Latest / Baba ji Vijay Vats / 9 May 25 - मैं कौन हूँ से आगे वह कौन है? महात्मा बुद्ध को महात्मा और भगवान महावीर को भगवान क्यों कहा गया?
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- 0:25बाबा जी, प्रणब, महात्मा बुद्ध को महात्मा और भगवान महावीर को भगवान
- 0:42क्यों कहा गया? कृपया सह विस्तार बताने का कष्ट
- 0:52करें। बुद्ध को महात्मा इसलिए कहा गया।
- 1:05कि वो उस स्तर पर नहीं पहुंचे। जीस स्तर पर व्यक्ति असीम हो जाता
- 1:11है, सीमाओं का बंधन टूट जाता है। सब वेद गिर जाते हैं।
- 1:22और व्यक्ति अवैध अवस्था में आ जाता है।
- 1:30स्वाभाविक बुद्ध के शब्दों से हम समझ सकते हैं बुद्ध कहते हैं अप
- 1:41दीपो भव। अपने दीपक को स्वयं बनो, दूसरे
- 1:49अर्थों में देखा जाए तो अपने नाव की पतवार अपने ही हाथों में रखो,
- 1:57किसी के हाथों में मत सौंपो और। जिसके लिए कोई रह गया दूसरा वह
- 2:09अभी भेद में जीता है। स्वयं का इलूशन समाप्त हुआ।
- 2:19पहला शक। मैं कौन हूँ ये पता चला लेकिन मैं
- 2:26कौन हूँ से आगे वह कौन है जिसे हम विस्तीर्ण कहते हैं तो सभी सीमाओं
- 2:35से पार वह कौन है, इसको बुद्ध नहीं जानते।
- 2:43फिर समझना मैं कौन हूँ इसे बुद्ध समझते हैं, जानते हैं, लेकिन
- 2:50सीमाओं से पार वह कौन है यह बुद्ध नहीं जानता है।
- 2:58इसलिए वे महान आत्महत्या कराये जाते हैं।
- 3:05इसमें मैं बुद्ध की जल्दबाजी कहूंगा।
- 3:13इसमें मैं बुद्ध का लगाव भी कहूंगा।
- 3:17जो कि करुणामन के उपजा जो बिखरा लोगों के भले के लिए है।
- 3:27संक्षेप में देखा जाए तो बुद्ध दूसरी का कल्याण करने में ज्यादा
- 3:35मज़ा अनुभव करते हैं। अभी बुद्ध का स्वयं का खुला नहीं
- 3:42होगा पूरा अभी बुद्ध का सफर थोड़ा सा बाकी है।
- 3:54तो वो कहेंगे अपने दीप का स्वयं बनो।
- 3:59वैसे देखा जाए तो मोटिवेशन, स्पीकर, आचार्यों और बुद्ध की
- 4:05भाषाओं में ज्यादा फर्क नजर नहीं आएगा।
- 4:10मोटिवेशन स्पीकर भी यही बोलेंगे। बुद्ध भी यही बोलते हैं अपने दीपक
- 4:18स्वयं बनो, अपने नाव की पतवार अपने हाथ में रखो, खिवैया किसी और
- 4:27को न बनने दो। उनके लिए मैं कौन हूँ यह जान गए
- 4:40बस यहाँ तक काफी है का मतलब यह नहीं कि उन्होंने सब जान लिया।
- 4:49सर्वज्ञ नहीं हुए। सर्वज्ञ होते हैं महावीर इसलिए
- 4:55मैं सदा से फर्क करता रहा हूँ बुद्ध और महावीर।
- 5:00के विश्व में बुध। महात्मा महान आत्मा हो गए, महान
- 5:10आत्मा वह होता है जो खुद को। उसका ये इल्लुसिओन मिट गया कि मैं
- 5:17विचार या मैं शरीर? हूँ।
- 5:25यह समाप्त हुआ उसने देख लिया। कि मैं शरीर इन विचार से पार कुछ
- 5:37हूँ जो मेरा वास्तविक स्वरूप है। बहुत स्थानों पर आपको संतों के
- 5:47शब्द महात्माओं से मिलते हुए नजर आएँगे।
- 5:52लेकिन वो शब्द ही मिलेंगे शब्द के पार की चीज़ नहीं मिलेंगे।
- 5:58महात्माओं में शब्दों से पार की चीज़ नहीं होती, संतों में शब्दों
- 6:05से पार होता है जैसे उन् मुनि मन से पार।
- 6:14बुध मन के ठहराव तक तो आ जाएंगे, विपश्यना करके मन को ठहरा देंगे,
- 6:24लेकिन इस मन से पार नहीं जा पाएंगे।
- 6:30स्वयं को पहचानने तक ही सीमित रह जाएंगे।
- 6:33इसलिए उनको महआत्मा का हक महात्मा महावीर महावीर स्वयं के बोध से
- 6:50आगे चलते हैं। मैंने पहले भी आपसे कहा था कि
- 6:53बुद्ध मात्र 6 साल में पहुँच जाते हैं और महावीर भी इस अवस्था में
- 7:00करीब छः वर्ष में पहुँच गए, लेकिन इससे आगे की इतनी ही यात्रा और
- 7:06शीर्ष है जो आपको नहीं करनी होती। यू अरे टु डू नथ्थिंग आपने सिर्फ
- 7:20शांत मन से बैठना होता है। वह यात्रा परमात्मा की यात्रा है,
- 7:27लेकिन यात्रा तो है। धैर्य की यात्रा है, सहनशीलता की
- 7:35यात्रा है, जीवन को जीने की कला सीखनी हो तो बुद्धि से सीखिए,
- 7:49बेहतर कलाएं बता देंगे तुम्हें। जीवन को जीने का अर्थ बता देंगे,
- 7:58जीवन को सही जीने का ढंग बता देंगे।
- 8:03अगर ऐसा कुछ है तो बुद्ध की शरण में चले जाइए।
- 8:07प्रथम शरण गच्छा। लेकिन इससे पार भी अगर तुम अभी
- 8:24पूरे फैले नहीं होते, बुध होने में अभी संकीर्णता बाकी होती है।
- 8:31बुध पूरे नहीं फैलते। यद्यपि यह पड़ाव काफी है, यह
- 8:40पड़ाव छू लेने के बाद अगली यात्रा तुम्हारी नहीं होती, भगवान की
- 8:44होती है, परमात्मा की होती है, बुद्ध को भगवान नहीं कहा गया
- 8:52क्योंकि उन्होंने भगवान तक की यात्रा की नहीं।
- 8:57महावीर ने भगवान तक की यात्रा की, इसलिए उन्हें भगवान कहा गया।
- 9:04बुध मह आत्मा तक ही सीमित रह गए, लेकिन यह सीमितता उनकी बहुत कुछ
- 9:13तोड़ गई। उपद्रव तोड़ गई।
- 9:16ये मन की असहजता तोड़ गई। सब वासनें समाप्त हो गईं, इच्छाएं
- 9:23समाप्त हो गईं। इल्यूशंस मिट गए, सत्य सत्य की
- 9:31तरह नजर आया यह। काफी है पता होना और परमात्मा तक
- 9:41होने की अनिवार्य यात्रा है। बुद्ध मैंने बहुत बार पहले भी
- 9:46बोला आपसे यहाँ तक तो पहुंचना ही होगा कम से कम।
- 9:54और बुद्ध कम से कम पहुंचते हैं। कम से कम पहुँच के उनका मंत बेहाल
- 10:01हो गया। फिर वो जाते हैं बांटने के लिए,
- 10:05बांटने की बड़ी जलती है बुद्ध को जितना छोड़ने की जलती थी,
- 10:11कपिलवस्तु को छोड़ दूँ। उतने ही बांटने की जल्दी हो जाती
- 10:16है तो क्योंकि भगवान की यात्रा नहीं की इसलिए भगवान नहीं कहा।
- 10:28यह जो अलंकार दिए गए। यह आम व्यक्तियों ने अलंकार नहीं
- 10:35दिया है। आप कहोगे भगवान शब्द अनुयायी न
- 10:42लगाया या महात्मा शब्द दूसरों के अनुयायी न लगाया ऐसा नहीं यह
- 10:51संतों। महात्माओं का साझा कॉम्बिनेशन
- 11:02महआत्मा कोण और संत कह तक है भगवान कौन?
