Latest / Baba ji Vijay Vats / 3 Aug 25 - Enlightenment का अनुभव कैसा होता है? योगी होने की यात्रा और बुद्धि के तल से नीचे कैसे जाएं?
Transcript
- 0:04रेणुका प्रभु भक्त क्या है और भक्ति क्या है?
- 0:24इसकी परिभाषा रहस्यत्मक ढंग से करने की कृपा करें।
- 0:51आपने शब्द सुना होगा विभक्त विभक्त का अर्थ है जो बंटा हुआ है
- 1:10इन पार्ट्स टुकड़ों में अलग थलग। वे भक्त और भक्त वह जो टुकड़ों को
- 1:28इकट्ठा करके एक हो गया जुड़ गया। योगी हो गया।
- 1:46जो बढ़ता हुआ है वह टूटा हुआ है। वह वियोग में है।
- 2:01जो भक्त हो गया वह एक हो गया और वह योगी हो गया।
- 2:11एक होने का नाम अनेक से एक होने का नाम भक्ति है।
- 2:28टुकड़ों में बंटी हुई थी, कभी एक थी फिर से एक हो जाए।
- 2:42भक्त कभी भी भक्त था। आज फिर भक्त हो गया।
- 2:52तो इन टुकड़ों को काम करता है, जोड़ने का, एक करने का, वियोग से
- 3:04योग में लाने का। विभात से भात बनाने का जो अधेसी
- 3:12काम करता है वो है प्रेम। प्रेम एक ऐसी गोंद है।
- 3:26जो टुकड़ों में बंटी हुई चीज़ को जोड़ देती है, इसे सरल भाषा में
- 3:34समझने की चेष्टा कर उचा व्यक्ति ने भक्त किया भक्ति का।
- 3:48भक्त वह जो एक हो गया वि भक्त वह जो हिस्सों में बटा है टुकड़ों
- 3:56में बटा है टूट गया है खंड खंड हो गया है।
- 4:02और भक्त हो। जो टुकड़ों से एक हो गया है वे
- 4:10योग से योग में आ गया है और भक्ति उस अध्यासी का नाम जिसने टुकड़ों
- 4:19को एक कर दिया। उस गोंद का नाम जो टुकड़ों को
- 4:28जोड़कर एक कर देते हैं उसका नाम है भक्ति प्रेम की गोंद के बिना।
- 4:41विभक्त हुआ व्यक्ति टूटा, टूटा व्यक्ति, खंड खंड व्यक्तित्व
- 4:48जुड़ता नहीं, योगी नहीं होता, एक नहीं होता, प्रेम व है।
- 5:00प्रेम को भक्ति कहते है। यह वो अध्याशिव है जो तुम्हारे
- 5:08बटे हुए टुकड़ों को जोड़ देती है। और अलग थलग पड़े हुए टुकड़ों को
- 5:17एक कर देते। है।
- 5:23प्रेम टुकड़ों को एक करता है। और जब कोई टूट जाता है खंड खंड हो
- 5:32जाता है तो बिरहा में तड़पता। है।
- 5:43तड़पेगा से जब एक अनेक में बढ़ जाएगा तड़पन के सिवा उसके पास कोई
- 5:52रास्ता नहीं, कोई मार्ग नहीं भड़केगा तड़पेगा दुखी होगा।
- 6:02एक होने का। प्रयास करें उस एक होने के प्रयास
- 6:11को कहते हैं भक्ति। वो अधेसिवे का नाम है भक्ति।
- 6:22और टुकड़ों को जो जोड़कर एक हो जाता है वो है भक्त और जो टूट गया
- 6:34एक से अनेक में टूट गया वो हो गया दो भक्त।
- 6:39बी योगी तो सारी यात्रा अध्यात्म बी योगी से योगी होने की यात्रा
- 6:52है। बी भक्त से भक्त होने की यात्रा
- 6:58है। जब टूटा हुआ व्यक्तित्व खंड खंड
- 7:04व्यक्तित्व के टुकड़े पुकार उठेंगे वो नहीं तो ये हवा क्या
- 7:15करूँ? क्या करूँ?
- 7:20तो नहीं तो यह हवा क्या करू? क्या करू?
- 7:32दूर रहकर मैं तुझसे? बता क्या करू क्या करू तुम?
- 7:44नहीं तो ये रुक ये हवा क्या करू क्या करू?
- 7:54दूर रह कर मैं तुझसे बता क्या करू क्या करू सुना सोना है जहाँ ऐसे
- 8:07में तू है कहाँ सोना सोना है जहाँ।
- 8:14ऐसे में तू है कहाँ तू ना मुझे है समझा जा बिगा बिगा है समां ऐसे
- 8:28में तू है कहाँ? मेरा दिल ये पुकार आजा मेरे दिल
- 8:39के सहारे आजा तू नहीं तो ये रुख ये हवा क्या करना?
- 8:53दूर दूष से में रह के बता क्या करूँ, क्या करूँ?
- 9:02भीगा भीगा है समा ऐसे में तो है कहाँ बस?
- 9:10इतना मुझे समझा जा ये पुकार है टूटे हुए हरदक प्रेम के बिना टूटे
- 9:25हुए खंड ऐसी ही भाषा में पुकारना है ये बिरहा के बीच।
- 9:32है। ये अवस्था वे भक्त की अवस्था है।
- 9:43ये अवस्था बिरहा की अवस्था है। वियोगी की अवस्था है वियोग में
- 9:49ऐसे गीत गाए जाते हैं। जो खंड खंड हो गया।
- 10:00जो टूट गया, जो एक से अनेक हो गया, जो मल्टीफरकेट हो गया वह
- 10:10रोयेगा वह चिल्लायेगा। बिरहा के गीत बखेरे का तुम्हारा
- 10:18रोना तुम्हें समझ नहीं आता तुम रोते फिरते हो सारे जहान में और
- 10:28तुम्हें पता नहीं कि तुम रोते हो? खंड खंड व्यक्तित्व है तुम्हारा।
- 10:38तुम अखंड होना चाहते हो, अखंड होने की चाहत, योगी होने की चाहत
- 10:51बियोगी मट जाए। बिरहा मिट जाए वि भक्ति मिट जाए
- 11:00तुम भक्त हो जाओ तुम योगी हो जाओ यह अनकाक्षा तुम्हारे हृदय के
- 11:07अंतःस्थल से हुई अनकाक्षा इसको जोड़ेगा प्रेम।
- 11:14प्रेम का, 68 प्रेम की गोंद तुम्हारे टुकड़ों को चिपका देगी
- 11:19और तुम एक हो जाओगे। एक होने का मतलब ही भक्त होना है।
- 11:29आँधियाँ चलीं। आशियाँ लूट गया, लूट गया, आंधियाँ
- 11:41चलीं, आशियाँ लूट गया, लूट गया। प्यार का मुस्कुराता जहाँ लूट
- 11:54गया, लूट गया, आंधियां हो चलीं, बसिया लूट गया, लूट गया।
- 12:10प्यार का मुस्कुराता जहाँ लूट गया लूट गया के छोटी सी झलक मेरे मरने
- 12:23तलक एक छोटी सी झलक। मेरे मरने तलक ओह चांद, ज़रा
- 12:35दिखला जा ओह चांद, ज़रा दिखला जा। भीगा भीगा है समां ऐसे में तू है
- 12:52कहाँ मेरा दिल है पुकारना आजा मेरे दिल के सहारे।
- 13:05आजा विभक्ति की अवस्था में। टूटे हुए टुकड़े बिरहा की करुण
- 13:18गाथा कहते हुए। ऐसी ध्वनि को उच्चारित करते हैं।
- 13:26यह हृदय की वाणी है, ढूंढती है उस प्रेम को, उस अध्यासी को, उस गोंद
- 13:36को जो इन टूटे हुए टुकड़ों को जोड़तें।
- 13:40है। और खंड खंड हुए हैं टुकड़े में एक
- 13:45कृत। है।
- 13:49बस तुम्हारी जीवन की दुविधा कुल मिलाकर यही है तो मल्टी फकेट हो
- 13:59गया। हमारे मेडिकल में शब्द आता है
- 14:08बाइपोलर तो मल्टीपोलर हो गया। संत कहता है अगर।
- 14:20तुम दो में भी विभक्त हो जाओ एक से दो हो जाओ, तो भी तुम दुखी हो
- 14:27जाओगे और तुम तो यहाँ एक से दो नहीं, तुम तो अनेक हो गया।
- 14:39तुम्हारा व्यक्तित्व मल्टीपोलर हो गया?
