Latest / Baba ji Vijay Vats / 20 Dec 24 - मन के जाल और वासनाओं से निकलने का उपाय! पुण्य करने से अहंकार क्यों बढ़ता है? जानें सच।
Transcript
- 0:12बिना परमात्मा हुए परमात्मा होने की कामना अहंकार की कामना है।
- 0:31बिना कुछ खोए परमात्मा होने की कामना अहंकार की कामना है।
- 0:46बिना कुछ बदले। परमात्मा होने की कामना अहंकार की
- 0:55कामना बिना छिदे, बिना जले, बिना कटे।
- 1:14बिना सूखे परमात्मा होने की कामना, अहंकार की कामना और आज।
- 1:29अब ये सारा संसार नकली भगवानो से भरा पड़ा है तो इसमें कोई आश्चर्य
- 1:38है? अच्यदेव एम देहयो एम क्लय देव
- 1:51असोश्य। नित्यह सर्वगथा स्थानूर चलो अय्यम
- 2:00सनातन। वह शरीर भी काटा नहीं जा सकता,
- 2:16जलाया नहीं जा सकता। गीला नहीं किया जा सकता, सुखाया
- 2:22नहीं जा सकता। वह सदा से युक्त रहने वाला सब में
- 2:35परिपूर्ण। अनंत स्थित स्वभाव वाला और अनादि
- 2:49है। बिल्कुल वही जो पहले श्लोक में था
- 3:07तेईसवां श्लोक नैनम चिदंती शास्त्र में वही अर्थ हैं इसके।
- 3:17एक शब्द रह गया स्थिर स्वभाव वाला जो आवागमन नहीं करता, अचल ठहरा
- 3:36हुआ। परम ठहराव अहंकार की कामना है कि
- 3:48मैं कुछ गंवाऊं ना और मैं परमात्मा हो जाऊं।
- 4:00मैं कटुना, मैं गलुना, मैं जलुना, ये वासन ये अंकाक्षाय कामनाएं साथ
- 4:07लिए लिए तुम परमात्मा होना चाहते हो, ये कभी नहीं हो सकेगा, तुम
- 4:19चाहते हो। मैं भागता, दौड़ता रहूँ, हिल
- 4:24स्टेशन पे जाता रहूँ, भौंक भौंकता रहूँ, झूमता रहूँ नाचता रहूँ,
- 4:35जश्न मनाता रहूँ। सब कुछ करता रहूँ और परमात्मा हो
- 4:48जाऊं। स्थिर स्वभाव वाला जो अस्थिर नहीं
- 4:58होता, चलायमान नहीं होता। ये इसमें कुछ अलग है, स्थिर है वो
- 5:17अहंकार शिखर नहीं होता। गौर से समझे ना?
- 5:27अहंकार अस्थिर होता है, मन लोभी, मन लालची मन, चंचल मन
- 5:49चौर ये सब मन के। मन के मते नाचा लिए पलक, पलक, मन
- 6:02और तुम अगर दान भी। करते हो?
- 6:13हैरान मत होना मेरी बात सुन के। लोभ के कारण करते हो तुम्हारी
- 6:23बुद्धि इस बात को स्वीकार नहीं करेगी, लेकिन मेरा अनुभव ये कहता
- 6:33है संत का अनुभव ये कहता है मन लोभी मन डाल जी मन चंचल।
- 6:40मन चूस अगर अभी मन बरकरार है गंदले पानी से युक्त मन मैला है
- 6:56मन ठहरा नहीं ध्यान रखना मैं स्थिरता पे बात कर रहा हूँ।
- 7:05अस्थिर मन लोभी होता है, अस्थिर मन लालची होता है, अस्थिर मन चंचल
- 7:19होता है, चोर होता है। कबीर कहते हैं, अस्थिर मन।
- 7:25के पीछे। लखनऊ।
- 7:31क्योंकि ये पलक, पलक, मन और अब कुछ हो रहा है पल भर बाद कुछ और
- 7:40होगा। इसलिए तो लोग गुरु बदलते हैं।
- 7:56इस गुरु में कुछ नहीं मिला, उस गुरु में मिल जाएगा।
- 8:04दूर के ढोल सॉन्ग है और गुरु भी लालच देता है तुम।
- 8:15कैसे फंस जाओ उसके जाल में गुरुपुरा संसार रचता है।
- 8:25जाल फैलाता है। गुरु कौन?
