Latest / Baba ji Vijay Vats / 9 Jan 25 - या तो विराट हो जाओ, या राख हो जाओ! क्रिया और कर्म में क्या फर्क है? गीता का ज्ञान!
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- 0:14योगस्थः गुरु कर वाणी संगम तृप्तवा तनय जया सिद्ध प्रसिद्ध।
- 0:29समभूतवा समध्वम योग उच्चते भगवान कृष्ण कहते हैं।
- 0:53तो दोनों अतियों को छोड़ते हैं या फिर अतियों पर हो जा थोड़ा
- 1:07मुश्किल पड़ेगा समझ में आना लेकिन व्याख्या करके समझाऊंगा सम तुम
- 1:15योग उच्चत है सम हो जा। आपने घड़ु का कड़ी का पेंडुलम
- 1:22देखा होगा इधर चलता है इधर चलता है, इधर चलता है एक ऐसा प्वाइंट
- 1:33आता है उसके दोनों अतियों के बीच में।
- 1:39जब वह सम हो सकता है, ठहर सकता है, लेकिन वो ठहरता नहीं है इसलिए
- 1:51वो चलता ही रहता है। कृष्ण का ये सूत्र फिर जीवन को
- 2:03जीने का ढंग सखाता है। बाहर से बहुत कुछ बदल जाता है।
- 2:14कोई बेला था जब हम भोज पत्रों पे लिखा करते।
- 2:19थे। पंखों की कलम बना लेते थे और उससे
- 2:31हम भोज पत्र में लिखते थे, वो भी बेला था, ज़माना बदलता गया, बदलता
- 2:42गया टाइपराइट रहा गया। कंप्यूटर आ गया।
- 2:51आज ऐसा ज़माना है कि तुम बोलो कंप्यूटर लिख के दे देगा तुम्हें
- 3:02ये तुमने बोला है। और कोई ऐसा।
- 3:06ज़माना भी आ सकता है कि तुम बोलो भी ना तुम सोचो और कंप्यूटर
- 3:15तुम्हें लिख के दे दे कि तुमने ये सोचा है ये मुश्किल नहीं है।
- 3:27अगर जुबान को पकड़ सकता है कंप्यूटर तो भावनाओं के विचारों
- 3:34को भी पकड़ सकता है। आपने देखा होगा।
- 3:41सुहानी शाह का नाम सुना होगा तुमने कुछ भी न बोलो, वह माइंड
- 3:51रीडिंग करके बता दे कि तुमने क्या सोचा है?
- 3:58यह भी एक विद्या? है।
- 4:06ऐसा वक्त आ सकता है कि साइंटिस्ट ऐसी मशीन तैयार कर लें।
- 4:13तुम क्या सोचते हो वह कंप्यूटर लिख के बता दे कि तुम ये सोच रहे
- 4:20हो? और ऐसा भी वक्त आ सकता है कि अभी
- 4:26जो विचार नहीं बना, अभी जो भावना ही नहीं बना, वह जो भीतर से उपजा,
- 4:36अंकुरित हुआ, उफान उठा। तभी बता देगा कंप्यूटर कि
- 4:43तुम्हारे भीतर ये तूफ़ान उठ रहा है ये काम का है, क्रोध का है,
- 4:49लोभ का है, मोह का है, अहंकार का है या मधु मत्सर का है?
- 5:01बाहर का ज़माना बदल गया। रोज़ बदलता है बदलता जाएगा कितनी
- 5:11सभ्यताएं नष्ट हो गई अपने पीठ को छूकर और कितनी डेवलप हो रही हैं।
- 5:21अपनी पीठ तक जाएगी। एक्स्ट्रीम से वापस हो जाती है
- 5:26उसको प्रज्ञा कहते हैं जैसे पेंटुलम जाता है, एक छोर पे जाता
- 5:33है, लेकिन एक दूरी तक जाता है और वहाँ से वापस आ जाता है।
- 5:40फिर दूसरे छोर पर जाता है एक दूरी तक जाता है फिर वापस आ जाता है
- 5:50ज़माना बदल गया भोज पत्र पे लिखते थे कभी।
- 5:59आज हम बोलते हैं लिखा जाता है सब बदल गया लेकिन एक चीज़ नहीं बदली।
- 6:10क्या नहीं बदली? जिसे भगवान कृष्ण गीता में बारबार
- 6:15कहते हैं वह कभी बदलता नहीं। ही इज़ नॉट चेंजेबल।
- 6:25उसमें परिवर्तन नहीं होता, वह अपरवर्तनशील है, बाहर सब बदल
- 6:34जाएगा, तुम्हारे इंस्ट्रुमेंट बदल जाएंगे।
- 6:39लेकिन जीवन नहीं बदलेगा। कृष्ण जी से जीवन कहते हैं उसे
- 6:49तुम आज तक समझे नहीं और जीस दिन समझ रहे होगे।
- 6:54उस दिन उससे आगे कुछ है नहीं। तुम जो मरे मरे फिरते हो, भटके
- 7:03भटके फिरते हो, उदास परेशान, थके, थके, हारी नासूर की तरह ये
- 7:15ज़िन्दगी चौती है। और जब ये ज़िन्दगी नासूर की तरह
- 7:24चुभती है, तुम कुछ भी बोलते चले जाते हो, तुम कुछ भी करते चले
- 7:31जाते हो यह तुम्हारे भीतर का दुखड़ा व्यायाम करते हैं,
- 7:38तुम्हारी हलचल, तुम्हारी उथल पुथल।
- 7:45जब उथल पुथल नहीं होती तो व्यक्ति मौन हो जाता है और जहाँ उथल पुथल
- 7:54नहीं होती वहाँ पर मौन होता है। देखिए बड़े गहरे शब्द हैं।
- 8:03आपको भी सुनने के लिए उतना ही मौन होना पड़ेगा।
- 8:13मुझे सुनते वक्त पूर्वाग्रहक छोड़ देना है।
- 8:22फिर सुनने के बाद चाहे तो पूर्व ग्रह अपना लेना मुझे कोई आपत्ति
- 8:27नहीं, लेकिन जब मुझे सुनो तो पूर्व ग्रह छोड़ देना तभी मेरी
- 8:35बातें आप सही से सुन पाओगे। उसी को श्रावक कहते हैं महावीर।
- 8:42और उसी को शिष्य कहते हैं। गुरु नानक, जो सही सही सुन सकता
- 8:50है कि क्या बोला गया है समतुम योग उचित है?
