Latest / Baba ji Vijay Vats / 20 Aug 25 - साक्षी - आत्म-ज्ञान की पहली सीढ़ी! “साक्षी भाव” कैसे विकसित करें? सत्य क्या है?
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- 0:01सुख शांति देता है और सत्य से सुख मिलता है।
- 0:11असत्य से दुख मिलता है सुख से। खुशबू मिलती है और सत्य से सुख
- 0:26मिलता है। इन शब्दों को थोड़ा सा समझ लेना
- 0:33महावीर हूँ, बुद्ध हूँ नानक हूँ। या कृष्ण हूँ या पतंजलि हूँ।
- 0:46परमात्मा की इस राह में सबसे पहले जो शब्द कहा गया वो सत्य है।
- 0:55पतंजलि कहते सत्य अहिंसा अस्त। बुद्ध भी यही कहते हैं, महावीर भी
- 1:03यही कहते हैं, नानक भी यही कहते हैं, आध सच जुगाद सच संतो ने सत्य
- 1:14का इतना महत्त्व क्यों बताया? ये सत्य है क्या?
- 1:24कृष्ण भी कहते हैं, अर्जुन को के अर्जुन तो अगर कप रहा है।
- 1:36तो तू झूठ में स्थित है। इस झूठ के तल को छोड़कर सत्य के
- 1:44तल पे आ जाना। सभी संतों ने कहा सत्य बोलो, सत्य
- 1:56करो। सत्य से सुख मिलेगा और सुख
- 2:02तुम्हारी चाहत है। प्रत्येक प्राणी सुख चाहता है तो
- 2:09संत कहते हैं कि वह सुख मिलेगा। सत्य से सत्य क्या है?
- 2:16ये तुम आज तक जान नहीं पाए। कृष्ण कहते हैं, सत्य क्या है हे
- 2:26अर्जुन ये फैसला हो ही जाना चाहिए क्योंकि जन्मो जन्मो तक तुम दुख
- 2:33भोगते रहे हो। और जन्मो जन्मो तक तुम दुख भोगते
- 2:38रहोगे, उसका मूल कारण क्या है? उसका मूल कारण है झूठ।
- 2:50तुम जान ही लो के सत्य है क्या? जानने से बात बनेगी, सिर्फ मानने
- 3:04से बात नहीं बनेगी जान हीरो के सत्य क्या है?
- 3:15सत्य सुख देता है, सत्य सुगंधि देता है, सत्य दुखों का हरण करता
- 3:23है, दुख कष्टों से दुख कष्टों से मुक्त कर देता है सत्य।
- 3:33तुम्हारे जीवन में सुगंधी का बाग खिला देता है सत्य कृष्ण इतना
- 3:46ज़ोर क्यों दे रहे है? पतंजलि, महावीर, बुद्ध, नानक सत्य
- 3:53पर इतना ज़ोर क्यों दे रहे हैं? क्योंकि तुम्हारे सुख में
- 4:03तुम्हारे आनंद में जो जड़ है जो फाउंडेशन है?
- 4:12वह सत्य है। अगर सत्य की नींव तुमने डाल ली तो
- 4:20तुम कभी दुखी न होगे। तुम कभी कष्ट में नहीं आओगे।
- 4:30तुम्हें कभी ज़रा दुख व्याधी दर्द यह नहीं होगा तुम कभी बीमार नहीं
- 4:36होगे और सबसे बड़ी बात तुम कभी मरोगे नहीं।
- 4:45बड़ी अद्भुत बात के ही कृष्ण ने। कृष्ण कहते हैं अर्जुन काहे तुम
- 4:57झूठ में गिरे फिरे हो, क्यों नहीं सत्य में आ जाते?
- 5:04क्यों नहीं सत्य को जान लेते? जिसके जानने से सुख तुम्हारे पांव
- 5:17छुमेगा संसार की सारी संपदा तुम्हारे चरण चुमन करेंगे।
- 5:31प्रत्येक कण में तुम ही तुम विराजमान होगे, तुम्हे दर्द नहीं
- 5:41होगा, तुम्हे दुख नहीं होगा। न कष्ट, न पीड़ा, न तनाव, न ज़रा
- 5:50न व्याधि, न तकलीफ, न जलन, न चिंता, न तनाव।
- 5:57कृष्ण कहते हैं यह कुछ भी नहीं होगा।
- 6:02अगर तुमने सत्य को जान लिया लेकिन अगर तुमने सत्य को नहीं जाना,
- 6:10पार्थ तो ये सब कुछ होता रहेगा? सब कुछ होता आया है।
- 6:22और सब कुछ होता ही रहेगा क्या तुम मरोगे भी?
- 6:29तुम जनमोगे भी तुम्हें दर्द भी होगा, कष्ट भी होगा।
- 6:41तुम चिंता भी करोगे तुम सभी दुखों से घिरे रहोगे अगर तुमने सत्य को
- 6:54न जाना और तुम चाहते हो सुखी रहना।
- 7:03तुम चाहते हो आनंद रहना तुम चाहते हो कि तुम्हारे आस पास आनंद की
- 7:10फुलवारी सदा के लिए रहे कवि दुख नय कवि कष्ट नय।
- 7:18तो फिर उसका एक ही रास्ता है अर्जुन कि तुम सत्य को जान लो
- 7:27सत्य क्या है? इस एक को जानने से सभी व्याधियाँ
- 7:34बंट जाएंगी। सत्य क्या है?
- 7:39इस एक को जान लेने से मृत्यु मट जाएगी, दर्द मट जाएगा, भराबा मिट
- 7:49जाएगा, कष्ट मिट जाएगा, तनाव मट जाएगा, चिंता नहीं रहेंगी।
- 7:59ये सब जिनके कारण तुम परेशान हो अर्जुन इनमें से कुछ भी तो ना
- 8:08रहेगा अगर तुमने सत्य को जान लिया।
- 8:18अर्जुन कहता है प्रभु ये सत्य क्या है?
