Latest / Baba ji Vijay Vats / 13/2/26 - आत्म-साक्षात्कार का रहस्य: शरीर से आत्मा की ओर!! कुंती ने कृष्ण से दुख क्यों मांगा?
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- 0:07जयप्रकाश बाबा जी प्रणब लोग सुसाइड क्यों कर लेते हैं?
- 0:34इसको पूरी तरह से समझाने का कष्ट करें।
- 0:45मैं जोधपुर से हूँ। साध्वी प्रेम बाईसाह की अचानक
- 0:53मृत्यु की गुत्थी सॉल्व नहीं हो पाई।
- 1:00क्या आप उसकी आत्मा को भुला के पूछ सकते हैं?
- 1:11प्रश्न बहुत गहरा है। पुत्र इसे लफ्ज़ व लफ्ज़ अगर तुम
- 1:21सही समझ पाए। तो तुम बिल्कुल गहरे जड़ में चले
- 1:30जाओगे कि व्यक्ति आत्महत्या करता क्यों है प्रेमबाईसा की अपने पास
- 1:41कही। कि क्या आप उसको बुला के पूछ सकते
- 1:48हैं? उसकी आत्मा को और आत्मा का भी झूठ
- 1:52नहीं बोलते क्योंकि आत्मा को कोई भय नहीं होता।
- 2:01वह शरीर जिसकी इज्जत जब बेइज्जती होनी थी, वह शरीर अब नहीं रहा।
- 2:18वैसे मुझे भी ये खबर कल ही पता चला है।
- 2:29इसलिए मैंने इसके पहलुओं को खंगालने की शिक्षा नहीं की।
- 2:36लेकिन अगर तुम कहते हो पुत्र जैसे वह लड़की नौजवान 25 वर्ष के थे,
- 2:50मुझे पता भी नहीं। मैंने उसका प्रवचन और भजन गायन
- 2:59कभी नहीं सुना या कभी मेरी निगाह में वह आई है जया किशोरी को तो
- 3:08मैं एक दो बार सुना। प्रेम को मैंने नहीं सुना हाँ,
- 3:16मैं पूछ सकता हूँ मेरा शायद पूछ सकता हूँ, लेकिन अपनी शक्ति को
- 3:24व्यर्थ नहीं करना चाहता। मुझे किसी भी चीज़ में कोई
- 3:31इंट्रेस्ट नहीं है, मैं सिथर हूँ और सिथरता में ही रहता हूँ अकम्प
- 3:40हूँ और आनंद में ही रहता हूँ कोई जिज्ञासा।
- 3:49या कोई कामना, कोई लहर की तरह मेरे मन में उससे अगर तुम्हारी
- 3:59सभी साइंटिफिक कन्क्लूश़न्स। किसी निष्कर्ष पर न पहुंचे तो मैं
- 4:17ये काम कर सकता हूँ, लेकिन किसी प्रकार की आपको पहले।
- 4:30सभी प्रकार के पहलुओं से इसे खंगाल लेना चाहिए।
- 4:34ये आपका काम है? अगर आप बिलकुल नाकाम रहे तो फिर
- 4:47मैं उसकी आत्मा को बुला के पूछ लूँगा।
- 4:49क्या हुआ था वो कहानी तो खोल ली जाएगी।
- 4:59लेकिन ऐसे तो रोज़ बहुत कुछ होता है संसार में उन सभी के बारे में
- 5:14मैं किसी प्रकार का कोई इंटरेस्ट नहीं दिलचस्पी नहीं रखता।
- 5:27व्यक्ति आत्महत्या क्यों करता है? मूल प्रश्न ब्याज है किन्हीं
- 5:38अभागे क्षणों में किन्हीं थोपनाओं के कारण किन्हीं मान्यताओं के
- 5:46कारण। हमने कुछ गलत मान लिया है, वो गलत
- 5:59क्या है? मैं रोज़ बोलता हूँ और मेरा अंतिम
- 6:04प्रयास यही है। और यही होना भी चाहिए और यही होगा
- 6:12भी कि कैसे आपकी वो धारणा टूट जाये।
- 6:25आपका विश्वास, आपकी मान्यता इतनी गहरी जड़ों तक चली गई।
- 6:33कि आप पक्का पक्का हृदय के अंतःस्थल से मानने लगे कि मैं
- 6:37शरीर हूँ, मैं भावनाओं हूँ, मैं यही सभी प्रकार के उपद्रवों का
- 6:46कारण बनते हैं। कोई संत पूर्व आत्म अवलोकन के बाद
- 7:07क्यों नहीं इन जंजालों में पड़ता? क्योंकि वह जानता है सत्याग्रह
- 7:15मैं प्रेमवैसा की बात कर रहा हूँ थोड़ा सा इशारा उद्र्व भी ले लेना
- 7:26थोड़ा सा इशारा मैं आपके प्रश्न की तरफ भी वज्जो दे रहा हूँ।
- 7:38कुछ मान्यताएँ हमने स्वयं ही मान ली है और कुछ मान्यताएँ हमें
- 7:48पूर्व के हमारे कर्मों के कारण मिली हैं, जिन्हें हम संस्कार
- 7:57कहते थे। प्रारब तो कह देते हैं, एक छोटा
- 8:06सा प्रश्न बीच में ले लेते हैं। ओसो कहते हैं कि बहुत संभावनाओं
- 8:10है कि इस जन्म में जो साधु है वो अगले जन्म में असाधु हो जाए।
- 8:20और इस जन्म में जो असाधु है वो अगले जन्म में साधु हो जाए।
- 8:28काफी हद तक ये बात ठीक है लेकिन पूर्व जन।
- 8:35अगर इस जन्म में साधु है और वो साधुता से तंग आ गया है, तो फिर
- 8:46इसी जन्म में असाधु बन जाएगा, वो अगले जन्म की आवश्यकता नहीं।
- 8:53और अगर इस जन्म में असाधु है पापी है और अपनी असाधुता से तंग आ गया
- 9:03है, तो इसी जन्म में वह साधु हो जाएगा अगले जन्म की आवश्यकता
- 9:10नहीं। लेकिन यह कोमन सिद्धांत में कोमन
- 9:19सिद्धांत तो यह के संस्कार बनते हैं।
- 9:29हमने जो सोचा कई जन्मों में पिछले जन्मों में।
- 9:34हम मछली थे, हम सूअर थे, हम गधे थे, घोड़े थे, आदमी थे, उड़ती हुई
- 9:43चिड़िया थी, हंस थे, मोर थे, हमने अपने शरीर के साथ तादाद में रखा।
- 9:54और ये संस्कार गहरे होते चले गए। 1 दिन ये संस्कार यानी मान्यता
- 10:04है। सत्य में तब्दील हो गई और हम