- 14:43है। चहु दिशाओं में मल्टीडाइमेंशनल
- 14:50तुम हो के चहु दिशाओं में। तुमने अपने आपको इन्वॉल्व।
- 14:58कर रखा है। तुम एक नहीं हो पाते सारी मानवता
- 15:05की कुल मिलाकर दुखद कहानी यही है। तुम मल्टीप्लर हो गया, ये एक
- 15:18डिसऑर्डर है तुम ऑर्डर में रहना चाहते हो, लेकिन डिसऑर्डर हो गया
- 15:31यही बाबा कहते हैं ओके मैं अंदर। सब हो अगर तुम हुक्म के अंदर हो
- 15:39जाओ, यानी तुम हक्म न बनो, हक्म मल्टीपोलर होता है और भक्त भक्त
- 15:52नॉनपोलर होता है। उसका कोई डायमेंशन नहीं होता, वह
- 15:59एक होता है, यूनिक होता है, इकट्ठा होता है, कलेक्टिव होता
- 16:06है, वह विभक्त नहीं होता, उसकी शाखाएं नहीं होती, वो टूटा नहीं
- 16:12होता टुकड़ों में। वह एक होता है सारी मानवता अगर
- 16:21दुखी है उसका कारण मात्र यही है। तुम एक होना चाहते हो कभी एक थे।
- 16:35हमारे शस्त्र कहते हैं कि परमात्मा ने संकल्प किया एको अहम
- 16:41भू। शाम ठीक किया।
- 16:46और वह एक से अनेक हो गया तो ज़रा सोचो।
- 16:52एक से अनेक जो भी होगा वह मल्टी बुलर हो गया, मल्टी डाइमेंशनल हो
- 16:58गया, बहुआयामी हो गया। उसके टुकड़े बंट गए जहाँ दिशाओं
- 17:06में फैल गया। जब तुम्हारे मन की वस्था भी ऐसी
- 17:13ही हो जाती है। तो तुम बिखर जाते हो और बिखरा हुआ
- 17:23मन तड़पता है। बिरहा के गीत काता है।
- 17:32काहे वह एक होना चाहता है उसके भीतर की पुकार, कैसे मैं एक हो
- 17:43जाऊं? मेरे पास लोग आ जाते हैं बाबा
- 17:46बहुत दुखी मैं कह तू मेन। सारा संसार दुखी है इसीलिए बाबा
- 17:56नानक ने कहा नानक दुखी या सब संसार, तुम दुखी क्यों हो?
- 18:04तुम भी भक्त हो गए हो। टुकड़ों में बंट गए।
- 18:12और कृष्ण तो अर्जुन को समझाते हैं, हे अर्जुन अगर तू सिंधिया
- 18:18ग्रस्त रहा, यू विल बी डिस्ट्रॉइड तुम्हारा विनाश हो जाएगा सिंह
- 18:25स्यात्मा विनिस्य। तुम ज़रा देखना अपने भीतर जाने से
- 18:35डरते हो क्यों नहीं जा पाते, इसलिए नहीं जा पाते?
- 18:42फिर तुम समझते हो कि मैं एक हूँ, लेकिन जैसे ही तुम अपने भीतर
- 18:46उतरोगे तुम पाओगे, तुम अनेक हो और तुम घबरा जाओगे।
- 18:53घबरा जाओगे, घबरा के बाहर आ जाओगे, यही वैसा है तुम्हारी
- 18:58करुणा कहानी तुम्हारा दो शख्स संतों से देखा नहीं जाता।
- 19:10वह तुम्हारे दुःख को दूर करने का अन्थक प्रयास करते।
- 19:14हैं। अंतवेला तक वह प्रयास में लगे
- 19:18रहते हैं। कैसे तुम बाई फ्रकेट से मल्टी
- 19:21फ्रकेट से एक में आ जाओ, कैसे तुम यूनिक हो जाओ।
- 19:30टूटे हुए टुकड़ों। को।
- 19:36कैसे जोड़ा जाए, कैसे जोड़ा जाए जो तुम भी भक्त से भक्त हो जाओ और
- 19:46तुमने पूछा पुत्री के भक्ति क्या? है।
- 19:50भक्ति क्या है, भक्त क्या? है।
- 19:55जो विभक्त नहीं वह भक्त जो बंटा हुआ नहीं, वह भक्त जो एक है वो
- 20:02भक्त। सीधी सी प्रभाषा ज़रा इसको हृदय
- 20:17में वसा ले और अगर तुमने इस सूत्र को अपने हृदय में बसा लिया।
- 20:30और प्रेम की गोंद तुमने टुकड़ों पे लगा ली तुमने विभक्त हुए
- 20:37टुकड़ों को इकट्ठा करके जोड़ लिया तो तुम भगत हो जाओगे, भक्ति की
- 20:48गोंद। प्रेम की गोंद टुकड़ों पे लगाओ और
- 20:55उनको जोड़ लो बस यही तुम्हारा दुखड़ा है, दुखड़ा मिट जाएगा इस
- 21:05दुखड़े के दर्द से। बिरह में छठ पटाते हुए तुम्हारा
- 21:14अंत सी ये कामना करता है कि कैसे मैं एक हो जाऊं?
- 21:22अब तुम्हारी व्यथा क्या है? आइए इसको रहस्य आत्मिक ढंग से
- 21:26समझने की चेष्टा करते हैं। जब भी कोई व्यक्ति बुद्धि में
- 21:34होता है, बुद्धि के तल पे होता है, वह मल्टीफर्केट होता है।
- 21:43अवशंभावी निश्चित? अगर तुम कहो कि बुद्धि के टुकड़े
- 21:54जुड़ कर एक हो जाएं तो तुम गलती में रहो।
- 22:04ऐसे प्रयास में कभी लग भी मत जाना बुद्धि का स्वभाव काटना है।
- 22:10बुद्धि का स्वभाव एक को खंडित करके अनेक में ले जाना है।
- 22:15तर्क वो ही तलवार है जो एक को काट कर अनेक में ले जाती है और बुद्धि
- 22:21का काम है काट लेना अगर तुम कहो कि के छी।
- 22:30काटे ना तो तुम गलत डिमॅंड कर रहे हो तुम बिल्कुल वही काम बुद्धि से
- 22:40ले रहे हो तुम चाहते हो तुम समझते हो कि बुद्धि तुम्हें एक कर्तिक
- 22:48यही गलती हो जाती है। लोग मुझे कहते हैं ये हिंदू,
- 22:52मुसलमान, सिख, ईसाई कैसे मिटें हिस्सा रजिस्टर मेथड है?
- 23:04जो चीज़ काटती है उसको हटा दो। कौन काटता है तुम्हारी बुद्धि
- 23:10काटती है तो क्या बुद्धि को फेंक दे न फिर बुद्धि के तल से हट जाओ,
- 23:25तुम भी तो दूर जा सकते हो वो सोक्रेट इज़ की कहानी बच्चा कहता।
- 23:33इस प्याली में समुद्र आयन है, सुबह से कोशिश कर रहा हूँ तो
- 23:40सोक्रेटिक कहने लगे पुत्र इस प्याली में कभी समुद्र आएगा भी
- 23:45नहीं और सोक्रेटिक कहते हैं कि प्रथम बार।
- 23:51मुझे किसी बच्चे ने झंझोर दिया मेरी रूह कंपी थर्रा गया मैं एक
- 24:00छोटा सा बच्चा ऐसी बात कह गया जो मेरे हृदय के अंतःस्थल में बैठ
- 24:08गई। बड़ी मासूम मेरे से बोला वो बच्चा
- 24:14मैं क्या करूँ? सोभे का लगाव इस प्याली में
- 24:17समुद्र आता नहीं, लाख कोशिश करने के बाद जो फिर वो सोकृति से लिखते
- 24:26हैं कि मैं। मेरा अस्तित्व कांप गया है।
- 24:33मैंने सोचा कि हम भी तो यही कर रहे हैं सारा दिन हम भी तो उस
- 24:39सागर को गागर में समेट लेना चाहते हैं।
- 24:43वह सागर है और तुम्हारी बुद्धि की आकक्षा।
- 24:50मूर्ख है। यह मूर्ख बुद्धि चाहती है कि मेरे
- 24:54में समा जाए वो पागल। है।
- 24:59मूर्ख है। जो भी कोई कोशिश करेगा इस बुद्धि
- 25:04में समा लेने की उस सागर को। वो गगरिया मूर्ख कहलाएगी इसलिए कल
- 25:10मुझे बड़े आज कमेंट साई बाबा तुमने बुद्ध को मूर्ख कहा, मैंने
- 25:18कहा वो मूर्ख है, विलासक मूर्ख है, मैं तुम्हें कारण बताता हूँ
- 25:26कि वो कोई मूर्ख है। बतलाया नहीं क्या आज फिर सुन लो
- 25:32जो व्यक्ति बुद्धि के चल से बोलेंगे वह मूर्ख ही होगा।
- 25:37वह बुध हो, वो आचार्य हो, वो शंकर हो, कोई भी हो।
- 25:46जो बुद्धि के दर से बोलेंगे वह मूर्ख कहलाएगा क्योंकि बुद्धि
- 25:54कैंची है, सीजर है, कैंची काटती है, कैंची जोड़ती नहीं, उसका
- 26:02स्वभाव ही नहीं है जोड़ना। कैंची का सवा है तोड़ना कैंची का
- 26:10सवा है काटना तर्क का सवा है काटना।
- 26:15इसलिए बुध कहेंगे आप दीपो भवा। वह तो है ही नहीं।
- 26:22उसमें गुम होने की चेष्टा मत कर तू अपनी ज़िन्दगी खुद संवार ले अब
- 26:31दीपो भावा। तुम अपना मार्गदर्शन स्वयं करो तो
- 26:37फिर पूछते हैं फिर गलत क्या कहा? मैंने कहा सब कुछ गलत कहा।
- 26:44गलत ही तो कहा सही कहा कहा इसलिए तो मैं बुद्ध को मूर्ख करता हूँ,
- 26:55बुद्ध हो या कोई भी हो। मार्क्स हो, नित्य हो जो बुद्धि
- 27:03के तल से बात करेगा, सोचेगा समझायेगा फॉर्मूला आज निकालेगा
- 27:10मूडता के अतिरिक्त, वो और कुछ नहीं कहलाएगा।
- 27:15फिर आगे कौन है पात्र? यह पंचतत्व का पुतला है कौन यह
- 27:21नहीं देखा जाता। बस यह देखा जाता कि वह है कौन?
