Latest / Baba ji Vijay Vats / 28 Nov 24 - साधक की आध्यात्मिकता को नई ऊंचाई पर ले जाने के मंत्र!
Transcript
- 0:03बाबा जी, आप अध्यात्म का उपदेश देते हैं जबकि हम सामाजिक प्राण
- 0:13हैं, घर गृहस्थी सब संभाले हैं। नौकरी भी करते हैं, कर भी चलाते
- 0:25हैं। हमारे लिए कभी कभी आप कुछ ऐसा
- 0:32संदेश दे दिया करें जो हमारे। दैनिक जीवनचर्या में काम आ सके।
- 0:42आध्यात्मिक बातें हैं। आप भी कहते हो कि बुद्धि में समझ
- 0:49नहीं आना और हम लोग बुद्धि से ही समझते हैं।
- 0:56तो कुछ ऐसा बता दे जिससे कि जीवन घर गृहस्थी में रहते हुए झगड़ों
- 1:04में ना पड़े और शांति से हम जीवन को गुजार सके।
- 1:11तीन बातों को ध्यान में रखना है ये तीन बातें।
- 1:17तुम्हें संसार में भी कमाएंगे और अध्यात्म में भी कमाएंगे।
- 1:23दोनों तरफ की प्रगति हो गई। वो तीन बातें कौन है सबसे पहले?
- 1:35सहनशक्ति आप में सहनशक्ति का प्रचुर मात्रा होना चाहिए,
- 1:47सहनशक्ति को बढ़ाते रहिए, विवेक जल्दी जल्दी मत खोइए।
- 1:55हालांकि मनुष्य की एक सीमा होती है।
- 1:57मैं जानता हूँ लेकिन उस सीमा से पार जाने की चेष्टा कीजिए।
- 2:05पहला सहनशक्ति संसार में तो काम आएगा ही, अध्यात्म में तो।
- 2:13यही काम आता है अध्यात्म में मुख्यतः सहनशक्ति यानी धैर्य।
- 2:22यही काम आता है। बुद्ध के ऊपर लोग थूक जाते हैं तो
- 2:29बुद्ध याद नहीं करते कि मैं राजा को पुत्र हूँ।
- 2:36बुद्ध हृदय से उन्हें क्षमा कर देते है, क्यों क्योंकि जीस सतल
- 2:42पर मैं हूँ उस सतल पर ये नहीं है बुद्ध भली भांति जानते है क्षमा
- 2:49करने योग्य है। तो क्षमा कर ही देनी चाहिए और बुध
- 2:53होने की क्षमा कर देते है। इस बात को धीरता और गंभीरता से
- 2:59लेना पहली बात मैंने कहा सहन शक्ति आप में धैर्य होना चाहिए
- 3:09दोनों बातों के लिए। इससे संसार के भीतर भी शांति
- 3:16रहेंगी और परमात्मा के लिए भी धैर्य संतुष्टि बनी रहेंगी।
- 3:26सहन शक्ति दोनों तरह काम आती है। दोनों जगह है कम आती है, दूसरा
- 3:39दूसरा है जागरूकता, होश होश संसार में भी काम आता है।
- 3:50और अध्यात्म में भी काम आता है। होश अगर खाना भी खा रहे हो तो होश
- 4:04रखो के खाना खार। कुछ भी कर रहे हो अपनी दिनचर्याओं
- 4:15का पालन करते हुए संसार में यथासंभव ये शब्द को ध्यान में
- 4:22रखें। होश बार बार टूट टूट जाएगा।
- 4:27छूट छूट जाएगा, लेकिन होश को फिर फिर से वापस लौटा लाना है।
- 4:36होश को कभी कभी भूल जाओगे, ऐसा वक्त आएगा ऐसे लम्हे आई लेकिन
- 4:43घबराना है। पहली सहनशक्ति और दूसरी अवेयरनेस
- 4:50होश होश गुम्भी हो जाएगी। किसी वक्त सहनशक्ति भी गुम हो
- 4:56जाएगी। लेकिन उसको सदा के लिए गुम मत
- 5:00होने देना, प्रत्यक्ष क्षण उसको वापस चले आना।
- 5:05जैसे ही होश आएगी, सहनशक्ति भी आ जाएगी।
- 5:09ये दोनों इंटर लिंक्ड हैं। भूल जाते हो, होश नहीं रहता तो
- 5:16तुम सहनशक्ति भी खो देते हो। जैसे ही होश आएगा कि मैंने
- 5:23सहनशक्ति खो दी। मुझको यहाँ धैर्य से ये काम लेना
- 5:30चाहिए था। तुरंत ही तुम्हारी सहन शक्ति वापस
- 5:33आ जाएगी प्रयासित मत करना कि मैंने ये क्या किया?
- 5:43मुझे ये नहीं करना चाहिए था। प्रायश्चित की जगह उस वक्त
- 5:49सहनशक्ति को बढ़ाने की चेष्टा कर प्रायश्चित से कोई हल होने वाला
- 5:55नहीं, सिर्फ तुम अपना वक्त और शक्ति को जाया करो।
- 5:59कहे। दो बातें बताये, पहली सहनशक्ति और
- 6:06दूसरे होश अवेयरनेस और तीसरी कर्तव्य परायणता फर्श तुम जहाँ भी
- 6:21हो। जीस सभी अवस्था में हो अपनी
- 6:27कर्तव्य परायणता को वक्त वक्त पे देखते रहो कुछ वक्त ऐसे आएँगे
- 6:39जीवन में। जब कर्तव्य एक जगह होगा और
- 6:49तुम्हारा अधिकार एक जगह होगा, वहाँ बड़ी मुश्किल पे शायद है
- 6:57कर्तव्य और अधिकार संघ संघ चलने चाहिए।
- 7:01रेल की पटरी की तरह पैरलल ये बड़ा संसार में महत्वपूर्ण शब्द है।
- 7:10कर्तव्य और प्राणों का आज सिर्फ ये इम्बैलेंस हो गई है।
- 7:18इसलिए मानवता बिगड़ गई। कुछ लोग हैं जो कर्तव्य करते हैं
- 7:30और अधिकार भी मांगते हैं। कुछ लोग हैं जो सिर्फ अधिकार
- 7:36मांगते हैं, कर्तव्य पूरा नहीं करते।
- 7:43कुछ लोग हैं जो सिर्फ कर्तव्य करते हैं, अधिकार नहीं मांगते।
- 7:47ये तीन तरह के लोग हैं, फिर सुन लो उसको ये बड़ा महत्वपूर्ण
- 7:53प्रश्न है संसार के लिए? तीन तरह के लोग हैं।
- 8:00कुछ लोग सिर्फ कर्म करते हैं, कर्तव्य करते हैं और अधिकार की
- 8:06परवाह नहीं करते हैं और कुछ लोग कर्तव्य करते हैं और अधिकार की भी
- 8:16बराबर चिंता रखते हैं। और कुछ लोग सिर्फ अधिकार की चिंता
- 8:22रखते हैं। कर्तव्य प्राण नहीं।
- 8:25अगर तीनों में से कोई बैलेंस बिगड़ जाता है तो ज़िन्दगी
- 8:29तुम्हारी अस्तव्यस्त हो जाएगी। आज।
- 8:36संसार उर्फ हो गया है पागल हो गया है अस्त व्यस्त हो गया है,
