा।
- 5:07सबसे आखिर में खड़े हो जाओ तो परमात्मा के दरबार में प्रथम हो
- 5:12जाओगे, हारना सीख जाओ तो परमात्मा के दरबार पे फतह हो जाएंगे।
- 5:21ये उलटे लगेंगे थ्रोटिकल में। लेकिन प्रैक्टिकल में यह सीधे
- 5:30करके देखो हारना सीखो कितना सुकून मिलेगा जीतने की तमन्ना तुम्हें
- 5:38नर्क में धकेल देती है। आज प्रत्येक व्यक्ति उजड़ा उजड़ा
- 5:45सा नजर आता है। कारण वह जीतना चाहता है और जो
- 5:53जीतना चाहता है वो हारेगा। एक बात और साफ कर दो।
- 6:04अगर तुम संसार में जीत भी गए तो भी हार पक्की है।
- 6:13आध्यात्मिकता तो जीतने से मिलती ही नहीं है।
- 6:17जीतने से मिलता है संसार। और अगर तुम संसार को जीत भी लिए
- 6:24तो भी हार पक्की है क्योंकि खुशी नहीं मिलेंगे।
- 6:32किसी को हरा के बना किसी को खुशी मिली, किसी के रातों की, नींदें
- 6:38छीन के। कभी कोई चैन की नींद सोपा है।
- 6:45यही तो नियम कायदे कानून हैं। परमात्मा के दरबार के जो संत हमें
- 6:51समझाते हैं और हम तालीमार के एक तरफ हो जाते हैं, मजाक उड़ाते
- 6:55हैं। आध्यात्मिकता की राह पे जीत नाम
- 7:08की कोई चीज़ होती ही नहीं आध्यात्मिकता स्वयं में एक हार का
- 7:15दूसरा नाम है हार जाओ, जानबूझ कर हार जाओ, खुशी खुशी हार जाओ।
- 7:24यही बाबा नानक कहते हैं जो तू द पावे सोई पलिकार तू हरवाते तो शुभ
- 7:34तू जीतवा दे तो तेरी रहमत मैं कहाँ जीता, तेरी रहमत से जीता तो
- 7:42मैं कहाँ जीता? मेरी कुशलता से जीता तो जीत थी,
- 7:53लेकिन तेरी रहमत से जीता तो क्या खाक जीता?
- 8:01तो मैं कहता हूँ अगर तुम जीत भी गए।
- 8:05आध्यात्मिकता में अगर तुम जीत भी गए, संसार में अगर तुम जीत भी गए
- 8:10तो वो हार ही होगी। तुम्हारे दूसरे प्रश्न का जवाब भी
- 8:16इसी में आ जाएगा। गुरु को कैसे तलाश है?
- 8:22कहीं भी जाओ। कहीं भी जाओ, कोई रोक टोक नहीं
- 8:28है। पता नहीं कौन किस कोने में आनंद
- 8:34से भरा पूरा परमात्मा मिलिन आनंदपुंज बैठा।
- 8:44कोई पता नहीं, लेकिन एक चीज़ को कसौटी की तरह ले लेना, तुम्हें दो
- 8:55चीजें मिलनी चाहिए शांति और आनंद। अब इनको गौर से समझना शांति
- 9:09नेगेटिव है, आनंद पॉज़िटिव है, शांति रणात्मक है, आनंद विधायक
- 9:21है। शांति तो तुम्हें कब्र में भी
- 9:28बहुत मिलेंगे। शांति तो तुम्हें सोने में भी
- 9:34बहुत मिलती है, लेकिन वहाँ आनंद नहीं होता है।
- 9:42कपड़ों में चिर निद्रा में तुम समा जाते हो।
- 9:48बड़ी शांति होती है लेकिन तुम कभी देखना श्मशान में जाके, वहाँ
- 9:54शांति तो बड़ी गज़ब की होगी, लेकिन आनंद नहीं होगा।
- 9:59और मुर्दा शांति भी कोई शांति होती है।
- 10:05मुर्दा शांति शांति होती है नहीं, हमेशा शांति ही वो होती है जो
- 10:13आनंद के साथ घुल मिल के आए। जो अकेली शांति आए, वह तो मृदानगी
- 10:21लाती है। ओम शांति सब मुर्दों का जमघट है।
- 10:29कहीं कोई आनंद की लहर नहीं, शब्दों की बकवास है।
- 10:38खोपड़ियों की बक बक है हिसाब किताब है, कुछ प्रमाणित करके
- 10:50इच्छाएं हैं कुछ पाने की इच्छाएं। मेरे पास एक ओम शांति
- 11:08ब्रह्माकुमारियों की एक बैठी आ गई बाबा मुझे पीएचडी की उपाधि मिल गई
- 11:15कहाँ ये तो धार्मिक समुदाय है? यहाँ उपाधियों का काका?
