Latest / Baba ji Vijay Vats / 11 Dec 24 - कैसे मिलता है हमें स्थूल शरीर? गीता का ज्ञान! कण से विराट तक की यात्रा- वासांसि जीर्णानि।
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- 0:09सार रूप में हम पहले की बात करके इस प्रसंग को आगे बढ़ाए गए वसाण
- 0:23से यह ऋणानी यथा विहाय। नवानि घृणाति नरोपराण।
- 0:29तथा श्रीराण विहाय जीर्णों अनन्याणि संयाति नवानी देवी।
- 0:43तीन चीजों का मैंने जिक्र किया सबसे पहले आत्मा वह स्थिर है।
- 0:51अचल है, निष्कम्प है, उसकी कोई यात्रा नहीं, समग्र भ्रमण में
- 1:02अस्तित्व में वह भरी पड़ी है, वो तो आत्मा हो गए हैं।
- 1:10परमात्मा कहलों आत्मा कहलों, दूसरा सूक्ष्म शरीर और सोल शरीर
- 1:24सारी यात्रा सूक्ष्म शरीर की है। सूक्ष्म शरीर सतूल शरीर में
- 1:35प्रवेश करता है, सतूल शरीर घर जैसा है जैसे तुम एक घर से दूसरे
- 1:43घर में चले मरता है फूल शरीर। बार बार और सूक्ष्म शरीर एक बार
- 1:55मरता है और जीस दिन सूक्ष्म शरीर मर गया वही तुम्हारी मुक्ति का
- 2:03क्षण है तुम्हारी मुक्ति का मतलब। लिबरेशन का मतलब सूक्ष्म शरीर का
- 2:12मर्चना अब तीन चीजें हो गई। सूक्ष्म शरीर का जन्म कैसे हुआ?
- 2:22मैंने कल भी बताया था सूक्ष्म शरीर में।
- 2:27तुम्हारी सभी कामनाएं वासनाएं पिछले जन्म की स्मृतियां तुम्हारी
- 2:36अधूरी रह गई अपूर्त वासनाएं कल्पनाएं, भविष्य की योजनाएं।
- 2:46और तुम्हारी सोंची गई मनुष्यृत्तियाँ जो अपूर्ण रह गई
- 2:53जो पूरी नहीं हो सकी। पिछले सभी जन्मों के सभी
- 2:58क्रियाकलाप हमारे सूक्ष्म शरीर में संग्रहित है।
- 3:05यह सूक्ष्म शरीर यह विद्युतीय होता है और सुर शरीर यह यह
- 3:16पदार्थीय होता है यह तत्वों से बना है और जो सूक्ष्म शरीर है वह
- 3:23तत्वों से नहीं बना है। वह विद्युतीय है।
- 3:27विद्युत से बना अब हम आगे चले आत्मा साक्षी है, आत्मा दृष्टा
- 3:44है, आत्माशक्ति का भंडार है। जैसे थर्मल पावर स्टेशन वहाँ से
- 3:54हम शक्ति लेते हैं, हम हम जानें सूक्ष्म शरीर इस वक्त विश्व का
- 4:03प्रत्येक प्राणी ध्यान से समझना शब्द को।
- 4:09इस शब्द को गांठ लगा दे जिसे तुम कहती हो मैं विश्व का प्रत्येक
- 4:18प्राणी यह सूक्ष्म शरीर ही है जिसे मैं कहता है इस सूक्ष्म शरीर
- 4:26में सब कुछ आ गया है। कांप भी आ गया, क्रोध भी आ गया,
- 4:30मोह भी आ गया। पिछली जम के संस्कार भी आ गए,
- 4:34प्रारब्ध कर्म भी आ गए। सब घुल मिल गया और सबका इकट्ठा
- 4:43समूह यह सूक्ष्म शरीर है। सारी साधना इस सूक्ष्म शरीर को
- 4:51गलाने की साधना है। फूल तो सिर्फ हमारा।
- 4:58लेवास वासन, श्री हिरण नहीं कोई जवान होता है, कभी बच्चा होता है,
- 5:06कभी मर जाता है, इसकी दशाएं बदलती रहती है, सूक्ष्म शरीर की दशाएं
- 5:16भी बदलती रहती है। कुछ कर्म भोग लिए कुछ नए जुड़ गए।
- 5:26कुछ कर्म शेष रह गए, कुछ आगे करने की योजनाएं बनानी घटता बढ़ता रहता
- 5:33है। सूक्ष्म शरीर पे लेकिन अंततः है
- 5:40यह जो यात्रा है। यह ना तो सुर शरीर करता है, ना
- 5:44आत्मा करती है। यह सूक्ष्म शरीर करता है।
- 5:51भगवान कृष्ण ने इस श्लोक के आखिर में एक शब्द कहा।
- 6:01हिरण अनन्याणि संयाति नमानी देही देही?
- 6:08कौन है यह बड़े अवसर पैदा होते हैं।
- 6:15बहुत से आचार्य। बहुत से व्याख्याकार टीकाकार इस
- 6:29देही को व्याख्यात करते हैं, आत्मा के रूप में नहीं दे ही।
- 6:38देह में रहने वाला सूक्ष्म शरिश यहाँ थोड़ा सा आप नोट कर लेना बात
- 6:47को देही आत्मा नहीं है आत्मा किसी देह को धारण नहीं करता है इसलिए
- 6:54वो देही नहीं। फिर सुन लो आत्मा किसी देह को
- 7:02उदाहरण नहीं करता और किसी देह को छोड़ता भी नहीं इसलिए आत्मा देह
- 7:10ही नहीं देह कौन, बस एक ही बचा। सूक्ष्म शरीर दे ही है, जो देह
- 7:20में जाता है और देह को छोड़ता है। जो देह में निवास करता है, घर
- 7:27बदलता है, वह दे ही है। ठीक तो चलो हम आगे चलें।
- 7:43इधर से प्रश्न आ रहा है सूक्ष्म लोक से कि दे ही बना कैसे देह तो
- 7:50बन गया पांच तत्वों से आत्मा साक्षी है दे ही कैसे बना?
