Latest / Baba ji Vijay Vats / 1 Sep 25 - रहस्य से भरपूर! आपको ऐसी बातें कैसे पता हैं? जिनका अभी तक आविष्कार भी नहीं हुआ!
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- 0:01दीनदयाल पर रामबाब ऐसे आपने कल की वीडियो में कहा।
- 0:17कि मांसाहारी करने वाले लोग खानों के नाम का एक जहर खा लेता है और
- 0:28साथ में ये भी कहा जो वैज्ञानिक ने अभी खोज।
- 0:40सवाल तीखा है बाबा चुनाव में तो आपको कैसे पता चला?
- 0:49लाजवाब सवाल है ये होते है? वैज्ञानिक ने अभी खोजा नहीं,
- 1:04मैंने खुद बोला खा। नोट नाम का जहर होता है अगर वापसी
- 1:10मेल खा गया जैसे ए ग्रुप से ए ग्रुप मेल खैर ए बी से ए बी मेल
- 1:18खैर। तो कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर
- 1:24रिएक्शन कर जाए एंटीबॉडीज वेदना कर सके तो जीवन को खतरा हो सकता
- 1:32है। आपको कैसे पता चले?
- 1:41विज्ञान में अभी खोजने भूल गए दिन यार आज कल मैं रहस्य के ऊपर बोल
- 1:54रहा हूँ। और मैंने बकायदा बहुत बार बोला है
- 2:06कि जब तुम चेतन से अब चेतन अचेतन। और सामूहिक अवचेतन तक पहुंचोगे
- 2:18कोलेक्टिव अनकॉन्शियस माइंड एक एक अल्फास्कु बड़े प्रेम्स शांति से
- 2:32सुन। यह तथ्यात्मक नहीं, यह सत्यात्मक
- 2:41है। जब आप अपने भीतर से हो गए, वैसे
- 2:56मज़े की बात तो ये है। तो प्रश्न तो आप पूछ लेते हो,
- 3:03लेकिन प्रश्न पूछने का अधिकार आपको तभी बनता है जब आप पहले से
- 3:10प्रैक्टिकल करके उस 70 में पहुँच गए हो और फिर प्रश्न?
- 3:21यह तो ज्ञान की गुणवत्ता को परीक्षण करने का एक ढंग मात्र है।
- 3:26मेरी दृष्टि क्या आप अपने भीतर उतरे दीन दयाल?
- 3:47मेरे भी तो कुछ सुध ले लिया कर आखिर में जवाब दूंगा तो किस तरह
- 3:55है दीना बंधु दीनानाथ, मेरी सुध लीजिये।
- 4:16जब हम भीतर उतरेंगे कब तक इन कागजी शब्दों में उलझन हो, समझ
- 4:28नहीं आता क्या मेरे जाने के बाद कंगालों के कागजों को?
- 4:35आज मैं बैठा हूँ तो क्या जक ही मारते रहोगे वेला आई थी मैं कहता
- 4:47तुम उतरते अपने भीतर देखते। और भीतर उतर के अगर कोई अड़चन आती
- 4:55तो उसे दूर कर लेता। सवाल अड़चनों से आने चाहिए ना
- 5:03बुद्धि की तारीख अवस्था से नहीं आनी चाहिए।
- 5:10और तुम्हारा दुर्भाग्य है कि तुम्हारे प्रश्न बुद्धि की
- 5:18तार्किकता से आते हैं से नहीं आते।
- 5:33मज़ा तो तब था जब तुम भीतर उतरते। उस स्तर पे पहुँच जाते वहाँ जाके
- 5:41फंसते किसी बात हमें और फिर आपके पूरे प्राण प्रश्न करते हैं ये
- 5:49बताओ बाबा अब और जीके अब क्या करें?
- 5:55लेकिन क्या? तुम थ्योरी में ही उलझ रहे हो।
- 6:01लगता है ऐसा ही रहस्य को बोलते हुए भी मुझे करीब एक वर्ष होने को
- 6:11है। आप कितना रहस्य में उतरे?