- 9:06वर्षों वर्षों से ये शब्द संतों को प्रभावित करता रहा है।
- 9:15ज़िन्दगी के जीने का ढंग है, शम हो जाना।
- 9:24योग उच्चते जब तुम मिल जाते हो उसमें तो सम हो जाते हो उस उच्च
- 9:38तुम सतह पे जब तुम चले जाते हो सम तुम योग उच्चते।
- 9:46तो तुम शम हो जाते हो, शम न हानि, न लाभ, न क्रोध, न अक्रोध।
- 10:03ना डाका ना दान जहाँ कोई हलचल नहीं होती जहाँ सब ठहरा है ज़रा
- 10:23सी भी हवा किसी पत्ते को हिलाती नहीं।
- 10:34जहाँ पत्ते के गिरने का शोर भी नहीं होता वहाँ पहुंचना है
- 10:43तुम्हारी जरूरत और जीस दिन तुम वहाँ पहुँच ही जाओगे।
- 10:52उस दिन तुम्हारे लिए शास्त्र बेकार हो जाएंगे।
- 10:58उस दिन तुम्हारे लिए गुरु बेकार हो जाएंगे।
- 11:01मार्ग बेकार हो जाएंगे, वहाँ जाकर ही नानक बोल सकते हैं।
- 11:10ज़ोर न जुगती छोटे संसार बस अब संसार से छूटने के लिए किसी
- 11:18प्रकार की युक्ति की जरूरत नहीं है अब मुक्त हो गया है।
- 11:33या तो विराट हो जाओ या राख हो जाओ, फिर सुनने शब्द को।
- 11:51संत आपको समझाता है और भलीभाँति जानता है कि जिन विचारों से
- 12:02लिपियों से मैं समझाने चला हूँ, समझाना पाऊंगा, फिर भी समझाता है।
- 12:13तो शांत, अच्छी तरह से जानता है कि तुम्हारी समझ में आएगा नहीं
- 12:20क्योंकि समझ में वो आता नहीं है, कभी गागर में सागर समाया है, बस
- 12:28ऐसा ही वो विराट है। तो मैंने कहा या तो राख हो जाओ या
- 12:39बैराट हो जाओ, लेकिन एक वक्त ऐसा होता है जब हम न तो राख होते हैं,
- 12:48न ही बैराट होते हैं, बस वही वेला होती है, कोला हल्के।
- 12:56वो ही वेला होती है, शोर शराबे के वो ही वेला होती है आपा धापी के
- 13:10तुम तनाव से ग्रस्त उलझे, उलझे। ज़िन्दगी को जीने का भ्रम पालते
- 13:21हो, यह वो वेला है, जब न तो तुम खाक हुए, न तुम विराट हुए।
- 13:40क्वेश्चन कहते हैं, या तो राख हो जाओ या विराट हो जाओ, इन दोनों
- 13:50में से कुछ हो गए तो तुम शर्म हो जाओगे और जब बड़े उलटे शब्द जान
- 13:56पड़ेंगे। या तो राख हो जाओ या विराट हो जाओ
- 14:06अगर तुमने ये दोनों 70 छू लिए कोई भी दोनों में से तो अगर तो तुम
- 14:13राख हो गए, देखिए एक एक शब्द बड़े गहरे।
- 14:17ध्यान से सुनने वाला है तुम्हारे भीतर उतर जा अगर तो तुम राख हो गए
- 14:27तो विराठ हो जाओगे तत्क्ष और जीस घड़ी तुम विराठ हो गए।
- 14:37उस गणित राख हो जाओ कह दो तलों की बात कर रहा हूँ मैं एक तल है
- 14:48विराट होने का एक तल है राख होने का।
- 14:55जब तुम्हारा इल्ल्यूज़न राख होता है तो तुम वैराट होते हो और जब
- 15:04तुम्हारा इल्ल्यूज़न वैराट होता है तो तुम राख होते हो, तुम कौड़ी
- 15:09के भी नहीं होते हो, तुम किसी मोल के भी नहीं होते।
- 15:15जब तुम परम अहंकार से भरे होते हो, तब तुम कौड़ी के भी नहीं होते
- 15:28और जब तुम शून्य होते हो। तो तुम ही होते हो तुम्हारा ही
- 15:33मूल्य होता है सम तुम जो को उच्चते है अगर सम होना है तो
- 15:45दोनों में से 117 छू लो, कोई भी छू लो।
- 15:53ज्यादा आसान है तुम्हारे लिए समर्पण तो राख हो जाओ स्त्री का
- 16:05मार्ग राख होना था। समर्पण स्त्री कहती है कि मैं
- 16:22तुम्हारे चरणों की दासी हूँ, मैं गोरी तो कन।
- 16:30अंत हमारा, मैं नदिया तू मेरा किनारा।
- 16:45मैं गोरी तू कंत हमारा, मैं नदी आ तू मेरा किनारा।
- 17:02अंग लगाओ प्यास बुझाओ, अंग लगाओ प्यास बुझाओ नदियां बनकर।
- 17:26प्यास बुझाने आई मन की प्यास बुझाने।
- 17:39आई अंतर्घट तक प्यासी हों मैं तू है मेरा प्रेम देवता तू है मेरा।
- 17:58प्रेमदेवता अंतर्घट तक प्यासी हूँ मैं गंगा होकर प्यासी हूँ मैं यह
- 18:17स्त्री का मार्ग है। समर्पण स्त्री राख हो जाती है,
- 18:26स्त्री का मार्ग राख होना है। बेटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ
- 18:31मर्द व चाहे कि दाना खाक में मिलकर गुरूगुलजार होता है।
- 18:40यह मार्ग है मिट जाने का राख होने का।
- 18:49मैंने कहा या तो राख हो जाओ तो विराट हो जाओगे।
- 19:00और पुरुष का मार्ग है संकल्प खुदी को कर बुलंदतना के हर तकदीर से
- 19:12पहले खुदी को कर बुलंदटना के हर तकदीर से पहले।
- 19:21खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है?
- 19:28ये संकल्प का मार्ग है, पुरूष का मार्ग है, संकल्प है।
- 19:43अगर ठीक से मैं व्याख्या करूँ तो पुरुष का मार्ग और स्त्री का
- 19:49मार्ग है। यह कहना उचित न होगा स्त्री के मन
- 19:55का और पुरुष मन का मार्ग जो अटैकिव प्रकृति के हैं।
- 20:03उनको पुरुष का मार्ग सूट करेगा और जो श्रेयण प्रकृति के हैं, उनको
- 20:14मिटने का मार्ग सूट करेगा। अंग।
- 20:24लगाओ प्यास बजाओ, नदियां होकर प्यासी हूँ मैं नदी सबकी प्यास को
- 20:34बजाती है, लेकिन स्त्रेण मार्ग कहता है कि मैं हूँ तो नदी।
- 20:42लेकिन मेरी खुद की प्यास नहीं, मुझे अंतर घट तक व्यासी हूँ मैं
- 20:49तू है मेरा प्रेम देवता जरूरत है उसे जीवन की और तुम जिए चले जाते
- 20:59हो। लेकिन वो जीवन नहीं मिलता।
- 21:03तुम्हें ये बात बड़ी विपरीत जान पड़ेगी, लेकिन क्या करें?
- 21:11शब्द बड़े तुच्छ हैं, छोटे हैं, शुद्र हैं।
- 21:18वही शब्द दोनों तरफ इस्तेमाल करने पड़ते हैं।
- 21:22क्या किया जाए? कोई रास्ता?
- 21:25भी तो नहीं है। तुम जीए चले जाते हो, लेकिन जीते
- 21:31कहाँ हो? जीवन तुमसे छिटक छिटक जाता है।
- 21:39जैसे तुम जीने का ड्रामा कर रहे हो तुम्हें जीने की अभी तरीका
- 21:53नहीं हो रहा। जांच नहीं आई।
- 21:57तुम्हें बल नहीं आया तुम्हें तुम्हें मेथड नहीं पता लगा, जीने
- 22:02का तरीका नहीं पता लगा और जिए चले जाते हो तो ऐसे मेरे शब्दों में
- 22:08अगर मैं कहूँ तो तुम दिनों को धक् के देते हो, तुम जीते कहो।
- 22:17अगर जीते होते तो दरदर मरे न फटते।
- 22:28तुम्हारा उच्चतम पदासीन व्यक्ति भी हाथ में कटोरा लिए फटता है।
- 22:34यह किस बात का इंगित है तुम्हारे उच्च पदासीन लोग जाने तुम
- 22:41राष्ट्रपति कहते हो, प्रधानमंत्री कहते हो।
- 22:49चीफ? जुडिशल कहते हो।
- 22:53उनके हाथ में कटोरा है तुम्हें देखता नहीं, अदृश्य कटोरा है सब
- 23:02कटोरा ये घूम रहे हैं कुछ लोग उस कटोरे को।
- 23:11भरने की फिराक में है कि हमें कब वो पदवी मिल जाए और जिन्होंने वो
- 23:18पदवी अख्तियार कर ली। तुम्हें पता नहीं चलता कटोरा वैसे
- 23:25ही रहता है। उनके हाथ में दोनों ही।
- 23:34कुछ उस राह पे चल रहे हैं कुछ वहाँ पहुँच गए हैं गद्दी निशीन्ह
- 23:42हो गए हैं, लेकिन दोनों के हाथ में कटोरा है, क्यों?
