Latest / Baba ji Vijay Vats / 10 Jan 25 - सूक्ष्म शरीर/देही का निर्माण कैसे होता है? कारण शरीर क्या है? देही को बाहर ले जाने का द्वार?
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- 0:12नंदिनी श्रीवास्तव आपने कहा बाबा आशुतोष महाराज?
- 0:32सहस्रार से निकल गए इसलिए वापस नहीं आ पाएंगे।
- 0:46जब भी शरीर से बाहर जाना होता है वापस आने के लिए।
- 0:54तो नाभी चक्कर से जाना होता है। बात कुछ समझ में आई नहीं बाबा
- 1:06इसको थोड़ा सा गहनता से। समझाने का कष्ट करेंगे।
- 1:17बिल्कुल अध्यात्म की बातें शब्दों में आती नहीं।
- 1:28प्रवचन से पहले ही मैं बोल देता हूँ ताकि आप शब्दों को पकड़ ना
- 1:35पाएं। शब्दों के भीतर जो छिपा है रहस्य
- 1:46उसे पकड़ पाएं। सवार अध्यात्म के ऐसे ही होते
- 1:52हैं। सवाल।
- 1:59बहुत ठीक पूछा हे बेटे अन्यथा मैं पार पार कहता हूँ आगे आगे ज़माना।
- 2:10अंधकार पूर्ण आर कोई जवाब दे पाए ना दे पाए, कोई इतनी गहराई तक जाए
- 2:21जाए ना जाए कौन जाना तो विस्तृत विवेचना करता हूँ आज।
- 2:35क्योंकि इस प्रश्न वे बड़ी गलतफहमी है, मैं भी कोशिश करूँगा
- 2:50सरल करने की आप भी ध्यान से सुनसान जगह पे।
- 2:58शोरगुल से बाहर एकांत में इसे सुनने का प्रयास करना तो शायद
- 3:10आपके गहरे उतर सकती है। बात।
- 3:19तो हम शुरू करते हैं विद्यार्थियों को आभासा भी सीखाना
- 3:31पड़ जाता है। कभी कभी दो चीजें होती हैं जब आप
- 3:44कोई विचार करते हो। इच्छा रखते हो?
- 3:51वासनाएं उठती हैं, क्रोध जन्मता है।
- 3:55लोभ जन्मता है तो वो विचार जाते हैं।
- 4:01देही में वासनाएं जाती हैं। देही में काम क्रोध?
- 4:06ये बेकार जाते हैं। दे ही में यह एकठ होता है दे ही
- 4:11में ध्यान से समझा बात को यहीं से समझा आ जाएगी।
- 4:20हम जब वासना में जाते हैं तो दे ही बढ़ता है।
- 4:26और जब हम ध्यान में जाते हैं तो कान्शस्नस बढ़ती है, चेतना बढ़ती
- 4:33है। अब इन दो चीजों को मूल रूप से ले
- 4:37लेना, ये दो दिशाएं मैंने आपको दे दी हैं।
- 4:45आसनाओं में जाओगे दे ही बढ़ेगा, ध्यान में जाओगे, कान्शस्नस
- 4:57बढ़ेगी, जागृति बढ़ेगी, अवेयरनेस बढ़ेगी।
- 5:07अगर ये बात समझ में आ गई तो आगे चलो विचार करते हो, वासनाएं करते
- 5:20हो, कामनाएं करते हो, लालसाएं करते हो, स्मृति में जाते हो या
- 5:25भविष्य की कल्पनाओं में जाते हो, दैही का निर्माण होता है।
- 5:34दे ही को समझने के लिए आप पिछले वीडियो खंगाल सकते हैं जब आप
- 5:42ध्यान में जाते हो। कुछ नहीं करते हो, बस बैठे रहते
- 5:54हो तो आपका कान्शस्नस बढ़ता है, चेतना का तल बढ़ता है।
- 6:15अब आगे चले जब हमने देही को साथ लेके जाना होता है कोई एस्टल
- 6:30ट्रैवलिंग पर कोई बाहर जाना है। कोई कैलाश जाना है, कोई ज्ञानगंज
- 6:40जाना है, सिद्ध आश्रम वगैरह वगैरह।
- 6:47यहाँ या बाहर किसी प्लानिंग के लिए जाना है तो कैसे जाएंगे हम?
- 6:57देही के साथ जाएंगे, देही जाएगा हमारे साथ देही ही जाएगा और कहाँ
- 7:11से जाएगा नाभीचक्र से जाएगा मुलाधर से जाएगा।
- 7:21एक एक शब्द को बड़े विस्तार से समझ लेना अगर न समझ आए तो मुझे
- 7:26बता देना, मैं यहीं रोक के रिपीट कर लूँगा।
- 7:39जब इस शरीर से बाहर जाना है स्थूल से बाहर जाना है, दे ही जब बाहर
- 7:45जाता है, ना भी चक्कर से जाता है और आपने बात की।
- 7:58दक्षिण द्वार की सहस्राल के सहस्राल से बाहर जाती है सिर्फ
- 8:08चेतना वह योगी जो सम्पूर्ण हो गया, जिसने इस देह में रहते रहते
- 8:19अपने सब कर्म भौंक फौंक लिए। योर ज्ञान गंगा में नहा लिया अपने
- 8:30आपा जान लिया, अपने विस्तार को जान लिया दो बाती बोली मैंने
- 8:36ध्यान रखना अपना आपा जान लिया टु नो दाय सेल्फ अपना विस्तार जान
- 8:44लिया। हम अस्तित्व हैं कोने कोने में,
- 8:55ईशा वास में सर्वबम् यत कैंची जगत या जगत है।
- 9:00पहले जानना होता है मैं ये शरीर नहीं हूँ, शरीर से बड़े साक्षी
- 9:10हूँ पहला कदम है, लेकिन यहाँ। अगर यहाँ रुक जाओगे तो बुद्ध हो
- 9:15जाओगे। फिर उसके आगे एक स्टेप हो रहा है।
- 9:26टु नो दाये सर्फ के बाद टु नो दी एक्चुअलिटी रियलिटी वास्तविकता
- 9:35क्या है? वास्तविकता तुम अस्तित्व में फैले
- 9:41हुए कण कण में समाये हुए है। बे न ना वे, ना ही कोठा।
- 9:47कोई जगह ऐसी नहीं है जहाँ तुम नहीं हो, वह एक आपा तुम्हारा
- 9:53दूसरा आपा है। एक आपा तुम्हारा तुम साक्षी हो और
- 10:03एक दूसरा आपा भी होता है, वो होता है तुम सर्वपति हो तुम सर्व