- 6:19रहस्य को छोड़ो। आप बुद्धि से परे हृदय तक भी आए
- 6:27कि तर्कों को छोड़कर आपने प्रेम में बसेरा डाला।
- 6:37और प्रेम से नीचे उतरकर आप उस तल पर पहुंचे जिससे मैं बार बार
- 6:44संदिग्ध क्षेत्र का था। लेकिन खैर।
- 6:53मैं उत्तर दे देता हूँ, आज नहीं हूँ कल ये रिकॉर्ड तो हो जाएगा,
- 7:00कभी कोई आएगा? कल को विज्ञान खोजेगा खानों के
- 7:06जहर तो पाएगा? कि बाबा ठीक कह गए थे, लेकिन आज
- 7:18क्या मैं प्रसिद्धि के लिए यह कह रहा हूँ?
- 7:21बिलकुल नहीं आपको आगाह करने के लिए जी हत्या मत कर।
- 7:34और जीव हत्या मत करो इसके लिए आपको वैज्ञानिक के कारण दे रहा
- 7:40हूँ। मैंने यहाँ कहाँ से लिया ये?
- 7:52चलो तुम उतरो, भीतर चेतन से अभिचेतन, सबकॉन्शियस, सबकॉन्शियस
- 8:02से अनकॉन्शियस और अनकॉन्शियस से कोलेक्टिव अनकॉन्शियस।
- 8:13थोड़ी सी बात प्रसंग से परे की कर तुम ये जो तुम दूसरे व्यक्तियों
- 8:24की सीआईडी को लेने के। यंत्र बना रहे हो तुम्हें पता
- 8:30नहीं संत एक कुटिया के भीतर बैठा अगर चाहे तो चाहता नहीं है।
- 8:40क्यों नहीं चाहता ये बाद में बताऊँगा।
- 8:47संत एक कुटिया के भीतर बैठा आनंदमग्न जिसकी भी चाहे मन की बात
- 8:56जान सकता है तुम यंत्रों से। ये क्या बोलता, क्या करता, क्या
- 9:06सोचता? क्या इसके मन में तूफान उठ रहे
- 9:12यंत्रों से तुम मेज़रमेंट करने की श्रेष्ठता करते हो?
- 9:18लेकिन परमात्मा ने हर व्यक्ति के भीतर यह यंत्र लगा रखा है।
- 9:25तुम्हें बाहर से किसी प्रकार के इंस्ट्रूमेंटेशन की जरूरत नहीं,
- 9:31अपने ही भीतर जाओ और देख लो। लेकिन कौन पड़े इस कछड़े में
- 9:37थोड़े से दिन तो शोक होगा फिर फिर तुम घबरा जाओगे बार बार बार बार।
- 9:58शोक भी थोड़ी देर ठहर पाते हैं। मेरा भाई सिनेमा में असिस्टेंट
- 10:08बने कर था, उसको फिल्मों देखने का बड़ा शौक था।
- 10:17माता ने उसे कहा कि तू ऐसा कर? थोड़ी तनख्वाह भी मिलेंगे, काम
- 10:24धाम भी लग जाएगा तू यहाँ पर संदीप छठ सर उसमें नौकरी कर ले।
- 10:39फिल्मों देखने का शौक है? प्रत्येक फ़िल्म देखा फिर नौकरी
- 10:48लग गया। थोड़े दिनों के बाद बोला बड़ी
- 10:50बोरियत होती है एक ही फ़िल्म बार बार वो ही सो गया, वो ही श्याम।
- 10:58दो दो शो और रोज़ रोज़ घबरा गया। अब अच्छा नहीं लगता शुरू शुरू में
- 11:16जब तुम जाओगे कलेक्टिव अनकॉन्शस में।
- 11:22तो तुम्हारी तमन्ना होगी क्योंकि नए नए आये जानू के वो क्या सोचता
- 11:30है जानू के, वो क्या सोचता है वह मेरा बड़ा प्रेमी है, प्रिय
- 11:36प्रिय, बात करता है, देखो क्या सोचता है?