- 23:49क्योंकि मार्ग गलत है। दोनों को तृप्ति नहीं मिलते।
- 23:57जो राहगीर हैं चल रहे हैं राह में उन्हें भ्रम है कि शायद हम गद्दी
- 24:03पर पहुँच जाए तो जीवन मिल जाएगा, शांति मिल जाएगी।
- 24:12हमारी सभी समस्याएं शांत हो जाएंगी और हम पूर्ण हो जाएंगे।
- 24:19हम हो जाएंगे, हम सम हो जाएंगे, जिसे कृष्ण कहते हैं समतुम यौग और
- 24:26चैत्य है। यह एक लंबी कतार है, बिखमों की बस
- 24:36लाइनों का फर्क है, कोई धन की कतार में खड़े।
- 24:45और जिसके पास से पहनने को कपड़े नहीं हैं, वह भी कतार में लगा है,
- 24:51हाथ में कटोरा है और जो दुनिया का नंबर एक अमीर हो गया है, उसके भी
- 25:02हाथ में कटोरा है। वो चाहे कहें चाहे नहीं कहें।
- 25:14उनके लक्षण बताते हैं कि कटोरा है।
- 25:16लक्षण क्या है? कृष्ण कहते हैं जहाँ तुम तृप्त हो
- 25:23जाओ, यहीं कबीर कहते हैं। जब अब है संतोष धन सब धन धुर
- 25:30समान, फिर वो धन है, चाहे गद्दी है, चाहे मान सम्मान है, चाहे
- 25:39पदार्थ हैं। कुछ भी है सब धूड़ी हो जाती है सब
- 25:45धूल हो जाती है सब राख हो जाती है गो धन, गज, धन व ज धन और रतन धन
- 25:56खान। इन सबसे संतोष नहीं मिलता, सबसे
- 26:03तृप्ति नहीं मिलती तो कबीर कहते हैं तृप्ति कहाँ मिलती है?
- 26:11जहाँ साहब मिलते हैं वह तृप्ति है साहब, मिल ही।
- 26:22सबूरी मैं मन्नड़ लाग्यो मेरा। कहत।
- 26:36कवि? सुनो भाई साधु कहत कबीर सुनो भाई
- 26:53साधु। साहब मिल हैं सबूरी मैं मन्नड़
- 27:07लाग्यो मेरो राम फकीरी मैं। फकीरी में।
- 27:20मन्नू। लाग्यो मेरा कबीर कहते है, फकीरी
- 27:26में मन लगा न कंगाली में लगा न राजगद्दियों में लगा।
- 27:35न मान सम्मान में लगा, न धन के अम्बारों में लगा, लेकिन मेरा मन
- 27:41फकीर में लग गया। यह फकीर बड़ा अद्भुत शब्द है
- 27:50जिसके भीतर फकीरी उजागर हो गई। बेहतर तो हो क्या?
- 28:01इसमें सब्र आ गया। लोग मुझे पूछ लेते हैं बाबा घर
- 28:08में अशांति है, लड़ाई झगड़े होते हैं।
- 28:17क्या उपाय करें? घर में शांति हो जाये क्या उपाय
- 28:23करें, खुशहाल हो जाये घर सब तरफ शांति ही शांति हो, तुम पसंद तो
- 28:30यही करते हो। कितना भी क्रोधी व्यक्ति है, उसके
- 28:36भीतर की इच्छा तो यही है कि कैसे मेरे घर में शांति हो जाए, ये जो
- 28:42आग लगी हुई है, कैसे बच जाए, कैसे न लड़ें, भाई भाई के साथ कैसे न
- 28:49लड़ें, पड़ोसी पड़ोसी के साथ कैसे न लड़ें।
- 28:53देश देश के साथ राज्य, राज्य के साथ झगड़ा न हो, लेकिन होता है
- 29:03क्यों होता है सब्र नहीं होता। तो कबीर कहते हैं कि साहब मिले ही
- 29:13सबूरी में तुम कहीं चले जाना, तुम मक्का मदीना चले जाना तुम अमरनाथ
- 29:26की यात्रा बद्रीनाथ की यात्रा कर लेना।
- 29:31केदारनाथ चले जाना लेकिन एक बात याद रखना अगर घर बैठे तुम्हें
- 29:39सब्र आ जाए तो बद्रीनाथ भी फेंके और हाजिर भी फेंका।
- 29:54क्या कहते हैं न रब तीर्थ, न रब मक्के दोनों में धक्के ही धक्के
- 30:02हैं, चाहे वो तीर्थ हैं चाहे मक्का है।
- 30:09तुम्हें चैन नहीं मिलता और तुम्हें जरूरत है चैन की,
- 30:21तुम्हारे भीतर का पूरा अस्तित्व मांग रहा है चैन।
- 30:27और तुम जो करते हो उससे तुम्हें चैन मिलता है तो कृष्ण कहते हैं
- 30:37तुम्हारे सब के हाथों में ठूंठे पकड़े हुए हैं, भिक्षा पात्र है
- 30:44क्योंकि चैन नहीं है। इस शंभ को चैन ही कहते हैं ध्यान
- 30:50रखना ये शब्द अलग अलग हैं, लेकिन अर्थ एक ही है इशारा उस एक तत्व
- 30:57की तरफ है जीस घड़ी चैन मिल गया। उस घड़ी ठहराव आ गया।
- 31:10जब। पेंडुलम अपने एक्स्ट्रीम में जाना
- 31:13बंद हो जाता है और बीच में ठहर जाता है।
- 31:17वो ही समित योग है, वो ही बुद्ध का स्त्री योग है।
- 31:24बुद्ध भी ये कहते हैं कि ठहर जाओ, मध्य में ठहर जाओ, मध्य ही यही है
- 31:33जहाँ तुम सम हो जाते हो, फिर कुछ भी हो जाए तुम्हारा चैन टूटता
- 31:41नहीं। सोते?
- 31:45जगते जगते, फिरते बैठते उठते। सभी।
- 31:50क्रियाकलाप करते तुम रस से भरे रहते हो उस गगनमंडल से टपका हुआ
- 31:57वो चैन, वो अमृत। तुम्हारे गले से भीतर घूंठ बन के
- 32:05उतरता रहता है और तुम इतने मगन होते हो उसे सबर कहते हैं।
- 32:18साहेब मिलेहीं सबूरी में कुछ भी कर लो अमृत वाणी का पाठ कर लो
- 32:30हनुमान चालीसा पढ़ लो, गुरबानी पढ़ लो।
- 32:44नमाज़ कर रहे हो, कुछ भी कर लो लेकिन अगर चैन नहीं अगर तृप्ति
- 32:54नहीं तो तुम्हारा सब किया, माटी हो जाएगा, राख हो जाएगा।
- 33:04तुम्हें तलाश है चैन की? पर।
- 33:09अफसोस इस बात का है कि तुम्हें पता नहीं है कि तुम्हें जरूरत किस
- 33:12चीज़ की है। पता न होने के कारण तुम भागते हो,
- 33:19इधर उधर घनचक्कर की तरह तुम। चक्कर लगाते हो तुम्हें सही
- 33:27तुम्हारी जरूरत का पता नहीं है इसलिए तो दसों दिशाओं में उसे
- 33:33तलाश लेते हो कभी धन मैं तलाशते हो कभी पद भी मैं तलाशते हो।
- 33:42कभी मान सम्मान में तलाशते हो, कभी सुन्दर सुन्दर पदार्थों में
- 33:47दृश्यों में सुन्दर मीठी आवाज़ में तलाशते हो वो कहीं नहीं
- 33:56मिलता। चयन कहाँ मिलता है?