- 27:29उसने कहा क्या वह कैंची की बात करता है या वह सुई धागे की बात
- 27:35करता है? वह इकट्ठा करने की बात करता है यह
- 27:39वह अलग थलग करने की बात करता। है।
- 27:46समझने वाली बात तो यही बुद्धि के तल से बुद्ध बोले।
- 27:56कृष्ण बुद्धि के तल से नहीं। बोल रहा है।
- 28:00यज्ञ वल्क या उपनिषद बुद्धि के तल से नहीं बोले।
- 28:03बुद्धि के पार बोले उपनिषद के सारे ही शब्द आपको ऐसे मिलेंगे जो
- 28:11बुद्धि से समझ आती है क्या समझोगे?
- 28:15वह दूर से दूर है, पास से पास है, समझाओ बुद्धि को कैसे समझाओगे
- 28:21लेकिन समझाने वाले आचार्य मिल जाएं, उपनिषद की व्याख्या करने
- 28:26वाली कैंचियाँ मिल जाएंगी तुम्हें बड़े अफसोस की बात।
- 28:32है। हम इन लोगों को बड़े शोक से
- 28:36सुनते। हैं।
- 28:39और हमें पता नहीं होता यह हमारे समाज के लिए एक जहर का काम कर
- 28:44रहे। हैं।
- 28:48यह हमारी यूनिकता को मारते। हैं।
- 28:52एक होने की तरफ हम जो प्रयास कर रहे हैं, उसको तोड़ते हैं।
- 28:59कैंची कभी जोड़ नहीं सकती, कभी कैंची जोड़ नहीं सकती, ध्यान में
- 29:04रखना जो जोड़ेगा वह गूंद ही होगा। उपनिषद के सारे शब्द ऐसे ही
- 29:13मिलेंगे जो बुद्धि में आएँगे ही नहीं और जो बुद्धि में आएँगे
- 29:17नहीं, वो आचार्य आपको बुद्धि का विश्लेषण करके समझाएंगे।
- 29:25अजीब सी बात है भाई। कैसे कैसे मूर्खों ने धरती पर
- 29:31जन्म ले लिया? आज नहीं कल ये खुद को अवतार घोषित
- 29:37कर दें। क्यों इतना खुद के चेहरे मोहरे को
- 29:44चमका रहे हैं? क्यों खुद के चेहरे मोरे को इतना
- 29:47ऐड कर रहे हैं? व्याख्यानत कर रहे हैं, देख रहा
- 29:50रहे हैं? यह बिल्कुल वही प्रयास है जो
- 29:56विष्णु के स्वम्बर में प्रयास किया नार्द ने बंदर का मुख लगाकर।
- 30:08कि दुल्हन मेरे गले में वरमाला डाल दे, लेकिन दुल्हने इतनी मूर्ख
- 30:17नहीं होती। दुल्हन सब को देखती चली गई।
- 30:24और विष्णु के गले में माला डालते हैं।
- 30:28वह लक्ष्मी का पूर्व रूप था। कहानी है चिपक मत जाना यही
- 30:38तुम्हारी बिमारी है कि तुम शब्दों से चिपक जाते हो।
- 30:44फिर पूछते हो ये बाबा आपने ये कहा था तब तो ये कहा था प्लीज़ क्लैफी
- 30:52यही मेरी भी दुविधा है। हर चीज़ उस तन से बोली नहीं जाती।
- 31:03और सही पूछो तो उस तल से कुछ भी तो बोला नहीं हो जाता, वह तो वो
- 31:11तल है जहाँ जाकर परम चुप्पी पर मौन हो जाता है, शांति छा जाती
- 31:17है, ठंडी हवाएं बहने लगती हैं, फिजाओं में गड़गड़ाहट खत्म हो
- 31:22जाती है। भिजाओ की खुशबू तुम्हारी नशा
- 31:29फुटों को आनंदित तो करेगी, लेकिन शोर नहीं करेंगे।
- 31:36ठहर जाएंगी हवाएं। और तुम मौन में उतर जाओगे, गहरे
- 31:42मौन में उतर। जाओगे
- 31:54तुम भी भक्त हो। टुकड़ों में भक्ति हो जब तुम्हारी
- 32:04बुद्धि टुकड़ों में बंट जाती है। वह फैसला करने में असमर्थ हो जाती
- 32:10है। इसको कहते हैं विवेक की शून्यता
- 32:17संशय जहाँ बुद्धि ठीक से फैसला नहीं ले पाती।
- 32:26तो विवेक का जन्म नहीं होता। इसे कहते हैं विवेक की अक्षमता।
- 32:34तुम अगर टुकड़ों में बंटे रहोगे, वे भक्त रहोगे, वे योगी रहोगे,
- 32:42खंडित रहोगे, टूटे टूटे रहोगे। तो तुम रोते रहोगे?
- 32:47तुम चिल्लाते रहोगे फिर क्या करें बाबा इस बुद्धि को फेंक दें,
- 32:53जरूरत नहीं है, जहाँ से बदबू आती है उस बदबू को हटा देना।
- 33:04यह कोई उपचार नहीं है क्योंकि बदबू फिर आ जाएगी तो सही उपचार
- 33:11क्या है? सही उपचार है गटर के पास से हट
- 33:17जाओ। और हजारों हजारों तरह की खुशबू
- 33:33सुगंधे बिखेरने वाले, बागों में चले जाओ कहाँ जरूरत पड़ी गटर को
- 33:47हटानी? तुम ही तो हटना है, तुमने स्थान
- 33:53को नहीं हटना है, तुमने खुद को हटना है, तुम यही गलती कर रहे हो।
- 33:59तुम स्थानों को हटाने की चेष्टा करते हो, खुद को हटाने की चेष्टा
- 34:04नहीं करते, यही बाबा कहते हैं। यू नीड नॉट टू चेंज दी
- 34:13सर्कमस्टैंसेस तुमने बाहर बाहर के वातावरण को बदलना है,
- 34:25सर्कमस्टैंसेस को बदला नहीं है तुम्हें?
- 34:29इन गठरों को साफ नहीं करना है तुमने यह गठर तो सदा ही फिर से
- 34:34आते रहे जब तक बुद्धि है, अपेक्षा ही मत करना कि गठर हट जाएगा
- 34:44बुद्धि को एक बार ही हटालो। गटर फिर आजायेगा पीछे से यह एक
- 34:56लम्बी कतार यह भी खत्म नहीं होता, तो फिर हल क्या है?
- 35:06हल है कि तुम ही हट जाओ। यही सब संत कहते हैं।
- 35:15दुर्गंध के पास खड़े होकर चिल्लाने का कोई फायदा नहीं है।
- 35:28तुम आस पास के वातावरण को बदलने की चेष्टा मत करना।
- 35:37तुम खुद ही वहाँ से हट जाना, वहाँ से हटकर उस स्थान पर चले जाना जो
- 35:46खुशबुओं से संपन्न फिजाओं में हवाओं को बिखेर रहा है।
- 35:51उन बगीचों में चहलकदमी करना, उन बगीचों में जाकर आसीन हो जाना।
- 36:00जब तक व्यक्ति खोपड़ी में है वो विभक्त रहेगा।
- 36:03पहली बात हाँ इसी चक्कर में चलो खोपड़ी वो सड़ात है जिसके पास तुम
- 36:15लाक यत्न कर लो। इसकी सडक नहीं मटेगी और तुम यही
- 36:21तो कर रहे हो सारी उम्र हो गई तुम्हे तुम यही तो कर रहे हो तुम
- 36:31गटरों में खुशबू भरने की जिष्ठ में संलग्न हो जो कि असंभव है।
- 36:38ये छोटा बच्चा कहने लगा ठीक थोड़ी देर रुका, पहले रो रहा था, रोना
- 36:45थम गया तो सुकरात कहते यगजग उसने एक प्याली को समुद्र में फेंक
- 36:55दिया। बोला हे सागर तू गागर में नहीं
- 37:02उतर सकता तो कोई बात नहीं गागर तो सागर में उतर सकती है ना ये ले
- 37:10संभाल ले गागर हे सागर? गागर को अपने भीतर विलीन कर ले और
- 37:20सुकरात कहते हैं, दूसरा झटका लगा मुझे, तुम्हीं ने दर्द दिया और
- 37:28तुम दबा देना। इस बच्चे ने ही दर्द दिया मुझे।
- 37:33इस बच्चे ने ही आँखें खोलीं मेरी कि हम प्रयास कर रहे हैं गागर में
- 37:39सागर को भरने का यद्यपि सागर इतना महान के गागर में आता नहीं और फिर
- 37:49सहरसा में सोच ही रहा था। हम भी तो यही प्रयास कर रहे हैं,
- 37:53लेकिन उसका हल नहीं मिल रहा था। कौन फिलॉसफर जान पाया है इसका हल
- 37:59क्या फिलॉसफर बाल की खाल निकाल लेते हैं?
