Latest / Baba ji Vijay Vats / 9 May 26 - ईमानदारी की पराकाष्ठा: सत्य का आह्वान, अपरिग्रह और वैराग्य का असली मतलब।
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- 0:01असल में व्यक्ति झूठ बोलता ही तब है जब उसे उस परवर दीगार का कथा
- 0:08नहीं लगता। मैं तुम्हें आज एक नई पर भाषा दे
- 0:13देता हूँ जो झूठ बोलता है, पक्का है।
- 0:21कि वह उस दरगाह पे पहुंचाने जहाँ आध सच जुगाद सच है भी सच नानक और
- 0:28से भी सच अगर उस दरगाह पे पहुँच गया होता तो झूठ ना बोलती।
- 0:39नहीं नहीं कहानी सुनी एक व्यक्ति ने किसी की जेब काट लेते और वहीं
- 0:47बैठे थे। 150 लोग उनमें से ही किसी ने काटे
- 0:52थे। कोई ऊपर से एलियन थोड़ा आ जाएगा।
- 0:59तो जिसकी जेब कटी थी, वह बेचारा तड़प रहा था, मेरी जेब कट गई।
- 1:07मैंने बच्चे की दवाई लेके जानी, मैंने और भी जरूरी काम करने।
- 1:17तो कहने लगा जिसने मेरी जेब काटी उसके बच्चे मरे गए।
- 1:26जेब काटने वाला तो मैं ही था, यहीं रहते हैं भाई।
- 1:33थोड़ी सी गद्दियाँ ऊंची होती हैं। उनकी बस इतना ही फर्क होता है तो
- 1:44वह व्यक्ति बीच में बोला। अरे साले मरेंगे क्या?
- 1:52जब है ही नहीं, हम पहले ही मका के आए हैं।
- 2:06व्यक्ति झूठ तभी बोलता है जब तक उसने परमात्मा नहीं देखा होता।
- 2:14तो यह तो सिर्फ तुम्हारी 10 कमेंडमेंट्स हैं झूठ मत बोलो,
- 2:23सत्य बोलो, चोरी ना करो, पाप ना करो वरन जब तुम वहाँ पहुँच जाओगे
- 2:28तो ना झूठ बोल पाओगे, ना पाप कर पाओगे, ना हत्या कर पाओगे तुम
- 2:33नहीं कर पाओगे। यही निशान जो वहाँ पहुँच गया उससे
- 2:44पहले 10 कॉमेंडमेंट्स काम आते हैं, लेकिन वहाँ पहुंचने के बाद
- 2:50तो वही करता है जो करता है तुम कुछ नहीं करते।
- 2:54फिर 10 कमेंटमेंट्स की जरूरत नहीं।
- 2:56जैसे सवाल को हल करने के बाद फॉर्मूलेशन को फेंक देना होता है
- 3:01जैसे काँटा निकालने के बाद फोरसेप को फेंक देना होता है।
- 3:06काँटा निकल गया बस ठीक है। हीरो पायो गांठ गठियायो हीरो पायो
- 3:26गांठ गठियायो। बार बार को क्यों खोलें?
- 3:39मन मस्त हुआ फिर क्यों बोलें मन मस्त हुआ।
- 3:49फिर क्यों? वो जब कांटा निकल गया तो जीस फोर
- 3:56शेप से कांटा खींच के बाहर निकाला था उसको दिखाने की जरूरत क्या?
- 4:04डॉ। अपने सर्जिकल।
- 4:10ट्रे में रख दे काँटा निकल गया व्यथा, खत्म हो गई बात खत्म।
- 4:29इसलिए दो धर्मों ने कहा कि एक ही जन्म होता है।
- 4:34उसका कारण था वो ही वो ही रेपुटेशन, तुम करोगे जब जग जाओ
- 4:41तभी सवेरा कल पे मत डालना रावण ने कहा लक्ष्मण।
- 4:50अभी कर लेना आज ही कर लेना, कल पे मत डरना यही कहा ईसाईयत ने यही
- 4:58कहा सलामत ने तुम मतलब नहीं समझ रहे हो लड़कपन खेल में।
- 5:08खोया लड़कपन खेल में खोया ज़मानी नींद भर सोया ज़मानी देख कर रोया
- 5:34वो ही किस्सा पुराना है, सजन रे झूठ मत बोल वही तो किस्सा है
- 5:43प्राण। फिर अगले जनम पे क्यों फेंकते हो?
- 5:51बस यही था मतलब इशाइयत का और इस्लामियत का इशाइयत और इस्लामियत
- 5:56के विद्वान आज तक इसे समझ नहीं पाए।
- 6:01वह शब्दों को पकड़ लेने में दक्ष है।
- 6:03व्यक्ति मैं रोज़ कहा करता हूँ। क्यों कहा गया इसके भीतर?