- 34:02तो कबीर कहते हैं, चैन मिलता है सब्र में और सब्र कहाँ होता है
- 34:11सब्र होता है जब तुम शम हो जाते हो, शम तुम योग हो जाता है और शम
- 34:17कब होगे। जब तुम्हारा पेंडुलम किसी
- 34:21एक्स्ट्रीम पर नहीं जाएगा। देखिए ये बड़ा उल्टा मसला है।
- 34:31किसी भी काम को करना और उसमें पूरे हो जाना तो तुम्हें सम कर
- 34:37देगा। ये अब मैं प्रैक्टिकल की भाषा बोल
- 34:41रहा हूँ। किसी भी काम को करना, उसमें पूरे
- 34:48तलीन हो जाना, 100% डूब जाना तो तुम समझ जाओगे और किसी भी कर्म को
- 34:56करना। और उस कर्म से बाहर रहना करता न
- 35:03बनना तो भी तुम हो जाओगे। सब थोड़े से गहरे मालूम पड़ेंगे,
- 35:10समझ में नहीं आने लगेंगे, लेकिन फिर भी बार बार सुनोगे।
- 35:18तो समझें मैं आज आएगा, रस चाहिए, तृप्ति का रस चाहिए सब्र का अगर
- 35:31सब्र आ जाये एक व्यक्ति में सब्र आ जाये।
- 35:35एक बुद्ध सब्र में आते हैं तो कपिलवस्तु को लात मार देते हैं,
- 35:46एक महावीर सब्र में आ जाते हैं तो वैशाली को लात मार देते हैं।
- 35:58यह सबर बड़ा अनोखा शब्द है। इसके बिना सब बेकार है अगर ये
- 36:11नहीं। तो फिर कुछ।
- 36:13भी नहीं अगर ये सबर आ गया। तो फिर सब।
- 36:19कुछ आ गया। तुम सारे संसार घूम लो, सुंदर से
- 36:27सुंदर दृश्यों का अवलोकन कर लो, मीठी सी मीठी वाणी सुन लो, सुंदर
- 36:37से सुंदर। स्वादिष्ट से स्वादिष्ट पदार्थ चक
- 36:44लो शीतल हवाओं का स्पर्श कर लो, तुम्हारी सारी इन्द्रियां तृप्त
- 36:55हो जाएं। लेकिन अगर मनुष्य में तपती नहीं
- 36:59आई तो तुम्हारी सारी तपतीयां बेकार हैं, एक बुद्ध तृप्त होते
- 37:12हैं। तो उनके साथ पूरी दुनिया निकल
- 37:17पड़ती है। वो तृप्ति का आरंभ इतना गहरा होता
- 37:22है वह संतोष का स्वाद इतना मीठा होता है रस?
- 37:36कि वह। सारे जहन को आकर्षित कर लेता है।
- 37:41तुम चुम्बक बन जाते हो और इतने विशाल चुम्बक बन जाते हो और एक
- 37:49बार के चुम्बक बने फिर तुम कभी उस चुम्बक को।
- 37:55छोड़ते नहीं तुम सोचना धरती ने कभी अपना फोर्स ऑफ ग्रैविटेशन
- 38:03छोड़ा है कितने वर्ष हो गए हमें रहते हुए कितने वर्ष पुराने हैं
- 38:09ये धरा और कितने वर्ष पुराने हैं? यह प्रेग्नेंट्स जो घूम रहे हैं,
- 38:19कभी इसने खोया अपना ग्रेविटेशन फोर्स वह खींचने की शक्ति कभी
- 38:27इसकी कम हुई होगी भी नहीं। बस तुम एक बार उस स्थल को पालो जो
- 38:41प्रेम स्वरूप है जहाँ जाकर तुम तृप्त हो जाते हो, जहाँ जाकर तुम
- 38:49सहम हो जाते हो। बस यही योग यानी मिलन की
- 38:54पराकाष्ठा है। जैसे बूंद समुद्र में समा जाती है
- 39:02वह मिलन की पराकाष्ठा होती है और बूंद समुद्र में जा के समुद्र ही
- 39:10हो जाती है। एक तरफ से उसका।
- 39:15अस्तित्व मिटा बूंद की तरफ से उसका अस्तित्व मिटा, लेकिन सागर
- 39:21की तरफ से उसका अस्तित्व हो गया। एक तरफ से वह मिटती है, दूसरी तप
- 39:27से वह विराट हो जाती है, यही मैं कहता हूँ कि या तुम मिट जाओ या
- 39:32विराट हो जाओ। तो तुम शाम हो जाओ गाय विराट कैसे
- 39:43हो जाओ, मिट जाओ समर्पण से और विराट हो जाओ संकल्प से।
- 39:52विराट कैसे होगे? बड़े मज़े की बात है, समर्पण भी
- 39:56उसी तल पे होता है जाके और विराटत्व भी उसी तल पर मिलता है
- 40:01जाकर तुम बुद्धि से संकल्प करते हो नहीं बुद्धि संकल्प नहीं कर
- 40:09सकते। बुद्धि विचार कर सकती है,
- 40:12डिटरमिनेशन कर सकती है, बुद्धि संकल्प नहीं कर सकती और देर इज़ ए
- 40:18लॉट ऑफ डिफरेंस बटन संकल्प एंड डिटरमिनेशन तुम इनको दोनों को एक
- 40:23ही चीज़ समझते हो डिटरमिनेशन और संकल्प।
- 40:30एक ही बात नहीं है डिटरमिनेशन आता है तुम्हारी खोपड़ी से और संकल्प
- 40:37आता है तुम्हारे अस्तित्व से और तुम्हारी खोपड़ी और तुम्हारे
- 40:43अस्तित्व में लॉट ऑफ़ डिफरेंस बहुत दोरी है।
- 40:51और। संकल्प से भी पहुँच ही जाओगे
- 40:56क्योंकि वो ही तल जब तुम समर्पण करते हो तो वहीं पहुँच जाते हो।
- 41:04जीस तल का कर्षण जक्र करते हैं। कबीर जक्र करते हैं, नानक और सभी
- 41:09फकीर करते हैं। समर्पण?
- 41:16करोगे तो उसी तल पर जा गिरोगे संकल्प करोगे तो उसी तल पर पहुँच
- 41:22जाओगे। जहाँ समर्पण करके व्यक्ति करता
- 41:29है, वहीं जाकर संकल्प परिपूर्ण होता है।
- 41:36भाषा की अल्पकता है हम करें क्या मजबूर है?