- 8:45कर्तव्य और अधिकार का संतुलन बहुत कम स्थानों पे मिलता है।
- 8:56जबकि यह संसार में शांति और समानता और आनंद के लिए आवश्यक
- 9:08प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि मुझे मेरा अधिकार मिले।
- 9:14तो जो चाहता है मुझे मेरा अधिकार मिले तो उसको ये भी जानना चाहिए
- 9:20कि मैं अपने कर्तव्य का पालन सुनियोजित ढंग से करूँ, ये बात
- 9:28समझी नहीं चाहती है। तुम्हारे घरों में अक्सर क्लेश
- 9:35रहते हैं और मेरे पास रोज़ सारा व्हाट्सएप इन्हीं चीजों से भरा
- 9:40रहता है। काम के प्रश्न तो एक आध कभी कभी
- 9:46मिलता है वरन इन संसार की ऐसी बातों के लिए ही भरा रहता है।
- 9:54पर मैं उनके ऊपर कोई ख्याल नहीं करता।
- 9:57क्यों? क्योंकि यह मेरे बस की बात है अगर
- 10:04कोई बीमार है पर वो कहता है कि बाबा पर याद कर दो तो ज़रा सोंची।
- 10:10ये बाबा किस किस के लिए? प्रयाग करण कभी किसी एक के लिए
- 10:21भीतर से दुआएं निकलती है, लेकिन उसका कारण तुम नहीं होते।
- 10:27मेरे शब्दों को ध्यान से समझे। कभी किसी एक के लिए भीतर से दुआ
- 10:32निकलती है, लेकिन उसके कारण तुम नहीं होते।
- 10:37उसके उसका कारण दुवा लेने वाला होता है।
- 10:40तुम भूल जाते हो तुम कहते हो, मैंने इसे दुआ दी, तुम गलती हो।
- 10:48उस व्यक्ति ने दुआ तुमसे ले ली क्योंकि दुआ देता है परमात्मा
- 10:55तुम्हारे भीतर का वो तत्व दुआ देता है तुमने कुछ ऐसा किया होगा
- 11:02क्योंकि उसने सोचा नहीं होगा जो तुम्हारा कर्तव्य भी नहीं बनता
- 11:06था। और वो तुमने कर दिया तो उसके भीतर
- 11:12से दुआ निपटेंगे और वो दुआ तुम्हारी सब दवाओं से ज्यादा
- 11:21मूल्यवान है, सबसे ज्यादा मूल्यवान, सबसे ज्यादा कीमती।
- 11:26वह दुआ है जो किसी भी कीमत से तुम्हारी दवा जो खरीदी जाती है वो
- 11:35उसके बराबर नहीं भरते है, दुआ ज्यादा भारी होती है।
- 11:48सर्कमस्टैंसेस को इग्नोर करना सीखो अब या कीमती सूत्रों में से
- 11:56एक सूत्र बता रहा हूँ कौन है जिसके जीवन में सर्कमस्टैंसेस
- 12:02अच्छे या बुरे नहीं आते? कोई भी ऐसा नहीं रहेगा।
- 12:07आपको और सर्कमस्टैंसेस के अधीन व्यक्ति किसी वक्त कुछ भी कर सकता
- 12:16है। अच्छा या बुरा?
- 12:19लेकिन इसका अर्थ ये नहीं। कि वह व्यक्ति स्वभाव का तस है,
- 12:24ऐसा नहीं। अगर कोई व्यक्ति परिस्थितिवश
- 12:29क्रोध करता है, परिस्थितिवश किसी प्रकार का कोई भी निर्णय लेता है
- 12:37तो इसका अर्थ नहीं कि ये इसका सौभाग्य है।
- 12:42यह है क्षणिक आवेग भी हो सकता है। इसलिए परिस्थितियों पर काबू करना
- 12:50सीखें और परिस्थितियों से समझौता करना सीख बड़ी गहरी बात।
- 12:58परिस्थितियों से समझौता करना है। उससे तुम्हारे भीतर की हार मानी।
- 13:07सरसता बनी रहेंगी। तुम जैसे भी हो, ये एक सिद्धांत
- 13:15नहीं है। तुम इसे सिद्धांत की तरह मत मांग।
- 13:20ये बहुत ऊंचे दर्जे की बात है जिनके लिए सिद्धांत है लव से
- 13:29कबीर, नानक, जिनके लिए ये सिद्धांत है, उनकी बात छोड़।
- 13:37और तुम उस तल पर जब आओगे तो तुम्हारे लिए भी यह सिद्धांत बन
- 13:42जाएगा, लेकिन अभी तुम उस तल पर आई नहीं जैसे लऊ से उस तल पर जा के
- 13:49कहते हैं कि जो करता है वह परमात्मा करता है।
- 13:58और जो करता है वह परमात्मा शुभ ही करता है।
- 14:02परमात्मा अशुभ कभी नहीं करता लेकिन ध्यान रखना ये शब्द लउसे के
- 14:09है। ये शब्द कृष्ण के हैं, कबीर के
- 14:13हैं, नानक के हैं। मीरा के।
- 14:16दया के हैं, सह जोते हैं ये शब्द तुम्हारे तुम इसकी नकल कर सकते
- 14:23हो, इमिटेट कर सकते हो, लेकिन ये शब्द तुम्हारे प्राणों से नहीं
- 14:27आएगा और जस्ट घड़ी ये शब्द तुम्हारे प्राणों से आएगा।
- 14:34तो ध्यान रखना अब मेरे आगे के शब्द और तुम्हारा काफिला लूट भी
- 14:39जाए तो तुम सी भी नहीं करोगे, तुम आह भी नहीं भरोगे तुम हाय भी नहीं
- 14:50कहोगे। काशीला पूरा का पूरा लूट जाए
- 14:58लेकिन तुम भूल जाते हो। मैं ये बात कहता हूँ उन लोगों के
- 15:03लिए जो उस तल पर पहुँच गए। जीस तल पर जाकर ये प्रज्ञा उपजती
- 15:11है। ये उन लोगों के लिए सत्य है जो
- 15:19लोग उस ऊंचाइयों को छू चूके हैं और ऐसे लोग बड़े गिनती चिंतित
- 15:26हैं। कोई कबीर नानक होता है, जो तू तो
- 15:33पाग है, जो भी तू करता है, चलो व्यापार करने के लिए कोई सामान
- 15:40खरीदने को मिल गए। भूखे साधु भूखे साधुओं को भोजन
- 15:45करा के घर वापस। जो तो पावे उसने ऐसा ही चाहा,
- 15:54लेकिन फिर याद करा दो कि ये उन लोगों के लिए है जो उस स्तर पर
- 16:00पहुँच गए हैं, उनका अपना कुछ नहीं।
- 16:06वो जानते हैं, भली भांति जानते हैं कि मेरा यहाँ कुछ नहीं, अगर
- 16:12खो गया तो मेरा कुछ भी नहीं खोया। अगर मिल गया तो मुझे कुछ नहीं
- 16:20मिला जो ये जानते हैं और भली भांति जानते हैं।