- 8:27जीसको जान लेने से सारे दुख तकलीफ, जनताएं, कष्ट, क्लेश।
- 8:36दर्द, बुढ़ापा, तनाव, चिंता सब खत्म हो जाता है।
- 8:45कृष्ण कहते हैं, ये जो तुम थर थर कांप रहे हो, ये जो तुम्हारा सारा
- 8:53शरीर सूखे पत्ते की तरह कांप रहा है।
- 8:58यह कंपना मिट जाएगी अगर तुमने सत्य को जान लिया क्योंकि ये
- 9:08कल्पना, ये चिंता, ये तनाव, ये थर थर का अपना।
- 9:13ये कष्ट, ये व्याधि ये है ही तो कि तुमने आज तक के सत्य को जाना
- 9:19नहीं, जैसे घड़ी तुम सत्य को जान लोगे।
- 9:29इन सभी चीजों से मुक्त हो जाओगे क्योंकि सत्य मुक्त करता है और
- 9:36झूठ तुम्हें बांधता है। सत्य खुशी देता है, झूठ दर्द देता
- 9:42है, दुख देता है, तकलीफ देता है। कष्ट और क्लेश देता है और तुम
- 9:52चाहते हो सुख और कर्म ऐसा करते हो जिससे पहुंचे दुख।
- 10:07हे अर्जुन तू ऐसा कुछ कर जिससे तू सत्य हो जाए, तू ऐसा कुछ कर जिससे
- 10:24तेरा झूठ बैठ जाए। क्योंकि ये झूठ ही है बुनियादी
- 10:32कष्टों करेशों का कारण तू इस झूठ को मिटा क्यों नहीं देता?
- 10:38अर्जुन लेकिन कृष्ण की कोई भी बात?
- 10:45अर्जुन के समझ में आती क्योंकि जो कभी उस स्थल पर गया नहीं जीस स्थल
- 10:56की बात कृष्ण करते हैं तो जो गया नहीं वह समझेगा कैसे उस स्थल की
- 11:03बात। अगर कोई बगीचों से सुंदर उपवन से
- 11:11सुगंधो से परम सुगंधो से बाहर आ जाता है और आके उसका वर्णन करता
- 11:19है उस व्यक्ति से जो कभी बाग बगीचे में गया ही नहीं।
- 11:27तो क्या वह उस व्यक्ति की बातों को समझ पाएगा?
- 11:31नहीं समझ पाएगा क्योंकि वो कभी बाग बगीचों में गया ही नहीं, वह
- 11:36टहला ही नहीं, उसे पता ही नहीं सुगंध होती क्या है?
- 11:42उसे तो दुर्गंध का मालूम है इसलिए कृष्ण कहते हैं कि तुम कभी उस तल
- 11:48पर ज्ञान और उस तल पर न जाने के कारण ही यह सारे दुख तुम्हें घेरे
- 12:00हुए हैं। तू कप रहा है सूखे पत्ते की तरह
- 12:05तू सिर्फ उसी कारण से के तू सत्य को जानता नहीं, तू दुख में आसीन
- 12:15है, तू असत्य में आसीन है। और क्यों नहीं तू सत्य को जान
- 12:24लेता? बाधा क्या है?
- 12:28सत्य को जान लेने में हर्ज क्या है?
- 12:30पार्थ एक को जानने से? सभी को जान लिया जाता है और एक को
- 12:47जानने से सभी पीढ़ाओं व्याधियों का नाश हो जाता है।
- 12:55एक साध्य सब सध्या सब साध्या सब जाय।
- 13:06मेरे एक मित्र का पिता मर रहा था, मित्र ने मुझे बुलाया कि पिताजी
- 13:19देह छोड़ रहे हैं। आप एक बार आ जाओ, मैं वहाँ चला
- 13:26गया, प्राण निकलने वाले थे, वह तंग हो रहा था, मुझसे बोला बाबा।
- 13:40मैं अभी और जीना चाहता हूँ, मैं अभी मरना नहीं चाहता हैने कहा
- 13:51क्यों? क्या ज़िन्दगी में इतना सुख पाया
- 13:56है? कि उस सुख को उस लुत्फ को फोर
- 14:02लेना चाहते हो नहीं बाबा सुख ही तो नहीं पाया, दुख ही दुख पाया है
- 14:12तो फिर भी जीना चाहते हो क्यों जीना चाहते हो?
- 14:16जिसे ज़िन्दगी ने सुख नहीं दिया। फिर फिर उसको क्यों पाना चाहते
- 14:23हो? उसने बड़ा सुंदर जवाब दिया और
- 14:28मेरे होश फक्त हो गए। बाबा इस आश्रम में जीना चाहता
- 14:37हूँ। कि अगर थोड़ा और जी लिया तो शायद
- 14:42जो जीवन भर नहीं मिला, मशक्कत के बाद वो अब मिल जाएगा।
- 14:51आशा त्रिचना ना मरे कह गए भक्त कबीर?
- 14:57माया मरी न मन मारा, मर मर गए शरीर माया मरी न मन मारा, मर मर
- 15:11गए शरीर आशा तृष्णा न मरी। कह गए हो भक्त कभी आशा नहीं मरते
- 15:25और आशा क्यों नहीं मरते? अब इसका गहरा पहलू देख लेना तो
- 15:31तुम्हें समझा जाएगा। आशा तू नहीं मरती कि तुम्हें आज
- 15:38तक सुख मिला। पूरा जीवन बीत गया, तुम्हें सुख
- 15:47की झलक नहीं मिले और तुम सुख चाहते हो, सुख आज तक मिला नहीं।
- 15:58तो तुम और जीना चाहते हो और जीना चाहते हो के शायद और झेलूं थोड़ा
- 16:09सा वो रात कभी तो आए थे। इसी आशा में गुजर जाता है सारा
- 16:21जीवन वो रात कभी नहीं आते, तुम गुजर जाते हो, जिंदगी गुजर जाती
- 16:30है, लेकिन वो रात कभी नहीं आती। जो तुम्हारे लिए सुख का संदेश
- 16:37लेके आए यह आशा यह त्रिशणा बड़े खतरनाक है तुम अगर इसीलिए जीना
- 16:52चाहते हो। कि आज तक सुख नहीं मिला शायद फिर
- 16:57मिल जाए। जब आज तक नहीं मिला 60 साल जे लिए
- 17:0470 साल जे लिए फिर आगे कब मिलेगा जीने का त्री कब वही है वही है
- 17:12चाल बेडंगी जो पहली थी वो अब भी है कुछ भी नहीं बदलेगा, फिर जीवन
- 17:19कैसे बदल जायेगा? कृष्ण कहते हैं, अगर कुछ बदले तो
- 17:27जीवन भी बदल सकता है। वह कुछ क्या बदले तुम्हारा तल्
- 17:33बदले तुम जीस तल् पर खड़े हो वह दुर्गंध ही दुर्गंध है, तनाव है,
- 17:45पीड़ा है, कष्ट है, क्लेश है, चिन्तनाएं हैं, चिन्ताएं हैं।
- 17:52दर्द है, दुख है, तकलीफ है और तुम उस तल को छोड़ना नहीं चाहते, तल
- 18:01को छोड़ना नहीं चाहते। आशा ये करते हो कि वो रात कभी तो
