Latest / Baba ji Vijay Vats / 16 Feb 25 - ध्यान में होने वाली बड़ी गलतियां, कुण्डलिनी शक्ति नहीं चेतना हैं! चेतना का पूरा विज्ञान।
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- 0:06बाबा जी प्रणब बहुत से संतो को भी सुना, आपको भी सुना लेकिन एक बात।
- 0:26मेरे आज तक समझ में नहीं आयी, किसी को सुनके भी नहीं आयी।
- 0:33क्या आप समझाने का कष्ट करेंगे हमारे गुरु ने?
- 0:42तीसरा, नेत्र जगाने के लिए तीसरे नेत्र पर ध्यान एकाग्र करने की
- 0:50विधि बताई है। कॉन्सेंट्रेशन और हम एकाग्र करते
- 0:59भी हैं। लेकिन उसके बाद सिर का दर्द शुरू
- 1:08हो जाता है। कुछ लोग मैंने पागल हुए भी देखे।
- 1:16कुछ लोगों की नाड़ियां भी फटती है देखी।
- 1:21यह दुर्घटना है या इस विधि का गलत इस्तेमाल या ये विधि ही गलत है?
- 1:38क्या हमें कॉन्सेंट्रेशन करना चाहिए या नहीं करना चाहिए?
- 1:48असल में संत की एक बहुत भारी मुसीबत होती है जो चीज़ समझाई
- 1:58नहीं जा सकती व्याख्याय नहीं की जा सकती।
- 2:03लिपि में आती नहीं, उसे लिपियों में कन्डेन्स कर देना
- 2:10मूर्खतापूर्ण है, लेकिन ये हम करते हैं, इसे समझे न?
- 2:21तीसरे नेत्र पर या किसी भी स्थान पर ध्यान को एकत्रित करना उससे वो
- 2:30चक्र जाग्रत हो जाता है। सर सर गलत बात है, मैं आपको
- 2:41उदाहरण देकर समझाऊंगा। सीधा सीधा समझाने का कोई उपाय
- 2:45नहीं है। ये उत्तर लेंस है।
- 2:53आप सभी ने देखे होंगे ये मैंने क्यों मँगवाया?
- 2:59वृद्धावस्था के कारण आँखें कमजोर हो गईं।
- 3:02कुछ बारीक शब्दों को पढ़ने के लिए इनका इस्तेमाल करता हूँ।
- 3:08दिख जाती है चीज़ लेकिन एक बात बताइए अगर इस कॉनवैक्स लेंस को।
- 3:21मैं जीस पर से पढ़ रहा हूँ सूरज के सामने कर दिया जाए और उसकी
- 3:29रेंज को कन्डेन्स कर दिया जाए तो क्या होगा जीस चीज़ को मैं पढ़ना
- 3:39चाहता हूँ। जीस पेपर से उसके ऊपर अगर सूरज की
- 3:45रौशनी को कॉन्डेन्स कर दिया जाए तो क्या होगा?
- 3:51पेपर जल जाएगा, आपने भी देखा होगा बस आप यही कुछ कर रहे हो।
- 4:01फिर अगर पागल नहीं होगे तो और क्या होगा?
- 4:08मैंने बहुत बार कहा है मत करो। यहाँ के एक टीचर थे और साधना करते
- 4:16थे। होशों से संयुस्त हो के आए थे,
- 4:22मैंने कहा आप मास्टर जी यह साधना मत किया करो, ये गलत कर रहे हो आप
- 4:28कहते ओशो ने समझाया मैंने कहा नहीं ओशो इतना मूर्ख नहीं है,
- 4:32समझाया कुछ और हो गया, समझा आप कुछ और हो गया?
- 4:39और शो इसे कभी नहीं समझा सकते। अगर समझाए हैं तो फिर गलती कर रहे
- 4:43हैं। अब मैंने आपको समझा दिया कि ये
- 4:48पढ़ने के लिए है, बारीक चीज़ नहीं पढ़ी जाती तो इसका सहारा ले लेता
- 4:55हूँ। लेकिन धूप में अगर यही चीज़
- 4:58कॉन्डेन्स कर दी जाए तो जल जाएगा। अगर आप अपनी शक्ति को कॉन्डेन्स
- 5:06कर दोगे तो यह जल जाएगा, विकृति पैदा होगी।
- 5:16एमरेज भी हो सकता है, वैन फ्रैक्चर भी हो सकता है।
- 5:23वह ऐसे ही मरा टीचर वैन फट गई, नाक में से लोगों निकलने लगा।
- 5:32और वह मर गया। देखिए इस तरह के तज़रबे मत करिये
- 5:42तीसरा नेत्र जागृत करना तो मैंने बिलकुल सीधी पद्धति आपको बताई है,
- 5:48सहज समाधी भली रसात हो। कबीर सब जगह मास्टर है।
- 6:00कबीर के ये शब्द अंतहीन व्याख्या करते हैं।
- 6:09कुछ न करो, कुछ न करो, कुछ न करने में क्या होगा आपकी चेतना ध्यान
- 6:25रखना यहाँ फर्क पड़ जाएगा बहुत बार यहाँ उलझते हो, आप मैं समझ
- 6:30गया। आपकी चेतना भीतर उतरेगी, सारी
- 6:37कॉन्सेंट्रेट होगी और मैंने पहले भी बताया था नाभी के पास जब चेतना
- 6:43जाएगी तो वहाँ पड़ी हुई कुंडलिनी को जागृत करेगी।
- 6:49और कुंडली जागृत हो के जो कि कॉन्शसनेस का अब यहाँ तुम बात समझ
- 6:59लेना कॉन्शसनेस इस नॉट ए एनर्जी। अब इस चॅप्टर को आप ध्यान से समझ
- 7:11लेना क्योंकि बहुत लोगों को गलतफहमी हुई है, वह कॉन्शसनेस को
- 7:19एनर्जी समझे बैठे क्या गलती का है जब आप कुछ नहीं करोगे?
- 7:30तो सहज रूप से आपकी कान्शस्नस जो कि पत्थर से बढ़कर भगवान हो जाती
- 7:37है, ऐसा समझो आप उस कान्शस्नस के लेबल को पत्थर से भगवान तक ले के
- 7:45आना है। वह एनलाइटन हो जाता है, वह कृष्ण
- 7:50हो जाता है। जब आप कुछ नहीं करोगे, आराम
- 7:54करोगे, महज तो आपका कॉन्शसनेस भीतर उतरेगा वह कॉन्शसनेस जो आपने
- 8:03बाहर फैला दिया से कैटर कर दिया। धन में लगा दिया, पदवी में लगा
- 8:09दिया, दुश्मनी में लगा दिया, दोस्ती में लगा दिया रिश्तों
- 8:12नातों में लगा दिया ये आपकी कॉन्शसनेस आपने फैला रखी है।
- 8:20यह सब जगह से एकत्रित होगी और यह भीतर उतरेगी।
- 8:25अपने आप जैसे आप गंध ले, पानी को कांच के ग्लास में रख के ठहरा दो,
- 8:35और कुछ न करो छेडो मत उसे तो माटी नीचे बैठनी शुरू हो जाएगी।
- 8:42और सुबह तक माटी अलग और पानी अलग हो जाएगा।
- 8:48समझ न आए तो प्रश्न कर देना देखो आपने प्रश्न नहीं पूछा, लेकिन
- 8:54प्रश्न निकल आया आप कॉन्शसनेस चेतना?
- 9:02और एनर्जी ऊर्जा इसको एक ही चीज़ समझती हो, पर्याय समझती हो यह पर
- 9:10नहीं है। एक ही चीज़ नहीं है, यह
- 9:13कैन्शियसनेस शक्ति होती है, कैन्शियसनेस चेतना होती है,
- 9:19एनर्जी शक्ति होती है। अब समझो आप रात को सोते हो कुछ
- 9:33गट्टे आपको पता नहीं होता आप कहाँ गए?
