Latest / Baba ji Vijay Vats / 9 Mar 25 - आज मानवता सबसे ज्यादा दुखी क्यों है? मान्यताओं को कैसे त्यागें? सुखी होने का सरल सूत्र!
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- 0:05जो तुम्हारा है ही नहीं, उसका कभी गुमान मत करना और जो तुम्हारा है।
- 0:21उसका गमान हो ही नहीं सकता, जो तुमसे छीन लिया जाए वो तुम्हारा
- 0:33नहीं है और जो तुमसे छीना ही न जा सके।
- 0:40वही तुम्हारा है, जो तुम्हारा है, रहेगा था वही तुम्हारा है।
- 1:00जो तुम्हारा नहीं है उसका कभी गौमान मत करना, वह तो मात्र
- 1:12तुम्हारा भ्रम है। भ्रम के कारण तुम जो तुम्हारा है
- 1:19नहीं, उसको अपना समझे बैठे हो, यह शरीर तुम्हारा नहीं है, यह धन
- 1:31तुम्हारा नहीं है। ये पदवी तुम्हारी नहीं है, मान
- 1:44सम्मान तुम्हारा नहीं। सिर्फ मान ही तुम्हारा नहीं है।
- 1:56एस सम्मान भी तुम्हारा नहीं है। जीसको लोग प्रणब करते हैं, वो
- 2:07तुम्हारा नहीं है। और जीसको लोग गालियाँ निकालते
- 2:11हैं, वो भी तुम्हारा नहीं, तुम्हारा है, क्या?
- 2:22बस वो ही तुम्हारा है जो सीना न जा सके?
- 2:32जो सदा से है और सदा तक रहे कहा वो तुम्हारा है जो बीच में कुछ
- 2:45लम्हों के लिए आया। और चला गया पुत भर ने उसको अपना
- 2:55मान भी मत बैठना, सारी दुविधा सारे दुखों का कारण।
- 3:06सारे वेलापों का कारण यही भ्रांति है कि यह मेरा है और तुम्हारा
- 3:23होता नहीं, सच ही है। और जब वो तुम्हारा रहता नहीं, तुम
- 3:32छाती पीटते हो, रोते चिल्लाते हो, गुहार लगाते हो, वो तुम्हारा था
- 3:42ही नहीं। स्वीकार कर रहा हूँ।
- 3:52ये तान तुम्हारा नहीं है एक बात और ध्यान में रख लेना।
- 4:08जो तुम्हारा नहीं है, उसकी निंदा भी मत करना, उसकी उपेक्षा भी मत
- 4:17करना। और जो तुम्हारा है, उसको महिमा
- 4:28मंडित भी बात कर रहे है क्योंकि जो तुम्हारा नहीं है बस इसको जान
- 4:37लेना जो तुम्हारा नहीं है। जो तुम्हारा नहीं है उसका उपयोग
- 4:50कर लेना, उसका उपयोग कर लेना, उससे काम ले लेना जो तुम्हारा है।
- 5:03ये शरीर तुम्हारा है नहीं, लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि तुम इसे
- 5:09मेटाडिन ईश्वर ने अगर तुम्हें शरीर दिया है, बहुत गहरा कारण रहा
- 5:19होगा। इसका उपयोग कर जैसे रथवान को पता
- 5:29होता है कि ये रथ मेरा नहीं है, मैं रथ पे स्वार्थ हूँ तो क्या वो
- 5:35रथ को तोड़ देता है? क्या वो रथ को खंडित कर देता है,
- 5:44नहीं करता है, क्यों? क्योंकि वो जानता है कि इस रथ के
- 5:51ऊपर सवार हो के मैं मीरों दूरी तय कर जाऊंगा।
- 6:02जो तुम्हारा नहीं है उसका उपयोग कर धन तुम्हारा नहीं है, उसको
- 6:16कुएं में नहीं फेंक देना है। उसको आग नहीं लगा देना है, उसका
- 6:25उपयोग कर लेना है। जो जो भी तुम्हारा नहीं है, जान
- 6:37लेना है कि यह तुम्हारा नहीं है। और तुम्हारा क्या नहीं है?
- 6:47क्यों? मृत्यु के वक्त या जो नींद के
- 6:52वक्त बड़ी मजेदार बात है, तुम्हारा नहीं होता वही तुम्हारा
- 6:59है? अब मैंने नींद शब्द क्यों कहा?
- 7:04क्योंकि नींद शब्द तुम रोज़ महसूस करते हो मृत्यु तो तुम कभी महसूस
- 7:11करते हो और जीस दिन तुमने मृत्यु को महसूस कर लिया उस दिन तुम आमूल
- 7:18चूल परिवर्तित हो जाओगे। लेकिन एक मृत्यु और भी है जिसका
- 7:26अहसास तुम्हें रोज़ होता है और वह मृत्यु है।
- 7:31नींद नींद में तुम्हारा क्या होता है और नींद में?
- 7:39तुम क्या होते हो ये सोचना है जब तुम गहन निद्रा में सुश्रुति की
- 7:47अवस्था में मग्न होकर सोए पड़े होते हो तो तुम्हारा क्या होता
- 7:54है? ये शरीर तुम्हारा होता है नहीं,
- 8:01इसका तो भान तक भी नहीं होता है अगर तुम्हें ये भान होता रहे कि
- 8:10मेरा शरीर मेरा है। तो तुम कभी आराम की नींद, चैन और
- 8:17सुकून की नींद सो न पाओगे तो यहाँ से समझी अगर तुम्हें सोए पड़े ये
- 8:30अहसास होता रहा। कि ये शरीर मैं नहीं हूँ, मेरा
- 8:35नहीं है तो तुम ठीक से सो ना सकोगे।
- 8:40तुम सो ही ना सकोगे। इसी तरह है जो तुमने इस संसार में
- 8:48मेरा समझा वह मात्र। तुम्हारे ऊपर बोझ है तुम्हारी
- 8:57मान्यताएँ मात्र तुम्हारे ऊपर बोझ है, अबर्डन अपॉन यू।
- 9:11तुम्हारे ऊपर एक बोझ इसे ढो रहा है।
- 9:23जितनी भी तुम्हारी मान्यताएँ हैं और मान्यता तुम्हारी एक नहीं गनाई
- 9:28नहीं जा सकती इतनी मान्यताएँ। तुमने भर ली है तो वो गिनाई भी
- 9:42नहीं जा सकती और सच पूछो तुम्हें खुद भी नहीं पता कि तुमने क्या
- 9:50क्या मान रखा है और फिर अगर तुम कहो।
- 9:57बाबा मैं दुखी हूँ तो कोई हैरानी वाली बात नहीं है अगर कोई सिर के
- 10:09ऊपर। इतना भार ढोएगा कि उस भार के वो
- 10:18खुद दब ही जाए तो वह सुकून पायेगा कैसे?