- 11:07ये बारिक शब्द है थोड़ा सा फर्क करने की।
- 11:12बुद्धि में हीन कर लेना। इसमें तो बुद्ध आनंद को छू तो
- 11:19लेते हैं, लेकिन आनंद में विलीन नहीं होते।
- 11:29जैसे बुध ने समुद्र को छू तो लिया।
- 11:35समुद्र का स्वाद जाना लेकिन समुद्र हो नहीं गई, जिससे संत
- 11:44कहते हैं के बूँद समानी संबंध में।
- 11:50वह होता है महावीर में। यद्यपि दोनों की यात्राएं संकल्प
- 11:57की यात्राएं मानी गईं, लेकिन भीतरी यात्राओं का तुम्हें पता
- 12:04नहीं होता। इसलिए महावीर तुम्हें कभी कभी
- 12:10पागल लगेंगे। थोड़ा कुछ फर्क है लेकिन वो तो
- 12:16आपको कभी पागल नहीं लगेंगे। उनके विचार, उनका मार्ग इतना
- 12:23सुस्पष्ट है, उनके शब्द। इतने साफ शैली में बोले गए कि
- 12:31आपके बुद्धि में उतरते वक्त ज़रा भी कोई तकलीफ नहीं होती, लेकिन
- 12:39महावीर के शब्द बुद्धि में नहीं उतरते।
- 12:46महावीर और गुरुगोरखनाथ में कोई फर्क नहीं है तो मैंने कहा अगर
- 12:51जीना या जीने की कला सीखनी हो तो बुद्ध के पास चले जाना और अगर
- 12:58जीने की कला के साथ साथ मरने की कला भी सीखनी हो तो फिर गौरव के
- 13:04पास आना। महावीर के पास क्षण, क्योंकि वो
- 13:12एक पक्ष नहीं बताएंगे, आपको वो अँधेरा भी बताएंगे।
- 13:19उजाला भी बताएंगे। दोनों पक्षों को बताने वाला संत
- 13:28और एक पक्ष को बताने वाला महआत्मा बुद्ध जीने की कला सिखाएंगे और
- 13:39महावीर जीने की कला सिखाएंगे मृत्यु के आगोश में जाकर।
- 13:45बुरा फर्क है। जैसे श्रेयत केतु को मृत्यु की
- 13:58शरण में जाकर गिरने की कला सिखाई गई।
- 14:10अब मैंने कल कहा था कि 3 दिन लगते हैं मरने की प्रोसेसर में 3 दिन
- 14:17पहले से शुरू होती है, व्यक्ति को पता नहीं चलता, जो थोड़ा सा
- 14:22समझदार होते हैं, सेंसिटिव होते हैं, वह 3 दिन पहले ही समझाते
- 14:26हैं। के मृत्यु की आहट शुरू हो गई तो
- 14:35कल पूछा नितिन घोसला ने के 3 दिन ये 72 घंटे क्या थे?
- 14:42ये 3 दिन बाबा नन्द कहाँ रहे? ये मृत्यु के द्वार पर रहे।
- 14:53ये 3 दिन का वक्त लगता है। अनिवार्य है उसको मरने में जो
- 15:05नकली है और उसको जानने में जो असली है, जो कभी मरता नहीं।
- 15:14जो सदा के लिए अमर है। वहाँ तक जाने के लिए 3 दिन लगते
- 15:19हैं, इसलिए बाबा नानक 3 दिन तक कहानी है कि नदी में से बाहर नहीं
- 15:29आए। बस आपको समझाने की एक प्रक्रिया
- 15:33है। क्योंकि तुम बहुत उपरी तलों पर
- 15:36बैठे हो मस्तिष्क करके तलों तुम गहरे उतरे नहीं तुम्हें गहरे
- 15:41उतरने में बड़ा भय आता है क्योंकि भीतर अगर जाओगे तो मृत्यु का वह
- 15:47तुम्हें सताएगा। किसी ने 20 साल पहले तुम्हें कुछ
- 15:52कह दिया था। अब सामने आएगा भीतर स्टोर है वो
- 15:58और तुम बदला लेने की भावना से भर जाओगे।
- 16:02किसने बेइज्जती कर दी है? किसी ने कुछ लूट लिया है तुम्हें
- 16:06और तुम बड़े ओहदे पे पहुँच गए हो तो तुम बदला लेने की चेष्टा
- 16:10करोगे। भीतर जाने में तुम्हें डर लगता
- 16:15है, इसलिए तुम बाहर बाहर घूमते रहते हो सफियर के ऊपर परिदे के
- 16:19ऊपर बस ये तुम्हारे सेंटर पर ना जाने की एक प्रक्रिया है सेंटर से
- 16:26तुम इतना डरते हो केंद्र से केंद्र बिंदु के।
- 16:29तुम पहुंचने में इतना डरते हो क्योंकि रास्ते में जो तकलीफें
- 16:33आएंगी, उनका तो मुकाबला नहीं कर सकोगे।
- 16:37वो तुमने ही दबाई थी। किसी वक्त और दबाई भी इसलिए थी कि
- 16:43तुम उनका मुकाबला नहीं कर सकते थे लेकिन आज फिर वो उभर आई।
- 16:51और ये कभी तो उभरेंगे? जीस दिन आप पथक जाओगे, जीवन के
- 17:00भोग विलास आपा धापी आये तो तुम बड़े उतावले हो।
- 17:07आज तो लोग क्षणिक सुख के लिए स्वाद के लिए मृत्यु तक को वर्णन
- 17:13कर। लेते हैं, लेकिन एक।
- 17:21मुकाम ऐसा जो स्वयं को जानने के लिए है अब समझें न?