- 18:08आएँगे। कभी तो मुझे सुख मिलेगा ये आशा
- 18:19करना व्यर्थ है। जब आज तक तुम्हें सुख नहीं मिला,
- 18:25तुम्हारे जीने का ढंग ऐसा है। तुम्हारे जीने का ढंग खुशबू फैला
- 18:33नहीं सकता। तुम्हारे जीने का ढंग तुम्हें
- 18:37दुखी ही कर सकता है और तुम दुखी ही हो।
- 18:45कृष्ण कहते हैं, अर्जुन। जब तक तू अपने जीवन का तंड न
- 18:51बदलेगा तब तक ना तो ये कष्ट मिलेंगे मिटेंगे ना ये क्लेश
- 18:58मिटेगा ना दुख दर्द मिटेगा जैसे कोई व्यक्ति सुगलों की सेज पे
- 19:05लेटा। ये कामना करता है कि मुझे सुख
- 19:10मिले फूलों की सेज जैसा तो यह असंभव है।
- 19:18अगर फूलों की सेज जैसा आनंद चाहिए तो फूलों की सेज पे ही लेटना
- 19:24होगा। कांटों की सेज पे लेटा लेटा तुम
- 19:30इच्छा करो कि मुझे फूलों की सेज जितना आनंद आए नहीं आएगा और आता
- 19:37भी नहीं कृष्ण यही दो शब्द कहते हैं अर्जुन से।
- 19:45और इन दो शब्दों की ही गीता है। अगर तुम ठीक से समझो तो कृष्ण कभी
- 19:54इधर से कभी उधर से दाएं, बाएं उत्तर दक्षिण, पूर्व, पश्चिम सभी
- 20:01तरफ से कोशिश करेंगे तुम्हें एक बात समझाने की।
- 20:06ध्यान रखना कृष्ण कभी दूसरी बात नहीं समझाते हैं।
- 20:12कृष्ण एक ही बात समझाते हैं और जीस दिन तुम्हें समझ आ गई वो उस
- 20:19दिन तुम गीता पढ़ने को छोड़ दोगे। क्या समझाना चाहते हैं कृष्ण
- 20:29कृष्ण कहते हैं, तल बदलो जीस स्थल पे तुम खड़े हो वहाँ दुर्गंध आएगी
- 20:40वहाँ तनाव आएगा। चिंता आएगी तुम थर थर काँपोगे
- 20:45कष्ट भी आएँगे, क्लेश भी आएँगे, चिंताएं भी आएँगे।
- 20:50तुम जलोगे तुम मरोगे, फिर लेकिन तुम इच्छा करते हो कि मैं कभी
- 20:59मरूँ, ना तुम इच्छा करते हो कि चारों तरफ खुशहाली की खुशबू हो,
- 21:07आनंद ही आनंद हो, बाहर ही बाहर हो, यह संभव न हो पाएगा।
- 21:12अर्जुन संभव तभी होगा जब तुम तल बदलोगे?
- 21:22उस स्तर पे चले जाओगे। जीस स्तर पर बगीचे हैं, सुगन्धित
- 21:29फूल लगे हैं, उस बगीचों में जाना पड़ेगा।
- 21:37आज तुम गड्ढरों के पास खड़े खड़े हैं, सुगंधों की कामना कर सकते
- 21:43हो, सुगंधों के सुगंध देख सकते हो, सुगंधों की कल्पनाएं कर सकते
- 21:49हो, लेकिन सुगंधें नहीं आएंगी। सुगंधें आएंगी वास्तव में।
- 21:55जब तुम सुगंधित बाग बगीचों में चले जाओगे, उससे पहले कल्पनाएं कर
- 22:01सकते हो, स्वप्न देख सकते हो, लेकिन सच में कुछ नहीं होगा।
- 22:06सच में अगर चाहते हो कि सुगंधित मिले तो उस बाग बगीचे में उतरना
- 22:14पड़ेगा। यही तुम्हारी दुविधा है।
- 22:20बागों में तुम जाना नहीं चाहते खड़े रहना चाहते हो, तुम दुर्गन्ध
- 22:26युक्त गटरों के पास काम न तुम सदा करते रहते हो कि हमें हमारी नास
- 22:33का पुटें। सुगंधों से आपूरित हो जाएं, यह
- 22:37कभी होता नहीं। सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता और
- 22:44तुम सत्य को झुठलाने की चेष्टा करते हो।
- 22:49कृष्ण कहते हैं, अर्जुन, अर्जुन। तुम मरने से डरते हो और खड़े हो
- 22:58उस जगह पे जहाँ मृत्यु के सिवा और कुछ है नहीं, थोड़ा प्यारा सा
- 23:07कृष्ण कहते है तुम मृत्यु से डरते हो।
- 23:12और तुम खड़े वहाँ पर हो जहाँ मृत्यु ही मृत्यु है जहाँ अमृत है
- 23:18नहीं क्या है मृत्यु तुम पदार्थों से मोहर लगाये खड़े हो।
- 23:30और पदार्थ मरते हैं, पदार्थों का स्ट्रक्चर ढांचा खींचता है,
- 23:40पदार्थ बिखर जाते हैं, पदार्थ कभी भी अपने स्ट्रक्चर में रहते हैं।
- 23:50और तुम कामना ये करते हो कि यह पदार्थों से बना हुआ शरीर यह सदा
- 23:59ऐसा ही रहे यही तुम्हारी नादानी है।
- 24:03अर्जुन कृष्ण कहते हैं, इस नादानी को त्याग दो।
- 24:10सत्य को स्वीकार कर लो, उसी सत्य की बात जिसे महावीर कहते हैं,
- 24:17पतंजलि, बुद्ध, नानक और सत्य की ही जीत होती है, सत्यमेव जयते।
- 24:30तुम अगर सत्य को जान लोगे तो सुखी हो जाओगे।
- 24:35दो अक्षर का सूत्र तुम्हे सुखी बना देगा, शांति दे देगा,
- 24:44तुम्हारे सारे तनावों को हर लेगा। तुम्हारे दुःख दर्दो को दूर कर
- 24:50देगा, यहाँ तक कि तुम्हारी मृत्यु को भी दूर कर देगा तुम्हे मृत्यु
- 24:55से मुक्त कर देगा मृत्यु नाम की कोई चीज़ तुम्हारे लिए नहीं रह
- 25:01जाएगी। कृष्ण कहते है अर्जुन से।
- 25:08कृष्ण कहते है तू इच्छा करता है अमर होने की और खड़ा है उस जगह
- 25:15जहाँ मृत्यु ही मृत्यु है अगर तू अमर होना चाहता है तो उस तल पर
- 25:23निकल जा जहाँ अमरता है। जहाँ में जाकर तू अमर हो जाएगा
- 25:33बुद्धिमान मनुष्य इन पदार्थों में विचलित नहीं होता बुद्धिमान।
- 25:46बुद्धिमान व्यक्ति इन पदार्थों में विचलित नहीं होता, इसलिए वह
- 25:56अमर हो जाता है। तुम इन पदार्थों से के पदार्थों
- 26:02से बना हुआ ढांचा। इससे मोह करते हो, इससे एकात्म
- 26:11सात्य हो। तुम ये मानते हो कि ये मैं हूँ,