- 10:30सारी मानवता आज दुखी है। सब कुछ होते हुए मानवता के पास।
- 10:37इतना कुछ कभी नहीं था जितना कुछ आज है और सब कुछ होते हुए आज
- 10:46मानवता सबसे ज्यादा दुखी है। क्योंकि तुमने मान रखा है पशुओं
- 11:03से एक बात सीखनी होगी। पक्षियों से एक बात सीखनी होगी
- 11:13नदियों से, झीलों से। तारों से, ग्रहों से, नक्षत्रों
- 11:23से सूर्य से, चंद्रमा से प्रकृति से उपवन से एक बात सीखनी होगी।
- 11:35क्या बात सीखनी होगी कि वो जैसे हैं वैसे हैं, यह बात सीखनी होगी।
- 11:47पक्षी कुछ मानता नहीं, चाँद तारे भी कुछ नहीं मानते।
- 11:58चाँद तारों की कुछ धारणाएं नहीं हैं, तत्वों की कोई धारणाएं नहीं
- 12:08हैं जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि, आकाश की कोई धारणा नहीं है।
- 12:21कोई मान नहीं नहीं रखा है उसने, इसलिए वो सुखी हैं बस वो महज।
- 12:39चल रहे हैं अपनी मौज अपनी मस्ती से सहजे चाल से कितना प्यारा होता
- 12:50है सूरज जब निकलता है सुबह। और जब डूबता है साँझ सारे दिन का
- 12:56सफर उसे ज़रा भी नहीं थकाता चन्द्रमा की कलाएं घटती पड़ती है
- 13:05ये घटना बढ़ना कलाओं का उसे ज़रा भी बेशिल नहीं करता की मैं घट
- 13:12क्यों गया? मैं वर क्यों गया?
- 13:16उसने कुछ मान नहीं रखा। जीतने भी प्राणी हैं, मछली है,
- 13:25सूअर है, हिरण है, गाय है, बुलबुल है।
- 13:31है, कोयल है, कौआ है, हंस है, कबूतर है, तोता है, बस वो है, कुछ
- 13:45माने हुए नहीं है, इसीलिए इतने निरबोज है।
- 13:52आपने किसी पंछी को चिल्लाते हुए देखा कि मेरी हार्टबीट बढ़ गई है,
- 13:59डॉक्टर को बोलो। किसी पक्षी को, किसी पशु को
- 14:14दुर्भावनाओं से या शुभभावनाओं से गृहसित पाया आपने मनुष्य के
- 14:23अतिरिक्त। सजना में किसी ने भी कुछ मान नहीं
- 14:32रखा। इसलिए सभी मस्त हैं इसलिए सभी
- 14:41इतने प्यारे हैं आप सुबह सुबह उठते हो?
- 14:47प्रकृति में चले जाना, वृक्षों को देखना, उन्हें चूमने का मन करेगा।
- 14:55इतने निर्दोष हैं, इतने मासूम है, पक्षियों के चेहरे की तरफ़ कभी
- 15:04देखा? उनको देखकर प्रसन्नता होती है
- 15:15खलते हुए फूलों को देखकर हवाओं में जैसे वो नृत्य करता है, कितना
- 15:23प्यारा लगता है। प्रकृति इसलिए इतनी सुन्दर लगती
- 15:31है आपको की प्रकृति ने किसी ने भी कुछ मान नहीं रखा।
- 15:44प्रकृति का प्रत्येक अंश। जो है, जैसा है वैसा ही बना रहता
- 15:52है, इसलिए सूखे है। जैसे जैसे तुम्हारी मान्यताएँ
- 16:06बढ़ती जाती हैं, इसको एक मापदंड की तरह ले लेना।
- 16:17जैसे जैसे तुम्हारी मान्यताएँ बढ़ने लगती हैं, वैसे वैसे तुम
- 16:24दुखी होती हो और जैसे जैसे तुम्हारी मान्यताएँ।
- 16:35हटती रहती हैं। वैसे वैसे तुम सुखी होते रहते हो।
- 16:42बस यही सूत्र हैं सुखी रहने का और दुखी होने का अपने।
- 16:52होने के अतिरिक्त तुमने जो भी कुछ माना उसके कारण तुम दुखी हो और जो
- 17:07तुम हो उसके कारण तुम प्रसन्न हो। तुम जो हो उसके कारण तुम कभी दुखी
- 17:20हो ही नहीं हो सकते। वह तो प्रसन्नता का एक सागर है जो
- 17:27तुम नहीं हो और तुमने मान रखा है बस वो ही तुम्हारे दुख का कारण
- 17:33ऊँचाई कुछ भी हो। पदार्थ से लेकर परमात्मा तक तुमने
- 17:45जो भी मान रखा है, वह तुम्हें दुःख देखा है।
- 17:55और जानने की तुम्हे आवश्यकता नहीं वो तो तुम हो, बस हो और होने में
- 18:07ही तुम। जैसे उतरते हो, भाग्यशाली हो जाता
- 18:14है, आनंदित हो जाते हो, मस्त हो जाते हो।
- 18:26रोम रोम तुम्हारा खुशी से छलकता है।
- 18:33अगर तुम दुखी हो, ज्यादा दुखी हो तो एक बात को पक्का समझ लेना कि
- 18:45तुमने कुछ शास्त्रों से। कुछ किताबों से कुछ गुरूओं से,
- 18:54कुछ मार्गदर्शकों से कुछ वक्ताओं से कुछ मान लिया।
- 19:10और जितना तुमने मान लिया उसी मात्रा में तुम दुखी हो जाओगे,
- 19:17क्योंकि मानना तुम्हारे मन के ऊपर बोझ है जानना तुम्हें मुक्त करता
- 19:27है। मानना तुम्हें बांधता है और बंधन
- 19:34दुख का कारण है, इसलिए सनातन ने कहा मुक्त हो जाओ यानी सभी
- 19:46मान्यताओं को त्याग दो। और जैसे ही तुम मान्यताओं को
- 19:55त्यागों के एक एक करके ध्यान रखना, तुम स्वयं को तो कभी त्याग
- 20:02ही नहीं हो सकता असंभव। स्वयं का तो त्याग हो ही नहीं
- 20:11सकता। हमेशा वो ही त्याग आ जाता है जो
- 20:16तुम हो नहीं जो तुम्हारा है नहीं। तुम अपना त्याग कभी नहीं कर सकते,
- 20:29तुम अपने सच्चे स्वय का कभी त्याग नहीं कर सकते।
- 20:38अगर तुम कुछ दान करते हो तो सदा। वही दान करते हो जो तुम हो नहीं
- 20:51जो तुम्हारा है नहीं कभी नहीं था तुम्हारा कभी नहीं हो जाएगा
- 21:01तुम्हारा। और जो तुम्हारा है नहीं उसको अगर
- 21:12तुम मानोगे कि ये मेरा है तो वह एक बोझ हो जाएगा तुम्हारे दिमाग
- 21:20पर। तुम अगर दुखी हो तो एक बात को
- 21:26ध्यान में रखना कि तुमने बहुत अपने से अतिरिक्त बहुत कुछ मान
- 21:36रखा है कम दुखी हो। तो कम मान रखा है, ज्यादा दुखी हो
- 21:43तो ज्यादा मान रखा है और बहुत ज्यादा दुखी हो तो बहुत ज्यादा
- 21:52अपने आपको मान रखा है के धारणाएँ मान्यताएँ।
- 21:58तो मैं बांधती, यही तुम्हारे दुख का कारण है ये तुम्हारे सर के ऊपर
- 22:08जो गठड़ी रखी है, आज मानवता भार से युक्त है।
- 22:17जिससे पूछो मुझे ही कहेगा, मेरे मन पे बाहर है बर्डन है क्या है
- 22:30पता नहीं अज्ञात बोझ है। वो अज्ञात बोझ आपकी मान्यताओं का
- 22:42बोझ है। मान्यताएँ झूठ होती हैं।
- 22:48मान्यताएँ कभी सत्य नहीं होती। ऐसा मत समझना कि कुछ मान्यताएँ
- 22:55सत्य होती हैं। और कुछ मान्यताएँ झूठ होती हैं।
- 23:00इस भ्रम में मत रहना मान्यताएँ मात्र झूठ है।
- 23:08मान्यताएँ मात्र सच नहीं है और जो सच नहीं है।
- 23:15वो आपको सुख नहीं देगा, सच ही आपको सुख देगा।
- 23:26कैसे पता चले कि यह तुम्हारा नहीं है जो तुमसे छीना न जा सके?