- 11:45वह मेरा दुश्मन है, देखूं क्या सोचता है, पाओ के गड़बड़ को डाला
- 11:51पाओ के मूड खराब हो जाएगा वहीं जाकर।
- 12:03व्यक्ति कहता है ये ज़िन्दगी मुझे दीवाना करता है।
- 12:19गया हूँ मैं अपने घबरा गया हूँ मुझे जिंदगी।
- 12:40दीवाना कर दे मुझे दीवाना कर दे ये दीवाना होने का मन करेगा।
- 13:01तुमने अभी थ्योरी सुनी है प्रैक्टिकल ये जो बात आज तुम्हारे
- 13:09दिमाग में तूफान की तरह उफान लेती है, वहाँ जाकर तुम पाओगे।
- 13:23कौन झक मारे? इस सारी दुनिया के ब्राह्मण के
- 13:30ब्राह्मणों के कोएक्टिव कॉन्शैस वहाँ पड़े।
- 13:37और कोलेक्टिव कॉन्शस सिर्फ अब जो है, उनके ही नहीं पड़े।
- 13:46कृष्ण का कलेक्टिव भी है, नानक का कलेक्टिव भी है।
- 13:53वे यहाँ छोड़ गए हैं ध्यान रखना, बुद्ध का कलेक्ट ये सारा यूनिवर्स
- 14:07इंटरमिंगल है, गोता हुआ है एक्स। जैसे माला के मन कर एक सूत्र में
- 14:23प्रोदिक लगते हैं एक माला, लेकिन तुम्हें वो धागा नहीं दिखता।
- 14:36जीस दागे ने इन माला को एक सूत्र में बांध दिया है कब तक पूछते
- 14:51रहोगे? थ्योरी ही थ्योरी है उतरोगे भी।
- 15:00तुम्हें नहीं पता वक्त बीता जाता है और एक एक पल इतना आनंद से भरा
- 15:11है इतना आनंद से भरा है। इसलिए तो संत बाहर जाने का मन
- 15:21नहीं करता। मुझे लोग पूछ लेते हैं, बाहर नहीं
- 15:29जाते, आप घर वाले ही पूछ लेते हैं, कभी दरवाजा खोल के बाहर लॉबी
- 15:35में आ जाया करो। मैं क्या बताऊँ रखा क्या है एक ही
- 15:52कपल जो तुम खो रहे हो जो संतो ने कहा बड़ा कीमती।
- 16:03जो तुमने खो दिया वो तो खो दिया कोई जगाने वाला न था, लेकिन जब
- 16:16कोई जगाने वाला हो तो बहाने बाजी मत किया करो।
- 16:25जागने में तुमने जो सदा से चाहा जन्मो जन्मो से, वो तुम्हें मिल
- 16:34जाएगा। थोड़ा संतों के लक्षण को देख लो।
- 16:43मैं क्यों कहता हूँ एक बार देख तो लो आप
- 16:57किस तरह जीते हैं ये लोग बता दो यारों, हमको भी जीने का अंदाज
- 17:06सीखा दो यारों। आओ जीने का अंदाज सीख लो मत भटको
- 17:20ये कॉम्पिटिशन यह मुकाबला तुम्हें मार डालेगा तुम शरीर से मर जाओ,
- 17:32कोई बात नहीं लेकिन तुम आनंद से मर जाओ।
- 17:37इससे भयंकर नुकसान नहीं है। इससे बड़ा पाप नहीं है।
- 17:46पल पल बीता जाता है। आज हूँ न आए बालमा।
- 18:27सावन भी ताजा, सावन भी ताजा। ये फल फल ये वक्त नहीं आनंद खो
- 18:55रहे हो तुम और आनंद भी इतना ना ग्लास ना मटका ना समुद्र।
- 19:05विराट विराट अनंत को करो कितना नुकसान तुमने झेला तुम्हें पता