- 6:14तुम जाते नहीं रहस्यमय इसीलिए कहा गया लड़कपन खेल में खोया जवानी।
- 6:24नींद भर सोया बुढ़ापा देख कर रोया।
- 6:27वही किस्सा पुराना। कितने जन्म से यही तुम दोहराते
- 6:32रहे हो और यही दोहराते रहो पहले देखो तुम।
- 6:42कितनी ही वेडिंगें तुम बना लो जिन्होंने बनाई थी वो चले गए, एक
- 6:47दर्रा माटी का साथ लेके गए तो मैं इतै से समझेंगे आप समझ क्यों नहीं
- 6:59आते उसका कारण मैं भलीभाँति जानता हूँ।
- 7:05और एक संत जब वहाँ पहुँच जाता है, मात्र वही जान पाता है कि यह
- 7:10दुनिया में आग क्यों लगी है? यह सारी दुनिया नास्तिक है और इस
- 7:19नास्तिकता के कारण दुख है। नास्तिकता का कारण दुःख तो है कि
- 7:25वह जान नहीं पाता। उसने नग्न आँखों से देखा नहीं,
- 7:28उसका भ्रम खत्म नहीं हुआ, वह समझता है यह क्षति लावारिस है।
- 7:35उसके पास शानदार बुद्धि का तर्क। क्या कर इस सृजना को प्रमात तो
- 7:44प्रमात को किसने बना? कुछ चीजें अज्ञात पर भी छोड़ देनी
- 7:49चाहिए। हर चीज़ का हल नहीं होता अगर
- 7:55कंप्यूटर यह सोचने लगे। अगर मुझे आदमी ने बनाया बनाया तो
- 8:04आदमी को फिर दूसरा कंप्यूटर कहेगा आदमी को उसके बड़े आदमी ने बनाया
- 8:15फिर उसको किसने बनाया? पंतहीन मसला है।
- 8:19वही किस्सा पुराना है जब तलक तुम्हारा ये भ्रम खत्म नहीं होगा
- 8:36तब तलक तुम झूठ बोलते ही रहोगे तुम मजबूर तुम्हारी फितरत नहीं है
- 8:42ये। बस ये एक ही बात का सबूत है कि
- 8:46तुमने उस सत्य को देखा है, दूसरी कोई बात नहीं, अगर कोई व्यक्ति
- 8:55इन्हीं शब्दों के उपनिषद के शब्दों का गलत व्याख्यान कर रहा
- 8:59है तो मैं पास से गुजर जाती हूँ। मैं डालता हूँ मसल्ला यह है इसने
- 9:12देखा अंधा कहेगा हरे रंग के छह टांगें हो तीन तो आँखें रखने वाला
- 9:22व्यक्ति मुस्कुराएगा और क्या करेगा?
- 9:26रंगों के भी टाँगें होती हैं, बस ऐसे ही तुम्हारे प्रवच है, ऐसे ही
- 9:33तुम्हारे व्याख्यान हैं। गेरुवे के आठ आठ टाँगें होती हैं।
- 9:43दो धर्माचार्यों में बहस हो गई तो वो कहता है हमारा धर्माचार्य
- 9:47ज्यादा समझदार वो कहता है हमारा धर्म आचार्य ज्यादा समझदार तो फिर
- 9:52डिस्कशन हो जाए, शास्त्रार्थ हो जाए।
- 9:57एक ब्राह्मण था, एक ग्रामीण था। दोनों को बैठा दिया।
- 10:08अब पंडाल इकट्ठी हो गई। हमारे गांवों में सत्य होती है।
- 10:12सत्य वहाँ पर बैठ गए तो जो संस्कृत का विद्वान था, जिसने
- 10:23शस्त्र पढ़े थे, वह ग्रामीण व्यक्ति से बोला पुचरो।
- 10:30उच्चरों का मतलब होता है कि बोलो बोलो बहस करने के लिए कहीं तो
- 10:39आगाज करना पड़ेगा। तो उस प्रकाण्ड पंडित ने कहा,
- 10:45उच्चरों वो ग्रामीण व्यक्ति तो बिल्कुल।
- 10:50बेचारा अशिक्षित अन पड़ता है तो वो कहता उछरो मुछरो बुछरो और जो
- 11:03आस पास के ग्रामीण लोग थे, उन्होंने शोर मचा दिया।
- 11:08ओह। उसे शोर हो सके और उस शोर में उस
- 11:13ब्राह्मण की बात सुनाई ही नहीं दी जैसे युधिष्ठिर का नरो के भरो नरो
- 11:25की माँ गुंजरों। शोर में खत्म हो गए।
- 11:32हाथी था या नर था उछरो मुछरो बुछरो वो लोग उछलने लगे जैसे
- 11:42हमारे मैनस्ट्रीम मीडिया के उछलते हैं।
- 11:46सच वगैरह कोई पता नहीं नहीं, झूठ बोलना है सिर्फ उस झूठ के शोर गोल
- 11:53में सब समाहित हो जाता है। इसलिए झूठे व्यक्तियों का झुंड
- 12:01होता है। सच्चा व्यक्ति अकेला होता है केवल
- 12:04या। तो ग्रामीण लोग ताड़ियाँ पीटने
- 12:11लगे, शोर मचाने लगे, उछलने लगे, कूदने लगे, जीत गए, जीत गए, जीत
- 12:15गए। क्या हुआ हमारे ग्रामीण ने तिरि
- 12:18मार दी तिरि तुमने कहा उछरो जाके तो उछरो मुछरो पुछरो तिरि मार दी
- 12:25इसने तिसर मार दी। बस तुम्हारा जिसे तुम गोदी मीडिया
- 12:33कहते हो प्रेम से वो सारा दिन यही कुछ करता है, एक ही सड़ी गली मूरत
- 12:40सुबह से शाम तक कब तक देखोगे तुम एक बात रोजाना खा सकते हो।
- 12:47एक बात बड़े से बड़ा राजा निकल सकता है, अरे वही भिंडी और लोग के
- 12:52बट्टे वहीं भिंडी वहीं मुँह की दा मैंने देखा है बीके की कुछ।
- 13:04प्रज्ञावान स्त्रियाँ जो ज्यादा पड़ी लिखी हैं वो सुबह जो मुरली
- 13:10बताई जाती है उसे लिखते हैं रोज़ पर सारा दिन एनर्जीलेसनेस का यही
- 13:16काम करते हैं और इनके पास कोई काम नहीं इसलिए तो इतने मूर्ख हैं।
- 13:26बीके से ज्यादा मुर्दा पूर्ण धर्म तुम्हें कोई नहीं मिलेगा।
- 13:30संसार भला की जे की जे भला होगा बुरा की जे बुरा होगा बही लिख लिख
- 13:52के क्या होगा बही लिख लिख के क्या होगा यही सब कुछ?
- 14:00चुकाना है। सब कुछ चुकाना है।
- 14:08अरे बच्चे को तो तुमने उसका हक नहीं दिया, ये वही लिख के क्या
- 14:13होगा? पड़ोसियों का तो तुम लेके मुकर गए
- 14:27उनके उसको न्यायालय में पुलिस स्टेशन में घसीट लिया उसकी जान पर
- 14:32क्या बीती होगी? हमने कभी सोचा लेकिन वही लिखते
- 14:38हैं। यहीं सब कुछ चुकाना है।
- 14:48क्या होगा अगर तुमने ग्रांट खा लिया?