- 11:27यहा तो गिरना होता है मिट्ठ तनिमी नान का गुण चंगियाणी आता।
- 11:35पर यहा तो मिट्ठ जाना होता है उपाधियाँ तो तुम्हें अहंकारी
- 11:44बनाती है। तो ओम शांति में उपाधियों का क्या
- 11:52मतलब? तो बिटिया तुम गलत जगह फंस गई हो,
- 12:00ध्यान रखना ये भी तुम्हें कॉम्पिटिटिव बना रहे हैं।
- 12:05और जो कॉम्पिटिशन में दगेले जो मुकाबलेबाजी में दगेले वो तो
- 12:10जीतना चाहता है और संत कहते हैं कि हारने का नाम है ज़िन्दगी।
- 12:24जीतने का नाम है बहुत और यहाँ तो धर्म भी जीतना सीखा रहे है।
- 12:36ये काहे का धर्म होगा मिटके मिलती है मोहब्बत।
- 12:47ये तो मिटना सिखाती नहीं, ये तो बनना सिखाते हैं और ज्यादा बनना
- 12:56सिखाते हैं और ऊंचे हो जाओ और ऊंचे हो जाओ।
- 13:06मुझे लोग कह देते हैं इनके 200, 300 यूनिट्स हैं।
- 13:16विदेशों में मैंने कहा फिर विदेशों में कौन सा मूर्खों की
- 13:21कमी है? तुम क्या समझते हो?
- 13:24अकेले हिंदुस्तान में ही मूर्ख हैं, विदेशों में बड़े मूर्ख हैं
- 13:32मेरे भाई बड़े भाई जब अमेरिका से आते हैं तो मुझसे बातें करते हैं।
- 13:39मुझे कहने लगे कि अंग्रेज लोग। रिकॉर्ड होते हैं जो हमारे पुराने
- 13:46जमाने करते हैं, उनके ऊपर हमारी आरती ओम जय जगदीश सहरे स्वामी जय
- 13:55जगदीश सहरे यह लगा लेते हैं और नाचने लग जाते हैं खूब।
- 14:04समझ तो उनको आता नहीं क्या है, बस धुन प्यारी है और इन्होंने तो
- 14:11शरीर तोड़ना है, आरती पे तोड़े के नागिन डांस पे तोड़े, इससे कोई
- 14:17फर्क नहीं पड़ता। आई एम यौर्स यू आर माइंड इस पे
- 14:23तोड़ें या ओम जय जगदीश हरी पे तोड़ें शरीर तोड़ना है सिर्फ शरीर
- 14:30तोड़ के थक जाना है और भी रस्ते हैं शरीर तोड़ने के आशा मत करो ये
- 14:39उनको आजमा लेते हैं। और इसमें ही प्रसन्नता मिलती है
- 14:51तो भला है मैं भी यही कहता हूँ तुम्हें जहाँ आनंद मिले शांति से
- 15:00लिबड़ा हुआ आनंद बस वो ही तुम्हारी मंजिल लागे।
- 15:05लेकिन आनंद आनंद होना चाहिए, आनंद अखंड होना चाहिए, टूटे नहीं।
- 15:16बस मेरी इसी बात को नोट कर अखंड आनंद जहाँ आ गया।
- 15:25शांति से लबड़ा तबड़ा शांति से ओतपरोत तुम्हारी मंजर फिर वहाँ से
- 15:41हटने को तुम्हारा जी ही नहीं करेगा।
- 15:46इसलिए अखंड आनंद बोलता हूँ मैं वो आनंद जो वास्तविक है वस्तुओं से
- 15:55भी तुम आनंद लेते हो अखंड नहीं होता टूट टूट जाता है।
- 16:02तुम फिर फिर जाते हो उन अनुभवों में फिर फिर हाथ तोड़ते हो,
- 16:10दौड़ते हो और इसको कहते हो आनंद आया आता है अगर आता अखंड आनंद।
- 16:22तो फिर अगले दिन शरीर को क्यों तोड़ते हैं?