- 9:40क्या हुआ? कॉन्शसनेस भीतर उतर गयी।
- 9:49एनर्जी तो है, सारे शरीर में एनर्जी घूम रही है, हार्ट भी पंप
- 9:55कर रहा है, फेफड़े भी सांस ले रहे हैं।
- 9:59भोजन भी पछ रहा है भी बन रहे हैं, रिपेयर भी हो रही है।
- 10:04सारे शरीर की न्यूरॉन की भी रीपेयर हो रही है।
- 10:08सारी बॉडी अच्छे से रीपेयर हो रही है लेकिन पता क्यों नहीं चल रहा
- 10:14आपको? यह पता होने का नाम कान्शस्नस है।
- 10:21अब देखिए आपको मैंने पहले कहा जो वो चीज़ शब्दों में नहीं बांधी जा
- 10:27सकती उसको हम शब्दों में बांधने की चेष्टा करते हैं।
- 10:33इशारों से कहने की बात है। अगर तुम्हारी समझ में आ जाए तो अब
- 10:42कोमा में व्यक्ति जाता है, चेतना कहाँ जाती है?
- 10:48एनर्जी तो होती है उसमें क्योंकि वह अजीब होता है।
- 10:56वह जीवित है तो एनर्जी तो है, इसमें ऊर्जा तो है, दिल भी धड़कता
- 11:02है, फेफड़े भी चलते हैं, सब होता है, आप खाना भी खिलाते हो, कोमा
- 11:07गए हो लेकिन। चेतना कहाँ गई कॉन्शसनेस कहाँ गई
- 11:16वह कॉन्शसनेस चेतना ऊर्जा से कुछ अलग है, वह क्या है?
- 11:35अगर कुछ करोगे तो वह तुम ऊर्जा को यहाँ लगाओगे कान्शस्नस को नहीं
- 11:43ध्यान रखना, मेरी बात को यहाँ तुम सभी चकमा खा जाते हो यहाँ जब आप
- 11:51ध्यान को केन्द्रित करते हो। तो यहाँ कॉन्सी स्नैस इकट्ठी नहीं
- 11:59होती, यहाँ ऊर्जा इकट्ठी होती है, जो समझ गए वो भाग्यशाली जो नहीं
- 12:09समझे वो अभाग्य? यहाँ आप शक्ति को संग्रहित करते
- 12:16हो, न के चेतना को, चेतना तो आपने फैला रखी है सब तरफ़।
- 12:30और चेतना को जब भीतर लेके जाओगे आप भीतर कैसे लेके जाओगे कुछ न
- 12:38करो कुछ न करने में वह चेतना अपने भीतर उतरेगी, कन्डेन्स होगी ना भी
- 12:48के पास जाके? कुंडेश हूँ कि वह जगाएगी आपकी
- 12:54कुंडली को इसमें किसी तरह का कोई खतरा नहीं तुम्हें डरा जाता है।
- 13:00इन बातों से जीस बात से डरना चाहिए उसे डराया ही नहीं जाता।
- 13:09तुम भीतर उतरोगे विदाउट एनी रिस्क वह कॉन्शसनेस ऊर्जा नहीं
- 13:16कॉन्शसनेस चेतना कुंडलिनी भी एक चेतना है, वो भी शक्ति नहीं है।
- 13:32कुंडलिनी इज़ ए कान्शस्नस नॉट एनर्जी पावर कन्डेन्सेशन नहीं है
- 13:41वो एनर्जी का वह चीतना का समूह है।
- 13:49और चेतना का समूह जब जग जाता है कैसे जगेगा जो सब तरफ से फैला रखी
- 13:57है आपने कॉन्शस महसूस को खेच लेना, भीतर उतर जाना।
- 14:06जैसे रात को सोए हुए आप उतरे थे। आपकी चेतना भीतर उतरेगी, उस तल पर
- 14:18जाएगी जहाँ कुंडलिनी है ना भी के आस पास है मूलाधार के पास।
- 14:27वह उस शक्ति को जगाएगी जिसे तुम शक्ति कहते हो, मैं चेतना पुंज
- 14:33कहता हूँ, वह चेतना पुंज का जाग दे जाना ही संबोधि की तरफ जाना
- 14:44है। यह चेतना का पुंज है।
- 14:49कुंडल निः फिर अच्छी तरह से समझ लो, क्योंकि ये समझने की बात है
- 14:57नहीं, लेकिन मेरे इशारे शायद बहुत लोगों के समझाए जाते हैं।
- 15:05चेतना का पूंज है कुंडली आपको बताया गया है कि वो एनर्जी का
- 15:10पूंज है, वह एनर्जी का पूंज है, आपको बताया गया है वो?
- 15:20चेतना कॉन्शसनेस का पूंजी तो जब आप भीतर उतरोगे तो एनर्जी नहीं
- 15:27भीतर उतरेगी, कॉन्शसनेस भीतर उतरेगी, चेतना भीतर उतरेगी, चेतना
- 15:36जाके चेतना को जगाएगी। जो कुंडलिनी में संग्रहित है।
- 15:42ये बहुत बारीक मसला है। फिर बार बार समझना, इस बात को वह
- 15:51चेतना जाकर चेतना पुंज को हिलोरो देगी।
- 15:56तो कुंडलिनी के भीतर भरी हुई चेतना जग जाएगी और जग कर वो
- 16:03सुसुमना के द्वारा आपके ससुराल में प्रवेश कर जाएगा मेरे दंड से
- 16:11आएगी। जिससे आप रीड की हड्डी कैसे हो?
- 16:19मेरु दंड से आएगी। ये तीन मुख्य नाड़ियां होती हैं।
- 16:23वैसे कुल 72,000 बताई गई हैं। तीन ईडापिंगला सुशमना सुशमना बीच
- 16:30में होती है ईडापिंगला आसपास होती है।
- 16:36दोनों के बीच में चलती है सुशमना जब आप कुछ नहीं करोगे तो आपकी
- 16:43कान्शस्नस भीतर उतरेगी। भीतर उतरकर उस चेतना पुंज को
- 16:49छेड़ेगी। और चेतना पूंज जागेगा उसको
- 16:58कुंडलिनी जागरण कहते हैं बोलने वाले कुछ बोले जाएं बताने वाले
- 17:03कुछ बताए जाएं, वह चेतना पूंज जागेगा।
- 17:09और यह एक रास्ता है मेरु दंड में से इस तीसरी सुशूमना नाड़ी के
- 17:20द्वारा ब्रह्मरंत्र कहलों से सराह कहलों में प्रवेश कर जाएगी।
- 17:28रीढ़ की हड्डी पीछे से उसमें से निकलेगी और 1000 में प्रवेश कर
- 17:35जाएगी। सहस्रार में प्रवेश कर जाएगी
- 17:39सहस्त्र दल कमल 1000 पंखड़ियों वाला खेल जाएगा वहाँ कोई 1000