- 8:37अधिकारी कौन है गुरु बढ़ने का जिसकी कोई जरूरत भी न रखे।
- 8:48वासना छोड़ो, कामना छोड़ो जिसकी कोई जरूरत भी न रखे।
- 8:59मुझे चाहिए था जिसके लिए भागदौड़ थी, जिसके लिए वटकन थी, जिसके लिए
- 9:11इस द्वार से उस द्वार इस पहाड़ से उस पहाड़।
- 9:17इस मंत्र से उस मंत्र सब जगह गया लेकिन नहीं मिला।
- 9:40मंदिर मंदिर मोहरत तोर। मंदिर मूरत तोरी फिर भी ना देखी
- 10:01सूरत तोरी। युग बीते कब आए मिलन के पुराण महा
- 10:22श्री? युग बीते कब आए, मिलन की पूरण
- 10:37माशिर। दर्शन दो।
- 10:47घनिशानाथ मोरी, अँखियाँ प्यासी। आन मंदिर में।
- 11:04ज्योति जला दे घट घट आसी रे। दर्शन दो।
- 11:19घनशामना ये मन? की खेल है।
- 11:30मन ही तो मैं दौड़ता है और मन की कहीं तृप्ति हो जाए।
- 11:39ये भूल जाना मन कभी नहीं होता, मन सदा अतर्रात रहता है।
- 11:47दूसरे शब्दों में कहूं तो जब तक मन है, तब तक अतृप्ति है मन।
- 11:57ऐसा घड़ा है जिसके नीचे से छिद्र है, जितना ऊपर से डालोगे ततक क्षण
- 12:07निकल जाएगा घड़ा खाली का खाल। सच्चे गुरु की पहचान क्या है?
- 12:25जिसकी वासनाएँ खत्म हो गई या नहीं?
- 12:31वो तो हो ही गई, जिसकी जरूरतें भी खत्म हो गई।
- 12:42जिसकी आवश्यकताएं ही न बचीं। वो गुरु अनशन तो तुम भी करते हो
- 12:53लेकिन क्रोधों वश करते हो। उस अनशन के पीछे क्रोध छिपा होता
- 13:01है और अनशन भगवान महावीर भी करते हैं, लेकिन उसके भीतर क्रोध नहीं
- 13:13छिपा होता है। तुम्हारे अनशन के पीछे मांग।
- 13:20महावीर के अनशन के। पीछे।
- 13:22कोई मांग नहीं महावीर। का अनशन।
- 13:29शुद्ध है। उसका ये कारण है कि उसकी जरूरत
- 13:36कोई बचे। तुम भूखे मरते हो तो पीछे उसकी
- 13:53बहुत सी वासनायी पड़ी है। इससे तुम व्रत कहते हो।
- 14:03लेकिन व्रत भूखे मरने का नाम पीछे वासना के मुझसे भगवान कहा करते
- 14:15हैं कि भूखे मरने वाले इतनी अंकाक्षाओं से भरे होते हैं।
- 14:28इतनी अंकाक्षाओं से तो आम ग्रस्त व्यक्ति बना नहीं होता, जमाने भर
- 14:35की अंकाक्षाएं इनके भीतर होती हैं।
- 14:41वो ही इनको भूखे। मरने पर मजबूर।
- 14:44कर देती है अन्यथा किसका दिल करता है तुम्हारा त्याग त्याग नहीं है,
- 14:52बड़ी मांग के कारण त्याग है। त्याग के पीछे बड़ी मांग खड़ी है।
- 15:08और तुम दूसरों की तरफ देख कर बेचैन हो जाते हो।
- 15:17जाने वो कै से लोग थे जिनके? प्यार को प्यार मिला हम उन्हें तो
- 15:38जब कलियाँ कांटों का हार मिला जान वो कैश लोग।
- 15:58थे, जिनके। प्यार को प्यार।
- 16:05मिला। हमने तो जब कलियाँ मांगी कांटों
- 16:17का हार मिला। जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार
- 16:28को प्यार मिला हमने तो जब कलियाँ मांगी कांटों का हार मिला ये मांग
- 16:41ही तड़पाती है तुम्हें। मांग तुम्हारे अधूरे होने का
- 16:51लक्षण अधूरा वित्तीय सजा मांगता ही रहता है।
- 17:03इसलिए संतों ने एक तरकीब निकाली। उन्होंने विरोधी कार्यप्रणालियाँ
- 17:13विकसित कर दीं। तुम लोभी हो तो दान करो।
- 17:20लोभ के विरुद्ध दान खड़ा कर दिया। इसलिए दान के इतने महिमा सनातन
- 17:26ज्यादा लोग ही रहे होंगे। लोग कमी हो तो ब्रह्मचर्य रखो।
- 17:40हर चीज़ का विपरीत पहल उखड़ा कर दिया गया ताकि तराजू बैलेंस रहे।
- 17:50एक अति पर ना जाए, पैंडुलम मध्य में ठहर जाए।
- 18:05वह छेदता नहीं लेकिन तुम छेदने का डर पहले हो, वह जलता नहीं, लेकिन
- 18:14तुम जलने से डरते हो, वह कटता नहीं, तुम कटने से डरते हो, वह
- 18:23मरता नहीं। तुम मरने से डरते हो, वह आनंद का
- 18:29भरा हुआ समुद्र है, और तुम उसकी एक बूंद के प्यास से हो तुम।
- 18:42प्यार का सागर। है तू प्यार का सागर है तेरे एक
- 19:00भूत के प्यार से हम। तो?
- 19:07प्यार का सागर है लौटा जो दिया तुने लौटा जो दिया तुने।
- 19:31चले जाएंगे जहाँ से हम चले जाएंगे जहाँ से हम।
- 19:47तुम। प्यार का।
- 19:50सागर है तुम प्यार का सागर है। तेरी एक बूंद के प्यासे हम लौटा
- 20:08दो जिया। लौटा दो अगर तुने जहाँ से चले
- 20:14जाएंगे हम आनंद के बिना भी जीना क्या जीना होता है?