- 23:38वह तुम्हारा है, जो जो भी आपसे छीना जा सकता है वो तुम्हारा नहीं
- 23:47है जो जो भी तुमसे छीना जा सकता है।
- 23:55वह तुम्हारा नहीं, मेरे पास एक विद्वान है।
- 24:02बात बात में कहने लगे कि ज्ञान को कोई छीन नहीं सकता, जो हमने जान
- 24:11लिया विद्या को कोई छीन नहीं सकता।
- 24:15मैंने कहा तुम तुम बाहरी विद्याओं की बात कर रहे हो।
- 24:22ये विद्याएं भी छीन ली जाएंगी। मृत्यु इसे भी छीन लेंगे।
- 24:32विद्या भी तुम्हारी नहीं है। तो लोग कहते हैं कि धन चुरा लेंगे
- 24:37जोक सम्मान चुरा लेंगे तुम्हारा सब कुछ चुराया जा सकता है।
- 24:52लेकिन तुम्हारा ज्ञान नहीं चुराया जा सकता।
- 24:56तुम्हारी विद्या नहीं चुराई जा सकती, बिलकुल चुराई जा सकती है।
- 25:02जीस विद्या को तुम विद्या की तरह जाने मृत्यु वो आपसे छीन ले के।
- 25:10सबसे बड़ी भ्रांति आज दुनिया को यही है।
- 25:15इसलिए इन्फॉर्मेशन जुटाने की इतनी जल्दबाजी भर लेना चाहते हो।
- 25:23तुम्हारे लिए यह भी एक खजाना है। जैसा हीरे जवाहरातों का स्वर्ण
- 25:32मुद्राएं का करसियों का एक खजाना तुम्हारे पास है वैसे ही सूचनाओं
- 25:41का एक खजाना तुम्हारे पास है। ये जो आज।
- 25:49लोग चिन्ह बुद्धिमान कहते हैं। वो समझते हैं कि हमारे पास बहुत
- 26:01खजाना है सूचनाओं का, ज्ञान का हम इतना जानते हैं, लेकिन नहीं।
- 26:08ये जिसे तुम ज्ञान कहते हो और जो छीना जा सकता है वह ज्ञान नहीं,
- 26:18इसलिए नकली ज्ञान भी तुम्हारी मानना है।
- 26:25इसको भी छोड़ना पड़ेगा। यह भी तुम्हारे ऊपर एक बोझ है।
- 26:31तुम्हारी गठड़ी के भीतर अगर देखा जाए तो ज्ञान से बड़ा बोझ कोई है
- 26:36ही नहीं, क्योंकि बाकी तो आप फेंक भी सकते हो।
- 26:44मूड धारणाओं को आप फेंक दोगे। जो आपने थोप लिया जो आपने मान
- 26:51लिया कि थाली में तीन रोटी नहीं रखनी चाहिए, यह 1 दिन आप छोड़
- 26:59दोगे धरना और अगर आपने मान लिया कि मोरनी मोर के?
- 27:06आंसुओं से गर्भवती होती है यह भी आप छोड़ दोगे।
- 27:11जीस सेन समझा आ जाये मूड धारणाएं आप छोड़ दोगे जैसे ही वो टूटेगी
- 27:24लेकिन वो धारणा है। जीसको तो आप श्रृंगार की तरह लिए
- 27:29करते हो, जो तुम्हे गहने लगते हैं, जो तुम्हे जेवरात लगते हैं
- 27:42जो तुम्हारे शरीर को चमचमाहट देते हैं, सुंदरता प्रदान करते हैं।
- 27:51उसको तुम चाह कर भी न छोड़ पाओगे। ओह है।
- 27:55ज्ञान मुक्ति के रास्ते पर चलने वाला प्रत्येक साधक इस बात को
- 28:08समझले। ज्ञान बड़ी से बड़ी बाधा है।
- 28:17धन बड़ी से बड़ी बाधा नहीं है। मान सबसे बड़ी बाधा नहीं है।
- 28:24ये कुर्सियाँ सबसे बड़ी बाधा नहीं है अगर सबसे बड़ी बाधा है।
- 28:31तो वो है जिसे तुम कहते हो कि इसे कोई छीन नहीं सकता।
- 28:36चोर चुरा नहीं सकता। डाकू डाका नहीं मार सकता।
- 28:40यही सबसे बड़ी वादा है और जो जितनी बड़ी वादा है वो ही
- 28:47तुम्हारे लिए उतना ही। व्यवधान पैदा करती है।
- 28:55वह तो ऐसा भारी पत्थर है जीसको हटाने का तुम्हारा खुद का मन ही
- 29:01नहीं करेगा कि इसको हटा भी दिया जाए।
- 29:05कभी किसी को अपने आभूषणों को उतार के नदियां में फेंकने का मन करता
- 29:10है, नहीं करता है तुम्हारे शरीर पर अगर गंदगी लग गई है, धूल जम गई
- 29:19है, पसीना आ गया है। शरीर से दुर्गंध आ रही है तो तुम
- 29:27उसको हटाने का उपाय कर सकते हो। स्नान करोगे, सुगंधित साबुन के
- 29:36साथ ना आओगे, रोम रोम को सुगंधित करोगे।
- 29:42उपाय करो लेकिन जीसको तुमने मान ही लिया गहना जीसको तुम जानते हो
- 29:53अपने हिसाब से कि यह गहना यह मुझे सुंदरता प्रदान करता है।
- 30:00उसको तो हटाने का तुम्हारा स्वयं का मन भी नहीं करेगा और यही
- 30:05मुश्किल है। ज्ञान बड़ी से बड़ी बाधा है।
- 30:14धन भी इतनी बड़ी बाधा है, लोग छोड़कर चले जाते हैं, मुनि बन
- 30:18जाते हैं, समर्पण कर देते हैं। धन इतनी बड़ी बात है, मान सम्मान
- 30:31भी छोड़ देते है ये भस्म लगाना ये अपनी मुँह सरकोली पेलेना।
- 30:46तुम्हारी आकृति को विकृत कर देना, यह मात्र इस बात का सबूत था कि
- 30:56तुम अपने आप से ही विकृत हो जाओ। इसका कारण जो भी बताया गया हो,
- 31:04गहरे से कारण जीता। तुमने देखा मस्त व्यक्ति कभी
- 31:12परवाह नहीं करता कि उसके बाल कटे हैं, नहीं कटे।
- 31:23उसने जो पहना है वो मैला है। जैसा उसने जो पहना है वो प्रेस
- 31:30किया हुआ है कि नहीं, उसकी क्रीज बनी है कि नहीं नहीं करता।
- 31:43धारणा ही तुम्हारे मन के ऊपर अज्ञात बोझ है।
- 31:50जीसको आप दिन भर रात ढोते हो और इसको आप नाजायज ही ढो रहे हो।
- 31:58इसको ढोने से आपका कोई मंतव्य हल नहीं होता बल्कि जो सुगंध बिखर
- 32:04जानी चाहिए आपके अस्तित्व में उसे ये पत्थर रोके रखता है।
- 32:14यह एक बात है। छोटी छोटी बाधाएँ हैं बाकी सभी
- 32:22मान्यताएँ लेकिन सबसे बड़ी मान्यता जो वादा है और जीसको
- 32:29हटाने का तुम्हारा मन खुद का भी नहीं होता, यही सबसे बड़ी बाधा
- 32:35है। अगर तुम्हें पता चल जाए कि तुम
- 32:44जिसे रस्सा समेत थे हो, वह रस्सी है नहीं, वह तो सांप है तो तुम