- 38:03पुरुषों जैसे और तुम बड़े प्रभावित होते हो?
- 38:10तुम कहते वाह क्या बात है इतनी सूक्ष्म बेचना इससे बड़ी
- 38:21खोपड़ियाँ भी आएंगी। इस सुर की सृष्टि में कोई इम्तहार
- 38:26नहीं होता। ईश्वर की सृष्टि में और भी बड़े
- 38:33बड़े। आए।
- 38:34इससे पहले भी आए और भी आते रहेंगे और सो एक सड़ी हुई खोपड़ी।
- 38:49बस नीचे का दूसरा 500 नीचे कहते पर मत बनियों गॉड इस मैंने उसे
- 39:03दफन कर दिया। 19 से 11 वर्ष तक पागलपन की
- 39:10बिमारी से जूझता रहा। वह रात रात भर चिल्लाता।
- 39:17वह पड़ोसियों के लिए सर दर्द बन गया।
- 39:20कोई अस्पताल उसे दाखिल करने से मना कर रहा।
- 39:23था। कहता नहीं, नहीं इसको नहीं हमने
- 39:26दाखिल नहीं करना है तुम ले जाओ इसको घर पे सभी नीचे का जानकार हो
- 39:33गए थे। 11 वर्ष की अवधि कोई काम नहीं
- 39:37होती, तड़प तड़प के मरा नीचे क्यों?
- 39:44ही वॉज़ मल्टी फ़र केटर तुम तो बात करते हो?
- 39:51बहु आयाम की संत कहते हैं बहु आयाम की छोड़ो, तुम अगर दो भी रह
- 39:59गए बाई फर केट भी रह गए। भाई पोडर भी रह गए तो भी तुम दुखी
- 40:06रहोगे तो संत ने एक नया शब्द निकाला, संत कहते गणना को ही खत्म
- 40:16कर दो, तुम ये न कहो कि वह दो नहीं है।
- 40:24तो संतों की भाषा बड़ी अजीब संतों ने कहा, वह अद्वैत है बड़ी प्यारी
- 40:31भाषा। है।
- 40:32यद्यपि अद्वैत का अर्थ होता वही है, केवल दो नहीं अद्वैत का अर्थ
- 40:39होता है जहाँ द्वंत नहीं। अद्वैत का गहरा अर्थ होता है जहाँ
- 40:46दुविधा नहीं जहाँ द्वंद नहीं जहाँ भेद नहीं है सारी दुनिया आज इस
- 40:56बिमारी से ग्रस्त। है।
- 41:04तुम्हें पता ही नहीं तुम कितनी बार झूठ बोल लेते हो और आज तो
- 41:12जैसे होड़ लगी तुमने मर्यादाओं की खबर उठा दी है।
- 41:26जो किसी वक्त भगवान राम ने उसा दी थी वो महल गिरा दिए हैं, तुमने
- 41:33खंडहर बना दिए हैं, तुमने आज मर्यादा नाम की चीज़ कहाँ है?
- 41:40नहीं। तुमने सब झाड़ डेरी कर।
- 41:50दिया। 11 साल तक तड़पते रहे नीच से जो
- 41:57कहते हैं भगवान ने मर गया है मैं दफन कर दिया है।
- 42:05यह एक पागलपन है, मैंने कब भी कहा था नास्तिकता एक पागलपन है।
- 42:13सीधी सी बात है जब खोजा नहीं जब खोजा नहीं तो पाओगे कैसे?
- 42:24तुम्हारी कोई चीज़ गुम हो गई, सुई गुम हो गई क्या भी गुम हो गई, कुछ
- 42:31भी गुम हो गया तुम इसे ढूंढा ही नहीं और तुमने डिक्लेर कर दिया कि
- 42:37सुई है नहीं क्या भी है नहीं। क्या कहा जाए, तुम्हें पागल ही तो
- 42:48कहा जाएगा और कोई हुक्म तो तुम्हारे लिए है ही नहीं।
- 42:54तुम्हारी चाबी गुम हो गई तुम्हारी सुई गुम हो गई तुमने ढूंढा तो है
- 42:58नहीं तुमने खोजा तो है नहीं तुमने डिक लेयर कर दिया।
- 43:03होता नहीं है नहीं, ऐसे ही आज के मार्गदर्शक कर रहे हैं मैं उन्हें
- 43:14क्या कहूँ? मेरे पास उनके लिए कोई शब्द नहीं
- 43:18है। अपना ही तो बिगाड़ रहे हैं।
- 43:26मैं उन्हें क्या कहूँ? जो व्यक्ति खुद को ही जख्म दे रहा
- 43:31है, मैं उसको और जख्म क्यों दूँ? कल एक बुद्ध का मेरे पास फ़ोन आया
- 43:40बाबा। आपने बुद्ध को मूर्ख कहा, मैंने
- 43:47कहा मूर्ख को मूर्ख ही तो कहूंगा समझदार कैसे?
- 43:50कहूंगा। समझदार तो वही सयाना तो वही जो
- 43:57अपने अंतिम स्तर पर उस लाश। लास्ट वीक पॉइंट पे पहुँच गया
- 44:06निश्चयतिबुद्ध ने खोजा। मैं ये नहीं कहता कि आचार्य की
- 44:09तरह बिल्कुल ही नहीं खोजा, नीचे की तरह मार्क्स की तरह चारबाग की
- 44:15तरह बिल्कुल ही नहीं खोजा, बिल्कुल खोजा।
- 44:19और इतना खोजा, इतना खोजा सब कुछ छोड़ के खोजा और जो छोड़ा था उसकी
- 44:28रडक न रह गई कि मैंने क्यों छोड़ा क्योंकि जो मिला वो इतना विराट
- 44:34था। सारा दुखड़ा मिट गया।
- 44:42जो छोड़ा था उसे अनंत गुना ज्यादा मिल गया, लेकिन मैं तुमसे ये कहता
- 44:49हूँ हे बुद्ध के शिष्य मुझे ज़रा ये बताओ।
- 44:57जिसने ईश्वर को खोजा न हो वो कहे के ईश्वर।
- 45:03नहीं। है।
- 45:07क्या यह किसी सच्चे आदमी के लिए शोभा देता है?
- 45:14कहता बाबा ने? किसी सच्चे व्यक्ति के लिए तो
- 45:18शोभा नहीं देता। मैंने कहा फिर ये बताओ।
- 45:22महावीर को 12 वर्ष छः महीने लगे, यद्यपि छः वर्षों में वो भी उसी
- 45:32स्थान पर पहुँच गए थे। क्या वो नहीं रुक सकते थे?
- 45:40रुक सकते थे फिर उन्होंने 6.5 साल और कहाँ लगाई स्वयं से केवल्य तक
- 45:50की यात्रा? 6 साल 15.5 दिन और लगे सही प्रमाण
- 46:07दे रहा हूँ मैं आपको जो मैं जानता नहीं जो शास्त्रों से मैंने देखा।
- 46:18क्योंकि बुद्ध और महावीर को मैंने देखा नहीं, मैंने बहुत बार बोला,
- 46:23मैंने देखा कृष्ण को देखा, मैंने देखा राम को।
- 46:27देखा? बुद्ध को नहीं देखा, मैं पता नहीं
- 46:30कहाँ था, महावीर को नहीं देखा मैंने, मैं पता नहीं कहाँ था।
- 46:36इन्हीं जन्मों में खोया ज़रा बताओ जिसने खोजा नहीं, जो जहाँ तक खोजा
- 46:52वहीं तक बोलना चाहिए था कि नहीं चाहिए चुप हो गए हो शर्मसार होने
- 47:00लगे बाबा? समझ गया तुम शर्मसार ना करो,
- 47:05मैंने कहा तुम्हें शर्मसार होना भी नहीं चाहिए क्योंकि यह गलती तो
- 47:10बुद्ध की है। बुद्ध इतने समझदार नहीं है कि जब
- 47:17जहाँ तक मैंने खोजा वहाँ तक मिल गया।
- 47:22और जो आज बुद्ध कह रहे हैं कि एनलाइटनमेंट होता है, प्रबुद्धता
- 47:28होती है और कुछ लोग ऐसे बैठे हैं जो कहते हैं प्रबुद्धता नहीं होती
- 47:33और आज भी हैं। और।
- 47:37कुछ लोग ऐसे कहते हैं कि प्रबुद्धता तो मर गई है।
- 47:42नित्य हैं, मार्कस हैं और चार वाक हैं, जो प्रकृति के नियमों तक को
- 47:46भी स्वीकार नहीं करते। वो कहते हैं नहीं हैं जहाँ कोई
- 47:52हिसाब किताब लेने देने वाला यदा जी वे सुखी जीवेत, जैसे जीना,
- 47:58सुखी जीना। हमारे हाथ में हो भाई हमारे हाथ
- 48:02में कहाँ है सुखी होना हमारे हाथ में साधन संपन्न होना है।
- 48:10हमारे हाथ में डिग्री होल्डर होना है।
- 48:14हमारे हाथ में मेहनतकश होना है। लेकिन सुखी होना हमारे हाथों में
- 48:19कहाँ है? और ज़रा देखो चार बात सुखी रहे
- 48:24तुम चार बाकू के रिश्ते को जानते हैं चार बाकू के हिस्टरी को।
- 48:29मैं जानता हूँ उनसे ज्यादा दुखी कोई रहा नहीं और देखिए।
- 48:35कायदे कानून ही बता देते हैं कि यह व्यक्ति सुखी रहा होगा कि नहीं
- 48:40रहा होगा। जो व्यक्ति आज किसी से उधारी ले
- 48:44ले और कल को जब वो व्यक्ति उधारी मांगे उससे कहे नहीं, मैंने देने
- 48:51नहीं, मैंने तो लेनी है। और जब वह व्यक्ति जिद करे तो वह
- 48:57थाने के चेहरी चला जाए। दहशत दिखाई तो फिर उससे क्या
- 49:03कहोगे? तुम झूठा कहोगे या सच्चा कहोगे?