- 16:26उनका व्यवहार इस तरह का होगा, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति अगर इस
- 16:32बात को इमिटेट करेगा तो वह सिर्फ प्रायश्चित के अलावा झूँजलाहट के
- 16:38अलावा और कुछ नहीं पाएगा। नकल तो वो कर लेगा लेकिन पछताएगा।
- 16:45और किसी की भी नकल मत करना, इस शब्द को आप पर ले बांध लेना, नकल
- 16:52किसी की मत करना, किसी शांति की भी नकल मत करना और किसी सांसारिक
- 16:58की भी नकल मत करना। तुम अपनी सहजता से अपने स्वभाव
- 17:02में जीना। तुम नकल करने के लिए पैदा नहीं
- 17:05हो, परमात्मा ने तुम्हें ऑथेंटिक पर्सन बनाया है।
- 17:11तुम ऑथेंटिक प्रमाणिक व्यक्ति हो। तुम्हारी अपनी एक प्रमाणिकता है।
- 17:18तुम छोटे हो बड़े तुम छोटे कुल में उपजे बड़े कुल में उपजे।
- 17:24इस बात से कोई संबंध नहीं है, लेकिन तुम प्रमाणिक हो, तुम तुम
- 17:29हो, तुम्हारी वैल्यू किसी से कम नहीं।
- 17:37तुम्हारे भीतर ये आत्मविश्वास होना चाहिए कि मेरी स्वयं की।
- 17:44स्वतंत्रता सत्ता है जो किसी से मिलती नहीं सिर्फ नजदीक हो सकती
- 17:53है, लेकिन उसके साथ खूब खूब नहीं मिलती परमात्मा ने मैं बहुत बार
- 18:00कहा करता हूँ। दो पत्थर भी एक से नहीं बनाए।
- 18:05देखने में एक से लगेंगे, लेकिन जब हम उनको करोड़ों गुणा ज्यादा
- 18:11मैग्नीफाई कर लेंगे तो कहीं ना कहीं दोनों में फर्क लगेगा।
- 18:17एक साथ की दो चीजें बनाई नहीं तो आइए हम।
- 18:23फिर अपने शब्दों पे आ जाए, सबसे पहले 37 वर्ष सबसे पहले अपने भीतर
- 18:36जगाओ सहनशील। सहनशीलता, धीरज, दूसरा अवेयरनेस
- 18:49जागो तुमने बुरा कर दिया तुमने अच्छा कर दिया, बेहोशी में करते
- 18:56ये मत समझना कि अच्छा मैंने होश में किया।
- 19:00ये गलती में मत कहें, अच्छा भी तुम बेहोशी में कर देते हो और कभी
- 19:06कभी बुरा भी तुम बेहोशी में कर देते हो, लेकिन जागृत बने रहना।
- 19:20कुछ भी करो, बच्चा करो, बुरा करो, जागृत बनते रहे।
- 19:28अपने भीतर की सहन शक्ति को बढ़ाना, एक और दूसरा जागृति को
- 19:36बढ़ाते रहना दो। और तीसरा कर्तव्य जहाँ तुम्हारा
- 19:44कुछ कर्तव्य बनता है वहाँ पर खोपड़ी का काम शून्य कर देना,
- 19:51खोपड़ी से कुछ मत सोचना तुम जा रहे हो कोई राहगिल चलते चलते।
- 19:59अचानक वर्ग है केले के छलके के ऊपर पांव रखा और वो फिसल गया उसके
- 20:10कोई हंडे टूट गए। अक्सर लोग हँसें हंसने वाली कोई
- 20:17बात भी नहीं। क्या बात है हँसने पर?
- 20:21चूक सबसे होती है। चलते हुए सभी बेहोश होते हैं।
- 20:25दुर्घटना किसी के साथ भी कट सकती है, लेकिन यहाँ हँसने की जरूरत
- 20:32नहीं है। यह कर्तव्य आपका क्या?
- 20:36आप उस व्यक्ति को जैसा भी है, उसको उठाएं, उसकी सहायता करें।
- 20:44जैसे ही उसको सहायता चाहिए ये है आपकी कर्तव्य परायणता।
- 20:51वह आपका क्या लगता है? वह मित्र है, वह शत्रु है।
- 20:58वह आपका पड़ोसी है। वह दूरदराज किसी गाम शहर से आया।
- 21:05ये मत सोचना कर्तव्य परायणता कोई नजदीकी या दूरी नहीं देखती।
- 21:13कर्तव्य परायणता सिर्फ ये देखती है।
- 21:17कि इसको इस वक्त जरूरत है और मेरा कर्तव्य बनता है क्योंकि मैं
- 21:23समर्थ हूँ, समर्थ हूँ। मैं इसकी सहायता कर जीतने भी कर
- 21:29सकता हूँ। ये तीसरी बात है।
- 21:38अधिकार और कर्तव्य इन साथ इन दोनों को साथ साथ चलने दो, इन
- 21:46दोनों को अगर साथ साथ चलने दोगे तो तुम्हारी घर गृहस्थी में शांति
- 21:53और आनंद। और मिठास बना रहेगा।
- 21:59देखिए दो बर्तन पास पास पड़े होते हैं, झूठे बर्तन पास पास पड़े
- 22:08होते हैं, उर्को की बर्तन हैं, वह आपस में भिड़ भी सकते हैं।
- 22:14खट भी सकते हैं लेकिन इसका मतलब नहीं कि उन्होंने आपस में सदा के
- 22:19लिए झगड़ा कर दिया। दो बर्तन पास पास पड़े खट सकते
- 22:25हैं लेकिन खटकने का मतलब ये नहीं कि सदा के लिए उन्होंने बैर मोल
- 22:31ले लिया। नहीं नहीं।
- 22:32मांझने वाला धोने वाला उन छात्रों को धोएगा मांजेगा फिर एक जगह पे
- 22:38रख देगा जहाँ दो होंगे वहाँ झगड़ा होना स्वाभाविक है लेकिन झगड़ा मन
- 22:51भेद में? मतभेद, मनभेद में तब्दील न हो
- 22:55जाए, झगड़ा दुश्मनी में तब्दील न हो जाए, इस बात का ध्यान रखना,
- 23:04उसे फौरन कवर कर लेना। हमारी संस्कृति में एक शब्द बना
- 23:12है सभी संस्कृतियों में एक शब्द बना है, सॉरी, मैं शर्मिंदा हूँ
- 23:21मैं इस बात पर दुखी यह क्या था यह भूल चुप को सुधारने का उपाय।
- 23:29सभी से गलती होती है लेकिन हम कह देते हैं क्षमा करना हम से गलती
- 23:36हो गई। इंसान हैं वुमनिस्थु एरस गलतियाँ
- 23:42होती ही हैं लेकिन जानबूझ के नहीं, बस अगर जानबूझ के आपने कोई
- 23:48गलती नहीं की। तो वह तो क्षमणीय है, अपराध नहीं,
- 23:54वह तो गलती है और गलती तो मनुष्य का स्वभाव है, ह्यूमन इज़ टु एर्स
- 24:00इसका मतलब मनुष्य गलती का पुतला है, गलती करेगा ही, लेकिन गलती?