- 8:02बड़ा सुंदर सवाल है। मुझे उम्मीद नहीं है कि यह सवाल
- 8:07कोई पूछेगा लेकिन कमाल की आत्माएं हैं।
- 8:16सभी वासियों का, इच्छाओं का, अभूषाओं का, आकांक्षाओं का,
- 8:21कल्पनाओं का समृतियों का ढेर दे ही है।
- 8:26मैंने कहा यह बना कैसे? एक शब्द सुनिए है तो सियार।
- 8:35मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर मैं अकेला ही चला था जानिबे
- 8:49मंजिल मगर लोग साथ आते गए। और कार्यवां बनता गया सूक्ष्म
- 9:00शरीर की रचना पत्थर से शुरू हो जाती है, थोड़ा थोड़ा जुड़ता रहता
- 9:08है, जुड़ते, जुड़ते, जुड़ते है जैसे जैसे।
- 9:15नए शरीर में जाता है पत्थर से पेड़ पेड़ पौधों से चलने वाले जीव
- 9:23जंतु जीव जंतु से यूनीसेल्युलर मल्टीसेल्युलर फिर आगे बढ़ता
- 9:31बढ़ता दो उपाय, चार उपाय। मैं अकेला ही चला था।
- 9:37जानबे मंजल मगर लोग साथ आते गए और कार्यमा बनता गया।
- 9:47सभी शरीरों में जैसे निर्माण हुआ। पत्थर से समझने वाली चीज़ है,
- 9:56बहुत काम आएगी, आपके सभी गुत्थियां खुल जाएंगी।
- 10:00आपके कुछ बने पत्थर में कुछ बने पेड़ पौधों में कुछ बने छोटे जीव
- 10:13जंतुओं में। कुछ बने बड़े जीवजन्तु में, कुछ
- 10:17पक्षियों में, कुछ पशुओं में और फिर कुछ मनुष्य में के संस्कार
- 10:29वासनाएँ इच्छाएं कल्पनाएँ। अभी साणें जुड़ती गईं, लोग साथ
- 10:38आते गए और कार वहाँ बनता गया। आज हम इस वजह से में हैं एक एक
- 10:45करके जुड़ता गया सब शुरू हुआ जड़ से शुरू हुआ पत्थर से जब काफी
- 10:51लाभ। विशाल है आज भर गया है सब शुरू
- 10:59हुआ पत्थर से छोटा सा काफिला नहीं था, छोटा सा एक ज़ारा था।
- 11:05सूक्ष्म से किसी वक्त और जैसे जैसे देहें बदलती गईं।
- 11:14जैसे जैसे देह बदलती गई, वैसे वैसे देह ही बदलता गया।
- 11:20शब्दों को बड़े गहरे से समझना मैंने दे ही कहा है सूक्ष्म
- 11:27चरित्र को आत्मा का इसमें कोई मतलब नहीं।
- 11:30आत्मा तो सिर्फ। ऊर्जा प्रदान करने वाली शक्ति
- 11:37सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ बिखरी पड़ी है।
- 11:43सारे संसार में अस्तित्व में उसी का ही अस्तित्व है।
- 11:50उसे आत्मा कहते हैं, उसकी बात ही नहीं है यहाँ फिर कह देते हैं
- 11:57कृष्ण ने आत्मा शब्द क्यों भरता है, क्यों प्रयोग किया?
- 12:02देखिए, कृष्ण की वेला में शब्दावली थोड़ी कम थे।
- 12:07उदाहरण भी कम थे। इतनी तरक्की नहीं की थी।
- 12:12साइंस में आई तो हमारे पास बड़ी उदाहरण है।
- 12:16हम कंप्यूटर के उदाहरण दे देते हैं।
- 12:18हम एआई के उदाहरण दे देते हैं, हम और बहुत सी चीजों के उदाहरण दे
- 12:23देते हैं, लेकिन उस वक्त नहीं थी वह उदाहरण।
- 12:27कि जितना था, उससे ही काम चलाना पड़ा तो कृष्ण ने शब्द इस्तेमाल
- 12:32किया। आत्मा मजबूर जीतने शब्द उपलब्ध
- 12:38होंगे तुम्हारी डिक्शनरी में, वैसे ही शब्द प्रयोग करने
- 12:42पड़ेंगे। वक्त के अनुसार आज बहुत कुछ
- 12:46उपलब्ध है। आपको उदाहरण देने के लिए और आज से
- 12:5150 साल बाद आज से भी ज्यादा शब्द होंगे।
- 12:54हम जो नहीं बोल पाए, हम जो उदाहरण नहीं दे सकते हैं, आज वह 50 साल
- 13:02बाद आने वाले ज्ञानी आपको उदाहरण दे देंगे।
- 13:07क्योंकि तब वो चीजें मौजूद होंगी। आज वो उदाहरण नहीं है लेकिन आज वो
- 13:13उदाहरण है जो कृष्ण के जमाने में नहीं है।
- 13:17इसलिए कृष्ण ने कहा आत्मा दे ही को आत्मा कहा लेकिन दे ही आत्मा
- 13:23है नहीं। देही का मतलब होता है सूक्ष्म
- 13:27शरीर बस आप ये समझ लो आगे चलें जड़ से शुरू किया एक एक संस्कार,
- 13:39एक एक वासना, एक एक छ अभिव्सा जुड़ती गई।
- 13:44मैं अकेला ही चला था जानी बे मंजिल मंजिल क्या थी मंजिल थी
- 13:53कान्शस्नस लेबल जड़ चला था परमात्माओं ने।
- 14:01जड़ चला था सुपरकॉन सी सून ये यात्रा है तो बीच में जुड़ती गई,
- 14:11लोग आकर गए और कारवां बनता गया। क्या बढ़ता गया?
- 14:19सूक्ष्म शरीर बढ़ता गया। जैसे जैसे सूक्ष्म से ऋण बढ़ा,
- 14:26वैसे वैसे काफीला बढ़ा जैसे आज तुम्हारी इच्छा जहाज खरीदने की
- 14:33है। हेलिकॉप्टर खरीदने की है, कार
- 14:36खरीदने की तो आम ही इच्छा है तुम्हारी।
- 14:40लेकिन क्या कृष्ण के जमाने में दत्तात्रेय के जमाने में शंकर के
- 14:45जमाने में कार खरीदने की इच्छा किसी की होती थी?
- 14:50जहाज हेलिकॉप्टर खरीदने की इच्छा किसी की होती थी नहीं होती थी
- 14:56क्यों? क्योंकि थे नहीं।
- 15:01आज ये इच्छा है क्योंकि आज हैं आज से 50 साल बाद जो चीजें होंगी नया
- 15:08इंस्ट्रूमेंट होगा, ऐसे यातायात के साधन आ जाएंगे जब कि तुम कहीं
- 15:15से भी चलोगे। और सारे संसार का चक्कर काट लोगे,
- 15:22खा पी भी लोगे, टी ब्रेक भी हो जाएगा, डिन्नर और लंच भी हो
- 15:27जाएगा, शाम की चाय भी हो जाएगी और 5 घंटे लगेंगे, वो वक्त भी आ
- 15:35जाएगा। सर इस संसार का चक्कर भी काट
- 15:40लोगे, घूम फिर भी लोगे लेकिन आज नहीं है ऐसा मैं अकेला ही चला था
- 15:51जानबे मंजिल मकर। लोग साथ आते गए और कार्यवां बनता
- 16:01पत्थर से ही चला था। एक एक संस्कार जुड़ा नई नई इच्छा
- 16:07जननी तब कार लेने की इच्छा नहीं थी आज के मालूम में।
- 16:13जहाज लेने की इच्छा है। हेलिकॉप्टर लेने की इच्छाएं
- 16:22जुड़ती गईं, जो तब नहीं थी आज हैं और काफिला बनता क्या?