- 49:07मकार कहोगे न? ऐसा ही गलती बुद्ध ने किया है।
- 49:16बुद्ध ने खोज न मैं तुम्हें पहले ही बताता हूँ, कबीर शब्द पहले ही
- 49:22कह देता है, मिलेगा नहीं जिन खो जाते ना पानी पर बुद्ध ने खोजा
- 49:32बुद्ध ने भागने की जल्दी की। ये बात अलग है।
- 49:36करुणा अवश्य, करुणा एक बिमारी हो जाती है अगर वो अप्रपूर्ण हो,
- 49:44इसको संक्रमित करुणा एक बिमारी हो जाती है अगर वो एप्रिपक्व हो।
- 49:54बुद्ध की करुणा ए परिपक्व। है।
- 49:58कृष्ण की करुणा परिपक्व है, बस दोनों की करुणा है, लेकिन दोनों
- 50:05की करनाओं में जमीन आसमान का फर्क है।
- 50:12बुद्ध की करुणा तुम्हें सुखी कर। देगी।
- 50:16निश्चिंत बुद्ध की करुणा तुम्हें उस स्थल पर पहुंचा देगी जहाँ तुम
- 50:23जान जाओगे, तुम क्या नहीं? हो?
- 50:29वहाँ तुम्हारी सारी भ्रांतियां टूट जाएंगी।
- 50:32और तुम्हारे 99% दुख इन भ्रांतियों के कारण तो 99% दुखों
- 50:43को खत्म करेंगे तुम्हारे बुद्ध इसलिए करूणा वश बुध उठ गए होंगे।
- 50:52मैं जानता नहीं हूँ मैं सिर्फ अंदाजा लगा रहा हूँ।
- 50:57ओके मैंने पहले ही कहा बुद्ध को मैंने देखा नहीं तो बुद्ध के
- 51:03मनुष्य भाव को मैं कैसे देख सकता हूँ, सिर्फ अंदाजा लगा सकता।
- 51:08हूँ। आई कैन जस्ट इमेजिन।
- 51:14कि इस कारण से उन्होंने जल्दी की होगी।
- 51:19संसार दुख है और दुख की निवृत्ति तो वही हो गई बिलकुल हो की गई।
- 51:26हम इस बात से बहदस्तूर रजामंद है। दुख की निवृत्ति वहाँ जाके हो
- 51:35जाती। है।
- 51:38लेकिन फिर ऐसा कहना एक प्रबुद्ध व्यक्ति के द्वारा के ईश्वर नहीं
- 51:42है। ये ईश्वर का अपमान थोड़ी है।
- 51:49ईश्वर तो अचल है। अकम्प है, वह तो अडोल है बुद्ध के
- 51:55कहने से सिर्फ नहीं तो नहीं हो जाएगा।
- 52:00अगर बुद्ध कहते हैं वो नहीं है तो जैसा मार्कर्स ने कह दिया, नीचे
- 52:05ने कह दिया तो नहीं है, वैसा ये बुद्ध कहते हैं, नहीं है तो नहीं
- 52:08नहीं हो जाएगा। शब्दों को समझ रहे हो आप च शब्द
- 52:15थोड़े से गहरे होते हैं, इसलिए उन्हीं शब्दों को रिपीट करके ढंग
- 52:22से बोलना पड़ता। है।
- 52:24बुद्ध केजी कहने से कि वो नहीं है, वह नहीं नहीं हो जाता।
- 52:32मैं फिर से दोहरा रहा हूँ। इसको बुद्ध का कहना भी बिल्कुल
- 52:37वैसा ही है जैसा मार्कर्स कहते हैं, अब बुद्ध उस श्रेणी में आ
- 52:42गए, जीस श्रेणी में, नीचे और मार्कर्स।
- 52:48जीस श्रेणी में चार वक्त तो क्षमा मांगने लगा, प्रभु आपकी बात में
- 52:57दम है, मैं क्षमा यार्चना करता हूँ, मुझे माफ़ कर दो, आपने मुझे
- 53:04सटीक ढंग से समझा दिया। अब हम आदमी चले बस बुध के बाद
- 53:14शुरू होती है भक्ति वो दो स्थल पर पहुँच जाते है।
- 53:24जहाँ व्यक्ति ये तो जान लेता है कि वह शरीफ मन, विचार, भावनाएँ
- 53:31नहीं हैं, लेकिन उसके दुखड़े दूर होंगे।
- 53:43रोगमुक्त होने का मतलब ये नहीं, अब ध्यान से सुनना बात अब
- 53:49तुम्हारे काम की बात है। रहस्य की बात शुरू होती है यहाँ
- 53:56से। और।
- 53:59रहस्य की बात यहाँ से शुरू तो हो जाएगी।
- 54:05लेकिन उतनी ही मुश्किल है समझाना, लेकिन मैं समझता हूँ कि तुम मुझे
- 54:14सुनते सुनते इतने सालों से अभ्यस्त हो गए हो।
- 54:20तो तुम समझ जाओगे मैं क्या बोलना चाहता हूँ एक व्यक्ति सवस्थ है,
- 54:30एक व्यक्ति सवस्थ है, इसका मतलब क्या है?
- 54:34उसमें रोग नहीं है ठीक? रोग का मतलब उसमें नेगेटिविटी
- 54:41नहीं है। ठीक तो क्या इसका मतलब यह है कि
- 54:45उसमें पाजिटिविटी है? यह कतई अर्थ।
- 54:49नहीं है उसका? क्योंकि निरोग होने का मतलब।
- 54:56आनंदित होना बिल्कुल नहीं होता। समझा रही है थोड़ा सा उल्टा
- 55:04पुल्टा करना पड़ेगा मुझे क्योंकि अब बुद्ध का तल छोड़ रहा हूँ मैं
- 55:09बुद्धि का तल छोड़ रहा हूँ मैं अब मैं गहरे में प्रवेश कर रहा हूँ।
- 55:15तो इसको ध्यान से समझना पड़ेगा। इसका एक एक अंश बटोरना होगा।
- 55:20एनालिसिस करना होगा, तोड़ना होगा। एक व्यक्ति निरोग है।
- 55:30इसका मतलब उसमें रोग नहीं है, नेगटिविटी नहीं है।
- 55:34इसका मतलब यह तो नहीं कि उसमें पॉजिटिविटी है।
- 55:39सभी लोग सवस्थ होते हैं, लेकिन आनंदित कहाँ होते हैं मुझे बताओ
- 55:47वह जो 1% रह गया उसे ही परमात्मा कह।
- 55:56वहीं चूक गए बुद्ध और अपने पीछे ऐसी मूढ़ों की कतार खड़ी कर गए जो
- 56:07दंत तो कमाए समृद्ध तो होंगे। निरोग तो होंगे, बिमारी नहीं होगी
- 56:15उनमें सारे कायदे, कानून, प्रकृति के वो छान मारेंगे, लेकिन क्या
- 56:26आनंद पा जाये? निरोगता का मतलब आनंदित होना तो
- 56:39है नहीं। निरोगता का मतलब रोग का नै होना
- 56:46होता है। निरोगता का मतलब आनंदित होना तो
- 56:51कतई नहीं होता। यही जोक गए वथ इसलिए मैंने कहा
- 56:56पुत्र वह चुप हो गया, बोला क्या मैं आपके शरण में आ सकता हूँ?
- 57:08मैंने कहा तुम जिसकी शरण में हो उसकी शरण में हीरो हो।
- 57:12बुद्धम शरणम् गच्छा संगम शरणम् गच्छा तुम उन्हीं के।
- 57:19शर्म में रहो क्योंकि फिर तुम वाइफ हर के हो जाओगे फिर तुम्हारा
- 57:27हसर न खुदाई मेला न बसा ले सनम। ना इधर के रह ना उधर के रह मुझे
- 57:34तो जो शुरू से सुन रहे हैं वो ही निरंतर चलते आ रहे हैं और प्रगाढ़
- 57:41हैं और समझते हैं और आनंदित होते हैं।
- 57:45रोज़ खुशबू की सुगंध हैं, उन्हें निहाल कर जाते हैं।
- 57:50इसलिए मैं नए साधकों को नए सब्सक्राइबर्स को कह देता हूँ।
- 57:56भाई तुम क्यों फंसे गए हो? तुम 1000 लाख प्रश्न पूछोगे मुझसे
- 58:06और मैं? मैं पूर्णता के करीब पहुँच गया।
- 58:11मेरा ग्रंथ पूर्ण होने को है, तुम बिल्कुल लास्ट चॅप्टर पे आए
- 58:18स्वभाव था, मुझसे पूछोगे, ये क्या होता है, वो क्या होता है?