- 10:10व्यापक हो, तुम सर्प शक्तिमान हो। तुम इस अस्तित्व के कण कण में हो
- 10:18और बड़ा प्यारा दृश्य होता है वो उसकी कल्पना से ही योगी कृत्य
- 10:30कृत्य हो जाता है। योग इसे ही कहते हैं, जिसने अपने
- 10:34आप को मिला दिया। योग का अर्थ प्लस जिसने अपने आप
- 10:41को मिला दिया किस्में बूंद समानी, समन्ध में बूंद जब समुद्र में
- 10:49समाती है तो समुद्र से। योग करती है।
- 10:54समुद्र में प्लस हो गए, वो समुद्र से निकली थी, समुद्र में समा गई।
- 11:05इसे योग कहते हैं। अपना आपा जान लिया।
- 11:14आपा जानने के बाद भी बुद्ध 30 वर्ष तक जीते हैं।
- 11:26महावीर भी जीते हैं। आपा जानने के बाद कर्मभोग तो भूत
- 11:33नहीं पड़ेंगे, जो भी आपने किए पिछले जन्मों में किए भोगे किए
- 11:42भोगे नए किए भोगे प्राण माइनस प्लस माइनस प्लस जो बच गए शेष।
- 11:56स्वय को जानने के बाद जो बच गए, वो तुम्हें भौंकने पड़ेंगे और वो
- 12:02तुम भौंकते हो, बुद्ध भी भौंकते। हैं कृष्ण भी।
- 12:05भौंकते हैं, राम भी भौंकते हैं, महावीर भी भौंकते हैं, कबीर भी
- 12:10भौंकते हैं, नानक भी भौंकते हैं, वो भौंकने ही पड़ेंगे।
- 12:19लेकिन अगर इसमें शरीर में रहते रहते बुध भोग लेते हैं लेकिन
- 12:29थोड़ा सा शीष रह के करुणा के कारण।
- 12:33भौंक सकते थे। उनके पास शरीर था लेकिन शेष रह
- 12:38गया वो शेष रह गया। अति करुणा के कारण परम करुणा के
- 12:45कारण क्या होगा? जैसे बाप दादा।
- 12:52अपनी संतानों के लिए सोचता है कि हम अपनी पुश्तों को क्या देके
- 12:58जाएंगे? ऐसे ही बुद्ध ने सोचा आने वाला
- 13:04वक्त अंधकार है तो फिर मैं बना ही रहूँ।
- 13:09एक बार घने अंधकार के युग में फिर प्रकट हो रहा हूँ।
- 13:15यह उनकी करुणा की कहानी ही कहता है और बुध फिर आएँगे तो क्वेश्चन
- 13:30भी। फर्श।
- 13:33लेकिन दोनों बातें यक्सा होती हुई भी अलग अलग हैं।
- 13:39वो आयेंगे किसी और रूप में पहचान तो तुम बुद्ध को भी नहीं सकोगे,
- 13:44कृष्ण को भी नहीं, राम को भी नहीं सकोगे।
- 13:47अगर वो आयेंगे तो। लेकिन आएँगे नहीं।
- 13:52राम भी कबीर भी नानक भी कभी नहीं आएँगे।
- 13:57वो भोग गए, सब भोग गए। वह योगी जो सारे कर्म भोग लेता
- 14:16है, सिर्फ देह में बैठे बैठे उसका देह ही नष्ट हो जाता।
- 14:21है। समझा ना बात को?
- 14:26क्योंकि दे ही के भीतर जो कुछ जमा है, कूड़ा कचरा वही तो भोगना होता
- 14:33है और अगर तुम विषय वासना में अभी भी पड़े रहे तो दे ही बढ़ता जाएगा
- 14:42और अगर तुम कन्सीअस्नेस में उतरते चले गए।
- 14:47तो चेतना बढ़ती जाएगी और जब तुमने जान लिया के हुए एम आए तो उसके
- 14:58बाद तुम्हारे बहुग शुरू हो जाते हैं, नए कर्म बनने बंद हो जाते
- 15:02हैं। देही रोज़ घटता है, रोज़ घटता है,
- 15:07सूक्ष्म शरीर कहता हूँ देही जो लोग ना समझे हो वो देही को
- 15:13सूक्ष्म शरीर की तरह ले लें। सूक्ष्म शरीर रोज़ घटता है, घटता
- 15:20है, घटता है, 1 दिन शून्य हो जाता है।
- 15:26अब उस अवस्था में जबकि दे ही न बचा दे ही शून्य हो गया तो क्या
- 15:37रह गया? चेतना रह गई, शुद्ध स्वरूप में रह
- 15:44गया। यश अतुल शरीर और देही सूक्ष्म
- 15:50शरीर और उसके भीतर एक कारण शरीर जो समुद्र का एक हिस्सा बहुमुद
- 15:58उसका जिक्र मैंने इसलिए नहीं किया वह प्रासंगिक था जब प्रसंग आएगा
- 16:03तो मैं बताऊँगा। तो यहाँ आवश्यक हो गया सूक्ष्म
- 16:14शरीर के पीछे कारण शरीर है जो समुद्र से बिछुड़ गई थी।
- 16:24उसने मिलना है समुद्र में। अपने उदगम स्थल से मिलना है, उससे
- 16:36शुद्ध चेतन वह संघ संघ यात्रा करती है।
- 16:50और अब आखिरी समय में जब देह ही समाप्त हो गया है तो उसकी अंतिम
- 16:59कदम उठाना है। उसने अपनी यात्रा का है, समुद्र
- 17:04में मिलना है बूंद ने यह उसका। अंतिम काम में रहना समा जाना
- 17:16समुद्र में है। वह चाहे तो।
- 17:27नाभि से निकल सकता है चाहे तो नाशिका से निकल सकता है, चाहे तो
- 17:32कानों से निकल सकता है। नव द्वार में से कहीं से भी निकल
- 17:35सकता है और दशमद्वार से वे ही निकल सकता है क्योंकि उसे वापस
- 17:41नहीं आना। और अगर कोई व्यक्ति मूर्खता करेगा
- 17:48आशुतोष शश देह समाप्त नहीं हुआ और निकल गया दशम द्वार से तब गड़बड़
- 18:02हो जाएगी ये मूर्ताएं कभी कभी होती हैं ऐसी ही मूर्ता आशुतोष।
- 18:14और कोई भी व्यक्ति जो साधना करते करते ऐसी मोहर तक रहेगा।
- 18:23देखिये, मेरे पास बहुत सी शंकाएं आ रही हैं।
- 18:28कि अगर ध्यान करते करते हम सहसरार में से निकल गए तो क्या होगा?