- 16:31ऐसे ही काफिला बन गया है और इस काफिले का नाम है सूक्ष्म शरीर।
- 16:39अब इस काफिले को तुम्हें मुँह बड़ा हो गया है।
- 16:45इस काफिले के साथ रहते रहते क्योंकि यह सदा से तुम्हारे साथ
- 16:49है। जैसे ही तुमने प्रथम यात्रा शुरू
- 16:54की पत्थर से परमात्मा की यात्रा शुरू की।
- 16:59पत्थर से थोड़ा सा संस्कार तुम्हारा जुड़ा हल्का सा शरीर बना
- 17:07तुम्हारा सूक्ष्म। वहाँ से सूक्ष्म बढ़ता गया,
- 17:12पेड़पौधों में आए तुम सूक्ष्म शरीर पेड़पौधों से तुम गए।
- 17:20अमीबा में यूनी सेल्यूलर मल्टी सेल्यूलर फिर तुम पशु पक्षियों
- 17:28में गए। उड़ने वाले वृक्षों में गए
- 17:34समुद्री जीवों में गए छोटे बड़े जीवों का चक्कर लगाते लगाते
- 17:40तुम्हारी वासनाएँ तुम्हारी इच्छाएं जुड़ती गईं।
- 17:44लोग साथ आते गए और कार्रवा बनता गया।
- 17:52आज ये दशा हो गई लेकिन इस दौरान एक घटना घटी।
- 18:02वो घटना क्या घटी कि तुम भूल गए कि तुम हो?
- 18:12शुरू शुरू में तुम्हे याद था थोड़ा सा हल्का सा पत्थर से शुरू
- 18:17हुई एक छोटा सा ज़र्रा कण से भी बहुत छोटा।
- 18:28सूक्ष्म शरीर का तुम्हारे साथ जुड़ा तुम आगे गए ये कण से शुरू
- 18:34हुई यात्रा है कण से बैराट तक ये यात्रा कण से बैराट तक की यात्रा
- 18:45है। जब तुम पत्थर में थे तो कण से
- 18:50शुरू हुई यात्रा धीरे धीरे बढ़ती गई।
- 18:55फिर तुम वृक्षों में गए पेड़पौधों के बाद तुम जीवों में गए जीवों के
- 19:00बाद तुम बड़े जीवों में गए और फिर आखिर में।
- 19:05मानव जामे में आ गए सर्वश्रेष्ठ जामा तुम्हें मिल गया जिसमें
- 19:11बुद्धि भी है और जिसके यंत्र बड़े शानदार हैं।
- 19:17प्रत्येक जीव के किसी न किसी यंत्र में कमी।
- 19:24एक चीज़ की कमी तो है बुद्धि नहीं मानव जितनी बुद्धि नहीं है, ये तो
- 19:30कम है, बाकी और भी चीजों में बहुत कमी है।
- 19:38आखिर में मानस का चोला मिला, लेकिन मानस का चोला आते आते।
- 19:44तुम्हारा सूक्ष्म शरीर विराट हो गया, विशाल हो गया और सूक्ष्म
- 19:52शरीर भी विशाल हो गया और तुम्हारा मोह हो तुम्हारी लिप्तता भी विशाल
- 19:56हो गई। धीरे धीरे तुमने समझ ही लिया।
- 20:02जो कण से चला था। आज विराट हो गया, वही मैं हूँ तो
- 20:10मनीष का ये प्रश्न बड़ा प्यारा है शायद कोई ना करता लेकिन एक नया
- 20:19आयाम दे दिया तुमने आज एक प्रश्न करके।
- 20:24कण से विराट की यात्रा धीरे धीरे बढ़ता गया।
- 20:29धीरे धीरे सूक्ष्म शरीर भी बढ़ता गया।
- 20:32सात सात चलो मैं और धीरे धीरे तुम्हारी लिप्तता भी बढ़ती गई।
- 20:39कण के साथ तुम्हारा जुड़ाव हुआ पहले दिन।
- 20:43फिर दो कण हुए फिर तीन, फिर पांच जैसे जैसे कण बड़ा होता चला गया।
- 20:49वैसे वैसे तुम्हारी लिप्तता बड़ी होती चली गई।
- 20:54आज कण बड़ा विशाल हो गया है। बड़ा विराट हो गया है उसे तुम मैं
- 20:59कहते हो। इसमें बहुत सी वासनाएँ हैं, बहुत
- 21:06सी विचार हैं, भावनाएँ हैं, बहुत सी ऐसी इच्छाएं है जो दमित रह
- 21:12गईं। बहुत कुछ होना चाहा, बहुत कुछ
- 21:17होना चाहा नहीं हो सके, दबाना पड़ा।
- 21:23और आज तुम इतने विराट हो गए तुम्हारा सूक्ष्म शरीर ही तुम हो
- 21:32किसी का भी सूक्ष्म शरीर उसका होना होता है ये समझ लेना।
- 21:42जिसे हम विजाति या द्रव्य कहते हैं।
- 21:45इस शब्द को नोट कर लेना सेंटिफिक भाषा है साइंस बड़े लोग तो समझ गए
- 21:50होंगे लेकिन तुम्हें थोड़ा सा धीरेधीरे समझाऊंगा मैं यह फॉरेन
- 21:55मटेरियल है, यह विजाति या द्रव्य है।
- 22:01और इसको गालना इसको समाप्त करना, इसको वैनिश करना ही मुक्ति है।
- 22:09ये चिपक गया तुम्हारे साथ और इसका मोह भी चिपक गया क्योंकि मोह बड़ा
- 22:17पुराना है। संस्कार बड़ा पुराना है।
- 22:20यह संस्कार बन गया और इतना गहरा संस्कार बन गया कि चेप्पी हो गया
- 22:25चेप्पी यह अखाड़े से करता नहीं। जब इसको थोड़ी सी चोट पहुंचाई
- 22:31जाती है तो यह कहता है कि तुमने मुझे चोट पहुंचा दी है।
- 22:36सूक्ष्म शरीर तुम हो के रह गए कि मैं सूक्ष्म शरीर हूँ, यही दुविधा
- 22:44है संत में और तुम में तुम कहते हो सूक्ष्म शरीर में हूँ संत कहते
- 22:53हैं, सूक्ष्म शरीर तुम नहीं हो। सूक्ष्म शरीर तुम्हारी लिप्तता
- 22:58है, तुम तो आत्मा हो तुम तो वो हो जो विराट में बिखरे पड़े हो
- 23:08तुम्हारा फैलाव और छोर के बिना है तुम्हारा कोई मापदंड नहीं।
- 23:16कोई पैमाना नहीं, कोई अंत नहीं, कोई आदी नहीं तुम वो तुम कहते हो
- 23:23नहीं, मैं सूक्ष्म मेरी चाहतें हैं, मैं चाहतें पूरी करूँगा।
- 23:31संत कहते हैं कि ये तुम्हारी लिप्तता है।
- 23:35जैसे ही पत्थर से लगे इकट्ठा करने, आज इतना कुछ कूड़ा कबाड़ा
- 23:41इकट्ठा कर लिया और इस कूड़े कबाड़े को तुम नाम देते हो मैं,
- 23:49लेकिन संत कहते हैं दत्तात्रेय कहते हैं, कृष्ण कहते हैं, शंकर
- 23:54कहते हैं। यह कूड़ा तुम नहीं हो और क्योंकि
- 24:00महो बड़ा घणा है, लिप्तता बहुत पुरानी है, इसलिए तुम किसी कीमत
- 24:08पे मान ही नहीं सकते कि यह कूड़ा मैं नहीं हूँ।
- 24:15बहुत पुरानी तुम्हारी चपकाहट है। शुरू से जब एक कण था तब से चपकने
- 24:24शुरू हो गए थे। तुम एक से दो कण हुए, फिर बढ़ता
- 24:28गया। लोग साथ आते गए और कारवां बनता
- 24:32गया। आज ये कारवां बन गया तुम भी ठीक
- 24:38हो अपनी जगह ये कारवां टूटे कैसे, बिखरे कैसे?