- 16:26नहीं आता। गुरु गो कैसे तलाशें?
- 16:34कहीं जाओ, किसी के पास जाओ, डेरों में जाओ, काबा में जाओ, तीर्थों
- 16:41में जाओ, मक्का में देना जाओ। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा कहीं
- 16:47भी था अखंड आनंद मिले बस वहाँ ठहर जाओगे, तुम वहाँ बैठने का मन
- 17:01करेगा और बैठ ही जाओगे बस। जहाँ अखंड आनंद मिला वहाँ तुम बैठ
- 17:08ही जाते हो यह पहचान वह आनंद जो कभी टूटता नहीं वह सुगंधी जो कभी
- 17:25जाती नहीं बस एक बार आती है। और वापिस कभी नहीं जाते ऐसा आनंद
- 17:39जहाँ मिल जाए शांति से ओत प्रोत आनंद तो तुम्हें तुम्हारी मंजर
- 17:46मिल गई। बस उसी को गुरु बना लेना।
- 17:53लोग मेरे पास यहाँ भागे आते हैं। अभी कल ही किसी मित्र को कमेंट
- 18:01आया बाबा मैं यहाँ आया। यहाँ के मनेजमेंट जो करने वाले
- 18:14हैं उन्होंने मुझे जाने नहीं दिया।
- 18:18बस कहते सिर्फ दर्शन करो और आ जाओ इतने लोग मत बुलाया करो ना।
- 18:28आपको व्यवस्था में बदलाव करना होगा।
- 18:36मैं इस बच्चे से क्या कहूं? जैसे तुम्हारी तमन्ना है, वैसे
- 18:44इनकी भी तमन्ना है। अगर मेरी बात तुम समझ गए होते तो
- 18:50मेरी बात ये भी समझ गए होते। मैं तो सदा से बोलता हूँ कि जब भी
- 18:57मिलेगा तुम्हें या किसी को अपने ही भीतर से मिलेगा।
- 19:07लेकिन तुम भी यहाँ आने को तत्पर हो फिर दूसरे क्यों न होंगे?
- 19:17लेकिन ज़रा सोचो बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने चार वर्ष पहले।
- 19:26दीक्षा के लिए अप्लाई किया था और मुझे यह बात कहते हुए अफसोस होता
- 19:33है कि उन्हें अभी तक दीक्षा के लिए बुलाये नहीं है।
- 19:38क्या इसका कारण क्या है? तुम कहते हो ज्यादा रश मत किया
- 19:45करो। ये रश करने वाले कौन रश करने वाले
- 19:54आप ही हो जो दीक्षा ली गए दीक्षा के बाद फिर फिर मुड़ मुड़ के
- 20:03दर्शन, फिर फिर मुड़ मुड़ के दर्शन।
- 20:07अति लोभ तुम्हें खेंच लाता है, पर मैं सदा ही तुम्हें कहता हूँ, अति
- 20:15लोभ से वचन अति लोभ तुम्हारे भीतर संस्कार पैदा करता है।
- 20:28कि जो मिलेगा बाबा के यहाँ से मिलेगा एक हाथ दुबारा आओ जब तुम
- 20:37भिक्षा लेके जाते हो यहाँ 10 5 मिनट बैठते हो मैं अपना भरपूर
- 20:44सान्निध्य तुम पे फेंकता हूँ। और वो काफी है।
- 20:53जीरा तो सबका करेगा, कौन है ऐसा जो जाना चाहता है कोई नहीं
- 21:02प्रत्येक व्यक्ति कहता है बाबा यहाँ से जाने को दिलाय करता।
- 21:07मैं कहा तुम बेटा यहाँ पर स्थान भी तो नहीं है, अब तुम नहीं जाओगे
- 21:15तो दूसरे कैसे आ पाएंगे? उनको भी तो आने का मौका दे दो।
- 21:26और दूसरे खाली वक्त भी गंभीरता आ सकते हैं।
- 21:32दूसरे खाली वक्त में क्यों नहीं आ सकते?
