Latest / Baba ji Vijay Vats / 12 Jun 25 - मन कैसे शांत होगा? तुम अब तक भीतर क्यों नहीं उतर पाए! जानिए क्या है असली कारण? Must Listen
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- 0:00डॉक्टर सार्स प्रेम, जापान से बाबाजी परम गीता के कृष्ण उपनिषित
- 0:19के यज्ञ बल के। अप दीपा भव के बुद्ध और अष्टांग
- 0:29योग के प्रणेता पतंजलि इन चारों में क्या फर्क है?
- 0:45गीता के श्री कृष्ण उपनिषद के यज्ञावालिका अब प्रदीप और भव के
- 0:55बुद्ध और अष्टांग योग। यमनियम, आसन, प्राणायाम,
- 1:02प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि इनके प्रणेता पतंजलि इन चारों में
- 1:13क्या फर्क है? फल के रूप में कुछ फर्क है फल के
- 1:25रूप में कुछ फर्क है, मार्ग के रूप में बहुत फर्क है।
- 1:35संत की परभाषा क्या है? भगवान की प्रभाषक जो तुमको दुख से
- 1:45मुक्ति दिलाते हैं, वह संत, वह भगवान, वह अवतार, वह पैगंबर, वह
- 1:55गुरु। जो तुमको दुख से मुक्ति दिला दे
- 2:03वह गुरु, वह परमात्मा और जो तुमसे तुम्हारा सुख छीन ले, तुम्हे दुखी
- 2:14कर दे। वह दुष्ट, वह शैतान इन चारों का
- 2:25फल एक है कृष्ण और। पतंजलि हों, बुद्ध हों या गवल को
- 2:38हों, ये तुम्हें आनंद देते हैं। इनका लक्ष्य है तुम्हें सुखी
- 2:46करना, तुम्हें आनंद देना, तुम्हें उस रस का पान करवाना।
- 2:55जिससे तुम अभी तक चूके रहे, यह तो है इनकी समानता चारों ही तुम्हें
- 3:03आनंद देना चाहते हैं और इस चार ही नहीं अनंत आनंद।
- 3:13संत कबीर हों, नानक हों, धातु हों, हजरत हों ईसा जो तुम्हें सुख
- 3:26देना चाहता है, जो तुम्हें प्रेम से लबा लब भर देना चाहता है।
- 3:37क्यों तुम्हें उस रास्ते पे उस मंजिल पे ले जाता है जहाँ बहार है
- 3:44जहाँ फूल खिलें हैं जहाँ गुलशन आ चुका है बहार में।
- 3:56और दृष्टिकोण जो तुमसे तुम्हारा चयन चिन्ह वह दुष्ट वह व्यक्ति
- 4:08राजनीतिक है या गैर राजनीतिक है धार्मिक है।
- 4:17इससे कोई भेद नहीं होता। संसारिक है कि राजनीतिक है कि
- 4:22धार्मिक है, जो तुम्हें दुख देता है, बंधन देता है, वह दुष्ट
- 4:32तुम्हें भटकाता है। जो तुम्हें सुख देने की चेष्टा
- 4:37करता है, सुख में डुबो देता है, रस से परिपूर्ण कर देता है, वह
- 4:46संत वह भगवान फल के रूप में देखें।
- 4:54तो इन चार नहीं 400 हो 4000 हो 4,00,000 हो जो तुम्हें सुख देता
- 5:01है वह संत, वह भगवान तुमने पूछा पुत्र?
- 5:14इनमें क्या फर्क है? इनमें कोई फर्क नहीं फल के रूप
- 5:20में कोई फर्क नहीं, लेकिन बीज से फल तक आने की यात्रा में फर्क है
- 5:28मार्ग का फर्क है। कैसे बीज फल में परिवर्तित हुआ,
- 5:37कैसे यात्रा शुरू की और मुकाम तक पहुंचा, इसमें फर्क है।
- 5:46पाथ में फर्क है, रास्ते में फर्क है।
- 5:52मंजिल में कोई फर्क नहीं मंजिल तो सभी संत कहते हैं जो तुम्हें आनंद
- 5:59दिलाते हैं, सुख और चैन में डुबोते हैं, वह संत है।
- 6:09जो तुम्हें अच्छे बलों को भटका दे, ईशा दे दे, वैश दे दे, नफरत
- 6:16फैला दे, आगजनी करते, बेड़िया दे दे बाँध दे, वह असंत है वह शैतान।
- 6:32कृष्ण तुम्हें रस से वेबोर कर देते, बुध तुम्हें शांत कर देते।
- 6:48पतंजलि तुम्हारे दुखों का समाधान कर देते है और यज्ञ बालिका
- 6:57रसोवैसा तुम्हें रसम में डुबो देते है।
- 7:03तुम गदगद हो जाते हो भीतर से तुम चारों का अर्क क्या है चारों का
- 7:12फल तो मैंने बता दिया फल के रूप में चारों एक चारों का माटों एक
- 7:20चारों का लक्ष्य। मानव को दुख से निवृत्ति कैसे
- 7:25देनी है और हज़ारों लाखों उन सभी का यही लक्ष्य था।
- 7:33यही था लेकिन मार्ग सबके अलग अलग थे।
- 7:44लैप्स्य का मार्ग अलग है। कृष्ण का अलग है अष्टावक्र कालक
- 7:53बुध कालक अब ध्यान से समझना। अगर तो तुमने शब्दों की भाषा को
- 8:06पकड़ लिया तो तुमने मार्गो की भाषा को पकड़ लिया तो चीजें बताई
- 8:16मैंने ध्यान से समझना। मार्ग और फल अगर तुमने मार्ग को
- 8:23पकड़ लिया तो तुम दुखी हो जाओगे, क्योंकि कृष्ण कुछ कहते हैं,
- 8:36बुद्ध कुछ कहते हैं। यज्ञ बल कुछ कहते हैं।
- 8:45पतंजलि कुछ कहते हैं, बुद्ध उपनिषद को नहीं मानते, बुध कहते
- 8:54नहीं कोई परमात्मा नहीं। या गबल के कहते हैं परमात्मा है,
- 9:04अगर तुमने इन शब्दों को पकड़ लिया तो तुम बोले जाओगे फिर तुम बाद
- 9:10में बात करोगे। फिर तुम कमेंट करोगे, टिक का टिप
- 9:16नहीं करोगे, तुम्हारा भी कोई कसूर नहीं है क्योंकि तुम्हें समाधान
- 9:23नहीं मिला, समाधान नहीं मिला तो तुम्हारा मन शांत और अशांत मन
- 9:32प्रश्न ही पैदा करेगा। अशांत मन प्रश्नों के सिवा और कुछ
- 9:37पैदा नहीं करता। प्रश्न दुख का कारण है, शांत मन
- 9:46प्रश्न नहीं खड़ा करेगा, क्योंकि शांत मन में कोई तरंग नहीं होती।
- 9:50मौन जेल। अशांत मन समुद्र की तरह लहरें
- 9:56खाता है, भटकता है, तड़कता है, उछलकूद मचाता है, मौन झील ठहरी
- 10:05हुई होती है, उसमें कोई लहर नहीं उठती।
- 10:11अगर तुम संतों को भगवान को किसी प्रकार के पीर, फकीर इनके शब्दों
- 10:25को सुनने लग जाओगे। तो महावीर कहते हैं कि तुम सम्यक
- 10:31श्रवक नहीं हुए, तुमने शब्दों को सुना और शब्द सबके अलग अलग हैं।
- 10:40यहाँ तक के विपरीत भी हैं, विरोधी भी हैं जो पतंजलि।
- 10:49जो यज्ञ बल कहेंगे वो बुध नहीं कहेंगे, जो कृष्ण कहेंगे वो यज्ञ
- 10:56बल कहेंगे और जो बुध कहेंगे वो पतंजलि नहीं कहेंगे तो गड़बड़
- 11:05घोटाला हो जाएगा। लेकिन जो संत बोलता है वो मार्गों
- 11:13को ध्यान में नहीं रखता, वो परिणाम को ध्यान में रखता है।
- 11:20अब आप इसको बहुत गहरे से समझना जो संत बोलता है।
- 11:27जो मास्टर बोलता है वह मार्गों को नहीं देखता, रास्तों की
- 11:35विभिन्नताओ को नहीं देखता, रास्तों के विरुद्धों को नहीं
- 11:39देखता के ये विरोधी रास्ते हैं। मैं कैसे बोलूं नहीं उसकी
- 11:46प्रत्येक बुद्धि। सॉल्व हो गई वह देखता है फल को
- 11:54यज्ञ बल्कि जहाँ पहुँचते हैं, कृष्ण वहाँ पहुँच जाते हैं।
- 11:57बुध भी वहाँ पहुँच चूके हैं, पतंजलि भी वहाँ पहुँच जाते हैं।
- 12:03कहाँ पहुँच जाते हैं चारो? जहाँ तुम रस रोप हो जाते हो जहाँ
- 12:10तुम मन हो जाते हो इन सभी का लक्ष्य है तुम्हारे मन को मन कर
- 12:19देना। मन को मौन करते और जब तुम्हारा मन
- 12:30मौन हो जाएगा तुम पाओगे उस घड़ी में तुम वर्तमान में ठहर गए तुम
- 12:40देखना। जब भी तुम्हें कभी एक पल के लिए
- 12:45संतुष्टि की झलक मिली हो, तृप्ति गहराई होगी।
- 12:51भीतर उस क्षण तुम पाओगे मन विलीन हो गया मन नहीं है जब तुम तड़पोगे
- 13:00वर्धकोगे इधर उधर। तलाशो के उस रस को तब तुम अशांत
- 13:08होगे तुम तुम देखोगे मन है ऐसे ही व्यक्ति मुझे प्रश्न करते हैं
- 13:14बाबा मन बड़ा परेशान करता है, मन भटकाता है, मन दुखी रखता है।
- 13:26तुम्हारे मन को मौन में ले जाना ही साधना है।
- 13:31मार्ग जय कोई भी हो फिर से समझना बड़ा महत्वपूर्ण क्वेश्चन
- 13:40तुम्हारे मन को। मौन में ले जाना ही साधना है और
- 13:47जीस रास्ते से तुम्हारा मन मौन हो जाए वो ही।
- 14:00पथ है, वही रास्ता है वही वे है तो लक्ष्य क्या है?