- 10:10मानने लग गए कि हम शरीर। यह है सारी कहानी मान्यताओं की
- 10:20लेकिन ये झूठी है भारत झूठ को अगर ज्यादा मान्यता में जाए इन शब्दों
- 10:31को गौर से समझना। हम अनाधिक काल से स्वयं को शरीर
- 10:37मानते हैं, पेड़ थे, पौधे थे, पशु थे, पंछी थे, अमीबा थे,
- 10:45यूनीसेल्युलर मल्टीसेल्वर दोपाए थे, चौपाय थे।
- 10:53हमने सदा से ही माना कि मैं शरीर और यह हमारे भीतर अचेतन के भीतर
- 11:03यह मान्यता और भावना इकट्ठी होती गई कि मैं शरीर।
- 11:11और यह मान्यता देखिए। एक एक शब्द को गहराई से सुनिए,
- 11:16बड़े काम की चीज़ है यह पहले चेतन में थी, चेतन में धीरे धीरे नीचे
- 11:24उतरी, अब चेतन में पहुंची और फिर अचेतन में पहुँच।
- 11:30जब चीजें ज्यादा गहरी हो जाती हैं तो अचेतन में पहुँच जाती हैं।
- 11:36इसलिए मैंने आपसे कहा नाम जब मत करना क्योंकि नाम जब आप चेतन से
- 11:42शुरू करोगे गहरा होता होता। वह अब चेतन तक पहुंचेगा।
- 11:48सब कॉन्शस तक फिर और गहरा होता होता वो अचेतन में पहुँच जाएगा।
- 11:55फिर आप माननीय लोगों को कि राम ही परमात्मा का नाम है।
- 12:04और यही 1 दिन आपकी व्याधि का कारण बनेगा।
- 12:09मुसलमान कहेगा अल्लाह उसका नाम और यही उसकी व्याधि का कारण बनेगा,
- 12:20ईसाई कहेगा गौर उसका नाम? यही आपकी व्याधी का कारण बनेगा।
- 12:27सिख कहेगा उसका नाम है वह गुरु यही आपकी व्याधी का कारण बनेगा।
- 12:37क्योंकि चेतन में आप झपते चले गए, रिपीट करते गए, रिपीट करते गए,
- 12:43रिपीट करते करते वह चीज़ चेतन से अवचेतन की तरफ खिसकनी शुरू हो
- 12:50जाती है। मैं धीरे धीरे बोलता हूँ, आप हृदय
- 12:53में उतारते हैं। चेतन से उतर के सबकॉन्षियस अब
- 13:02चेतन में उतर जाएंगे, लेकिन फिर भी आप जबते रहे तो वह और गहरे
- 13:12खिसके ही। चीजें जैसे जैसे भारी होती हैं वह
- 13:18अब चेतन के और गहरे तलों में चली जाती हैं।
- 13:22सेगमेंट फ्राइड यहीं तक आ सका। इसके आगे सेगमेंट फ्राइड पहुंचाने
- 13:30तो उसने अचेतन के दो भाग कर दिए। सबकॉन्शियस एंड अनकॉन्शियस
- 13:38सबकॉन्शियस को उसने अवचेतन कहा और अचेतन को उसने अनकॉन्शियस कहा।
- 13:46लेकिन हमारे विषयों ने दोनों को ही अचेतन कहा।
- 13:51थोड़ा कम गहरा था। वह अभिचेतन जो ज्यादा गहरा था वो
- 13:57अचेतन और हमारे मन का स्वभाव है कि वह शब्दों को वस्तुओं से जोड़
- 14:07लेता है। शब्दों को वस्तुओं से जोड़ लेता
- 14:15है। जैसे मैं कहूं आम है तो ये शब्द
- 14:21लेकिन फौरन तुम्हारी ज़हन में आम की तस्वीर आ जाए।
- 14:27मैं कहूं मुर्गा है तो ये शब्द। लेकिन फौरन आपके मन में मुर्गे की
- 14:35तस्वीर आ जाएगी। मन की यह प्रणाली है नाम के साथ
- 14:49वह घटनाओं को। शक्तियां को जोड़ लेता है।
- 14:54मुसलमान ने जोड़ा अल्लाह को परमात्मा के साथ परमात्मा का नाम
- 15:03अल्लाह हो गया, हिंदू ने जोड़ा राम का।
- 15:12परमात्मा के साथ तो राम ही परमात्मा का नाम हो गया।
- 15:21सिख ने जोड़ा वह गुरु परमात्मा का नाम तो वह गुरु परमात्मा का नाम
- 15:28हो गया। ये चीजें पहले नहीं थी।
- 15:33जब राम नहीं हुए थे तब परमात्मा का नाम राम नहीं हुआ करता था।
- 15:42जब राधा नहीं हुई थी तो परमात्मा का नाम राधा नहीं हुआ करता था।
- 15:51लेकिन आज है क्यों? चारों तरफ तुम्हें गूंज सुनाई
- 15:55पड़ती है और तुम्हारा मन विश्वास कर लेता है।
- 15:59हाँ ठीक है यह धर्म चेतना इसका नाम राधा ही है।
- 16:08लोग तो अपने गुर्दों का नाम राधा और कृष्ण रख देते हैं, लेकिन नाम
- 16:15रख लेने से उनकी विकृति तो नहीं मरती, वो जीवंत तो नहीं होती?
- 16:20हालांकि राधा का मतलब तो चेतना होता है।
- 16:26मरी हुई किडनी का नाम राजा रख दोगे या कृष्ण रख दोगे तो राधा
- 16:32वाली किडनी में चेतना नहीं आएगी और कृष्ण वाली किडनी में आनंद
- 16:38नहीं आएगा हमारा मन शब्दों को। सत्य के साथ जोड़ लेता है।
- 16:49मैं धीरे धीरे तो बोलता हूँ कि आपके हृदय के अंत में उतर जाये,
- 16:54सत्य समझ भी आएगा तुम्हें अब तुम्हें एक बहुत मजेदार बात बताता
- 17:02हूँ। ये कहीं ग्रंथों में नहीं
- 17:04मिलेंगे। जो इनवेंटर होता है, वह अपने भीतर
- 17:09जा के सत्य को खोजता है। शास्त्रों में सत्य मिलता भी
- 17:14नहीं। कुंती ने भगवान कृष्ण से अपनी
- 17:20झोली फैला के दुख क्यों मांगे? दुख को कोई मांगने की चीज़ है?
- 17:25दुःख तो स्वेता ही बहुत आ जाती है।
- 17:30क्यों मांगा दुःख? यह एक करें हास्य और यह भी आज एक
- 17:38प्रश्न है एक किसका है कुंवर कुंवर सिंह का?