- 17:46पंखड़ियाँ नहीं है। वहाँ आप खिल जाओगे।
- 17:54फूल की तरह इसका ये मतलब था जैसे हजारों पंखड़ियाँ खिलती हैं।
- 18:00ऐसी खुशी होगी तुम्हें वह कॉन्शसनेस का बढ़ जाना।
- 18:07या उर्दगामी होना वह आपको खिला देगा।
- 18:121000 पंखड़ियों की तरह वहाँ कोई 1000 पंखड़ियाँ नहीं हैं।
- 18:17लोगों ने तेनु का नाम रखे हुए हैं पंखड़ियों का खैर।
- 18:24तो सहस्त्र दल कमल को खेल जाना बहुत आनंद मिलेगा।
- 18:29उसको ही खुशी कहते हैं, वह व्याखाहित नहीं हो सकता, मैं रोज़
- 18:35बोलता हूँ और जो ईडा पिंगला है थोड़ी थोड़ी।
- 18:45कॉन्शसनेस उसमें से भी जाएगी और वह जगाई की तीसरे नेत्र को ईडा
- 18:58पिंगला दूँ यहाँ बहुओं के ऊपर। यहाँ समाप्त हो जाएंगे, यह
- 19:06प्रभावित करेंगे नाशिका इनको एक गर्म स्वर, एक ठंडा स्वर एक को आप
- 19:17चंद्र नाड़ी को होंगे। एक को आप सूर्य नाड़ी को होंगे।
- 19:24आपको समझाई सूक्ष्म वाले कह रहे है या समझा के आप बताओ, आपको
- 19:31समझाई कि नहीं जब आप कुछ। कुछ नहीं करोगे करने से तो कुछ
- 19:39नहीं होगा। मैंने आपको पहले भी बताया जब आप
- 19:43कुछ नहीं करोगे तो जैसे रात को आपकी चेतना भीतर उतरती है और आपको
- 19:52पता नहीं चलता शक्ति तो होती है। शक्ति तो सिर्फ मुर्दे में नहीं
- 19:59होती, सोये हुए व्यक्ति में भी होती है।
- 20:05कॉमा में गए हुए व्यक्ति में भी होती है।
- 20:10लेकिन सोए हुए व्यक्ति और कोमा में गए हुए व्यक्ति की चेतना
- 20:16बिल्कुल उसी स्थान पर पहुँच जाती है जहाँ पर बहुत साक्षी के भीतर
- 20:23अवस्थित हो जाती है, लेकिन मूर्छित रूप से।
- 20:30सपन में भी तो मूर्छित होती है तुम्हारी चेतना और कोमा की अवस्था
- 20:37में भी मूर्छित होती है चेतना लेकिन होती है एक ही जगह पर इससे
- 20:47ज्यादा अगर व्याख्याहित हो पाया कभी।
- 20:51तो करूँगा, लेकिन इससे ज्यादा व्याख्या तो हो नहीं सकता।
- 20:57पहली बात तो इस भ्रम को छोड़ दो एनर्जी इज़ कॉन्शसनेस एनर्जी
- 21:04कॉन्शसनेस नहीं। जीस व्यक्ति की एनर्जी उस स्थान
- 21:18पर चली गई। सारे शरीर पर वह गतिमान हो जाएगा,
- 21:27एनर्जी का काम गतिमान करना। और चेतना का काम गतिमान करना नहीं
- 21:34होता। चेतना का काम है अवेयरनेस, होश
- 21:39में देखना, जागना, जागने में काम करेगी अवेयरनेस।
- 21:48और दौड़ने में काम करेगी शक्ति देखिए, मैं अलग अलग इशारों से
- 21:55आपको समझा रहा हूँ। अगर सिर्फ चेतना है आपके भीतर
- 22:01जैसे संत जब स्वादिष्ट हो जाता है तो चेतना होती है, होती शक्ति भी
- 22:06है। लेकिन चीतना अपनी गहन ऊंचाइयों पे
- 22:12होती है, इतना मस्त हो जाता है कि दौड़ नहीं पाता, शक्ति होती है,
- 22:18दौड़ने की दौड़ नहीं पाता, इच्छा भी नहीं होती दौड़ने की लेकिन एक
- 22:26धावक है। उसमें आम जो चेतना होती है, उतनी
- 22:31ही चेतना है। एनर्जी बहुत है, शक्ति बहुत है,
- 22:36वह दौड़ सकता है, लेकिन बहस समाधिष्ट नहीं हो सकता ध्यान में
- 22:41रखना धावक। समाधीष्ट नहीं हो सकता, उसमें वो
- 22:46आनंद नहीं होगा। शक्ति होगी।
- 22:50शक्ति आती है काम करने की। योगा चीतना आती है जागने के युग
- 22:56में। अब अगर अब भी नहीं समझे तो फिर
- 23:00कैसे समझोगे और समझा देता हूँ तो किसी तरफ से।
- 23:08शक्ति काम करने की हम व्यायाम करते हैं, शक्ति की जरूरत होती
- 23:15है, लेकिन जो उस व्यायाम करती हुई हाथों पांवों को निहारता है।
- 23:23वो है चेतना। किसी को पता भी तो चलता है कि तुम
- 23:30व्यायाम कर रहे हो या तुम सोए पड़े हो या तुम स्वप्न देख रहे हो
- 23:36वह जानने की क्षमता दट इस कॉल्ड कॉन्सेस्नेस।
- 23:46हाँ, ये सूक्ष्म बाली कहते संतुष्ट हो गए आप बताओ अगर कोई
- 23:51प्रश्न हो तो फिर मुझे कर देना अगर जहाँ आप एकत्रित करोगे।
- 24:01तो कॉन्शसनेस को नहीं करोगे, शक्ति को करोगे और शक्ति जब
- 24:08एकत्रित होती है तो वह फट जाएगी। इसलिए बहुत सी दुर्घटनाएं घटी।
- 24:15मेरे सामने घटी। कुछ एक को मैंने रोका कि यहाँ मत
- 24:24करो, संग्रहित यह फट जाएगा लेकिन फिर भी उन्होंने टेल हमारे गुरु
- 24:28ने कहा है ठीक है भाई, गुरु ने कहा तो करो तो आज आप।
- 24:38इस बात को समझ के जाना आज के चैपटर में शक्ति और चेतना दो
- 24:48अलगअलग हैं चेतना देखने की क्षमता है।
- 25:02साक्षी होने की कैपेसिटी जब व्यक्ति 100% साक्षी हो जाता है,
- 25:11वह भगवान हो जाता है। और जब व्यक्ति एनर्जी पूर्ण हो
- 25:18जाता है तो वह पहलवान हो जाता है, उसके मसल पूरा काम करते हैं लेकिन
- 25:27ये दोनों चीजें भिन्न हैं। इतनी बात पहले समझना आप?