- 26:19सोचते सोचते मानते मानते। तुमने ये पक्का विश्वास ही कर
- 26:28लिया है कि मैं शरीर हूँ, बस मानने का यही नुकसान होता है।
- 26:38मैंने आपको पहले भी बहुत बार कहा कि मानने से शुरू तो कर दो।
- 26:43लेकिन मानने में तुम उलझ जाते हो। ये तुम्हारी पीड़ा का कारण बनता
- 26:48है। तुम मान लेते हो कि ये अनार है है
- 26:55भी लेकिन ये अनार है, ये तुम सदा ही मानते रहो, ये गलत है।
- 27:03फिर तुम कभी डॉक्टरेट न कर सकोगे। तुम पीएचडी कभी न कर सकोगे एम्
- 27:09अनार है यह जानने से शुरू करना होता है।
- 27:15शुरू तो मान्यता से ही करो लेकिन मान्यताओं से जकड़े मत रहो।
- 27:22यह ए अनार कभी छूट जाना चाहिए? कभी तुम्हें इबारत पढ़नी आनी
- 27:30चाहिए। पूरा का पूरा शब्द तुम पढ़ लो और
- 27:36कब पढोगे जब तुम ए अनार की मान्यता से मुक्त हो जाओगे।
- 27:44तुम इससे मुक्त होते, इसे ही अंधभक्त कहते है?
- 27:49इसे ही अंधविश्वास करते है। फिर तुम्हारे भीतर से प्रश्न उठते
- 27:56है। बाबा कह दो ना।
- 27:59के विष्णु होते हैं। भाई विष्णु जब नहीं होते तो मैं
- 28:06कहता हूँ नहीं होते कल को मैं कहूं के ए अज्ञान का भी होता है ए
- 28:17असमर्थ का भी होता है। तो तुम कहोगे बाबा तुमने तो कहा
- 28:22था ए अनार का होता है, कह दो ना कि ए सिर्फ अनार का ही होता है,
- 28:30आज तुम कहने लगे ए तो असमर्थ का होता है।
- 28:35ए तो अप्रिय का होता है। ए तो और बहुत चीजों का होता है
- 28:42तुम कह दो ना के विष्णु भगवान हैं बस यहाँ थमा के दुख हो जाते हो
- 28:51तुम मान लेते हो कि ए सिर्फ अनार का है।
- 28:59तुम्हारे दुखों का कारण मान्यता गलत मान्यता है।
- 29:04मान्यता से चपट जाना तुम्हारे दुखों का कारण बुद्धिमान व्यक्ति
- 29:11पदार्थों से विचलित नहीं होता। तो वह अमर हो जाता है।
- 29:21ये कृष्ण कहते हैं, अर्जुन बुद्धिमान व्यक्ति इसको अच्छी तरह
- 29:27से समझ लेना। यह सार है गीता का बुद्धिमान
- 29:32व्यक्ति। पदार्थों से विचलित नहीं होता तो
- 29:37वह अमर हो जाता है और तुम अमर होना चाहते हो तो एक सूत्र बता
- 29:47दिया भगवान कृष्ण ने कि इन पदार्थों से विचलित मत हो।
- 29:55मान्यता तो ठीक शुरू तो करो लेकिन उसको छाती से चिपकाए मत बैठे रहो
- 30:07ऐ सिर्फ अनारका नहीं उगता। अनार का होता है, सिर्फ अनार का
- 30:14नहीं होता है और भी बहुत सी चीजों का होता है ये जीस दिन तुम्हें
- 30:22समझा गई उस दिन तुम नहीं कहोगे के बाबा कह दो ना के विष्णु होते
- 30:28हैं। कह दो ना के ब्रह्मा, शंकर,
- 30:34दुर्गा, पार्वती ये सब होते हैं मेरे कहने से क्या होगा कल को तुम
- 30:45कहोगे बाबा कह दो ना ये शरीर मैं हूँ।
- 30:49बिल्कुल तुम हो मैं कह दूंगा तुम्हें तुम शरीर भी हो, लेकिन अब
- 31:00ये गहरा शब्द है। अब थोड़ा सा शांति से सुन लें।
- 31:05सारे संत कहते हैं कि तुम शरीर नहीं।
- 31:09शुरूआत तो यहीं से होती है जैसे ए अनार है।
- 31:14शुरूआत तो यहीं से होती है फिर बाद में जाके ए अनार नहीं है।
- 31:19ए और भी बहुत सी चीजों का है जब तुम साक्षी होते हो।
- 31:26और देखते हो कि यह पदार्थों का संग्रह बोल रहा है, यह पदार्थों
- 31:35का संग्रह श्वास ले रहा है, यह पदार्थों का संग्रह देख रहा है यह
- 31:41बोल भी रहा है। यह माटी का पुतला माटी का।
- 31:50पुतला कैसा नचत है, कैसा नचत है? डरियो फिरत है माटी का पुतरा कैसे
- 32:14नचत? है।
- 32:19अब थोड़ा गहरा शब्द आएगा आगे। तुम शरीर नहीं हो, पहले तो ये
- 32:32जानना पड़ेगा कि तुम शरीर नहीं हो, तुम शरीर के साक्षी हो, वह
- 32:37चेतन रूप हो जो शरीर को हर वक्त। सोते जगते क्रिया करते देखता है
- 32:47लगातार निरंतर तुम वो यह अनार की तरह है अनार उसके बाद जब तुम आगे
- 32:58मरहरों पर निकल जाओगे। तो तुम शरीर भी हो, तुम आत्मा भी
- 33:12हो, तुम चेतना भी हो, सब कुछ तुम हो पदार्थ भी तुम हो।
- 33:19और चेतन भी, तुम जड़ भी तुम हो और चेतन भी तुम हो सब कुछ तुम हो,
- 33:28लेकिन शुरुआत कहाँ से करना पड़ेगा कि तुम चेतन हो, तुम जड़ नहीं हो।
- 33:40जड़ के तुम साक्षी हो और तुम देखो इसी जड़ को और तुम्हें देखेगा जब
- 33:46तुम साक्षी हो जाओगे तो तुम्हें ये जड़ दिखेगा।
- 33:50क्रियाकलाप करते हो, बोलते चलते हँसते रोते।
- 33:59कभी इसमें विराग आएगा, कभी ये खुशी से नाचने लगेगा, कभी ये दुख
- 34:07में पागल हो जाएगा, कभी ये सुख में और आनंद में छलांग लगाना शुरू
- 34:12कर देगा? संत कहते हैं शुरू यहाँ से करो
- 34:21शुरू ए अनार से करो, तुम शरीर नहीं हो, तुम इसके साक्षी हो और
- 34:30देखिए अगर तुमने ये कदम छोड़ दिया।
- 34:32पहला। तुमने ये नहीं जाना की ये एनआर
- 34:35होता है तो तुम अवारत भी निपट सकोगे।
- 34:41बड़ा गहरा विषय है थोड़ा शास्त्रों से अटके आएगा।
- 34:48पहले जानना पड़ेगा की तुम शरीर नहीं?