- 19:17नहीं कोई जगाने नहीं आया तुम्हें? और जब कोई जगाने आता है तुम बहरे
- 19:29हो जाते है, आँखें मूँद लेते हो जगाने वाला कोई कसर नहीं छोड़ता
- 19:41तुम्हें बांध देने की। लेकिन तुम जगते ही नहीं।
- 19:45सुबह की ठंडी हवाएं तुम और ही कामों में लगे रहते हो।
- 19:59देखो उनकी तरफ और बुद्धि भी है परमात्मा ने सोचो जे बैठे तुम।
- 20:13क्या पागल हो गए हैं पागल हो गए हैं तो कुछ हरकत करते हैं, पागलों
- 20:20जैसी हरकत करते हैं कोई जजीरें बांधकर हाथों पांव में ताड़ने
- 20:28पड़ते हैं। इनके करीब आने से तो माह को बदल
- 20:35जाती है। तुम इनके लक्षण देखने से घबराते
- 20:47हैं, चूख जाते हैं। तुम्हें बुध का चेहरा एक बार जरूर
- 21:04देखना चाहिए। तुम्हें कृष्ण का चेहरा जरूर
- 21:11देखना चाहिए उस बंसरी के ऊपर। गोंजती होए तान एक बार तुम्हें
- 21:26अवश्य पिलानी चाहिए, तुम्हारे कानों को तुम्हारे हृदय को जंकृत
- 21:33अवश्य होना चाहिए और मुरा लिया की तानसन के।
- 21:42लेकिन तुम अभागे हो इसे बड़ा शब्द है मेरे पास में अभागे हो तुम।
- 21:59कितने संत भाई गुजर गए तुम्हारे सामने से और तुमने परवाह ही नहीं
- 22:09किया एक एक पर। विराट आनंद तुम खो रहे हो ये कोई
- 22:25काम नहीं है, जब तुम भीतर जाओगे उस स्थल पे जाओगे।
- 22:38सारा यूनिवर्स एक है और सारे यूनिवर्स का कलेक्टिव अनकॉन्शियस
- 22:46मैएंड एक है बहसनी की धरती पे ही जो बैठे हैं उनका ही कलेक्टिव मन।
- 23:04कोलेक्टिव अनकॉन्शियस भी एक और उससे आगे कलेक्टिव कॉन्शियस भी एक
- 23:17जिसे ईशा वासुपनिशर कहते हैं, शाबाश।
- 23:24विधम सर्वम यत किंग जगत जगत ईशा वास सर्वम यत किंग जगत।
- 23:42टोटल यूनिवर्स गुथे हुए हैं अब उसमें और इन सबका एक कलेक्टिव
- 23:55अनकॉन्शस माइंड भी है। तुम स्वतंत्र हो सिर्फ चेतन चेतन
- 24:05सिर्फ तुम्हारा चेतन मन अब चेतन मन तुम्हारा अचेतन मन तुम्हारा ये
- 24:12तीन मन तुम्हारे उससे आगे तुम्हारा नहीं है कुछ।
- 24:18उसके आगे सब सामूहिक है कलेक्टीव अनकॉन्शियस माइंड में सब पड़ा तुम
- 24:27थोड़ा सा सवाल कर दो, वहाँ जाके तुम्हें जवाब मिलेगा यहाँ नहीं
- 24:33खोजा गया, मुझे पता है। आज मैं इस धरती पे ही हूँ, इस
- 24:40ब्लेंड पे ही हूँ लेकिन मैं उस से हूँ जो कायनात की खबर रखता हूँ।
- 24:58कुछ ऐसा है जो यहाँ नहीं खोजा क्या किसी और ग्रह पे खोजा क्या
- 25:08तुम इस धरती को अकेले जीवन का? स्रोत मत समझ लेना करोड़ों
- 25:16करोड़ों धरतियाँ हैं, करोड़ों करोड़ों धरतियाँ हैं।
- 25:23इस व्रत का कोई अंदाजा लगा सकते हो?