- 41:43लेकिन तुम्हें इशारा कर रहे हैं अगर तुम इशारों से समझ जाओ तो
- 41:49बड़ा शुभ है। फिर तुम परम सौभाग्यशाली हो और
- 41:57अगर इशारों से न समझोगे। तो फिर हमारा।
- 42:00बोलना तो वैसे भी बेकार है क्योंकि हम जानते हैं कि बोला
- 42:05नहीं जा सकता वो, लेकिन कोई एक कोई एक शायद इशारों को समझ जाए।
- 42:19इशारों को पकड़ ले। हमने भी तो इशारे ही पकड़े हैं।
- 42:26सत्य तो कभी पकड़ा नहीं जा सकता। सत्य में तो खोया जा सकता है।
- 42:33सत्य को जांचा रखा नहीं जा सकता। सत्य में तो विलीन हुआ जा सकता
- 42:38है, सत्य का स्वाद लिया जा सकता है, सत्य में मिला जा सकता है,
- 42:44सत्य का एनालिसिस नहीं हो सकता और बुद्धि चाहती है सत्य को भी
- 42:51एनालिसिस कर लूँ, उसको भी काँट छूट लूँ।
- 42:57उसके भीतर भी जो तत्व हैं उनको उभार लूँ पदार्थों की तरह, लेकिन
- 43:04सत्य ऐसा नहीं है कि उसका एनालिसिस कर सको, उसमें तो मिला
- 43:12जा सकता है। उसका स्वाद चखा जा सकता है और
- 43:17बड़ा मीठा है। कबीर कहते हैं जो गूंगा गुड़ खाई
- 43:22के कहे कौन मुख स्वाद जीवा नहीं है उसके स्वाद को वर्णन करने
- 43:33हेतु। जैसे गूंगा गुड़ को खा लेता है,
- 43:41कहानियों हैं, उदाहरण हैं और जैसे उदाहरण कबीर के पास हैं, वैसे ही
- 43:47वो दे पाएंगे प्रत्येक व्यक्ति। चाहे वो पढ़ा हो लिखा हो या अनपढ़
- 43:56हो या बिल्कुल बिल्कुल अव्वल सिरे का कभी स्कूल भी नहीं गया, लेकिन
- 44:05स्कूल जाने या न जाने से उस रस का कोई संबधन नहीं है।
- 44:14कबीर कहते हैं कागज करम छुओ नहीं तो कभी पाठशाला के दर्शन नहीं
- 44:21किए। और कहाँ जाते हैं बाबा नानक?
- 44:32और जो। जाते हैं।
- 44:38स्कूल जाने से विद्या इकट्ठी करने से सूचनाएं इकट्ठी करने से सत्य
- 44:44का कोई समर्थन नहीं, बुद्धि की साझेदारी का।
- 44:50फर्क पड़ता होगा। लोगों में आप अपना छवि बना सकते
- 44:58हो, लेकिन ईश्वर के बारे में तुम्हारी सूचनाएँ कोई काम नहीं
- 45:04करती, कभी रखना भी पड़े हो। तो भी उस पर हम अनुभव को छू लेते
- 45:10हैं क्योंकि सूचनाओं से कोई संबंध है ही नहीं।
- 45:15बुद्धि के साथ कोई संबंध नहीं है। इसलिए जैन फकीर कहते हैं कि जब
- 45:23तुम मेरे पास आओ। तो जूतियों के साथ बुद्धि को भी
- 45:28रख आना जहाँ तुम जूते उतारते हो न वहाँ तुम बुद्धि को भी उतार के रख
- 45:36देना इसको साथ मत लेके आना ये कूड़ा है लेकिन क्या करें?
- 45:45ये तुम्हारी मजबूरी है, तुम इसको भी साथ ले आते हो और यह साथ जब आ
- 45:54जाती है तो बाधा ही बनती है। कोई सहयोग नहीं करती तुम्हारा।
- 46:03मैंने कहा तुम्हें एक बात पूछ ले, किसी प्रवचन में बताई थी एक
- 46:10व्यक्ति जापानीज़ वह हिंदी नहीं जानता, वह सिर्फ मेरे प्रवचन
- 46:17सुनता, सुनता बहुत हो गया क्या हुआ?
- 46:21उसे तो पता भी नहीं मैं क्या बोलूं?
- 46:25शब्द उसे आते नहीं, हिंदी के वह जापानीज़ जानता है, अंग्रेजी
- 46:33जानता है हिंदी तो जानता नहीं, लेकिन वह सिर्फ टेप लगा देता।
- 46:42सुनता और मग्न हो के बैठ जाता किस तरफ़ इशारा है इस घटना का इशारा
- 46:53है के बुद्धि की समझ में वो आता ही नहीं तो उसने क्या पकड़ा?
- 46:59उसने वो रस पकड़ा। जो शब्दों के साथ लबड के आता है
- 47:08वो रस पीता चला गया, पीता चला गया उन के ख्याल।
- 47:21आए तो आते चले गए, उनके ख्याल आए तो?
- 47:39आते चले गए। दीवाना जिंदगी को बनाते चले गए।
- 47:59उनके ख्याल आए तो आते चले गए, पर जब रस पीना शुरू कर दोगे तुम।
- 48:17और ध्यान रखना बुद्धि रस में देते हैं।
- 48:22बुद्धि तो उस रस से बेसुध हो जाती है इसलिए बुद्धि को छोड़ देना ये
- 48:32तुम्हारी कमी तुम्हें ले बैठेगी। तुम्हारी बुद्धि तुम्हें देरी
- 48:38करवा सकती है, ये पक्का जान लेना कि बुद्धि बाधा है, बुद्धि सहायक
- 48:46नहीं होती और इसकी सारी सूचनाएं परमात्मा को पाने के रास्ते में।
- 48:57एक बाधा है और उस चकल है सीधा सीधा रस को पीना आसान तरीका है।
- 49:10शम होने का संत जब बोलता है। देखिए, मैं संत की बात करता हूँ,
- 49:19मैं उसकी बात नहीं करता, जो सिर्फ बोलते हैं, अनुभव के बिना बोलते
- 49:26हैं और वही शब्द बोलते हैं जो कृष्ण ने कहा है।
- 49:35जो कृष्ण बोले शब्द वही शब्द वो बोलते हैं लेकिन वो भीतर से
- 49:41लिपटते बढ़कर नहीं आते हैं। वो तुम्हारे कानों में पड़ते हैं
- 49:47तो शब्द पड़ते हैं। और शब्द तुम्हारी खोपड़ी में जमा
- 49:54हो जाते हैं, लेकिन तुम्हें नहीं पता संत जब बोलता है तो शब्द आते
- 50:01हैं, शब्दों के साथ अमृत भी आता है, शहद भी आता है तो वहाँ से अलग
- 50:08अलग हो जाते हैं। सूचनाएं बुद्धि में चली जाती है।
- 50:13और वह रस तुम्हारी आत्माओं में इकट्ठा होता रहता है, बूंद बूंद
- 50:19करके तुम्हारा घड़ा भर जाता है, इसलिए संत को सुनते सुनते सुनते
- 50:27सुनते। बूंद बूंद बूंद बूंद इकट्ठे होते
- 50:32होते तुम्हारा बड़ा भर जायेगा। एक एक बूंद इकट्ठे होते होते
- 50:40तुम्हारा बड़ा भर जायेगा और 1 दिन तुम सौभाग्य शादी हो जाओगी।
- 50:48यही बाबा नानक ने कहा सुनिए दुःख प कनअस संतो ने इशारे तो बहुत
- 50:56किये लेकिन हम समझ गए बड़े महावीर भी कहते हैं श्रावक बन जाओ।
- 51:10सम्यक। रूप से सुनो बस सिर्फ सुनो, लेकिन
- 51:18क्या करें जब तुम बुद्धि लेके साथ आओगे तो सुन नहीं पाओगे।
- 51:25क्योंकि बुद्धि काट छाठ करे बुद्धि रास्ते में खड़ी सेंसर
- 51:34करके जाने देती है, शब्दों को और छूट जाता है और रस।
- 51:43जो शब्दों के साथ लबट के आता है। फिर बुद्धि जब काटेगी तो रसी भी
- 51:50कटेगा और रस भीतर न जाएगा तो वह कढ़ा ना पड़ेगा।
- 52:01इसकी बूंद बूंद को भरने से तुम लबालब हो जाते।
- 52:05किसी दिन तुम सौभाग्यशाली हो जाते।
- 52:09तुम भाग्यवान हो जाते। उसी को भगवान कहा गया, जीस घड़ी
- 52:13तुम भाग्यवान होते हो, तुम्हारी पोटेंटियलिटी पूरी खैल जाती है।
- 52:20जीस दिन बीज। फूल बन जाता है, बीज फल बन जाता
- 52:24है और तुम्हारी पोटेंशिअल की तुम्हारी संभावना है अपने चर्म को
- 52:30छू गई और जब फूल बना तो सुगंध देगा है जब फल बना तो मिठास देगा
- 52:40है। तो कृष्ण कहते हैं, कसम हो जाए
- 52:53कैसे हुआ जाएगा असम या तो अतीम में आजा।
- 53:00कोई भी कर्म कर उसमें पूरा इन्वॉल्व कर दे।
- 53:04अपने आपको तो फिर क्या रह जाएगा? दूसरे शब्दों में कहूं तो क्रिया
- 53:13रह जाए, कर्म ना हो क्रिया हो। कैसे रात को तुम सो जाते हो,
- 53:24तुम्हारी श्वास आती ही जाती है, तुम्हारा दिल धड़कता है, खून रगों
- 53:33में बहता है। सारे शरीर में फैलता है और सारे
- 53:39शरीर में फैल के फिर वापस आ जाता है स्वास्थ्य चलती है बाहर भीतर,
- 53:52लेकिन तुम आनंदमय रहते हो। तो रात्रि को जब तुम सोते हो,
- 54:03श्वास भी आता है, निर्भय धड़कता है, खाना भी पचता है, यह कर्म
- 54:11होता है या क्रिया होती है, सोच करता हूँ तुम्हारी इच्छा के बिना
- 54:19होती है। दिल भी तुम्हारी इच्छा के बिना
- 54:26धड़कता है श्वास भी तुम्हारी इच्छा के बिना आती जाती है।
- 54:33भोजन भी तुम्हारी इच्छा के बिना पछता है।
- 54:38तुम्हारी इच्छा से कुछ भी तो नहीं होता महत्त्व काम तुम्हारी इच्छा
- 54:43के बिना होते हैं तुमसे पूछ के नहीं होते तुमसे नहीं पूछता के
- 54:48धडकों के न धडकों स्वास्थ्य तुमसे नहीं पूछती क्या आऊं के ना?