- 34:55और उसके तर्क देने पड़ेंगे सब शरीर के तुम साक्षी हो देखो शरीर
- 35:01बोल रहा है तुम्हें दिख रहा है बाहर से आती आवाज़ों को तुम सुन
- 35:06रहे हो ये कान तुम नहीं हो। बाहर के दृश्यों को तुम्हारी
- 35:12आँखें देख रही हैं, ये आँख तुम नहीं हो तो पहले ये देखना पड़ेगा
- 35:20कि तुम शरीर नहीं हो और अंत में क्या होगा?
- 35:26धीरे धीरे धीरे धीरे तुम आ गई चलोगे?
- 35:31और आगे चलते चलते एक वक्त ऐसा आएगा जब तुम जानोगे के शरीर भी
- 35:40तुम हो पदार्थ भी तुम हो। जड़ भी तुम हो चेतन भी तुम हो अगर
- 35:52उपनिषद कहते हैं तो वो सत्य कहते हैं।
- 35:59उपनिषद कहते हैं के तुम्हारे सिवाय यहाँ कुछ भी नहीं है।
- 36:08ईशा वश्य में दम सर्वम यत किंच जगत राम जगत इस जगत के कण कण में
- 36:14व्याप्त है तुम सब कुछ हो, तुम जड़ भी हो तुम चेतन भी हो।
- 36:23और अगर तुम कहते हो कि मैं जड़ नहीं हूँ, मैं चेतन हूँ तो समझना
- 36:30अभी अधूरे रह गए अभी पूरे नहीं हुए हैं क्योंकि अभी भेद बुद्धि
- 36:38बनी रही जड़ और चेतन के बीच में। तुमने अपना पसारा, बिन नावें ना
- 36:48ही कोठाओ ये ता कित्ता तेता न ये सारा पसारा भी वह है पसारे को
- 36:58देखने वाला भी वह है यह पसारा भी वह है।
- 37:04संसार भी व्यय है अन्यथा उसके बिना संसार आ कहाँ से गया?
- 37:11ईशा वास्य में हम सर्वम जगत जगत चाहे जड़ है, चाहे चेतन है जो भी
- 37:20कुछ है। वॉटेवर इट इस जो भी विद्यमान है,
- 37:29जो भी मौजूद है, वह एक है जिसे हम ईश्वर कहते हैं, जिसे बाबा नानक
- 37:38नाम कहते हैं। जेता कित्ता तेता नाम सारा पसारा
- 37:44उसको नाम कहते हैं बाबा बिन नावें नाहीं को ठान और नाम के बिना कोई
- 37:51ठान नहीं नाम यानी जो है वॉटेवर एग्ज़िस्ट विद्यमान है जो।
- 37:59मौजूद है जो जिसकी प्रजेंस है, जो मौजूद है, एक्सिस्टेंस इस गॉड जो
- 38:09कुछ है वह परमात्मा है। ईशावश्यमितम, सर्वम यत, किंच जगत,
- 38:17याम जगत सब जगह है। जगत में भी है और जगत के पार भी
- 38:21है। जगतयाम जगत अगर तुम कहते हो कि
- 38:28मैं तो सिर्फ परमात्मा हूँ और संसार का दृष्टा हूँ तो यह है एक
- 38:35लेवल पे सत्य तो है। जानना तो पड़ेगा एक लेवल पे आके
- 38:41कि यह शरीर तुम नहीं हो क्योंकि तुम इसे देख रहे हो?
- 38:47इसकी देखती हुई सभी क्रियाएं के तुम साक्षी हो सोते में भी तुम
- 38:53देखते रहते हो इसे। ये कितनी प्यारी निद्रा में
- 38:58निमेधन है यह है और स्वप्न अवस्था में भी तुम देखते हो कि देखो यह
- 39:04स्वप्न देख रहा है और जब से में होते हो तो भी देखते हो ये देखो
- 39:11ये कितनी प्यारी निद्रा में सोया हुआ है।
- 39:14और जब जागते हो तो भी देखते हो कि देखो ये जाग रहा है तुम शरीर की
- 39:21सभी अवस्थाओं के साक्षी हो। पहले पहला कदम फर्स्ट स्टेप तुम
- 39:31साक्षी हो। जो तुम्हें दिखता है वो तुम नहीं
- 39:36हो यह बिल्कुल ऐसा है जैसे कायदा पढ़ लिया एम् अनार ठीक है तब आगे
- 39:46चले एम् अनार है तो बाकी क्या है? बाकी भी तो फल है सेब है।
- 39:55सिर्फ अनार ही तो नहीं है? बग्गु गोशा है, नाश पाती है, आलू
- 40:02बुखारा है, केला है, संतरा है, कितने फल हैं सिर्फ अनार ही
- 40:11थोड़े? ये आगे आएगा जो संत है कृष्ण है
- 40:22कृष्ण आखिर में तुम कहेंगे के तुम शरीर भी हो, तुम सिर्फ साक्षी
- 40:31नहीं हो। ये तो समझाने की बातें हैं और
- 40:35समझाना किसी तल से तो पड़ेगा ना? ये समझाने की बातें हैं कि तुम
- 40:42साक्षी हो और तुम्हें समझ में आएगा भी क्योंकि तुम होती हुई
- 40:47क्रियाएं के शरीर के देख रहे हो श्वास ले रहा है।
- 40:52श्वास छोड़ रहा है शरीर शरीर को दर्द हो रहा है तुम देखते हो शरीर
- 41:00चिंता में निमग्न है, तुम देखते हो शरीर के ऊपर कष्ट आ गया है
- 41:05विपत्ति काल आ गया है तुम देखते हो?