- 25:34एनर्जी से काम करने की क्षमता बढ़ेगी।
- 25:39कॉन्शसनेस से देखने की क्षमता बढ़ेगी।
- 25:51शाक्षित्व की क्षमता को बढ़ाना कान्शस्नस।
- 26:01शरीर की शक्ति को काम करने की वजन उठाने की दौड़ने की भागने की इसकी
- 26:07शक्ति को बढ़ाना, एनर्जी, ऊर्जा ये दोनों चीजों की आप एक ही चीज़
- 26:15समझे बैठे हो इसलिए। देखिए अगर आपको आपके गुरु समझाते
- 26:20हैं तो समझाते रहें। मैंने अपना अनुभव बताना है, वो
- 26:31अपना अनुभव बताते रहे, हम उनको रोकते नहीं।
- 26:38लेकिन अगर उनका अनुभव गलत है तो हम जरूर कहेंगे कि ये गलत है।
- 26:44बस ये कोई निंदा नहीं है। ये सिर्फ हमारे दोनों के अनुभवों
- 26:51का फर्क है। उसका अनुभव कुछ और है।
- 26:55राधे राधे कहने से हो जाएगा? हम कहते नहीं होगा क्योंकि राधे
- 27:02राधे कहने से कान्शस्नस बढ़ती नहीं।
- 27:09हमने चेतना को बढ़ाना है, राधे खुद चेतना है।
- 27:16ये बिलकुल ठीक है लेकिन राधे राधे की रेपुटेशन करने से चेतना नहीं
- 27:22पड़ती। राम खुद चेतना है, लेकिन राम राम
- 27:32की रेपुटेशन या जाप करने से चेतना नहीं पड़ती।
- 27:41चेतना और एनर्जी में फर्क? आज मैंने बड़ी बड़ी केस से
- 27:45समझाया, जब आप रात को सो जाते हो, शक्ति तो होती है, चेतना भी होती
- 27:51है, शक्ति से शरीर चलता है, टिश्यूज़ रिपेर होते हैं।
- 27:57जो दिन में काम धाम करते हुए न्यूरोन से टूटे, आपके टिश्यूज़
- 28:01टूटे वो रिपेर होते हैं। वहाँ एनर्जी का काम है, कान्शस्नस
- 28:07का नहीं और कान्शस्नस एक जगह पे केंद्रित हो जाती है।
- 28:13वह देखती है आपको सोए हुए को। श्वास आ रहा है जा रहा है दिल
- 28:19धड़क रहा है टिशूज रिपेर हो रहे हैं।
- 28:22जब परिपूर्ण साक्षी हो जाओगे आप तो आप अपने टिशूज को रिपेर होते
- 28:27हुए देखोगे, मस्तिष्क के टिशूज को निरंज को रिपेर होते हुए देखोगे।
- 28:35आप जानोगे कि यह जो सोया हुआ है, वह दूसरा है मैंने, लेकिन होगा कब
- 28:44पूर्ण जागृति में होगा पूर्ण कॉन्शसनेस में होगा जैसे जैसे
- 28:49कॉन्शसनेस का लेवल बढ़ता जाएगा। तैसे तैसे आप साक्षी गहरे होते
- 28:57जाओगे, बढ़ते जाओगे। इसको कहते हैं चेतना को बढ़ाना और
- 29:02चेतना का बढ़ जाना ही महा रास है। मधुवन में राधी का नाच रहे मधुवन
- 29:25में राधी का नाच रहे। गिरधर के मोरलिया बाजरे गिरधर के
- 29:45मोरलिया बाजरे। मधुवन में राधिका नाचे रे।
- 30:01राधिका चेतना नाचने लग जाती है वह मधुवन जहाँ मधुशाला है।
- 30:08उस मस्ती में चेतना नाचती है। इसे कहते हैं निधिवन तुम यहाँ के
- 30:18वृंदावन के निधिवन में कृष्ण और राधा को नाचते हुए देखना चाहते
- 30:27हो। नहीं मिलेगा।
- 30:32हमारी कॉन्शसनेस जीस लेवल पर जाकर नाचती है कहाँ नाचती है परिपूर्ण
- 30:39होकर नाचती है, वह नाच आता है, मेरा को नाचती है, मेरा को मस्त
- 30:46होती है। प्रफुल्लित होती है सहस्रार खिल
- 30:52जाता है वह खिलना, आनंद का प्रतीक पर मस्ती की सीमा वो खुमारी।
- 31:07जहाँ पुरुष चेतना से भरा हुआ पुरुष कृष्ण और राधा नाचते हैं,
- 31:15दोनों चेतना की परिपूर्णता में ही नाचा जा सकता है।
- 31:25रात को आप नाच नहीं सकते हैं। रात को आप सोए हुए हो?
- 31:32आपकी चेतना शीतल हो गई, लेकिन कृष्ण रात को भी नाचते हैं,
- 31:42तुम्हें पता नहीं चलता, कृष्ण सोये पड़े हो तो भी नाचते हैं।
- 31:49वह मस्त हैं, वह आनंदित हैं, वह खुमारी में हैं, वह मैं को पिए
- 31:57हुए चेतना संघ है और चेतना परिपूर्ण रूप से पूर्ण रूप से।
- 32:08बढ़ चूके हैं और चेतना का बढ़ जाना नाच को पैदा करता है।
- 32:15मस्ती का बढ़ जाना खुमारी का बढ़ जाना नृत्य को पैदा करता है।
- 32:19यह नृत्य छलकन देता है। मीरा के भीतर मीरा छलकती है,
- 32:25नाचती है। और पुरुष स्त्री नाचती है, पुरुष
- 32:39मस्त हो जाता है, जिससे पुरुष के भीतर थोड़ा अस्त्रेण भाव होता है।
- 32:50वह भी नमस्ते है, शंकर नाचते हैं और आनंदित भी होते हैं, मस्त भी
- 33:00होते हैं इसलिए उन्हें अर्ध नारीश्वर कहा गया।
- 33:05शंकर नृत्य भी करते हैं। और शंकर मस्त भी होते हैं, समाधि
- 33:11भी होते हैं। वह चेतना और कृष्ण पुरुष और चेतना
- 33:20का अनूठा संगम है। शिव वह नृत्य भी करते हैं और
- 33:27समाधि। में भी लीन हो जाते हैं।
- 33:29दोनों चीजें घटनाएँ में घटती हैं। यहाँ भी दोनों घटनाएँ घटती हैं।
- 33:39कृष्ण मस्त हैं मस्ती में और राधा चेतना से नाचती है परिपूर्ण।
- 33:49खिल जाता है पूरा रोम रोम और वह ब्रम्हंड तक फैल जाता है तो जहाँ
- 33:58ये घटना घटती है अद्वितीय घटना मिलन की।
- 34:04राधा और कृष्ण का अनूठा संगम वहाँ नृत्य फलीभूत होता है और नृत्य के
- 34:12साथ साथ समाधि फलीभूत होती है। वहाँ मस्ती भी होती है आनंद की और
- 34:20नृत्य का छलकन भी होता है। वहाँ नाच भी होता है, सतर्कता भी
- 34:25होती है। परिपूर्ण स्थिरता और परिपूर्ण
- 34:29नृत्य मीरा को नाचते हुए आपने देखा नहीं आजकल तो कलाबाज़ियों से
- 34:41नाचने वाली हैं, लेकिन भीतर से वो नाच नहीं आता।
- 34:47मीरा के भीतर से नाच आता है और तुम उसके नाच को देखकर भाव बेबोर
- 34:52हो जाते हो। तुम खुद नाचने लग जाते हो और किसी
- 34:58तरह का कोई वाद्य यंत्र नहीं है, वह बस नाचती है क्यों?
- 35:03क्योंकि भीतर जो घटना घटी। चेतना की प्रगाढ़ता की यहाँ शक्ति
- 35:10का कोई सवाल नहीं शक्ति सिर्फ नाचने में जो काम आती है वो शक्ति
- 35:17है लेकिन जीस कारण से नाचा जाता है वो चेतना।
- 35:27आती है। समझ में आती है, जीस कारण से नाचा
- 35:34जाता है मीरा के द्वारा वो। और जीस नाचने में काम आती है वो
- 35:42शक्ति है एनर्जी है। अगर एनर्जी नहीं होगी, छीतना इतनी
- 35:52प्रगाढ़ हो जाएगी तो तुम बुद्ध की तरह बैठ जाओगे।
- 36:01अगर सिर्फ शक्ति होगी और चेतना नहीं होगी तो तुम दो डाक बन
- 36:09जाओगे। अगर दोनों चीजें होंगी तो फिर
- 36:16मिलन होगा। कृष्ण और राधा का वो निधि वन बन
- 36:21जाएगा वहाँ नाचेगी राधा और कृष्ण बांसुरी बजाएंगे।
- 36:35अनूठा मिलन होगा। बिना वाद्य यंत्रों के वाद्य
- 36:41यंत्र तो खुद ही बज रहे हैं। हमारे भीतर बस आपने पहचाना नहीं।
- 36:48बाज्जे नाद अनेक अशखा केते बावनहारे केते राग परिसू कैयण
- 36:56केते गावणहारे। बड़े राग बज रहे हैं।
- 37:01भीतर बड़े, सुंदर, सुंदर मस्त करने वाले और वो राग बाहर मीरा के
- 37:10घुंघरूओं की छनकाहट बनकर कदमों की आहट देते हैं।
- 37:18और तुम्हें आनंदित कर जाते हैं। निधिवन में तीसियों वर्षों तक तुम
- 37:29ध्यान केन्द्रित करते हो, तीसियों वस्त्र वर्ष तक तुम, सुरती।
- 37:36और शब्द का मिलान करते हो, लेकिन फल नहीं आता।
- 37:48क्यों नहीं आता यहाँ तू रास्ता गलत है, या तो पथ गलत है।
- 37:59यह साधना गलत है। तुम चलते ठीक है, तुम उस रास्ते
- 38:05पर चलने के बजाय उस रास्ते से विपरीत चलते हो, उलटे चलते हो दो
- 38:10ही कारण है जो तुम पहुंचते नहीं जो तुम्हारे भीतर वो नाच नहीं
- 38:16भरता वो शांति नहीं आती। तो फिर दो ही कारण या तो साधना पथ
- 38:23की ही कमी है या साधना की कमी है। या तो पथ गलत चुन लिया तुमने?