- 17:28स्वयं को मज़ा लेने के लिए तुम अपने जीवन को कर्बान कर देते हो,
- 17:32रेप करते हो, बलात्कार करते हो, पर हत्या कर देते हो पर जला देते
- 17:36हो, पकड़े जाते हो रेयर एस्ट हो ज़रा रेयर में से भी रेयर एस्ट।
- 17:48तुम्हारे ऊपर चलता है केस और तुम्हें फांसी की सजा हो जाती है
- 17:55क्यों हुई? ये घड़ी का भी नहीं था और कुछ
- 18:00क्षणों के आनंद के लिए तुमने अपनी ज़िन्दगी को नर्क बना डाला।
- 18:07मृत्यु का वर्ण किया, लेकिन स्वेच्छा से नहीं।
- 18:12यह जज की इच्छा थी। तुम बचने की बड़ी चेष्टा करोगे,
- 18:16किसी तरह माफी हो जाए लेकिन गया वक्त हाथ से जो निकल गया वो वापस
- 18:21नहीं आता। मरते तो महावीर भी हैं, मरने से
- 18:32पहले मरते हैं तो मर जीवड़ा शब्द मरे शास्त्रों में कहा गया जीते
- 18:39जी मर जाना, मृत्यु आने से पहले मर जाना।
- 18:44यह कोई सीखे गौरख से यह कोई सीखे महावीर से जीवन को जीने की कला
- 18:58बुध तत्व आना ही होगा। तुम्हें यह नेसेसरी रास्ता है।
- 19:06अनिवार्य कदम है। इतने तो उठाने ही पड़ेंगे तो बुध
- 19:10तक आ गए हो जीने की कला तुम्हें आ गई फिर अगर तुम चाहो इस सुख से भी
- 19:19उबोगे 1 दिन याद रखो मेरी बात यह भी एक सुख है।
- 19:27जो आनंद से लिपटते बढ़ जाता है, लेकिन कभी इससे भी तुम्हारा मन
- 19:32भरेगा, फिर आगे की यात्रा करनी होगी क्योंकि परिपूर्ण हुए बिना।
- 19:46परमात्मा तुम्हें अपनी गोद में समायेगा नहीं या परमात्मा की
- 19:53लाचारी समझूं या परमात्मा का विधान समझूं तुम्हें परिपूर्ण
- 20:00होना ही पड़ेगा। तो परमात्मा तुम्हें अपनी गोद में
- 20:04बैठा लेगा, तुम्हें अपनी बाहों में आलिंगनबद्ध करेगा, बुध तक तो
- 20:15आना ही होगा। आज दुनिया दुखों से गर्व क्षेत्र
- 20:21है। दुखों से ग्रसित होने के कारण ये
- 20:27झूठ कफ़र तूफान बदला नफरत की भावनाओं को फैलाना ऐसे ऐसे
- 20:40मूर्छित कदम उठा रही है मानवता। यह बिल्कुल ऐसे ही कदम है
- 20:47आत्मघाती जिन्हें कहना चाहिए। आज हमने अनु बम की सारी शक्ति मूड
- 21:00लोगों के आत्म में दे दी। जिन्हें पता ही नहीं कब गुस्सा आ
- 21:04जाए और कब वो। खुद तो मिटना ही है सनम आपको भी
- 21:09ले डूबेंगे हम तो डूबेंगे सनम, आपको भी ले डूबेंगे।
- 21:18इन मूर्छित हाथों में देना शुभ नहीं।
- 21:27मुझे लोग पूछ लेते हैं बाबा क्या परलय आ जाएगी?
- 21:32परलय तो उसी दिन आ गई थी। जीस दिन हमने एटोमिक एनर्जी
- 21:38मूर्खों के हाथों में दे दी थी और एक नहीं।
- 21:47जो भी राजनीति में चला गया, समझदार तो जाता नहीं, समझदार
- 21:53क्यों जाएगा? जीसको मानसरोवर में आनंद का रस
- 22:03मिला। वह तालाबों, सरोवरों में क्यों
- 22:07ठूंटेगा तालाबों में सरोवरों में मान सम्मान लोगों से शक्ति लेना
- 22:17यह मूर्छित व्यक्ति ही कर सकता है।
- 22:21लेकिन जिसे मिल गया वो मानसरोवर तो कबीर कहते हैं हंसा पायो
- 22:33मानसरोवर। हम सफायो मानसरोवर तालक लिया।
- 22:53क्यों ढोल रहे मन मस्त? फिर क्यों?
- 23:02वो बोले मन मस्त हुआ, फिर क्यों बोले?
- 23:15क्यों बोले या क्या बोले? क्योंकि वह बोला नहीं जा सकता।
- 23:22ऐसी मिस्त्री सी घुल जाती है। ऐसा अमृत सा भूल जाता है कि उठने
- 23:29को ये नहीं करता। आँखें खोलने को ये नहीं करता।
- 23:37ये रोज़ कमेंट आते हैं बाबा। अब तो कहीं जाने का मन नहीं करता।
- 23:44पहले भटकाव बना रहता था। चलो वक्त है फ़िल्म ही देखो और
- 23:52कुछ नहीं तो सर्कस ही देखो और कुछ नहीं तो फला।
- 23:57मिनिस्टर ने आना है उसकी बातें ही सुनो मन सदा ब्रह्मात्र रहता था
- 24:07अब ऐसा कि कोई मेरे पास ना है लेट मी लाइव उनसीन अन्नोन।
- 24:15एंड उनले मेंटल लेट में डाइ स्टील फ्रम दी वर्ड एंड नॉट एस्टोन टेल
- 24:22व्हेर आई लाइ बस मुझे कोई देखे ना मैं संसार में गुजर जाऊं मुझे कोई
- 24:34पहचाने ना। मैं सदा के लिए गुजर जाऊं, मेरे
- 24:40गुजर जाने पर कोई अफसोस ना करे, कोई आंसू न बहाये, यह एक संत की
- 24:50अभिलाषा ही हो सकती है। अंततः मैंने ऐसे लोग भी देखे हैं
- 24:58कि आपकी अंतिम इच्छा क्या है? कहती मेरी अंतिम इच्छा यह है ये
- 25:08कोई गुरु देवी है, नाम नहीं, मुझे ठीक से पता।
- 25:14उससे पूछा क्या तुम्हारी अंतिम इच्छा क्या है?
- 25:17कहती मेरी अंतिम इच्छा है ये कि मेरी अंतिम अंत्येष्टि के वक्त दो
- 25:24लोग 2,00,000 लोग क्या हो जाएगा उससे 2,00,000 के हो जाएंगे,
- 25:322,00,00,000 के हो जाएंगे। अंत्येष्टि को देखने के लिए दो
- 25:43अरब लोगों ने अंत्येष्टि प्रक्रिया देखी।
- 25:49माइकल जैक्सन। उसने ऐसा इंतजाम किया था कि
- 25:57चौबीसों घंटे डॉक्टर उसकी निगरानी में रखते थे।
- 26:03कहीं इसके शरीर में कहीं कोई बिगाड़ ना हो जाए।
- 26:09प्रत्येक अंग खराब होने पर उसने डोनर रखे हुए थे।
- 26:14गोर्ते देने वाले, जिगर देने वाले हार्ट के लिए और सभी जो इतरी ओजार
- 26:22है इन्स्ट्रुमेंट्स है इनके लिए। अरबों का मालिक था डेढ़, 100 वर्ष
- 26:32में जीऊंगा ऐसा वो कहता था, जीसको बचाने के लिए बड़े से बड़े डॉक्टर
- 26:45खरीदे जा चूके थे। लेकिन वह मात्र 50 साल तक जिया।
- 26:53इतना इंतजाम होने के बाद नहीं सिकंदर कितने साल जिया?