- 41:09और तुम्हें जो दिखाई पड़ता है वह तुम नहीं हो।
- 41:13पहले तो यही जानना पड़ेगा पहला स्टेप तुम जो देख सकते हो वो तुम
- 41:22नहीं हो, तुम फ़िल्म को देख रहे हो फ़िल्म तुम नहीं।
- 41:30सिनेमा हॉल के भीतर बैठे तुम सक्रीन के ऊपर चलती हुई रंगीन
- 41:35तस्वीरों को देखते हो तो तुम देखने वाले हो और फ़िल्म के पर्दे
- 41:41के ऊपर चलती हुई ये रंगदार तस्वीरें तुम नहीं हो।
- 41:47पहले ये जानना पड़ेगा लेकिन और भी राहतें हैं।
- 41:57वसल की राहत के सिवा आगे भी कुछ बात है और भी।
- 42:08राहत ये हैं वसल के राहत की सेवा और भी दुख हैं जमाने में मोहब्बत
- 42:16के सिवा सिर्फ यही सत्य नहीं है की तुम शरीर के साक्षी हो।
- 42:27हिंदू दर्शन की छः प्राचीन और प्रसिद्ध परंपराएं हैं।
- 42:36तुम हिंदू धर्म को एक रास्ता मत समझ लेना।
- 42:44हिंदू धर्म में भी छः रास्ते हैं। कौन कौन से सांख्य, योग, न्याय,
- 42:58वैशेषिक, मिमांसा और वेदांत? और इन दर्शनों को कपिल पतंजलि,
- 43:11गौतम कर्नाड, जैमिनी और बाद राय इन्होंने कहा है।
- 43:24छः दर्शन है एल। और इन दर्शनों की उत्पत्ति छः
- 43:30संतों ने की है और छः के छः संत हैं, छः रास्ते हैं और छःों
- 43:37रास्ते ठीक हैं, लेकिन ठीक कौन है?
- 43:45छःों में से कौन ठीक कृष्ण ठीक कृष्ण कहते हैं, अगर साक्षी
- 43:57दृष्टा और दृश्य ये दो अलग हैं तो भेद आ गया।
- 44:12जो तुम देख रहे हो वह और जो देख रहा है वह ये दो हैं तो भेद आ
- 44:25गया। और परमात्मा क्या है?
- 44:31परमात्मा यह है जहाँ भेद खत्म हो जाता है जहाँ भेद मुख गया जहाँ
- 44:40भेद की समाप्ति हो गई जहाँ सब भेद बुद्धि मिट्टी।
- 44:47वहाँ परमात्मा है छह सिद्धांतों पर चलेंगे तो छह रास्ते हैं और
- 44:57इनमें से कोई भी रास्ता ये नहीं कहता के एक है एक एक।
- 45:05कोई कहता तीन है, कोई कहता दो है। कोई नहीं कहता कि एक है और इन
- 45:17छहों के अनुभव उस संत से नहीं मिलते।
- 45:25जो संत आखिर में जा के कहता है क्या अहम ब्रह्मस्व जो इस बात का
- 45:33उदघोष करता है कि अनल हक जो कुछ है वो मैं ही हूँ व्हटेवर इट इस
- 45:41आई ऍम। जो कुछ है वो मैं हूँ सारी
- 45:51एग्ज़िस्टन्स में दूसरा कोई नहीं है सारी एग्ज़िस्टन्स में एक है
- 45:58और वो एक मैं हूँ। अंत में जाकर साधक जब सिद्ध हो
- 46:09जाता है तो ये शब्द बोलता है अहम् ब्रह्मा सुन सारा ब्रह्मा मैं ही
- 46:16हूँ दुःजा कोई नहीं। और अगर दूजा है तो भेद बुद्धि बनी
- 46:24हुई है और जहाँ जाकर भेद बुद्धि समाप्त हो जाती है।
- 46:30जहाँ दो नहीं रहते वो सत्य है। मैंने सत्य से शुरू किया था सत्य
- 46:39को जान लो। सब कष्ट मिट जाएंगे तो पहले तो ये
- 46:44जान लो क्रम से फिर मैं उन कौड़ियों को दोहरा दू।
- 46:51पहले स्टेप में ये जान दो के अन्नार होता है के ये शरीर मैं
- 46:57नहीं है। शरीर के दुख, दर्द, कष्ट, क्लेश,
- 47:02चिन्ताएं, आग, वैराग्य ये सब मैं नहीं हूँ।
- 47:09पहले ये जानना है दूसरा जानना है कि सब मैं हूँ।
- 47:17यह बड़ी मुश्किल पड़ेगी। बुद्धि के लिए और बुद्धि के लिए
- 47:22हमेशा ही मुश्किल खड़ी होती है। बुद्धि मुसीबतों का घर बुद्धि
- 47:30मुसीबतों का जन्म दाता है। और तुम बुद्धि से हल करना चाहते
- 47:37हो, बुद्धि से उसका हल नहीं मिलेगा।
- 47:42तो बाबा क्या कहते हैं? इस बुद्धि को छोड़ दो।
- 47:46कृष्ण क्या कहते हैं? इस बुद्धि को छोड़ दो सभी संत
- 47:52कहते हैं इस बुद्धि को छोड़ दो। सभी संत कहते हैं के तेरा पाना
- 48:00मीठा लग जो तुद पा वे सुई बलि का जो तुझे अच्छा लगता है।
- 48:11कोई तू कह के बुला देता है कोई, मैं कह के बुला देता है बाबा नानक
- 48:16तुम कह के बुलाते हैं मलूक दास तू कह के बुलाता है कृष्ण मैं कह के
- 48:25बुलाते हैं हम तुम सर्व बापे भव मोक्ष श्याम।
- 48:30माँ सुचाह अनन्या चिंतितों माँ ये जनम परोपास्तय तेशाम
- 48:42नित्यभुक्तानाम योग क्षमं भाव म्यं मैं उसका पालन करता हूँ।
- 48:50मैं उसका भार वहन करता हूँ। कृष्ण ठीक है, कृष्ण कहते हैं,
- 48:59मेरे सवा दूजा कोई यह जो शैतान की धारणा चली थी, यह द्वैत की धारणा
- 49:09है। और वेदांत की धारणा अद्वैत की
- 49:13धारणा है। लेकिन सिखाते क्या हो?