- 21:37झुंड के साथ जरूर ही आना है। कभी मैं मस्त होता हूँ।
- 21:49तो यहाँ की देख रेख करने वाले मनेजमेंट करने वाले मजबूर हैं जब
- 21:57जब मैं ही मस्ती में पड़ा हूँ। तो वो आपको कैसे बुला लें?
- 22:07उनको खुद को ही जहाँ आने के जायद में ऐसा करना उचित नहीं होता,
- 22:19इतने लोग ही मत बनो। कि तुम भूल ही जाओ कि तुम्हें
- 22:25तुम्हारे भीतर से मिलेगा, इसको सदा ही दोहराते हो मैं कहता हूँ
- 22:31राधे राधे मत करो, यही करो अपने भीतर से मिलेगा।
- 22:41जीसको मिला अपने भीतर से मिला आज तलक बाहर से किसी को।
- 22:53नहीं मिला। मानसरोवर, अंसपयो, मानसरोवर ताल
- 23:15तलैया क्यों ढोले। हाँ मन मस्त।
- 23:22हुआ फिर क्या? बोला मन मस्त।
- 23:29हुआ तो क्यों? बोला?
- 23:37तेरा साहब। है तुझे माहि।
- 23:46तेरा साहब है, तुझे माहि बाहर। बाहर नैना क्यों खोले?
- 24:07मन मस्त हुआ। फिर क्यों बोल?
- 24:14मन मस्त हुआ। तो क्या बोले?
- 24:25यहाँ से कुछ तो सीख के जाओ मूर्ख लोग अपने ढेरों में।
- 24:33जब मावड़ा इकट्ठा करना चाहते हैं और मैं तुम्हें सीधा राह बताता
- 24:40हूँ, यहाँ से सिर्फ एक संस्कार लेके जाना एक आग।
- 24:53आग की चिंगारी लग जाएगा वो चिंगारी भड़क उठ है, अपने ठो
- 25:04ठिकाने चले जाओ, रोज़मर्रा के काम भी करना आराम से।
- 25:13और ध्यान भी करना है तो आनंद और शांति ज्यादा दूर नहीं, मैं तो
- 25:23रोज़ कहता हूँ, सच पूछो तो आनंद और शांति तुमसे दूर है ही नहीं,
- 25:28तुम ही हो। लेकिन क्या करूँ?
- 25:33तुम। ख्वाबों में इतनी दूर निकल गए हो
- 25:36कि तुम्हें याद भी नहीं आता कि तुम हो कौन यही याद करना रिमेम्बर
- 25:53दायसल। अपने आप को याद करो, तुम हो कौन
- 26:00यही है, पर मैं कभी नहीं कहता कि तुम आईएस न बनो, पीसीएस न बनो।
- 26:12बिल्कुल अपने पांव पे खड़े हो किसी के ऊपर बोझ क्यों बनते हो
- 26:22अपने पांव पे खड़ा हो खुद कमाना और मौज मस्ती में रहना।
- 26:35फकीरी की तरह खाना सम्राट की तरह जीना भीतर से बाहर से ये चार छः
- 26:45सूट बदलने की आवश्यकता नहीं होती। फकीरी में फकीरी में दिखाना भी
- 26:51नहीं होता। फोटो वोटो मत खचाया करो।
- 26:58मूर्खों के काम है दिखावा मूर्ख किया करते हैं जिनके पास कुछ है
- 27:06नहीं थोथ चना बाजे गनू। जिनके पास है वो तो लुत्फ उठाया।
- 27:22करता है ईरोपयो। गांठ।
- 27:27गठयायो ईरोपयो। गांठ गठ।
- 27:37आयो और वार। बा को क्यों?