- 24:11अचानक होनी चाहिए, जान बूझकर नहीं आनी चाहिए ये दोनों चीजों में
- 24:17फर्क है। एक शरारत और षड्यंत्र रचकर गलती
- 24:22करना है। एक सहज ही गलती हो जाना है।
- 24:27गलती होने में और गलती करने में यही पर है।
- 24:31जब तुम षड्यंत्रपूर्वक साँझ बढ़ाकर चाल चलकर गलती करते हो तो
- 24:40वह षड्यंत्र होता है जो सहज सपाट जाते जाते गलती हो जाती है।
- 24:49वह तुमने जानबूझ के नहीं की, वह पाप नहीं क्षमा करने का जिगरा सदा
- 24:58ही बनाए रखना, वो छोटा हो या बड़ा हो, गलती अपने से बड़े से भी हो
- 25:05सकती है। गलती अपने से छोटे से भी हो सकती
- 25:08है, लेकिन गलती जानबूझ के न हो तो क्षमनीय है।
- 25:15यह कोई अपराध नहीं है और गलती जानबूझकर हो तो फिर क्षमनीय नहीं
- 25:21है। वो अपराध है।
- 25:25तो घर गृहस्थी के लिए कुछ उपाय बताई जिससे संतोष और सुख और अच्छी
- 25:35तरंगें लहरें घर के वातावरण में बनी रहे।
- 25:42यह छोटे बड़े की उपाधि। ध्यान से समझना हम बड़े गर्व से
- 25:50कह देते हैं कि हम शंस्यकारित हैं सनातन के, लेकिन इन संस्कारों ने
- 25:58हिंदुस्तान का बीड़ा गर्व कर दिया है।
- 26:04हम संस्कारों को निभाने में चले गए।
- 26:08हम हृदय को सहज और सलूक बनाने की दिशा में नहीं गए।
- 26:14हम हृदय को पवित्र करने में नहीं गए।
- 26:18हम फॉर्मेलिटी निभाने में चले गए और आज सब जगह हम फॉर्मेलिटी निभा
- 26:25रहे हैं, इंसान के साथ तो निभा रहे हैं, भगवान के दरबार में भी
- 26:29जाकर झुकते हैं और झुकते कहाँ हैं?
- 26:34बस शरीर झुकता है, हम कहाँ झुकते हैं?
- 26:38अन्यथा ऐसी कोई ताकत नहीं कि तुम्हारा झुकना भीतर से आए और
- 26:44झुकने के बाद तुम तब्दील ना हो। ट्रांसफॉर्मेशन ना हो, तुम्हारे
- 26:48भीतर ये हो ही नहीं सकता, लेकिन तुम झुकते हो, आदमी के आदमी भी
- 26:55झुकते हो। और झुकते क्या हो?
- 26:57उसके पीछे वह होता है, कोई कारण होता है स्वभाव वश तुम नहीं
- 27:03झुकते, तुम किसी कारणवश झुकते हो और यही कुछ प्रार्थना स्वभाव में
- 27:10हो रहा है। मंदिरों में, मस्जिदों में,
- 27:12गुरुद्वारों में हो रहा है। तुम झुकते तो हो?
- 27:15आडंबर तो सारे करते हो। सभी धर्मों की जो पहचान है, जो
- 27:21नियम है वह अपनाते हो, लेकिन हृदय के भीतर गांठ नहीं खोलते और यही
- 27:27चीज़ खोलने वाली थी वही तुम झुक जाते हो।
- 27:34झुकते न भी। शरीर की आकृति चाय बिल्कुल
- 27:38स्ट्रेट बनी रहती। तुम बिल्कुल अल्प की तरह खड़े
- 27:43रहते एक की तरह खड़े रहते कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन तुम भीतर
- 27:48से झुक जाते हो, उससे फर्क पड़ता है।
- 27:53बाहर झुकने से तुम तब्दील नहीं होगे, सिर पर ढांचा तब्दील होगा,
- 27:59शरीर का ढांचा थोड़ा मुड़ेगा लेकिन भीतर झुकने से क्रांति हो
- 28:05जाएगी। जैसे ही तुम भीतर से सचमुच झुक
- 28:09गए, क्रांति हो जाएगी। नम्रता उपजेवी और नम्रता तो
- 28:14छोड़ो, सत्य दखाई पर जाएगा। यह एक ऐसी कीमियां हैं तो
- 28:23तुम्हारी समझ में किसी की समझ में कभी भी आ जाए वह तत क्षण
- 28:27रूपांतरित हो जाएगा और तत क्षण उसका भ्रम ठुक जाएगा।
- 28:34हमने जीवन में कभी झुकना सीखा ही और इसीलिए कितने जन्म बीत गए हम
- 28:43सिधे ही रहे, स्टेट परमात्मा ने शरीर के लिए मेडा बना दिया।
- 28:54लेकिन हमारा अहंकार बिलकुल स्ट्रेट लाइन की तरह सदा खड़ा
- 29:01रहा। हम भीतर से नहीं झुक गए, बाहर की
- 29:07आकृतियों में हम झुक गए, उससे कुछ नहीं होता।
- 29:11वो सिर्फ एक ढकोसला है, वो सिर्फ एक सर्कस है, अलग अलग जातियों की
- 29:21देशों की अलग अलग सम्मान देने की रीतियां हैं और वो सिर्फ।
- 29:30यंत्रवत् हैं, भीतर से नहीं आती सभी देशों के अपने अपने एक देश
- 29:38में जब किसी को प्रेम देना हो, सत्कार देना हो, एक दूसरे पे
- 29:43थूकते। भला ये भी कोई तरीका?
- 29:49एक दूसरे पर थूकते है। बड़ा प्रेम बरसाया उसने उसने क्या
- 29:55थोका कमाल कर दिया। ऐसे विदेश और ऐसे विदेश है जहाँ
- 30:03थूकने से गर्द निकल जाती है। यह संस्कृति है मानव निर्मित
- 30:13मनुष्य की क्रियाएं। लेकिन मानव निर्मित 10
- 30:19कमेंटमेंट्स कमेंट से कोई मसला हल नहीं होता।
- 30:24मसला हल होता है भीतर के गुणों को।
- 30:28सही ढंग से लागू करने में मैंने कहा सहन शक्ति को बढ़ाइए सबसे
- 30:39पहली बात धीरज बढ़ाइए रोज़ मेरे पास प्रश्न आती है, बापू क्रिया
- 30:47योग भी करता हूँ। ध्यान में भी बैठता हूँ।
- 30:51थोड़ा थोड़ा आनंद भी आता है लेकिन वो जो आप कहते हो कुआं मिठास का
- 30:59वो कुआं भी नहीं है। बस ये धीरज को दिया है और बहू से
- 31:07साधक। अंत की बात को सुन तो लेते हैं
- 31:14लेकिन उसके नए होने से श्रद्धा दुखी रहते हैं।
- 31:19बुद्ध को क्यों हो गया? मुझे क्यों नहीं हुआ?