- 14:07मन को मन करना क्या होता है जब मन मोहन होता है, जब मन मोहन होता है
- 14:17तुम ठहर जाते हो? तुम्हें वास्तविकता नजर आती है।
- 14:25तुम कभी देखना चलते हुए पंखे की तरफ चलते हुए पंखे की तरफ जब तुम
- 14:34देखोगे। तो तुम्हें सब कुछ घूमता हुआ नजर
- 14:42आएगा पंखे में और पंखे से पार जो ऊपर छत पे है वो हूबहू तुम लिखा
- 14:50हुआ पढ़ सकता है। पंखा पूरी स्पीड से चल रहा है।
- 14:57ऊपर छत पे कुछ लिखा हुआ है तुम आराम से पढ़ सकते हो और जब पंखा
- 15:10ठहर गया, पंखा घूम नहीं रहा तो छत के ऊपर जो चीज़ लिखी है।
- 15:19वो जो उस पंखे के घेरे में आ गई वो तुम्हें नहीं दिखेगी।
- 15:24उसको तुम पढ़ नहीं सकोगे। ये क्या हुआ वही पंखा है, वही
- 15:34पंखा है जो पहले घूम रहा था। तो छत पे लिखा हुआ तुम सब पढ़ रहे
- 15:40थे और वही पंखा है जो ठहर गया और उन ठोस परों के नीचे जो शब्द आ
- 15:49जाते हैं उन्हें तो हम नहीं पढ़ सकते क्या हो गया जब पंखा घूम रहा
- 15:56था। तो तुम्हें इल्यूज़न हो गया था इस
- 16:02इल्यूज़न के कारण तुम छत पर क्या लिखा हुआ है इसे पढ़ नहीं सकते
- 16:07थे, यह एक इल्यूज़न था एक भ्रम था जब पंखा घूम रहा था।
- 16:15तो छत पे लिखा हुआ तुम पढ़ सकते थे और जब पंखा ठहर गया तो छत पे
- 16:20लिखा हुआ तुम पूर्ण रूप से नहीं पढ़ सकते ऐसा ही मन है।
- 16:25जब मन दौड़ता है, घूमता है तो तुम्हें सत्य की झलक नहीं मिलती
- 16:31है वह जो तुम्हें दिखता है। वह असत्य है, घूमता हुआ मन उसमें
- 16:39तुम जो भी देखते हो, वह असत्य होता है और ठहरा हुआ मन या पंखा
- 16:48वह तुम जो देखते हो वो सत्य है। फिर तुम बिल्कुल जो छत पे लिखा
- 16:56हुआ पंखे की आड़ में आ जाएगा, वो तुम नहीं पढ़ सकोगे और जब मन
- 17:03चलेगा तो छत पे लिखा हुआ तुम मज़े से पढ़ पाओगे वही पंखा है सिर्फ
- 17:11उसने गति पकड़ ली है। ऐसे ही तुम्हारा मन जब ठहर जाता
- 17:16है वर्तमान में पंखे की तरह तो तुम्हें सत्य का आभास होता है
- 17:24कहाँ छत पे लिखा हुआ है कहाँ छत पे नहीं लिखा हुआ है?
- 17:33जब मन घूमता है, वह तुम्हें गलत दर्शन करवाता है।
- 17:43जहाँ लिखा हुआ है पंखे के घूमने के कारण वह भी दिखता है जहाँ लिखा
- 17:50हुआ नजर नहीं आता, वह भी दिखता है।
- 17:54तो घूमने के कारण असत्य दर्शन होता है और ठहरने के कारण सत्य
- 17:59दर्शन होता है। इन चारों में कोई फर्क नहीं है।
- 18:03अगर फल को देखा जाए फल चारों का एक है।
- 18:07चारों ही तुम्हें दुःख से निवृत्त करना चाहते हैं।
- 18:11यही पतंजलि कहते हैं योगा शित व्रती नरोदा के वृत्तियों का
- 18:17निरोध करो। अगर योग करना चाहते हो तो
- 18:24परमात्मा से मिलन चाहते हो तो यही कृष्ण कहते है मेरी शरण में आ
- 18:30जाओ। अगर तू सुख चाहता है माम एकम
- 18:37शरणम् वृक्ष यही बुध कहते हैं अप दीपो भव अगर सुखी होना चाहता है
- 18:46अपना स्वयं खोज लें। अपना दीपक स्वयं बन अपना स्वयं तू
- 18:52खुद खोज ले, अपने भीतर जाना पड़ेगा तो मैं खो दो, यही जाग्यो
- 18:59बल का कहते हैं, उसको रस को पी लेना ही सकते है।
- 19:06संसार के रस को पी लेना सत्य नहीं संसार तिक है, संसार कड़वा है,
- 19:16चारों की भाषा अलग है, मार्ग भी अलग है।
- 19:21ये मत देखना जिसने मार्ग देखा वो लग जाएगा।
- 19:26ये जो इतने प्रश्न आज लोग उठाते हैं या ये जो प्रश्न दे दे के चले
- 19:32गए बेचारे और तुम्हारा आज तक का हल नहीं हुआ।
- 19:38ये सिर्फ इसलिए हल नहीं हुआ की तुम्हारा मन ठहरन।
- 19:45ठहरा हुआ मन सत्य का दर्शन करता है इसलिए तुम अब तक असत्य का
- 19:51दर्शन कर रहे हो और असति का दर्शन दुख देता है।
- 19:58सत्य का दर्शन तुम्हें सुखी करता है।
- 20:02तो ये चारों तुम्हें सत्य का दर्शन कराते हैं और तुम्हें सुख
- 20:07देते हैं। इसलिए इनका रास्ता कोई भी हो,
- 20:12रास्तों को भूल जाना मंजिल एक है, मंजिल है तुम्हारे दुखों को हरण
- 20:19करना। तुम्हारे कष्टों का निवारण करना,
- 20:23तुम्हारे मन के विचारों का समाधान करना, तुम्हें निर्वाण में ले
- 20:33जाना, तुम्हें दुखों से निवृत्त करना।
- 20:38फल के रूप में समान है, चार फल के रूप में सभी संत सुनाई फल के रूप
- 20:50में अगर देखोगे तो कोई इनमें फर्क नजर नहीं आएगा मार्गों के रूप में
- 20:57देखोगे। तो फर्क ही फर्क नजर आएगा।
- 21:01सर विरोधी लगेंगे। कृष्ण वहाँ पहुंचाते हैं जहाँ
- 21:06महावीर पहुंचाते थे, लेकिन कृष्ण के शब्द महावीर के शब्दों से
- 21:12बिलकुल गबरे थे और जिसने कृष्ण को सुना।
- 21:20हमारे तो ग्रंथों में लिख दिया, क्या अगर तुम किसी ऐसी गुफा में
- 21:28से गुजर रहे हो, जिसमें कोई पागल हाथी आ रहा है?