- 38:33और या अगर पथ ठीक है तो तुम पथ प्रसिद्ध नहीं जा रहे हो, उल्टे
- 38:37चल रहे हो, पीछे पीछे चल रहे हो, दोनों में से कोई बात है अगर तुम
- 38:43पहुंचे नहीं तुम्हारे चेहरे की दुखद सिल बंटे आनंदमय न होना।
- 38:52न नाचना मरे मरे से पीले पीले से तुम सारे दिन रहते हो कारण यही
- 39:01कारण है। बुध छः वर्ष में खेल जाते हैं।
- 39:07महावीर 12 वर्ष में खेल जाते हैं। और बाबा नानक के 17 वर्ष में कहीं
- 39:17जाते हैं। तुम तो 4040 साल तक, लेकिन दर्द
- 39:28बढ़ता ही कि अजून जू दबा के तुम रोज़ दुखी होते जाते हो, मिलता
- 39:34कुछ नहीं। पर जब वे जाओ तुम्हें जब गुरु को
- 39:37कहते हो कुछ नहीं हुआ तो वो कहते हैं पर थोड़ी सी और तेजी से दौड़ो
- 39:46और तेजी से दौड़ो। ये दौड़ाने वाले लोग तुम्हें कहीं
- 39:49पहुंचा नहीं सकते। ये पहुंचाने वाले लोग नहीं हैं।
- 39:54ये दौड़ाने वाले लोग हैं। फिर दौड़ तो चाहे संसार की हो,
- 40:00पैसे की हो, पदवी की हो, मान की हो, सम्मान की हो या परमात्मा की
- 40:04हो, दौड़ तो दौड़ ही होती है। कोई भी दौड़ तुम्हें कहीं नहीं
- 40:10पहुंचाती पहुंचाता है तो ठहराव पहुँच जाता है।
- 40:17तुम ठहर जाओ, कुछ न करो। अगर यहाँ ध्यान केन्द्रित करोगे
- 40:27तो वह कॉन्शसनेस का समूह नहीं होगा।
- 40:31वह एनर्जी का समूह होगा जो तुम यहाँ पर एकत्रित करते हो।
- 40:39एनर्जी को तुम एकत्रित करोगे वह कोई न कोई गलत गोल खिलाएगी जिसका
- 40:46तीसरा नेत्र जागृत होते देखा तुमने?
- 40:52सहज जागृत होगा। सहज कैसे कुछ नहीं करने से
- 40:57तुम्हारी चेतना अपने भीतर जाएगी उतरेगी धीरे धीरे भीतर उतरेगी।
- 41:02जैसे गंदले पानी में माटी नीचे बैठती है।
- 41:09एक उदाहरण दे रहा हूँ। मैं आपका चेतना नीचे उतरती उतरती
- 41:18उस चेतना के पूंज्य कुंडलिनी को छेड़ेगी हिलाएगी।
- 41:30और वह चेतना पूंज कुंडलनी फन उठा लेगी, जागेगी जागेगी तो वह चेतना
- 41:39पूंज चेतना पूंज बोल रहा हूँ ऊर्जा पूंज नहीं, वह चेतना पूंज?
- 41:48जाग के कहाँ से जाएगा ये रास्ता जो मैंने बताया सुसुमना के जरिये
- 41:56ब्रह्मरेन्द्र में जाएंगे सुसुमना के जरिये में जाएगी?
- 42:04और उसके साथ साथ ईडा पिंगला और दोनों बहू के बीच में ठहर जाएंगे
- 42:14और सुशमना के भीतर वह सहस्त्र दल कमल खेल जाएगा और थोड़ी सी चेतना
- 42:21की बूंद। यह तीसरे नेत्र को जगा देगी।
- 42:27अब मेरे ख्याल में ठीक से समझ गए होगे तुम वह थोड़ी सी चेतना कुंज
- 42:40इसको जगा देगी जैसे आप तीसरा नेत्र कहते हो।
- 42:44जैसे जैसे कुंडलिनी सुसुमना नाड़ी के बीच में से प्रवाहित होगी जैसे
- 42:53पानी चलता है और सभी बांधों को तोड़ देता है।
- 42:57बांध बड़े हलके हैं। पानी के बहाव के आगे बाढ़ के आगे
- 43:04बांध बहुत हल्के हैं। टूट जाते हैं, बह जाते हैं,
- 43:10बांधों को बहा के ले जाता है ये बाढ़ वैसे ही तुम्हारे सारे चक्र।
- 43:20खुल जाते हैं इस चेतना पुंज के सब जागेंगे, मूलाधार से शुरू होगा
- 43:28स्वादिष्ठान मणिपुरों का नाहद भाई शुद्धि और तीसरा नेत्र।
- 43:40और सहस्त्र सभी घुल जाएंगे लेकिन ऐसे ही नहीं खुलेंगे।
- 43:46ये तुम्हारा रास्ता गलत है। मैंने पहले भी इसके ऊपर प्रवचन
- 43:51किया था। आज फिर आपको बता रहा हूँ ऐसे ही
- 43:56खुलेगी। आपकी ये सारी चक्रों की बांध ऐसे
- 44:07जगेगा 1000 पंखड़ियों वाला और ऐसे तीसरा नेत्र खुलेगा।
- 44:17ये सारी एक ही चेतना पुंज का काम है, शक्ति से नहीं खुलेगा भाई
- 44:24शक्ति से तुम्हारा शरीर ब्लश हो सकता है।
- 44:29शक्ति डिफरेंट चीज़ है शक्ति चेतना समझ रहे हो आप यहाँ गलती खा
- 44:34गए। अगर शक्ति चेतना होती तो व्यक्ति
- 44:41कुमा में न जाता और व्यक्ति नींद में भी न जाता, कुमा में भी शक्ति
- 44:52होती है। नींद में भी शक्ति होती है।
- 44:56लेकिन होता क्या है? नींद में भी आपकी चेतना भीतर
- 45:01मुड़ती है, कोमा में भी आपकी चेतना भीतर मुड़ती है और तीसरी
- 45:07समाधि में भी आपकी चेतना भीतर मुड़ती है नींद?