- 55:01पाचन तंत्र तुमसे नहीं पूछता के पचु के न पचु जगर तुमसे कभी नहीं
- 55:08पूछता कि मैंने जो बनाए हैं, जो से वह निर्माण करूँ कि न करूँ।
- 55:22जब वो तुम्हारी मर्जी से नहीं होते, जगर तुमसे पूछता नहीं, और
- 55:31साढ़े 300 प्रकार के जूसेस का निर्माण करता है, हरबंस का तुमसे
- 55:37पूछता नहीं। हृदय तुमसे पूछता नहीं लड़कों न
- 55:41लड़कों, स्वास्थ्य तुमसे पूछते नहीं फेफड़े तुमसे नहीं पूछते कि
- 55:47श्वास लूँ कि न लूँ? यह सब प्रकृति।
- 55:51के विधान से चलता है और सारी रात तुम सोए पड़े रहते हो।
- 55:59ये सब चलता है और तुम ज़रा भी इसकी फिक्र नहीं करते।
- 56:08सुबह तुम मज़े से उठते हो, फ्रेश हुए अगर तुम दिन में भी।
- 56:16जैसे रात को ये कर्म नहीं थे, क्रियाएं थे ये तुम्हारी इच्छा के
- 56:22बिना हुए दल भी तुम्हारी इच्छा के बिना धड़का श्वास भी तुम्हारी
- 56:29इच्छा के बिना तुमसे पूछ के नहीं आया और भोजन भी तुम्हारी इच्छा से
- 56:34नहीं बचा? तो ये कर्म हुआ या क्रियाव्यय या
- 56:41क्रियाव्यय? ऐसे ही अगर तुम दिन में भी
- 56:49क्रियाएं को होने दो, परिस्थितियां तुमसे जैसा कराएं।
- 56:55वैसा तुम करो तो कर्म नहीं होंगे, वो क्रियाएं होंगी।
- 57:01थोड़ा ध्यान से समझ रहा हूँ बात को और ये कैसे होगा जब तुम अपने
- 57:08जीवन के पतवार उसके हाथ में सौंप दोगे तो कर्म नहीं होंगे फिर
- 57:13क्रियाएं होंगे, एक्शन्स होंगे। और तुमने ऐक्शन क्रिया और कर्म को
- 57:19एक ही नाम दे दिया ऐक्शन अडक्कन हिंदी वालों ने बड़ा सुन्दर काम
- 57:25किया। संस्कृति में अर्थ दो हो गया
- 57:29क्रिया और कर्म दो अर्थ बन गए। क्रिया होती जिसमें तुम इन्वॉल्व
- 57:40नहीं होते, वो अक्शन्स होते हैं और कर्म होते हैं जिसमें तुम
- 57:45इन्वॉल्व होते हो, तो मैं सह काम और निष्काम?
- 57:52कर्म के बजाय तो मैं आज दो शब्द नए देता हूँ क्रिया और कर्म तुम
- 58:01क्रियाएं को होने दो, जैसे दिल धड़कता है, श्वास आती है, भोजन
- 58:07पछता है, पसीना निकलता है, तुम्हारी इच्छा से नहीं निकलता।
- 58:14चाँद तारे चलते हैं, हवाएं बहती हैं।
- 58:19सारी। सृजना चल रही है।
- 58:23एक मनुष्य ही ऐसा मूर्ख है, जिसने ये भ्रम पाल लिया की मेरी इच्छा
- 58:28से होता है। इसलिए सिर्फ मनुष्य ही दुखी है।
- 58:37मानव को छोड़कर इस धरती पर कोई दुखी नहीं, सिर्फ मनुष्य ही दुखी
- 58:42है। क्यों दुखी है?
- 58:45इसी कारण से दुखी है कि उसकी इच्छा से कुछ होता नहीं।
- 58:53उसकी इच्छा है कि मैं ये बनु ये ये बनु मैं ये बनु मैं ये बनु
- 58:58होता नहीं, उसकी कामनाएं बहुत हैं, वह सुनाएं, बहुत हैं,
- 59:05आकांक्षाएं बहुत हैं, अपेक्षाएं बहुत हैं।
- 59:08लेकिन होता कुछ भी नहीं। उसके सब तुम कर्मों में आ जाते
- 59:14हो। काश तुम बाबा नानक की बात को मान
- 59:20के करे। आओ मैं ठहर जाओ, कर्मों में मत
- 59:26ठहरों। जैसा होता है, होने दो, यह क्रिया
- 59:31हो गई। जब तुम बीच में इन्वॉल्व हो जाते
- 59:38हो, क्रिया के तो वह कर्म बन जाता है और फिर कर्म का फर्जो में
- 59:46भोगना पड़ता है। अच्छा किया।
- 59:51तो सुख और बुरा किया तो दुख काश तुम क्रिया को कर्म न बनने दो
- 1:00:00क्रिया को क्रिया ही रहने को तुम कभी इतने पागल भी हो सकते हो लोग
- 1:00:09हैं। जो कहते हैं श्वास मेरी मर्ज़ी से
- 1:00:12आता है और वो श्वास सावधानी का वेतन भी करते हैं।
- 1:00:19होता होता कुछ नहीं। 1 मिनट में 1516 श्वास व्यक्ति को
- 1:00:25आते हैं और कुछ मूर्खों ने। ज़िन्दगी को स्वास्थ्य के आधार पर
- 1:00:31गन लिया है के इतने श्वास लिखे हैं इतने श्वास आएँगे तो फिर
- 1:00:38लोभियों ने स्वास्थ्य को सीमित करना शुरू कर दिया।
- 1:00:43प्राणायाम के जरिये उन्होंने शॉर्ट कर दिया।
- 1:00:48स्वास्थ्य। लेकिन वह भूल गई कि ऑक्सीजन तो
- 1:00:53उतनी ही जरूरत पड़ेगी। तुम 10 श्वास लेते हो, उसमें
- 1:01:00जितनी ऑक्सीजन लेते हो वो एक श्वास में उतनी लंबी ऑक्सीजन
- 1:01:05लेडी? ऑक्सीजन तो तुमने उतनी ही ले ली
- 1:01:09ना बस मात्रा घटा दी। लेकिन।
- 1:01:16ऑक्सीजन की मात्रा नहीं घटाई, स्वास्थ्य की मात्रा घटा दी।
- 1:01:22ऐसी मूडताएं परमात्मा के दरबार में चलती नहीं।
- 1:01:27और तुम अगर ऐसा करोगे कहाँ जिओंगे 1000 साल उम्र वही रहे की जो है
- 1:01:34तुम श्वास धीरे लो, तुम श्वास तेज़ी से लोग, बहुत से लोग दौड़ते
- 1:01:39नहीं, मैं जब सैर करने जाता था तो एक व्यक्ति दौड़ता नहीं था।
- 1:01:48बैठ जाता सर, गाड़ी भी आता, आराम से बैठ जाता, मैंने कहा तुम थोड़ा
- 1:01:55सा एक्सरसाइज कर लिया करो, घूम फेर लिया करो, दौड़ लिया करो,
- 1:02:00कहता नहीं उससे उम्र कटी हुई है क्यों?