- 31:24बुद्ध ने झुकना सीखा। बुद्ध ने मरना सीखा, बुद्ध मर गए
- 31:32बुद्ध अंगली माल के सामने बेखौफ़ जाके खड़े हो जाते हैं और अंगली
- 31:38माल उन्हें सावधान करता है। सावधान अभू तक मैं अंगली मार
- 31:44सिर्फ मेरा एक शिकार बाकी है। और तुम मेरा आखिरी स्कार मत बनो न
- 31:51जाने मुझे तुम पर दया क्यों आ रही है तुम्हारे ये वस्त्र देख कर
- 31:56मुझे हृदय मेरा द्रवित हो रहा है तुम्हारे ऊपर कापा उठाने का दिल
- 32:02नहीं करता, यद्यपि तुम हमारे आखिरी।
- 32:07शिकार हो इसलिए वापस लौट जाओ, चले जाओ जहाँ से आए आगे मत बढ़ो,
- 32:16लेकिन बेखौफ़ बेखौफ़ बुद्ध धीमे धीमे।
- 32:25पगु के साथ उसके करीब जा रहे हैं वनों का सन्नाटा और दो ही व्यक्ति
- 32:38हैं अंगनीवाद हैं और भगवान बुद्ध हैं।
- 32:44और वो बराबर सावधान कर रहा है शिकारी शिकार को कभी सावधान करता
- 32:50है नहीं करता क्योंकि अगर शिकार को सावधान कर दिया तो मैं तो भाग
- 32:57जाएगा यहाँ उलटी बात है। शिकारी शिकार को सावधान करता है
- 33:04के आग उन तक रुक जाओ, मुझे ना जाने क्यों तस आता है, यद्यपि आज
- 33:10मेरा लक्ष्य पूर्ण होने जा रहा है, बस एक ही व्यक्ति एक ही अंगदी
- 33:15वाक्य थी, और तुम मेरे लास्ट शिकार आखिरी शिकार।
- 33:23लेकिन अजीब विडंबना मेरे सामने प्रकृति ने पेश कर दी।
- 33:29तुम्हें मारने का दिल भी नहीं करता और शिकार भी मेरे आखिर हो।
- 33:35मैं तुमसे यही कहूंगा कि वापस चले जाओ।
- 33:40लेकिन बुध वापस नहीं जाते, धीमे धीमे कदमों से उसके पास चले जाते
- 33:46है और ऐसा व्यक्ति जो भीतर से नॉन रिऐक्टिव है।
- 33:59उसकी तरंगें बदल जाती हैं। तुम अगर खूंखार शेर के सामने
- 34:06निस्तरंगा अवस्था में गुजर जाओ तो शेर तुम्हें नुकसान नहीं
- 34:10पहुंचाएगा। ध्यान रखना कोई भी जानवर तुम्हें
- 34:15तब तक नुकसान नहीं पहुंचाता। जब तक तुम उसको नुकसान पहुंचाने
- 34:21की भावना नहीं विकसित करते, तुम भावना विकसित करते हो उसको नुकसान
- 34:28पहुंचाने की और वह तुम्हारी भावनाओं को समझ आता है।
- 34:33वह तुम पर अटैक करेगा ही तब। यह ईश्वरीय प्रदत्त गुण है।
- 34:38उनके भीतर खूंखार से कुंखार जहरीले से जहरीला जानवर सांप
- 34:45बिच्छू तक तुम्हें तब तक तुम्हें नहीं डसेगा जब तक उन्हें अंदेशा न
- 34:51हो जाए। और जैसे ही तुम्हारे भीतर हिंसा
- 34:56की प्रवृत्ति आई, तुम्हारे भीतर से कुछ ऐसे तरंगे रोम रोम से बाहर
- 35:01निकलने शुरू हो जाती है। जिन तरंगों को वो पशु या वो जीव
- 35:08जंतु जान जाती है। ग्रहण शक्ति है उनके भीतर कि यह
- 35:15व्यक्ति मुझे मारने की कामना रखता है, वह तुरंत अटैक कर देती है और
- 35:24सबसे बड़ी बात क्षमा करना सीखो, क्षमा मांगना तो सीखो ही।
- 35:34क्षमा करना भी सीखो, ये अद्भुत बात है।
- 35:41हम क्षमा मांगना ही सहाते रहते हैं।
- 35:43सारी बात अब कोई भी धर्म देख लो। कोई भी संस्कृति देख लो, समाज देख
- 35:52लो, घरों में भी सिखाया जाता है। अब तुमसे गलती हो गई तो मैं क्षमा
- 35:59मांगो, सॉरी कहो कान पकड़ो आगे से नहीं करोगे यह वचन तो हम क्षमा
- 36:07मांगना सिखाते हैं। जबकि क्षमा मांगना एक हिस्सा है।
- 36:14एक सिक्के का दूसरा हिस्सा। दूसरा पहलू हमने कभी सिखाया ही
- 36:20नहीं और दूसरा पहलू न सखाने की वजह से आज समाज में इतना असंतुलन
- 36:26है। जीस दिन हम समाज में हमारा समाज
- 36:33सिक्के के दोनों पहरुओं को सीखाना शुरू कर देगा।
- 36:36उस दिन समाज में शांति वो क्या है?
- 36:42मैं बहुत बार जीकर कर चुका हूँ, एक उत्सव।
- 36:51जैन धर्म में मुझे बहुत प्यारा लगता है उसको महोत्सव कहते हैं मह
- 36:57उत्सव बड़ा उत्सव है। वो सबसे बड़ा उत्सव है, वर्ष में
- 37:04एक बार आता है। उस दिन वो सभी इकट्ठे होते है,
- 37:13सिनान ध्यान करके पवित्र शरीर के साथ हो बैठते है, दो तीन अंगोटी
- 37:20पहन लेते है, भूखे बैठे रहते है। कुछ लोग सिर्फ जल का जीवन करते
- 37:29है, लेकिन कुछ लोग कुछ भी सेवा नहीं करते, भूखे रहते है और शांति
- 37:39से बैठते है, सिर्फ बैठते है। और कुछ नहीं करते।
- 37:46कुछ लोग कुछ जाप पाठ करते हैं, लेकिन कुछ लोग कुछ भी नहीं करते,
- 37:53सिर्फ व्यर्थते हैं। मैंने सभी धर्मों में सिर्फ एक
- 38:03धर्म ही ऐसा देखा। जो इस कीमती बात को भीतर से समझ
- 38:08पाया तो क्या कहते हैं? जो पर्युषण पर्व होता है, उनका
- 38:15महापरुषण पर्व और तो सभी बातें आम भी बताते हैं वो जो सभी धर्म
- 38:22बताते हैं। लेकिन एक बहुत बढ़िया बात
- 38:25उन्होंने खोजी जो कि बाकी धर्म सूख जाते है।
- 38:31कमेंट में उन धर्मों ने ये बात नहीं कही क्या क्षमा मांगो तो?
- 38:43लेकिन क्षमा कर दो आज के बाद इस क्षण के बाद यह महाप्रभुषण पर्व
- 38:52बीत जाने के बाद तुम्हारा दिमाग बिलकुल वाश हो जाएगा।
- 38:59किसने 10 साल 20 साल पहले तुम्हे गाड़ी निकाली?