- 32:53उसे तुरंत फेंक दोगे। अगर तुम्हें पता चल जाए कि जीस
- 33:00पानी में आप हाथ डालते हो वह उबलता हुआ पानी है, हाथ जल जाएगा,
- 33:07तुम उसमें हाथ नहीं डालोगे? क्योंकि तुम जानते हो के उबलते
- 33:19पानी में हाथ डालेंगे, जस्टडैक हाथ को खीच लोगे, हाथ को जाने
- 33:31नहीं दोगे, लेकिन। यह ज्ञान तो तुम कभी छोड़ ही ना
- 33:42पाओगे। मुश्किल से मुश्किल बाधा जो आखिर
- 33:46में आती है मिशु इसी से ही दो चार होना पड़ता है आखिर में।
- 33:57वो है ज्ञान ज्ञान यानी तुम्हारी सूचनाओं का संग्रह है तुम्हारी
- 34:07इन्फॉर्मेशन की। एक यूनिटी है एक संग्रहित
- 34:17इन्फॉर्मेशन, संग्रहित सूचनाएं उसे तुम ज्ञान कहते हो ज्ञान है
- 34:25नहीं तुम्हारा है क्या नहीं जो तुमसे छीन लिया जाए।
- 34:35जब मृत्यु में तुमसे छीन लिया जाए, वो तुम्हारा नहीं, उस पर कभी
- 34:43मान मत करना, उस पर इतराना मत। ये शरीर तुमसे छीन लिया जाता है
- 34:59शरीर तुम्हारा है नहीं, इसकी आपने तोहिन भी नहीं करनी है।
- 35:08ये रथ है इसका उपयोग करना है। मन का भी आपने उपयोग करना है।
- 35:17बुद्धि का भी आपने उपयोग करना है। धन का भी आपने उपयोग करना है।
- 35:28मान सम्मान का भी आपने उपयोग करना है।
- 35:33तुम जिसे वासना ही कहते हो उनका भी तुमने उपयोग करना है।
- 35:40ये बात अलग है के ईश्वर ने अगर तुम्हे वासना हिंदी।
- 35:48उसका उपयोग तुम गलत करते हो। वासनाएं कभी गलत नहीं होती।
- 35:54वासनाओं का उपयोग गलत होता है। भला सोचो काम ऊर्जा को तुम वासना
- 36:04कहते हो? तो ये बताओ कि काम, वासना, गलत या
- 36:12काम वासना का उपयोग गलत भगवान राम, कृष्ण, नानक, कबीर, बुद्ध,
- 36:23महावीर। सभी काम वासना में उतरे उतरे,
- 36:31उन्होंने इसका उपयोग किया। मुश्कलात तो तब पैदा होती है जब
- 36:40वासनाएँ आपको उपयोग करना शुरू कर देती।
- 36:45ऐसे महान पुरुषों के साथ वासना ने इनका उपयोग नहीं किया।
- 36:54इन्होंने वासनाओं का उपयोग किया तो सर्जना कैसे बढ़ेगी?
- 37:04सृष्टि को बढ़ाने का अनिवार्य ढंक है, लेकिन मालकीय तो तुम्हारी ही
- 37:14है वासनाएँ तुम्हारी मालिक न बन जाएं।
- 37:19बस यही ध्यान रखना तुम इंद्रियों को मैंने बहुत से पागलों की बातें
- 37:28सुनी हैं, कहानियों सुनी हैं, देखा ने आँखों ने गलत दृश्य देख
- 37:35लिया जिसे वो गलत कहते हैं। सुंदर दृश्य।
- 37:39के दीवाने हो गए और उन्होंने आँखें फोड़ लीं।
- 37:47भगवान की इस सुंदर रचना को देखना और तुम्हारे सुंदर नैनो से देखना
- 37:55इसमें भला बुरा है क्या? कुछ भी तो बुरा नहीं जैसे तुम एक
- 38:12सुन्दर फूल को देखते हो। खिलता हुआ फूल ताजा ताजा किला है
- 38:18और तुम उसको भर नैन देख लेते हो, बस वैसा ही।
- 38:26सुन्दर स्त्री पुरुष को देखना है लेकिन कुछ बातें तुमने मानना मान
- 38:35लिया है कि ये निंदनीय है, ऐसा नहीं करना है।
- 38:41तुम्हारे समाज ने कर दिया है। और तुम समाज के अनुगामी बन गए हो।
- 38:48ये है गुलामी ईश्वर ने आँखें दी देखने के लिए और ईश्वर ने सुंदरता
- 38:59दी मनोरंजन के लिए। सुन्दरता को निहारो, उसके स्वाद
- 39:07को चखो जैसे सुन्दर पदार्थ बनाए, भगवान जीव आदि उसका स्वादन करने
- 39:17के लिए तुम्हारी सभी इंद्रियां। रसाअस्वादन के लिए दी गई तुम्हें
- 39:26जहाँ भी तुमने दुरूपयोग किया उसका वहाँ तुमने गलत किया।
- 39:35ईश्वर की संघ रचना में कोई गलती नहीं, ईश्वर ने जीववादी।
- 39:44उसके बनाए पदार्थों का स्वाद चखने के लिए और तुम कुछ भी खाते रहो,
- 39:54मात्र स्वाद के लिए फिर तुम गुलाम हो गए।
- 40:01तुम आँखों से सुंदरता को देखो, उसमें लिप्त न हो जाओ, उस सुंदरता
- 40:15को निहारो पियो। नैनों से पीओ जितनी भी कलाकृतियाँ
- 40:23बनाई भगवान ने एक चखने के लिए देखने के लिए आँखें चखने के लिए
- 40:32जीवा संतानों के लिए। गुप्त इंद्र वासन जीतने उजार
- 40:42तुम्हें दिए गए ईश्वर के द्वारा उनका एक निर्धारित कार्य था, उनसे
- 40:50वही निर्धारित कार्य लेना चाहिए था लेकिन दुर्भाग्यता तो ये है।
- 40:56कि तुमने वो निर्धारित कार्य लेने की बजाय मनमुखी होकर, इंद्रियों
- 41:09के गुलाम होकर, इंद्रियों के कहने से वो कार्य किए तुमने संसार को
- 41:17भोंगा। भोगने के लिए संसार था ही नहीं,
- 41:25ब्यूटी इज़ टू सी नॉट टू टच सुन्दरता देखने के लिए छूने के
- 41:35लिए नहीं। कहावत है किसी अंग्रेज पाठक
- 41:46ब्यूटी स्तुसी ना टु टच सुंदर है। ईश्वर की इस रचना की सुंदरता को
- 41:55निहारो इसीलिए आँखें दी गईं। लेकिन उस सुंदरता को निहारकर उसे
- 42:05अपनी गृहस्थ में लेने की कामना ये जाब्ती हो गई ये तुम गुलाम ये तुम
- 42:16गुलाम हो गए। जिन्हें तुम वासन ही कहते हो, ये
- 42:23तुम्हारे दिए गए नाम हैं। ईश्वर ने कोई वासन नहीं बनाई।
- 42:31ईश्वर ने तो मात्र ऊर्जा का निर्माण किया है।
- 42:36आपने देखा पशु पंछ अंतरंग क्षणों में जाते हैं तो क्या अंधेरे में
- 42:43जाते हैं? उन्होंने कुछ थोप नहीं रखा है।
- 42:52उन्होंने धारणाओं के मान्यताओं के।
- 42:56कुछ संग्रह अपने मस्तिष्क में पाल नहीं रखे, लेकिन तुम्हारे समाज ने