- 27:46खोलें। मन मस्त हुआ।
- 27:53फिर क्यों बोले? क्यों आते हैं यह वहाँ के तेरा
- 28:02साहब है तू जमा ही बाहर नैना क्यों खोला देखो मैं तुम्हे सत्य
- 28:13उपदेश देता हूँ। इसमें ज़रा भी झूठ नहीं है।
- 28:17फिर तुम यहाँ क्यों भागते हो बताओगे?
- 28:21मुझे लालच के पशु भूत कभी कभी विश्वास डगमगाने लगे।
- 28:39तो आ जाना लेकिन मार्ग न बदलना ये मत कहना के वो नहीं है मुझसे लोग
- 28:54पूछ लेते हैं परमात्मा के। होने का प्रमाण मैं कहता हूँ
- 29:11प्रमाण एक ही है क्या है बाबा मैंने देखा है।
- 29:22और इसके अतिरिक्त प्रमाण हो भी नहीं सकता।
- 29:29मैंने देखा है इसके अतिरिक्त कोई प्रमाण नहीं होता है।
- 29:38तुम क्या कहते हो? तुम आए तुम्हारी चार बातें बता
- 29:42देना, वो तो फेसबुक में मिल जाएंगे तुम कहाँ गए थे?
- 29:49तुम खुद ही डाल देते हो इंस्टा पे फेसबुक पे तो कोई भी बता सकता है।
- 29:58तुम्हारे चार पड़ोसियों से पूछा जा सकता है कि तुम कौन हो भाई,
- 30:03तुम्हारे पिता के नाम तुम्हारे दादा के नाम कोई मुश्किल बात नहीं
- 30:09पाखंडी लोग अक्सर यही करते हैं टोपी मार्क का।
- 30:17और कोई से देवीदीन नहीं है। इनकी पोल आज इन्हें कल खुल जाएंगे
- 30:27झूठा कभी झूठ से पहुँच पाए इनके चेहरों की मृदानगी देखो क्या
- 30:36उम्रें हैं इनकी चेहरे पर मृदानगी है।
- 30:44कोई खुशी के लहर दिखाई नहीं पड़ती।
- 30:48आभा मंडलिन का काला जैसे ठगों का होता है, चोरों का होता है,
- 30:55बेईमानों का होता है, जूठों का होता है।
- 30:58और झूठा व्यक्ति ध्यान रखना झूठा व्यक्ति परमात्मा तक नहीं पहुँचता
- 31:05और जिसने परमात्मा को खो दिया फिर उसने कुछ भी पा दिया पड़ी।
- 31:16विराट चीज़ खो के तुम कुछ भी पाल दाव बड़ा लगा तुम बड़ा दाव हार
- 31:24गए, छोटे छोटे दाव जीतते रहो, वो पूर्ति नहीं कर सकेंगे।
- 31:32विराट को खो के धन कमा लिया। ठगी मार ली।
- 31:37रिश्वत दे के मुकदमा जीत गए झूठ बोल के भाई का हड़प लिया माँ बाप
- 31:52के कान भर के। मित्र का या भाई का हड़प लिया
- 31:58तुमने बड़ा दाम लगा दिया और बड़ा दाम तुम हार गए छोटे छोटे दाम तुम
- 32:04जीत जाओ, कोई फर्क नहीं पड़ता। छोटे छोटे दाम बूंद बूंद से कितना
- 32:11इकट्ठा कर लोगे, समुद्र का इकट्ठा होगा।
- 32:16समुद्र तो समुद्र है और समुद्र को खो के तुम बूंद को इकट्ठा कर लेते
- 32:23हो, बस यही तुम्हारी फितरत है सदा से तुम यही करते आए हो तुमने खोया
- 32:31ग्राट को। पाया बाँध को, लेकिन भीतर झांक के
- 32:39देख देखोगे तृप्ति और इसी तृप्ति को परमात्मा कहते हैं कभी?