- 39:05और वो तुमने गांठ की तरह बना दी गोल गांठ और तुम्हें पता नहीं वह
- 39:11गोल गांठ जिसके प्रति बनाई है उसको ज़रा भी पता नहीं है उसको
- 39:19दुखीणी देने वाली। गांठ जिसके भीतर होती है उसको दुख
- 39:24देती है। इस बात को आप अच्छी तरह से फिर
- 39:26समझो। अगर तुम्हारी मित्र अज्ञान की
- 39:30गांठ है तो पड़ोसी को दुख नहीं देती, अज्ञान की गांठ तुम्हें दुख
- 39:37देगी, जिनके भीतर वो गांठ है। तो किसी ने तुम्हे गाली दी, कुछ
- 39:46भी उपद्रव किया, कुछ भी तुम्हारा अधिकार छीन लिया, कुछ भी तुम्हारे
- 39:54साथ कोई धक्का किया उसने बल पूर्वक?
- 40:00उपयोग किया, अपनी ध्वस्त दिखाई, अपनी चालाकी दिखाई, अपना रुतबा
- 40:06दिखाया और कुछ गलत तुम्हारे साथ बेहेवियर किया।
- 40:14उसने तुम्हारे भीतर गांठ पड़ जाएंगे।
- 40:21और ध्यान रखना शेक्सपियर ने भी कहा।
- 40:24बुध ने भी कहा कि दूसरों की गलती के लिए तुम क्रोध करके स्वयं को
- 40:31दंड देते हो, दूसरों को नहीं गलती।
- 40:34उसकी दंड तुम खुद को देते हो क्योंकि क्रोध में।
- 40:39किसने तुम्हें गाली निकाल दी? तुम्हें क्रोध आया, बहुत क्रोध
- 40:44आया, इतना क्रोध आया, लेकिन तुम्हें ये पता नहीं कि उस क्रोध
- 40:48के क्षण में तुम्हारे भीतर कुछ ऐसे विषैले और मौन जब पैदा करता
- 40:54है शरीर, जिसके भीतर पैदा होगा जहर।
- 40:59उसको ही तो नुकसान पहुंचाएगा। जो व्यक्ति जहर पी लेता है या
- 41:05जिसके भीतर जहर उत्पादित होता है, नुकसान किसका करता है?
- 41:09उसी व्यक्ति का तो गाली तो उसने निकाली गलती तो उसकी और दंडित तुम
- 41:16स्वयं को कर रहे हो। तो सर तुम समझदार हुए या तुम ना
- 41:22समझो तो शेक्सपियर कहते हैं कि मनुष्य बड़ा मूर्ख है, दूसरों की
- 41:29गलती के लिए दंड खुद को देता है, गलती उसने की है कोई दुर्व्यवहार
- 41:35करके। कोई गैरजिम्मेदारना हरकत करके कोई
- 41:40गैरमानविक हरकत करते और तुम तुम अपने आपको क्रोधित करते हो,
- 41:49तुम्हारे भीतर ग्रंथियाँ जहर पैदा करती हैं।
- 41:54एडरनालिन कार्टिसोल वगैरह। जहरीले तत्व पैदा करते हैं जो जहर
- 42:00है। अगर उनकी ज्यादा मात्रा तुम्हारे
- 42:03शरीर के भीतर इंजेक्ट कर दी जाए तो निश्चित ही तुम मर जाओगे।
- 42:08तो उस अवस्था में जब तुम उत्तेजित या क्रोधित होते हो।
- 42:15उस अवस्था में ये जहरीले तत्व तुम्हारे भीतर पैदा होते हैं।
- 42:19वो काटी शोर हो, वो अडेनलिन हो, वो किसी और तरह का जहरीला तत्व
- 42:24हो, वो हार्मोन तुम्हारे शरीर को विकृत करते हैं और नुकसान कर देते
- 42:29हैं तो बुध भी कहते हैं, शेक्सपियर भी कहते हैं।
- 42:33के गलती तो की दूसरे वृत्त्य हैं दंड तुमने दिया खोद खो, ये कोई
- 42:39समझदारी की बात तो नहीं क्षमा मांगना सीखो और दूसरा।
- 42:51जो ये जैन धर्म के लोग महापरुषण पर्व के ऊपर आकर जगते की क्षमा
- 42:59करना सीखो ये जो गांठें तुमने बना ली, इनको खोल दो 1 साल में।
- 43:12जो 12 महीने में तुमसे कुछ ऐसी गलतियाँ हुईं, उनके लिए उससे
- 43:19क्षमा मांग रही हूँ और जो दूसरों से गलतियाँ हुईं तुमने गांठ बना
- 43:25ली, वो तुम्हें ही दुखी कर रहे हैं उन गांठों को आज खोल।
- 43:31इसलिए उसको महापुरुषन पर्व कहते हैं।
- 43:35सब गांठें खोल दो, आज सब को क्षमा कर दो और यह एक ऐसी कीमियां हैं
- 43:44जो कि दूसरों को भी सुखी करती है और तुम्हें भी सुखी करती है।
- 43:49दोनों धड़े से सुखी हो जाते हैं तो वो जैन धर्म के जीतने भी शिष्य
- 43:56हैं। वो एक स्थान पर स्थानक पर कठे हो
- 43:59जाते हैं और शरीर को पवित्र करने के बाद शिनान ध्यान करने के बाद।
- 44:08एक वस्त्र लपेट के बैठ जाते हैं और आनंद से शांत भाव से बैठते
- 44:15हैं। देखते हैं मैंने वर्ष भर में क्या
- 44:18किया है? और गांठें तो भीतर ही पड़ी ज्यादा
- 44:22जाती। तो प्रत्येक व्यक्ति से वो माफी
- 44:28मांगते हैं। अगर कुछ याद आए तो भी ना याद आई
- 44:34तो भी अगर मैंने जीवन में कभी कोई गलती की है तो मैं आज तुमसे।
- 44:42कर वध प्रार्थना करता हूँ, एक दूसरों के पांव को छूते हैं, ये
- 44:47तो मुझे क्षमा करता हूँ और वो सभी के चरण से स्पर्श करते हैं।
- 44:57मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया तुमने जो भी गलती की।
- 45:01तुम्हें याद है नहीं है, लेकिन मैंने वो गांठ बांध दी, मैंने
- 45:06तुम्हें क्षमा कर दिया और तुम भी मुझे क्षमा कर दो, मैंने कभी कोई
- 45:11जाने या अनजाने जो भी गलती की है, तुम मुझे उससे मुक्त कर दो।
- 45:17इससे क्या होता है? दोनों के मन के ऊपर जो बोझ था?