- 18:33नहीं निकल सकोगे। तुम बड़ा मुश्किल है वो निकाल लो
- 18:43क्योंकि वह द्वार ही नहीं है, यह तो ऐसा है।
- 18:50जैसे एक छोटे से द्वार से हाथी निकलने की कोशिश करें।
- 18:54क्या होगा? यह दरवाजा टूट जाएगा।
- 19:02दशम द्वार है निकलने के लिए कारण शरीर के निकलने के लिए द्वार है।
- 19:11सूक्ष्म शरीर के निकलने का द्वार नहीं है।
- 19:16इसको बहुत बारीकी से समझना ठीक किया तुमने बेटी प्रश्न पुष्कर
- 19:27अगर दे ही को। कारण शरीर के साथ ले के जाना है
- 19:36तो तुम्हें नाभि के अंदर से ही निकलना होगा और अगर कहीं गलती से
- 19:42गलती से देखिये प्रयास करना पड़ता है, ऐसा ही नहीं है कि तुम ध्यान
- 19:47करते करते अपने से निकल जाओगे। ऐसा इतना।
- 19:50आसान मसला नहीं है। ये ये स्वभाव नहीं होता, ये गलती
- 19:55से भी नहीं होता। इसलिए जो लोग ध्यान में जा रहे
- 20:00हैं वो निश्चिंत रहें। मैं जिम्मेवार हूँ।
- 20:05इस चीज़ का वो अपने से नहीं निकल सकेंगे।
- 20:10उन्हें बड़ा प्रयास करना पड़ेगा तो हमारा क्या ख्याल है?
- 20:13छोटे से दरवाजे से तुम्हारे दरवाजे से हाथी गुजर सकता है,
- 20:17नहीं, बड़ा प्रयास करना पड़ेगा। जिन लोगों ने ऐसी शंकाएं ज़ाहिर
- 20:28की हैं, डर, भय ज़ाहिर किए हैं, कही ऐसा तो नहीं होगा।
- 20:35हम शरीर से बाहर निकल जाते हैं तो देखिये शरीर से बाहर निकाला जा
- 20:41सकता है, ध्यान में निकाला जा सकता है, लेकिन जब भी तुम शरीर से
- 20:48बाहर निकलोगे वो निकलेगा दे ही। कारण शरीर नहीं जाएगा।
- 20:54यह बात समझना, शब्दों में सारी चीज़ को अभिव्यक्त करने के पहले
- 21:03ही मैं क्षमा याचना कर चुका हूँ। कोई व्यक्ति प्रश्न न करे यह इतना
- 21:10साधारण मसला नहीं है। कि आगे तुम्हारे प्रश्नों के मैं
- 21:16जवाब देता हूँ, बस यहीं तक बोल सकता हूँ अपनी पूर्ण
- 21:21इंटेलेक्चुअलिटी का इस्तेमाल करके मैं जो बोल रहा हूँ वो अंतिम है,
- 21:27उसके आगे मैं बोल नहीं सकता, शब्द भी।
- 21:31बेकार और मेरा प्रयास भी बेकार तुम ध्यान करते करते जब बाहर हो
- 21:45जाते हो तो एक बात समझ लेना कारण शरीर नहीं जाता है दे ही बाहर
- 21:51जाता है या नहीं सूक्ष्म बाहर जाता है।
- 21:54थूल यहाँ पड़ा रह जाता है और थूल के भीतर कारण शरीर भी पड़ा रह
- 21:59जाता है। कारण शरीर एक ऐसा फूसे है जो
- 22:11तुम्हारे घर को सप्लाई करता है। देखिये थर्मल प्लांट में बिजली
- 22:17बनी। वहाँ से तुम्हारे पावर स्टेशन में
- 22:21आई यहाँ जीतने भी तुम्हारे वोल्टेज के होते हैं 11,000 होते
- 22:27हैं जो भी होते हैं वहाँ से तुम्हारे घर तक आई लाइट और
- 22:33तुम्हारे घर तक भी आने में लाइट। उसको भी फ्यूज का सहारा लेना
- 22:37पड़ता है। वहाँ भी तुम फ्यूज़ लगाते हो, वो
- 22:40है कारण शरीर उस फ्यूज़ से वह थर्मल प्लांट की विद्युत पावर
- 22:52तुम्हारे घर को रोशन कर देते हैं। अगर वह फ्यूज़ नहीं होगा तो भी
- 22:57तुम्हारा। घर रोशन नहीं हो सके।
- 23:02अब इस सारी व्यवस्था को ठीक से समझ लेना अगर समझ न आए तो उसको
- 23:07बारबार सुन लेना, रिपीट करके सुन लेना, अहम बिन्दुओं को मैं बारबार
- 23:14बोलता हूँ। एटोमिक पावर प्लांट या कोई भी
- 23:25पावर प्लांट वहाँ से सप्लाई आती है।
- 23:32सारे संसार को वो आती है तुम्हारे ग्राम या शहर के।
- 23:43विद्युत स्टेशन तक पावरहाउस, जिसे कह देते हैं पावरहाउस से तारे
- 23:50बिछाके तुम्हारे घर से बाहर के जो खम्भे हैं, वहाँ तक आ जाते हैं।
- 23:59वहाँ से तुम्हारे घर तक आ जाती है, लेकिन फिर भी तुम्हारा घर
- 24:03जगमग नहीं होता, एक कमी रह जाती है, फिर भी क्या कमी रह जाती है
- 24:10वह है फूसे सारे कनेक्शन ओके, लेकिन जब तुम फूसे लगाओगे।
- 24:22तो वह बिजली तुम्हारे घर को रोशन करेगी, फिर सब कुछ चलेगा, पंखा भी
- 24:28चलेगा, एसी भी चलेगा, हीटर भी चलेगा।
- 24:32बल्ब भी जगेगा। ट्यूब पर चलेगी, पानी के मोटर पर
- 24:35चलेगी। लेकिन अगर तुम ने फूसे नहीं लगाया
- 24:41तो कुछ नहीं चलेगा। यह है फूसे कारण है क्योंकि इसका
- 24:51जिक्र कहीं आता नहीं, इसलिए पहले मैंने तुम्हें उलझाना ठीक नहीं
- 24:56समझा। वक्त आने पर इसका छोटा सा रोल है
- 25:02तो मैं बता दूंगा। आज वो वक्त आ गया, आज वो प्रश्न आ
- 25:08गया तो तुम्हारे खम्भे से तुम्हारे घर तक।
- 25:15कनेक्शन आ गया और तुम्हारे घर के भीतर जो कनेक्शन जाएगा वह ले के
- 25:20जाएगा। कारण श्रेष्ठ तो क्या होता है जब
- 25:29तुम संबोधि से युक्त होते हो? ये तुम्हारा देह ही गल गया तुमने
- 25:34सभी भोग भोग लिए जब तुमने सारे भोग भोग लिए तो तुम्हारा देह