- 45:16और कोमा इन दो अवस्थाओं में जो चेतना भीतर मुड़ती है, वह कभी
- 45:23बाहर लौट आती है, कोमा में कभी नहीं भी लौटती है।
- 45:34हो सकता है कभी नींद में भी ना लौटे लेकिन बड़े रेयर चांस हैं।
- 45:41लेकिन समाधि में गई हुई चेतना नहीं लौटते, वह तो स्वादिष्ट हो
- 45:49गया, वह तो टूट गए सारे। बाँध टूट गए तो आप प्रबुद्ध हुए,
- 45:56आपने अपने आप को जाना ये है सारी प्रोसेसर आज एक और बाँध टूट गया।
- 46:14चेतना और शक्ति को आप एक ही समझ रहे थे एक नहीं चेतना अलग चीज़
- 46:21है, शक्ति अलग चीज़ है आप जो कॉन्सेंट्रेट कर रहे हो वो शक्ति
- 46:30है। यह जो सूर्य की किरण है,
- 46:38कॉन्सेन्ट्रेट होकर कागज को जला देती है, यह चेतना नहीं जलाती है।
- 46:45यह शक्ति जलाती है एनर्जी सूरज के भीतर की एनर्जी जलाती है।
- 46:52एनर्जी चेतना नहीं है, सूरज एनर्जी को फैलाता है, चेतना को
- 46:59नहीं, नहीं तो फिर बढ़िया काम था। फिर तो सूरज की रौशनी में बैठे
- 47:06रहते और चेतना बढ़ जाती। कुछ करने की जरूरत नहीं थी, फिर
- 47:10तो। नहीं नहीं ये गलत रास्ता चुना
- 47:17तुने सूरज तुम्हारी चेतना को नहीं बढ़ा सकता, क्योंकि सूरज के भीतर
- 47:24है शक्ति चेतना नहीं है, सूरज चेतन थोड़ी है।
- 47:32सूर्य जड़ है, लेकिन शक्ति का पुंज है, चेतना का पुंज नहीं है,
- 47:40चेतना का पुंज कहाँ है, अब ठीक से समझ लो, मोरल के ऊपर आ गया वक्त
- 47:47भी हुआ जाता है। तीसरा नृत्य खुलेगा शक्ति के
- 47:56द्वारा नहीं आप कंसेंट्रेट कर रहे हो शक्ति को तीसरा नृत्य खुलेगा,
- 48:03चेतना के संग्रहण से चेतना जगेगी सूरज में बैठने से नहीं।
- 48:11चेतना जगे की गंगा स्नान करने से नहीं, चेतना जगे की कुंडल नहीं
- 48:17जागरण करने से जो कि चेतना पुंज है और वह चेतना पुंज महासागर से
- 48:26जुड़ा हुआ है। उसमें कोई कमी नहीं होती है।
- 48:30एक बार जब बुक खुल गई, कुंडली का बाँध टूट गया, वह चेतना का पुंज
- 48:36है, वह सीधा समुद्र से मिलता है, कैसे खुलेगी, जगेगी?
- 48:45कैसे? मूर्खों ने गलत पथ भ्रष्ट कुएं
- 48:56आपको भ्रष्ट कर दिया, उन्हें पता है देखिये उनका कोई स्वलोभ होगा।
- 49:07नहीं तो स्वार्थ होगा। इसीलिए वो उलटे पुलटे ज्ञान दे
- 49:13देते हैं। कुछ भी बोल देते हैं जो ठीक है।
- 49:22क्योंकि उनको पता है कि भीड़ का अपना शोचन सामर्थ्य नहीं है, जो
- 49:30चाहो उधर मर जाए। कभी फुटबॉल जो है फुटबॉल उसका कोई
- 49:35अपना शोचन समर्थ होता है। इधर से इसने की कमर दी, उधर चला
- 49:39गया, उधर से उसने की कमर दी, उधर चला गया।
- 49:43ऐसे ही तुम तुम ठहरते नहीं, क्योंकि तुम में स्वय की कोई भी
- 49:54शक्ति या चेतना नहीं है। तुम दूसरों के ठुडों से इधर उधर
- 50:00जाते हो। कुंडलिनी को जगाना है जगाने के
- 50:12तीन रास्ते मैंने बताए क्रय योग को करोगे कुंडलिनी जो चेतना कुंज
- 50:19है वो जगेगी, उसके ऊपर प्रहार होगा, जो नहीं कर सकते हैं ना
- 50:24करो, कोई बात नहीं। असल चीज़ जो जगायेगी वो ध्यान है
- 50:32ध्यान यानी कुछ न करना, कुछ न करने में जो आपका शक्ति पूंज भीतर
- 50:38जाएगा क्षमा करना, जो आपका चेतना पूंज भीतर जाएगा।
- 50:47वो चेतना पूंजी जाकर कुंडली को छिड़ेगा, कुंडली जगेगी जैसे सोई
- 50:55सांप को हम जगा दे, वह फन उठायेगा, जागृत हो जाएगी, और वह
- 51:01जागृत होकर उसमें। अथाह चेतना निकलेगी शक्ति नहीं
- 51:07चेतना अब मैंने बिल्कुल सही शब्द उपयोग किये हैं।
- 51:18ये सूक्ष्म से प्रश्न कहते हैं कि आप अपने वक्तव्य को बदल लेते हैं,
- 51:24बिल्कुल बदल लेता हूँ। बदलना पड़ता है।
- 51:28क्या करूँ? जब मैं पहली पौड़ी पर होता हूँ,
- 51:32तब मैं कहता हूँ बहुत बढ़िया पौड़ी है, नहीं तो आप चढ़ोगे
- 51:35नहीं, पहली पौड़ी पर शुरू ही नहीं करोगे, फिर मैं पहली पौड़ी को
- 51:40छोड़ देता हूँ, दूसरी पर आ जाता हूँ, दूसरी सीढ़ी पर जैसे ही आया
- 51:44मैं कहता हूँ इसको पहली को छोड़ दो।
- 51:48फिर दूसरी को भी छोड़ दो। ऐसे एक एक सीढ़ी छोड़ते जाओ तो
- 51:53चलता जाएगा तो मेरे वक्तव्यों में विरोधाभास होना स्वाभाविक है।
- 52:09मैं कहूंगा ए अनार होता है, यह बच्चों के लिए है और फिर जब आप
- 52:19बड़े हो जाओगे तो मैं कहूंगा ए सिर्फ अनार का नहीं होता है।
- 52:24ये वक्तव्यों का बिल्कुल विरोध हो गया और आप कह सकते हो कि आपके
- 52:30वक्तव्य खुद के वक्तव्य विरोधी हो जाते हैं।
- 52:34दूसरे संतों को छोड़ो बिल्कुल क्योंकि जब मैं कहूंगा ए अनार का
- 52:41होता है। तो तुमने बैठा लिया, तुम चिपक गए,
- 52:46फिर मैं कहूंगा ए सिर्फ अनार का नहीं होता है ए बहुत तुमका होता
- 52:52है, अपयश का भी होता है, अनर्थ का भी होता है।
- 52:57ए बहुत चीजों का होता है, तो आप कहोगे जी कल तो आपने ये कहा था?
- 53:01आपने विरोधी वक्त दे दिया अब कौन सा माने दोनों मानो भाई कौन सी
- 53:09सीढ़ी चढ़ें दोनों चढ़ो भाई, पहली सीढ़ी फिर छोड़ो पहली सीढ़ी फिर
- 53:15दूसरी दूसरी भी छोड़ो फिर तीसरी सब छोड़ते चले जाओ फिर आखिरी छत।
- 53:24सो मेरे विरोधी वक्तव्यों से घबरा मचा।
- 53:32विरोधी वक्तव्य आपके हितार्थ हैं मैं आपके हित के लिए बोल रहा हूँ।
- 53:40स्वयं के प्रयोजन के लिए नहीं बोल रहा हूँ।
- 53:45मैं कोई सरकारी टीचर नहीं हूँ जो कि तनख्वाह लूँगा और पेंशन लूँगा
- 53:55उसके पास और कई लोग तो। नकली सर्टिफिकेट देकर लग जाते
- 54:04हैं, पकड़े भी जाते हैं चीतना शक्ति अलग अलग है ए अनार है,
- 54:17लेकिन आप छोटे बच्चों को समझाने के लिए ए अनार है।
- 54:21वह नहीं समझेगा। इसके बिना और अ अनार का ही नहीं
- 54:27होता है या भाई ठीक है, यह बड़ी उम्र के बच्चों को समझाना होगा,
- 54:35क्योंकि तुम आगे बढ़ कैसे पाओगे? तुमने डॉक्टरेट करना है।
- 54:41मास्टर डिग्री करनी है। तुम अगर उससे चिपके रहोगे तो आगे
- 54:46कैसे पढोगे पहली पोढ़ी से चिपक गए तो दूसरी तीसरी चौथी कैसे करोगे?