- 45:21उपद्रव का कारण बीमारियों का कारण असंतोष का कारण दुखों का कारण वह
- 45:28टूट जाता है। गांठ खुल जाती है और दादा सीधा हो
- 45:32जाता है। उसे ही आनंद की अवस्था कहते हैं।
- 45:38कोई गांठ न रही बीच में। रहिमन धागा प्रेमिका मत तोड़ो
- 45:43चटकाय टूटे थे फिर नहीं मिले मिले गांठ पर जाए यह गांठ पर तंग करती
- 45:52इन गांठों को खोलना ही रहीम ने कहा बड़ा सुन्दर शब्द कहा है।
- 45:58गांठ का मतलब है वह जो तुम्हें दुख देती है, वह जो तुम्हें कष्ट
- 46:03में डाल देती है, वह जो तुम्हें सदा जहरीला बनाए रखती है, तुम
- 46:09दुश्मन के प्रति सदा ही ऐसी भावना रखते हो, तुम्हें यह नहीं पता।
- 46:16कि तुम दुश्मन का ऐसी भावना रख के कुछ भी नहीं, बिगाड़ते तुम
- 46:20बिगाड़ते हो स्वयं का, क्योंकि जब तुम किसी से बैर रखोगे, ईशा
- 46:28करोगे, द्वेष करोगे, नफरत करोगे तो तुम उसका तो कुछ बिगाड़ते
- 46:34नहीं। तुम खुद का ही बिगाड़ते हो क्रोध
- 46:43के उठने का, नफरत के उठने का, ईशा और देश के उठने का एक बहुत भी
- 46:50बेहतर है। अमूलाधार के पास से उठता है और
- 46:56ज्ञानी व्यक्ति संघ जाता है। जैसे ही वह शुरू होता है उठना और
- 47:04ज्ञानी व्यक्ति वहीं से उसका सोलवेशन कर लेता है, इसलिए ज्ञानी
- 47:10उसे ही कहते हैं। जिसके इशारे पर ये सारे विकार
- 47:15नाचते हैं। अभी तक तो तुम विकारों के इशारों
- 47:20पर नाचते हो विकार तुम्हें नचाते हैं।
- 47:24वैज्ञानिक कोण शृद्ध, कोण योगी कोण सिग्न्यासी, कोण साधु कोण?
- 47:31जो विकारों को अपनी उँगलियों पर निचाये।
- 47:36जो इंद्र बन गया, जिसने अपनी इंद्रियों के सभी विकारों पर विजय
- 47:42प्राप्त कर ली। वह इंद्र और जो इंद्र बन गया वह
- 47:46फिर स्वर्ग पे राज़ करेगा स्वर्ग या निसुख?
- 47:51सुख का केंद्र कोई स्वर्ग भोगोलिक संस्था नहीं है, भोगोलिक जमीन
- 47:56नहीं है। जीस व्यक्ति ने इंद्रियों के
- 48:01खुराक पातों पर अंकुश लगाना सीख लिया।
- 48:06विकारों पर विजय प्राप्त की। और विकारों को अपने ढंग से प्रयोग
- 48:10करना सीख लिया। वह व्यक्ति इंद्र हो गया।
- 48:17वह व्यक्ति भगवान हो गया। इसलिए वेदों में परमात्मा को जो
- 48:22शब्द दिया गया हे इंद्र वह इंद्र परमात्मा से किताब है।
- 48:30इंद्र परमात्मा से सन्मुख हो रहा है।
- 48:33हे इन्द्र ऐसा कर दो हे इन्द्र ऐसा कर दो हमारी गुमों की रक्षा
- 48:39कर हमारी रक्षा कर हमारी धन संपत्ति की रक्षा कर हमारी जमीनों
- 48:44की रक्षा कर। इंद्र कहते हैं, भगवान को और
- 48:50भगवान ही सिर्फ विकारों को जीत सकते हैं, विकारों को अपने ढंग से
- 48:55नचा सकते हैं। अभी तुम तो इंद्रन नहीं अभी तो
- 48:59तुम इंद्रियां तुम्हें नचाती हैं। इन्द्रियां नचाती हैं विकार
- 49:04तुम्हें नचाती हैं और तुम ना सकते हो इसलिए तुम दुखी हो।
- 49:08और परमात्मा सुखी क्यों है? क्योंकि वह इंद्र है इन्द्रियां
- 49:12उन्हें निजाती ही नहीं वह इंद्रियों को नचाता है।
- 49:18सभी आवेग जिन तुम शत्रु कहते हो काम, क्रोध, लोभ, मोघ, अहंकार।
- 49:26इन शत्रुओं को जो निजात है आएँगे जब तक व्यक्ति जिंदा है ये विकार
- 49:36आएँगे क्योंकि यह ऊर्जा का ही एक प्रारूप है, वो चाहे कोई भी विकार
- 49:43वो काम है, वह क्रोध, वह लोभ। वह मोह, वह अहंकार है, ये आएगा
- 49:51अगर नहीं आता तो समझो ही इस डॅड वह मृत है, वह मरा हुआ है।
- 49:57अगर जीवंत व्यक्ति है तो उसके भीतर ये विकार आएँगे।
- 50:01वह चाहे मुनि है, चाहे महात्मा है, चाहे संत है।
- 50:05चाहे कोई है लेकिन आगे टैकल करने की बात है।
- 50:12काम क्रोध लो मो। अंकार प्रत्येक शरीर धारी के भीतर
- 50:19आते हैं। ये कोई व्यक्ति गुमान न करे के
- 50:22मेरे भीतर नहीं आते नहीं। आगे उनसे डीलिंग कैसे होती है बस
- 50:28इस बात का फर्क है। तुम इंद्र बनकर उनसे निपटते हो या
- 50:34तुम इन्द्रियों की आज्ञा को मानकर अनुशन करते हो और उनके पीछे लगकर
- 50:41भोगों को भोगने में व्यर्थ हो जाते हो।
- 50:44बस बात तो इसकी है, तुम उन्हें कमांड करते हो या वो तुम्हें
- 50:49कमांड करते हैं। बात इसकी है तो सभी जीतने भी जैन
- 50:56धर्म के उपासक हैं, शिष्य हैं, श्रावक हैं, आदमी तो छोड़ो।
- 51:05चलते फिरते अचानक किसी कारण से ध्यान भटक गया और तुम्हारा वजन तो
- 51:15एक क्विंटन भी हो सकता है। 80 किलो 60 किलो भी हो सकता है।
- 51:20दुबले पतले इंसान भी हो सकते हो 4030 किलो।
- 51:25लेकिन उन जीव जंतुओं के लिए जो दिखते भी नहीं है बहुत मेंहीन है
- 51:29आकार में, वो तो बड़े दुर्बल है उनके लिए तो तुम्हारा वज़न जैसे
- 51:38पूरी की पूरी एक पृथ्वी तुम्हारे ऊपर कर गई इतना वज़न है।
- 51:43और वो मर गए होंगे और तुमने जान के नहीं मारे तुम बस चल रहे थे
- 51:51स्वभाव तक वो मरेंगे ही, मरेंगे और संतों ने।
- 51:55तभी से जैन मुनियों ने कहा कि हम तो पैदल चलेंगे, उन्हें पता नहीं
- 52:00तुम पैदल तो चलोगे? लेकिन कितना ही पैदल चल बहुत से
- 52:07किटाणु तो मरेंगे ही, बैठ तुम कितना ही यत्न कर दो।
- 52:11तुम्हारी आँखों के ऊपर कोई ऐसा दूरबीन, कोई लेंस तो लगा नहीं।