- 17:50क्यों? कुंती ने कृष्ण भगवान से अपनी
- 17:57झोली बसार के कह हे प्रभु मेरी झोली को दुखों से परथ कारण क्या
- 18:05है? ध्यान से सुनें जब आपको गहरा शौक
- 18:17लगेगा, कोई इतना गहन घाण पड़ेगा आपके सिर के ऊपर एक दम से जो आपने
- 18:27कभी सोचा था? तो आपकी बुद्धि के साथ तादाद में
- 18:34खो जाएगा एक फ्यूज ही जो था बुद्धि के साथ तुम्हारा तादाद में
- 18:42फ्यूज जोड़ाव लगाव। कॉम्बिनेशन आइडेंटिफिकेशन।
- 18:50वो टूट जाए और जब फूसे टूट जाता है बुद्धि के साथ तो तुम अपनी
- 18:57चेतना में उतर जाता है। ये है इसकी साइंटिफिक प्रक्रिया।
- 19:08जैसे हम अपने घर की बिजली को मेन स्विच ऑफ कर दे, सभी यंत्र रुक
- 19:17जाएंगे, ना पंखा चलेगा, ना पानी का पंप चलेगा।
- 19:23ना एसी चलेगा कुछ नहीं चलेगा ना बल्ब जगेगा सब ठहर जाएगा क्या हुआ
- 19:34हमने आइडेंटिफिकेशन तोड़ दिया। हमने फूसे तोड़ दिया।
- 19:41तुम्हारा फ्यूज है कि मैं शरीर हूँ, मन भावना, मैं हूँ और कुछ
- 19:53गलत है तुम्हारे लिए कुछ ठीक है तुम्हारे लिए ये तुम्हारी मान्यता
- 19:57है, तुम कहते हो ये बेकार है। ये सदाचार है यह व्यहविचार्य इस
- 20:09तरफ तुम्हारी मान्यता कुंती को पांडु से बड़ा फ्रेम था।
- 20:20खत्म मादरी हो गई, लेकिन कुंती को क्योंकि पहले आयी थी कुंती पांडु
- 20:30से बहुत प्रेम करती थी। अचानक पांडु ने कहा।
- 20:38कि मैं इस गद्दी को छोड़ता हूँ। वह रात गया क्या उसने गद्दी छोड़
- 20:46दिया हस्तनापुर की और उसके ऊपर अंधे धृतराष्ट्र बैठ गए।
- 20:53कुंती। पांडु से बड़ा प्रेम करते थे कारण
- 21:00कारण ये कि उसने अपने पति को बताया, पांडु को कुंती कहने लगी।
- 21:15कहे प्रियथम आज से पहले भी मेरा संबंध एक पुरुष से रखा है और उससे
- 21:24एक पुत्र उत्पन्न हुआ और वह मैंने लकड़ी के संदूक में डालकर।
- 21:34दरिया में बहा दिया था। यह कुंती के मन पर बोझ था।
- 21:49आज प्रत्येक व्यक्ति शहदत है कि मेरी स्त्री पर पुरुष के साथ न
- 22:02दिख जाए। जबकि वो खुद की ओर नहीं देखता कि
- 22:06तुम कितने सदाचारी वह उम्मीद करता है कि मेरी पत्नी अनछुई हो उन
- 22:20दिनों में। ऐसी रिवायत थी तो लेकिन बहुत कम
- 22:25थी। कुंती ने पांडु से कहा, हे प्रिय
- 22:40मेरा तुमसे पहले भी एक व्यक्ति से संबंध रहा है।
- 22:44उसका नाम सूर्य था। उससे मुझे एक संतान नोट पद थी जो
- 22:54कि बेटा था वो मैंने नहर में बहा दिया था, पानी में बहा दिया था,
- 23:00दरिया में बहा दिया था। मैं कवारी नहीं हूँ।
- 23:09पांडु मुस्कुराए, पांडु कहने लगे, हे देवी तुम्हारे प्रति जो मेरे
- 23:22मन में श्रद्धा था, आज ही जब हो गई।
- 23:30इससे पहले सिर्फ तुम मेरे लिए स्त्री थी, भोग्य वस्तु, लेकिन आज
- 23:36तुम मेरे लिए दिव्य होगे। कुंती बोली क्यों प्रिया?
- 23:48पांडु कहने लगे हे प्रियदर्शिनी जो स्त्री है, मन में मैल नहीं
- 24:03रखती। वह शरीर के कुंवारेपन से कहीं
- 24:06ज्यादा कुंवारी है। आइए तो मैं इतिहास के गर्भ में ले
- 24:20चलो। पांडु जब राजा थे।
- 24:281 दिन शिकार करने के लिए वन में गए वन में उन्होंने देखा एक हिरण
- 24:37और हिरण सहवास कर रहे थे, मैथम कर रहे थे इस अवस्था में।
- 24:49पांडु ने तीर जला दिया और वह मर गए।
- 24:58वास्तव में वो हिरण हिरनी नहीं थे, वो ऋषि कंडम थे।
- 25:06कहानी है। इसका अर्थ थोड़ा गहरा है, खोलूंगा
- 25:14तो बहुत वक्त लगेगा। अभी आप कहानी को कहानी की तरह
- 25:17लें। ऋषि किंडम मैथन कर रहे थे अपनी
- 25:23स्त्री के साथ। पांडु के तीर से मारे गए ऋषि
- 25:32किंडम ने शराब पीया पांडु को जीस तरह सहवास करते हुए मेरी मृत्यु
- 25:45हुई है। इसी तरह तुम भी सहबाश करते हो,
- 25:50तुम्हारी मृत्यु हो जाये, तुम स्त्री को स्पर्श करो और क्षण
- 25:59तुम्हारी मृत्यु हो जाये। पांडु ढेर गए, यह उस काल वेला की
- 26:11बात है। उस ऋषि की बात है जो अपने अंतःस
- 26:17के उस तल पर चला गया था जिसमें आपसे जंक्चर पैंट से थोड़ा नीचे।
- 26:25यहाँ वाणी सत्य हो जाती है। जो कहोगे वह हो जाएगा तो पांडु डर
- 26:37गए कि किंडम ऋषि ने मुझे श्राप दे दिया है, लेकिन उनकी दो पत्नियां
- 26:44थीं। एक तो कुंती एक मादरी 1 दिन वर्ण
- 26:58में पांडु ने कहा कि अब मर तो जाना ही है तो आखिरी वक्त में।
- 27:09थोड़ा ईश्वर को सिमंड कर लेते हैं।
- 27:13वणो में निकल गए वणो में बैठे थे तो कुंती और माधुरी कहने लगी कि
- 27:20हम भी संग चलेंगे, हम यहाँ क्या करेंगे?
- 27:26पांडु ने कहा ठीक? ये तीनों चले गए और 1 दिन माधुरी
- 27:37स्नान करते वक्त पांडु अपने काम वासना को रोक न सके और उन्होंने।
- 27:48कामवासना के वशीभूत होकर माधुरी को आलिंगन में ले लिया।
- 27:56प्रतिक्षण शराब से ही हुआ और पांडु की मृत्यु हो गयी।
- 28:05पांडु की मृत्यु ऐसे हुई। इस घटना से कुंती को एक शॉक लगा।
- 28:18कुंती को शॉक लगा क्योंकि उन्हें बहुत प्रेम था गांडू के साथ।
- 28:26अगाध प्रेम कि जो व्यक्ति मुझे मैं कवारी नहीं हूँ, ये कहने के
- 28:38बावजूद भी अब बनाता है और राजा है उसके मन में पांडु के प्रति अगाध
- 28:46श्रद्धा। और पांडु की मौत की खबर मिलते ही
- 28:52उसे एक शौक लगा। वह दौड़ कर पांडु के शव के पास गई
- 29:02मृत पांडु को देख कर। उसे शॉक लगा।
- 29:09मेरी उस बात को याद कीजिए जब बुद्धि को शॉक लगता है बड़ा भारी
- 29:15अन अपेक्षित जो सोचा ही नहीं था। तो बुद्धि से संपर्क टूट जाता है,
- 29:32डिस्कनेक्ट हो जाता है फ्यूज और फ्यूज के टूटते ही तुम्हारी
- 29:40बुद्धि से लगाव टूट जाता है। तुम अपने स्वय में पहुँच जाते हो।
- 29:48अब समझिये बात को यह शौक लगते ही पांडु से प्रेम था, बहुत ज्यादा
- 29:55पांडु का शव देखते ही उसे शौक लगा फूसे टूट गया और चेतना?