- 43:02पाल रखे। समाज जितना कामों का होगा उतना
- 43:12सुन्दर सुन्दर चीजों पर प्रतिबंध लगा देगा।
- 43:16ये नकाब के धारणें इसी विकृत धारणा से आई थी।
- 43:27स्त्री की सुंदरता को कोई निहार्य नहीं।
- 43:32जबकि सुंदरता निहारने के लिए ही होती है।
- 43:37क्या करोगे सारी प्रकृति का सौंदर्य कभी चादर उठा उसने कभी
- 43:46नकाब उठा सुन्दरता ने और आज नकाब। आज ही जाप के ऊपर मार काट चल रही
- 43:59है लपा लप हो रही है सुबह से विचारों के आदान प्रदान।
- 44:10सड़ांध से सनी हुई तुम्हारी खोपड़ियां चाहे पक्ष की हो, चाहे
- 44:19विपक्ष की हो, कोई बात नहीं समझता ही नहीं है कि ईश्वर ने सरजना
- 44:27जैसे बनाई बस वैसी ही बनाई। नंगी उगडी तुम नहीं छू पाया उसने
- 44:36बनाया उसने बनाया अपनी नगनता में बनाया छुपाया तो तुमने?
- 44:52तुम अपने विचारों को छुपा लेते हो, अपने कर्मों को छुपा लेते हो,
- 44:59अपनी धारणाओं को भावनाओं को छुपा लेते हो, जिन्हें दमन कहा जाता
- 45:04है। क्यों?
- 45:06क्योंकि किसी मूड व्यक्ति ने कह दिया कि ये गलत है।
- 45:14ईश्वर ने कुछ छुपाने योग्य कुछ नहीं बनाया।
- 45:18ईश्वर ने जो भी कुछ बनाया वो उगाड़ के बनाया, तुमने उसे गलत
- 45:25समझा, तुमने उसे छुपाया। मान्यता है ईश्वर प्रत्येक
- 45:41उत्पत्ति को उसकी परम सौंदर्यता में जन्म देता है।
- 45:48उसकी क्रिएशन परम सौंदर्य का स्वरूप है।
- 45:56अलौकिक प्रतिभा, सारी सृजना भरी पड़ी है।
- 46:00इससे तुम्हारी मान्यताओं ने इसे कुरूप और इसे सुरूप बना दिया।
- 46:14अनीता ईश्वर ने तो जो बनाया। वह सुरुप ही बनाया, कुरुप उसने
- 46:22कुछ बनाया बच्चे के चेहरे पे देखी है बच्चे की निर्दोषता पे देखी है
- 46:29आपको? उसका रंग नज़र नहीं आया आपको उसकी
- 46:33मासूमियत नज़र आएगी? उसका खिलता हुआ बचपन नज़र आएगा।
- 46:39उसका हँसता हुआ ठाँठे मारता हुआ भीतर का आनंद दिखेगा, रंग नहीं
- 46:46दिखेगा, उसकी प्यारी मुस्कान दिखेगी पक्षियों को कभी गौर से
- 46:55देखना। प्रकृति के प्रतिक अंक को पूर्ण
- 47:01दृष्टि से निहारना तो आपको समझा जाएगी की प्रकृति की सम्पूर्ण
- 47:10सृजना ने कुछ कभी माना नहीं। मानते तो हूँ।
- 47:19यह फूल कुरूप है। यह फूल अच्छा है।
- 47:23यह फूल सुगंध है। यह फूल दुर्गंध है।
- 47:30ईश्वर ने दुर्गंध भी किसी कारण से दी होगी।
- 47:34ईश्वर ने सुगंध भी किसी कारण में सिद्ध होगी।
- 47:38अगर अमृत्य बनाया तो उसके पीछे भी कुछ उद्देश्य होगा और अगर विश्व
- 47:42बनाया तो उसके पीछे भी कुछ उद्देश्य होगा।
- 47:46निर्उद्देश्य और रचना ईश्वर कभी करता ही नहीं।
- 47:56प्रत्येक संरचना परमात्मा की सार्थक है, निरर्थक नहीं है।
- 48:03उसके भीतर कुछ अर्थ है, बिना अर्थ के कभी वो चीज़ बनाता ही नहीं,
- 48:10फालतू की चीज़ का वो उत्पादन करता ही नहीं।
- 48:15सृजन करता ही नहीं, आज सारी सृजना भार मुक्त नाच रही है।
- 48:23सारा अस्तित्व आज हंस रहा है, लेकिन आपने अस्तित्व के साथ आँखें
- 48:31चार नहीं की। सुबह सुबह उठी प्रकृति में चले
- 48:44जाइए, जहाँ कुछ थोप नहीं रखा। प्रकृति ने कभी कुछ थोपा नहीं
- 48:51इसलिए सुखी है और आपने इतना कुछ थोप रखा है इसलिए दुखी हूँ।
- 48:59जितनी आपकी होंगी मान्यताएँ इच्छाएं नहीं लोग कहते हैं जितनी
- 49:05इच्छाएं उतना ही दुख नहीं, जितनी मान्यताएँ उतना ही दुख, ज्यादा
- 49:15मान्यताएँ। ज्यादा दुख, कम मान्यताएँ, कम दुख
- 49:21और अगर मान्यताएँ बिलकुल ही नहीं तो तुम अपने शुद्ध स्वरूप में परम
- 49:26सुख का सागर, जहाँ कोई भी मान्यता नहीं जहाँ मात्र।
- 49:36होना है जहाँ मानना कुछ नहीं जहाँ मानना समाप्त होता है वहाँ
- 49:46तुम्हारा होना है और तुम्हारा होना लाजवाब है।
- 49:52तुम्हारा होना परमखिलावट है। परम सुगंध से परिपूर्ण है, परम
- 50:01आलादित है तुम्हारा अपना होना और जहाँ तुम थोपे बैठे हो देखिये
- 50:11बड़े मज़े की बात है तुम्हारे दो। एक तो तुम्हारा मानना और एक
- 50:17तुम्हारा होना तुम्हारा मानना तुम्हारी खोपड़ी में तुमने जो कुछ
- 50:27भी मानो जो सीखा जो समझा। जो करेक्शन की इन्फॉर्मेशन कि वह
- 50:40तुम्हारी खोपड़ी में संग्रहित है, इसलिए तुम्हारी खोपड़ी दुखी है वो
- 50:51दूसरा तल है। तुम्हारा होना तुम्हारे होने में
- 50:56कोई मान्यता नहीं है। मान्यता विहीन तुम्हारा होना
- 51:03शुद्ध अस्तित्व परम खिलावट है, वहाँ किलकारियां गूंज रही है।
- 51:11दोन बज रहे हैं। जिथे वाचे नाद 1000।
- 51:17हज़ारों तरह के नाद बज रहे हैं। इतनी सुंदर अनइंस्ट्रक्टेड साउंड
- 51:28जिनको कोई बजाने वाला न। जो स्वतः से उत्तपन्न होती है,
- 51:36इतनी मिठास से भरी पड़ी और इतनी आनंद की परदाई नहीं है इतने सुख
- 51:46के मस्ती के देने वाली। वहाँ कोई मान्यता नहीं है जहाँ
- 51:58तुम हो, जहाँ तुम्हारा होना है, वहाँ परम सुख बरस रहा है।
- 52:05कबीर कहते हैं कि भक्तों नाचो। परम सुख बरस रहा है तो खोपड़ी से
- 52:13नहीं बोलते है, वह अस्तित्व से बोलते है, उस घड़ी को अस्तित्व
- 52:20में बैठे होते है। वहाँ तो अमृत बरस रहा है क्यों?