- 21:32मस्त हाथी और इतनी संकीर्ण है वो? गुफा उसमें हाथी ही चल सकता है।
- 21:44रगड़ रगड़ के जलता है हाथी और तुम भी आ रहे हो तो हमारे शास्त्रों
- 21:55में लिखा हिंदू शास्त्रों में। कि तुम हाथी के पांव तले आ जाना,
- 22:02कुचले जाना लेकिन अगर रास्ते पे कोई मार्ग निकल न हो और वह मार्ग
- 22:09जा रहा हो, स्थानक की तरफ महावीर के स्थान की तरफ तो उसमें मचन।
- 22:17और ऐसा ही जैन शास्त्र अमेरिका हाथी आ रहा हो, रास्ते में कोई
- 22:25मंदिर हो, कोई रास्ता जाता हो, कोई झरोखा खिड़के का खुलता हो।
- 22:33दरवाजा निकलता हो वहाँ से मत निकलना।
- 22:35अगर सामने कोई अंदर है तो इतने विपरीत शब्द हैं।
- 22:48इतने विपरीत शब्द होने के बावजूद फल एक।
- 22:54फल है तुम्हें सुख कैसे मिले फल है तुम बेचैनी से मुक्त कैसे हो
- 23:00जाओ दुखों से मुक्त कैसे हो जाओ तुम्हारी दुखों से निवृत्ति कैसे
- 23:07हो? निर्वाण कैसे हो?
- 23:10कैसे तुम भीड़ भाड़ के शोरगुल से मुक्त हो के कैवल्य को उपलब्ध हो
- 23:15जाओ केवल हो जाओ एकांत में हो जाओ लक्ष्य सभी का एक लक्ष्य के रूप
- 23:26में अगर देखोगे तो चारों में कहीं भेद न पाओगे।
- 23:32मार्को के रूप में देखोगे तो चारों में भेद ही भेद नजर आएँगे।
- 23:38बस ये जो रास्तों की तरफ देखते हैं यही खंडें उठा लेते हैं, यही
- 23:45तलवारें उठा लेते हैं, यही रक्तपात करते हैं।
- 23:51यही मनुष्य का लघु बिखेरते हैं जो मार्गो को देखते हैं, मार्गो के
- 23:58शब्दों को देखते हैं और रक्तपात करते हैं, हिंसा फैलातें हैं,
- 24:06ईर्ष्या करते हैं, द्वेष करते हैं, आग लगाते हैं।
- 24:11क्योंकि इन्होंने रास्तों को देखा और रास्ते तो विपरीत भाषा बोलेंगे
- 24:20लेकिन रास्ते अलग होते हुए भी विपरीत होते हुए भी विरोधी होते
- 24:24हुए भी मंजिल एक है। और एक मंजिल क्या है?
- 24:31रस सुख निरजरा, निर्वाण निवृत्ति कैवल्य इस मन के भीड़ से अकेले
- 24:44चले जाओ। महावीर कहते हैं।
- 24:47मन भीड़ है, मन शोर है, मन एक समूह है, मन एक कमीन है, इससे
- 24:59चुपके से खिसके जाओ, एक तरफ कमीन से अलग हो जाओ, मन मैराथन की दौड़
- 25:06दौड़ रहा है। तुम उसके संग में चलो मन को
- 25:11दौड़ने दो औरों को दौड़ने दो तुम उस भीड़ में से चुपचाप अकेले बाहर
- 25:18निकल जाओ, तुम शांत हो जाओ, तुम्हें आनंद मिल जाएगा।
- 25:28चार संत हो 4000 संत हो फल के रूप में एक है केंद्र एक है राष्ट्र
- 25:39सभी का अलग है पर अब तो महत्वपूर्ण बात में तुम्हें समझा
- 25:45दू। कि जिन्होंने मार्गों को देखा
- 25:50उन्होंने तलवारें निकाली। उन्होंने अपने अपने अस्त्र शस्त्र
- 25:56तीखे कर वो लड़े क्योंकि वो वृद्ध है।
- 26:02शब्द सब के विपरीत थे। भिन्न भिन्न थे, अलगाव था,
- 26:08शब्दवेद था और यह भी ध्यान रखना कि शिष्य सदा मूड होता है।
- 26:20जब तक व्यक्ति गंतव्य को प्राप्त नहीं होता वह मूड होता है।
- 26:29समझदार कब होता है जब गंतव्य तक पहुँच जाता है?
- 26:35कबीर ने कहा, सभ्य सयान एक मत जब भी कोई सयाना हो गया, किसी भी
- 26:42मार्ग से चलकर सयाना हुआ। स्याने का मतलब दुख से मुक्त हुआ,
- 26:49दाँध से मुक्त हुआ, भीड़ से एकांत में आया वृत्तियों से निवृत्त हुआ
- 26:58निवृत्त व्रतियों के बिना निवृत्त कहते हैं उसको।
- 27:10सभ्यस्यने एकमत जब कोई सुखी हो गया वह एकमत हो गया और जिसने
- 27:21मार्गों को चुना शब्दों को चुना, वह शांत नहीं होगा।
- 27:28और वह सुखी भी नहीं होता और दुखी व्यक्ति रक्तपात करता है, उत्पात
- 27:35में जाता है, जीतने उत्पात तुम देखोगे, जीतने देहादी तुम देखोगे।
- 27:45जीतने लड़ाई झगड़े वाले कोई भी अनसरतत्व तुम देखोगे, एक बात को
- 27:51ध्यान में रख लेना सभी दुखी हैं। दुखी व्यक्ति झगड़ा करेगा, दुखी
- 27:58व्यक्ति ही प्रश्न पूछेगा, दुखी व्यक्ति ही तर्क करेगा।
- 28:05दुखी व्यक्ति ही शास्त्रार्थ करेगा इसलिए मैंने शंकर को नकारा
- 28:15या तो वो शास्त्रार्थ न करते हैं तो वो सुखी थे लेकिन वो तो
- 28:20शास्त्रार्थ करने के लिए मोहरे पाल रहा है ढूंढ रहा है।
- 28:25आओ कोई शस्त्रार्थ करो उस पहलवान की तरह उसने झंडी उठा ली आओ
- 28:32शस्त्रार्थ करो और मेरी दृष्टि में सुखी व्यक्ति की यह पहचान
- 28:37नहीं थी, सुखी व्यक्ति, वह जो ठहर गया।
- 28:45शास्त्रार्थ क्यों करेगा? वो भटका हुआ मानव शास्त्रार्थ
- 28:50करेगा, जो दुखी है वह शास्त्रार्थ करेगा।
- 28:57अगर शंकर शास्त्रार्थ करने निकलते हैं तो उनके सुख के।
- 29:05उनके सुख के फल के ऊपर प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है।
- 29:13वह सुखी नहीं है, वह दुखी है, दुखी व्यक्ति ही प्रश्न उठायेगा
- 29:19और दुखी व्यक्ति ही। शास्त्र करेगा, जीतने की अंकाक्षा
- 29:24करेगा जो जीत ही गया, जिसने अपने आप को जीत लिया, मन जीते जग जीत,
- 29:34वह शास्त्र क्यों करेगा, वह क्यों पौथ ही उठाएगा?
- 29:40वह अपने आप को उत्कृष्ट साबित करने की घोषणा क्यों करेगी?