- 30:04तब तक ही मैं मानती है शरीर को जब तक यह फूसे नहीं टूटता बस तुम
- 30:11जगती नहीं मर मर गए शरीर आशा तृष्णा न मारी कह गए भक्त गंभीर
- 30:23शरीर तो बहुत बड़ा। मरे हैं तुम्हारे लेकिन ये फ्यूज
- 30:26नहीं टूटा। संबंध नहीं टूटा और तत्क क्षण मृत
- 30:35देह को देखकर पांडव के मृत देह को देखकर।
- 30:43उसका आइडेंटिफिकेशन टूट गया और वह स्वय के अंदर चली गई।
- 30:49उस क्षण वह जान गई कि मैं कौन? वह जान गई कि मैं कौन?
- 30:57ये शब्द बड़े कीमती हैं। इन शब्दों को धरोहर के रूप में
- 31:02परोलेना फिर कोई आए ना आए तुम्हें समझा पाए ना समझा पाए मैं ये
- 31:12कंटेंट इसीलिए गिरा रहा हूँ यूट्यूब पर कि मुझे लगता है
- 31:17अंधकार है भविष्य में। इसलिए किसी न किसी तरह कहीं न
- 31:24कहीं पर मेरा ये कंटेंट बचा है। क्यों मैं जानता हूँ आज की घड़ी?
- 31:37लोभ के कारण पैसे के मोह के कारण परमात्मा की कथाएँ कहने में लगे
- 31:42हुए हैं। प्रेम भाई साहब कोई असाधारण लड़की
- 31:49नहीं थी। शी वास नॉट एनलाइटन?
- 31:55उसे स्वय का ज्ञान नहीं हुआ था। सिर्फ कहानियों कहना जानती थी,
- 31:58मधुर आभा थी, गायन करना जानती थी, वह कबुलरी अच्छी थी।
- 32:09कुंती उस क्षण स्वय में आदि, लेकिन स्वय में आने के बाद भी कोई
- 32:16चीज़ थी जो उसे गहरे हुए थे। सब हो गया, संस्कार हो गया।
- 32:26अंतिम फरियाद हो गई, कुंती स्वय में लीन रहने लगी।
- 32:37लेकिन फिर भी कोई तड़पन बाकी थी वह तड़पन मैं रोज़ बोला करता हूँ
- 32:45बुद्ध से कृष्ण होने की यात्रा आत्मा को तो आपने जान लिया तुम
- 32:52कौन हो यह तो जान लिया वह कौन है यह तुमने नहीं जाना।
- 32:58इसलिए कृष्ण ने दो रूप दिखाए अर्जुन को स्वधर्मो ने धर्म श्रेय
- 33:05पर धर्मो भया वह स्वे दिखाया। सबसे पहले अर्जुन समझ गया कि न
- 33:16तो। द्रोणाचार्य भरेंगे न भीष्म पिता
- 33:19न भरेंगे, ना ही मैं मरूँगा अर्जुन उठाने ही वाला था धनुष को
- 33:30कृष्ण कैचर को अब तुम स्थल पर पहुँच ही गए हो।
- 33:38तो अब तुम मेरा दूसरा तत्व भी देख लो तुमने जाना कि तुम कौन हो, अब
- 33:42तुम जानो कि मैं कौन हूँ? कृष्ण ने अपना विराट दिखाया, वह
- 33:53विराट देख कर कांपने लग गया। इस कहानी को हम नहीं छोड़ते हैं।
- 34:04कुंती के भीतर ये आग थी कि क्या है, जो मुझे कचोटता है, अब भी वो
- 34:12कचोटता था बुद्ध से। कृष्ण होने तक क्या दर्द, बिरहा
- 34:19जो सताता था मीरा को वो ही सताने लगा कुंती को जो मैं
- 35:04न करियो, जो मैं को सेतु।
- 35:44समझाया मैं कौन हूँ? जे समझाया हू एमआइ समझाया।
- 35:50हूँ। इस ए ही ये समझ नहीं आया और कुंती
- 35:57इसी फिराक में थी। मुझे समझा जाए कि इससे आगे कौन सा
- 36:03दर्द है जो मुझे खेंचता है। बिरहा का संता पांडु का मृत चुका
- 36:09था। स्वयं के जानने के बाद, के पांडु
- 36:14मरा नहीं, पांडु का ढाँचा मरा है, शरीर मरा है, पांडु जीवत है,
- 36:24लेकिन फिर भी एक दर्द का होना एक खिंचाव का होना।
- 36:28किसी चीज़ का चुंब की तरह खींचते रहना वह क्या है जीस जीस भाग दशा
- 36:36में मीरा थी उसी भाग दशा में कुंती आँखें जब भगवान कृष्ण ने
- 36:45कहा माथे। मैं चला तो आज्ञा दीजिए कुंती ने
- 36:56कहा कुतरा आज्ञा है माते को सुमागो कुंती ये फल ढूंढ़ते थे।
- 37:07कुंती को पता था, कुंती ने झोली फैलाई और वह जानती थी कि वह
- 37:15मिलेगा दुख की अनंत पीड़ा से जैसे एक पीड़ा पहले मेरी जिससे मैं
- 37:24प्रेम करती थी, पांडु उसका निधन हो गया।
- 37:27और शॉक लगा और फूसे टूट गया। मेरी चेतना स्वय पे उड़ गई।
- 37:34अब ऐसा क्या है जो अटकाए खड़ा है और मैं उस स्तर पर नहीं पहुंचती
- 37:39जो मुझे खींच रहा है? कुंती ने झोली फैलाई, बोली हे
- 37:53माधव मेरी झोली में दुखी दुख डाल दो और इतना विराट दुख डाल दो
- 38:02जिससे मैं सहना पाऊँ। कृष्ण मुस्कुराए क्योंकि कृष्ण के
- 38:16इसने वो मांग लिया मांग के साथ तुम्हारा।
- 38:27मांग के साथ तुम्हारा मैंने मांग या संसा मांग के साथ तुम्हारा।
- 38:45इन्हें संसार की अंतरिम चीज़ मांग ले।
- 38:50बस इससे ज्यादा कुछ मांगा भी नहीं जा सकता और इससे ज्यादा कुछ दिया
- 38:54भी नहीं जा सकता। यह अंतिम छोर है तो माँ कुंती ने
- 39:03वो मांग लिया। जिसके आगे मांगने को कुछ बचा है।
- 39:08बुध के आगे मांगने को कुछ बचता है।
- 39:11कृष्ण के आगे मांगने को कुछ नहीं बचता तो कृष्ण मुस्कुराए एवं
- 39:23वस्तुमाते। और आपको शायद ना पता हो कुंती
- 39:31वर्ण गमन के वक्त जब आखिर में विदुर, धृतराष्ट्र और कुंती
- 39:36गंधारी यह हिमालय में निकल गए थे। युद्ध समाप्त होने के बाद तो
- 39:42कुंती? उस तत्व में समा गई थी जैसे
- 39:47कृष्ण। मैं कहते अहम तम सर्वे भव मोक्ष
- 39:52श्यामी माँ सूचक ये कहानियाँ गहरी हैं, रहस्यत्मक हैं और उससे आगे
- 40:02भी रीलात्मक हैं। परमात्मा जनता है जीसको मैं इतना
- 40:12बुरे हद दुख दे रहा हूँ, क्या वह इसको अब्सर्व कर पाएगा?