- 32:54कबीर कहते हैं, धन, पालिया, हीरे, जोहरात, पालिया सब पालिया जब आवे
- 33:02सन्तु खजाना। लेकिन तृप्ति नहीं मिली तो खाया
- 33:07क्या? खा खाया खानो तो वह।
- 33:14जो सिर्फ भूख ही न मटाए, तड़पती भी दे दे और भूख तो चाहे आंधी ही
- 33:21मटे, तड़पती पूरी आ जाए, इसलिए जो जानते थे, उन्होंने कहा।
- 33:34युक्ताधार बिहार से आधा पेट खा लो, तृप्ति होनी चाहिए।
- 33:51अगर तृप्ति नहीं हुई तो फिर खाने का कोई फायदा नहीं, तुम भूख को
- 33:57मिटा सकते हो। सुबह शाम तक मैं देता हूँ देखता
- 34:01हूँ गोलगप्पा टिकिया चाउ मन चोंगा क्या करने खाते हो तुम मुझे तो
- 34:12नाम देने पता है सेवियां सोमियां सी होती हैं ना इनको खाते कैसे
- 34:17हैं मैं तो ये समझ नहीं आती। गले में फंसती नहीं है, हैरान की
- 34:26होती है बस तुम कहते हो बड़ा स्वाद था संत हस्ता है क्योंकि
- 34:39संत ने असली स्वाद जान। संत ने बहुत स्वाद जाना जो खंडित
- 34:46नहीं होता, जिसका छोर तोड़ता नहीं।
- 34:55दोनों छोर अखंड बने रहते हैं। हिलते नहीं अकंप हैं।
- 35:14तीसरा परसेंट हमारा रैदास कैसे पहुंचे?
- 35:17बिना शास्त्र के शास्त्र तो वाले हैं जिनके पास शास्त्र हैं।
- 35:30वो देरी से पहुँच चूके हैं। मैं रोज़ देखता हूँ, मेरे पास
- 35:35प्रश्न आते हैं, इन शास्त्रों के उनमें से सवाल पूछे जाते हैं, मैं
- 35:43कोई जवाब नहीं देता, मैं जानता हूँ शास्त्र कूड़ा।
- 35:51बहुत बार बोला भी है इन्हें जला क्यों नहीं देते हैं, इनको गंगा
- 35:58स्नान क्यों नहीं करवातें कौन से चल रहा है बड़े मजेदार दिन?
- 36:04इनको मुक्ति दिला दो ये बेचारे कब के तरफ से हैं?
- 36:09खुद मुक्त नहीं हो गए। तुम्हें मुक्ति क्या कहकर बड़ी
- 36:19अजीब बात है? जीवंत प्राणी मृदा शास्त्रों से
- 36:27जीवन का ढंग पूजता है। मजेदार बात है, अजीबोगरीब बात है।
- 36:37जीव का प्राणी मुर्दा शास्त्रों से जीने का ढंग पूछता है, क्या
- 36:44बताएंगे आपको? बेचारा बोलते नहीं बेजुबान है।
- 36:52पशुओं से गए गुजरे हैं पशु सिर्फ बेजबान होते हैं, चलते फिरते तो
- 37:00हैं वस्त्र तो पड़े रहते हैं चल फिर भी नहीं सकते बेचारे।
- 37:09इनको क्यों नहीं समाधि दे देते? इनकी मुक्ति करा दो।
- 37:13महाकुंभ भी चल रहा है। अच्छे दिन भी चल रहे हैं।
- 37:19अमृता कार भी चल रहा है। इस वेला में मुक्ति शीघ्र हो
- 37:24जाएगी। शास्त्र वादन है शास्त्रों के साथ
- 37:43तुम देरी से पहुंचोगे अगर जीवित शास्त्र मौजूद हों रियादास का
- 37:53बचपन का नाम रवि। रबिकार्थ सूर्य होता है और वह
- 38:07मानवता के क्षितिज में सूर्य की तरह चमके।
- 38:15ऐसे चमके। क्यों?