- 25:27वह कोई पागल तो नहीं है जो इता बनाए जा रहा है।
- 25:35करोड़ों करोड़ों जीवन लिए हो। ऐसी ही प्रतियों कोई आकार में
- 25:44छोटी हैं। कुछ आकार में हजारों गुणा पड़ी।
- 25:58तुमने तो इस धरती को भी ठीक से कहा देखा है बस सिर्फ तुम ये
- 26:11जानते हो। कि हमने धरती को घूमा है, सिर्फ
- 26:19धरती ही नहीं, संत समस्त भ्रमण में घूमता है, जब चाहे फैल जाए।
- 26:33विराट हो जाए जब चाहे कन्जेस्टेड हो जाए, शरीर हो जाए रामकृष्णा
- 26:46परमास जब शुद्धता में आती हैं, कन्जेस्टेड हो जाती हैं।
- 26:53तो कहते हैं माँ शारदा को ठीक करता है, गरीबों को खीर पुणे खलओ
- 27:02का रामकृष्णा शरीर भाव में आता है और रामकृष्णा जो विराट हो गया।
- 27:19बोलेंगे जो राम जो कृष्ण, जो दोनों वो मैं अकेला आ रहा हूँ
- 27:25कृष्ण वही कृष्ण जरासंध के डर के कारण मथुरा छोड़ के द्वारका बचा
- 27:38लेता है। वो ही कृष्ण अपना विराट जगह के
- 27:52अर्जुन को जंगे मैदान में 40,00,000 लोगों का कतल करवा देते
- 28:02हैं। वो ही कृष्ण रास रह जाते हैं, वो
- 28:13ही कृष्ण परम चरित्रता का मूर्त बन जाते हैं।
- 28:24कृष्ण को बांधा नहीं जा सकता। कृष्ण सिर्फ शुद्र नहीं हैं,
- 28:39विराट में कृष्ण आनंद स्वरूप नहीं हैं, दुख सुरुप हैं।
- 28:51हर्ष और शुक दोनों हैं और दोनों से पार भी हो, इसलिए समझने की
- 29:02चेष्टा मत करो। हर्ष और शोक भी कर।
- 29:10हर्ष और शोक से पार बी कृष्ण सर्वम जगत जगत जो भी है वॉटेवर इट
- 29:23इज़ एक्सिस्टेंस, दैट इज़ कृष्ण। कृष्णा में सब समा गया, गंदा नाला
- 29:40प्या गया समुद्र मंथन से जो अमृत निकला वो भी आ गया सब आ गया कृष्ण
- 29:53समाग्र। कृष्ण अभेद्य हैं, कृष्ण में भेद
- 30:00नहीं डाला जा सकता। वह सर्वस्व इसलिए तुम्हारी शुद्र
- 30:12बुद्धि में। उस समायेंगे संत सबसे पहले यही
- 30:20कहता है अगर विराट का रस पीना चाहते हो क्षुद्रबुद्धि को वहाँ
- 30:30उतार जाओ। जहाँ तुम जूते निकालते हो, उससे
- 30:36लोग पूछ लेते हैं या तुलसीदास हुई कलेक्टिव अनकन्शियस में पहुंचे
- 30:43थे, तो कैसे बता दिया? सूर्य पृथ्वी से इतना दूर पहली
- 30:53बात तो जो चीज़ में बताई जाती है गाक उसमें झोल रह जाता है, युग से
- 31:05है सर योजन परवान अभियोजन का। आठ भी लग सकता है, नौ भी लग सकता
- 31:11है, 13 भी लग सकता है। क्या करोगे?