- 40:20तो वही दुख देता है। कांच के ऊपर कभी सोनार भी हथौड़ी
- 40:28नहीं चलाया करता। जानता है इस हथौड़ी से भी चाहे
- 40:34चोट हल्की हो कांच तो टूट ही जाएगा।
- 40:41तो भगवान कृष्ण ने कहा अब मस्तुमाद्य जब टूटता है, संपर्क
- 40:50बुद्धि से बुद्धि ही तुम्हें जनारती है कि मैं मैं हूँ।
- 41:00ये मैं अहंकार के साथ संबंध स्थापित करा देता है।
- 41:04तुम्हारा बुद्धि ना हो तो तुम्हें रात को कहाँ पता चलता है?
- 41:07तो तुम शरीर बुद्धि से संबंध थोड़ी देर के लिए मूर्छित हो जाता
- 41:14है और तुम्हें कुछ नहीं पता चलता। पांच 7 घंटे तुम कहाँ थे, किस लोक
- 41:23में थे पता चलता है, किसी को नहीं पता चलता।
- 41:29एक योगी ही जानता है कि मैं कहाँ था साधारण मानव जानता नहीं।
- 41:41कुंती ने इसलिए दुख मांगा। तुमने पूछा पुत्र कुंती ने दुख को
- 41:48मांगा, दुख भी कोई मांगने की चीज़ है?
- 41:51दुख ही तो मांगने की चीज़ है लेकिन याद रखना तुम्हारे मांगने
- 41:57से दुख मिले तो वह तो प्री प्लांट हो गया।
- 42:02फिर वह इतना गहरा आगा तो तुम पर नहीं करेगा सदन सहसा बिन मांगे
- 42:12तुम्हारे ऊपर ऐसा प्रहार हो जाए जो वजर के सामान गिर पड़े।
- 42:18और तुमने अपेक्षा भी ना की हो, वह तुम्हें आमूल चूल परिवर्तित कर
- 42:25देता है, वह तुम्हें माटी से भगवान बना देता है।
- 42:42अगर तुम आयोजन करोगे बड़े दुखों का, वो तुम्हें नहीं बदल पाएंगे।
- 42:51इसलिए संतों ने कहा कि तुम मांगो कुछ मत सहसा जो होता है उसको
- 42:58स्वीकार कर लो अंतर्मन से। और कौन जाने परमात्मा किसी वक्त
- 43:05तुम पर खुश हो जाए और वो तुम्हारे ऊपर ऐसा वजर गिरा दे उस वक्त?
- 43:18उस तुम उसे स्वीकार कर लो वजर गिरते ही तुम्हारी स्वीकृति के
- 43:26बिलकुल उसी क्षण तुम पाओगे तुम खुद खुदा।
- 43:33हो? आदम को खुदा मत कहो आदम खुदा है
- 43:46लेकिन खुदा के नूर से आदम जुदा है।
- 43:49यहाँ आकर पता चलता है कि खुद ही खुदा हूँ अनल हक में ही परमाम।
- 44:01एको ब्रह्म द्वितीय और नास्तिक यहाँ आकर पता चलता है और ये होता
- 44:05है अनुभव से एक बात समझ लेना। पुत्र कहानियों में मत उलझना।
- 44:16कहानियों को छोड़ देना, अनुभव में उतरना और मेरे कारण अगर कोई
- 44:25व्यक्ति अनुभव में उतर जाए, उस रसीले अनुभव में उतर जाए जो आपको
- 44:32संसार का कोई पदार्थ नहीं दे सकता।
- 44:35जो संसार की कोई और घटना तुम्हें नहीं दे सकती तो मैं भी
- 44:40सौभाग्यशाली मानूंगा। अपने आप को जीस वक्त कोई परमात्मा
- 44:47होता है, तुम्हें नहीं मालूम फिजाएं बदल जाती हैं।
- 44:55हवाएं बदल जाती हैं, मुरझाए हुए फूल खिल जाते हैं, असमान नाचता
- 45:02है, अस्तित्व नाचता है यका यक तुम्हें ऐसा लगता है?
- 45:11ये अचानक माहौल कैसे बदल गया तुम्हें पता ही नहीं कोई एक
- 45:19ब्रम्हंड में कोई एक उस तल पर पहुंचा है।
- 45:23जस्त तल पर जाकर व्यक्ति परमात्मा हो जाता है।
- 45:29आज लंबी कतार लगी है। साधगियों की साधुओं की लेकिन
- 45:38ध्यान रखना इनको अनुभव नहीं हुआ। काश ये अपना कीमती वकत।
- 45:50जो पैसा कमाने के लिए कहानियों में व्यतीत कर रहे हैं, इनको
- 45:56सद्बुद्धि मिल जाए। नदरी मुख्य द्वार परमात्मा इन पर
- 46:01कृपा करते हैं और यह असली मार्ग पर निकल पड़े।
- 46:09अपने ही बेहतर उतरना बाहर मत भटके।
- 46:14काहे बनो को जन जाए। काहे सर्ब गया पी सदा अली पा सर्ब
- 46:43गया। पी।
- 46:45सदा अलेफा तोहे संग समा काय रे बन खोजन जाए?
- 47:06कहाँ है? आज प्रचारकों की भीड़ रहती है और
- 47:17प्रचार कर रहे हैं उस वृहद परमात्मा का जिसे प्रचार की कोई
- 47:22आवश्यकता नहीं। तुम्हें उसे खोजना चाहिए।
- 47:29उसका प्रचार नहीं करना चाहिए, वह तो पहले से ही इतना प्रसारित है
- 47:39कि उसका आदिमध्य और अंत तुम जान नहीं सकते।
- 47:44उसका कोई मेज़रमेंट नहीं है। तुम उसका प्रचार कर रहे हो, तुम
- 47:50उसका प्रचार कर रहे हो, वह कोई साधारण राजनीतिक इंसान नहीं है।
- 47:58असल मुद्दा क्या है? असल मुद्दा है।
- 48:03लोगों को बहकाना, मूर्ख बनाना शब्दों के जंजाल में उलझा लेना
- 48:12सारी दुनिया इन शब्दों के जंजाल में उलझी हुई है आनंद की घूँट
- 48:18किसी ने कभी पी। मैं क्यों बोलता हूँ सिर्फ इसलिए
- 48:29कि जीसको प्रचार और प्रसार की जरूरत नहीं है?