- 25:42शून्य हो गया, जी रो कुछ और भोगना बंधना रहा।
- 25:47सभी बही खाते बराबर कर दिए गए, कोई लेना देना बाकी नहीं।
- 25:56अब क्या है? अब तुम्हारी मर्जी है, अगर शरीर
- 26:02चलता है तो चलने दो। अगर तुम चाहते हो तो चलने दो,
- 26:08नहीं चाहते तो निकल जाओ। और फिर तुम्हारे लिए तुम स्वतंत्र
- 26:14हो, इसे ही स्वतंत्रता कहते हो, यहाँ भी परतंत्र नहीं है व्यक्ति
- 26:22तुम चाहो किसी भी द्वार से न कर सकते हो, लेकिन उसी अवस्था में।
- 26:32यह सहस्रार काम करता है, सहस्रार से निकलना होता है तो योगी
- 26:38सहस्रार से निकलता है, क्योंकि सही सही बिंदु सही सही निकासी शटल
- 26:47कारण शरीर का। शब्द समझ लेना अब मैं दही नहीं
- 26:52बोल रहा हूँ, कारण शरीर का उस बूंद का समुद्र में मिलने का सही
- 27:04सही। निकासी द्वार है हमारा सहसाहार
- 27:11लेकिन एक बात को ध्यान में रखना उस कारण शरीर के साथ दे ही नहीं
- 27:16जाएगा तो जो अपने दे ही को समाप्त कर चुका है, वह निकलेगा।
- 27:25दशम द्वार से जैसे हर चीज़ की निकासी के परमात्मा ने द्वार बना
- 27:33रखे हैं। पसीने का द्वार, चमड़ी, मलमूत्र
- 27:38का द्वार अलग है। बाकी द्वारों के अपने अपने काम
- 27:45हैं। ऐसे ही इसका द्वार का एक बार
- 27:52इस्तेमाल होता है। सहरार द्वार का एक बार इस्तेमाल
- 27:57होता है कब अंतिम समय में? जब बुद्ध पुरुष सब भोग लेता है और
- 28:05उसका देह ही समाप्त हो जाता है। एक बात तुमसे कहो इस द्वार से बुध
- 28:11भी नहीं निकलते हैं। निकल सकते हैं, निकलते नहीं हैं।
- 28:19बुध भी जब जाते हैं ना भी केंद्र से जाते हैं।
- 28:27कोई भी व्यक्ति जो कॉन्शसनेस लेवल को बढ़ा रहा है, ध्यान में जा रहा
- 28:33है। इस द्वार से एक बार ही निकाला
- 28:37जाता है। दूसरी बार नहीं निकाला जाता और
- 28:41अंत वेला में बुध यहाँ से निकल सकते हैं लेकिन बुध निकले नहीं
- 28:45हैं। महावीर यहाँ से निकल गए।
- 28:52बुध नहीं निकले। सभी चीजों के निकासी द्वार
- 29:00निर्धारित हैं। अगर निकासी द्वार गलत निकासी से
- 29:06निकलोगे आप तो कोई न कोई गड़बड़ी होगी।
- 29:12देखिये पसीने को निकलने की जगह है, हमारे रोम छिद्र मूत्र के
- 29:19निकलने की जगह है, वीरे के निकलने की जगह है?
- 29:24हमारी गुप्तेंद्र मर के निकलने की जगह है, आँखों को देखने की जगह है
- 29:34आँखें कानों से नहीं सूझ सकतीं, सो देने की जगह है।
- 29:41आँखें सुन नहीं सकती, कान देख नहीं सकते।
- 29:47सभी के द्वार अपने अपने हैं सुचारू रूप से काम कर रहे हैं।
- 29:53गड़बड़ी कब पैदा होती है जब तुम किसी द्वार को।
- 29:57गलत ढंग से इस्तेमाल करते हो, नाभी तोहार है दे ही के साथ शरीर
- 30:05का निकल जाना। तुम एस्टर ट्रैवलिंग करना चाहते
- 30:07हो करो, मौत से करो, तुम चाहे तो हिल स्टेशन जा सकते हो।
- 30:19गाड़ी में बैठ सकते हो, कार में बैठ सकते हो, बस में बैठ सकते हो
- 30:29क्या तुम्हारी ऑप्शन है? लेकिन वो सही ढंग है हिल स्टेशन
- 30:35पे जाने के? लेकिन कार के द्वारा तुम दूसरे
- 30:39ग्रह पे नहीं जा सकते हो, वहाँ जाने के लिए तो देय ही को साथ
- 30:44लेके जाना पड़ेगा और फिर यहाँ मैं साफ कर दूँ।
- 30:50बात कल फिर उलझ सकती है आए तो प्रसंग आया है।
- 30:57जब तुम एस्ट्रल ट्रैवलिंग पे जाते हो तो दे ही जाता है।
- 31:02सूक्ष्म शरीर साथ चेतना तो सब जगह फैली हुई है, लेकिन कारण शरीर
- 31:11नहीं जाता कारण शरीर यही रहता है। क्योंकि कारण शरीर जिससे निकल गया
- 31:18उस दिन तुम्हारे भीतर कुछ नहीं कारण शरीर के निकलने का कौन सा
- 31:26स्थान है, जैसे पसीने के निकलने का द्वार है कारण शरीर के निकलने
- 31:32का। एक ही द्वारा है सहसरार यह द्वार
- 31:37बना ही कारण शरीर के लिए है देही के लिए नहीं है देही के लिए नाभि
- 31:45केंद्र है वहाँ से जाओ आओ कारण शरीर के लिए।
- 31:52एक ही शान है निकासी द्वार है, वो है सहसरार दशम द्वार और कारण
- 32:01श्रेय से निकला भी नहीं करता कारण से बिल्कुल अंत में निकाला करता
- 32:06है। अभी तुम पूरे भौंक भोंके नहीं अभी
- 32:20तुम्हारा दे ही बरकरार है तुम दे ही को साथ लेके अगर बाहर निकलते
- 32:29हो। कारण शरीर को साथ लेकर देही के
- 32:37संग उस द्वार से निकलते हो जो सिर्फ कारण शरीर के लिए है।
- 32:45प्रथम में मैंने कहा कि वह एक बार वहाँ से निकला हुआ कारण शरीर।
- 32:54वह निकासी द्वार है कारण शरीर के लिए और कारण शरीर बिल्कुल अंत में
- 33:01निकलता है। कब जब उस बूंद ने समुद्र में
- 33:05समाना होता है जहाँ कबीर कहते हैं बूंद समानि समुद्र में?