- 29:45कहीं कोई कसर बाकी है? यहाँ शक पड़ा मुझे इसने झंडी को
- 29:52उठा रखा है जीसको पता चल गया सब कहीं वही है।
- 29:59जिससे मैं शास्त्रार्थ करूँगा, वह भी वही है और जो शास्त्रार्थ
- 30:05करेगा वह मैं भी वही है तो किस्से शास्त्रार्थ करूँ।
- 30:11किसकी बावत करूँ और कौन करे, यह मूर्खता के निशान है।
- 30:20इसलिए मैंने शंकर को नकार दिया। लक्षणों के बल पर एक ही तो लक्षण
- 30:29था तुम ठहर जाते, वो ही तुमने गंवा दिया।
- 30:35तुम ठहरे नहीं इसका मतलब? अभी तुम जीतने की आकांक्षा रखते
- 30:39हो अष्टावकर जीतने की आकांक्षा नहीं रखते अष्टावकर कहते हैं कि
- 30:47मैं समझा तो सकता हूँ तुम्हें जहाँ तक संभव है जीतने की मेरी
- 30:52कोई अंकाक्षण जीतने की मेरी कोई अपेक्षण।
- 30:57कहो तो बदला देता हूँ जनक मैं रास्ता वह मार्ग तुम्हारा बोलता
- 31:06हुआ चित तुम्हारा, शोर मचाता हुआ चित मौन हो जाए, ठहर जाए
- 31:15निर्द्वंध हो जाए। निवृत्त हो जाए बिना व्रतियों के
- 31:25तो चारों में कोई फेर नहीं और चारों तुमने बड़े बाप का माल
- 31:30चुने। चारों के रास्ते अलग अलग है।
- 31:41बड़े चुन चुन कर तुम्हें पात्र खोज, लेकिन चारों तुम्हें केंद्र
- 31:52पर ले जाते हैं सब है सयाने एक मत।
- 31:58जो केंद्र पे पहुँच गया वह सयाना हो गया और जो सयाना हो गया उसका
- 32:03मत समान हो गया। आगे दूसरा शब्द भी बोलते हैं कबीर
- 32:08मूर्ख अपनों अपने बस कबीर का कुल मत बीतना है।
- 32:16जो मार्गों के शब्दों को चुन लेगा वह विष फैलाएगा, इच्छा फैलाएगा,
- 32:24द्वेष फैलाएगा, नफरत फैलाएगा, मारकाट करेगा, लघु बिखेरेगा,
- 32:29शस्त्र उठायेगा, शस्त्रों की धार को टीका करेगा।
- 32:34क्योंकि उसने शब्दों को पकड़ लिया अब एक बात और ध्यान में रखें,
- 32:41शब्द को पकड़ने का रोग है, और शब्द से छुटकारा स्वास्थ्य जिसने
- 32:51शब्दों से छुटकारा पाया। यद्यपि मुश्किल बहुत है, वह सवस्थ
- 32:57हुआ, वह स्वयं में स्थित हुआ क्योंकि जीस स्वयं में सिद्ध हुआ
- 33:03जाता है वह कोई शब्द नहीं है वह मस्ती है, स्वरूप है, आनंद है,
- 33:09खुमारी है, प्रेम है। शांति कोई शब्द नहीं किसने शब्दों
- 33:20को पकड़ा वह शब्द द्वेष फैलाएगा ऐसा फैलाएगा लोगों के गले काटेगा
- 33:28लोगों के खेल। और जिसने शब्दों को नहीं पकड़ा
- 33:35नहीं, शब्द में उतर गया, वह शब्दों से पार हो गया, शब्द तीर्थ
- 33:42हो गया, वह अपने आप में आ गया, सवस्थ हो गया स्वस्तित हो गया।
- 33:50और जो स्वस्थित हो गया मेहमान हो गया अपेक्षा दूर अपने हृदय की
- 34:02डायरियों में नोट कर ले। जो स्वे स्थित हो गया यानी स्तिथि
- 34:10प्रज्ञा जिसे कृष्ण कहते हैं अपनी प्रज्ञा में स्थित हो गया जो ठहर
- 34:15गया पहले तुम ठहरोगे बुद्धि के तल पे रिलैक्स यूरसेल्फ़।
- 34:31अपने आप को छोड़ दो, ये मुश्किल बहुत है क्योंकि तुम्हारा मन
- 34:39कहेगा अभी तो पैसा कम है। लड़की की शादी करनी बेटा भयाना।
- 34:46अभी पोता भी बड़ा हो चला है। अभी ये करना अभी वो करना संसार
- 34:55में बहुत से काम है, जीवन बीत जाता है, संसार के काम नहीं बीतते
- 35:01है। छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए
- 35:16ये मुनासिब नहीं आजम के लिए। छोड़ दे सारी दुनिया किसी के ये
- 35:34मुनासिब नहीं आदमी के लिए। प्यार से भी जरूरी कई काम हैं
- 35:51प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए प्यार से।
- 36:02जी जरूर होरी कई काम हैं प्यार सब कुछ नहीं, ज़िन्दगी के लिए छोड़
- 36:18दे सारी दुनिया। किसी के लिए मन यही करेगा।
- 36:27कैसे छोड़ दू? अभी बहुत से काम धाम हैं, जो आनंद
- 36:36से ज्यादा जरूरी है। प्यार से भी जरूरी।
- 36:42बहुत काम है प्यार सब कुछ नहीं ज़िन्दगी के लिए अभी बेटा पे आना
- 36:50है अभी बेटी पे आना है अभी काम धाम और करना है अभी तो पोता जवान
- 37:00हो चुका है। अभी ये करना अभी वो करना अभी तो
- 37:07धर्मपत्नी बीमार है, उसका इलाज कराना है तुम्हारा मन 1000 प्रश्न
- 37:15पैदा करेगा 1000 संकट तुम्हे याद कराएगा।
- 37:211000 कर्तव्य तुम्हें याद कराएगा देखिए इस वक्त भागने का वक्त नहीं
- 37:26है यह आपातकालीन वेला इस वक्त तुम्हारा यहाँ से जाना ठीक है,
- 37:37अभी बने रहो। अभी तुम्हारी जरूरत है मन बड़े
- 37:43उपद्रव खड़े करेगा। उस उपद्रव काल में से संसार के
- 37:53सभी कर्तव्य कर्म करता हुआ। तुम कैसे मूक हो जाओ कैसे मान हो
- 38:02जाओ यही रास्ता तुम्हें बताता हूँ, संसार के काम धाम करते रहो,
- 38:12संसार के सभी कर्तव्य निर्वाहण करते रहो।
- 38:1824 घंटे के लिए कोई भी इन्वेस्ट नहीं करता।
- 38:28अपने आपको प्रत्येक व्यक्ति के पास खाली वक्त आता है।
- 38:36ये तुम्हारे मन के बहाने अभी ठहरू अभी उम्र नहीं हुई।
- 38:43अभी क्या कोई वेला है, परमात्मा को सुमर्ण करने का?
- 38:50नहीं अभी बहुत काम है। प्रत्येक व्यक्ति के पास बहुत
- 38:56वक्त है और मैं उन्हीं लोगों को जो कहते हैं कि वेला नहीं है,
- 39:02वक्त नहीं। मैं उन्हें ताश खेलते हुए देखता
- 39:07हूँ, ताश पीटते हुए देखता हूँ ये ले भेजी आ गई, ये ले इक्का आ गया,
- 39:14आ उठा बादशाह मैंने खुद देखा है जो कहते वक्त नहीं है।
- 39:22ताश खेलने के लिए वक्त है, वही लोग मूवी में बैठे होते हैं, मन
- 39:28परचवा करते हैं, मन बहलावा करते हैं और इनके पास वक्त नहीं है, मन
- 39:38बहाने बाज है। मन 1000 तरह के बहाने करेगा।
- 39:43क्योंकि मन ठहरना नहीं चाहता और अदर मन ठहर जाए तो ठहरा हुआ मन
- 39:59अपने भीतर उतरना शुरू हो जाता है। ठहरा हुआ मन भीतर उतरेगा।
- 40:09यह लाजमी में है। मन या तो घूमता रहेगा, घूमता हुआ
- 40:16मन में सिंचाई नहीं देखने दे। जब ठहर जाएगा तो तुम्हे सत्य
- 40:22दर्शन होगा, जब मन ठहर जाएगा तो ठहरा हुआ मन नीचे उतरेगा धीरे
- 40:29धीरे धीरे धीरे धीरे रोज़ तल बदलते हो तुम अगर ठहर जाओ तो।
- 40:41ठहरा हुआ मन अपने भीतर अंतर्मुखी हो के अपने अंतःस की यात्रा शुरू
- 40:47करेगा। बहरी यात्रा बहुत कर रही है।
- 40:53संसार की यात्रा बहुत कर रही है। सदा ही उलझ रहे कामधाम में मिला
- 41:04कुछ नहीं जो मिला वो आखिर में पाया के मरती हो गया समझता हीरा
- 41:12जवाहरात निकले कंच के बंटे। समझे ते हीरे जो रात निकले मिट्टी
- 41:22के ढैले आखिर में सब बेकार हो जाता है तो क्या करो ठहर जाओ,
- 41:35पहले बुद्धि को ठहरो। बुद्धि बहुत कुछ कह बुद्धि से
- 41:43निकला हुआ मन बुद्धि की पैदाइश मन तुम्हें कहेगा अभी मैंने बहुत कुछ
- 41:48करना है दुकान के ऊपर कोई भी नहीं कोई पशु आ जाएगा अस्त व्यस्त हो
- 41:55जाएगा सारा कुछ। मैं तो खान ना खाने आया था।
- 42:00मेरे पास वक्त कम है और वक्त सभी के पास होता है।
- 42:08ये सब वक्त नहीं है के कहने वालों को मैंने वक्त को गुजारते हुए
- 42:13देखा है। क्या कर रहे हो वक्त गुजार रहा
- 42:16हूँ? दोनों को धक्के दे रहा हूँ।
- 42:20ये वही लोग हैं जिनके पास वक्त नहीं है, वक्त सभी के पास है
- 42:29लेकिन तुम वक्त को निकालते क्यों हो?