- 1:02:04क्योंकि ज्यादा स्वांस है क्या? और स्वांसों की गणना पे जीवन है
- 1:02:11और मैं जल्दी दौड़ के स्वांसों को पूरा नहीं करना चाहता।
- 1:02:14मैंने कहा तुम नरक भोगो के भोग रहे हो, भोगो के, क्या तुम्हारी
- 1:02:22बुद्धि व्यापार में जाती है तो रुपये गड़ती है?
- 1:02:27बात। बगीचों में आती है तो सुहास गिनती
- 1:02:30है। तुम ये गणना कब छोड़ोगे तुम
- 1:02:35गणनाओं में ही उलझे रहते हो। तुमने जिंदगी को भी शेयर नहीं
- 1:02:41किया, तुमने जिंदगी को भी साँसों की गणना में धकेल दिया।
- 1:02:47और फिर तुम कामना करते हो सुख की तुम कामना करते हो तृप्ति की
- 1:02:51नहीं, तृप्त न हो पाओगे, तृप्ति तो मिटने का नाम है, तुम तो जीवन
- 1:03:00को लंबा करना चाहते हो। तुम्हारा उद्देश्य बदल गया।
- 1:03:08तुम्हारा उद्देश्य वो नहीं जो कृष्ण का उद्देश्य है।
- 1:03:13स्वाभाविक रूप से जितना शरीर चले चले, तुम्हें उसकी परवाह नहीं
- 1:03:18होनी चाहिए। लेकिन तुमने उद्देश्य बदल लिया
- 1:03:26ज्यादा जीना है, लेकिन कृष्ण का ये उद्देश्य नहीं है।
- 1:03:33कृष्ण कहते हैं, ज्यादा या कंग का कोई सवाल नहीं है।
- 1:03:39तृप्ति से जीना है, आनंद से जीना है, खुमारी से जीना है, संभाग में
- 1:03:46जीना है, आनंद से भरे पूरे जीना है, उस राष्ट्र में मग्न होके
- 1:03:50जीना है, महा राष्ट्र रचाते हुए जीना है, मुरली मुरली बजाते हुए
- 1:03:56जीना है। जीवन लंबा भी हो जाए तो कोई फर्क
- 1:04:03नहीं पड़ता। संक्षेप में समझने की चेष्टा करो।
- 1:04:15जीवन अगर लंबा भी हो जाए, लेकिन रस ही न हो तो तुम लाख साल भी
- 1:04:20जीते रहो, कोई फर्क न पड़ेगा। अगर गन्ने में मिठास न हो तो उचाई
- 1:04:30कितनी भी हो जाए जीवन रस के बिना जीवन नहीं होता।
- 1:04:38है। लंबी।
- 1:04:39लंबी उमरिया को छोड़ो। लंबी।
- 1:04:47लंबी उमरिया को छोड़ो प्यार की। एक घड़ी है बड़ी।
- 1:05:03प्यार। कर ले घड़ी दो घड़ी।
- 1:05:11रस में बीते रास में बीते महा रास में बीते।
- 1:05:17वो होता है जीवन और दुख में बीते विलाप में बीते रूलते घुलते हुए
- 1:05:25बीते वो कोई जीवन नहीं होता, धक्का होता है तुम जीते नहीं हो,
- 1:05:30तुम देने को धक्का देते हो। शम हो जाओगे, शम कैसे हो जाओगे
- 1:05:42कृष्ण कहते हैं योग योग आस्था गुरु कर्णाणी संगम चतवा धनय्य।
- 1:05:55योग मिल जा किसके साथ उसकी रजा से मिल जा मिटा दे अपनी हस्ती को मिल
- 1:06:06जा चाहे उसकी हस्ती मैं मिल जा। चाहे अपनी हस्ती में उसे मिला
- 1:06:12लें। नानक कहते हैं कि उसकी मर्ज़ी में
- 1:06:18तो मिल जाए, मेरी तो यही अर्जी कर वो ही जो तेरी मर्ज है।
- 1:06:27इससे योग कहते हैं उसकी मर्ज़ी में मिल जा वधा न बन जैसा वो करे
- 1:06:36करे, स्वीकार कर ले, पूर्ण हृदय के भाव से उसे स्वीकृत कर ले।
- 1:06:43ठीक है। आखिर में तुम यही पाओगे कि तुम हो
- 1:06:53ही नहीं। यह अध्यात्म का आखिरी सूत्र है।
- 1:07:03तुम हो ही नहीं और जीस घड़ी तुम पाओगे।
- 1:07:07के तुम हो ही नहीं। उसी घड़ी तुम पाओगे के सब कुछ
- 1:07:10में। जिन्होंने ये उदघोष किया अहम
- 1:07:18ब्रह्मस्त्र। याद रखना।
- 1:07:20उन्होंने उस स्तर पर जाकर उदघोष किया जहाँ वह शून्य हो गए।
- 1:07:26जहाँ तुम्हारा अहंकार शून्य होता है, वहाँ तुम्हारा अस्तित्व विराट
- 1:07:31हो जाता है, जहाँ तुम्हारा अस्तित्व विराट होता है, जहाँ
- 1:07:38तुम्हारा अहंकार विराट होता है, वहाँ तुम्हारा अस्तित्व शून्य हो
- 1:07:43जाता है। इस बात को आप पले से बांध लेना।
- 1:07:49इसे फिर सुन लो क्योंकि यह एक्स्ट्रैक्ट है, यह रस है सारे
- 1:07:54प्रवचनों का जहाँ तुम्हारा अहंकार शून्य होता है।
- 1:08:06वहाँ तुम्हारा अस्तित्व विराट हो जाता है और जहाँ तुम्हारा अहंकार
- 1:08:15विराट होता है, वहाँ तुम्हारा अस्तित्व शून्य होता है और जिसका
- 1:08:22अस्तित्व। शून्य होता है।
- 1:08:27वह दुखों से भरा ही होगा। क्योंकि अस्तित्व प्रेम को कहते
- 1:08:32हैं अस्तित्व। कहते हैं हर रस को।
- 1:08:38और अस्तित्व तो शून्य हो गया तुम्हारा रस विहीन हो गए तुम।
- 1:08:45क्योंकि अहंकार तुम्हारा विराट हो गया।
- 1:08:48जीस घड़ी तुम्हारा अहंकार इतना बरब हो जाएगा कि मैं हूँ तो
- 1:08:54मुमकिन है उस घड़ी तुम परम दुखी हो जाओगे जब नेपोलियन कहता।
- 1:09:00है इम्पॉसिबल वर्ड इस। नॉट फाउंड इन मैं डिक्शनरी।
- 1:09:04उसी घड़ी समझ लेना कि इससे ज्यादा दुखी व्यक्ति कोई नहीं है।
- 1:09:10क्योंकि एक ही सत्ता है जिसके लिए इम्पॉसिबल।
- 1:09:13कुछ भी नहीं है, पर वह परमात्मा है, वह विराट है।
- 1:09:22जब तुम्हारा। अहंकार विराट हो।
- 1:09:25जाता है तो अस्तित्व शून्य हो जाता है।
- 1:09:28यानी तुम प्रेम से विहीन हो जाते हो, रस हो जाता है।
- 1:09:33आज अगर सारी दुनिया रस को खोए बैठी युद्ध में आशक्त है, युद्ध