- 33:15यह द्वार सिर्फ कारण से लिया है, लेकिन कोई व्यक्ति है जो विशुद्धि
- 33:29चक्कर से ऊपर चला गया है। वह निकल सकता है यहाँ से देखिये
- 33:41एक बैन है जो विशुद्धि से नीचे है वो तो यहाँ से निकल ही नहीं सकता,
- 33:45उसकी तो बात छोड़ दे जो विशुद्धि पे आ गई हैं।
- 33:52वो यहाँ से निकल सकते हैं। नेकन निकलना मूर्खता होगा फिर अगर
- 34:00वो यहाँ से निकलेंगे तो ये सोच के निकलें कि वापस नहीं आएँगे
- 34:05क्योंकि इस ब्रह्मरद्र से। निकला हुआ फिर वापस नहीं आता,
- 34:19कारण सही इससे तुम जीव भी कह देते हो जीव कार्थ जो जिंदा है जीव
- 34:30कार्थ जो चेतन है। यह उसका निकासी द्वारा है।
- 34:38सहसर तो क्या हुआ? आशुतोष के साथ क्या हुआ है इस?
- 34:51चक्कर से बाहर हो गए थे वह विशुद्धि चक्कर से बाहर और मैंने
- 34:59पहले भी प्रवचन के अंदर साफ किया। विशुद्धि चक्कर में जैसे ही आप
- 35:04प्रवेश कर गए बस आप योग्य हो गए। किसके मुक्ति क्या?
- 35:15फिर देर अवेयर तुम पहुँच जाओगे और देर अवेयर का ये मतलब नहीं कि
- 35:21प्रकृति के हिसाब से लाखो जन्म नहीं लगे।
- 35:23नहीं नहीं, लाखों नहीं लगेंगे, फिर तुम जल्दी ही पहुँच जाओगे।
- 35:30बस एक या दो अगर तुम भी शुद्धि किसी ना किसी तरह इसलिए मैं रोज़
- 35:36तुम्हें कहता हूँ किसी ना किसी तरह से तुम भी शुद्धि पर पहुँच
- 35:41जाओ और जब मैं यहाँ दीक्षा देता हूँ अब मैं थोड़ा साफ करता हूँ।
- 35:47तो तुम किसी भी तल पे हो, किसी भी तल पे हो, किसी भी चक्कर पे हो
- 35:57चाहे मूलाधार पे हो चाहे अनाह पे हो साजिस्तान पे हो मैं तुम्हें
- 36:05अनाहक पे ले आता हूँ। बस मेरी दीक्षा का यही मतलब इसलिए
- 36:13मैं तुम्हें कन्फर्मली कह सकता हूँ कि यू विल बी लिबरेटेड
- 36:19क्योंकि मैं बखूबी इन नियमों को जानता हूँ, जो प्रवेश कर गया
- 36:24शुद्ध चक्र में। वह सर्वटन हो गया, वह पहुँच
- 36:30जाएगा। एक गुरु का यह काम बड़ा अनोखा और
- 36:35अद्भुत होता है जो व्यक्ति अभी से योग्य नहीं हुए होते कि उन पर
- 36:42शक्तिपात करके। उन्हें अपना आपदा दिखा दिया जाए
- 36:48तो फिर एक ही रास्ता है कि उन्हें इतने सेव कर दो कि अब शुद्धि पे
- 36:53ले जाओ तो कम से कम उनकी लिबरेशन का मार्ग पक्का हो जाएगा।
- 37:09यह एक अन्य में है विशुद्धि के भीतर जो प्रवेश कर गया।
- 37:17लेकिन इस नियम को इतना हल्के में मत ले लेना कि मारकाट शुरू कर दो,
- 37:24झूठ बोलना शुरू कर दो। राजनीति में प्रवेश कर जाओ, ऐसा
- 37:29कुछ मत करना। मैं अपने शिष्यों को समझा देता
- 37:32हूँ कि ऊंट पटांग शुरू मत कर देना, बस तीन काम शुरू रखना, सुबह
- 37:40उठ के क्रियायोग करना, ध्यान में बैठना।
- 37:47नथ्थिंग टु डू ये दूसरा और तीसरा आपको लगातार प्रेरणा मिलती रहे
- 37:56इंस्पिरेशन मिलती रहे वीडियो को सुनते रहना इन तीनों कामों को मत
- 38:03छोड़ना। कमी बत्ती हो सकते हैं नहीं
- 38:09तुम्हारा शरीर इजाजत देता क्रिया योग मत करो बाहर सर्कमस्टैंसरी
- 38:17बड़े ठंडे हैं मुझे पूछ लेते हैं यहाँ बाबा -20 है क्या करें तो
- 38:23मैं कहता हूँ घर में हीटर लगा लो। थोड़े से कमरे को रूम टेम्परेचर
- 38:29पर ले आओ, वहाँ पे कर लो और अगर नहीं कर सकते हो तो कोई बात नहीं
- 38:36ये दिन गुजार लो, इससे निश्चित रहे क्रिया योग छोड़ दो एक बार।
- 38:42कोई शरीर की तकलीफ होती है तो छोड़ दो क्रिया एक चीज़ को छोड़
- 38:47सकते हो। अगर ध्यान में नहीं बैठा जा सकता
- 38:52किसी कारणवश तो ध्यान को छोड़ दो। एक बार अगर कोई तकलीफ हो गई है।
- 39:01वीडियो नहीं सुन सकते तो एक बार छोड़ दो उनको ये पाबंदी नहीं है
- 39:09लेकिन ये आवश्यकता है इन तीनों को करते रहना।
- 39:15प्रेरणा मिलती रहेंगी वीडियो से। क्रियायोग से तुम्हारे भीतर साफ
- 39:24सफाई होती रहेंगी। ऑक्सीजनेशन होता रहेगा और ध्यान
- 39:32से तुम कॉन्शसनेस लेवल को बढ़ाते जाओगे।
- 39:35रोज़ गहरे गहरे, गहरे, गहरे रोज़। ये तीनों चीजों को लगातार करते
- 39:46रहना अगर मैंने तुम्हें स्थापित कर दिया विशुद्धि चक्र पे तो ये
- 39:55मत सोच लेना के विशुद्धि चक्र पे। हम अगर बुरे कर्म भी करेंगे तो