- 27:0232 क्या हुआ इनको? तुम चाहते हो जीना और इसे जीने की
- 27:20कलिंगिंगनेस के कारण तुम्हें पता नहीं तुम्हारी कितनी शक्ति व्यय
- 27:24हो जाती है। ये मेन राज़ की बात तुम्हें
- 27:29बताता। हूँ।
- 27:34जो जीना चाहता है अब ये मोटिवेशन स्पीकर तुम्हें कहते है जीना चाहो
- 27:44लेकिन असली जो अपने भीतर चला गया वह इस इफेक्ट को पाएगा।
- 27:51कि जो इस क्लिंगिकनेस से भी मुक्त हो गया कि मैं जीना है, मैंने
- 27:56जीना ही है, वह बहुत कम जी पाएगा तुम्हारी क्लिंगिकनेस तुम्हारी
- 28:04उम्र छोटी कर जाती है जीने की तमन्ना।
- 28:10महावीर ने ऐसा ही किया। मैं जीना नहीं चाहता था, लेकिन जी
- 28:15सकता था। ऐसे लोग आध्यात्मिक होते हैं, जो
- 28:21जी सकते हैं, लेकिन जीना नहीं चाहते, उनका भ्रम टूट जाता है।
- 28:29काहे जिए, किसके लिए जिए उस पेट को भरने के लिए जिए जो मैं नहीं
- 28:39उस शरीर को सुंदरता से सजाये। लाभान्य भीतर से आए गहने गट्टे
- 28:47डाल सुडोल शरीर हो क्या उसके लिए जी जो मैं हूँ नहीं, उनका जीना एक
- 28:58अर्थ में बेकार हो जाता है। जीने का कोई प्रयोजन नहीं रहता,
- 29:06तुम्हारे जीने का प्रयोजन है, तुम इकट्ठा करते हो ध्यान से समझना
- 29:15बात को तुम इकट्ठा करते हो? बहुत से लोग मुझे दलील दे देते
- 29:20हैं कि ठीक हम मर जाएंगे। लेकिन हमारे बच्चों की काम आएगा,
- 29:29वह भी मर जाएंगे, उनके बच्चों की काम आएगा, पीढ़ी दर पीढ़ी ये चलता
- 29:34रहेगा। ठीक है तुम्हारा तर्क लेकिन मुझे
- 29:38ये बताओ जिसका ये भ्रम टूट गया कि मैं शरीर ही नहीं हूँ।
- 29:42उसका यह भी तो भ्रम टूटेगा कि मेरा बच्चा भी तो शरीर नहीं होगा।
- 29:48मेरे बच्चे का बच्चा यानी मेरा पोता भी तो शरीर नहीं होगा, ऐसी
- 29:54100 पीढ़ियां तुम गणा देते हो। उनके लिए सब शरीर से विहीन हो
- 29:58जाते हैं। किसी का भी शरीर नहीं था।
- 30:01मातृ शरीर के साथ छिपकाहट थी। यही तो हुआ अर्जुन के साथ लाख
- 30:13समझाया कृष्ण ने इतनी गीता बोली नहीं समझाई वसांझी जिरणीयता
- 30:20विहाय। नवानी, घृणाति नरो प्राणी तथा
- 30:24श्री रानी विहाय हिरण, अनन्या अणि सिंहाती नवानी देवी जैसे हम
- 30:33प्राणी वस्त्र उतार के नए वस्त्र धारण कर लेते हैं।
- 30:37वैसे ही अर्जुन यह देही। पुराने वस्त्र उतारकर नए वस्त्र
- 30:44ग्रहण कर लेता है। बहुत शब्द कहे न हन्नते हन्नय
- 30:51माने शरीर तुम्हारा वास्तु के स्वरूप नहीं मरेगा तुम क्यों डर
- 30:55रहे हो? कंप रहे हो न हन्नते?
- 31:00अने माने शरीर तुम्हारा हनन नहीं होगा, तुम्हारे शरीर का हनन होगा,
- 31:06तुम जिन के लिए शोक कर रहे हो वो वो शोक करने के योग्य नहीं
- 31:12क्योंकि वह शरीर है और शरीर तो 1 दिन मिटेगा।
- 31:16दसल आगे या दसल बाद में? वह मिटेगा तो ऐसा व्यक्ति बहुत
- 31:25थीम तक गहरी जड़ों तक पहुँच जाता है।
- 31:29तुम तनों तनों में उलझे रहते हो। तुम पत्ते पत्ते में उलझे रहते
- 31:34हो, वह व्यक्ति जड़ में उतर जाता है और जड़ की गहराइयों तक पहुँच
- 31:38जाता है। किसने ये जान लिया कि मैं शरीर
- 31:44नहीं हूँ? वो यह भी जानेगा कि मैं मेरा बेटा
- 31:49भी शरीर नहीं है। मेरे बेटे का बेटा और उसका बेटा
- 31:54ये भी शरीर नहीं है। उसके सब भ्रम खत्म हो गए।
- 31:59मिट गया सब इल्यूश़न तो फिर मोह कैसे करेगा वो मोह किस के साथ
- 32:11करेगा तुम्हारी दुविधा और कुछ नहीं ना तुम भोगना चाहते हो।
- 32:20न तुम कुछ खाना पीना चाहते हो, यह है सिर्फ तुम्हारी चिपकाट कि तुम
- 32:27शरीर हो तो तुम्हे भूख लगती है तो तुम कहते हो कि मुझे भूख लगी।
- 32:35स्वामीराम। अपने जीवन के अनुभव को अपने
- 32:42शब्दों में बोलने लग गए थे। उसे भूख लगती तो वो ये नहीं कहते
- 32:48कि मुझे भूख लगी है। संस्कारों को जल्दी से टूट जाए।
- 32:58उसके लिए वो शब्द बदल लिए थे। क्या कहते हैं राम को भूख लगी है?
- 33:05राम को प्यास लगी, पानी दे दो, भूख लगी भोजन दे दो राम को रात
- 33:11में ठंड बहुत लगी, आज एक कंबल ज्यादा दे देना।
- 33:18बोलने का ठंगा अनुभव को शब्दों में डाल देना।
- 33:26यद्यपि सुनने वाले इसके आदि नहीं थे, लेकिन धीरे धीरे आदि हो गए।
- 33:33स्वामीराम जान गए कि ऐसे अगर मैं कहूंगा मुझे भूख लगी है तो यह
- 33:41संस्कारों को और प्रगाढ़ करेगा। पहले से ही संस्कार बड़े जन्मों
- 33:47के हैं कि मैं शरीर हूँ, मैं मन हूँ।
- 33:51इन संस्कारों को शब्दों के जरिए से थोड़ा सा हल्का करें।
- 33:55इस चपकाहट को शब्दों के जरिए थोड़ा सा हल्का करें।
- 33:59शब्द मुँह बोलना शुरू कर दें जिनसे चपकाहट टूटे तो नहीं कहते
- 34:06कि मुझे भूख लगी है वो कहते राम को भूख लग के।
- 34:11राम को बड़ा क्रोध आया। तुम्हारी इस बात से राम को बड़ा
- 34:17क्रोध आया, राम को बहुत शांति मिली।
- 34:23तुम्हारी बातों से मैं गदगद हुआ। ऐसा नहीं कहते।
- 34:27कहते तुम्हारी बातों से राम बड़ा प्रसन्न हुआ, गद गद हुआ, वह अपने
- 34:33सिर्फ फर्क में बात करते थे। इस सारे ढांचे को मैं की तरह वह
- 34:41बात नहीं करते थे और बात अलगाव से करते थे।
- 34:45यह अभी एक फॉर्मूला हो सकता है। लेकिन समझो में नहीं आएगा।
- 34:48लोग तमे पागल क्या है? तुम्हारी इच्छाएं बड़ी क्षुद्र
- 34:54हैं। माइकल जैक्सन चाहता था कि मैं
- 34:59डेढ़ 100 साल जीऊं 50 साल जीया। और उसने सब प्रकार मृत्यु से बचने
- 35:06के उपाय कर लिए थे, लेकिन डॉक्टरों से बचाने से और उसकी
- 35:16अंतिम संस्कार देखने के लिए दो अरब लोग थे।
- 35:25दो अरब लोग सभी साइट्स ब्रेक हो गए।
- 35:32इतने लोगों ने उसकी अंतिम संस्कार की क्रिया देखी।
- 35:39उसने ये तो कभी नहीं चाहा था। कि मेरे अंतिम संस्कार को अरबों
- 35:45लोग देखे, लेकिन यहाँ एक गुरु माता है, उसका नाम मैं फिर बार
- 35:53बार भूल जाती हूँ। राधे माँ राधे माँ उसका एक क्लिप
- 35:58मेरे पास है। क्या आपकी अंतिम इच्छा क्या है?