- 49:15तुम नाम तो देते हो अद्वैत और बात करते हो द्वैत, अद्वैत सिखाया
- 49:25कहाँ तुमने? वे दान्त अद्वैत सीखाता कहाँ है
- 49:32बात करता है। अद्वैत के अद्वैत मैं जाता नहीं
- 49:37अद्वैत को सीखाता नहीं अद्वैत वह जहाँ दो नहीं होते।
- 49:42जहाँ दो नहीं होते वहाँ भेद नहीं होता।
- 49:45जहाँ भेद नहीं होता वहाँ सब एक हो जाता है एको आह।
- 49:51द्वितीय नास्ति एको ब्रह्म द्वितीय नास्ति और वो ब्रह्म कोण
- 49:59अहम ब्रह्मास्वा मैं ही ब्रह्म। किसी झगड़े, झूठों में इन्हीं
- 50:08शब्दों के मायाजाल में जंजाल में सारी दुनिया उलझी पड़ गई, लेकिन
- 50:15कृष्ण इस जंजाल को खत्म कर देते है।
- 50:19कृष्ण कहते है, दूजा कोई नहीं। मेरे सिवा दूसरा कुल है आज का
- 50:26पाठ। इसका रास एक ही है, दो नहीं है,
- 50:38लेकिन शुरुआत दो से करनी पड़ेगी। शुरुआत करनी पड़ेगी।
- 50:44दृष्टा और दृश्य और इन दोनों से खिसकते खिसकते एक में ही आना होता
- 50:53है। बस जब एक आ गई तो भेद समाप्त हो
- 51:00गया। जहाँ भेद मुक गया, जहाँ भेद मिट
- 51:06गया, वहाँ सत्य है, सत्य की बात में नहीं शुरू किया कृष्ण कहते
- 51:15हैं, तू सत्य में आजा अर्जुन। तू दुखी इसलिए है क्योंकि तू झूठ
- 51:22में ठहरा हुआ है, तू सत्य में उतर जा और सत्य का है, यही सत्य है।
- 51:31पहले ये जान लो कि ये दुख। ये तकलीफ, ये चिंताएं, ये दर्द,
- 51:39ये चिंत न ये आग मेरे से दूर है। मैं इन सब का साक्षी हूँ, मैं
- 51:49देखने वाला हूँ आग दूर कहीं लगी है और मैं कहीं दूर बैठा निहार
- 51:55रहा हूँ। पहला स्टेप ये है देखिये छत पे
- 52:01जाना पड़ेगा तो पोडियों के स्टेप तो कवर करने पड़ेंगे तुम कहो कि
- 52:09पोडियां भी स्टेप ना करूँ और छत पे भी पहुंचाऊं।
- 52:13यह मुश्किल है असंभव है शुरू करो दौर से एक वह है जो दिखता है वह
- 52:28दृश्य है एक वह है जो देखता है। वह दृष्टता है, तुम दृष्टता हो
- 52:35पहले यहाँ से शुरू करना पड़ेगा और जो तुम्हें दिखता है वह दृश्य है,
- 52:43फिर दो से शुरू करके उतरते चले जाओ एक में एक में जैसे जैसे तुम
- 52:50अपने भीतर उतरोगे। हृदय के तल पे दो, आय बुद्धि के
- 52:59तल पे दो नहीं होते, अनेक होते हैं, अनेकता से दो में उतरना
- 53:05होगा। बुद्धि के तल से हृदय के तल पे
- 53:08आना होगा। बुद्धि अनेक है हृदय दो में तकसीम
- 53:15है, सुख दुख, खुशी, गमी दो हैं, हृदय के भीतर दो हैं और हृदय से
- 53:28वे नीचे आओगे। दो भी मिट जाएंगे, एक ही रहेगा वह
- 53:36एक जो तुम हो, जिसका उदघोष ब्रम्ह ज्ञानी करते हैं, संत करते हैं,
- 53:48उस स्तर पर जाकर करते हैं। और तुम भी जब पहुंचोगे सम्बोधिक
- 53:54क्षण में और जब तुम अपना फैलाव देखोगे तो तुम यही अनुभव करोगे कि
- 54:02दूसरा कोई भी नहीं है एक ही है एक ही तत्व है चहुं और।
- 54:11उसका ही फैलाव है, वहीं चारों ओर फैला हुआ है और उसके सिवा कुछ
- 54:18नहीं और ठहर जाएगा। सब कुछ गुजरते वक्त की हर मोसे
- 54:28ठहर जाएंगे। करोगे याद तो हर बात याद आएगी।
- 54:38गुजरते वक्त की हर मोह ठहर जाएगी। वहाँ जाकर सब ठहर जाता है और ठहरे
- 54:46हुए पल में। सब तूफान शांत हो जाते हैं।
- 54:54तूफान यानी भेद भेद तूफान हैं। जब तक तुमने कहा दो हैं, भेद हैं।
- 55:06और भेद है, तो तूफान है, जब तुमने कहा कि तीन है, तो भेद है और जब
- 55:14तक भेद है, तब तक तूफान है हलचल है, शोर है ठहराव न जब तुम जानोगे
- 55:24शब्दों को समझना। जब तुम जानोगे, कि एक ही है एक ही
- 55:34है और वह क्या है वह रस्वरूप है उपनिषद में परमात्मा को रस्वरूप
- 55:43कहा। रसोवैस जहाँ जाने से तुम इतने रस
- 55:53को पी लोगे, तुम इतने आनंद को गटक जाओगे कि तुम्हें कुछ और नजर नहीं
- 56:02आएगा। सब भेद ठहर जाएंगे गुजरते वक्त कि
- 56:08हर मोज़ ठहर जाएंगे करोगे याद तो हर बात याद आएगी जब तुम वहाँ चले
- 56:20जाओगे। परम ठहराव होगा पर मौन होगा, कोई
- 56:29कोलाहल नहीं होगा, शांति हो के साइलेंस हो गए पर मौन होगा।
- 56:42ज़रा भी हलचल न होगी ठहर जाएगी गुज़रने वक्त कि हर मोज़ ठहर
- 56:49जाएगी करोगे याद तो हर बात याद आएगी।
- 56:56ये आखिरी पड़ाव है कृष्ण कहते हैं।
- 57:01को मैं और मैं एक हूँ और वहाँ तक पहुंचना चाहते हो उस आनंद के रस