- 31:15और फिर तुम अल्टीमेट आंकड़ा भी निकालोगे तो सही आंकड़े से 3% के
- 31:22करीब फर्क पड़ेगा। और तुलसीदास कोई वैज्ञानिक
- 31:33तुलसीदास के जमाने में वराहमिहिर, आर्यभट्ट वो कहाँ जाए खगोल
- 31:39शास्त्रीय बैठे हैं। नक्षत्रिय विज्ञान रखने वाले लोग
- 31:51हैं, तुलसीदास की कोई स्पेशल रिश्ते भी नहीं है।
- 32:00अरे भट्ट ने कहा वराह मिहिर ने कहा फर्क तो सब में भी निकला।
- 32:08सही गणना तो आज हुई 14,96,00,000 करीब करीब अब भी करीब करीब है
- 32:2414,96,00,000 किलोमीटर। ये पद्य में बोलने का यही लाभ है
- 32:44अब ज्योजन को आठ माइज कर लो नौ कर लो तेरा कर लेकिन तुम भगत लोग।
- 32:55इसको गुणा जमा करके बराबर बढ़ा देंगे नहीं।
- 33:00तुलसीदास कोई वैज्ञानिक नहीं है और ना ही अपने भीतर गए हुए है।
- 33:07कलेक्टिव अनकॉन्शस में वो गए नहीं।
- 33:11साइकोलॉजी की बात वो जानते होंगे। उस स्थल पर जाकर तुम सृष्टि की हर
- 33:34बात को खंगाल सकते हो और जो बात आज तक किसी भी ग्रह नक्षत्र।
- 33:48प्लेनेट पे नहीं खोजी गई और थोड़ा सा आगे चले जाओ सर्वज्ञ बैठा है,
- 33:57उससे पूछ लो, बता देता हूँ, लेकिन मैं तुमसे कहता हूँ।
- 34:07यह छोटी कल बातें तुम कब तक सुनोगे न्यूरोस भरकर तुम्हें
- 34:15सटिस्फैक्शन मिल जाती है क्या नहीं मिलती जब मुझे नहीं मिली तो
- 34:22तुम्हें भी नहीं मिलेंगे। नियम सब के लिए बराबर है।
- 34:35इन सर लोगों के निरंज भरे हुए हैं और चेहरे के काम लटके हुए।
- 34:45आज हुई मुकाबलेबाजी शुरू है बस कल से शुरू है नया कुछ जल्दी अपना लो
- 34:57डिस्काउंट पे मिल जाएगा जल्दी करो गीता का व्याख्यान शुरू, ये क्या
- 35:07है? मुकाबलेबाज अगर तुमने जान लिया कि
- 35:13दूसरा कोई नहीं मुकाबला किस्से करो इन दोगले पंक्ति लोगों को
- 35:25नकार दो, किस्से करोगे मुकाबला। यहाँ एक एक पर विराट खजाने को
- 35:49लुढ़ा रहा है यार हसीन गले। लग जा यार हसीन गले लग जा, उम्र
- 36:11उम्र गुजरती जारे। उम्र गुजरती जाए,
- 36:33सावन भी ताजा हाय रे। सावन भी ताजा तुम्हारा दिल नहीं
- 36:48करता यार हसीन गले लग जा नहीं करता हूँ।
- 37:00यार हसीन गले लग जा, मेरी उम्र गुजरती जाए, मेरी उम्र गुजरती
- 37:17जाए। पर पर बीता जा रहा है।
- 37:32क्यों जगाई मारे क्या करोगे कलेक्षन को?
- 37:37सूचना इकट्ठी करो, द्रव्य इकट्ठा करो, ख्याति इकट्ठी करो, गद्दियाँ
- 37:44इकट्ठी करो, कभी किसी ने पाया है, कभी किसी ने पाया है?