- 52:17कोई हेर्बल टेलीस्कोप नहीं है। कोई जेम्स वेब टेलीस्कोप नहीं है।
- 52:23जो बहुत में हीन आकार के बैक्टीरिया को देख ले वो मरेंगे
- 52:30और उनके लिए तुमने उनकी हत्या की। तुम हिंसक हो तो ये तुमसे प्राप्त
- 52:37हो गया वे अनजान। तो अनजाने में किए हुए पाप का वो
- 52:43प्रायश्चित नहीं करते। वो सर्पक क्षमा मांगते वो कहते
- 52:49हैं, देखो मैंने जान के नहीं किया हे सूक्षम जीव जानता हूँ हमने
- 52:56किसी ऐसी। आवेश के वशीबूत तुम्हारी मृत्यु
- 53:06का कारण नहीं पैदा किया, सहज में ऐसा घट गया।
- 53:11हमने तुम्हे जानबूझ के नहीं मारा, हमें क्षमा करता हूँ।
- 53:17सभी जीव जंतुओं से सभी मनुष्यों से वो क्षमा मांगते हैं और क्षमा
- 53:26कर देते हैं। यह अद्भुत परीक्षण पर्व था जैन
- 53:34धर्म का। काश यह पर्व प्रत्येक धर्म नहीं,
- 53:42प्रत्येक समाज नहीं। प्रत्येक घर और प्रत्येक घर का
- 53:49प्रत्येक जीव इसके ऊपर अमल करना शुरू करते है।
- 53:55फिर देखो संसार शांति का समद्र हो जाएगा, संसार आनंद का सागर हो
- 54:06जाएगा अगर इसी पर्व को हर वर्ष। हर धर्म का व्यक्ति अपनाएं किसी
- 54:19भी धर्म की अच्छी व्यवस्था को उठाने न चाहिए तो चाहे धर्म कोई
- 54:24भी हो जिससे मानवता सुखी हो, जिससे आनंद की बढ़ोत्तरी हो
- 54:31तुम्हारे भीतर। तो जैन धर्म का ये पर्युषण पर
- 54:35बड़ा सुन्दर है। यह मानने योग्य है प्रत्येक
- 54:39धर्मों के द्वारा और धर्म ही नहीं, प्रत्येक समाज मैं कहता हूँ
- 54:47प्रत्येक देश, प्रत्येक समाज और प्रत्येक घर।
- 54:52प्रत्येक घर का प्रत्येक जीव यह है अवस्था करे साल में 1 दिन अपने
- 55:02घर में तुम जन्मदिन मनाते हो, तुम मृत्यु का शोक दिवस मनाते हो,
- 55:08स्मृति दिवस मनाते हो, लेकिन तुम पर्युषण पर्व कभी नहीं मनाते।
- 55:13जैन धर्म की ये अद्भुत खोज कि जाने अनजाने पाप होते ही रहते हैं
- 55:241 दिन ऐसा मुक्कर कर लिया जाए किया है।
- 55:28हमारे हिंदू धर्म में भी ऐसा किया है।
- 55:33नव वर्ष को यह संदेश आते हैं कि मैंने इस वर्ष में अगर कोई मैंने
- 55:40गलत शब्द का उपयोग किया हो, जिससे आपकी भावनाओं को दुख पहुंचा हो,
- 55:47आह तू ही हो तुम्हारे मनोवृत्ति। और तुम्हें किसी प्रकार का कोई
- 55:52नुकसान हुआ हो। यद्यपि उसमें मेरा कोई इरादतन
- 55:57नहीं था मसला, लेकिन तुम मुझे उसके लिए क्षमा करते हो।
- 56:02मैं बीते हुए गए हुए साल के लिए अपने किए हुए उदंडताओं के लिए
- 56:08अपराधों के लिए। आपसे क्षमा का स्वास्थ्यघाट मुझे
- 56:13आप क्षमा करता हूँ ये आज होता है लेकिन एक संदेश के रूप में होता
- 56:18है मनो संदेश नहीं इसको मन के भीतर अपनाया नहीं जाता।
- 56:28भावनाओं के भीतर संजोया नहीं जाता।
- 56:31मन से क्षमा नहीं मांगी जाती। सिर्फ एक फारमैलटी के रूप में
- 56:35कार्ड पर छुपा लिया जाता है जब व्हाट्सएप पर भेज दिया जाता है।
- 56:39बस बात खत्म हो गई लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती, बात खत्म होती है
- 56:46इसको। जीवन में अपना लेने से इसको जीवन
- 56:52में अपना लेना और जैसे ही तुम जीवन में अपनाओगे तुम पाओगे तुमसे
- 57:00कोई गलती हुई वर्ष भर तो जब आएगा आएगा।
- 57:05तुम उसी वक्त उसको क्षमा कर दो कि भाई गलती हो गई, मैंने तुम्हें
- 57:11कुछ कह दिया तुम मुझे माफ़ कर दो, तुम्हारे हृदय को आघात लगा मुझे
- 57:19माफ़ कर दो और जो मेरे हृदय को तुम्हारे कहने से आघात लगा, मैं
- 57:23तुम्हें माफ़ करती हूँ। क्षण हिसाब क्लियर कर दिया जाए।
- 57:28वाश कर दिया जाए तो तुम्हारे अचेतन मन की भीड़ कम होती जाएगी
- 57:33और अचेतन मन की भीड़ कम होते होते होते इसी को निरझिरा कहते हैं।
- 57:38भगवान महादेव तुम कैबिल के उस तल पर पहुँच जाओगे।
- 57:44जहाँ तुम अकेले रह जाते हो, भीड़भाड़ से दूर इस भीड़भाड़ को
- 57:48सबको समाप्त कर दो और उसका ये उपाय है प्रत्यक्ष क्षमा माकलो
- 57:54हृदय से क्षमा मकलो उन जंतुओं के लिए जो तुम्हारे पांव के नीचे आ
- 57:58के मर गए। अहिंसा का यह रूप जैन धर्म में
- 58:04मैंने बड़ी प्रबलता से देखा और जैन धर्म में इतने लोग जो पहुंचे
- 58:11उनका एक कारण मैंने यही पाया। इतने लोग किसी धर्म में नहीं
- 58:17पहुंचे तो मैं जानकर आश्चर्य होगा।
- 58:2124 तीर्थंकर, सभी राजा और प्रत्येक व्यक्ति कैबले की अवस्था
- 58:27को प्राप्त करके आके उसका कारण क्या था?
- 58:30उसका बेसिक कार्य यही प्रदुषण पर था की उन्होंने क्षमा मांग ली और
- 58:36क्षमा कर दिया। गांठ नहीं बची और ये गांठ ही
- 58:40अज्ञान की गांठ है। यही तुम्हें तंग करती है, यही
- 58:44तुम्हें बांधती है। इसी से तुम दुःखित होते हो, इसको
- 58:49अपना लो, तुम्हारा जीवन सुखी हो जाएगा, तुम्हारे संसार के लिए भी
- 58:54काम आएगा और तुम्हें? अध्यात्म के अंदर कैवल्य की
- 59:02उपलब्धि के काम भी आएगा। दोनों मसलेहले होंगे, संसार में
- 59:07आनंद मिलेगा, सुख मिलेगा, शांति मिलेंगे और उस स्थल पर जाकर आनंद
- 59:14की लपटों से तुम शराब और कुछ। धन्यवाद।