- 36:05उसने कहा, मैं चाहती हूँ कि मेरी अंत्येष्टि में अंतिम क्रिया में
- 36:10संस्कार में 2,00,000 लोग मौजूद रहे।
- 36:15क्या हो जाएगा इससे? जिसकी इच्छा बाकी रह गई हुई मरने
- 36:27से पहले जीते जी या मरने के बाद वह पहुंचा होगा भला, जिसकी कोई
- 36:38अंतिम मच्छर रह गई। जीते जी उसकी इच्छा ये नहीं
- 36:46बतलाती है, वो पहुंचा नहीं, बिल्कुल बतलाती है, लेकिन हम ऐसे
- 36:57ही लोगों को पूछते हैं। मैंने सुना है कि भक्तों को
- 37:01प्रसाद देने के लिए सुना है ये सुनी हुई बातें हैं मैंने कभी
- 37:05राधे माँ को न देखा है ना मैं कहीं जाता हूँ बाहर सुना है कि वो
- 37:16पहले खा लेती हैं और अपना खाया हुआ चबाया हुआ।
- 37:23जो अन्न है उसे बाहर निगल लेती है, निकाल देती है और फिर उसको
- 37:31प्रशाद के रूप में भक्तों को देती है।
- 37:33ये क्या तरीका है? आदमी की अपेक्षाएं इच्छाएं बड़ी
- 37:46विचित्र हैं। देखने में क्रियाएं में ऐसा लगता
- 37:52है जैसे सचमुच पागल है। अब क्या कहें इसके बारे में।
- 38:01ऐसे ऐसे लोगों को किसी के दो दो लोगों के काम बन गए होंगे।
- 38:04कुछ सहजता में भी ऐसा हो जाता है। तुम किसी मूर्ति के आगे कुछ मन्नत
- 38:11मान लो। 100 में से दो की तो पूरी होगी।
- 38:18वहीं लोग भगवान मानने लग जाएंगे तो इस तरह की मूडताएं चलती हैं,
- 38:24अध्यात्म में नहीं, साइंटिफिक माइंड से समझ होनी चाहिए।
- 38:30बोलने वाला भी साइंटिफिक ढंग से बोले।
- 38:35बोलने का डग बड़ा सेंसिटिव होना चाहिए, साइंटिफिक होना चाहिए।
- 38:48विज्ञान की धरा पर बिल्कुल सजीव जो प्रमाणित हो सके ना प्रमाणित
- 38:58हो सके तो वह कह दे कि देखो। तो मानना मत इसे संत हमेशा ऐसा
- 39:05कहता है कि मुझे कटा, मैंने बोला ऐसा हुआ, तुम मानने को बात नहीं,
- 39:15तुम इसे मानना मत क्योंकि तुम्हारे मानने से।
- 39:20भोजन मैंने खाया भूख मेरी मिट्टी भोजन तुमने नहीं किया, तुम्हारी
- 39:26भूख नहीं इसलिए किसी को मान लेना बिल्कुल पूर्णतः यह मूर्खता है।
- 39:39अंत भक्त की तरह हो जाना ये मूर्खता के लक्षण हैं।
- 39:46महावीर को भगवान कहा गया, बिलकुल ठीक कहा गया क्योंकि बुद्ध से आगे
- 39:51का कदम जो परमात्मा की यात्रा होती है वो उन्होंने होने दी।
- 39:586 साल के करीब तो वो भी पहुँच गए थे।
- 40:01खुद को जानने और कोई भी व्यक्ति पहुँच सकता है।
- 40:05आज के जमाने में मुश्किल क्यों हो गया अगर आप वास्तव में उस स्थल पर
- 40:13पहुंचना चाहते हो? तो एक बात का ध्यान रखना, इस
- 40:19मोबाइल को छोड़ दो, इसको छोड़। दो, तुम ये।
- 40:29कल्पना भी मत करना ये तुम्हारे पास रहे और तुम पहुंचे जाओगे।
- 40:40तुम बचपन से ही इसमें उलझा लिए जाते हो और जैसे संस्कार बढ़ गए
- 40:48तुम्हें कि मैं शरीर हूँ, मैं मन हूँ, मैं विचार हूँ।
- 40:53वैसे ही तुम्हें इसके संस्कार बढ़ जाते हैं, लत बढ़ जाती है, यह लत
- 41:00तुम्हें घेर लेती है। इस लत को तुम आदत एडिक्टेड हो
- 41:07जाते हो तुम जैसे नशेड़ी व्यक्ति नशे का एडिक्टेड हो जाता है।
- 41:13उसे तो फिर ये चिट्टा काला चाहिए, गर्भपात हो जाये, कोई बात नहीं,
- 41:22बुद्धि शून्य हो जाती है, बुद्धि समाप्त हो जाती है, कोई काम नहीं
- 41:29करती। तो बुध उस लैब तक पहुंचे जहाँ तक
- 41:36कि स्वयं को जानना होता है। हम मोरल की तरफ आ जाए।
- 41:43जहाँ तक स्वयं को जानकर सारे इल्ल्यूसन मच जाते हैं।
- 41:50वास्तव में 99% भ्रम तुम्हारे इस कारण से ही हैं और बुद्ध के 99%
- 41:59भ्रम मिट जाते हैं। बुद्ध में कोई वासना शिष्य नहीं
- 42:05रहती, ना बुद्ध इकट्ठा करना चाहते हैं।
- 42:09न बुद्ध भोगना चाहता, लेकिन बुद्ध स्वयं को जाने से आगे नहीं बढ़ते।
- 42:18अगर खुद को और पान 7 साल ठहरा दिया होता, उसी बोधी वृक्ष के
- 42:23नीचे तो वो महावीर की तरह भगवान हो जाते।
- 42:30यह नाम कोई शिष्यों के द्वारा दिया हुआ नाम नहीं है।
- 42:34यह नाम बुद्ध की कदर घटाने के लिए बोला गया शब्द है।
- 42:39महात्मा और संत का फर्क मैं बता रहा हूँ महात्मा वह जिसने अपनी
- 42:44मेहता आत्मा को जान लिया। शुद्र शरीर को छोड़ दिया
- 42:51आत्ममहत्त्व है उसके आगे भगवान तुम कितनी ही महात्मा हो जाओ,
- 43:02लेकिन तुम रहोगे संकेरण। इसलिए बुद्ध संकीर्ण कोई थूक
- 43:11जाएगा, माफ़ कर देंगे। क्यों जानते हैं मिट्टी के ऊपर
- 43:16थूक के, लेकिन महावीर तो महावीर? महावीर इससे आगे चलते हैं।
- 43:28बुद्ध के सतल तक वो पहुँच जाते हैं।
- 43:33उससे आगे वो खुद को छोड़ते हैं क्योंकि एक लंबी प्रोसेसर है।
- 43:3923 तीर्थंकर उससे पहले हो चूके हैं।
- 43:43एक मार्गदर्शन बहुत लंबा मार्गदर्शन मिलता है।