- 58:22जैसे बच्चा सवाल करता है, तुम्हें किस किस का जवाब दूंगा तुम्हें ये
- 58:28तो पता नहीं? कि सब पुरानी वीडियो सुन के खंगाल
- 58:32के फिर मेरे पास आके सवाल पूछ लेते।
- 58:36ऐसे ही लोग मेरे पास आते हैं, सवाल पूछ लेते हैं, जो मैंने 2020
- 58:44बार जवाब दे दिए हैं, वो फिर से सवाल पूछ लेते हैं बाबा?
- 58:48मैं नाराज हो जाऊंगा, मैंने कभी हो जाओ।
- 58:53जब नहीं आए थे तो भी तो नाराज थे, अब तुम्हारे नाराज होने की फिक्र
- 59:00मैं करूँ, तुम आए ही क्यों हो मेरे पास जो हैं।
- 59:10दट। इस सफ्फीशिएंट इतने दिए ही जल
- 59:15जाएं तुझे घड़ी सौभाग्य की घड़ी होगी पल तू, शुभ धन शुभ घड़ी याद
- 59:33पढ़ें जब। अगर इन्हें अपनी खुद की याद आ जाए
- 59:38वो दिन शुभ शुभ खड़ी हो पर थोड़ा सा तो मैं यहाँ अगाह कर।
- 59:45दूँ? बुध तक सभी को पहुंचना होता है।
- 59:52मैं बहुत बार कह चुका हूँ। लेकिन बुद्ध के तल तक पहुंचने के
- 59:57बाद आफ्टर नो दाये सेल्फ रुको मत जान उसके आगे भी और भी राहते हैं
- 1:00:07और भी वसल की राहत के सिवा। अभी जारी रखना होगा।
- 1:00:15तुम्हें अभी आनंद तो बाकी है और आनंद ही सेंस है, आनंद वो ही तरह
- 1:00:27है। फ़ोन तुम्हें सुगंध देता है।
- 1:00:33और फूलों का रस तुम्हें इतर देता है बस यही फर्क है सुगंध में और
- 1:00:40इतर में इतर तुम कहीं भी ले जा सकते हो सुगंध तुम कहीं नहीं ले
- 1:00:47जा सकते। हो?
- 1:00:51बुध के तल पर आना। आना पड़े आवश्यक लेकिन वहाँ रुक
- 1:01:00मत जान अभी और भी गम है जमाने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी
- 1:01:11हैं। वसल की राहत के सिवा इससे आगे भी
- 1:01:15प्रेम की दुनिया शुरू होती है और सच पूछो तो इससे आगे ही प्रेम की
- 1:01:20दुनिया शुरू। होती है विभक्त।
- 1:01:25कुण्ड, जो बंट गया बुध अभी खोपड़ी में।
- 1:01:33खुद को जान लिया और खुद को जानने के बाद दो रह गए।
- 1:01:40एक नहीं हुए अभी समझ लेना, बात को बुद्ध की तकलीफ क्या है?
- 1:01:45बुद्ध की यही तकलीफ है, शांत है। दो रहने वाला व्यक्ति भी शांत
- 1:01:50होगा। बहुत रहने वाला व्यक्ति अशांत
- 1:01:56होगा। बुध दो रह जाते हैं और कबीर कहते
- 1:02:02हैं दो भी नैना संत कहते हैं अद्वैत वेदांत कहता है।
- 1:02:11अद्वैत जहाँ दो नहीं ऋषि बड़े समझदार निकले।
- 1:02:22ऋषियों ने गणित को छोड़ ही दिया, भूल ही जाए इसको जब गणित का यहाँ
- 1:02:30कोई काम नहीं है। तो गणित को याद भी परिभाषित भी
- 1:02:35क्यों करना है अंकों में तो उन्होंने कहा, वह एक है, यह नहीं
- 1:02:49कहा। उन्होंने कहा वह दो नहीं।
- 1:02:54बोलने का व्यक्त करने का बड़ा सुंदर तरीका एक तीर से बहू
- 1:03:03स्वीकार कर लिया उन्होंने अद्वैत वो नहीं है वो।
- 1:03:11तो बुद्ध के तर पर पहुंचोगे तुम दो रह जाओगे दो कैसे एक तुम आत्मा
- 1:03:20एक जीसको खोजोगी अब परमात्मा इसलिए बुध को मैं कहता हूँ मूर्ख।
- 1:03:31कोई और देखा कृष्ण देखे, आसमान में भटकते हुए जन्म लेने के लिए
- 1:03:37लालायी कबीर देखे, नानक देखे, मीरा देखी, कोई और संत देखा
- 1:03:44तुम्हें अगला जन्म लेने के लिए लालाई?
- 1:03:48अकेले बुद्ध ही क्यों फिर रहे हैं?
- 1:03:51क्योंकि वो वाइफ के उन्होंने आत्मा को जान लिया।
- 1:03:59मैं कौन हूँ और वे राहतें हैं बसल की राहत के सिवा?
- 1:04:07उन्होंने ये नहीं जानना कि मैं के आगे मैं का क्रिएटर, वह कौन है?
- 1:04:17आत्मा कौन है? जान दिया परमात्मा कौन है, यह
- 1:04:23नहीं है सर, इसलिए बुद्ध। जब तक यहाँ रहेंगे, तुम्हें दुखी
- 1:04:32मालूम नहीं पड़ेंगे, क्योंकि दुख इतना गहरा है भी नहीं।
- 1:04:36मैंने पहले भी कहा हल्की सी तरिह हल्की सी दरार दुख तो देती है और
- 1:04:45वो दुख बुद्ध जानते हैं। शायद करुणा के कारण वो तो उठे
- 1:04:51होंगे, मैं अंदाजा ही लगा सकता हूँ, लेकिन बुद्ध जानते भरी भाँति
- 1:04:57हैं क्योंकि जब कोई व्यक्ति। अपने आप के तल पे पहुंचता है।
- 1:05:04उसे बिलकुल साफ एक अपारदर्शी, ट्रांसपेरेंट पर्दा दिखता है।
- 1:05:10जीना, जीना सा। उसके पर्दे के पास वह परमात्मा
- 1:05:14स्पष्ट ही तो नजर आता है और जिसने वो कलश देख लिया दो।
- 1:05:22ये कैसे इंकार करेगा की परमात्मा नहीं लेकिन फिर भी इंकार किया।
- 1:05:30मार्क ने इंकार किया इसलिए बुध को मैं थोड़ा स्पेयर करता हूँ।
- 1:05:34यहाँ आके मार्क ने भी खुद को भी नहीं जाना।
- 1:05:39न नीचे, न जाना, न जाना चारवाक में, लेकिन बुद्ध ने खुद को जाना,
- 1:05:48दोनों की नास्तिकता का महत्त्व फर्क है।
- 1:05:52पर मैं यह भी जानता हूँ भली भाती कि जो खुद को जान लेता है।
- 1:05:56खुद को जानने के बाद हल्का से के जीना पर दाता है।
- 1:06:00यद्यपि ये दोनों गटरें मुझे एक ही दिन हुई, एक ही वक्त में हूँ,
- 1:06:08फैलता ही चला गया, फैलता ही चला गया, संसार की सोलिडिटी खत्म होती
- 1:06:15चली गयी। संसार का ठोस तब मिटता चला गया
- 1:06:21पर्वत, मिटे नदियां, मिट्टी समुद्र मिटे, समुद्र चाँद तारे
- 1:06:28मिटे सब मिटा, सामने बोना वृक्ष मिटा।
- 1:06:34इधर उधर खड़े हुए वृक्ष मटे छोटे छोटे पत्ते, मटे घास फूस मटे धरती
- 1:06:40मटे सब मिट गया, धीरे धीरे सोरिडिटी खत्म हो गई और क्या एक
- 1:06:46अपारदर्शिता आई ट्रस्ट फिर एन सी आई और वो व्हाइट मिल्की?
- 1:06:54पार्टिकल्स सब जगह वो ही वो है, भरा पड़ा है, कोई एक स्थान नहीं।
- 1:07:03बाबा ने अवश्य ही इस स्थान पर आके बोला।
- 1:07:06होगा। बिना ना में ना ही हो उठा।
- 1:07:13सब जगह वो ही वो भरा पड़ा। है।
- 1:07:19व्हाइट दूधिया पार्टिकल्स एव्रीवन हर जगह है।
- 1:07:27वो बिना नामें नाहीं को था। जितना तेकता तेकता सब जगह पर सारा
- 1:07:35जो है जितना विराट है सीमाओं से परे।
- 1:07:44सब जगह वो ही वो है और उसके। अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं।
- 1:07:52शब्दों से समझ आता है कि ये संत कहाँ तक पहुंचा?