- 37:57कोई लेख लिखा कैसे नहीं? मैं चक्रवर्ती सम्राट हुआ मुझे
- 38:02बड़ा हिस्सा है, लेकिन लेख मिलेंगे, संतों का संत कहेगा मैं
- 38:13वहाँ पहुंचा हूँ। जीस रस का बखान अर्भास में किया
- 38:20नहीं जाता लफ्ज़ वहाँ जाके मजबूर हो जाता है इतना आनंद, इतना आनंद,
- 38:28इतनी महक, इतनी कुमारी इतना नशा। कब समझोगे तुम ये गाने तो बहुत आज
- 38:46लोग थे क्यों नहीं जगते?
- 39:01क्या नींद इतनी प्यारी है? नहीं एक बार उसकी एक बूँद चुका
- 39:08है। जब तक भेद का पता नहीं चलता और
- 39:17भेद का पता चलता है। दोनों को पीकर नींद तो पी रही थी
- 39:25थोड़ा उससे जागृति की बहुत फिर देखो तुम कभी सोना पाओगे?
- 39:39एक बार जागृति की एक बहुत फिर कभी सोना, वो ऐसा प्यारा है।
- 39:58उसको गढ़वाल गाने को जी करता है यार हसीन गले लग जा बार बार बंद
- 40:14करता है यार। तू इतना हसीन है, अमेरिकन लक्ष्य
- 40:27कुर्सी छोड़ने का दिल लिंक है थोड़ा इस राह पर चल के तू चेक
- 40:41अर्जे उल्फत कर चुका है। ये भी उल्फत करके देख यार की
- 40:49मर्जी के आगे यार का दम भर के चख यार की मर्जी के अनुसार भी चल के
- 40:57देख वो चाहता तो कुछ और है। लेकिन तुम अडंगा डाल देते हो हॉबी
- 41:08और वह इतना प्यारा है और कहता है ठीक है, बच्चा है खेल लेने दो
- 41:18मेरी सस्ती भी तो इतनी प्यारी है मैंने खेलोना भी तो इतना प्यारा
- 41:22बनवाया है। खेलने का मन करें तो खेल बिगड़ता
- 41:31भी क्या है? कहाँ से पाया यही नहीं पाया।
- 41:44मैंने कहा मैं वो शय हूँ। जो कायनात की खबर रखता मुझे सब
- 41:53मोर सर्वज्ञ उसी को कहते ये बात है।
- 42:06एक बार जो झक मारी, तो पाया कि सरदर्दी के सवार कुछ जो मज़ा वहाँ
- 42:20है। ओह मज़ा संसार की जकाई में थोड़े
- 42:27जो सुख छज्जु तह जो गगन मंडल वो ना बल्क ना पुकारना, एक बार तुम
- 42:37गगन मंडल पे चढ़ते तो फिर एक बार सिर्फ एक बार।
- 42:45पर मज़ा ये है कि तू एक बार भी नहीं चिड़ा उससे जूके चुवार बर्ख
- 42:53बुखार फीका फीका जहर लगने लगेगा एक बार से जूके चुवार पे चढ़ तो
- 43:02जा। उस गगन मंडल की रोशनाई तो देख ले,
- 43:09उसकी चकाचौंध भरी सृष्टि तो देख ले वह आनंद से पल्ल्वित सुगंधित
- 43:18पुष्प तो तिहार। उसके साथ नाशक उत्सव लगा लें।
- 43:27तुम्हारे सारे प्राण आनंदमग्न हो जाएंगे जन्मो जन्मो से, जिसकी
- 43:41तलाश और तलाश मट जाएगी। इसे ही कहते हैं ठहर आप?
- 43:46तलाश का मत जाना ठहरा अभी तुम तलाश रहे हो और तलाश क्या रहे हो
- 43:56ये तुम्हें पता ये तुम्हें गुरु बताएगा तुम क्या तलाश रहे हो?