- 24:44क्योंकि तुम्हारी छिपकहट बड़ी गहरी है।
- 24:50जब इसको उखाड़ा जाता है तो तुम चिल्लाते हो, चीखते हो तुम्हारा
- 24:58मोह बड़ा घना है तुमने ऐसी गोंद लगा ली है ऐसी चेपिया लगा ली है
- 25:05इसके साथ। कि अगर कोई इसको थोड़ा सा चिप
- 25:09उखाड़ न जरूर करता है तो तुम चिल्लाते हो और तुम चिल्लाते भी
- 25:14हो, तुम प्रतिक्रिया भी कर देते हो, क्योंकि संत कहते हैं यू आर
- 25:27ऑन मिस्टेक यू आर इन इल्ल्यूज़न। तुम गलती पे हो, तुम भ्रम में हो
- 25:34शांत इसे उखाड़ने की कोशिश करता है क्यों करता है?
- 25:42क्योंकि यह फौरन मटेरियल है और फौरन मटेरियल सदा ही दुखदायी होता
- 25:48है। तुम डॉक्टरों से पूछो यह जो
- 25:54कैंसराइटिस के होते हैं अणु यह फौरन मटेरियल होते हैं, इनकी
- 26:00आवश्यकता नहीं होती, लेकिन यह तुम्हें तंग करते हैं, दुख देते
- 26:06हैं, ऐसे ही तुम तुम्हारा अहंकार। जिसे तुम मैं कहते हो, वह तुम्हें
- 26:11दुख देता है यह तुम्हारे लिए, यह तुम्हारे लिए दर्द का कारण है।
- 26:22संत क्यों इसको तोड़ना चाहते हैं? तुम्हारी चिल्लाहट के कारण तुम
- 26:27चिल्लाते हो बाबा, मैं दुखी हूँ। बाबा मेरा बच्चा बीमार है बाबा
- 26:38मेरी माता बीमार है, मेरे मामा को ठीक कर दो, मेरी माता का ख्याल
- 26:44रखो, वो मर चुकी है, फिर उसका ख्याल रखो।
- 26:50तुम्हारा मोह घना, गहरा टूटे से टूटता नहीं।
- 26:57संत क्या करे बेचारा संत को दया बड़ी आती है, दया क्यों आती है?
- 27:05क्योंकि वो भी किसी दिन? इसी पोज़ीशन में रहा है और वो
- 27:10जानता है तुम्हारा दुखड़ा और वो ये भी जानता है कि इस दुखड़े से
- 27:16तुम मुक्त भी हो सकते हो लेकिन उसके जो वश में है वो जब करता है
- 27:22तो तुम उसे करने नहीं देते। यह तुम्हारे कैंसर आईटीस की
- 27:27सर्जरी करना चाहता हूँ और तुम उलटे प्रतिक्रिया करते हो,
- 27:35गालियां भी निकाल देते हो, कॉमेंट्स भी कर देते हो, बला बुरा
- 27:39भी कह देते हो। कबीर कहते हैं, अगर तुमने किसी की
- 27:45सर्जरी करनी हो तो भला बुरा तो वो कहेगा, लेकिन सर्जन भले बुरे का
- 27:54ख्याल नहीं करता, सर्जन का एक ही उद्देश्य होता है कि कैसे तुम्हें
- 27:59इन शैलजा से मुक्त कर दू? जिनको हटाना आवश्यक है।
- 28:04जिनके कारण तुम दुखी हो। जो दर्द का कारण है तो कबीर कहते
- 28:14है। भला बुरा सबका।
- 28:25सुना ली जो भला बुरा सबका। सुन ली जो कर गुजरान गरीब।
- 28:59मन लाग्यो मेरे राम फकीरी मैं फकीरी मैं।
- 29:15मन्नड़ोलाग्यो मेरा कबीर कहते हैं।
- 29:22तुम्हें सर्जरी तो करनी पड़ेगी, भला बुरा भी कहेंगे, लोग तुम्हारी
- 29:30जब्त भी मार सकते हैं, मेरे भतीजे के।
- 29:36स्कूटर किसी ने मार दिया, माथे सुकून से निकलने लगा, हम डॉक्टर
- 29:43के ले गए। डॉक्टर ने 12 टाँके लगाए और भतीजा
- 29:52छोटा था। सात 8 साल का तो भतीजा डॉक्टर को
- 29:58गाली निकालने लगा। माँ बहनों का छोटा सा बच्चा दर्द
- 30:02होता है, जब स्विच होता है, टांका लगाता है, दर्द होता है तो वो
- 30:09गाली निकालता है, ऐसे ही तुम बिगड़ती हो।
- 30:14तुम्हारा घाव डॉक्टर ठीक करना चाहता है और तुम गाली निकालते हो।
- 30:21ये कॉमेंट्स जो तुम भद्दे भद्दे कमेंट कर देते हो, ये तुम्हारी
- 30:28गालियां ही तो हैं या तुम ज्यादा ज्ञानी बन के करो।
- 30:33या तुम मूड बन के करो, तुम भाद्र भाषा का प्रयोग करो, तुम भाद्र
- 30:38भाषा का प्रयोग करो नहीं नहीं अपनी एनलाइटनमेंट की वीडियो बनाई
- 30:48बड़े कमेंट पापा। मैंने उसको फ़ोन लगाया, बेटा
- 31:00पक्का है आई ऍम ए इन हैलूसिनेशन लेकिन आई ऍम एन एक्सटसी परम आनंद
- 31:13में भी हूँ मैं। क्या हैलो सेनेशन में अखंड धारा
- 31:21आनंद की होती है? बाबा जी तो मुझे पता नहीं बट यू
- 31:27अरे इन हेल्प सेनेशन कोई साइकोलॉजिस्ट होगा।
- 31:34तुम ज्ञानी बन के बड़े ज्ञानी बन के कमेंट करो या मूड बन के कमेंट
- 31:42करो, सीधी गाल भी निकाल देते हैं। कई लोग सीधी सीधा चलते हैं चलो।
- 31:50हमें सब कुछ बर्दाश्त करना पड़ता है।
- 31:51कबीर कहते हैं भला भूरा सबका सुन लीजिए, कर गुजरान गरीबी में,
- 32:00मनोरुर लागो मेरो राम फकीरी में जिसका मन फकीरी में लग गया।
- 32:10जिसके भीतर शहद की बारिश होने लगी।
- 32:15मिठास ही मिठास जड़ने लगा। वह तुम्हारी गालियों की परवाह
- 32:21नहीं करेगा। हर पल हर पड़ी।
- 32:29तरंगे अमरश्र ही हैं। आनंद के वो विचलित नहीं होने
- 32:35देंगे। सारी आध्यात्मिकता तुम्हें तुम से
- 32:49मुक्त कराने के। अब शब्दों में नहीं आता, लेकिन
- 32:54समझा देता हूँ तुम सूक्ष्म शरीर फौरन मटेरियल हो भी जाती या
- 33:04द्रव्य हो, इसको हटाना ही संत का काम है।
- 33:12जैसे कैंसर होते हैं, कैंसर के सेल होते हैं, उनकी जरूरत नहीं
- 33:15होती। वो शरीर को फलने फूलने में कार्य
- 33:21करने में कोई योगदान नहीं देते, वर्ण बाधा बनते हैं, दर्द क्रिएट
- 33:29करते हैं। दुख होता है, रातों की नींद हराम
- 33:34करते हैं, जीना मुहाल कर देते हैं इसलिए तुम डॉक्टर के पास जाते हो।
- 33:41देखो जी ये क्या है? डॉक्टर उसका सैंपल भेजता है, वाइफ
- 33:46से गहरी वाइफ से भेजता है वह कहता है सॉरी।
- 33:51इट इस कैंसर इट इस फिर क्या करना होगा?