- 48:33उसका प्रचार और प्रसार न करो। ये साध्वी, वैसा जया, किशोरी या
- 48:40कितने लोग हैं मेकअप कर लेते हैं, कोई दाढ़ी काली पीली कर लेता है
- 48:49लोग तुम्हें पूजेंगे लेकिन याद रखना तुम्हारा।
- 48:57चेतना का प्रसार नहीं होगा, अहंकार का प्रसार होगा।
- 49:00तुम कहोगे लाखों लोग मुझे पूछते हैं वो भी तुम्हारी तरह बेवकूफ
- 49:07है, वो भी तुम्हारी तरह अज्ञानि है, वो भी तुम्हारी तरह मूड है?
- 49:13उन्होंने तुम्हें पूछना शुरू कर दिया।
- 49:16उन्होंने तुम्हें सम्मान दिया और तुमने समझ लिया कि हाँ मैं कोई
- 49:21ऐसा तत्व हूँ जो पूजने योग्य है। यही भ्रांति है।
- 49:33प्रत्येक। प्रचारक प्रसारक का अंत ऐसा ही
- 49:40होगा क्यों? क्योंकि उन्होंने उसको खोजा नहीं।
- 49:53जीसको प्रचार की कोई आवश्यकता नहीं जीसको प्रसार की कोई
- 49:59आवश्यकता नहीं, वो अपना एक्सपैंशन चाहता ही नहीं।
- 50:10तुमने किस से इजाजत ले के उसका प्रसार करना शुरू किया और ध्यान
- 50:17रखना अगर तुम्हें ये लालच है कि हम उसका नाम लेने से वह खुश हो
- 50:22जाएगा नहीं, वह खुश नहीं होता, वह नाराज भी नहीं होता।
- 50:32तुमको तुम्हारे कर्मों पर छोड़ देता है बस तुम्हारा वो समय
- 50:35व्यर्थ हो जाता है समय व्यर्थ होने के साथ साथ तुम्हारे में
- 50:41अहंकार बढ़ जाता है। मैंने एक अरब जाप कर दिया, मैंने
- 50:451,00,00,000 जाप कर दिया। बैंक बैलेंस हो गया तुम्हारा।
- 50:50और तुम बड़ी भद्दी नजर से देखते हो, लोगों को ये क्या है?
- 50:55ये धन कमा रहे हैं इनके पास धन है, मेरे पास परम धन है तुम्हें
- 51:04ये अमीर लोग तुझ लगते। लेकिन तुम्हें नहीं पता तुम्हारी
- 51:12आँखों पर ऐनक गलत झड़ गई है अंगार्थ धन तो तुम्हारे पास भी है
- 51:22जिसे तुम राम नाम का परम धन कहते हो, वो धन नहीं होता।
- 51:28वो जपना नहीं होता। वहाँ तो जाना होता है, वह तो रस
- 51:33पीने की चीज़ है, वह तो पीकर मुग्ध होने की चीज़ वह तो पीकर
- 51:41मदहोसी के आलम में खोने ही ऐसी चीज़ है।
- 51:45भला उसको याद करोगे कैसे कभी मुलाकात हुई जाने अनजाने में
- 51:50परमात्मा से तुम्हारी मुलाकात हुई जीसको तुम याद करोगे कैसा है उसका
- 51:55नैन नक्श बताओ कितना विस्तार है उसका आँखें काली हैं कि नीली हैं।
- 52:07तुम कुछ न बता सकोगे क्योंकि इससे पहले तुम्हारी मुलाकात उससे हुई
- 52:16तो क्या खाक सुम रहोगे उसको जीसको कभी देखा ही नहीं, मैं सदा ही कहा
- 52:23करता हूँ। तुम बताओ मैं किसका सुमरण करता
- 52:26हूँ तड़प भ्यम सेंगे बताओ बस तुम ऐसा ही सुमरण करते हो उसका सुमरण
- 52:36करते हो याद क्या खाक आएगा जीसको तुमने कभी देखा नहीं?
- 52:45जिससे पहले जान पहचान कभी हुई ही है, जिससे मुलाकात का दौर कभी चला
- 52:51ही नहीं। उसको याद तुम कर भी कैसे पाओगे और
- 52:57यह कोई बुद्धि की बात है ही नहीं या कोई नूरोंज में याद थोड़ी
- 53:01मेमोरी थोड़ी है। यह मेमोरी नहीं है, यह यादाश्त
- 53:10नहीं है, जिसे याद कर लोग ये भूल गए हों नहीं नहीं यहाँ तो उस दर
- 53:15पे जाना होता है जहाँ प्रेम बरसता है, जहाँ अमृत का रस बरसता है।
- 53:21उस तल पर जाना होता है और कहानियों से उदाहरणों से नामों से
- 53:26शब्दों से उस तल पर नहीं जाया जा सकता।
- 53:30ये तो बाधक है। अखरा नालों भखर जड़ा शब्दा तीर्थ
- 53:35है जो बियॉन्ड वर्ड्स है जो वहाँ जाना है।
- 53:46तो कुंती समझदार थी। कुंती ने आखिरी फॉर्मूला प्रयोग
- 53:51कर लिया क्योंकि वह एक फॉर्मूला पहले प्रयोग कर चुकी थी।
- 53:55बिना कुछ किए कुंती ने कुछ नहीं किया।
- 54:00सिर्फ अपने पति से लगाव था, वह लगाव टूटते ही वह अपने अंतः में
- 54:06गिर गई और अपने अंतः में जाकर उसे बड़ा परम स्वाद आया।
- 54:16जो उसने कभी अपने जीवन में चखा ही नहीं था, लेकिन फिर भी कोई चीज़
- 54:22उसके भीतर अभी भी दुख देती थी। बुद्ध को भी दुख रहता है।
- 54:30बुध का अंत से पुकारना रहता है इसलिए उसको फिर से जन्म लेना
- 54:35पड़ेगा। कृष्ण फिर से जन्म लेने की बात
- 54:37कभी सोंची। आप नहीं कृष्ण फिर से कभी जन्म
- 54:45नहीं लेंगे क्योंकि उनकी यात्रा पूरी हो गई।
- 54:47नानक फिर से जन्म नहीं लेंगे, कबीर फिर से जन्म नहीं लेंगे।
- 54:52महावीर फिर से जन्म नहीं लेंगे, ये तुम्हारी कहानियों कथई हैं जो
- 54:59उस समुद्र में चला गया, एकाकार हो गया बूंद सामान्य समुद्र में वह
- 55:04फिर कहाँ से आएगा उसको तो ढूंढने से भी तुम ढूंढ न पाओगे ढूँढते रह