- 42:33तुम एम्प्टी क्यों नहीं होते? तुम अवस्त क्यों नहीं होते?
- 42:41क्योंकि अगर तुम अवस्त हो गए, नॉन बीज़ीनेस में आ गए तो तुम भीतर
- 42:47उतरना शुरू हो जाओगे। अंतर यात्रा शुरू हो जाएगी।
- 42:52और अंतर यात्रा शुरू हो जाएगी। तुम्हें तकलीफ क्या है?
- 42:55अंतर यात्रा करने में अभी से सुन लो तुम क्यों नहीं उतरते बेहतर
- 43:03क्योंकि भीतर तुम्हें मिलेगा सभी प्रकार के विकार सभी विषय।
- 43:17एक तो मैं सुंदर बात बताऊँ ऋषियों ने बेकारों में काम, क्रोध, लोभ म
- 43:28अंहकार मत ये तो। एक जो अहम चीज़ थी पता नहीं क्यों
- 43:39चुक गए जबकि वो सबसे ज्यादा है तुम्हारे भीतर तुम क्यों डरते हो
- 43:48भीतर जाने से अगर कोई गाहे बगाहे भीतर चला भी जाए।
- 43:55तुम रोज़ कहते हो बाबा सिर पे हाथ रख दो ना हम थोड़ा सा आसानी से
- 44:05भीतर उतर जाएंगे तो सुनिए मेरी बात बेकार बता दिए।
- 44:17तुम्हारे रिश्यों ने तुम्हारे मार्गदर्शकों ने एक तो चूके विचार
- 44:23नहीं बताये, सब्जेक्ट नहीं बताये, विषय नहीं बताये बेकार बताती है,
- 44:27विषय नहीं बताये, जबकि विषय सबसे ज्यादा तुम्हें पागल बनाते हैं।
- 44:37विषय कोई केमिस्ट्री पढ़ रहा है, फिजिक्स पढ़ रहा है, मैथ्स पढ़
- 44:42रहा है, साइंस पढ़ रहा है, कोई डेंटिस्ट है, कोई मेडिकल स्टडी कर
- 44:50रहा है, कोई रिसर्च कर रहा है, कोई चंद्रमा की कोई भूगोल
- 44:53शास्त्री? तरह तरह की परमात्मा की बनाई
- 44:57क्रियेशन में तो उलझ जाओ और इन्वेंशन कर रहे हो।
- 45:03मैं नहीं कहता हूँ नहीं छोड़ता। यह विषय है इनको पढ़ो।
- 45:12जब तुम भीतर जाओगे, तुम भीतर जाने से डरते क्यों हो?
- 45:15मेरा प्रश्न ये है क्योंकि भीतर तुम्हें बेकार तो मिलेंगे ही,
- 45:23विषय वही भी रहेंगे, तुम्हारा इकट्ठा किया और सब मिलेगा तुम्हें
- 45:28जो कुछ तुमने सोच नहीं। इकट्ठे की वो सब मिलेंगे इसके
- 45:32अतिरिक्त जो चूक गए, ऋषिकांत क्यों चूके मुझे नहीं पता लेकिन
- 45:40तुम्हें जानकर हैरानी हो कि सबसे ज्यादा तुम्हें वही मिलेगा वो
- 45:45क्या है? भै भै।
- 45:50कोई शस्त्र घृणा तो मुझे जहाँ विकारों में भय लिखा जबकि भय सबसे
- 45:57बड़ा विकार है भय सबसे बड़ा विकार।
- 46:05और इसी भय के कारण अगर गुरु कृपा करता है राम किशन परमहंस नरेंद्र
- 46:12अनाथ के ऊपर तो उसी भय के कारण बाहर छलांग मार के आ जाते हैं।
- 46:17गुरुदेव महाराज मेरे माँ बाप भी हैं।
- 46:26क्योंकि बेहतर जाके उस मिरता क्या है भै मृत्यु का भै तुम सब चीजों
- 46:34को क्रॉस कर सकते हो काम क्रोध, लोह मोह अहंकार।
- 46:42मध, मत्सर इन सभी को तुम क्रॉस कर सकते हो एक चीज़ को तुम क्रॉस
- 46:49करना बड़ा मुश्किल हो जाएगा तुम्हारे लिए वो क्या है भै भै भै
- 46:54मृत्यु का भै इसी भय से कप जाते हैं हम महाबलिशाली।
- 47:01जो सूडोल हुए हैं, 2 घंटे रोज़ वारिश करते हैं।
- 47:06नरेंद्रनाथ बड़े तगड़े तैराक थे। मिलों तक वो तैरते हैं।
- 47:14उनके मसल बड़े सुदृढ़ थे। एक तरह से वो मसलमैन थे।
- 47:23लेकिन वह डर जाते हैं क्योंकि छाती के नाप से व्यक्ति वादत नहीं
- 47:30होता है। ध्यान रख लेना दिल के बड़े होने
- 47:37से व्यक्ति बड़ा होता है। जो मृत्युसिन्ह डरे, वह बहुत
- 47:46महावीर मृत्युसिन्ह डरते, उन्हें महावीर का खिताब मिलता है।
- 47:52नाम उनका वर्द्धमान, लेकिन मृत्यु से जो न डरे बाकी छोड़ दो सबको।
- 48:00बाकी तो सिर्फ साक्षी होने से ही काबू में आ जाएंगे।
- 48:05तुम्हारे विचार और तुम्हारे विकास।
- 48:07अब इन बातों को जो प्रैक्टिकल है इसलिए आराम से सुन लेना, बार बार
- 48:11सुन लेना, रिवाइंड करके सुन लेना। विचार और विकार काम क्रोध, लोह,
- 48:19मोह, अहंकार, मधुमत्सर और विचार तुम्हारी सूचनाएं जो तुमने इकट्ठी
- 48:25कि वो किसी भी विषय के संबंध में कि तो एक तो विकार एक विषय इनको
- 48:32तुम इसिली छोड़ सकते हो। इजली का मतलब मृत्यु से ज्यादा
- 48:39इजली भय से ज्यादा इजली मुश्किल तो यह भी बड़ी घरपेश आएगी तो बहुत
- 48:48से लोग काम में रो जाते हैं। क्या करें मास्टर वेट करना ही
- 48:55पड़ता है। सभी की अपनी अपनी समस्याएं, लेकिन
- 49:01किसी तरह किसी तरह यह बड़ा क्षुद्र मसला है, इसको तुम क्रॉस
- 49:07कर जाओगे। ब्रह्मचर्य होना कोई इतना मुश्किल
- 49:11नहीं है जितना तुम समझ रहे हो। यही ब्रह्मचारी भी है।
- 49:16नरेंद्रनाथ परम ब्रह्मचारी निवेदिता के साथ रहते हैं।
- 49:23एक चारपाई पर सोते हैं, काम नहीं क्या कर सकते और वो ही वो ही
- 49:31नरेन्द्रनाथ। मौत से डर जाते हैं।
- 49:39गाँधी जी पिछले जन्म में ही उस की झलक को पा गए थे।
- 49:47अपने पिछले जीवन काल में नग्न लड़कियों के साथ सोते हैं।
- 49:54ब्रह्म चर खंड इतने बड़े मज़े से सो जाते हैं।
- 50:00नग्न लड़कियों के साथ नहाते नग्न तुम्हें बड़ा भद्दा लगेगा तुम्हें
- 50:06कृष्ण भद्दे नहीं लगता? गाँधी भद्दे।
- 50:13पर बहुत से लोग तर्क दे देते हैं वो तो बच्चे थे, वो तो बच्चे थे
- 50:23तो जब राष्ट्र चाहते थे फिर क्या वो तो बच्चे नहीं थे?