- 1:07:58बाबा के शब्द साफ ढलते हैं बाबा के अलफाज़ साफ ढलते हैं दर्शन कि
- 1:08:07देखा है? अन्यथा ये शब्द कौन कह सकता है ये
- 1:08:14परमहंस के शब्द? हैं।
- 1:08:18जीसको दूसरा कोई दिखाई नहीं पड़ता।
- 1:08:28एक ही बार में दो घटनाएं घटीं में अज्ञानी से नगण्य हो गया या कह लो
- 1:08:38विराट? हो गया।
- 1:08:40दोनों में से कुछ भी कह सकते हो दोनों ही शब्द है।
- 1:08:48मैं अज्ञान से भरा हुआ हूँ, ज्ञानी हो गया या अस्तित्व हो
- 1:08:57गया, तुम कुछ भी कह लो घटना एक ही घटे।
- 1:09:04और वो घटना। यह थी वह प्रेम से लब लब था सब हर
- 1:09:09जगह उस प्रेम का ही आलम। था।
- 1:09:14और वह प्रेम बड़ी मदहोशी देता है जिन लोगों का प्रेम हुआ।
- 1:09:21कुछ भाग्यशाली लोगों के जीवन में प्रेम उतरा।
- 1:09:24होगा। उन्होंने इसका स्वाद चखा होगा।
- 1:09:31वो जानते हैं ये कैसा रसीला है। ये तो देखा देखी बात है, सुना
- 1:09:40सुनी की है नहीं लिखा लिखी की है। नहीं देखा देखी बात जिसने जान
- 1:09:50लिया जो गूंगा गुड़ खाई कहे कौन मकसद?
- 1:09:57वे कह नहीं पाएगा। मीठा मीठा है, लेकिन मीठा कैसा
- 1:10:03होता है उसे तुम ही खाओगे तो समझ पाओ बस गूंगा सिर्फ गुड़ को खा के
- 1:10:13कह देगा, मीठा है। लेकिन मीठा तुम जानोगे कैसे तुम
- 1:10:19जानोगे? जब तुम गुड़ को जीबा के ऊपर रखोगे
- 1:10:23तो समझ आएगा मीठा क्या होता है। इसलिए जिनके पास जीबा के टेस्ट
- 1:10:30नहीं है। वो स्वाद की परिभाषा करते अच्छे
- 1:10:36लगते नहीं, ये आचार्य ये सद्गुरु ये कथावाचक उस रथ का बखान करते
- 1:10:47अच्छे लगते हैं। क्योंकि इस रस के पीछे भावना का
- 1:10:53तूफान नहीं है। उस रस के पीछे दर्शन का तूफान
- 1:10:58नहीं, वेग नहीं है वो भयंकर तूफान का।
- 1:11:10वो गलबकड़ी नहीं डाला है। उस तूफ़ान में तुम्हें यही कमी रह
- 1:11:16गई। बुध में बुध जानते हैं।
- 1:11:20मेरी दृष्टि से जानते हो कि मैंने जैसा देखा वहीं से गुजरा उस स्तर
- 1:11:27से जहाँ बुध पहुँच। जहाँ खुद को जान लिया खुद की खुद
- 1:11:32ही को जान लिया वह 5.5 घंटे का सफर करीब शायद 9:00 बजे के करीब
- 1:11:448:30 बजे के करीब शुरू हुआ होगा। और जब मुझे किसी किसान ने आके
- 1:11:52थपथपाया तो 2:00 बज गए। 5.5 घंटे का सफर दोनों सफरों को
- 1:12:00तय कर गया। बहुत से जन्मों की यात्राएं सफल
- 1:12:06हुए। बहुत से जन्मों की यात्राएं
- 1:12:10परिपूर्णता को उपलब्ध हुई, उससे पहले खंड खंड था।
- 1:12:20खंड खंड से प्रेम ने जोड़ा, मौन ने जोड़ा मौन मौन भी प्रेम का ही
- 1:12:26रूप है। हाँ इसको सड़क में दिल जब तक किसी
- 1:12:31को प्रेम नहीं उतरा है, वह मौन में उतर जाए।
- 1:12:38मौन भी प्रेम का ही एक प्रारूप है।
- 1:12:41प्रेम भी मौन का ही एक प्रारूप। है।
- 1:12:47जिसे प्रेम नहीं उतरा, वह मौन हो जाए, मौन में उतर जाए।
- 1:12:53सभी संतों ने यह कहा यह बोला नहीं जाएगा।
- 1:13:02किस सम्मुख करुण वखान उसको जानकर? शब्द नहीं, जीवा नहीं जो वह प्रकट
- 1:13:12किया जा सके। आइए हम पहले तल से समझते हैं।
- 1:13:19पहला तल बुद्धि का है। प्रेम को काटेगी छाटेगी।
- 1:13:28बहु रंग देगी, बहुरूप देगी, मल्टीडायमेंशन करेगी लेकिन ये
- 1:13:35बुद्धि मल्टीडायमेंशन से बाई डाइमेंशन में आ सकती है।
- 1:13:39टू डाइमेंशन मल्टीपोलर से बाईपोलर।
- 1:13:47इस बुद्धि से नीचे आ जाओ, इसको छोड़ दो कभी भी गटर को साफ सुथरा
- 1:13:53करने की चेष्टा मत करो। यह भी परमात्मा की क्रिएशन है।
- 1:13:59उसने बनाया है। गटर को साफ करने की चेष्टा न करो,
- 1:14:08ये सदा के लिए हट जाए, मैं ये कहता हूँ गटर रहेगा लेकिन तुम
- 1:14:14वहाँ से खिस करो तुम्हारे लिए चल और भी है तुम्हारे पास पांव है
- 1:14:19चलने के गटर के पास पांव नहीं है चलने के, वह तो वहीं बहेगा।
- 1:14:26तुम चलो उस स्थल से तुम आ जाओ इमोशन के तल पे वहाँ पर थोड़ी सी
- 1:14:36मल्टीडायमेंशन से तुम थोड़ी सी डायमेंशन में रह जाओगे, बस ईरशा
- 1:14:42द्वेष नफरत। पुण्य, पाप, खुशी, गमी और सुख दुख
- 1:14:54प्रेम मल्टीडायमेंशन से कुछ डाइमेंशन में तुम आ जाओगे, घट
- 1:15:05जाएंगे डाइमेंशन्स। हृदय तक आती आती तुम जुड़ जाओगे,
- 1:15:11थोड़ा प्रेम का गोंद तुम्हें चपका देगा फिर उससे भी नीचे उतरो,
- 1:15:20क्योंकि जैसे जैसे तुम नीचे उतरते जाओगे, रास्ते में गोंद है।
- 1:15:26रास्ते में गोंद है, बूंदी से नीचे प्रेम ही प्रेम है।
- 1:15:35जितना अपने भीतर उतर जाओगे उतना ही प्रेम गहरा होता जाएगा और वह
- 1:15:41प्रेम तुम्हारी मल्टीडायमेंशनल को जोड़ना।
- 1:15:44शुरू कर देगा। तुम्हारे टुकड़ों को विभाजित
- 1:15:51टुकड़ों को अविभाज्य में बदलना शुरू कर देगा, वह तुम्हें यूनिफाइ
- 1:15:59कोशिश करने करेगा तुम ज्यादा से बहू से।
- 1:16:05कम तर में आ जाओ, टुकड़े कम हो जाएंगे, समझ रहे हो, थोड़ी
- 1:16:13मुश्किल भाषा है, उसको व्याख्यायित करने चला हूँ, जो
- 1:16:17किया नहीं जा सकता। कोशिश है तुम समझ जाओ।
- 1:16:25बुद्धि के तल को छोड़ दो यात्रा तुमने करनी है खोजना तुमने उतरना
- 1:16:32तुमने जैसे जैसे वितर उतरोगे प्रेम का फैलाव सब जगह मिलेगा और
- 1:16:39प्रेम गहरा गहरा होता जाएगा, गहरा गहरा होता जाएगा।
- 1:16:45जितना गहरा प्रेम उतना गहरा गोंद तुम्हें लगेगा और एक वक्त ऐसा
- 1:16:50आएगा बुद्ध के तन तक पहुँच जाऊंगा जहाँ दो रह जाएंगे दो दो आत्मा और
- 1:17:03परमा। ये एक नहीं ये दो एक जीस आत्मा को
- 1:17:10जानते हैं। बुध वह परमात्मा क्योंकि अंश हैं,
- 1:17:15बूंद भी तो पानी है, बूंद का फॉर्मूला भी तो एच टू है न भाई।
- 1:17:23तो एक वह जो आत्मा है वह परमात्मा नहीं है है चट्टू वो लेकिन बूंद
- 1:17:32है आत्मा है तो परमात्मा लेकिन अंश है एक इसलिए एक शब्द कहा।
- 1:17:41है। आदम ने एक शब्द कहा है आदम को
- 1:17:46खुदा मत कहो आदम खुदा नहीं अब समझना एक शब्द को ऐसे यार तुमने
- 1:17:53बहुत बार सुना होगा आदम यानी आदमी।
- 1:18:01आदम को खुदा मत कहो, आदम खुदा नहीं आत्म को परमात्मा है नहीं अब