- 38:20उन्होंने बता दिया कि यहाँ सूद्र कोई नहीं सूद्र सिर्फ तुम्हारी
- 38:31बनाई हुई पाखंड की धारणा। अरे दास कैसे पहुंचे जीवत गुरु के
- 38:43आश्रय पहुंचे जीवत गुरु ही ललकार सकता है तो मैं जीवत गुरु
- 38:50तुम्हारी सोई हुई चेतना को जगा सकता है चेतना तो तुम्हारे भीतर
- 38:54है, बस सो गई। उसे जगाने के लिए शास्त्र कामना
- 39:03है। शास्त्र तो खुद बोझा है तो
- 39:07शास्त्र को तो जला दो बहा दो, शुभ वेला है जीवंत, गुरु को अपना दो।
- 39:20अभी ये दुनिया इतनी सोनी नहीं हुई, कोई जीवत गुरु न मिले अभी
- 39:25हैं जागो जागो जागो। सोये मत रहो अगर अब भी सो गए तो
- 39:49सब खोदोगे। उठ जाग मुसाफिर भोरभे अब रहनू।
- 40:09कहाँ? जो सो तू?
- 40:12है उठ। जा के मसा फिर भोर भाई।
- 40:24अब रहन कहा जो सोवत है जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत
- 40:43है। जो सोवत है सो खोवत है, जो जावत
- 40:58है सो पावत है। जो जागत है सो पावत है।
- 41:12उठ जाग मसा। फिर भोर भय।
- 41:20सुबह हो गई। हम बाग दे चले नहीं उठोगे कसूर
- 41:29तुम्हारा हमारे ये शब्द बोलते रहेंगे इतिहास में दरस।
- 41:41और तुम्हारी आने वाले पुश्ते हैं तुम पर थूकेंगे कि तुम क्या कर
- 41:51रहे थे उस वक्त जब तुम्हें झंझोड़ा जा रहा था, तुम उठे क्यों
- 41:56नहीं? तुम कर क्या रहे थे तब बताओ मैं
- 42:06तुमसे पूछता हूँ आने वाली पुस्तक तुमसे पूछना उस एक महामानव ने।
- 42:24अगर आकाश क्यों ने बुलंदियों को छू लिया तो आप में क्या कमी है?
- 42:32कुछ है कुछ आप में कमी है आपने हजारों साल होगा स्त्रियों ने तो
- 42:41सभी ने बोखा चाय को ब्राह्मण के। चाहे वैश्य, सूत्र, क्षत्रिय किसी
- 42:47के भी थे। स्त्रियों ने तो सभी ने बोला और
- 42:51स्त्री में सोए पड़े, ऐसा लगता है सोने की लत लग गई है।
- 43:00यू अरे एडिक्टेड टु स्लिप? सोने के भ्रष्ट हो गए तुम जागना
- 43:09तो मेरा स्वभाव नहीं है, ऐसा मत करो आने वाली पुस्तक।
- 43:24की कुछ खबर आने वाली पुश्तों की नगाह बांध रहे हो वो तो मैं क्या
- 43:30कहें? सब गुम हुआ जा रहा है।
- 43:39तो मैं चेता देता हूँ मैं और हमारा काम सिर्फ चेतना है।
- 43:46चेताते तो पहले भी रहे लोग तुम भूल गए, भूलना तुम्हारा स्वभाव
- 43:55है। बोलने वाले तो बोल के गए लेकिन
- 44:00तुमने सुना नहीं तुम नींद की मस्ती में खोए रहे हो।
- 44:04सुबह की ठंडी हवाएं तुम्हें लोरी की तरह सुलाती रहेंगी।
- 44:11मुनीर नियाजी की गज़ल मुझे बड़ी अच्छी लगती है।
- 44:17हमेशा देर कर देता हूँ मैं जरूरी बात कहनी हो, कोई वादा निभाना हो,
- 44:30उसे आवाज देनी हो, उसे वापस बुलाना हो।
- 44:36हमेशा देर कर देता हूँ, मैं मदद करनी हो, उसकी यार का ढांढस
- 44:48बढ़ाना हो, मदद करनी हो उसकी यार का ढांढस बढ़ाना हो।
- 44:57बहुत देरी न राहों पे किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता
- 45:10हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो।
- 45:17बदलते मौसमों के सैर में दिल को लगाना हो, किसी को याद रखना हो,
- 45:25किसी को भूल जाना हो, हमेशा देर कर देता हूँ।
- 45:34और यह पंक्ति मुझे हमेशा रुला जाती है।
- 45:38किसी को मोत से पहले किसी गम से बचाना हो, किसी को मोत से पहले
- 45:48किसी गम से बचाना हो, हकीकत और थी कुछ।
- 45:55उसको जा के ये बताना हो हकीकत और थी कुछ उसको जा के ये बताना हो
- 46:05हमेशा देर कर देता हूँ मैं तुम देर मत करना।
- 46:16गया हुआ वक्त वापस नहीं आया करता, आने वाली नसलें तुमसे सवाल पूछे,
- 46:31क्या आने वाली फसलें तुम्हें कहेंगी?