- 52:30मेरे आखरी शब्द को अच्छी तरह समझ ले ना इन प्रवचन वहाँ तुम पूरे
- 52:37सुखी हो क्यों क्योंकि वहाँ कोई मान्यता नहीं है वहाँ तुम जैसे हो
- 52:45वैसे ही मौजूद हो। ज़रा भी मान्यता तिल मात्र भी
- 52:50मान्यता नहीं इसलिए तुम परम सुखी हो और तुम्हारी खोपड़ी परम दुखी
- 53:01इतनी दुखी है। क्योंकि उसने इतना ही कुछ माना
- 53:09हुआ है जिसे तुम जानती भी हो वो भी तुम्हारा मानना ही है क्योंकि
- 53:19वो। जो जाना ही नहीं जा सकता, उसको
- 53:24तुम जानोगे कैसे? तो तुम्हारा सारा ज्ञान यानी
- 53:30जानना व्यर्थ है, निरर्थक है वो जाना जा ही नहीं सकता।
- 53:39जिसे तुम ज्ञान कहते हो वो भला क्या होगा?
- 53:42फिर ईश्वर जाना ही नहीं जा सकता हो और तुम उसे जानकर मान भी लेते
- 53:52हो और इसे ही तुम ज्ञान कहते हो। इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम्हारी
- 53:59खोपड़ी दुख का एक संयंत्र है इस यंत्र में दुख के कारण भरे पड़े
- 54:07हैं, क्या है तुम्हारे मान तुम्हारे मान ने?
- 54:16तुमने इतना कुछ मान लिया है कुछ केमिस्ट्री मान ली, कुछ फिजिक्स
- 54:22मान ली, कुछ इतिहास मान लिया, कुछ भूगोल मान लिया, कुछ साइंस मान ली
- 54:35कुछ। विज्ञान माना कुछ अध्यात्म माना,
- 54:41कुछ परभौतिक चीजें माने, लेकिन तुमने चाहे संसार के बारे में कुछ
- 54:49माना या परमात्मा के बारे में कुछ माना।
- 54:56जो भी कुछ आपने माना, वह तुम्हें दुख देगा।
- 55:01यही भार है तुम्हारी आत्मा के भीतर, यही भार है तुम्हारी खोपड़ी
- 55:07के ऊपर जो तुम हर पर सोते जागते चलते फिरते डोते रहते।
- 55:15खोपड़ी कभी सुखी नहीं हो सकती और अस्तित्व कभी दुख नहीं हो सकता।
- 55:25अब आप देख लें कि मैं क्या बोलना चाहता हूँ।
- 55:31खोपड़ी कभी सुखी नहीं हो सकती। सारे अस्तित्व का इन्फॉर्मेशन भी
- 55:40वो क्यों ना जुटा ले? और तुम तलाश हो।
- 55:45खुशी और खोपड़ी कभी सुखी हो नहीं सकती।
- 55:53क्योंकि वह मान्यताओं का एक समूह है, मान्यताओं का एक संयोजन है,
- 56:07इसलिए खोपड़े कभी सूखे नहीं हो सकते।
- 56:11और तुम जीस परमात्मा का इन्फॉर्मेशन संग्रहित किए हो उसके
- 56:20बारे में भी सुना वह जो कभी जाना ही नहीं जा सकता।
- 56:28वो तुमने जानकर खोपड़ी में भर लिया है।
- 56:31अब इसका अर्थ समझ लो आप क्या है? इसलिए हम संत असंत, सच्चा, झूठा
- 56:45हम जो बोल रहे है। मात्र बकवास है, क्योंकि वह भुला
- 56:53ही नहीं जा सकता और तुमने तो उसे जानकर खोपड़ी में संग्रहीत भी कर
- 57:02लिया है। हम आपको सत्य कभी ना बता पाएंगे।
- 57:12सत्य की गगरिया इस छोटी सी लुटिया में आती नहीं और तुम इस खोपड़ी
- 57:19में समाहित करना चाहते हो यही तुम्हारी भूल है।
- 57:26खोपड़ी अगर कोई भूल करती है तो यही भूल सबसे बड़ी है।
- 57:33खोपड़ी उसे जानना चाहती है जो जाना जा नहीं सकता।
- 57:40और ज्ञानियों ने जो आपको प्रवचन कर रहे हैं।
- 57:46उसे जानकर आगे समझाना भी शुरू कर दिया।
- 57:59भ्रांत धारणा को तोड़ मत। भ्रांत धारणाओं से चैनल बदलना
- 58:17खोपड़ी से लड़ो मत तुम सारे खोपड़ियों के लड़ने वाले हो, एक
- 58:24मत कहता है कि ये है। दूसरा मत कहता है कि ये इसे तुम
- 58:32धर्म कहते हो। जो आपस में लड़े जा रहे हैं, वह
- 58:40जो जाना ही नहीं जा सकता वो तुमने जानकर।
- 58:45अपनी खोपड़ी में भर लिया है और उसे तुम ज्ञान कहते हो और जो
- 58:50ज्यादा बातों को जानता है उसे तुम ज्ञानी कहते हो, फिर ज्ञानी में
- 59:02और सच्चेगानी में। क्या फर्क है?