- 44:10एक बार शिशु के चवारे पे चर्चाओ तुम्हारी तलाश पूरी हुई वह मिल
- 44:17जाएगा जीते जी सत्यखंड में जाना होता है।
- 44:28इन मूड गुरुओं के पीछे मत चल जाना, ये तो मैं ब्रह्मांक पहले
- 44:35इनके भी कुछ नहीं पड़ेगा जिसने जीते जी कुछ न पाया हो।
- 44:44जीते जी मरना पड़ता है, हमारे जीव बड़ा होना पड़ता है।
- 44:48मरकर क्या खास पता लगेगा तुम्हे? और तो परम होश की घड़ी होती है
- 44:56तुम मरते होगे, बेहोश होगे ऊँगली पकड़ेंगे, सच खंड ले जाएंगे नहीं
- 45:02इन वर्मो में मत पड़ना तुम तो जीते जी खुद ही चले जाना सच खंड
- 45:07में। किसी गुरु का आशरा मत थकना मेरा
- 45:12बलम हो जाना, खुद ही चले जाना खुद ही सफर तय करना होता है और खुद ही
- 45:19सफर तय करना, इनके भरोसे मत रह जाना, ये खुद भी सच गठ नहीं देते
- 45:24हैं। सच खंड देखे होते तो मृत्यु की
- 45:29बात न करते। जिसने सच खंड देख लिया, वो मृत्यु
- 45:36की बात क्यों करेगा? वो जीवन की बात करेगा, जो है वो
- 45:41जीवन है, वह परिम जीवन है। जहाँ सचखंड का वास है, वहाँ
- 45:49मृत्यु झवक भी नहीं सकती, आहट भी नहीं होती मृत्यु की नैनम चिरं ती
- 45:57श प्राण नैनम दाहति पाबका न चैनम के जनतपु न सुश्रुति मारूता।
- 46:05कोई आग नहीं पहुंचती, वहाँ कोई शस्त्र नहीं पहुंचता, वहाँ कोई
- 46:11तूफान नहीं बहता, वहाँ कोई बाढ़ नहीं जाती वहाँ तुम वो सच खंड हो
- 46:21और जीते जी जाना होता है। मरकर क्या खाक?
- 46:29मरकर क्या कहाँ कसा हुआ है? ये मात्र छला में इनके पास कुछ
- 46:40नहीं है। ये खुद नहीं पहुंचे और फिर अगर ये
- 46:44गड़कना ही चाहते हैं तो गर्क इनके पीछे।
- 46:49स्वतंत्र है प्रत्येक प्राण जागो जागो जागने की वे लाक कितने जगाने
- 47:06वाले आए? तुम पल पल खो रहे हो उस असीम
- 47:14बैराट आनंद ये नुकसान नहीं तो और क्या है?
- 47:21कब मौत आई, कब सच कंठ गए? तुम अभी जा सकते हो, बहरे हो
- 47:32गूंगे हो अपाहिज हो लूले हो लंगड़े हो जो कोई दूसरा लेके
- 47:39जाएगा तुम खुद अपने सहारे। तुम खुद चलो खुद मरकर ही सर को
- 47:52देखा जाता है और खुद चलकर ही सच खंड पहुंचा जाता है।
- 47:59दूसरों के कंधों पर पहुँचकर ना सच खंड मिला।
- 48:03नंबर कर स्वर्ग मिला उठो जग इन ठगों की बातों में मत उलझो।
- 48:32चूक रहे हो पल पल असीम विराट आनंद को तुम खोर हो, तुम पता नहीं हर
- 48:43पल तुम क्या धोखा रहे हो मान से जन्म मिल गया।
- 48:51इसका लाभ उठा दो बहुत ही जन्म बीते मेरे मात्र हो यह जन्म
- 49:01तुम्हारे लेख है, यह जन्म यह पल मेरे लेख से लगा था एक बार पुकार
- 49:11लो, प्रेम से पकार लो। पूर्ण हृदय से बकार लो अंतरात्मा
- 49:17से बकार लो यार हसीन गले लग जा यार, हसीन गले लग जा।
- 49:36मेरी उम्र गुजरती जाए। सावन भी ताजा धन्यवाद।