- 55:10जाओगे। साध्वी प्रेम भाई साहब मैं उस
- 55:22बेचारी को जानता हूँ, मैंने शायद नाम भी पहली बार सुना और ध्यान
- 55:32रखो। उनके समाज में तेरहवीं होती है कि
- 55:36दसवीं होती है कि चौथा होता है। वो करने के बाद जब सब अपने अपने
- 55:43घर चले जाएंगे, अंतिम विदाई दे देंगे, फिर उसको याद आएगी।
- 55:49या तो सब छोड़ चले मुझे। फिर इसका मुँह टूटेगा।
- 55:57जो आशुतोष के साथ आज हो रहा है वो ही प्रेमबाईसा के साथ होगा।
- 56:03इतने दिन सभी के साथ होता है इसलिए जल्दी कर देना चाहिए।
- 56:10भूख जल्दी कर देना चाहिए। जैन धर्म मेरा समझौता होता है, यह
- 56:20तो आवश्यक भी है। 1 दिन आग लगाओगे, अगले दिन भक्ति
- 56:25हुई हड्डियाँ पाओगे। फिर 1 दिन चाहिए फिर उन अस्थि कलश
- 56:34को गंगा जी में बहा के आओगे कि जो भी स्थान है तुम्हारा तो तीन 4
- 56:44दिन लग जाते हैं, चौथे दिन तो तुम उसको विदा कर दोगे जाओ भाई।
- 56:49और विदा करके तुम घर पे बैठ जाओगे फिर उसकी आत्मा दे ही सोचेगी अरे
- 56:56ये तो भूल गए मेरे को, फिर उसका मुँह टूटता है फिर प्रकृति।
- 57:07जैसे ही मुँह टूट जाता है देहि का तो उसे नया वर्ब उपलब्ध करवा देती
- 57:14है। प्रकृति का ये विधान अब आशुतोष का
- 57:22क्या फॉर्मूला है? आशुतोष का फॉर्मूला ये है।
- 57:26कि तुम उसको भूलने ही नहीं देते? तुम हर वक्त डोल की छने घडकाती
- 57:32रहती हो, वो दुखी है। उसका मुँह टूटा नहीं शरीर से और
- 57:39उसके शरीर को न तुम जलाते हो, न तुम दफन करते हो सजा रखा है।
- 57:46और वो तुम्हारे भीतर से निकलती हुई भावनाओं को भी देखता है और
- 57:52तुम्हारे भीतर की भावना ये है कि गुरूजी कभी लूटेंगे, वो कभी नहीं
- 57:57लूटेंगे। मैंने पहले भी कहा जो घर गिर जाए।
- 58:05कभी वापस से बना करता है, अपने हाथ नहीं।
- 58:11जो उस घर में रहने वाला व्यक्ति है वो दूसरे घर में चला जाया करता
- 58:15है। उसके लिए दूसरा घर प्रकृति भी
- 58:19उपलब्ध नहीं कर पाती क्योंकि ना तुम उसका भ्रमितिक ने देते हो।
- 58:25ना उसका भ्रम स्वयं से मिटा है। वो एनलाइटन पर्सन नहीं, यही
- 58:32दिक्कत है और यही एक बहुत बड़ी रेट्रेस्ली इस संसार में पहली बार
- 58:38घटित हुई है मिस्र के पिरामिडो में।
- 58:43दफन कर दिया गया। ये जानकर लेपन करके कि इनके शरीर
- 58:48सुरक्षित रहें। ये कैसे थे?
- 58:52लेकिन ये मर गए, ये वो जानते थे। तुम तो ये मानते ही नहीं कि ये मर
- 58:59गए। तुम तो कहती ये तो बाबू साहब ये
- 59:02तो लंबी समाधि में। अरे मूर्ख नंदो कभी इतनी लंबी
- 59:06समाधि इससे पहले कभी किसी की है हुई है?
- 59:11छह महीने की समाधि आदि शंकराचार्य ने ली थी।
- 59:19उसके बाद तुरंत वह शरीर में वापस आ गए थे और बड़े साधन थे।
- 59:23उसके सभी चक्करों को जागरूक रखने के लिए तो हमारे पास कोई साधन
- 59:29तुमने एवरेस्ट के आइस बंडल की तरह बस कम टेम्परेचर पर उसका शरीर
- 59:38सुरक्षित कर लिया है। यह ठीक है और बरसों तक बचा रहेगा।
- 59:42लेकिन मैं पहले भी कह चुका हूँ वह जीवंत कभी नहीं होगा, वह हम जैसे
- 59:52लोगों को फरियाद करता ही रहेगा। कुछ करो हिला बसीला करो अब हम
- 1:00:00क्या करें ये तुम्हारे ही पाले हुए हैं।
- 1:00:07ऐसी मूर्ख मंडली मैंने धरती पर पहली बार देखी है जो मृत व्यक्ति
- 1:00:16हो और देखो ये वो ही व्यक्ति है अगर इनका कोई सगा 1012 साल में मर
- 1:00:21गया हो, कोई बाप, कोई बहन, कोई माता, कोई भाई।
- 1:00:26तो उसको फौरन आग लगा के ये आ गए। गुरु से कोई द्रोह है क्या आपको
- 1:00:34अपने माता पिता को तुमने फूंक दिया?
- 1:00:38भाई, बहन को पुत्र आदि को तुमने फूंक दिया?
- 1:00:41लेकिन गुरु से कोई बैर है, आपको नहीं कोई बैर नहीं है।
- 1:00:44मसला है, खजाने का मसला है डेयरी की, संपत्ति का और कोई भी न्यायिक
- 1:00:58संस्था, न्यायपालिका स्वतः संज्ञान नहीं लेती।
- 1:01:04वो कहती है, आदमी की आस्था सर्वोपरि है तो ठीक सर्वोपरि रखो,
- 1:01:13यह आस्था तुम कहते हो। आस्था से खिलवाड़ तो एक व्यक्ति
- 1:01:19अपनी यात्रा को ही तय न कर पाएगा। क्या जन्मो जन्मो के लिए इसे
- 1:01:26भटकने के लिए छोड़ दोगे, आप ऐसा ही कर रहे हो?
- 1:01:32फिलहाल तो 10 से 12 वर्ष तो बीत गए अभी और नहीं पता आपकी मूर्खता
- 1:01:39कितने वर्ष तक रहेंगी? और तब तक तुम्हारे अपने प्रिय
- 1:01:46कितने गुजर गए होंगे और कितनों को तुम राख में तब्दील करके गंगा बहा
- 1:01:52दिए होंगे? गुरु के शरीर में ऐसा क्या था?