- 43:47उन्हें 23 तीर्थंकरों का अनुभव भी तो बहुत बड़ी चीज़ होती है।
- 43:56इस अनुभव के कारण उन्हें मार्गदर्शन मिलता है।
- 44:0023 प्रबुद्ध व्यक्तियों का। जो अपने आप तक पहुंचे, भगवान की
- 44:06उस विराडता तक पहुंचे और उसमें ये भी बता दूँ कि हिंदू धर्म से
- 44:15दोनों ही धर्मों का संबंध है हिंदू धर्म से।
- 44:20सनातन से मन्नू और शत्रूपा की पांचवीं संतान यह सनातन की संतान
- 44:29थी जो पहले ऋषभदेव हुए थे। सिंधु से ऋषभदेव कहते हैं जैनी
- 44:38इसको ऋषभदेव कहते हैं। यह इनके पहले ही तीर्थंकर थे और
- 44:45हिंदुओं के पांचवें पांचवीं पीढ़ी से शुरू होता है।
- 44:54मन्नू के पांचवीं पीढ़ी से जयंत। और फिर बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता
- 44:59है और आखिर में आता है लास्ट 24 वो आते हैं महावीर लेकिन महावीर
- 45:08के पास 23 तीर्थंकरों का अनुभव है।
- 45:13बुद्ध के पास है संघ। बुद्ध के पास कोई श्रंखला नहीं
- 45:18है। बुद्ध अकेले बुद्ध को तो भीतर से
- 45:23कुछ किचोटता है सब भोग लिया सब देख लिया लेकिन अंत क्या है अगर
- 45:31मर ही जाना है? तो ये काँटा क्यों न निकाल लिया
- 45:34जाए, देख लिया जाए काँटा क्या है जो भीतर चुभता है सब है लेकिन फिर
- 45:41भी भीतर किसी को किसी का इंतजार वो किसका इंतजार?
- 45:46कोई दिखता भी नहीं कमी है, लेकिन भीतर कुछ कमी खलती है।
- 45:54कोई नहीं है फिर भी है मुझको कोई नहीं है।
- 46:13फिर भी है मुझको, ना जाने किसका इंतजार ओह कोई नहीं है।
- 46:32फिर भी है मुझको, न जाने किसका इंतजार है ये बताओ ये पता है कि
- 46:46जो मैंने होगा, जो मैंने देखा। उसमें वह नहीं है जिसका इंतजार है
- 46:51भीतर के प्राणों को भीतर कुछ तड़प रहा है, कुछ और पाने को वह और है
- 46:59क्या ये भी नहीं पता, लेकिन महावीर जानते हैं वो और क्या?
- 47:04है। महावीर के पास 23 तीर्थंकरों की
- 47:08एक श्रृंखला 23 तीर्थंकरों का एक अनुभव है।
- 47:13जो से मार्गदर्शन करता है यहाँ ठहर मचाना इससे आगे भी है मुकाम
- 47:21जल्दबाजी में मत बढ़ना। वहाँ ठहरे ही रहना जहाँ तुम ठहर
- 47:26गए। आगे एक पड़ाव आएगा जब तुम्हें
- 47:31तुम्हारा और शोर नजर नहीं आएगा, तुम विराट हो जाओगे, तुम व्यक्ति
- 47:37न रहोगे, वो तो अभी व्यक्ति रह जाते हैं।
- 47:44महावीर विराट हो जाते हैं और यह उसी श्रृंखला का परिणाम था या इसे
- 47:51ऐसा समझो कि अगर गुरु की महिमा बताई गई तो इसका भी एक कारण यही
- 47:58रहा होगा। कि बिना गुरु के बुद्ध कैसे भटक
- 48:04गए क्योंकि कोई श्रृंखला मार्गदर्शन के लिए थी नहीं।
- 48:11मनवीर के पास पूरी श्रृंखला थी इसलिए खुद को जानने के बाद भी
- 48:17जानते थे अगला पड़ाव है और वो बैठे रहे।
- 48:22और आखिर में बड़ा उपाय है जिसे कैबरी रखा इधर शब्दों की तरफ
- 48:29ध्यान दीजिए बुध कहते हैं निर्वाण निबृत्ति मिली किस चीज़ से
- 48:34इल्यूजन से इल्यूजन से निर्वृत्ति मिली।
- 48:39क्या निबृत्ति मिली? मैं शरीर नहीं, मैं मन नहीं, मैं
- 48:42इंद्रिया नहीं, इससे निवृत्ति मिली।
- 48:47एक अंधकार का नाश हुआ, लेकिन महावीर का शब्द बिल्कुल अलग है।
- 48:54महावीर नहीं कहते कि निवृत्ति मिली, महावीर कहते केवल।
- 48:59केवल हुआ मैं केवल हुआ मैं एक रह गया निवृत्त किसी से नहीं हुआ,
- 49:07मैं ही अकेला रह गया दो शब्दों में बड़ा गहरा फर्क है अगर तुम
- 49:15इसकी कहराई में जाओ। बुद्ध कहते हैं, निवृत्त हो जाओ
- 49:20किस्से इन ब्रह्मों से इत्रियां हूँ, मन हूँ शरीर हूँ, विचार हूँ
- 49:28बाबू हूँ, इनसे निवृत्त हो जाओ, हो भी गए, उससे खुद का आपा जाना
- 49:34जाएगा लेकिन। महावीर कहते निवृत्ति मात्र
- 49:43पूर्णता नहीं, निवृत्त हो के उसके बाद तुमने केवलय में भी जाना है
- 49:48तुमने केवल हो जाना है एक जिसका और छोर कोई नहीं।
- 49:54दूसरा नहीं, जिसे अद्वैतवाद कहते हैं, वेदांत दूसरा नहीं है कोई बस
- 50:02एक बचता है तो बड़े सुंदर शब्द मुझे सबसे प्यारा शब्द महावीर का
- 50:07केवल ये लगता है केवल हो जाना। बस वही जो है वही हो जाना एक ही
- 50:17है परिपूर्ण विस्तार विराट की तरह सब जगह समाया हुआ यही उपपरिषदों
- 50:23में वर्णन है यही संतों का उदभोज है एको हम द्वितीयना से एको
- 50:32ब्रह्म। ईशा अवश्य में तुम सर्वमम।
- 50:36जगत जगत ईश्वर इस। जगत के कण कण।
- 50:41में विद्यमान है और एक है एक ही जगत जगत में विद्यमान हो सकता है।
- 50:49वह दो नहीं है। इसे अद्वैतवाद कहते हैं, दो नहीं
- 50:54हैं। और संत भी यही कहते हैं।
- 51:01अहम् ब्रह्मस्व एको अहम् एको ब्रह्म द्वितीय नाश्ते दूसरा
- 51:08नहीं। दादू कहते हैं, दादू दूजा?