- 40:01विश्व युद्ध पे टिके रहेंगे। नहीं नहीं, इतनी कृपा नहीं है तुम
- 40:04पर की है अभी ध्यान रखना कि तुम कुछ भी अच्छा बुरा करते रहो, तुम
- 40:10नीचे भी आ सकते हो। इसलिए इस स्टेज को बरकरार रखे
- 40:17रहना आवश्यक है। दीक्षा लेने के बाद मैंने कहा तुम
- 40:227 दिन तक बैठो, अगर तुम्हारा माहौल इजाज़त देता है तो अवश्य
- 40:27बैठना चाहिए। 7 दिन तक तुम ध्यान में बैठो,
- 40:34थोड़ा सा और गहरा हो जाएगा। तुम्हारा कॉन्शसनेस लेवल थोड़ा सा
- 40:42और ऊंचा उठ जायेगा। तुम्हें आनंद की वो खुशबू आने
- 40:47लगेंगी और वह आना जरूरी है। खुशबू अगर तुम्हारे नासा पुटों को
- 40:56छू ले तो बार बार तुम्हारा मन करेगा वहीं जाने को बस इसे ही
- 41:01संस्कार कहते हैं तो ये मत सोचना कि तुम यहाँ से दीक्षा लेके गए हो
- 41:12तो जो चाहे करते रहो। जो चाहे मन उत्पाद करता रहे नहीं।
- 41:19फिर तुम विशुद्ध चक्कर से नीचे भी आ जाओगे, अनाहत पे भी आ जाओगे।
- 41:26अगर तुम इसको सिफ़ रखना चाहते हो तो यहाँ से जाओ।
- 41:317 दिन बैठो नहीं भी बैठ सकते। तो कम से कम ऐसा मत करो कि इस
- 41:36समाज में उत्पाद करना शुरू कर दो। स्वतंत्र तुम हो, सुरक्षण नहीं
- 41:43हो, मन में जो आये वो करो, ऐसा नहीं चलेगा।
- 41:50अटॉन्शियसनेस लेवल पे सब फीड होता है।
- 41:55ध्यान रखना तुम जो करोगे वह ततक्षण भीड़ हो जायेगा ततक्षण
- 42:03यहाँ कोई चन्द्रगुप्त वगैरह नहीं बैठे हैं, चन्द्रगुप्त वगैरह को
- 42:07तो रिश्वत दी जा सकती है, सब बिकाऊ माल होते हैं।
- 42:13ये चंद्रगुप्त हुआ, यमराज हुआ, यमदूत हुए, सब बिकाऊ होते हैं,
- 42:18हसा मत करो, कोई गुप्त नहीं बैठा है, ये तुम्हारे स्वामियों की खोज
- 42:28है छग्गी मारने के लिए। लेकिन इनको अब तक मूर्खों को ये
- 42:39भी नहीं पता लगा कि जो ठगी मार कर कमाओगे साथ में ही ले के जाओगे तो
- 42:47वे क्या समझ जाएंगे? क करे वही पुराने के सेपटेर काय
- 43:00काले रंग के एच एम भी के। अरे बस भी करो कुछ खुद का देखा भी
- 43:09बोल दो वो ही गरुड़ प्राण लगा दो। आज इसको जब तुम दीक्षा लेते हो तो
- 43:26गुरु तुम्हें उस केंद्र पे स्थापित कर देता है।
- 43:32जहाँ से बड़ा आसान हो जाता है आसान मैं किस लिए कहता हूँ तो
- 43:38मेरी बेटी को आप अवश्य सुने जिसने नहीं सुनी है, बट इस अनाहत नाक
- 43:44साउंड ऑफ़ साइड लाइन्स अस्तित्व की आवाज क्या है?
- 43:51ये अवश्य सुनो आप बाकी कोई सुनो न सुनो, कोई बात नहीं क्योंकि इसमें
- 43:58पार्ट टू पार्ट देना है। तुम्हें अनाथनाथ 1 दिन शुरू हो ही
- 44:02जायेगा और बड़े काम आएगा तुम्हारा वटका वटका सम्मान अनाथ।
- 44:10के ऊपर ध्यान जामालो किसी बिंदु की आवश्यकता नहीं, किसी स्वास्थ्य
- 44:15पर स्वास्थ्य पर ध्यान लगाने की जरूरत नहीं।
- 44:18वो तुम्हारा बनाया हुआ है। यह अनंतनाथ स्वयं से आया हुआ
- 44:23परमात्मा के द्वार के उद्गम स्थल से प्रकट हुआ हुआ।
- 44:28अपने आप ध्यान इधर खींच जाएगा। इतना रसीला और सुरीला होता है तो
- 44:35यह एक भूम है, परमात्मा का नाद शुरू हो जाए, फिर सहारा मिल गया
- 44:45तुम्हें समझो। मार्ग मेरे जातों में क्योंकि ये
- 44:50धुर जाता है उदगम स्तर पे वहीं से आया है इसके संग संग होलो बड़ा
- 44:56आसान वार मैंने तुम्हें बताया वाजे नाद अनेक असंका केते
- 45:01पावनहारे केते राग परिसों कैयण केते ग।
- 45:15और अगर जाने नहीं हुआ है तो कोई बात नहीं धैर्य रखे अगर हो गया तो
- 45:23बहुत बढ़िया है, नहीं हुआ तो और भी रास्ते हैं और भी राहते हैं
- 45:29वसल की राहत के सिवा और भी गम है जमाने में मोहब्बत का।
- 45:35अकेला यहीं नहीं है रास्ता राहतें और भी हैं अकेला यही रास्ता नहीं
- 45:48है कि चुक गया रास्ता नहीं नहीं उसके विराट रस्ते हैं।
- 45:52अनेकों द्वारों से तुम जा सकते हो, अनेकों रास्ते हैं, जीतने
- 45:58व्यक्ति हैं, उतने ही रास्ते हैं तो चिंता मत करना, किसी और रास्ते
- 46:06से हो लेना केंद्र तक ही तो जाना है।
- 46:11और सफीर से बड़े रास्ते जाते हैं केंद्र की तरफ़ तो मैंने कहा हर
- 46:23चीज़ का निकासी द्वार है। कारण शरीर का भी निकासी द्वार है।