- 33:58ये फ़ैल जाएगा सारे शरीर में और जो है फिर फिर इसको निकाल दो,
- 34:06निकाल दो। तो इस व्यर्थ के टिशूज़ को निकाल
- 34:15देना, विजातीय द्रव्य को निकाल देना तुम्हें चयन देगा और मैंने
- 34:23कहा यह सूक्ष्म शरीर विजातीय द्रव्य है।
- 34:28तुम्हारे दुख का मूल कारण है, मूल नहीं, मुख्य कारण है।
- 34:32कारण ही यह है दूसरा कोई कारण नहीं है।
- 34:40जब तक इसको नहीं हटाओगे तब तक तुम दर्द से कराहते ही रहोगे तुम
- 34:49बेचें। फिकरमंद चिंताग्रस्त, तनावग्रस्त,
- 34:59न दिन को चैन, न रात को नींद। तुम्हें कहीं आराम नहीं मिलने
- 35:06वाला आराम कब मिलेगा? जब ये सूक्ष्म शरीर का जिसकी
- 35:14आवश्यकता नहीं है देखिये इसकी आवश्यकता नहीं है।
- 35:18यह फौरन मटेरियल है। यह पहले दिन से ही तुम्हारी संघ
- 35:23चिपक गया है। बढ़ता गया, बढ़ता गया और आज इसने
- 35:28ये रूप ले लिया। कि तुम्हारा जीना मुहाल कर दिया।
- 35:33अब इसको हटाना इसलिए मुश्किल है कि जन्मो जन्मो का तुम्हारा चिपका
- 35:38हट का संस्कार है, इसके साथ यह तुम्हारे फैमिली मेंबर जैसा हो
- 35:47गया है, ऐसा नहीं। बल्कि यह तुम जैसा हो गया है, इसे
- 35:52तुमने मैं मान लिया है। अब इससे बड़ी विडंबना क्या होगी?
- 36:03तुमने विजातीय द्रव्य को मैं मान लिया, अब डॉक्टर क्या करेगा?
- 36:10जो व्यक्ति कैंसराइटिस के शेल को मैं मान ले कि नहीं ये तो मैं हूँ
- 36:17इसको निकालोगे तो मैं मर जाऊंगा और दुविधा उत्तपन्न होती है, तुम
- 36:25अज्ञानी हो, तुम्हें पता तो कुछ है नहीं।
- 36:29डॉक्टर को पता है ये कैंसर के सल हैं, ये मार देंगे इसको और
- 36:38तुम्हें कुछ मालूम नहीं तुम जिद पे अड़े हो मोह के कारण के ये तो
- 36:44मैं हूँ। इसे कोई ठेस पहुंचाना है तो तुम
- 36:49अदालतों में जाकर दरवाजे खटखटाते हो।
- 36:54किसी ने मुझे तू कह दिया 500,00,00,000 का हरजाना दे दो,
- 36:59ऐसे ऐसे उपद्रव करते फिरते हो तुम और उसका मुख्य कारण क्या है?
- 37:08तुम्हारा अज्ञान तुम्हारा अज्ञान के तुम कैंसर के शेल को मैं मानते
- 37:14हो, यह जो तुम्हें दुःख देता है यह जो तुम्हें दर्द देता है।
- 37:24यह जो तुम्हारी रातों की नींद दिन का चैन छीन लेता है, उसको तो
- 37:34मित्र नहीं, परिवार का सदस्य नहीं।
- 37:38उसे तो मैं कहने लग गया इससे बड़ी बड़बड़ और क्या?
- 37:44बड़े चिपके बड़े चिपके ऐसे चिपके उखड़ने का नाम नहीं लेते,
- 37:59बड़ेबड़े संत हार जाते हैं। उनके सारे फॉर्मूला फैल हो जाते
- 38:06हैं। देखिए ऋषि ने 112 विद्या बनाई
- 38:13तुम्हें उखाड़ने की कि कैसे तुम्हारा ये सूक्ष्म शरीर रूपी।
- 38:21कैंसर का सेल बीजाती है। द्रव्य हम काट के अलग कर दे,
- 38:26लेकिन तुम काटने के बाद तुम्हें तो कैंची दिखा दें तो तुम
- 38:30चिल्लाने लगते हो, तुम कहते हो मेरी तो भावना ही है हाथ कर दी।
- 38:39तुम कहते हो मेरी तरफ तो इसने घूर लिया, लाला तुम वे सिर, पैर की
- 38:50बातें और तर्क देते हो। जिन दलीलों में कोई दम नहीं होता,
- 38:57वो दलीलें तुम देते हो। यही रोग है।
- 39:01अब क्या करें? जब कोई व्यक्ति जहर को अपना भोजन
- 39:08मानने लगे तो कोई क्या करेगा? कोई कुछ नहीं कर सकता।
- 39:16ऐसी आपातकाल की स्थिति आ गई है। आज तुम्हारे पर सारी मानवता दुखी
- 39:22है। सारी मानवता रो रही है, पीड़ित
- 39:25हैं, सुविधाएं हैं, सुख लगता है। लेकिन है नहीं, अब है क्षण बर्बाद
- 39:41नहीं होगा, तुम फँस गए हो दुर्गा में न तुम इधर के हो न तुम उधर के
- 39:52हो। तुम भीड़ के बीच में फंस गया और
- 39:58तुम्हें निकलने का कोई मार्ग सूजता नहीं तो संत एक ही बात कहते
- 40:07हैं। शास्त्र एक ही बात कहते हैं कि
- 40:12ऐसे बहुपत्काल में। एक ही टेक है, क्या गुरु परमात्मा
- 40:21ही तुम्हें बजा सकता है? संघ सखा सब तज गए, कोई न न
- 40:27व्यवसाद संघ सखा सब तज गए। को उननभयो साथ कह नानक इस विपद
- 40:37में एकट्ठे कर गुणा थे, उसके ही शरण में जाओगे प्रभु, मैं घोर
- 40:47संकट में हूँ, आपातकाल में फंस गया हूँ अब तू ही नकार।
- 40:53बाप नानक ने कहा ना। बाह पकड़ कढली ने अपने।
- 41:12बांह पकड़ कढ़ ली नै अप ने बांह पकड़ कढ़।
- 41:28ली ने अपने गृहण को पुतमाया, ठाकुर तुम सरनाई आया।
- 41:47ठाकुर, तू सर नाई या? परमात्मा के आगे फिर याद करते हैं
- 42:01बाबा अपनी बाह। से मुझे निकाल लो।
- 42:11मैं गहरे अंधकार कूप में कुएं में डूब गया।
- 42:21तुम मुझे अपना सहारा दो। कह नानक इस विपथ में एक एक रघुनाथ
- 42:29और परमात्मा तुम्हारे लिए गुरु का इंतजाम करता है, बस खुद ही बन के
- 42:34आ जाता है, उसके सिवा कोई और है तो है नहीं।
- 42:42वही है सब जगह खुद ही वो गुरु बन के आ जाता है तुम्हारा, लेकिन जब
- 42:52वो गुरु बन के आए और तुम्हारी सर्जरी करने लगे।
- 43:01तो तुम चुप करके सर्जरी करवातें रहना क्योंकि वो जो तुम्हारी सेल
- 43:06निकालेगा वो निकालने योग्य है। उन्हीं के कारण ही तुम दुखी हो ये
- 43:14रात भर नींद फिर क्यों नहीं आती? 1 दिन भर चैन फिर क्यों नहीं आता?