- 54:51आप तो मेरा विरोधी बोलना लाजिम है।
- 55:01मैं विरोधी बोलेंगे तो एक को छोड़ूंगा और ऊंची चेतना के पड़ाव
- 55:09के ऊपर ले जाऊंगा। फिर मैं इसको भी कहूंगा, छोड़ दो
- 55:12इसको अब घबराना मत, मेरे विरोधी वक्तव्यों से घबराना मत।
- 55:19और मेरे शब्दों को मेरे ही शब्दों से तोड़ने की कोशिश मत करना,
- 55:25ध्यान रखना मेरे शब्दों को मेरे शब्दों से तौलने की चेष्टा मत
- 55:30करना तो क्या करना आप करना अपने आनंद से, मेजरमेंट से।
- 55:40लेखा जोखा करना आनंद बढ़ा कि नहीं बढ़ा बस ये है मैंने शब्द बदले या
- 55:50नहीं बदले या वहीं पे रहा, मैं तो सीढ़ियों बदलता जाऊंगा, मजबूरी
- 55:58है। ढंग भी है।
- 56:03अगर ये ढंगी इस्तेमाल ना करूँगा तो पहली सीढ़ी से शतक नहीं आ
- 56:08पाऊंगा तो कभी कहूंगा पहली सीढ़ी फिर कहूंगा छोड़ दो फिर कहूंगा
- 56:19पांचवीं सीढ़ी फिर कहूंगा छोड़ दो।
- 56:23लेकिन मेरे विरोधी वक्तव्यों को आप दिल को मत निकाल लेना ये अच्छा
- 56:31गुरु हुआ ये तो कह देता है कभी कुछ कह देता है कभी कुछ अडंगा
- 56:35वडंगा हो जाता नहीं कुछ अडंगा वडंगा नहीं आप मेरे शब्दों को
- 56:41सुनते जाओ। भीतर उतरते जाएंगे, आनंद बढ़ता
- 56:46जाएगा जो आपकी समस्या है क्या दुख, दुख टूटे आनंद घना हो रोज़।
- 57:00तो फिर शब्दों का फिक्र मत करना, फिर वक्तब्यों का फिक्र मत करना।
- 57:07अगर आपकी गांठें खोली, जली गांठें तो फिर कोई और फिक्र मत करना।
- 57:16बस इस मेजरमेंट को आप ध्यान में रखना।
- 57:20यही आपकी जरूरत है, यही आपकी मंजिल है।
- 57:27यहीं तक पहुंचना है, यही आपके भीतर की पुकार है, आनंद को ही
- 57:33पुकार रहे हो, आनंद तक ही जाने के रास्ते मैं बताता हूँ।
- 57:40तो शब्दों के वक्तब्यों का ख्याल मत करना, बस ये सुन लेना क्योंकि
- 57:47मैं बोल रहा हूँ, इनका उपयोग कर रहा हूँ, शब्द भी समझना है कि
- 57:52तुम्हें इशारे करूँगा, इशारे भी छोड़ दूंगा क्योंकि इशारे भी
- 57:56पूर्ण नहीं हैं। शब्द भी पूर्ण नहीं।
- 58:00आप किसी भी चीज़ को मत पकड़ना वो दिन सौभाग्यशादी होगा।
- 58:04जीस दिन शब्द तुम शब्दों से पार ले जाए, इशारे तुम्हें इशारों से
- 58:11पार ले जाए वो दिन भाग्यशादी होगा।
- 58:15क्योंकि मैंने पहले कहा ना तो शब्द ना ही इशारे वहाँ तक नहीं
- 58:20जाते। वहाँ तक जाते हैं तो ढंग होता है
- 58:26आपको बताने का लेकिन ना शब्द पहुंचते हैं ना इशारे पहुंचते
- 58:33हैं। पहुंचती है आपकी प्रज्ञा कोई धन
- 58:39भाग्यशाली आएगा। नदरी मोक्ष, द्वार कर्मी, आवय
- 58:47कपड़ा मनुष्य का शरीर मिल जाता है।
- 58:52उसकी रहमत से कर्मी आवे, कपड़ा आगे नदरी मोख दवार आपकी जिंजरें
- 59:03कब कटेंगी? तुम्हारी मेहनत से नहीं कटेंगे,
- 59:09उसकी नजर होगी। राधे राधे राम, राम, कृष्ण, कृष्ण
- 59:14कहने से नहीं कटेंगे। उसकी नजर उसकी नजर कैसे होगी?
- 59:20उसकी नजर होगी कि आप सब परपंचों को छोड़ दो, बाहर के परपंचों को
- 59:25छोड़ दो, छोड़ दो, अपनी चेतना जहाँ जहाँ आपने वितरित की है।
- 59:32इन्वेस्ट कर रखी है उस चेतना को मोडो मोडो एकत्रित करके कछुए की
- 59:39भांति उस चेतना के भीतर ले जाओ उसको पूंजा बना के उतरते जाओ,
- 59:45उतरते जाओ इसी को ध्यान कहते हैं भीतर।
- 59:51उतरते जाओ तो आपने कोई प्रयास नहीं करना है।
- 59:55आप उतरोगे आप ज़रा ठहर के देखो ठहर के देखो जो चीज़ ठहर जाती है
- 1:00:02वो उतर जाती है। आपने कभी देखा जो हम रॉकेट छोड़ते
- 1:00:09हैं? वह रॉकेट अगर ठहर जाए, थोड़ा सा
- 1:00:14एग्ज़ैम्पल दे रहा हूँ आपको ये रॉकेट है फर्ज़ करो, ये रॉकेट है
- 1:00:25ये जा रहा है ऊपर ऊपर ऊपर ऊपर। अगर तू जा रहा है तो पृथ्वी का
- 1:00:33ग्रेविटेशन इसको नीचे लेकर आएगा। हालांकि काम करता है ग्रेविटेशन
- 1:00:37अगर ये रॉकेट ऊपर ऊपर जाता है, ऊपर जाता है तो जाता है अपनी
- 1:00:42शक्ति से लेकिन अगर ये ठहर गया तो क्या होगा?
- 1:00:46गया नीचे गया। यही चेतना का हिसाब है।
- 1:00:53चेतना अगर बाहर बिखरी रही, बिखरी रही, बिखरी रही तो तुम बिखरते चले
- 1:01:01जाओगे, बिखरते चले जाओगे। फिर धन को बढ़ाते जाओगे, मान यश
- 1:01:07को बढ़ाते जाओगे, डिक्टेटर हो जाओगे, राज़ काज की गद्दी पर बैठ
- 1:01:11जाओगे लेकिन तमन्ना नहीं भरेगी, तमन्ना क्यूँ नहीं भरेगी?
- 1:01:15क्योंकि तृप्ति नहीं आएगी गद्दी के ऊपर ऊपर बैठ जाना।
- 1:01:26मान, सम्मान, रूतबा, धन इनके ऊपर ऊपर गति कर जाना, उससे चेतना
- 1:01:35निभती है। चेतना को भीतर गिराना है।
- 1:01:41कहाँ उस कुंडनी के पास कैसे गिरेगी?
- 1:01:45यह चेतना चाहती हुई इसको रोको जब रोकोगे, जब कोई चीज़ ठहरी तब नीचे
- 1:01:53धरे ठहरना है मूल मंत्रा रुक जाओ स्टॉप।
- 1:02:08जब ठहरोगे तो आपको नीचे उतरना नहीं पड़ेगा।
- 1:02:13इसको गिरना थोड़ी पड़ा, इसको गिरना नहीं पड़ा, सिर्फ इसने ऊपर
- 1:02:18जाना छोड़ दिया। ऊपर जाना छोड़ दिया तो क्या हुआ
- 1:02:22या गई नीचे गई ऐसे ही तुम्हारी चेतना भीतर जाएगी।
- 1:02:31आपने कुछ नहीं करना है, चेतना को बेहतर इकट्ठे करने के लिए कोई
- 1:02:37प्रयास नहीं है ध्यान और प्रयास का दूसरा नाम है ध्यान में कुछ
- 1:02:43नहीं करना होता ध्यान में बस आप से चलो के बैठ जाओ, बैठ जाओ
- 1:02:48सिर्फ। ध्यान अपने आप भीतर मुड़ेगा भीतर
- 1:02:51जाएगा जाएगा जाएगा वक्त लग सकता है क्योंकि तुम्हारे संस्कार
- 1:02:56तुम्हें उखाड़ेंगे पहले तो तुम्हारे विचार तुम्हारे बैरी
- 1:03:01बनेंगे फिर तुम्हारी भावनाए बैरी बनेंगी।
- 1:03:04ये लोग लालच कहेगा क्या करते हो, कहाँ उलझ गए?