- 59:05बाबा ज्ञानी सूचनाओं को जुटाकर अपनी खोपड़ी में भर लेता है।
- 59:17उसको जो जाना नहीं जा सकता ज्ञानी।
- 59:27खोपड़ी में भर लेता है उस ज्ञान को जो जाना ही नहीं जा सकता।
- 59:37इस नॉट ओनली अन्नोन बट ऑल्सो अन्नोन एबल।
- 59:46और बुद्ध सच्चा ज्ञानी यह जानता है कि वह जाना नहीं जा सकता,
- 59:55लेकिन वह चखा जा सकता है। उसमें डूबा जा सकता है, आनंद लिया
- 1:00:04जा सकता है, उस सरोवर में तैरा जा सकता है।
- 1:00:09उस समुद्र के भीतर विलीन हुआ जा सकता है, उस समुद्र के भीतर
- 1:00:16एकाकार हुआ जा सकता है, जाना नहीं जा सकता।
- 1:00:24श्री कबीर ने कहा बूंद समानि समुद्र में बूंद समुद्र के बारे
- 1:00:34में जान तो कभी नहीं पाए थे और ये खोपड़ी।
- 1:00:39तुम्हें यही भ्रम देती रहेंगी कि मैं जानता हूँ आओ मेरे पास आ जाओ,
- 1:00:44मैं तुम्हें बताता हूँ, मैं तुम्हें बताती हूँ, आज कितनी
- 1:00:50प्रवचन करते हैं आपको ईश्वर के बारे में बता रहे हैं।
- 1:00:58उसे बता रहे हैं जो जाना नहीं जा सकता।
- 1:01:02जो बताया नहीं जा सकता, जिसकी तरफ इशारा भी नहीं किया जा सकता
- 1:01:13क्योंकि इशारा भी जिसकी तरफ करोगे कहीं तो जाकर खत्म होगा ना?
- 1:01:20ये तो बड़ा विराट है। उसकी तरफ इशारा भी नहीं हो सकता।
- 1:01:27एक यात्रा करो खोपड़ी से अस्तित्व की ओर सूचनाओं से सत्य की ओर।
- 1:01:44मान्यताओं से अस्तित्व की ओर मान्यताओं से तुम्हारी होने की ओर
- 1:01:59खोपड़ी में सब संग्रहित है जो तुमने मान लिया।
- 1:02:04तुमने उसे भी मान लिया, जिसे तुमने जाना नहीं, जो जाना नहीं जा
- 1:02:12सकता, उसको तुमने जान भी लिया और उसको तुमने मान भी लिया और कहते
- 1:02:18भी हो इसलिए तुम डोग ले हो, यही तो बाहर है तुम्हारे वो।
- 1:02:26जो जाना नहीं जा सकता वो तुमने जान लिया है।
- 1:02:30बस इसके अलावा तुम्हारे ऊपर बड़े से बड़ा कोई है ही नहीं।
- 1:02:36यही एक बड़ा पत्थर है जो तुम्हारे भीतर के झरने को रोके हुए है।
- 1:02:45तो अब एक यात्रा शुरू करें मान्यताओं से हुंद की ओर
- 1:02:56मान्यताओं से स्वभाव की ओर। सूचनाओं से स्वयं की ओर भला ही
- 1:03:12स्वयं को जाना नहीं जा सकता। भला ही स्वय के बारे में कुछ बोला
- 1:03:18नहीं जा सकता। भला ही स्वय के बारे में कोई
- 1:03:24कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन स्वय में डूबा तो जा सकता है स्वय
- 1:03:34में। बिलिंग तो हुआ जा सकता है स्वयं
- 1:03:40में उतरा तो जा सकता है आओ एक यात्रा शुरू करें इस खोपड़िया से
- 1:03:53उस होने तक यात्रा। खिसकना शुरू करो खोपडिया के सारे
- 1:04:02जो तुमने अब तक संग्रहित कर ली हैं, सूचनाएं उनको एक एक करके
- 1:04:11तोड़ न पाओगे। ये तुम्हारे बलबूते से बाहर की
- 1:04:15बात है, इसलिए एक काम करते हैं, इन सूचनाओं को ही छोड़ देते हैं।
- 1:04:24इस खोपडिया को छोड़ दो, इसे छोड़ सकते हो क्योंकि ये खोपडिया।
- 1:04:33तुमने जो तुम हो वो कुछ और है इस खोपड़िया को हट जाओ जाँस इसे ही
- 1:04:45मैं कलिंगनेस कहता हूँ तो खोपड़िया के मान्यताओं को।
- 1:04:54वो मूड हूँ या सच हूँ। सच तो कोई भी नहीं है उनको एक एक
- 1:05:00करके तोड़ो मत बहुत हो गया, टूटेंगे नहीं, नई नई मान्यताएँ
- 1:05:08उगती जाएंगी। मैं एक प्रश्न का निदान करूँगा।
- 1:05:11तुम दूसरा मोड प्रश्न कर कर तो फिर ऐसे ही करते है, किस खोपड़िया
- 1:05:22को छोड़ देते है? अगर डोर इतनी उलझ गयी है कि वो
- 1:05:27स्वर्भ नहीं हो सकती? एक बड़ा गुंजलदार?
- 1:05:32गोला बन गया है जो कभी सुलझाया ही नहीं जा सकता तो फिर ऐसा करते
- 1:05:38हैं, उस गोले को छोड़ देते हैं, पतंग की डोर छोड़ देते हैं।
- 1:05:45साथ ही पतंग जाएगा, साथ ही डोर जाएगी।
- 1:05:49साथ ही वो गुंजल भरी सारी हिल साथ ही चली जाएगी, छोड़ दो इसको इसको
- 1:06:03छोड़कर स्वय की ओर चल। बुद्धि की सारी मान्यताओं को
- 1:06:11त्याग दो। इसे ही भगवान कृष्ण कहते हैं
- 1:06:15समर्पण सर्वधर्मण व्रतजमामी कम स्वर्ण और जैसे ही तुम इससे परे
- 1:06:25हट जाओगे। ये आग बुझाना नहीं है।
- 1:06:29हमने इसको जलते रहने दो बुझेगी बिन बड़ा मुश्किल है संत कितना
- 1:06:39बोले और अंत में पाया खाली हाथ। सारी रामायण पढ़ लेते हो?