- 46:37हमारी देख रेख क्यों नहीं कहाँ गया हमारा हक क्यों नहीं पहरा
- 46:48बिठाया क्यों नहीं आवाज दी? क्यों रहे सोये पड़े झंकार की
- 47:00आवाज दी क्यों रहे सोये पड़े झंकार की झंकार दी अलफाज़ की कहाँ
- 47:11गए थे तुम? क्यों नहीं झंकार दी?
- 47:13तुमने क्यों नहीं कुछ अलफाज़ तुम्हारे मुँह से निकले क्यों
- 47:17नहीं तुम्हारे ओठ फड़ फड़ाये आने वाली पीढ़ियों का सवाल है आज बता
- 47:27रहा हूँ तुम्हें? संभल जाओ।
- 47:37वैसे तो मौका नहीं रहा लेकिन फिर भी थोड़ा बाकी है।
- 47:44अभी जाग गए तो संवर सकता है ये मकान।
- 47:53बको ध्यानम, स्वानिद्रा काकच्येष्ठ, बको ध्यानम,
- 48:01स्वानिद्रा काकच्येष्ठ ये पहरेदार के लक्षण है।
- 48:10तुम सोये मत पड़े रहना। लगीवाले ता लगीवाले ता क देबी ना
- 48:25सुंदे तेरी की मैं। अख लग गई लगी वाले।
- 48:38ताक? दे भी ना, सो दे तेरी की मैं अख
- 48:45लग गई अख लग गई। दोहे पख लग गई अंदर वख लग गई, उधर
- 49:00वख लग गई लगी वाले। लगी वाले तक।
- 49:06दे भी ना सोंदे? सौंदे तेरी क्यों आँख लग?
- 49:16गई आंख लग गई तेरी क्यों आंख लग गई?
- 49:25पहरेदार तो कभी सोते नहीं। जिनकी लग जाती है उसके साथ यारी
- 49:34या इसके साथ यारी यहाँ की प्रेमिका हो या वहाँ की प्रेमिका
- 49:39हो जहाँ का प्रेमी हो या वहाँ का प्रेमी हो कभी सौते न हो।
- 49:48लगी बाले कदे भी ना सो दे। तेरी के में।
- 49:56अख लग गई। अख लग गई तेरी तो दोनों तरफ लग
- 50:03गई, उधर भी लग गई और उधर भी लग गई।
- 50:06तुम्हें पख लग। गई।
- 50:10इधर। वख लग गई और उधर वख लग गई।
- 50:15लकी वाले लकी वाले ताक दे भी ना सुन दे।
- 50:24तेरे के में। हक?
- 50:26लग गई तेरी के में। हक लग।
- 50:31गई। श्री कृष्ण।
- 50:38गोविंद अरे मुरारी। हे नाथ नारायण वासुदेव?
- 50:52श्रीकृष्ण गोविंद हरे। मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।
- 51:07पितुमात स्वामी सखा हमार पितुमात स्वामी सखा हमार।
- 51:20हे नाथू नारायण, वासुदेव, श्रीकृष्ण, गोविन्द, हरे मुरारी।
- 51:37हेनाथ नारायण वसुदेवा पितुमात स्वामी सखा हमा।
- 52:01पितुमात स्वामी सखा हमार हेनाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण
- 52:13गोविंद। हरे मुरारी रे नाथ नारायण वासु
- 52:24देववा। धन्यवाद।