- 14:56कितनी अगर 10,00,000 आया? तो पक्का पक्का चार लाखो हमारे
- 15:03हैं जो सीमेंट गरीबों की झोंपड़ी की छत के ऊपर लगना था।
- 15:13बारिश में छत टप टप करती रहती है और गरीब व्यक्ति सो नहीं हो सकता।
- 15:20वो पंचायत के लिए जो सीमेंट आता है में ये लोग कहते हैं कि
- 15:2610,00,000 है वह चार लोग हमारा ही है 4,00,000 मैं कहता हूँ यह
- 15:33मंजिल तुम सिर पे उठा कर ले जाओगे क्या?
- 15:38यही बोंधू नाथ के लिए छोड़ जाओगे और बोंधू नाथ आगे बोंधू नाथ के
- 15:47लिए छोड़ जायेगा। उल्लू नाथ के लिए यही किस्सा
- 15:52पुराना है, सजना रे झूठ मत डालो। खुदा की बात शर्म है आखिर तो
- 16:02कच्चे पकाई ओथे पाई नानक गया जापुय जाई।
- 16:07वहीं जाकर फैसला होगा। चंगेइया चंगेइया वाचे धर्महदू
- 16:15गर्मी आपको अपने कैनेडा के। सब साफ हो जाएगा।
- 16:22जहाँ लिखते रहो कन्ना बत्ती गुर तू चेर लाते में गुर तरजामात कर
- 16:34नोटर। इनको ये नहीं पता जो माल तुमने
- 16:38छीन लिया किसी का साथ तो तुम भी नहीं लेके जाओगे बेटा और 7 दिन के
- 16:47लिए कमाया है वो भी नहीं लेके जाएंगे और देखो तुम कहते हो, हमने
- 16:52एश कर ली बस तुम्हें यही तो पता नहीं?
- 16:58इन्द्रियों के सुख को तुम स्वाद कहते हो जबकि इन्द्रियां ही यहाँ
- 17:06छूट जाती हैं। जीसको हम दहन कर देते हैं या दफ़न
- 17:10कर देते हैं। फिर स्वाद के संग लिया।
- 17:18जिन इंद्रियों से तुमने साथ लिया, वह हम यहाँ जला दिए दशन कर दिए।
- 17:27जब 1020 साल बाद कंकाल निकालोगे तो इंद्रियां सब गायब होंगी।
- 17:32हड्डियों के कंकाल मात्र होंगे लेकिन तुम बही लिखने में व्यस्त
- 17:42हो तो शास्त्र प्रश्नों का हल नहीं देता।
- 17:55समस्याओं का हल नहीं देता। श सिर्फ किसी चीज़ का हल है ही
- 18:01नहीं तो हल कौन करता है हल जीवंत गुरु भी नहीं अब अच्छे से समझे
- 18:16सच्चा जीवंत गुरु। तुम्हें मार्गदर्शन देगा और वह
- 18:24कोई हल नहीं है। जाना तो तुम्हें ही पड़ेगा चलना
- 18:29तो तुम्हें ही पड़ेगा अपने अंदर तुम कितनी ही बहाने बाजी करो बाबा
- 18:35मैं भीतर नहीं जा सकती, मैं भीतर नहीं जा सकता।
- 18:38ठीक है, बेटा। मैंने तुम्हें राह बता दिया,
- 18:45ईमानदारी से बता दिया, सही सही बता दिया, मैंने तुम्हारी शक्ति
- 18:49को नाजायज खर्च नहीं करवाया। मैंने तुम्हारी सारी शक्ति को एक
- 18:55अप्पूंजी की तरह। कॉन्सेंट्रेट करने के ढंग बताया
- 19:00और फिर उस शक्ति को साथ ले के अपने भीतर उतर जाओ, क्या दिक्कत
- 19:04है फिर भी अगर तुम कहते हो मौत का 1 दिन मयंक है, नींद क्यों रात भर
- 19:22नहीं आती? अगर तुम फिर भी अपनी लिप्तताओं को
- 19:29जहाँ जहाँ तुमने अपनी एनर्जी को इन्वेस्ट किया वहाँ से नहीं तोड़
- 19:33पाते तो इसमें गुरु का क्या कसूर है?
- 19:44गुरु तो तुम्हें यही कहता है किसी भी सर्कमस्टैंस में।
- 19:52तुम अप्रभावित ही रहते हो। यह सत्य किसी भी समस्या में, किसी
- 20:00भी प्रश्न में किसी भी जलती हुई आग में प्रहलाद जल जाए।
- 20:06बैठ जाए तो प्रहलाद नहीं जलता। बस ये मतलब था उसका कि उसका अंत
- 20:12सतल नहीं जलता। ये कहानी है तुम्हें समझाने के
- 20:15लिए? होलिका जल जाती है क्योंकि होलिका
- 20:22अपने आपको शरीर मानती है। प्रहलाद नहीं जलता क्योंकि
- 20:28प्रहलाद नारायण को मानते हैं, जानते हैं इतनी छोटी उम्र में
- 20:35प्रहलाद ध्रुव थोड़े से बच्चे हैं, जिन्होंने स्वय को जान
- 20:42होलिका बुआ थी हिरण्यकृषप की। बहिन जल जाती है सब जल जाएंगे जो
- 20:50खुद को शरीर मानेंगे बस में भूत से देह से पुनर आगमन कुत्ता ठीक
- 20:56कहते हैं, चारवां जो अपने आपको शरीर मानेगा वह 1 दिन बसम हो
- 21:01जाएगा, लेकिन कृष्ण भी ठीक कहते हैं।
- 21:06कृष्ण कहते हैं शरीर से पार भी एक नैनम सिदंत शस्त्रण नैनम धाती
- 21:13पावगा नय चैनम प्रियजन त्या पो न शतिमारता शरीर से पार भी तुम हो
- 21:20और वो ही तुम हो सत्य स्वरूप वो ही तुम हो।
- 21:25वहीं आनंद और संत और चेतन वहीं तुम वहीं प्रकाश का पुंज तुम
- 21:35जीसको संत कहते हैं असितो मा सत ग मैं हे प्रभु मुझे।
- 21:42असत्य से सत्य की ओर ले जा तुम सोमा ज्योतिर कमे मुझे अंधकार से
- 21:48प्रकाश की ओर ले जा किसी चीज़ की कामना करते हो, यह शरीर को अपना
- 21:54समझ लेना अंधकार है शरीर से मोह को तोड़कर निर्लिप्त होकर।
- 22:09अपने भीतर चले जाना सत्य तक पहुँच जाना।
- 22:14यह प्रकाश तमसो माँ ज्योतिर्गमय, उस ज्योति के पास पहुंचाना जो
- 22:19सारे वक्त चौबीसों घंटे अपनी ज्योति का नूर।
- 22:30तो प्रहलाद नहीं जला करते, जल्दी है होलिका यह सिंबल स्थित तुम्हें
- 22:39समझाने के लिए लेकिन तुम कहानियों से चिपट गए।
- 22:45क्या करें अगर तुम शब्दों से चपट जाना चाहते हो और शास्त्र में और
- 22:58जीवंत शास्त्र में एक फर्क शास्त्र?