- 50:28नदी वन में गोपियों के साथ राष्ट्र चाहते थे, वो तो बच्चे
- 50:31नहीं थे। 16,100 रानियाँ जो उठाई गई थीं,
- 50:38उनके साथ रहते थे। बच्चे तो नहीं थे, बच्चे पैदा
- 50:41करते थे, तुम चूक जाते हो, हर चीज़ को तर्क में ले लेते हो।
- 50:51गाँधी ने भिखारों को जीत लिया था, विषयों को जीत लिया था।
- 50:56वो न्यूट्रल हो गए थे, हो गया जो कुछ करना था कर दिया मैंने, उसके
- 51:02बाद पटेल कहती है तुम ले लो बाबा मैंने पक्का जान लिया है तुम्हे
- 51:08मार देंगे। गाँधी कहते हैं, सुरक्षा तो मैं
- 51:15नहीं लूँगा अब मैंने और करना भी क्या है जी की और अगर वो नहीं
- 51:25मारेंगे, जो भी मारेगा मुझे। तब तक तो उन्हें पता नहीं था कौन
- 51:30मरेगा तो क्या मृत्यु भी अपने जाल नहीं पाश नहीं फेंक पाएगा, मृत्यु
- 51:39मार देगा और मैंने अब करना भी क्या है जो होना था हो गया।
- 51:48देश अजाज़ हो गया। सभी के सामूहिक प्रयास के कारण जो
- 51:56चिढ़ी थी वो चोंच भर के लेके आई। जो हाथी था वो सोंड भर के लेके
- 52:01आया, जिसके पास से जैसा था उसने वैसा उँढेल दिया।
- 52:07आजादी के संग्राम सीढ़ी चोच के भर के ले गई आग बुझाने के लिए और
- 52:14हाथी सूठ भर के ले गया। बस इतना सा तो काम हुआ लेकिन सबने
- 52:21अपना पूर्ण योगदान दिया। बिशर्ते हो ना आदमियों के?
- 52:25जिन्होंने अपने जीवन को कुर्बान करना डर गए, वह कह गए क्षमा याचना
- 52:33करने लगे, वो डर गए गाँधी जर्या ने।
- 52:40यही उनकी महआत्माओं का संकेत है। और गाँधी ने कबी ने कहा, मुझे
- 52:48महात्मा गाँधी ने कभी नहीं कहा मरने के बाद मेरे नोटों के ऊपर
- 52:54तस्वीर छाप देना तुम मज़े से हटा सकते हो, गाँधी को कोई एतराज नहीं
- 52:59होगा गाँधी ने कबी ने कहा मुझे राष्ट्रपिता का।
- 53:05कभी कहा तुमने अपनी मर्जी से कुछ किया किया, अब मैं तुमको
- 53:12राष्ट्रपिता की उपाधि दे दूं तो कसूर मेरा या तुम्हारा।
- 53:22किसी ने उसको महात्मा कह दिया, हरविंदर नाथ और नहीं तो उसकी
- 53:26जुबान पकड़ ले जाते, अब देखो मैं दान मांगता हूँ, लेकिन मुझे लोग
- 53:36दान दे देते हैं क्या मैं मैं मैं वो दान को चला के मारूं?
- 53:43इससे उनकी श्रद्धा की तो नहीं होगी, उनके आंसू आ जाएंगे।
- 53:48श्रद्धा कितने प्यार से हमने ये तोहफा दिया था थोड़ा सा हमारी
- 53:56सेवा भी इतनी सी स्वीकार कर मैं उनका दिल तोड़ दूँ।
- 54:02मैं ठुकरा दूँ, तोड़ दो उनके शीशे यह सिद्धद नहीं, मैंने मांगा नहीं
- 54:10बस इतना ही बहुत महात्मा गाँधी ने कभी ने कहा मुझे राष्ट्रपिता की
- 54:16उपाधि तो उसने नहीं कहा। मुझे भारत रत्न की उपाधि दो,
- 54:23लेकिन अगर तुम मरने के बाद अब दे ही दोगे तो रोकने के लिए थोड़ी
- 54:28जाएंगे तुम मरनो प्रांत तुम कुछ भी उपाधि कहते हो, तुम महात्मा को
- 54:35तुम दुष्ट को उससे क्या फर्क पड़ता है?
- 54:40तुम उनके बुत्तों में लहू भर के गोली मार दो ये तुम्हारा मसला है
- 54:45भाई और तुम चाहे उनकी कुर्बानियों को याद करके असुर भावो यह भी
- 54:52तुम्हारा मसला है जाने वाला चला क्या?
- 54:57लेकिन उन्होंने मांगा नहीं, बस यही सबूत है और देखिए मांगने की
- 55:04जरूरत भी नहीं थी। देश आजाद हो गया था पर वो अपनी
- 55:09बकरी निर्मला अरे वो निर्मला नहीं भाई।
- 55:13बकरी का नाम निर्मला था। बकरी को सैला रहे थे, मालिश कर
- 55:19रहे थे, नवा थाली के भीतर अकेले अपना लठ लिए पैदा चले थे, कोई
- 55:25नहीं था उनके पास बकरी के मालिश कर रहे थे।
- 55:31और काम भी क्या है? जितना वक्त है ऐसे ही गुज़ारो बीत
- 55:38जाएगी यूँ तू करके काम जो करना था काम तो कोई बचा जो काम बचा वो
- 55:45हमने करना नहीं काम क्या बचा गद्दी संभालना, कुछ तो गद्दी को
- 55:50पाने के लिए जीवन लुटा देते हैं। और उस गद्दी को पाने के लिए
- 55:58राष्ट्र के प्रति जताते हैं कि तुम आभार व्यक्त करो।
- 56:07मैंने देश के लिए प्रमाण कर दिया। और जिन्होंने गद्दी पर वान की
- 56:14उनको राष्ट्रपिता की उपाधि तुम ही दे देते हो, उस पर ऐतराज है।
- 56:24जो भी तुमने गाँधी को दिया उनमें से कुछ भी एक भी चीज़ गाँधी ने
- 56:30मांगी। फिर दोष क्या?
- 56:35गाँधी चाहते तो उनका कोट पैंट बैरिस्ट्री वाला ट्रंक में
- 56:41संभालना पड़ा था, और चाहते कोट पैंट टाई लगाके आके बैठ जाते।
- 56:49माइसेल्फ प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया कैसे रोकते?
- 56:54किसी में शक्ति थी और रोकता बताओ किसी में शक्ति थी, कोई रोकता और
- 57:02अगर वो प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया बन जाते क्योंकि कोई रोक नहीं
- 57:05सकता था। तो नाथूराम गोडसे की क्या को गोली
- 57:09मारता था? उसकी आवाज की खनक तक नहीं पहुँच
- 57:14सकता था। वो इतनी सुरक्षा प्रहरा होता है,
- 57:18इतना ज्यादा होता है, उनका के उनकी हवा तक नहीं व्यक्ति पहुँच
- 57:24सकता। लेकिन बात कुछ और है, तुम समझ कुछ
- 57:31और है। पटेल ने वारिंग दी बाबा तुझे मार
- 57:37देंगे पिता बापू तुम बात सुन लो मेरी।
- 57:43मैं अच्छी तरह से पूर्ण यकीन रखता हूँ तो गाँधी ने मुस्करा के कहा,
- 57:51मैंने और करना भी क्या, अब तो मरना ही है, बाकी तो सब हो गया ना
- 57:57तो मरना ही शेष रह गया ना? तो वह न मारेगा तो मृत्यु तो
- 58:02हमारी है, दे दे और वल्लभ के पास कोई जवाब नहीं है और उनको मार
- 58:10दिया गया, उसी दिन मार दिया गया और उसके बिल्कुल 1 घंटे बाद ही
- 58:13मार दिया गया। एक घंटा भी काम।
- 58:22इतिहास को नहीं जानने वाले व्यक्ति ऐसे ही मूडताएं बखेरा
- 58:28करते हैं। किस लिए गद्दी पाने के लिए किसके
- 58:32ऊपर थूक रहे हो? जिसने गद्दी को त्याग दिया उसके
- 58:38ऊपर थूक रहे हो, गद्दी को पानी के लिए।
- 58:43उसकी लगन फोटो दिखा रहे हो लोगों को क्या दिखाते हो तुम?
- 58:48तुम अपनी वृद्धियों को दिखा रहे हो भाई गाँधी की वृद्धियों को
- 58:53थोड़ी दिखा रहे हो गाँधी की तो ये महानता है।
- 59:02गाँधी गाँधी की महानता है, तुम अपनी मूड़ताओं को दिखा रहे हो,
- 59:11देखो ये नकल स्त्रियों के साथ है, बिल्कुल है उसने इंकार कब किया?
- 59:20लेकिन बात ये नहीं नग्न स्त्रियों को तो कृष्णा भी देखते हैं लेकिन
- 59:29अगर व्यक्ति वेद व्यास और अगर उसके पुत्र।
- 59:40सुखदेव जैसा हो या तो दोनों आदमी एक बार की बात है कि कुछ
- 59:47स्त्रियां स्नान कर रही थीं गोपियां किसी तालाब में उस वक्त
- 59:52ये नहाने के लिए नल नहीं होते थे। घर में जब फौव्वारे नहीं होते थे।
- 1:00:01किसी सरोवर में स्नान कर रहे हैं, वेद व्यास आ रहे हैं।
- 1:00:06सुखदेव के पिता आहट सुनकर एक गोपी का निगा हाँ कोई आ रहा है?