- 1:18:12आगे चलिये लेकिन खुदा के नूर से आदम जुदा नहीं है तो उसका ही
- 1:18:18प्रारूप। फॉर्मूलेशन तो वही है, एच टू ओह
- 1:18:22बूंद की भी फॉर्मूलेशन होती है और एच टू ओह समुद्र की भी फॉर्मूलेशन
- 1:18:27होती है। आत्मा ने परमात्मा हो जाना है।
- 1:18:35असर क्या है? बट थोड़ा सा प्रेम में और गहरा
- 1:18:39उतरना है। थोड़ा और गहरा में जाना है।
- 1:18:48बुध जहाँ तक पहुंचे वहाँ तक करुणा तो है और करुणा।
- 1:18:55तुम्हें समझा दूं बड़ी शुद्ध होती है, लेकिन होती है वासन करुणा।
- 1:19:03एक वासन करुणा से आगे नहीं उतरे, जीस समय उतरते हैं महावीर, अब तुम
- 1:19:13कहोगे ये तुम क्या कर रहे हो? बिल्कुल ठीक कर रहा हूँ।
- 1:19:20जीस समय उतरते हैं, महावीर महावीर प्रेम का रूप हो जाते हैं।
- 1:19:25महावीर कहते हैं अहिंसा परमो धर्मः प्रेम के बिना ये शब्द आने।
- 1:19:34असंभव है और सब उपाय करते हैं। पांव के नीचे कोई कीटाणु न जाए,
- 1:19:48ऐसा न हो कि वह परमात्मा मुझे जीने न देना चाहता हो।
- 1:19:54और मैं जीने की चेष्टा करूँ इसलिए ऐसा करता हूँ।
- 1:19:59बुद्ध तो मांगते हैं लेकिन वह मांगते नहीं।
- 1:20:02बुद्ध एनलाइटन होने के बाद भी मांगते हैं, घर घर जाकर मांगते
- 1:20:08हैं और पहले अकेले मांगते थे। अब 50,000 की भीड़ के साथ मांगते
- 1:20:13हैं, लेकिन महावीर मांगते तो हैं। शर्त।
- 1:20:24स शर्त मांगते हैं, ये शर्त पूरी करोगे।
- 1:20:31वहाँ से मैं ग्रहण करूँगा भोजन अन्यथा नहीं कहूंगा यह अहिंसा का
- 1:20:38चरम प्राकाष्ठा। है।
- 1:20:42यह उत्पन्न होती है जीवेशणा के समाप्त होने के बाद।
- 1:20:51बुद्ध में अभी जीवेशणा बाकी है। अगर बुद्ध की जीवेशणा मर गई होती
- 1:20:56तो ये फिरते क्यों? दूसरा जन्म लेने के लिए क्यों
- 1:21:00फिरते? कभी ये सोचा तुमने अगर बुद्ध की
- 1:21:06जीवेशणा मर गई होती तो क्या ये मैत्री के रूप में?
- 1:21:10और जन्म लेने के लिए अभी फिर से नहीं, फिर बंद हो गया था सब मसला
- 1:21:18जीवन मरण का चक्र समाप्त हो गया था।
- 1:21:21जब जान दिया जीवन दुख है फिर जन्म लेंगे ही क्यों?
- 1:21:28लेकिन? चूके नहीं, मैं कहता हूँ करुणा के
- 1:21:32कारण मेरे समझ में यही बात आती क्योंकि बार बार वो दृश्य मेरे
- 1:21:37सामने घूमता जब उस बिंदु पे था में जिसे बुद्ध का बिंदु कहा जाता
- 1:21:46उसके बिल्कुल पार एक ट्रांसपेरेंट।
- 1:21:49पर्दा लगा और उस ट्रांसपेरेंट पर्दे के पीछे परमात्मा साफ से
- 1:21:55झांक रहा है। उसकी मद्द और मुस्कान स्पष्ट देख
- 1:21:58रही। है।
- 1:22:00ये कैसे हो सकता है कि बुध वहाँ पहुंचे, भटपुल पहुंचे और चूक गए
- 1:22:05हों इस मन्दर मुस्कान से? एक और भी बात बताता हूँ उस मधुर
- 1:22:12मुस्कान से चूकना मुश्किल तो बहुत।
- 1:22:14है। प्रत्येक व्यक्ति उस खुमार में
- 1:22:18उतरना चाहेगा। इसे एक बड़े दान भी कहूंगा मैं।
- 1:22:26संसार का दुख नष्ट करने के लिए बुद्ध ने बुद्ध ने उस आनंद का
- 1:22:36ठोकरार कर दिया हो तो कोई बड़ी बात है आत्मा को पाने के लिए।
- 1:22:44राजगद्दी छोड़ने वाले त्याग का संस्कार इनके भीतर है।
- 1:22:51बरापुरा दरबार छोड़ के आ जाते हैं हीरे जवाहरात हैं मणि मोती माणिक
- 1:22:59हैं, पिता है। पुत्र है, स्त्री है, जनता है,
- 1:23:07राजा है, सब है लेकिन एक चीज़ नहीं है वो संस्कार छोड़ने का
- 1:23:15संस्कार भरे पूरे होते हुए भी छोड़ने का संस्कार बुद्ध में है।
- 1:23:20किसी ना किसी तट पे ये भी रहा होगा जब मैं डीप विश्लेषण कर रहा
- 1:23:25था गहरे तलो में जाके तो मुझे एक ये कारण भी मिला हो सकता है उतने
- 1:23:35तुम विभक्त न रहे। तुम खंड खंड ना रहे तुम टुकड़े
- 1:23:42टुकड़े ना रहे तुम जगतशरा हो गए तुम अद्वैत में आ गए, तुम एक हो
- 1:23:48गया यही है भक्त की चरम प्रकाशठा इसे ही भक्त।
- 1:23:58जो भी भक्त न हो इसको जोड़ती है। प्रेम रूपी अध ऐसे गोंद जैसे जैसे
- 1:24:07वेतर उतरोगे वैसे वैसे ये गोंद आपको जोड़तें हैं प्रंत में तुम
- 1:24:14उस स्थान पर पहुँच। जाओगे?
- 1:24:17जहाँ सभी बैठे हैं, कृष्ण हैं, कबीर हैं, नानक सब हैं, इसलिए
- 1:24:26बाबा जब उस स्थान में तीर्थ में स्नान करके बाहर आते हैं तो कहते
- 1:24:32हैं। एक अंक वह एक है।
- 1:24:37ऋषि जब उस तीर्थ में जाता है तो वह कहता है अहम परमास मंसूर कहता
- 1:24:45है अनस आपका ऑपरेशन कहते हैं, तत्वम अशीस कहते हैं, भाषाई अलग
- 1:24:55है। केवल में पहुंचते हैं जहाँ एक रह
- 1:25:03जाता है। दूसरा कोई रहता नहीं।
- 1:25:05भेद रहे का अवस्था केवल की अवस्था कह देती है, लेकिन निर्वाण शब्द
- 1:25:11थोड़ा सा अलग से बैठता है। निर्वाण का मतलब निवृत्त जो
- 1:25:17मान्यताएँ थी उससे निवृत्त। अभी मान्यताओं को निवृत्त किया
- 1:25:22है। मैं ये नहीं, मैं शरीर नहीं, मैं
- 1:25:24भावना ही नहीं मैं विचार रस तक नहीं पहुंचे, इसलिए बुद्ध ने अगर
- 1:25:31निर्वाण शब्द दिया तो कुछ गलती भी नहीं हुई।
- 1:25:36निर्वाण से आगे महानिर्वाण भी शबद दे दिया उसने कवल से पार शब्द कोई
- 1:25:41नहीं, मोक्ष से पार कोई शब्द नहीं।
- 1:26:04कबीर के शब्दों में जो उस परम रहस्य को जान गया वह हसना और जो
- 1:26:16उस परम रहस्य को जाने बिना मुड़ गया।
- 1:26:20चाहे आत्म तत्व को देख के मुड गया हो।
- 1:26:25कबीर की भाषाओं से मूर्ख कहते हैं सभ्य से आने एक मत मूर्ख अपनों
- 1:26:34अपने। कोई न जाए।
- 1:26:40कुंज कलिन में तुझे बिन कलियाँ चुनने को तुझे बिन कलियाँ चुनने
- 1:26:52को कोई न जाए कुंज कलिन में। तुझे बिन कलियाँ चुनने को तुझे
- 1:27:04बिन कलियाँ चुनने को तरस रहे हैं। तरस रहे हैं यमुना के तट मुरली की
- 1:27:27धुन सुनने को, मुरली की धुन सुनने को।
- 1:27:36अब तो दरिस दिखा जा नटखट, अब तो दरिस दिखा जा नटखट कौन विदा में
- 1:27:51डाला रे। बड़ी के भाई नंदलाल, तेरी राह के
- 1:28:04ब्रजवाला गाल बाल एक एक से पूछे। कहाँ है मुरली बाला रे, बड़ी देर
- 1:28:20भाई नंदलाला, तेरी राह के ब्रजवा। धन्यवाद।