- 23:05मैं सूचनाएं होती हैं। जीवंत शास्त्र में सूचनाओं की संग
- 23:10संग चेतना भी होती है। इसमें कृष्ण की सारी सूचनाएं
- 23:22श्रीमद्भागवत की सूचनाएं। लेकिन इसमें चेतना नहीं है।
- 23:29ऐसे ही तुम्हारे ग्रंथ हैं वो कुरान हो, पुराण हो, बाइबल हो,
- 23:33ग्रंथ हो, गीता, अष्टावक्र गीता इनमें चेतना नहीं है, एक धर्म
- 23:44चलता है निरंकारी। वो पाँचवें तत्वों को ही चेतना
- 23:51बताता है। वो कहता है आकाश ही फ्रॉम मनम है,
- 23:56क्योंकि नैनम चिदंती शास्त्राण देखो हमने तलवार चला दिया, कटा
- 24:03नहीं कटा। नैनम दहाती पांव का इसमें आग
- 24:07जलाई, यह झलक नहीं जला नहीं, चैनम के लिए जानते आपो न सोसिया दी मरु
- 24:13कहा। इसमें बाढ़ गुजर जाती है इसका कुछ
- 24:16बिगड़ता है नहीं। इसमें तूफान गुजर जाता है।
- 24:21यह टस्य मस होता है। नहीं तो बस यही परमात्मा है।
- 24:24तू चेतना कहाँ गई भाई ज्यादा समझदारों मुझे तो बताओ इसमें
- 24:35रहस्य का रस है, आकाश तत्व में तत्व है और तत्वों में रस नहीं
- 24:44होते। वह न पृथ्वी में है, न अग्नि में
- 24:49है, न वायु में है, न जल में है, न आकाश में तत्वों में रसनी होता
- 24:54है, तत्वों से पार तत्वों से पार जो परा है परा तत्व।
- 25:03उसमें रस होता है तो एक धर्म है निरमकारी।
- 25:09लोग पागल हुए वो इसी को परमात्मा मान लेते हैं।
- 25:19फिर क्या फर्क हुआ? किसी ने मूर्ति को परमात्मा मान
- 25:22लिया। किसने किताबों को परमात्मा मान
- 25:27लिया, गुरु ग्रंथ साहब को परमात्मा मान लिया किसने बाइबल
- 25:34को, किसी ने कुरान को परमात्मा मान लिया?
- 25:36फर्क कहाँ रह गया? मूलभूत तत्व तो वहीं रहा ना, यह
- 25:42सभी चीजों में आनंद कहाँ है? कुरान में रस कहाँ है, कहाँ है?
- 25:50पुराण में बाइबल ग्रंथ गीतम कहाँ है?
- 25:53रस इनके पन्ने बोलते हैं। क्या यह सम्मान के योग्य तो हैं?
- 26:02क्योंकि इनमें वह शब्द? मंडे हुए हैं जो किसी संत व्यक्ति
- 26:10ने कभी उचरित किये थे। यह सिर पर रखने के योग्यता है
- 26:16लेकिन हर वक्त सिर पर रखे और इसको सिर पे रख के ही सो यह मुड़ता है।
- 26:24और यह तुम्हारी सवालों का जवाब नहीं देगा।
- 26:28पूछो, ज़रा से मेरे पास एक व्यक्ति आ गया, मेरे बच्चा हुआ था
- 26:40तो हमने गुरूजी से पूछा। इस बच्चे का नाम क्या?