- 1:00:21दूध से देखा, उसने कहा वेद व्यस्त है, अपने शरीरों को डाप लो, गर्दन
- 1:00:30तक ले आओ, पानी को गर्दन तक डाप लो कहानी सुनना फिर उनके अंजाम
- 1:00:37में जाना। वेग व्यास आ रहे हैं।
- 1:00:41अपने आप को ढके चले गए वेग व्यास कुछ ही देर बीती पांच 7 मिनट फिर
- 1:00:54आहट हुई। एक एक लड़की ने पूछा, आहट फिर
- 1:01:02सुनाई पड़ती है कोई आ रहा है, फिर उनने देखा कौन आ रहा है?
- 1:01:08सुखदेव आ रहा है, कोई बात नहीं नहातेल बस यही बात मैं तुम्हे
- 1:01:14समझाना चाहती। सुखदेव बच्चा है, बच्चा शारीरिक
- 1:01:22रूप से नहीं है, जवान है। सुखदेव की उम्र तुम जानते हो
- 1:01:28कितनी थी उस वक्त 32 वर्ष जब की ये घटना?
- 1:01:35सुखदेव की उम्र 32 वर्ष और उसके पिता विद्या उसके पिता आ रहे हैं
- 1:01:44तो वो छिप गए, गर्दन तक अंत है और गन छिपा लिए गए।
- 1:01:54और जब जवान व्यक्ति जा रहा है शुक्र तो उन्होंने कहा अब कोई बात
- 1:01:59नहीं। मज़े से नाते हो क्या कारण?
- 1:02:04वेद व्यास निर्मल है शमाकुर सुखदेव निर्मल है?
- 1:02:14वेद व्यास सम्मिल युक्त है और वेद व्यास का ही बेटा है।
- 1:02:19सुखदेव सुखदेव आ रहे हैं, कोई बात नहीं मज़े से ना हो।
- 1:02:26यह इतना निर्मल है के इसकी दृष्टि भी कोमल है।
- 1:02:30निर्मल। दृष्टि तुम्हारी खराब है जो गाँधी
- 1:02:42के साथ नग्न स्त्रियों को दखाते हो वासना तुम्हारे भीतर है उसको
- 1:02:48देखो गाँधी की फोटो क्या दखाते हो क्या चाहते हो तुम?
- 1:02:57अपनी ही अंतर्दृष्टि का व्याख्यान करते हो?
- 1:03:00गाँधी की तस्वीरें दिखा के और गाँधी को तो तुम्हारी ये तस्वीरें
- 1:03:05और महान कर जाती हैं। अच्छा इतने महान थे जो तुम सोच भी
- 1:03:11नहीं सकते। सत्य में सब कुछ लिखते थे अपनी
- 1:03:19किताब सत्य के प्रयोग में लिखा जो जो कुछ किया हूबहू वही लिखा राई
- 1:03:28कम नहीं, तेल ज्यादा नहीं वही कुछ लिख दिया तुम लिख पाओगे।
- 1:03:38तुम्हारी दरिंदगियाँ तो सारा दिन मीडिया छुपाने में लगा रहता है,
- 1:03:44तुम तो पैसे देते हो हमारी कमियों को?
- 1:03:51वो जाकर मत होने देना। मुँह मांगा इनाम मिलेगा तुम्हें
- 1:03:58और वह खुद लिख देता है। मैंने ये किया, मैंने वो किया कोई
- 1:04:04कॉम्पिटिशन है, नो कॉम्पिटिशन विथाउट ही एंड ही।
- 1:04:11तुम अगर ऐसे ही चित्र दिखाते हो तो अपने ही मनोविकारों को उजागर
- 1:04:15करते हो तो मैंने कहा जब तुम भीतर जाओगे, तुम भीतर क्यों नहीं जाना
- 1:04:19चाहते? भीतर विचार भी देखेंगे, विकार भी
- 1:04:22देखेंगे, विषय भी देखेंगे। लेकिन सबसे ज्यादा क्या दिखेगा?
- 1:04:3190% तक भी हो सकता है मृत्यु का भय और इस समृद्धियों का भय से
- 1:04:40बड़े बड़े महारथी मसल में नरेंद्रनाथ तक कप जाते हैं।
- 1:04:47पहराये जाते हैं। समाधि के वो झलक पाने से बस अगर 5
- 1:04:54मिनट रुक जाते सिर्फ 5 मिनट लेकिन सूखे पत्ते की तरह कहाँ पे मैं तो
- 1:05:01गयो गयो मैं तो। तो आवाज लगाते हैं, चिल्लाते हैं
- 1:05:13स्वामी जी, मेरे माँ बाप भी हैं, भाई बहन भी हैं, अच्छी तरह जानते
- 1:05:22हैं, बखूबी जानते हैं। राम किशन पर सो कहते अच्छा तो ठीक
- 1:05:30है, हाथ हटा दिया तुम जो कहते हो ना हाथ रख दो तुम्हें पता नहीं
- 1:05:38तुम्हारा असर क्या होगा? बस एक महावीर ही निकले, वहाँ जाकर
- 1:05:45वर्धमान ही निकले, जिन्हें महावीर का किताब देना पड़ा।
- 1:05:50एक नार्द ही निकले, जिन्होंने काम देव को जीत लिया।
- 1:05:55तुम बस बातें ही बना सकते हो, तुम भीतर जो निकलेगा।
- 1:06:01मुझे नहीं पता, मैंने पहले ही कहा ये भय को क्यों चूक गए?
- 1:06:05जो बड़ी से बड़ी वादा है। तुम्हारी अपने अपने आप तक स्वे तक
- 1:06:10पहुंचने के लिए सबसे बड़ी से बड़ी वादा है।
- 1:06:14भय उनका जिक्र क्यों नहीं किया? साधना पथ में मैं नहीं जानता।
- 1:06:19क्या चुप हो गई? क्यों चुप हो गई?
- 1:06:22लेकिन चुप हो गई। इतना पता है बैठ रहेगा वह कब
- 1:06:27आएगा, लेकिन तुम तुमसे तरह बने रहना, मैं तो यही कहूंगा, वह
- 1:06:36आएगा, बादलों की तरह आएगा। भीषण पहाड़ जैसा आपत्ति काल दिखाई
- 1:06:43पड़ेगा। सूखे पत्ते की तरह तुम कम होंगे
- 1:06:46जैसे तेज हवाओं में सूखा पत्ता जो कि बस डाली को अब छोड़ा तब छोड़ा,
- 1:06:53पहले ये मरा पड़ा और तूफान चलेगा ना?
- 1:06:59वैसे ही जान नहीं टहनी के साथ बस मामूली सी उसकी किनार छिप के हुई
- 1:07:04है। उस क्षण में उस पत्ते का हाल क्या
- 1:07:08होता होगा? पत्ता पीला हो गया है।
- 1:07:14पतझड़ का मौसम है। तूफान तेज़ चल रहा है।
- 1:07:19उसकी एक छोटी सी नारी लगी है तने के साथ उस क्षण में जो पत्ती का
- 1:07:26हाल होता है, बस वही हाल होता है तुम्हारा अब तुम देख लो क्या हाल
- 1:07:34होता होगा उस सूखे पत्ते का पत्ती झड़के मौसम में?
- 1:07:40अब टूटा तब अब मरा तब मरा क्योंकि उसने जाना था।
- 1:07:45अब तक किस वृक्ष के साथ चिपटे रहना बड़ा सेफ है?
- 1:07:52इसी ने ही जीवन दिया, इसी ने ही पोषण दिया।
- 1:07:55इसने ही बचपन गुज़ारा। इस यही जवानी के कार्य में काम आई
- 1:08:00और अब है की अब सब कुछ क्यों नहीं लगा और सारा पत्ता के फिर टूट
- 1:08:05गया। ऊपर से ये तूफ़ान मेरा क्या होगा?
- 1:08:11सोच के डर जाता है। तुम भी ऐसे डर जाते हो बड़े से
- 1:08:18बड़ी बड़ी से बड़ी बाधा यही लेकिन तुम देखो मुश्किल तो बड़ा है मैं
- 1:08:26तुम्हें पहले क्या जीतने देर लगती है?