- 51:18को नहीं अद्वैत पाता। दूजी मन की दौड़ या मन दौड़ रहा
- 51:23था तुम्हारा दौड़, मिट्टी सन सह गया वस्तु ठोर की ठोर वस्तु वहीं
- 51:29है तो उपनिषद। यही कहते हैं।
- 51:37तुम्हारी गीता भी यही कहती। है अनन्या चिंतन तो माँम तो उस एक
- 51:45का चिंतन कर जो मैं हूँ। अनन्या चिंतितों।
- 51:52माँ सर्वधर्माण पर त्ज माँ एक कं मुझे एक में समाचार।
- 52:02समर्पण हो गया। सभी।
- 52:06संतों ने अलग अलग। शब्द प्रयोग।
- 52:09करके उस। एक का फैलाव बताया।
- 52:15बाबा नानक ने कहा एक। कौंकार।
- 52:22सभी संतों के शब्द अलग। थे।
- 52:25इशारा वो ही था कैबल एक। निर्वाण में एक की खुशबू नहीं आती
- 52:34इसलिए बुद्ध निवृत्त तो होते हैं, मुक्त हो जाते हैं।
- 52:38निवृत्त हो। जाते हैं उन ब्रह्मों।
- 52:40से मैं शरीर में मन। लेकिन उस एक में नहीं।
- 52:47जाते फैलाव में नहीं जाते, जिसका और कोई नहीं।
- 52:54जो तुम वास्तव में हो? जो तुमने।
- 52:57देखा कि मैं हूँ। वह तक ठीक तुम्हारा भर्म टूटा
- 53:03लेकिन भर्म टूटने से आगे वास्तव में।
- 53:06तुम हो कौन? जो वहाँ पहुंचा कि तुम।
- 53:13हो कौन हूँ? एमआइ मैं कौन हूँ यह तो जान लिया
- 53:20हूँ इस ही वह कौन है ये जानना बाकी।
- 53:26तो वह परमात्मा है। और एक है एक ओंकार, वह ओंकार, जो
- 53:31है एक है। इसको ठीक से समझे न?
- 53:37मैं बड़े विस्तार से बोल रहा हूँ। तो, जो उस एक तक।
- 53:44पहुँच गया जो केवल में उतर गया। जो केवल हो गया जो एक कोंकार में
- 53:49चला गया वो समझ लेना कि भगवान हो गया फिर वो।
- 53:54भाषा किसी का इस्तेमाल? करें कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन
- 53:59कम से कम बुद्ध नहीं कह सकेंगे। के मेरी शरण में आजा, वो कहेंगे
- 54:04प्रथम शरणम् गच्छामि, संगम शरणम् गच्छाम वो नहीं।
- 54:12कहेंगे मैं तुम्हें पाप। मुक्त कर दूंगा, वो कहेंगे।
- 54:16पाप मुक्त होगे। तुम तुम्हारे कारण अपनी दीपक
- 54:19स्वयं भरु। अपने पथ।
- 54:22प्रदर्शक। मार्गदर्शक तुम स्वयं बनो, दूसरे
- 54:26पर निर्भर। मत हो जाओ।
- 54:29यहाँ तक बुद्ध का प्रचार है और शांति के लिए काफी है।
- 54:33दुनिया को आज शांति की जरूरत है। और शांत होने के लिए।
- 54:39बुद्ध का ही ये फॉर्मूला काम आएगा, लेकिन इससे आगे
- 54:49आध्यात्मिकता में। बिल्कुल छोर को छूने वाले।
- 54:55अंतिम अभी। मार्ग बाकी है।
- 55:02तुम कौन हो पता लग गया? वह कौन है ये पता न लगा इसलिए
- 55:07बुद्ध कहते हैं परमात्मा नहीं है खत्म।
- 55:12अब तुम अपनी कमान, अपने हाथ। में रखो।
- 55:19लेकिन महावीर कहते हैं, अपनी। कमान उसके हाथ में सौंप दो अब
- 55:24तुम। यहाँ ऐतराज करोगे?
- 55:26उनके कामों से पता नहीं चलता। अगर तू जलाना है तो जिला अगर नहीं
- 55:31जलाना है तो मत जिला। लेकिन मुझे मेरी शर्तों पे खाना
- 55:35दे, नहीं तो मैं खाना नहीं खाऊंगा।
- 55:39यह किस्से रखते हैं प्रस्ताव किसी चेतन सत्ता से।
- 55:45प्रस्ताव रखते हैं। बुद्ध जीस सत्ता से प्रस्ताव।
- 55:51रखते हैं। वह चेतन नहीं है, वे अचेतन हैं,
- 55:56वह तो। सिर्फ नियम है और।
- 55:58बुद्ध कहते हैं नियम लार्ज और सुफ्फिसिएंट नियम ही पर्याप्त है।
- 56:05बुद्ध यहाँ रुक जाते हैं। लेकिन महावीर नहीं रुकते।
- 56:09महावीर? कहते हैं कि अगर तुने?
- 56:11जलाना है वह तुने किसको कहते हैं महावीर किसको कहते हैं वह तुने जो
- 56:17मुझको जलाना है तो जला नहीं जलाना तो मत जला जीने की मेरी अपनी कोई
- 56:25इच्छा नहीं मरने की भी मेरी अपनी कोई इच्छा नहीं।
- 56:29बस इच्छा तेरी। तू जो चाहता है वह कर।
- 56:34और बाबा नानक भी तो यही कहते हैं जो तुद पावे सोई पलिका।
- 56:42क्या? बट्टू भी तो यही कहते हैं।
- 56:44मेरी तो यही अर्जी कर वही जो तेरी मर्जी।
- 56:49सन्तु ने यही तो कहा। लेकिन बुद्ध नहीं कहेंगे ये।
- 56:54बात इसलिए बुद्ध महात्मा। महावीर इसी श्रेणी में आएँगे।
- 57:01पलटू, इसी श्रेणी में कबीर भी इसी श्रेणी में नानक भी इसी श्रेणी
- 57:04में तू कर जो करना है। कृष्ण से लेके सारी भक्त।
- 57:11मंडली बहुत बड़े समझदार हैं। अब यहाँ समझ लेना।
- 57:21जो समझदार है। वह स्वयं को जान देगा।
- 57:28लेकिन समझदारी को आगे। छोड़ना पड़ेगा, थोड़ा थोड़ा
- 57:31पागलपन भी लाना पड़ेगा। को छोड़ना पागलपन ही।
- 57:39तो होता है। थोड़ा थोड़ा पागलपन।
- 57:45लेके आना पड़ेगा जैसे जब तुम शराब की थोड़ी सी घूंठ उतार लोगे तो
- 57:51बहक सकते हो थोड़ा सा तुम्हारी। बातों में थोड़ा।
- 57:57अलग अंदाज। होगा वह।
- 57:59ऐसा लगेगा जैसे यह पागल है। यह पागल होना ही।
- 58:08तुम उस। महफिल में शरीक।
- 58:10हो गए जहाँ वो मद पी जाती है और बांटी जाती है पिलाई जाती है।
- 58:18और जहाँ तुम एक घूंट। पी के बुध ने पी नहीं अभी।
- 58:23बुध ने खुद को जाना लेकिन उस दिशा में नहीं गए।
- 58:26जीसको रस कहते हैं रसोवै सा वह परमात्मा है, उसको नहीं पिया खुद
- 58:33के। होने को।
- 58:35पिया, वह भी बड़ा रसदार है, लेकिन।
- 58:39तुम समझ सकते हो कि। बूंद का रस।
- 58:42और समुद्र का रस इसमें फर्क तो तुम अच्छी तरह से समझ सकते हो।
- 58:49बूंद का रस उतना शुद्र है। और समुद्र का?