- 26:48उन्होंने ग्रंथ साहब का पन्ना खोला, जो पहला अक्षर था वो बता
- 26:51दीजिए, यह तो कोई तकनीक न हुई, लेकिन तुम नकल गढ़ने में बड़े
- 26:58तक्ष हो। तो पहला गाय लिखा था।
- 27:04उन्होंने नाम गुरेंदर सिंह रख दिया।
- 27:06ठीक है, रख दो क्योंकि ग्रंथ साहब का पहला अक्षय जो निकला वो गया
- 27:14था, वो गुरेंदर है। जीवत गुरु बोलेंगे वो जीवत गुरु
- 27:27बोलेंगे कि नी एस्ट्रोनॉमिकल व्यवस्था को देखकर जांच कर फर्क
- 27:34कर बोलेंगे। कौन से नक्षत्र में जन्म व कौन से
- 27:37चरण में जन्म और इसके नाम क्या रखना चाहिए वो बताएगा।
- 27:49लेकिन शास्त्र बोलता नहीं, शास्त्र में चीत न है सूचनाएं तो
- 27:56ए आई के पास तुम्हारे पास तो अकेला गीता की सूचना अष्टावक्र
- 28:06गीता की सूचनाएं उपनिश्चित। सूचनाएं एआई के भीतर जो सारा जहान
- 28:10भरा उससे तो कुछ ही पूछलो तुम वातसाइन के काम सूत्र पूछलो वो भी
- 28:15बता देगा। वो तुम्हारे कुरान पुराण में नहीं
- 28:19लिखा होगा, वह तो वातसाइन के सूत्र भी बता देगा।
- 28:24फिर सूचनाएं तो उसमें बहुत ज्यादा हैं।
- 28:28सितारों के पार जो है वो भी बदला देगा।
- 28:32कितने किलोमीटर के ऊपर? बृहस्पति कितनी धरतियाँ बृहस्पति
- 28:38में समा सकती हैं और कितनी धरतियाँ सूरज में समा सकती हैं
- 28:42एआईए, तुम्हे लेकिन तुम्हारे ग्रंथ नहीं पता है।
- 28:48अगर तुम सूचनाएं को ही परमात्मा मानते हो, सूचनाएं देने वालों को
- 28:52ही परमात्मा मानते हो तो डेरे वाले को मात्र सूचनाएं देते हैं।
- 29:04तुम्हारी गीता और ग्रन्थ तो मात्र सूचना ही देते हैं।
- 29:09रस इनके मार्ग पर चलकर मिला सकता है।
- 29:13निश्चय ये ठीक यह मार्गदर्शक है, सिर्फ रखने के योग्य भी है।
- 29:25माथा नबाने के योग्य भी है। आस्था की दुख भी है।
- 29:37पूछने के जौक नहीं है यहीं तो मार खा जाता क्योंकि पूजते पूजते
- 29:46पूजते, पूजते तुम संस्कारित हो जाते हो।
- 29:50और तुम पूजा में व्यस्त हो जाते हो और व्यस्त होना ही वहाँ तक
- 29:58जाने में बाधा है अब इस शब्द को, क्योंकि यह वीडियो समाप्त होने के
- 30:07कगार पर। जब तुम झपकी पढ़ते, पढ़ते या गीता
- 30:15के स्लोप पढ़ते, पढ़ते या कुरान पढ़ते, पढ़ते बाइबल पढ़ते पढ़ते
- 30:26जब तुम व्यस्त हो जाते हो। उस कालखंड में परमात्मा नहीं
- 30:33होता, चौंक मत जाना, सुबह उठकर तुमने मौन का आनंद लेना।
- 30:51इसलिए अमृत वेरा में जागने को कहा।
- 30:55जब तुम फुलफिल ऑफ एनर्जी हो जब तुम्हारी पूरी चेतना और शक्ति
- 31:01संपूर्ण है। सारी रात सोकर तुम निहाल हो गए,
- 31:06वह वेला है। ऋषि अच्छी तरह से जानता है कि इस
- 31:09वेला में। तुम आसानी से अपने बेहतर उतर सकते
- 31:13हो, इसलिए उसको भ्रम वेला कहा कि इस वेला में भ्रम तक पहुंचाया जा
- 31:19सकता है। बिकॉज़ यू अरे, फुल्ली एनर्जेटिक
- 31:24तो पहुंचना है। कौन से संस की तरफ?
- 31:27एनर्जेटिक हुए बिना कान्शस्नस तक नहीं पहुंचा जा सकता, अन्यथा फिर
- 31:33मुर्दा ही पहुँच जाता। मुर्दे में ही नहीं होता तो
- 31:39ब्रह्म विला में क्यों तुम्हें कहा गया कि ब्रह्म विला में तुम
- 31:45मौन हो कर बैठ जाओ? सारी रात तुमने उस शक्ति को किया
- 31:53है यू आर फुल्ली एनर्जैटिक और एनर्जैटिक हुए बिना अपने अंत से
- 32:03की यात्रा संभव ही नहीं। अनीता पर मुर्दे खड़े हो जाते
- 32:07हैं। फिर क्यों कहा गुरु को मैं जीवंत
- 32:16गुरु को न मानो गुरु मानो गर्म क्योंकि ग्रंथ तुम्हें।
- 32:25साफ साफ बातें बता देगा शब्द वह तुम्हें भटकाएगा नहीं तुम भटक जाओ
- 32:33बात अलग है तुम उनके अर्थ गलत कर दो वो तुम्हारी गलती है यह
- 32:40शास्त्र तुम्हें भटकाएगा नहीं और इसमें लिखा लिखा एक भी अल्फाज़।
- 32:45मदरेगण उतना ही रहेगा। फिर जीवत गुरू की क्यों मुखालफत
- 32:55की गुरुबागण क्योंकि ये मार्गदर्शन ही चाहिए मार्गदर्शन
- 33:03तुम्हें श्री गुरुगण साहब दे देगा।
- 33:07गीता देती थी। 20 का बिचोला खत्म हो जाएगा,
- 33:12लेकिन बीच का बिचोला कारगर भी है। वो तब कारगर है अगर वह उस तल को
- 33:21छू लिए हैं जिसने यह गीता बोली। जिसने यह जपजी साहब बोलीं, उस तल
- 33:29को छू लिया वह जेनाग अनेक आशंका कीर्ति व मनहारी कीर्ति राग और शो
- 33:36के अनकते गांव बनहार वहाँ जहाँ अनंतनाग का गुंजार होता है।
- 33:43लक्षण भी बताये। बाबा ने जब तुम वहाँ पहुँच गए तो
- 33:49तुम जहाँ से जब जी का उदगम हुआ, तुम वहाँ पहुँच गए यहीं मस्जिद की
- 33:59चारदवारियों के बंधनों में तंग आकर।
- 34:04बोले शाह आ भाग जाते हैं, वहाँ से बोले शाह लिखते हैं वहाँ मस्जिद
- 34:13को नो जेवड़ा डरिया इन बंदिशों में जीरा घबराता है।
- 34:22समाज की बंदिशें हों या शास्त्र की बंदिशें हों, बंदिशें तो
- 34:27बंदिशें होती हैं। 10।
- 34:29कमेंडमेंट सभी बंदिशें मच्छित कोरो जोड़ा डरा तुम उसमें
- 34:40परमात्मा ढूंढ जाओ। बुले शाह का जीरा डर जाता है।
- 34:48इन बंदिशों को देखकर इन बंदिशों को ही तो तोड़ना है, इसे ही तो
- 34:52मुक्ति कहते हैं। आचार्य जी क्या ठकर दे डेरे,
- 35:00बढ़िया। ठक्कर के डेरे में चला गया तुम तो
- 35:08यहाँ किसी और ही डेरे में भटकते भटकते हो भूले।
- 35:13शाह कहता है जा ठक्कर दे, डेरे बढ़िया उसका लक्षण बताती।
- 35:20जिथे वाजदे नाद 1000 तुम नकली नाद पैदा कर सकते हो, तुम नकली सब कुछ
- 35:34आयोजित कर सकते हो कौन रोकता है तुम्हारी व्यवस्था है?