- 57:11को पीना चाहते हो तो मुझ में उतर जाओ मुझको समर्पित हो जाओ।
- 57:23सब सूंघ दो मुझे तुम्हारे दुख, तुम्हारे सुख जो भी कुछ तुमने
- 57:31अपना माना वो सब छोड़ दो तुम्हारा नहीं मेरा है।
- 57:39मेरा मुझको ही सौंप दो और जैसे ही तुम मेरा मुझको सौंप दोगे, वैसे
- 57:48ही तुम पाओगे, सारा बोझ उतर गया, तुम निर्भोज हुए, तुम निर्विकल्प
- 57:57हुए। सारा तूफान ठहर गया, सारी मोज़
- 58:06ठहर गए। तुम एक ठहराव हो जाओगे, कोई कंपनी
- 58:16नहीं होगा, कोई हलचल नहीं होगा। भेद खत्म हो जाएंगे।
- 58:26अभेद ही अभेद रह जाएगा। बस तुम ही तुम रह जाओगे।
- 58:33उसी क्षणमया के संत ने कहा जिधर देखता हूँ, उधर तू ही तू है।
- 58:40कहने का तरीका मैंने कहा मतलब कहे के तू ही तू है, मेरी तो यही
- 58:47अर्ज़ी कर वही जो तेरी मर्ज़ी तेरा तुझको सौंकते क्या लगत है और
- 58:57दूसरा पितल है। ये कृष्ण कहेंगे मैं ही
- 59:03सर्वधर्माण पर तज्जमा में एक हम शरण ब्रज पारे शरण में आजा के सभी
- 59:11धर्मों की विनाश लीला को छोड़ दे अर्जुन ये भेद बुद्धि को छोड़ दे।
- 59:19भेदों से परे हो जा और भेद में उतर जा यहाँ कोई भेद नहीं जहाँ दो
- 59:25नहीं जहाँ एक है और एक है और मैं हूँ मैं हूँ सिर्फ मैं हूँ।
- 59:34फिर वो हम। सजदानंद में शिवो, हम शिवो हम
- 1:00:11शिवो हम। यहाँ सब कुछ शिव रूप है, स्थायी
- 1:00:20है, कुछ भी मरता नहीं, न पदार्थ मरता है, न परमात्मा मरता है।
- 1:00:30इस भेद बुद्धि को त्याग दे कि पदार्थ मरता है, पदार्थ भी नहीं
- 1:00:35मरता। परमात्मा भी नहीं मरता, वस्तु जान
- 1:00:39ले सब कुशामर है यहाँ सब शिव स्वरूप है कुछ कटता नहीं, कुछ
- 1:00:50जलता नहीं, कुछ मटता नहीं। बस सिर्फ रूप बदल जाती है, रूप
- 1:00:58बदल जाते हैं, स्ट्रक्चर बदल जाते हैं, डांचे बदल जाते हैं और कुछ
- 1:01:05नहीं बदलता मरता यहाँ कुछ नहीं, सब यहाँ शिव है।
- 1:01:12शिओ हम न पदार्थ मरता है, न परमात्मा मरता है, तुम इस गलती
- 1:01:22में मत रह जाना किस पदार्थ मरता है?
- 1:01:25कृष्ण कहते हैं या कुछ नहीं मरता सब अमर है।
- 1:01:32पदार्थ भी अमर है, परमात्मा भी अमर है और तुम कुछ वो हो जो सब
- 1:01:41कुछ है वो तुम हो। इसलिए वैज्ञानिक कहते हैं मैट्र
- 1:01:47कैन नीदर बी क्रिएटेड नॉर कैन बी डिस्ट्रॉइड।
- 1:01:51तुम कहते हो पदार्थ मरता है। कृष्ण कहते हैं पदार्थ भी नहीं
- 1:01:54मरता आत्मा भी नहीं मरती वॉटेवर इट इस जो भी कुछ है वह अमर है और
- 1:02:06तू अमर हो जा। अर्जुन तू स्थल पर चला जाए जहाँ
- 1:02:10तुझे पता चल जाए कि तू कौन है तेरा विस्तार तुझे पता चल जाए
- 1:02:20तेरा विस्तार तुझे तूफानों की तरह घेर ले चारों ओर से तेरे अस्तित्व
- 1:02:26को ढकर ले। और तुम इस शरीर की बाधाओं से पार
- 1:02:34हो जाए। मन की बाधाओं से पार हो जाए कर यो
- 1:02:40तुझे तो तेरा सबूक दिखाई पड़ेगा। वह अभेद दिखाई पड़ेगा।
- 1:02:50जद पाले आपेद कलंदर दा बुहा खुल गया अपने अंदर दा।
- 1:03:08जद पाल्या बेदुकलंदर दा बुआ, खुल गया अपने अंदर दा सुखबा सिंह।
- 1:03:23उस मन्दर दा चित्ते चढ़ दी है ना लें दी है।
- 1:03:42सुखवासी हाँ, वो समंदर दा मुद्र में तो तुम भी बैठते हो लेकिन सुख
- 1:03:52कहाँ होता है? संत कहते हैं जितनी चढ़ दी है ना
- 1:03:58लेती है वहाँ एक बार सुख आया। कि बस सुखी रह जाता है, फिर कभी
- 1:04:05दुख नहीं आता। अखंड धारा सुख की बहने लगती है।
- 1:04:12तुम वहाँ उतर जाओ, उसके भेद को जान लो क्या कि वह अभेद है।
- 1:04:23कोई भेद नहीं, यहाँ वो ही वो है, उसके सिवा कुछ नहीं।
- 1:04:30एक। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:04:41हे नाथ नारायण वसुदेव श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:04:56हेनाथ नारायण वासुदेव, श्रीकृष्ण गोविंद पितुमात, स्वामी सखा
- 1:05:13हमारे। वित्त महत स्वामी सखा हमारे अनाथ
- 1:05:25नारायण वासुदेव श्रीकृष्ण गोविंद। हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव
- 1:05:46श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी। हेनाथ।
- 1:05:55नारायण, वासुदेव, हेनाथ नारायण वासुदेव धनवात्र।