- 1:06:48प्रश्न तुम्हारे फिर बाकी रह जाते है क्योंकि तुम ठीक से शरावक नहीं
- 1:06:55बन सके, जो महावीर कहते हैं कि सब में श्रवण करो, तुम ठीक से
- 1:07:02दुष्टता नहीं हो सके। जिसे बुद्ध कहता है सम्यक दृष्टा
- 1:07:11वो तुम कर नहीं सकते। तुम व्यर्थ की सूचनाओं को बुद्धि
- 1:07:19के नुरोंज में भरने के अलावा न कुछ किये हो।
- 1:07:22ना कुछ कर सकते हो और ये सभी कुछ प्रयास आपके चाहे ईमानदारी से
- 1:07:30हों, चाहे गैर ईमानदारी से हों, कोई फल ना ले के आयेंगे तो मैं
- 1:07:37उलझा देंगे तो आओ। इसको छोड़ ही देते हैं।
- 1:07:47ये घर अब रहने के योग्य न रहा इस बुद्धि से नीचे उतरो, इसको एस इट
- 1:07:54इस छोड़ दो इसको बने रहने दो अपनी गुलजनों में अपनी उलझनों में।
- 1:08:01इस रील के गोले को उलझे हुए गोले को यहीं छोड़ दो क्लिंगिंगनेस
- 1:08:12चिपकाहट हटाओ नीचे उतरो, जहाँ तुम्हारा स्वय।
- 1:08:21मौजूद है। कोई फिकर मत करो, कोई कुंडल नहीं
- 1:08:27की कोई सहसरार की कोई बरम्बर अन्द्र की कोई सात चक्रों की।
- 1:08:40ये तुम्हारी सभी मान्यताएँ हैं। इनको सॉल्व करने का प्रयत्न मत
- 1:08:51करो, क्योंकि इसको तुम जान न सकोगे।
- 1:08:57ये जाना जा नहीं सकता इसलिए इसको छोड़ना बेहतर है।
- 1:09:07वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़
- 1:09:17देकर छोड़ नाच तो ऐसे ही काम तुम भी करो।
- 1:09:24इसको छूट दो बुद्धि की सभी सूचनाएं ज्ञान सभी यहीं धरे रहने
- 1:09:32दो, इनको साथ मत उठो। यही बोझ थे तुम्हारे ऊपर और अपने
- 1:09:38अंतःस्थ में उतरो। कैसे उतरें?
- 1:09:47मैंने समझाया है कुछ न करो विचार आएँगे वासनाएँ आएंगी भावनाएँ
- 1:09:56आएंगी आने दो आसमान में काले बादलाएं कि सफेद बादलाएं।
- 1:10:05कि पानी से भरे काले मेघाएँ कि वो मेघ बरसे कि वो मेघ गरजे, गरजने
- 1:10:16दो, बरसते हैं, बरसने दो, मेघ काले हैं, कोई बात नहीं।
- 1:10:24मेघ सफेद हैं, कोई बात नहीं, वे बरसने वाले हैं, वो गरजने वाले
- 1:10:34हैं वो किस रंग के हैं, वो कितने हैं, इसकी फिक्र ही मत करो, बस
- 1:10:40तुम ये जान लो। कि तुमने यहाँ रहना नहीं है तुमने
- 1:10:50दूसरे देश में जाना है तुमने ये देश छोड़ना है, चल हंसा।
- 1:11:01उस देश समुद्र जहाँ मोती है, जल हंसा उस देश।
- 1:11:20चल हंसा उस देश चल हंसा उस देश समुद्र जहाँ मोती है।
- 1:11:38चल हँसाऊ सुरदेव तुम्हारे ध्यान को हंस कहते हैं संत जन अपने
- 1:11:49ध्यान को चलो चलो आ अब लोट चलो यहाँ से अपने ध्यान को।
- 1:11:58हटा यहाँ दुख है, पीड़ा, दर्द, कष्ट, तनाव, दिन भर रात उदास।
- 1:12:18दुखद स्थिति में यहाँ कभी चैन नहीं पड़ा।
- 1:12:22जिसने खोपड़िया में अपनी इंटेंशन को बरकरार रखा वो कभी सुखी नहीं
- 1:12:29रहा। यहाँ लाखों तरह की दर्द है और इसे
- 1:12:35छोड़ ही देते हैं। वहाँ चले जहाँ समुद्र में मोती
- 1:12:42जहाँ तुम्हारा स्वयं विद्यमान है तो नीचे उतरो विचार आएँगे,
- 1:12:48भावनाएँ आएँगी, वासनाएँ आएँगी, कल्पनाएँ आएँगी, सपना आएँगे,
- 1:12:54स्मृति आएँगी। सब कुछ आएगा और उन्हें मेघों की
- 1:13:02तरह देखो, उनमें कोई छेड़छाड़ ना करो, बरसने वाले हैं, गरजने वाले
- 1:13:11हैं, सफेद मेघ हैं। मानसून के हैं।
- 1:13:15बरसेंगे, फुहार बरसाएंगे, शीतल हवा आएगी, गर्म हवा आएगी, कोई भी
- 1:13:21ख्याति मत करो, कमल मत दो निर्लिप्त भाव से नीचे उतरते जाओ,
- 1:13:34नीचे उतरने का अर्थ तुम कुछ मत करो।
- 1:13:38अगर छेड़छाड़ भी करोगे तो कुछ किया अगर इंटरफेरेंस करोगे ये
- 1:13:47काले मेघ क्यों नहीं आए सफेद? क्यों आ गए मुझे बरसने वाले फुहार
- 1:13:55सावन की? वो वाले मेघ चाहिए थे, ये वाले
- 1:14:02मेघ क्यों आ गए? ऐसी कोई भी अपेक्षा न रखो,
- 1:14:07निरपेक्ष भाव से बने रहो और आप पाओगे।
- 1:14:15आप धीरे धीरे धीरे जैसे गंदले पानी में मिट्टी नीचे बैठ दी जाती
- 1:14:23है, वैसे ही मिट्टी नीचे बैठ जाएगी और शुद्ध जल ऊपर रह जाएगा
- 1:14:33छेड़छाड़ की। कहीं भी तो गजोल बज जाएगी, फिर
- 1:14:41वही पानी फिर गंधला हो जाएगा। पानी को गंधला मत करो जाने के तुम
- 1:14:47उसके भीतर हाथ मत गजोल मत करो। उसमें कोई तुम शरारत बाजी मत करो,
- 1:15:00पानी में खिलवाड़ मत करो, कोई छेड़छाड़ मत करो, तो तुम पाओगे कि
- 1:15:07तुम भीतर उतरने लगे। और तुम वहाँ पहुँच गए 1 दिन जहाँ
- 1:15:17कोई मान्यता नहीं जहाँ सिर्फ होना है जहाँ सिर्फ तुम हो, दूसरा कोई
- 1:15:27नहीं। एको अहम् द्वितीय नास्ती उस
- 1:15:38अस्तित्व से किया गया उदभोष है एक है तुम।
- 1:15:46द्वितीय नास्ती दूसरा नहीं है कोई यहाँ तुम पाओगे ये बोलने की बात
- 1:15:53नहीं है या पहुंचने की बात है, यह उस स्तर पर जाने की बात है एक को
- 1:16:02अहम्। द्वितीय और नास्ती दूसरा कोई नहीं
- 1:16:06मैं हूँ सिर्फ मेरा वहाँ तुम कहोगे शिवो हम शिवो हम।
- 1:16:21शिवोहम शिवोहम और ये कोई मान्यता नहीं होगी।
- 1:16:33यह सत्य का गायन है, यह सत्य की प्रश्नुतना है।
- 1:16:43जो तुम्हारी अंतः की आत्मा के प्राण गाएंगे, सत्य को गाएंगे।
- 1:16:59सच्चिदान मैं हूँ शिवो, हम शिवो हम जिसे शस्त्र काटे नग्नि जलाये
- 1:17:26गलाये न पान न वायु सुखाये बुहिया तू माँ।
- 1:17:37सचिदानंद, मैं हूँ, वो ही याद मा सचिदानंद, मैं हूँ।
- 1:17:53शिवो हम शिवो हम अमर आ तू मा सच्चिदानंद, हम शिवो हम शिवो हम।
- 1:18:13धन्यवाद।