- 1:03:07दुकान पर बैठ जाओ, चार पीस से कमा लोगे, कोई झंडा उठा लो, कहीं
- 1:03:13पहुँच ही जाओगे, कोई रूतबा मिल जायेगा, कोई छोटे मोटे करता धर्ता
- 1:03:20बन जाओ किसी पार्टी के। चलते चलते चलते कुछ ना कुछ पा
- 1:03:24जाओगे। यहाँ क्या कर रहे हो इन मुलों के
- 1:03:28साथ क्या है? कुछ नहीं मिलेगा, मन तुम्हें
- 1:03:32भटकाने की बड़ी कोशिश करेगा। अगर भटक गए तो भाई भटक जाओगे अगर
- 1:03:41नहीं भटके। आपने अपने भीतर उतरना शुरू कर
- 1:03:45दिया। दिनचर्या के कामगार करते रहो, पेट
- 1:03:53भरने के परिवार भरने के परिवार के कर्तव्यों को निर्वहन करने के
- 1:03:57उपाय करते रहो। जो भी आपके पास हैं।
- 1:04:03लेकिन जैसे ही आपको वक्त मिले वैसे ही ठहरना ठहर जाना जैसे ही
- 1:04:10ठहरे आप ठहर नहीं सकते। समझ लेना बात को एक ही तल पे को
- 1:04:16कुछ नहीं ठहर सकता। पृथ्वी भी अगर आज ठहर जाएगी,
- 1:04:20घूमना बंद कर दे तो गिर जाएगी, ठहरी हुई चीज़ गिर जाती है, बाहर
- 1:04:35से खींचना ठहरा लेना, आप ठहर जाना।
- 1:04:41वह चेतना का जो एकत्रित रूप है, जो आपने बिखेरा था बाहर अलग अलग
- 1:04:49चीजों में, वह भीतर उतरेगा अपने आप उतरेगा भीतर उतरता जाएगा उतरता
- 1:04:56जाएगा फिर आप पहुंचोगे उस जगह जहाँ कुंडली है।
- 1:05:00मुलाधर के पास है वह उस कुंडली शक्ति से जाकर सारी चेतना टकराएगी
- 1:05:09और कुंडली जगेगी, चेतना कुंज खुलेगा, सुशमना नाड़ी के जरिए सभी
- 1:05:17चक्करों को क्रॉस करेगा। सब भी चक्कर खुल जाएंगे।
- 1:05:22किसी भी चक्कर पे ध्यान नहीं करना है।
- 1:05:26ये रास्ता ही नहीं है, गलत रास्ता है जी।
- 1:05:30इसके दुष्परिणाम हो सकते हैं। बहुत से लोग मेरे पास आते हैं।
- 1:05:33बाबा रीढ़ की हड्डी में बड़ा दर्द हो रहा है।
- 1:05:37कहीं कोई गिरे थे, कोई एक्सीडेंट हुआ था नहीं, कुछ नहीं हुआ।
- 1:05:41बस ये साधना चक्करों की करता हूँ, इसे छोड़ दो ये साधना तो मैं कहीं
- 1:05:47नहीं पहुंचाई इसका सहज मार्ग आपको मैंने बताया साधू।
- 1:05:56सहज समाधि भरी सहज समाधान हो जाए वो भला है आप असहज समाधान करते
- 1:06:06हो। सीधा उस चक्कर पे ध्यान कर लिया
- 1:06:09सीधा उस चक्कर पे ध्यान कर लिया सीधा सहस्रत पे सचखंड पे ध्यान कर
- 1:06:13लिया। जो मार्ग मैंने बताया बाहर से
- 1:06:23सारी चेतना पुंज को इकट्ठा करो, कछुए की तरह सारे अंगों को समेट
- 1:06:30लो, भीतर उतरते जाओ, उतरते जाओ ठहरोगे तो उतरोगे।
- 1:06:37ठहरोगे तो उतरोगे इसको आप मूल मंत्र की तरह ले लेना ठहरोगे तो
- 1:06:46उतरोगे वो उतरना अपने आप हो जाएगा क्योंकि भीतर एक चुम्बक बैठा है
- 1:06:55भाई आपकी शक्ति को खींचेगा। जहाँ से ये अनंतनाद का उद्गम स्थल
- 1:07:02है। आप ठहरे तो आपकी चेतना भीतर लौटी
- 1:07:10लौटते लौटते आप उस स्थान को टॅच करोगे जहाँ कुंडलिनी का।
- 1:07:17कॉन्शस नर्स पुंज चेतना पुंज विद्यमान है।
- 1:07:21उससे टकराएगा वह जगेगी, जगेगी और जगकर सुशूमना नाड़ी के बीच में से
- 1:07:31प्रवाहित हो के सभी चक्करों का वेदन करके।
- 1:07:34सहसर में उतरी और तीसरा नेत्र भी खोल दे, ये है साफ साफ प्रोसेसर
- 1:07:45और अगर किसी को यहाँ पर ध्यान करने से मिल गया हो तो मुझे बता
- 1:07:50दे पागल हुए बहुत देखे मैंने। संत हुआ कोई नहीं देखा, कोई है तो
- 1:07:56आ जाओ भाई मेरा ओपेन बराबर अगर कोई किसी स्थान पर ध्यान करके उस
- 1:08:05चक्कर को जगह पाया है, आज तक धरती पे तो आ जाए।
- 1:08:12खुला खुला बुलावा है, मेरा ऐसा व्यक्ति चैलेंज करे।
- 1:08:16क्या आप कल बोल रहे हो? नहीं होता है ऐसा क्योंकि जिसने
- 1:08:23ताजमहल देख लिया है वह सभी प्रकार के दावे करेगा।
- 1:08:28जो कहते हैं नहीं है वो आ जाए मेरे पास, मैं दिखा दूंगा उसको।
- 1:08:34जिसने देख लिया ताजमहल उसने देख लिया, देखने से सारी शंकाएं मिट
- 1:08:39जाती हैं उतर गयो मेरे मन का सन्स है जब तेरा दर्शन पायो।
- 1:08:54ठाकुर ठाकुर। तुम सरनाइयो ठाकुर, तुम सरनाइयो।
- 1:09:28उतर गयो, मेरे मन का संसा उतर गयो।
- 1:09:44मेरे मन का संसार जब्त दर्शन पायो ठाकुर।
- 1:10:01तुम सरनाई आए ठाकुर तुम सरनाई आए। दुख नाट है, सुख सहज समाज दुख नाट
- 1:10:32है सुख सहज समाज। दुःख नाट है सुख सहज समाज।
- 1:10:54दुःख, दुःख, नाटक, सुख सहज समय आनंद आनंद गुण।
- 1:11:15आयो ठाकुर तुम सरना, आयो ठाकुर, तुम सरना।
- 1:11:33आया बांह पकड़, कड़ ली ने अपन बांह पकड़।
- 1:11:52काढली ने अपनी ली ने अपनी गृहण को पुतेमाया ठाकुर।
- 1:12:10तुम सरनाई आया ठाकुर, तुम सरनाई आया तुम सरनाई आया ठाकुर।
- 1:12:29तुम सरनाई आयो तुम सरनाई आयो ठाकुर तुम सरनाई आयो ठाकुर, तुम
- 1:12:44सरनाई। आयो ठाकुर तुम सरनाई आयो।
- 1:13:03धन्यवाद।