- 46:32कारण शरीर का निकासी द्वार है। सहसा सचखंड के ब्रह्मरंत ऋषि से
- 46:41कह देते हैं, बस कारण शरीर का सही सही निकासी द्वार है, वह अगर कोई
- 46:52दे ही निकलेगा। कारण शरीर को साथ लेके तो वह निकल
- 46:59सकता है, कोई व्यवधान नहीं है, बशर्ते के वो शुद्धि चक्र के ऊपर
- 47:05पहुँच गया हो। इसलिए जो व्यक्ति यहाँ से दीक्षा
- 47:10लेके जाते हैं वह प्रयास ना करें। वह शुद्धि पे आ गए हैं लेकिन
- 47:19मूर्ख न बने देही को साथ लेके यह सटीक मार्ग नहीं है निकलने का
- 47:27कारण शरीर के निकलने का देही के संग।
- 47:32सहस्रार सटीक मार्ग नहीं, हर चीज़ के सटीक मार्ग होते हैं।
- 47:38देही के निकलने का सटीक मार्ग नाभी चक्र है, लेकिन वहाँ से कारण
- 47:43शरीर नहीं जाता। अब इसको आप बहुत विस्तार से मैं
- 47:48आपको डिफ्रेंशीएट करके समझा रहा हूँ।
- 47:53इसलिए कभी भी जब तुम एस्ट्रल ट्रैवलिंग पे जाओगे, बाहर जाओगे,
- 47:57घूमोगे, फिरोगे और गृहतारे इन क्षेत्रों को देखोगे ये जो ऋषियों
- 48:04ने इतनी इन्वेंशन्स की जो आज वैज्ञानिक खोज रहे हैं ये कैसे
- 48:08की? ये दे ही को साथ ले जाके के।
- 48:12लेकिन कारण शरीर साथ नहीं गया। कारण शरीर तो एक बार ही जाता है
- 48:20और कारण शरीर जाता है जब एक बार जाता है।
- 48:28तो सह श्रास हो जाता है और फिर जब कारण शरीर के साथ दे ही निकल गया
- 48:36तो अंतिम वेला में कोई भी द्वार प्रयोग कर सकता है, ये समझ ले बात
- 48:44लेकिन वो वापस आने के दिन नहीं आता।
- 48:49बैन नहीं है। कोई कारण शरीर को किसी द्वार से
- 48:54निकल जाने का बैन नहीं है। कोई बस बैन एक ही है, ये वापस
- 48:59नहीं आ पाएगा। अब इसको बड़ी सूक्ष्म चीज़ है।
- 49:06गौर से समझ लेना कारण शरीर का एक्चुअल निकासी मार्ग है।
- 49:12सथरा लेकिन अगर तुम दे ही के साथ सूक्ष्म शरीर तुम्हारा विद्यमान
- 49:19है, अभी तुमने पूरे भोग नहीं भोंगे हैं, तुमने स्वयं को भी जान
- 49:24लिया है, चाहे। और तुम कारण शरीर को साथ लेकर देह
- 49:32समेट यहाँ से निकल गए हों तो वापस नहीं आओगे, ये पक्का है
- 49:41शंकराचार्य शिव को अच्छी तरह जानते हैं।
- 49:45और शंकराचार्य छह महीने के लिए शरीर से बाहर रहता है।
- 49:50निकलते कहाँ से हैं उन्हें पता है वापस आना।
- 49:55वे मस्ट ऑफ मस्ट हैज़ हैं तो नाभि से जाते हैं और नाभि से ही वापस आ
- 50:03जाते हैं। लेकिन एक बात फिर मैं बता दूँ
- 50:09शंकराचार्य जब जाते हैं, दे ही जाता है सिर्फ कारण नहीं जाता जब
- 50:15कारण जहाँ से गया एक बार तो फिर वापस नहीं आता भाई।
- 50:22कारण जब भी जाएगा देही के बिना जाएगा तो समुद्र में ही समा जाएगा
- 50:29वह बूंद है चेतना की जो देही के संग संग रहती है।
- 50:43समझ में ना आए तो मेरा कसूर न समझना, शब्दों का कसूर समझना,
- 50:50इशारों से समझ जाना, अगर कोई समझे तो वह कण कण में विद्यमान है।
- 51:03लेकिन देही के साथ उसकी एक बूंद रहती है ये समझना मुश्किल हो
- 51:08जाएगा। इस जहान में बहुत सी चीजें हैं जो
- 51:13तुम्हारी समझ में आएंगी नहीं। इसलिए संत भलिभाती जानता है और
- 51:17पहले ये हाथ जोड़ लेता है कि देखो बोल तो न पाऊंगा।
- 51:23तुम्हारे में प्यास है तो बोलने की चेष्टा कर दूंगा।
- 51:30समझ आए तो भला न आए तो भी भला मैं सब चीजों को खोल रहा हूँ हम आपके
- 51:39सामने। तुम दैही को कारण से साथ लेके
- 51:44निकल सकते हो। अगर तुम शुद्धि पे पहुँच गए तो तो
- 51:52ये निकासी द्वार हो सकता है लेकिन ध्यान रखना वापस नहीं हो सकोगे।
- 51:56जैसे ही गति हुई आशुतोष की मैंने 2 साल पहले।
- 52:01ही विल नॉट रिटर्न ऐट ऑल, और उसके बाद तो कहते हैं, एक शादी का भी
- 52:08बेचारी बलि हो गई न? जानें कितने लोग बलि चढ़ेंगे इन
- 52:15मुड़ताओ के? वो जानें उनका प्रतिष्ठान जानें
- 52:27हम बातों को समझा सकते हैं क्योंकि समझा सकते हैं जीसको पता
- 52:33नहीं वह तो समझा भी न पाएगा। मानना न मानना सबकी स्वतंत्र
- 52:41चेतना यह जरूरी नहीं है। तुम चाहो तो मान सकते हो, तुम
- 52:49चाहो तो नहीं मान सकते हो 2 साल हो गए कहाँ माने तुम?