- 1:08:30विषय बेकारों को जीतने में नहीं लगती।
- 1:08:33सबसे ज़्यादा देर लगती है मृत्यु के व्यय से मुक्त होने।
- 1:08:38इसलिए सभी संतो ने और कुछ कहा नहीं कहा, लेकिन मृत्यु के बारे
- 1:08:44में जरूर कहा। उन्हें पता है मृत्यु ही इनको
- 1:08:47रोकेगी उस पथ पर जाने के लिए। सभी ने मृत्यु के बारे में बात की
- 1:08:54मरो मरो हे जोगी मरो मरो मरण है मीठा ऐसी मरणी मरो जिद मरणी मर
- 1:09:01गोर खट्टी था संत तुम्हें हल्ला छेरी देते हैं कि कहीं वहाँ जाके
- 1:09:10चूक न जाओ तुम। कबीर कहते हैं, जीस मरने से जग
- 1:09:16डरे मेरे मन आनंद, मरने ही से पाइए पूर्ण परिणाम आनंद वो कहते
- 1:09:23हैं कि जीस मरने से सूखा पता कबता है।
- 1:09:32मेरे मन में आनंद होता है, क्या मुक्त हो जाऊं?
- 1:09:37दो बातें हैं, एक तो मैं मर जाऊंगा, दूसरी बातें बिलकुल भरो
- 1:09:42थी। कबीर कहते हैं कि मैं मुक्त हो
- 1:09:45जाऊंगा। ये छोटी सी जो चिपकाहट टहनी के
- 1:09:49साथ बनी हुई है अब रुक जाएगी मैं झर जाऊंगा नीचे नरजरा हो जाएगी
- 1:09:58जीस संवरने से जागदा रही सारी दुनिया डरती है मैं वही डरता था
- 1:10:03किसी वक्त कबीर कहते हैं। लेकिन अब मेरे मन में आनंद है
- 1:10:09क्यों? क्योंकि बस यही लास्ट मुकाम है।
- 1:10:13अगर यहाँ से पार हो गए तो नैया पार मरने ही से पाई है।
- 1:10:19पूरन परमा अनंत। मरने के बिना मिलता नहीं।
- 1:10:29मोया बाज ना मिल दा सजन आवे मोया बाज ना मिल दा।
- 1:10:43सजन वे उस मालिक दा प्यार मोयाबाज न मिलदा सजन वे।
- 1:11:02मरे बिना नहीं मिलता। सभी संतों ने तुम्हें हल्ला शेयर
- 1:11:06किया, वह जानते हैं आखिरी द्वन्द आखिरी अड़चन आखिरी कंपाहट मृत्यु
- 1:11:15ही तुम्हें दिखायेगी। बाकी तो तुम जैसे तैसे पार कर
- 1:11:19जाओगी। विचारों को जीतोगे, विचारों को
- 1:11:22जीतोगे, विषयों को जीतोगे लेकिन मृत्यु कब है, बड़ा मुश्किल हो
- 1:11:28जाएगा, आड़े आ जाएगा तुम्हारे पत्थर की चिट्ठान बन के हिमालय
- 1:11:33जैसी छाती उड़ा देगा अपने चलो कैसे चलते हो यही मुसीबत है।
- 1:11:40और उस वक्त गुरु का मत है अंतवेला में गुरु का मत है जब तुम अड़
- 1:11:47जाओगे, लाचार हो जाओगे, तुम्हें कोई रास्ता नजर न आएगा चारों तरफ
- 1:11:53मृत्यु का, वह तूफ़ान की तरह तुम्हें घेर लेगा उस वक्त गुरु
- 1:11:59तुम्हें कहेगा देखो। डरो मत जम्प खो जाओ, देखो मैं
- 1:12:06तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, मेरे सामने भी यह मुसीबत आई थी और देखो
- 1:12:10मैं मरा नहीं, मैं ये खड़ा हूँ तुम्हारे साथ साक्षात जिंदा बोल
- 1:12:15रहा हूँ, तुम भी घबराओ मत। मृत्यु नहीं आएगी।
- 1:12:19मृत्यु का भय है ये ये मृत्यु नहीं है।
- 1:12:23ये मृत्यु का भय है, शिष्य को दिलासा देता है वो बस आखिर में
- 1:12:34यही काम आता है। इसलिए संत कहती हैं आखिरी वक्त
- 1:12:39में गुरु भी तुम्हारी अंगुली पकड़ के सच कांड तक ले के जाता है।
- 1:12:47गुरु आखिर में तुम्हारी आखिरी पड़ाव में।
- 1:12:52जब तुम कपते हो, सूखे पत्ते की तरह तुम्हारे सामने मौत के
- 1:12:55अतिरिक्त और कुछ नजारा नहीं होता। तांडव नृत्य करती हुई मृत्यु और
- 1:13:00अकेली मृत्यु हुई चारों तरफ नजर आती है।
- 1:13:03उस वक्त खेवटहार खेवनहार बनकर अगर कोई खड़ा होता है तो वो गुरु
- 1:13:10होता। क्योंकि इसके ऊपर भी कभी ये
- 1:13:14विपत्ति काल आयात था। उसके ऊपर भी ऐसी ही दशा कभी आई थी
- 1:13:21और वो समझता है और वो जानता है तो हमारे ऊपर भी आएगी और इसके बिना
- 1:13:25मोया बाज न मिलता सजन वे उस मालिक का प्यार इसके बिना मिलेगा भी।
- 1:13:32इसे पार करना ही होगा। ऐट एन ऐट एनी कॉस्ट किसी भी कीमत
- 1:13:38दे करो कीमत क्या होगी? तुम ही हो कीमत तुम्हारी ही कीमत
- 1:13:43मांगता है वो। कबीर कहते हैं मृत्यु के बाद आता
- 1:13:54है प्रेम प्रेम का वो सरोवर उस सागर मृत्यु के फौरन बाद वो ही
- 1:14:01नसीब होता है, इसलिए तुम घबरा नहीं होता?
- 1:14:09यह अनिवार्य शर्त है। प्रेम है ना बॉडी ऊपर जाए मैं
- 1:14:13किसी खेत खलेहान में पैदा नहीं होता।
- 1:14:17प्रेम ना हार्ट बकाए, वो किसी वणिक की दुकान पर मोड़ नहीं
- 1:14:21मिलता। राजा वरजा जहीरुचे उसके लिए बराबर
- 1:14:25है सब वहाँ कोई वेद दृष्टि नहीं है शीश दे।
- 1:14:32वो तुम्हें ही मांगता है, वो तुम्हें ही तुमसे मांगता है जो शी
- 1:14:39सुतली पे धर न सके वो प्रेम गली में आए अगर तुम तैयार हो शी सुतली
- 1:14:47पर रखने के लिए यह सिर नहीं काटना है।
- 1:14:52मृत्यु का भय लांघना है। शीश काट के नहीं रखना है ये तो
- 1:14:57तुम रख दोगे मुझे पता है बड़ा आसान है ये लेकिन ये नहीं मृत्यु
- 1:15:03का वो भय उस वक्त जब आएगा उसको पार करना है उसको लांघना है।
- 1:15:09बस ये हृदय की डायरी पे ले लेना वह कल आएगा अगर तुम ऐसे ही चल रहे
- 1:15:15हो वर्तमान के लम्हे में ठहर गए तुम जैसे तैसे कैसे भी वर्तमान
- 1:15:24में तुम ठहरे हुए भीतर उतरोगे। भीतर उतरते हुए बहुत सी चीजें
- 1:15:29आएंगी, उनको तुम पार कर जाओगे जैसे तैसे पार कर जाओगे लेकिन एक
- 1:15:35चीज़ को पार करना पड़ा हो जाएगा आखिरी और सबसे बड़ी चटदान मृत्यु
- 1:15:42कब है? उसे तुम खुद नहीं हटा पाओगे।
- 1:15:46वहाँ गुरु की जरूरत पड़ती है। वहाँ गुरु इतने कहेगा देखो मेरी
- 1:15:51तरफ से 2000 बातें तुम्हें सुनाएगा, बताएगा समझाएगा तुम्हें
- 1:15:57बहुत सी बहुत सी बातों से तुम्हें वो होती है इंस्पिरेशन वो होती है
- 1:16:02मोटिवेशन। तुम्हारी मोटिवेशन वहाँ काम नहीं
- 1:16:05आएगी तुम्हारी स्पीकर तो खुद ही मर जाएंगे वहाँ जाके कौन मोटिवेशन
- 1:16:11स्पीकर ठहरा है वहाँ तो एक ही मोटिवेशन स्पीकर काम आता है, वो
- 1:16:16है सच्चा गुरु जिसने मृत्यु जीतली खुद नहीं, जो मृत्यु से पार चला
- 1:16:21गया, वही काम आएगा। पर इसलिए यह कहावत थी कि आखिर
- 1:16:26वक्त में गुरु आएगा उस काल में जब तुम कम्पते होगे, तुम्हारी ऊँगली
- 1:16:33पकड़ेगा यानी तुम्हें गलासा देगा और तुम्हें पार करा देगा बाबू
- 1:16:37सागर और तुम्हें सच कांडे में ले जाएगा।
- 1:16:51धन्यवाद।