- 43:29कोई उम्मीद बर नजर नहीं आती, कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नजर
- 43:38नहीं आती। मौत का 1 दिन मयावन है।
- 43:44नींद को रात भर नहीं आती, कोई उम्मीद भर नहीं आती, कोई सूरत नजर
- 43:53नहीं आती। मौत का 1 दिन वायाबन है, नींद को
- 43:58रात भर नहीं आती। आगे आती थी हाले दिल पे हँसी आगे
- 44:07आती थी हाले दिल पे हँसी अब किसी बात पे नहीं आती आगे आती थी हाले
- 44:15दिल पे हँसी अब किसी बात पे नहीं आती मौत का 1 दिन।
- 44:22मोइन है रात क्यों ना नींद क्यों रात भर नहीं आती, तुम तड़पते भी
- 44:30हो, रोते चिल्लाते भी हो, कब से रोज़ चिल्ला रहे हो?
- 44:39फिर तुम अपना ऑपरेट करने क्यों नहीं देते?
- 44:42मैं समित संत अच्छी तरह समित है, मोहोबड़ा गहरा एक जन्म का पुत्र
- 44:56अभी कुछ साल का हुआ। तुम उसको आंचल में छिपा लेते हो।
- 45:05इसको आंच की गर्माहट न लग जाए। मैं चाहे जल जाऊ, अपने आँचल में
- 45:16छिपा लेते हो तुम। मोह की लिप्तता है और तुम्हारा
- 45:25मोह बड़ा पुराना है। बरसों बरसों जमू जन्म कब से चले?
- 45:34फिर तुम मोह को पाले एक झर्रा झर्रा था।
- 45:38पत्थर से चले विराट की तरफ वहाँ से मोह जुड़ता गया।
- 45:47लोग साथ आते गए और कारमा बनता गया।
- 45:53देखिए मोह कितना गहरा होगा, कितना पुराना होगा?
- 46:00ये टूटेगा बड़ा मुश्किल है, तुम उम्मीद जिता लेते हो?
- 46:10गुरु बहुत कोशिश करता है, लेकिन क्या करे?
- 46:17तुम बुरी तरह से रोने लगते हो, तुम चीखें चिल्लाहटे करते हो,
- 46:25गुरु का हृदय खुद उद्रवित हो जाता है तुम्हारी चीखें सुनकर जबकि वो
- 46:30जानता है कि चीख न दो उसको। मैं इसको रोगमुक्त कर रहा हूँ, एक
- 46:38बार तू चीखेगा ही, लेकिन तुम इतनी बुरी तरह से रोते हो कि सृजन को
- 46:47भी दया आ जाती है, उसका हृदय भी कॉम्प हो जाता है, वह छोड़ भी
- 46:54नहीं सकता। हाथ से सिसर को और तुम्हें काट भी
- 46:59नहीं सकता और खुद दुविधा में डाल देते हो।
- 47:04तुम अपने सर्जन को गुरु एक स्थान पर आकर किंग कर्तव्य प्रमोद हो
- 47:11जाता है क्या? इतनी बुरी तरह से थोड़ा रोया करते
- 47:17हैं, दुःख ही तो काट रहा हूँ, दर्द ही तो काट रहा हूँ, संताप ही
- 47:27तो काट रहा हूँ उसके बाद चैन आ जाएगा कहाँ उलझा है जी?
- 47:36है तो सम्राट हाथ में भिक्षा पत्र उठाये दर दर का अधिकारी बना करता
- 47:42है। अब इसे समझाने की चेष्टा करते
- 47:46हैं। इसे दिखाने की चेष्टा करते हैं तो
- 47:49यह बुरी तरह चलाता है। क्या किया जाए इसका तुम्हारा
- 47:57चिल्लाना बड़ा विषादग्रस्त होता है।
- 48:05उस स्थिति में संत करें तो क्या करें?
- 48:13बड़े साझ छेड़े। बड़े गीत गाये लेकिन तुमने ना कोई
- 48:19साझ समझा, ना कोई गीत समझा तुमने तो अपना दुख और दर्द जो चिपकाहट
- 48:28को हटाने में लगता है। गुरु काढ़ता है तुम्हारे।
- 48:32चिपकाहट को उस पोस्टर को जो दीवार से चिपका हुआ है जन्मो जन्मो से
- 48:40और तुम्हारी चीखें उतनी ही गहरी हो जाती हैं।
- 48:45गुरू भी द्रवित हो जाता है, गुरू वैसे।
- 48:49संत हृदय नवनीत सम्मान वैसे ही बिगला हुआ होता है बेचारा
- 48:55तुम्हारी करुण पुकार, तुम्हारी चीख से लाट इतनी इतनी बुरी तरह से
- 49:00रोकते हो तुम? गुरु को भी दया आ जाती है।
- 49:13पहले दुखी थे तो दया आती थी, अब तुम्हारे रोग को काट रहा है
- 49:18तुम्हारी चल लाठों के कारण दया आती है जहाँ गुरु आकर।
- 49:26खुद दुविधा में फंसता है करूँ क्या करूँ?