- 35:40जिथे वैदेनाथ 1000 इश्क दी नमी नमी पता है वहाँ की बात मैं क्या
- 35:49बोलूं नित नूतन है वह पुरातन से पुरातन है और नित नूतन है बिलकुल।
- 35:59अभी अभी गिरी हुई उसकी तरह कृषि का व्याख्यान सुनने से पहले
- 36:12विवेकानंद का फॉर्मूला आजमाना विवेकानंद पूछता हूँ परमात्मा है।
- 36:22कौन संत कहते हैं परमात्मा में संतों का रोज़गार ही अगर संत
- 36:30कहेगा परमात्मा नहीं है, यह तो कोई एक सहसवान व्यक्ति कहेगा
- 36:38नहीं। परमात्मा नहीं है बुद्ध।
- 36:44जिसने आत्म तत्व को देख लिया वो कहेगा आत्म तत्व इज़ सफीशियंट
- 36:54आत्म ही आगे चलकर परमात्मा हो जाता है।
- 37:00वह क्षुद्र स्वरूप ही वरात हो जाया करता है बूंद ही तो समित्र
- 37:04में गिरा करती है, नमक समित्र में नहीं बेलीन हो सकता मर्ज नहीं हो
- 37:10सकता भूल सकता है डिसॉल्व्ड हो सकता है मर्ज नहीं हो सकता।
- 37:16मेरे शब्द थोड़े गहरे हैं। बार बार पलट पलट के देख लेना गुरु
- 37:24गोविन्द सिंह गुरुओं की असलियत को समझ गए थे।
- 37:31माखें सारवान जब कह सो अशरफियाँ। मैं भेंट करूँगा हे नौमे पाशक
- 37:43कष्टियां सबके किनारे पे लग ही जाती हैं न खुदा जिनका कोई नहीं,
- 37:50उनका भी खुदा होता है तो सच्चे गुरु ने सुन लिया।
- 37:59तो उसने देखा इतने पांडार दिखे एक बात और समझ अज्ञानी व्यक्ति
- 38:05पांडारों में बैठेगा। यह एक सबूत भी है।
- 38:14कबीर कभी पांडा नहीं सजाते। कृष्ण कभी नहीं बताती कि यह प्रेम
- 38:21जो मैं निधि वन में बिखेरता हूँ, यह आयता का अंश है।
- 38:26नितांत अकेलापन में जो चला गया, कैवल्य में उतर गया जो साली छूट
- 38:31में चला गया। वह दिखावा नहीं करती क्योंकि
- 38:38दिखावा करने का मतलब है अभी इसने पी नहीं, जिसने पीली है वह तो
- 38:49उसकी आनंद को चखेगा। दिखामा करता रहेगा नहीं मुझे
- 38:59रोबोट्स लगते हैं। 14 साल बाद ये गुजरे कैसे?
- 39:06मैंने कहा मुझे पता ही नहीं चला। तू जो चाहे तो दिन निकलता है तू
- 39:23जो चाहे तो राज़ होती है। जिक्र होता है जब कयामत का तेरे
- 39:39जलओं की बात होती है, तू जो चाहे तो।
- 39:49दिन ने कर ता हे तू जो चाहे तो रात होती कब दिन निकल गया, कब
- 40:04सूर्य हो गया कब दिन? छिप गया।
- 40:10कब सूरी डूब गया? मुझे पता चला कारण क्या था?
- 40:17कारण था कि मुझे पीने से फुर्सत नहीं मिलती।
- 40:33वह इतना सुसाज व अमृत है कि उसको पीते रहने का मन करता है।
- 40:45शब्दों में ही बोलना पड़ेगा और मेरे पास कोई शब्दों के अतिरिक्त।
- 40:50इशारे हैं इशारे के करण बस लक्षण बता देंगे वायम सोस्टेबल मैं इतना
- 41:09सिधर क्यों? मैं इतना आनंदित क्यों?
- 41:17मुझे अपने भीतर इतनी माहक क्यों आती है?
- 41:23मैं यहाँ से हिलने की इच्छा क्यों नहीं करता?