- 1:01:58पंच भौतिक शरीर के अलावा? वो ही पंचभूतों का शरीर था, इसे
- 1:02:03जलाते क्यों हैं? इसका अंतिम संस्कार क्यों नहीं
- 1:02:07करते? जब कोई व्यक्ति उलझ गया ना वो
- 1:02:11मुँह तोड़ पाता है क्योंकि दशा वो आई ही नहीं ना तुम उसका मुँह
- 1:02:16टूटने देते हो क्योंकि तुम कहते हो वह आएगा।
- 1:02:21मैं कितनी बार बोल चुका हूँ तीन वर्ष पहले भी मैं बोला चार वर्ष
- 1:02:26पहले भी मैं बोला वह नहीं आएगा, अगर वह आए तो मेरी गर्दन काट लेगा
- 1:02:35और वह नहीं आया और वह नहीं आएगा। तुम ढोल के खड़काओ तुम छेने
- 1:02:45खड़काओ तुम बाजे बजाओ, प्रकृति का असूल प्रकृति के हिसाब से चलता ही
- 1:02:53रहेगा। प्रकृति तुम्हारी फिकर करती ही
- 1:02:56नहीं। प्रकृति अपने नियमों की फिकर करती
- 1:03:01है। प्रकृति अपने नियमों से चलती है।
- 1:03:05तुम्हारी मान्यताओं से प्रकृति चलती नहीं, तो तुमने सवार पुषा
- 1:03:11पुत्र के कुंती ने दुख क्यों मांगा?
- 1:03:16मैंने तुम्हें बता दिया। स्वय का ज्ञान उसे हो गया था।
- 1:03:22विराट का ज्ञान उसे नहीं हुआ था इसलिए भगवान कृष्ण से उसने कहा
- 1:03:27मुझे दुख दे दे डंक जानती थी कैसे मिला उसे स्वय।
- 1:03:37वृहद चोट से मिला गाने लगा उसकी बुद्धि पर और उस बुद्धि का फूज
- 1:03:43टूट गया। चेतना के साथ वह अपने आपे में गिर
- 1:03:48पड़ी तो स्वयं का ज्ञान हो गया। और बहुत से लोगों को इस तरह ज्ञान
- 1:03:57हुआ है। ओशो को भी झलक मिली थी जब उसके
- 1:04:02नाना के साथ उसको बहुत और हॉस्पिटल में ले के जा रहे थे।
- 1:04:08रास्ते में उसने दम तोड़ दिया। ओशो को पहला झटका लगा।
- 1:04:15तभी तय हो गया था कि यह व्यक्ति एनलाइटन हो जाएगा और हो गया ऐसे
- 1:04:24बहुत से लोग हैं जो अकसमात। चोट खा जाते हैं।
- 1:04:37प्रकृति की चोट तुम इस चोट को व्यवस्था में मत डाल लेना।
- 1:04:50अगर तुम खुद से ही ऐसा ढंग बनाओगे अनुपान बनाओगे?
- 1:04:56कि मेरी पर चोट पड़ जाए तो वह तुम्हें नहीं बदल सकेगी।
- 1:05:00यह तो प्रकृति की परमात्मा की दी हुई चोट जब तुम पर अकसमात पड़ेगी
- 1:05:05और तुम्हें पता भी नहीं होगा तो तुम उसी वक्त उसी क्षण तुम तब्दील
- 1:05:12हो जाओगे। तुम अपने आप ही में लुढ़क जाओगे।
- 1:05:18इसलिए दुख बड़ी कीमियाँ है, दुख को भगाना मत, दुख से भागना मत,
- 1:05:27दुख को धकेलना मत, पुष्य मत करना, उसको दुख को स्वीकार करना।
- 1:05:40मेरी तो यही मर्ज़ी कर वही जो तेरी मर्ज़ी इस भाव अवस्था में
- 1:05:50स्थित रहना तो तुम पहले अपने मय को पाओगे।
- 1:05:58तुम वास्तव में कौन हो? मान्यताओं में तो तुम शरीर हो
- 1:06:03मान्यताओं में तो तुम विश्वास हो, विचार हो, भावनाओं हो, ये सब जो
- 1:06:13तुमने इकट्ठा किया वो ज्ञान है। लेकिन जब ये टूटता है फूज तो तुम
- 1:06:21अपने आप में लुढ़के जाते हो, गरा दिए जाते हो, पटक दिए जाते हो, तब
- 1:06:26तुम्हें पहली दफ़े समझती है कि हो आईवास इन मिस्टेक आईवास इन
- 1:06:36इल्ल्यूशन। मैं भ्रम में था, मैं गलत फहमी
- 1:06:40में था इसलिए दुख आये तो उसे स्वीकार करना सन्तु ने कहा,
- 1:06:49क्यों? ये दुख बड़ा प्यारा है आये
- 1:06:55परमात्मा का दिया हुआ आये तो इसे स्वीकार कर लेना।
- 1:07:00सुख में तो तुम बदल नहीं पाओगे, सुख में तो तुम्हारी आसक्ति और
- 1:07:04ज्यादा बढ़ जाती है। सुख में तो तुम रसीले हो जाते हो,
- 1:07:11तुम उस वस्तु से चपक जाते हो तो सुख में ये काम नहीं होगा।
- 1:07:17महा दुख दुख भी नहीं महा दुख। गाने लगे इसलिए मैंने तुम्हें कहा
- 1:07:22अब मैं तुम्हें घण मारने वाला हूँ और वो घण तुम्हारे फायदे के लिए
- 1:07:29है वो फायदा ये कि तुम अपने आप को जान पाओगे, टूट जाएगा यह भ्रम हूँ
- 1:07:38एमआइ। कौन हो तुम?
- 1:07:41यह सत्य सामने आएगा जिसे रमन कहती हैं, जानो अपने आप को सभी संत
- 1:07:47कहते हैं, अपने आप को जानो, मूडताएं मत करो, शास्त्र मत करो,
- 1:07:54सिर्फ जानो अपने अंत में उतरो और जानो।
- 1:07:58शब्दों का दोहरा मत करो, सिर्फ जानो मानो कुछ भी मत मान्यताओं को
- 1:08:04त्याग दो मान्यताओं को गिरा दो, क्योंकि तुम जानती कुछ भी नहीं
- 1:08:11मान्यताओं को गिराने से तुम वहाँ पहुँच जाओगे।
- 1:08:15जहाँ तुम्हारा अपना अस्तित्व है, तुम स्थिति प्रज्ञा हो जाओगे,
- 1:08:21जहाँ तुम्हारी प्रज्ञा विद्यमान है, तुम वहाँ पहुँच जाओगे।
- 1:08:28मैंने दोनों प्रश्नों को जवाब दे दिए।
- 1:08:29पुत्र अगर कोई और प्रश्न बचा हो तो मुझसे पूछ लेना।
- 1:08:36पितमातु स्वामी सखा हमारे पितमातु श्री कृष्ण गोविन्द हरे मोरारे।
- 1:09:10श्री कृष्ण गोविंद वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ?
- 1:09:29आयन वासु रे फिर तुमात स्वामी सखा सखा हमार।
- 1:09:48यन वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी नाथनारायण वासुदेव पितु मत
- 1:10:05स्वामी। सखा हमार भितुमात
- 1:11:11धन्यवाद।