- 49:33किसी किसी वक्त कृष्ण भी दुविधा में आ जाते हैं।
- 49:37अब कैसे इस का हल करूँ? ये तो बड़ी मूर्खता की बातें करता
- 49:41है। इस मूर्ख को यह नहीं पता कि जब
- 49:47गुरु थे तब गुरु थे, गुरु की तरह रहते तो गुरु की तरह में पूजे
- 49:52जाते। अब दुश्मन की तरह सामने खड़े हैं
- 49:57तो गुरु की तरह कैसे पूजे जाएं? वे संपदा में जब दादा की तरह थे।
- 50:05और दादा की तरह ही रहते तो पूजे जाते, लेकिन आज दादा की तरह नहीं
- 50:10खड़े, मेरे दुश्मन की तरह खड़े हैं, मुझे मारने के लिए खड़े हैं
- 50:15तो फिर दादा की तरह पूजा कैसे हुए, इनकी यह अर्जुन समझ नहीं
- 50:22सकता। और कृष्ण समझाने में करीब करीब सब
- 50:29युवतियों इस्तेमाल कर लेते हैं। भीतर से तो माथा पिट लेते हैं।
- 50:35कृष्ण लेकिन जानते हैं कि करेगा ऐसा स्वभाविक है।
- 50:44जन्मो जन्मो। पुरानी ये चिपकाहट की कहानी इतनी
- 50:52जल्दी न छोड़ सकेगा। शंखनाद हो चुका है, ताजा ताजा मोह
- 50:57जन्मा है तो फिर आखिरी अस्त्र का सहारा लेते हैं।
- 51:05कृष्ण के पास यह सभी गुरुओं के पास एक ही सहारा आखिरी होता है।
- 51:13एक ही आश्र होता है आखर और सभी गुरुओं के पास होता है।
- 51:24फिर वो फेंकते हैं शक्तिपात शक्तिपात से उसे पता चल जाता है
- 51:36कि वह है कौन और यही जड़ है तुम्हारे दुखों के।
- 51:45गुरु जिसे काट रहा है वह उसे ही काट रहा है।
- 51:50जो तुम तुम्हें गलत समझे बैठा हो, वो तुम्हारे भ्रमों को काट रहा
- 51:54है, तुम्हें नहीं काट रहा है तुम समझते ये हो कि वह मुझे काट रहा
- 52:01है? तो गुरु को तुम्हें यह समझाने के
- 52:04लिए बातों से तो तुम समझते हो, लातों से भी तुम नहीं समझते तो
- 52:14फिर समझाने का एक ही रास्ता बजता है तो कृष्ण वही फॉर्मूला आजमाते
- 52:19हैं, शक्तिपात करते हैं। इसको दिखा तो फिर और क्या हो सकता
- 52:25है? ये है शक्तिपात करते हैं, जैसे
- 52:30रामकृष्णा ने विवेकानंद को उसका आपा दिखा दिया।
- 52:38ऐसे ही कृष्ण अर्जुन को अपना आपा दिखा देते हैं।
- 52:44अब तक कहता था मेरा गुरु मेरा भीष्म पिता माह इसके गोदी में पला
- 52:52बढ़ा बुरकी बुरकी खाया शस्त्र विद्या सीखा गुरु से कैसे हनन कर
- 52:59दूं कैसे छाती में से तीर? आर पार कर दूँ नहीं, मैं ऐसा नहीं
- 53:07कर सकूंगा। केशव मैं युद्ध नहीं करूँगा और
- 53:16कृष्ण भली भाँति जानते हैं कि ये शब्द आते कहाँ से हैं और क्यों
- 53:20आते हैं? फिर कृष्ण जब नहीं समझता बातों से
- 53:25अर्जुन तो फिर शक्तिपात करके उसे दहला देते हैं कि तू है कौन?
- 53:33जब तक तू अर्जुन है, तब तक वो द्रोण है, जब तक तू अर्जुन है, तब
- 53:39तक वो विषम पिता में है। जब तू अर्जुन ही न रहेगा, तब
- 53:45भीष्म भीष्म न रहेगा, द्रोणाचार्य द्रोणाचार्य न रहेगा, दुर्धन
- 53:51दुर्योधन न रहेगा और धृतराष्ट्र धृतराष्ट्र न रहेगा, मोह समाप्त
- 53:57होगा और फिर तुम्हें सिंचाई गिर जाएगी।
- 54:01तुम्हारे कैंसरराइटिस के सारे शर्त तुम खुद ही तोड़ दोगे, फिर
- 54:11सर्जन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। फिर तो तुम ही अपने सर्जन खुद बन
- 54:15जाओगे। तो जब शक्ति बात करते हैं तो
- 54:21अर्जुन दो शब्द बोलते हैं। बड़े प्रसन्न होते हैं अर्जुन
- 54:29सत्य को देखकर कौन प्रसन्न नहीं होता है सत्य सभी बेड़ियों को खोल
- 54:34देता है, सभी बंधनों को तोड़ देता है, तुम्हें भार मुक्त कर देता
- 54:41है, तुम निर्भार हो जाते हो। और निर्भार अवस्था में जो उदगार
- 54:47निकलते हैं कृष्ण अर्जुन के मुख से अर्जुन कहते हैं, स्मृति लब्ध
- 55:00मुझे याद आया नष्टो मोहा। मेरा मोहन नष्ट हो गया, मैं जिसे
- 55:10गुरु समझता था, द्रोण तो तभी तक समझता था जब तक खुद को अर्जुन
- 55:16समझता था। हे भगवान आपने बड़ी कृपा की?
- 55:23आपने अनंत अनंत कृपा की आपके पांव की धोली की रच अपने माथे से लगाने
- 55:32को दिल करता है तुमने बड़ा उपकार किया मुझे कंफते हुए को तुमने
- 55:39वास्तविकता दिखाई। नष्टो मोहा मेरा मोह नष्टो हो गया
- 55:45इल्यूश़न गॉन समृद्ध लफ्था याद आया रिमेम्बर बाय सैंड हू एमआइ
- 55:58मुझे मेरा अपा याद आया। मैं हूँ कौन इसका पता चला अब मैं
- 56:10तुम्हारा कृतज्ञ हूँ, मैं तुम्हारे शरण में हूँ, मैं
- 56:15तुम्हारा शिष्य हूँ, अब मुझे हुक्म हो रहा मैं क्या करूँ?
- 56:23किम कृष्ण क्या करूँ मैं भगवान कृष्ण कहते हैं, मुझे याद कर और
- 56:39युद्ध में कुछ। इनको छलनी करते हैं, इनका हनन
- 56:48करते हैं। अब तेरा मोह नष्ट हो गया।
- 56:52अब तुझे याद आया कि तू कौन है जीसको ये याद आ जाता है कि मैं
- 56:58कौन हूँ? उसको सभी याद आ जाता है कि तुम
- 57:01कौन क्योंकि जो मैं हूँ वो ही तुम हो यहाँ एक है, दूसरा नहीं जो
- 57:16अर्जुन है वो ही द्रूण है। जो अर्जुन है वो ही विश्व में है,
- 57:23जो अर्जुन है वो ही दूरोधन है, बाहर से दुश्मन है।
- 57:28लेकिन भीतर से एक लहरें विपरीत हो सकती हैं सागर के ऊपर की, लेकिन
- 57:37सागर? अटल गहराइयों के भीतर तो बड़ा
- 57:40शांत है और एक है कोई दुश्मनी नहीं, कोई विरोध नहीं।
- 57:47ऐसा ही तुम्हारा भी अंतर से है तो गुरु आखिर में यही काम करता है।
- 57:56तुम जब नहीं समझते, शेष हथियार उसके पास एक ही व्यक्त है, तो फिर
- 58:05वो थोड़ी सी इंतज़ार करता है तुम्हारी भूमि तैयार होने की कि
- 58:11तुम इस शक्ति को ग्रहण करने के योग्य हो जाओ।
- 58:16और तो तुम कुछ योग्य न हो सके, तुमने सर्जरी भी नहीं करने दी,
- 58:22तुमने शब्दों को भी अपने भीतर नहीं गटकने दिया जाने दिया।
- 58:29तुमने वो बिमारी के शेल भी नहीं काटने दिए, तुम डटे ही रहे।
- 58:37कि मैं कौन हूँ, मैं जानता हूँ तो कृष्ण के पास एक ही उपाय है और
- 58:45कृष्ण तुम्हारी भूमि को तैयार करते हैं।
- 58:49बस इधर उधर की बातें करके जो प्रश्न पूछते हो उसे समझा देते
- 58:54हैं। कृष्ण।
- 58:55इसलिए इतनी गीता बनी क्योंकि अज्ञानी के मन में बड़ी डाइमेंशन
- 59:04से प्रश्न आते हैं। बड़ी तरह से प्रश्न आते हैं मुझे
- 59:09लोग पूछ लेते हैं बाबा ये भूत प्रेत क्या है?