- 41:27हिलने की इच्छा वही करेगा जिसके भीतर वास नहीं, वासना ही तुम्हें
- 41:33दौड़ाती हैं, वासना ही तुम्हें भगाती हैं।
- 41:36वासना ही तुम्हें कुछ इकट्ठा करने को प्रेरित करूँ।
- 41:49जो व्यक्ति निर्वासन हो गया उसके भीतर तुम्हें दौड़ाने वाला तत्व
- 41:55समाप्त हो गया, इसलिए मैं पूजा प्रार्थना, उपासना।
- 42:04तुम्हारी किसी भी परख छोड़्सपचार इनको वासना ही है तुम कुछ पानी की
- 42:14तमन्ना जिज्ञासा ठीक है मुँह मुखसा ठीक रास्ता।
- 42:28अगर ऐसा ही मनुष्य जग गई तो हमारे पास सभी साधन हैं, तो फिर किसी
- 42:39ग्रंथ को पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं है।
- 42:41फिर एक ही ग्रंथ है पढ़ने योग्य। और वो तुम हो और वो तुम्हारे भीतर
- 42:49उस गहें तल पर विद्यमान हैं तत्व मशी शेर के अहम् ब्रह्मस्व अनलफक।
- 43:06रिमेम्बर योरसेल्फ हूँ, अरे यू यही जानने योग्य है जिसने यही जान
- 43:13लिया कि मैं हूँ कौन? उसमें प्रश्न बचता है।
- 43:22इश्क पे इश्क पे ज़ोर नहीं जब वो आती से है गालिब जो लगाई ना लगे
- 43:31और बुझाई ना बने यह आग अगर एक बार लग गई तुम अगर एक बार अपने भीतर
- 43:39उतरने का चस्का तुम्हें लग गया। तो फिर तो वह महान चुंबक तुम्हें
- 43:44अपनी तरफ खींच लेगा। मुश्कलात तो यही है, तो तुम बाहर
- 43:51अपने आप को चिपकाए करते हो, किन्हीं किन्हीं पदार्थों में या
- 43:57किन्हीं किन्हीं ऋतबो में। तुम अपने चेहरे मोहरे झूठे बना
- 44:02दिए हैं, कहीं टूट ना जाएंगे और ये सब 1 दिन टूट जाएंगे।
- 44:11फिर तुम क्या करोगे? हो रही
- 44:33है खड़ा माली वो पीछे होशियार। मारकर गोली गिरा ली जाएगी जब तेरी
- 44:53डोली निकाली जाएगी। बेमहूर के उठा ली जाएगी जब तेरी
- 45:08मुझे हैरानी होगी। 150 साल के सुद्र जीवन तुम कितनी
- 45:15जूट कफर तूफान तौलता। और नतीजा शून्य शून्य लेकर जाते
- 45:25हो जांज जो तुमने जोड़ा क्या वह जोड़ा सही था धन दौलत पुत्र
- 45:35पोतरादि। महल चुबारे कारें वो जहाँ क्या
- 45:46तुम्हारे संघे की ज़रा भी जाता है फिर क्या तुमने सच में जोड़ा था?
- 45:55फिर अगर कोई संत कहे के परिग्रह जोड़ना मत, मैं पहले से अदा कर
- 46:02देता मत जोड़ना। शरीर के निर्वाहन के लिए सिर्फ
- 46:11उतना ही जोड़ना जितनी जरूरत है। छोटी सी कहानी से मैं अपनी बात को
- 46:18खत्म कर दूंगा। तुम किसी एक विशिष्ट कुंभ को
- 46:31गदियाँ निकालते हो, वो तुम्हारा मसला है।
- 46:35तुम अगर अपने रक्त को विषाक्त कर करना चाहते हो पार्टी सिर से
- 46:40अडिनाल से इसमें दूसरे को कोई शिकायत नहीं होनी भी नहीं चाहिए
- 46:46तुम करो मर्जों से तुम्हारी इच्छा है तुम्हारा सिर मोहम्मद जब।
- 46:56साँझ ढलती तो फातिमा से कहते एक मात्र बच्चा था फातिमा बच्चे तो
- 47:07कुल सात हुए हजरत मोहम्मद के लेकिन उन सातों में से एक फातिमा
- 47:14बच। सल लाहु अरहे बरसलम मोहम्मद हजरत
- 47:28के सात बच्चों में से छः बच्चे उनके जीते जी ही बहुत हो गए।
- 47:39एक बच्चों। फातिमा लेकिन छः बच्चों का उन्हें
- 47:44कोई गम नहीं जो व्यक्ति जानता है। पंचतत्व का पुतला अपने तत्वों में
- 47:53विलीन हो गया। वह अफसोस क्यों करेगा?
- 47:58छः बच्चों का कोई अफसोस नहीं हुआ। सात बच्चे हुए थे छः हो गए एक
- 48:08बेटी फातिमा बच्ची फातिमा खतीजा की बेटी थी, खतीजा पहली पत्नी थी।
- 48:18जो मोहम्मद साहब से 15 वर्ष बड़ी थी और आपको जानकर शायद हैरत लगी।
- 48:33मोहम्मद साहब की मृत्यु के छः महीने बाद फातिमा भी चालू थी।
- 48:41ये कुल कहाँ है? और यह जो वंश चल रहे हैं, ईरान
- 48:48में आयात उदा। अली खान ने यह फातिमा तो वंशजों
- 48:52में से तो वह जब सांई ढल जाती तो बोलते फातिमा।
- 49:05घर में कुछ बचा है साँझ ढल रही है सूरज ढल रहा है खात्मा कहती हाँ
- 49:16बच्चा तो उसे बांटते भागो। वह जो भी कुछ बचा होता, वो पैसा
- 49:27होता दीनार होता या कुछ खाना होता, सब बाहर बांट आते।
- 49:39आखिरी दिन जब हजरत ज्यादा बीमार हो गए।
- 49:46और लगा कि आज शायद ना बचें या शायद देर रात किसी हकीम को बनाना
- 49:54पड़ेगा। वो ठंडी रात, इतनी ठंडी रात हवाएं
- 50:01बड़ी सर्द थी उस दिन। कलेजा घिर रही थीं।
- 50:13सर्द रात में ऐसा कोई लोभ के बिना आएगा नहीं, मनुष्य का सौभाग्य।
- 50:28उन दिनों भी ऐसे ही मनुष्य होते थे।
- 50:31आज भी वैसे ही तासीर में ही गुजरते तो वैद्य ऐसे तो आएगा
- 50:38नहीं, उसको पैसा देना पड़ेगा। धन के रोग से वो आ जाएगा।
- 50:53तो दिन में कोई भगत पांच दिनार देगा था दिनार आए तो बहुत महंगा
- 51:01है उस वक्त दिनार सोने का होता था शुद्ध सोना।
- 51:094.25 ग्राम 4.25 शुद्ध सोने का दिनार होता था, एक पांच दिनार का
- 51:18कोई सीखा देगा यानी करीब 2021 ग्राम सोना।
- 51:33उन दिनों में वैसे ही लोग इतना सा दान के लिए दे देते थे और 1 दिन
- 51:41की कीमत आप देख सकते थे। 5 दिन ₹1,50,000 का हो गया आज की
- 51:47कीमत के हिसाब से करीब। फातिबानी सब कुछ खाने पीने का
- 51:54सामान सब बांट लिया दीनार रख लिया पांच यह जरूरत पड़ेगी हथीम लालच
- 52:03के बिना आएगा नहीं 4.25 ग्राम सोना ₹1,50,000 उस वक्त का लोभ तो
- 52:16देना ही पड़ेगा तभी इतनी सर्द रात में कोई उठेगा अन्यथा कोई बहाना
- 52:25करदे। पांच दिनार का सिक्का रखे हजरत
- 52:35मोहम्मद कहते हैं, फातिमा आज मेरे प्राण क्यों नहीं निकल रहे हैं?