- 58:52रस उतना विराट है और ये भक्त समुद्र।
- 58:57का रस पीना चाहते हैं तो थोड़ी थोड़ी बुद्धि को छोड़ना होगा।
- 59:01थोड़ा थोड़ा पागल बन में उतरना होगा।
- 59:07बुद्धि 1 दिन पूरी छोड़ दो। थोड़ी।
- 59:11थोड़ी छोड़ एकदम से तुम। नहीं छोड़ पाओगे, थोड़ी थोड़ी
- 59:15बुद्धि को छोड़ो, थोड़ा थोड़ा पागल बन आएगा, थोड़ा थोड़ा पागल
- 59:20बनो। मैं तो हूँ पता ही है थोड़ा थोड़ा
- 59:29पागल बनते जाओ बुद्धि को छोड़ते चले जाना, छोड़ते चले जाना और उस
- 59:35तल पे आ जाना जहाँ बुद्धि सारी छोड़ती जाती है।
- 59:39जहाँ नाशम जी का परम आलम आ जाता है और जहाँ तुम पूरे पागल हुए।
- 59:47उसको कहते हैं भक्त पूर्ण समर्पण, बस उसकी बुद्धि कामना करती वह।
- 59:55कहती, तू ही तू तू? ही तू?
- 1:00:00हे। तुम्हें कुछ पटपटा सा लगेगा।
- 1:00:09ये क्या है? ये तो पागलपन कीनता है हाँ बिलकुल
- 1:00:13पागलपन कीनता और उसे स्वीकार करना होगा।
- 1:00:18शुरू का पैग डालते हुए स्वीकार करना होगा कि इसको पीने के बाद
- 1:00:22तुम्हें और पीने की तमन्ना जगेगी दो।
- 1:00:27कुट पीला। दे शाकिया।
- 1:00:34दो कुट। पीला जैसा किया बाकी मेरे तिरोड़
- 1:00:46दे। पीला भी मुझे दे।
- 1:00:52और नहला भी मुझे ही दे दो, कुट पीला जैसा किया बाकी मेरे तिरोड
- 1:01:05दे दो कुट पीला दे सा की। इसे पीने के बाद या।
- 1:01:16तो शुरू मत करना, समझदार बने रहने।
- 1:01:21या उसका आनंद का लुत्फ? लेना चाहते हो तो फिर पहली घूँट
- 1:01:26भरने से पहले यह निश्चय कर लेना। की और तमन्ना उठेगी और पीने की
- 1:01:35तमन्ना उठेगी। यह राशि ही कुछ ऐसा है और।
- 1:01:43ज़रा सी। दे देसा की और ज़रा सी और।
- 1:01:50और ज़रा सी दे दे सा की और ज़रा सी और कैसे रहूं चुपके मैंने पी
- 1:02:00ही क्या है, होश भी तक है बाकी। और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा
- 1:02:12सी। अगर एक घूँट तुमने पी।
- 1:02:16लिया तो और पीने की प्यास से तुम कहोगे अभी तो।
- 1:02:23होश में है। अभी और दे मुझे।
- 1:02:29और इतना दे कि ये मुझे पीला दे, जो बच जाए वो मुझे नहला दे, बड़ा
- 1:02:36प्यारा तुम खुद। ही खो जाओ उसमें।
- 1:02:40मैं के सागर में। अठखेलियां करने लगो।
- 1:02:48उसमें तैरने लगो। उसमें विलीन हो जाओ, उससे अलग न
- 1:02:53रहो, उसमें खो जाओ, यह खो जाना भक्ति इसलिए भक्त।
- 1:03:04योगी से ज्यादा उच्च? श्रेणी रखता है।
- 1:03:11योगी? खुद को जानता है योग?
- 1:03:12हो गया उसमें? उसने खुद को जान लिया।
- 1:03:18सत्य में योग? हो गया सत्य को।
- 1:03:20जान लिया मैं हूँ कौन? लेकिन योगी भक्त नहीं हुआ।
- 1:03:25भक्त ने तो अपने सब दाव पे लगा दिया भक्त का कुछ नहीं बचा, बाकी
- 1:03:32न मैं रहूं, न मेरी आरजू रहे, मेरी आरजू भी कुछ न रहे।
- 1:03:44जो भी रहे। बस तू ही रहे।
- 1:03:49बाकी न मैं। रहूँ न मेरी आरजू रहे।
- 1:03:54मैं खो जाऊं मेरा अस्तित्व मिट। जाए।
- 1:03:58मैं न बच्चों। पहले ऐसी भावना करनी।
- 1:04:02होगी तुम तो मृत्यु से डरते हो तुम तो।
- 1:04:06मौत से ही डरते हो? और व्रत कहता है।
- 1:04:11के। मुझे तो मौत दे दे तू रह जा मुझे।
- 1:04:18मिटा दे। उस परवाने की तरह तुम्हें हिम्मत
- 1:04:22जुटानी होगी जो जानता है क्षमा के भीतर घुस के मेरा वजूद न बचेगा
- 1:04:30अगर इतना। साहस है तो भक्ति के।
- 1:04:32मार्ग पे चलना। तुमने पूछा भक्ति का मार्ग?
- 1:04:36विस्तार से बता दो बता दिया। बुद्ध और महावीर की बात आपको समझ
- 1:04:42में आ गई? बुद्ध महात्मा क्योंकि खुद को जान
- 1:04:45लिया बंदर से मुक्त हो गए निवृत्त हो गए बंधनों।
- 1:04:52से निवृत्त हो गए। और महावीर भगवान हो गए उसे आगे
- 1:04:56चले। विराट तक उनका अस्तित्व हो गया
- 1:05:02ये। दोनों का फर्क और फिर।
- 1:05:04भक्ति क्या है? भक्ति है अपने आप का मिट जाना।
- 1:05:11बोध सुन्दर में सम जाती। है भक्ति का अंतिम।
- 1:05:17लक्ष्य यह है भक्त अंत में खुद नहीं रहता केवल रह जाता है एक।
- 1:05:27उस एक को भक्त कह। लो उसको भगवान कर लो, दोनों एक ही
- 1:05:32बात है। मन डोला।
- 1:05:35देओ मेरो राम। फकीर?
- 1:05:46में। फकीरी मैं मंड़ लाग्यो मिरो राम।
- 1:06:01जो सुख। पाए राम?
- 1:06:07भजन में जो सुख पा राम भजन में वो सुख नाम।
- 1:06:25अमीरी में मंडोला गयो मेरा फकीरी में, फकीरी में।
- 1:06:43मन्नड़ लाग्यो मेरो राम कहत कबीर सुनो भाई साधु कहत कबीर।
- 1:07:02सुनो भाई साधु कहत कबीर सुनो भाई साधु साहेब मिलही।
- 1:07:21सबूरी में मन्नड़ लागो मेरो राम फकीरी में फकीरी में।
- 1:07:38मन डु लाग्यो मेरे हो रहा। हो।
- 1:07:56धन्यवाद।