- 1:09:39में तलीन है। जगह जगह झगड़े हैं तो कारण।
- 1:09:46कारण है उनका अहंकार। विराट हो गया तो अस्तित्व शून्य
- 1:09:51हो गया, प्रेम शून्य हो गया और प्रेम शून्य हो गया तो झगड़े ही
- 1:09:56झगड़े हैं प्रेम के बिना। तो फिर कलह ही होगा।
- 1:10:03और जप तुम्हारा अहंकार शून्य हो जाता है तो फिर तुम्हारा अस्तित्व
- 1:10:11विराट हो जाता है। जब तुम्हारा अहंकार शून्य हो जाता
- 1:10:19है तो अस्तित्व विराट हो जाता है। अस्तित्व विराट होने का मतलब
- 1:10:24तुम्हारा प्रेम विराट हो गया तुम प्रेम के स्वरूप हो गए वह तुम कह
- 1:10:28सकते हो वसुथ है व कुटुम्बकम स्वरूप सारी वसुधा वसुधा ही नहीं
- 1:10:37सारी सृजनम सारा अस्तित्व। वसुधैव कुटुम्बकम नहीं।
- 1:10:46अस्तित्व में भी एक कुटुम्ब हो जाता है, अस्तित्व में जीतने भी
- 1:10:50गृह तारे नक्षत्र हैं, सब एक कुटुम्ब हैं।
- 1:10:54और है भी। यह सत्य ब्रम्हंड।
- 1:10:58एक कुटुंब है, लेकिन यह प्रेम के। क्षण में पता चलता है।
- 1:11:06केसा के? क्षणों में नफरत के क्षणों में
- 1:11:08यह। पता नहीं चलता।
- 1:11:11प्रेम घना होता है और प्रेम घना होता होता परिपूर्ण हो जाता है।
- 1:11:19तो तुम्हें। ये आभास होता है कि ये सारा।
- 1:11:21अस्तित्व प्रेम मैं है और सारा अस्तित्व मैं हूँ उसी क्षण में
- 1:11:29कहा जाता है संत के द्वारा सियाराम मैं।
- 1:11:37सब। जग जानी।
- 1:11:44कर। प्रणाम।
- 1:11:48जोर जुगनी। सिया राम में सब जग जाने कर्म
- 1:11:58प्रणाम जो वर्षी पानी सारा जगत उसका घर है अलग से मंदिर बनाओ तो
- 1:12:06तुम अलग कर रहे हो परमात्मा का जिसने ये जान लिया।
- 1:12:15इस जगत में ही उसका घर है। जगत के कण कण में उसका निवास है।
- 1:12:21ईशावाश्य में दम सर्वम यत्क इंच जगत याम जगत।
- 1:12:24वह अलग से मंदिर नहीं बनाएगा। अलग से मंदिर बनाना और राजनीति के
- 1:12:29खेल हैं। सियाराम में।
- 1:12:35सब जग जानें यह जानकर। वह प्रेम, सब जगह मौजूद है हर
- 1:12:48झर्रे में वह प्रेम। उस प्रेम की कशिश झरे, झरे में वो
- 1:12:54समाहित है और वही परिणाम। होता है वही झुकता।
- 1:12:59है व्यक्ति करो, प्रणाम जोर जुग पाने।
- 1:13:08वहाँ भीतर से प्रणाम आता है वहाँ भीतर से नमन आता है, वहाँ होती है
- 1:13:14नमाज़ वहाँ झुकता है, तुम्हारा अहंकार वहाँ नमन होता है सच्चा
- 1:13:22उससे पहले तो सब राजनीति है खेलते जाओ, लेकिन एक बात याद रखो।
- 1:13:29दुखी रहा हो गया मूल्य तट। क्षण चुकाना पड़ता है।
- 1:13:36यहाँ अगले जन्म। वगैरह की बात नहीं होती।
- 1:13:40जहाँ ऐसा सुपर सेंसिटिव कंप्यूटर है कि तुमने कर्म किया।
- 1:13:46और तत क्षण वह प्रोसेसिंग में आ जाता है।
- 1:13:50यह बात रग है कि जैसे बीज को वृक्ष बनने में और वृक्ष को फल
- 1:13:57देने में वक्त लग जाता है, उतना वक्त जरूर लगता है लेकिन वो वक्त
- 1:14:04होता है प्रोसेसिंग का। उसको तुम कह सकते हो कि देर है,
- 1:14:10लेकिन देर होती नहीं, वो प्रोसेसिंग होती है।
- 1:14:15अधेड़ तो होता। ही नहीं उसके घर में।
- 1:14:17देर भी नहीं होती, हर चीज़ का ऋण चुकाना पड़ता है, जैसा कर्म
- 1:14:23करोगे। अगर राजनीति करते हो तो तुम ये
- 1:14:30समझना के दुखी रहोगे। अगर प्रेम करते हो तो तुम ये
- 1:14:36समझना के संत कभी दुखी नहीं होते। संत चौबीसों घंटे सदा दिवाली
- 1:14:42सादकी और आठों पहर आनंदा, वह झूमता रहता है।
- 1:14:47यह फल ही तो है। दुनिया जीसको तरसती है एक बूंद।
- 1:14:55को जीस शहर के स्वाद को जीस रस को।
- 1:14:59संत चौबीसों घंटे बीता है और जिसके एक बूंद को तुम तरस जाते हो
- 1:15:10कभी अंतरंग। क्षणों में खोयते हो।
- 1:15:14कभी सुंदर स्वादिष्ट दृश्यों में पदार्थों में।
- 1:15:22सुन्दर वाणी में खोलते हो। एक बूंद के प्यासे हो तुम काश तुम
- 1:15:30जान जाओ, जीस। एक बूंद के तुम प्यासे हो।
- 1:15:38हो भरे समुद्र तुम्हीं हो यू अरे ओशन ऑफ़ नो दाय।
- 1:15:44सिर्फ इसलिए संतों ने कहा, ज़रा जानो तो अपने आप को कहाँ खोल हो,
- 1:15:51कहाँ भटक रहे हो? तुम अपने आप को पहचानो।
- 1:15:55नो दाय सिर्फ। तुम हो कौन भटक रहे हो बूंद बूंद
- 1:16:00के लिए हो तुम सागर प्रेम का यार और बूंद बूंद के प्यासे हो तुम बस
- 1:16:14यही अजूबा है, इसे ही कबीर कहते हैं।
- 1:16:17एक अजूबा मैंने देखा जल में रह के मीन है प्यासी?
- 1:16:26श्रीकृष्ण गोविंद। हरे।
- 1:16:31मुरारी। हे नाथ नारायण वासुदेव व श्री
- 1:16:47कृष्ण गोविंद। हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव
- 1:17:02श्री कृष्ण। गोविंद।
- 1:17:05हरे मुरारी। हेनाथ नारायण वसुदेव पितुमात
- 1:17:18स्वामी सखा हमारे पितुमात स्वामी। सखा हमारे हिनाथ नारायण वासु देव,
- 1:17:41श्री कृष्ण गोविंद हरे। मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।
- 1:18:07धन्यवाद।