- 52:54तो फिर वहाँ सिर्फ एक ही बात समझती है।
- 53:00यहाँ संस्थान को चलाने वालों में कोई लोभ होगा और वह तो गया जाने
- 53:07वाला यहाँ कोई लोभ अवश्य है जो संस्थान को चला रहे हैं।
- 53:14अन्यथा एक तरफ़ा कर देते लोग अपने गुरुओं को कौन सा नहीं ठिकाने
- 53:17लगाते वो दफन करने योग्य दफन कर देते हैं जलाने योग्य जला देते
- 53:23हैं अपने अपने हिसाब से, लेकिन गुरुओं को उसका अंतरिम छोर तो दे
- 53:29देते हैं ना के गुरु के साथ अन्याय है।
- 53:33शिष्यों का अत्याचार है, अब वो चला गया, वो नहीं कुछ कह सकता,
- 53:38लेकिन ये झूठ जाट बातें हैं। जो लोग कहते हैं कि हमें स्वप्न
- 53:42में आके कह गए, वो कह गए ये कह गए प्रकट हो जाऊंगा वो हो जाऊंगा,
- 53:47कुछ नहीं होगा भाई मेरी खुद उससे बात हुई है।
- 53:52नहीं तो बेचारा बेचारा हो गया। अब छोड़ो इन बातों को हम मूल
- 53:59मु्द्दे पर आ जाएं। कैसे भक्तों की भावनाओं भड़कती
- 54:05हैं मैं क्या करूँ मजबूर मैं भी हूँ सत्य बोलने के लिए।
- 54:12और भावना तुम्हारी बढ़के न बढ़के इससे कोई लेना देना नहीं है।
- 54:15मेरा मेरा लेना देना है। मैं परवाह करता हूँ सत्य की मैं
- 54:20तुम्हारी फिक्र नहीं करता हूँ। मैं फिक्र करता हूँ सत्य की मैं
- 54:26तुम्हारी फिक्र करता या नहीं करता।
- 54:32और जीस दिन मैंने तुम्हारी फिक्र करनी शुरू कर दी जो दुनिया की
- 54:35फिक्र करना शुरू कर देता है, वह शक्ति की फिक्र से चूक जाता है।
- 54:40मेरे इन शब्दों को गोल्ड इन शब्दों में लिख लेना, जो दुनिया
- 54:45की फिक्र करना शुरू कर देता है, वह शक्ति की फिक्र करना बंद कर
- 54:49देता है। इसलिए मैं तुमसे करता हूँ, कुछ तो
- 54:55लोग कहेंगे आशा मत करो, लोगों का काम है कहना छोड़ो विकास की बातें
- 55:06कहीं बीत न जाए। अरे ना आओ।
- 55:10हम तो रात को सुनहरी कर रहे हैं तो इन्होंने तो अपनी रात सुनहरी
- 55:16कर ली। अब बारी है तुम्हारी चूक न जाओ इन
- 55:31मूर्खताओ को इतना फैलाया गया जो जानते नहीं थे।
- 55:35उन्होंने भी कुछ न कुछ कहा, बड़ी गलत बात है जब तुम जानते नहीं यू
- 55:46शुड बी क्विट तुम्हें चुप हो जाना चाहिए मानवता की इसमें भलाई है
- 55:53तुम्हारा बोलना। अगर मानवता के लिए अभिशाप बन जाए,
- 55:58भटकाव का कारण बन जाए तो तुम पापी हो।
- 56:03मैंने बहुत बार कहा है और लोग बोले ही चले जाते हैं।
- 56:11किसी के मन में राज्यसभा की टिकट पाने की इच्छा है?
- 56:14उन्हें लगता है राज्यसभा की टिकट में वह आनंद मिल जाएगा, भाई नहीं
- 56:19मिलेगा जो तुम्हें टिकट देगा, ना पीएम ना सीएम, किसी को नहीं
- 56:24मिलेगा। मिलेगा किसे मिलेगा उससे?
- 56:31मयभु गए सावरिया। बोल गए सांवरिया आवन कह गए आज हो
- 57:05न आए आमन। कह गए आजगुणा आए ली नहीं मोरी
- 57:24खबरिया। मोहे भूल गए, सांवरिया भूल गए
- 57:41सांवरिया। इस भजन के बीच में थोड़ा सा
- 57:53सूक्ष्म रोहणों के लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए मैं बता
- 57:57दूँ। अगर कहीं ऐसी गलती हट जाए तो
- 58:04ज्ञानगंज में तीन रोए बैठे हैं। एक तो स्वामी उदंडानंद जी महाराज,
- 58:15तृप्तानंद जी गिरि और तीसरी सुनंदा कात्या स्त्री ये तीन
- 58:24रूहें बैठी हैं। ध्यान रखना शरीर के बाहर निकलने
- 58:29के बाद कोई पुरुष या स्त्री नहीं रहता, बस वो सिर्फ विद्युत के
- 58:38तरंगे मात्र रह जाता है। यह तीन लोग बैठे हैं उनसे।
- 58:44दिशानिर्देश ले सकते हैं और वो आने वाले करीब 1,00,000 वर्ष तक
- 58:50के लिए वहीं बैठेंगे, कोई उलझ जाए।
- 58:54व्यक्ति कोई गलती कर बैठे तो उनसे परामर्श ले सकते हैं।
- 59:01वो इस वक्त के ध्रुव हैं। हमारी आध्यात्मिक फील्ड में।
- 59:13जो मैं ऐसा जान। प्रेत न करियों।
- 59:59को प्रेत न। करियों को।
- 1:00:14मोह भूल गए सागरिया भूल गए सांवरिया।
- 1:00:34आमन कह गए आज हो न आए। ये।
- 1:00:42आमन कह गए आज हो न आए। मौरी खबरिया मैं भूल गए सागरिया।
- 1:01:11भूल गए सावरिया नैन कहें रो। रोके सजना देख चूके हम चार का
- 1:01:37सपना। नै न कै रो रो के सजना देख चूके
- 1:01:52हम प्यार का सक। प्रीत हजोठ प्रीतम झूठा प्रीत
- 1:02:10हजोठ प्रीतम झूठा। झूठी हसारी नगरिया मोहे भूल
- 1:02:33सांवरिया। भूल गए सांवरिया दिल को दिए क्यों
- 1:02:52दुःख विरहा के। दिल को दिए क्यों दुख विरहा के
- 1:03:07तोड़ दिया क्यों? महल बना के तोड़ दिया।
- 1:03:21क्यों महल बना के आस? दिला के।
- 1:03:33ओह बेधर दे आस दिला के ओह बेधर दे फिर लिखा।
- 1:03:50ये। नजरिया फिर लिखा है नजरिया मोहे
- 1:04:03भूल गए। सागरिया भूल गए सांपरिया आवन कह
- 1:04:22गए आज होना आये। अमन कह गए आज हो ना आए ली ना ही
- 1:04:39मेरी खबर या मोह भूल गए। सांवरिया भूलकर सांवरिया।
- 1:05:03श्री कृष्ण गोबिंद। हरे मुरारी हिनाथ नारायण वासुदेव
- 1:05:23श्री कृष्ण गोबिंद। हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव
- 1:05:41पितुमात स्वामी सखा। हमारे पितुमात स्वामी सखा हमारे ए
- 1:05:59नौथ नारायण वासुदेव। श्री कृष्ण गोबिंद हरे मोरा रे ए
- 1:06:16नॉर्थ नारायण वासुदेव।