- 59:12हालांकि भूत प्रेत क्या है? इसको मैं बता भी दूंगा तो वे अपना
- 59:18आपा नहीं जान पाएंगे और अपना आपा जानने से आनंद मिलता है और मैं
- 59:25तुम्हें आनंद की खोज खबर दे रहा हूँ।
- 59:29मैंने ये जो सीरीज शुरू की है। 2000 वीडियो बोल दिया है।
- 59:35ये किसलिए बोला है तुम्हें सूचनाएँ देने के लिए नहीं बोला
- 59:42है, तुम्हारे भीतर सूचनाएँ संग्रहित हो जाए।
- 59:49तुम्हारे में इसलिए भी नहीं बोला है।
- 59:53मैंने बोला है कैसे तुम आनंदित हो जाओ और जीवन का आनंद जीवन को जीने
- 1:00:01में है। आनंदपूर्वक जीवन तभी तक जीवन है।
- 1:00:13जब तक आनंदपुरों को जिया जाता है। जी ना उसका जी ना है।
- 1:00:31जी ना? उसका।
- 1:00:34जीना। है।
- 1:00:37जो? औरों को जीवन देता है, मधुबन
- 1:00:44खुशबू देता है। जीना उसी का जीना है जो औरों को
- 1:00:52जीवन देता है। कृष्ण को आनंद मिला, कृष्ण बांटते
- 1:01:01हैं, जीवन को कृष्ण ही बाट सकते हैं, जीवन को और उसी का जीना जीना
- 1:01:09होता है जो खुद पहले जीना सेख जा रहा है।
- 1:01:15इसलिए जीवन को तुम बांटना, जीवन को जीने की कला दूसरों को देना,
- 1:01:21लेकिन पहले खुद सीख लेना आज ये बिमारी बड़ी घनी खुद ने।
- 1:01:32जीने की कला सीखने वाले लोगों को जीने की कला सिखार रहे हैं।
- 1:01:41बड़ा बुरी बेला आ गया है। यह संकटकालीन विपदकाल है।
- 1:01:53तुम जीना बांटना, जीने की कला बांटना लेकिन पहले खुद जीने की
- 1:02:00कला सीख लेना जीने की कला सीख लोगे कैसे सीखोगे?
- 1:02:08कृष्ण सगाते हैं जीने की कला उस तल पे पहुँच जाओ जहाँ जीवन है बस
- 1:02:20उस तल पर जाकर तुम सीख जाओगे जीवन के साथ जब आगोश में एक हो जाओगे।
- 1:02:30तो तुम भी जीना सीख जाओगे। वह जीवन का भंडार है जब तुम्हारे
- 1:02:38गले लगेगा, जब ईद हुई, ईद मनेगी। तुम उसको गले में लिपटा लोगे,
- 1:02:48आगोश में ले लोगे, आगोश में ले सकोगे, उसके पास पहुँच गए अभी तो
- 1:02:56तुम दूर हो, अभी वह दूर है अभी तुम दूर हो, उसके करीब जाओ।
- 1:03:06उसको आगोश में ले लो, आप ईद मनेगी, वहाँ महा रास होगा।
- 1:03:14वहाँ निधि वन है वहाँ कृष्ण लिप्टेंगे राधा संग गोपियों संग
- 1:03:22वहाँ महा रास होगा वहाँ। और वहाँ तुम जीना सीख के आओगे
- 1:03:31वहाँ जीना सीख के आना और बाहर आकर दुनिया को जीना सखाना कृष्ण ने
- 1:03:39आखिरी शक्तिपात किया। आखिरी हथियार गुरु के पास होता है
- 1:03:45और ध्यान रखना मैं बार बार कह रहा हूँ आखिरी हथियार गुरु के पास
- 1:03:51होता है, होता ही है और जब कोई चाल न चले, कोई वश न चले, कोई
- 1:04:02रास्ता न बचे। विषाध चारों तरफ मुँह बाय खड़ा यह
- 1:04:10विषाध की स्थिति है, युद्ध क्षेत्र में खड़े हैं, कृष्ण भी
- 1:04:14और अर्जुन भक्त बिल्कुल भी नहीं है।
- 1:04:20पलों के हिसाब से भी वक्त नहीं है।
- 1:04:22शंखनाद हो चुका है, अब इंतजार कब तक करेंगे?
- 1:04:32अगर इधर से कोई तीर न चला तो विरोधी पक्ष अपने तीर चलाना शुरू
- 1:04:37कर देगा। फिर क्या करेगा?
- 1:04:39अर्जुन न भाग सकेगा। फिर तो मरना पड़ेगा तो कृष्ण इस
- 1:04:47अद्भुत विपत्ति काल को देखकर अपने अंतिम अस्त्र का इस्तेमाल करता
- 1:04:54है। शक्तिपात शक्तिपात उसे फेंकते हैं
- 1:05:00उसके ऊपर। और पल भर में जान लेता है अर्जुन
- 1:05:04के मैं कौन? जब पल भर में अर्जुन जान लेता है
- 1:05:09कि मैं कौन हूँ तो पल भर में ये भी जान लेता है कि दूसरे कौन है?
- 1:05:18यही है मुग्धा। तुम्हें यह नहीं पता कि तुम कौन
- 1:05:23हो और इसलिए संत तुम्हें कहते हैं नो दाय सैफ अपने आप को जानो हू आर
- 1:05:30यू तुम हो कौन भला कि आखिर तुम हो कौन?
- 1:05:37और जब तुम खुद को जान जाओगे। तो अर्जुन के ये दो शब्द बोलो गए
- 1:05:43हैं। समृद्ध रब्धा नष्ट।
- 1:05:47मोहा श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:06:01हे नाथ? नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण
- 1:06:09गोविंद हर मुरारी हे नाथ? नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण
- 1:06:27गोविंद, हरे मुरारी। हेनाथ नारायण वासुदेव पितमात
- 1:06:44स्वामी सखा हमारे पितमात स्वामी। सखा हमारे हेनाथ नारायण वासुदेव
- 1:07:09चि कृष्ण गोविंद। हरे मुरारी एनाथ नारायण वासुदेव
- 1:07:25एनाथ नारायण वासुदेव। धन्यवाद।