- 52:45क्या कारण है? सारी जिंदगी भर मैंने कभी जब मैं
- 52:49रात को सोया। तो कुछ रख के नहीं सोया।
- 52:53इसे कहते हैं अपग्रह जब मैं रात को सोया और तीन ही रोग होते थे
- 53:03मोहम्मद खतीजा और फातिमा कोई बहुत बड़ा परिवार भी नहीं था।
- 53:13तो मैंने अपने पास कुछ नहीं रखा। सब बांटते सोया फिर आज मैं सारी
- 53:20उम्र का मैंने ऐसा क्या गलती कर दिया कि आज प्राण नहीं निकले?
- 53:33फातिमा से बोला फातिमा तुने कहीं कुछ बचा के तो नहीं रख लिया है?
- 53:45फातिमा कहते हैं। मैंने कुछ नहीं बचा के रखा अब्बा
- 53:51कुछ नहीं बचा के रखा, तुम आराम से लेट जाओ।
- 53:54उसने चादर उड़ी लेकिन चादर उड़ी फिर चादर हटा दी।
- 53:59नहीं भाती माँ। कहीं ऐसे तो नहीं कि तुने कुछ बचा
- 54:05के रख लिया? देखो अगर ऐसा है तो मुझे बता दे
- 54:12तो सारी जिंदगी के मेरे सधे हुए अपने ग्रह के ऊपर उसकी दरगाह में
- 54:20जाते जाते काली मत पोत। फाथ मंडरी फाथ म के की अब्बा में
- 54:30पांचों के नाशू अब बीमार थे। मैंने कहा ऐसे हकीम आएगा नहीं,
- 54:40लालच देना पड़ेगा। यह पांच दिनार का लालच और मैं
- 54:44बुला लाऊंगी मोहम्मद कहते तू जल्दी कर तू बेटी इसे बाहर बांट
- 54:56के आ के सिखों फातिमा कहती अब्बा रात का 1:00 बज के।
- 55:022:00 बज गए, अर्ध रात्रि हो चली है।
- 55:05इस वक्त मगते नहीं होते, सब सो जाते हैं तो हजरत बोले अल्लाह खैर
- 55:18करे कश वह आता है तुम पहचान नहीं। तुम पहचानने में गलती कर जाते हो।
- 55:30वह आता है तो हज़रत बोलते हैं तू जा तक सही बाहर तू देख वह परवर
- 55:40दिगार पर रहमत करेगा। कोई ना कोई तो आ जाएगा।
- 55:49सारी उम्र का एक संस्कार जो मैंने पाला मैं उसको तोड़ के नहीं जाना
- 55:56चाहता उसकी दरगाह में नानकते मुख जिले के ती छुट्टी मनाली।
- 56:04मैं उजला मुख लेके जाना चाहता हूँ तू बाहर जा वह शहंशाह इनायत करे
- 56:24रहम करेगा। का मन में लिए दरवाजे की संगली
- 56:36खोली। उसने द्वार खो लिया, बाहर चली गई,
- 56:44कोई नहीं था। अचानक एक परछाई दिखी।
- 56:49दूर से आती हुई चंद्रमा की रोशनाई में परछाई शक्ति थी।
- 56:58उसने कहा कोई है तो परछाई करी बाती थी और जब सामने से गुजरेतो
- 57:06को वृद्ध बूढ़ा कंपता हुआ। हाथ में लाठ ही लिए तो कहने लगे
- 57:15बेटी कुछ खाने को है, मैं भूख फौत मैंने जल्दी से 5 दिन लगा ली और
- 57:30सुवृद्ध व्यक्ति से कहा। ये परवर्ती गार, ये पांच दिनार है
- 57:41कहीं से भी खा लेना। उसने 5 दिन आ गए।
- 57:49काँप से आगे निकला, खाती मंत्र आ गई धीमे धीमे चल रहा था बूढ़ा
- 58:02उसने कुटी लगा ली, लेकिन अचानक खा रहा है अरे।
- 58:10यह कौन था तो उसने जल्दी से संग्रीक होते दरवाजा खुला बाहर गई
- 58:17कोई? उस पर वर्धिका ने तुम्हारी रकात
- 58:38कबूल के रकात खुद उसने आके कबूल के भीतर से तुम्हारे दान का भाव
- 58:53उठना चाहिए तो परमात्मा खुद आके लेके जाते।
- 59:01फातमी को समझाइश यह तो अल्लाह पर वर्दी का अर्थ था।
- 59:07यह तो शहंशाह ही आलम था। उसके पांव के फगचिन्ह अभी भी
- 59:13चंद्रमा की दोषनाई में दिख रहे थे।
- 59:20फत मैं तो जैसे पागल हो, उसने उन बग चिन्हों से रेत उठाई और अपने
- 59:27सिर में डाल ली अपना सारा मुँह सिर ले बैठ लिया आँखों से सलूता
- 59:36रहा। आज अल्लाह के दर्शन किए आज अल्लाह
- 59:44के पांव की धोली चरण धोली मैंने अपने माथे पर ग्रहण की।
- 59:56उसके पगजीन्हों से माथा रगड़ा। तुम तो यहाँ चंदन के तिलक लगाते
- 1:00:02हो, कोई फायदा नहीं। यह साक्षात परमात्मा के जगत में
- 1:00:11के क्या? दूर दूर तक चले गए वो उसने अपना
- 1:00:18सारा मुँह से लपेट लिया। जब याद आया कि अब्बा में बात तो
- 1:00:26भाग के गई, जाके देखा। तो हजरत मोहम्मद प्राण त्याग।