- 20:23टक्करें होती। संत जब देखता है अपने पराक्रम
- 20:33जीवन को बड़ा दुख होता है। ये वजह है जो इतनी देर लगाई।
- 20:52इतनी बात तो न थी जब देखता है इतनी टक्करें मारीं कभी पर्वतों
- 21:05पे, कभी मंदिरों में, कभी मस्ज़िदों में, कभी गुरुद्वारों
- 21:11में। कभी एक गुरु के पास, कभी दूसरे
- 21:16गुरु के पास मन का भटका इसका मुख्य कारण है मन का स्वभाव भी
- 21:29भटकना। क्या किया जाए?
- 21:33समय उस तत्व की बात करते हैं भगवान कृष्ण वहाँ पहुँच ही जाओ जो
- 21:44जलता नहीं कटता है। जो गलत नहीं, जो सूखता है लेकिन
- 21:50पहुंचे फिर से मन की गर्व से छूट कर इस मूल मंत्र को आप लिख लेना
- 22:05ये जो बात करते हैं। तेईसवें और चौबीसवें श्लोक में
- 22:09दूसरे अध्याय के भगवान श्री कृष्ण वह छिदता नहीं, वह गलता नहीं, वह
- 22:19सूखता नहीं, वह मरता नहीं। आनंद स्वरूप है और तुम्हें आनंद
- 22:33की एक बूंद की चाहत है, तो जब देखता है संत पहुँच के अपनी मंजिल
- 22:44पे अपने प्रार्थ। जीवनों को तो पता है नाहक ही इतने
- 22:52परेशान हो गया। बात तो कुछ भी न थी।
- 23:02संत सोचता है कि मैं इतना क्यों? सभी जो अच्छे कर्म शास्त्रों में
- 23:12बताए संत जनों ने बताए वो मैंने किया मंत्र जप किया, तंत्र किए
- 23:26सभी पुण्य किए। लेकिन फिर भी भटकता रहा, बिल्कुल
- 23:38ठीक है, संत निचोड़ता है और अपने ही जीवनों से उस रस को पा लेता
- 23:48है। जो हम फल को निचोड़ के रस प्राप्त
- 23:53करते हैं, संत अपने अनुभव से बोलता है और अपने पिछले जीवनों के
- 24:01अनुभव से निचोड़ता है, मैं इतना भटका कि किस कारण से इतनी देरी
- 24:09हुई। और इस डेरी को मैं औरों के ऊपर
- 24:15मरता रहा, औरों के ऊपर मरता रहा क्योंकि मन कभी जिम्मेवारी खुद
- 24:28उठाना नहीं चाहता। मन चाहता है इसकी जिम्मेवारी
- 24:34दूसरों पर थप दूँ और स्वयं मुक्त हो जाऊं।
- 24:39यह मन का आंतरिक स्वभाव है। संत जब अपने दूसरे जन्मों में
- 24:51जाता है, सभी जन्मों को तलाशता है, देखता है, रस निकालता है तो
- 25:00एक चीज़ उससे मिलती है, निचोड़ता है, नचोड़ता है, निचोड़ता है।
- 25:07हरक निकाल लेता है और इस तथ्य पे पहुंचता है ये किया तो मैंने सब
- 25:19कुछ बोला सब पुण्य किए। जो शास्त्रों में वर्णन थे, जो
- 25:27गुरुओं के द्वारा कहे गए थे। जो सुने थे जो पढ़े थे, लेकिन
- 25:37पहुंचा सब किया लेकिन उस करने को। अहंकार बना लिया।
- 25:50संतों ने बताया था वह करने के लिए कि तुम्हारा अहंकार जड़े आज 20 है
- 25:58तो कल 19 हो जाए। परसो 18 हो जाए और फिर 17 हो जाए,
- 26:051 दिन शून्य हो जाए, लेकिन हुआ और क्या दान किया?
- 26:12आज 20 है, कल 21 हो गया जो तुम पहले थे, साथ में दानी भी हो गए,
- 26:19बड़े दानी हो गए। फूल के कुप्पा हो गया।
- 26:27अगर ऐसा है जो कि है, तो फिर चिल्लाना।
- 26:41फिर किसी और को दोष मत देना। कृष्ण कहते हैं तुम्हारा यहाँ कुछ
- 26:48नहीं अगर तुम दान करके कहते हो, मैंने दान किया तो यह तुम्हारे
- 26:58अहंकार को बढ़ाएगा क्योंकि ये सत्य नहीं है।
- 27:02असत्य तुम्हारे अहंकार को बढ़ाता है।
- 27:06सत्य तुम्हारे अहंकार को तोड़ता है।
- 27:12इस शब्द को फिर सुन लेना असत्य तुम्हारे अहंकार को बढ़ाता है।
- 27:17तुम दान करते हो है तुम्हारा कुछ भी न।
- 27:22कमाया होगा बनाया नहीं है परमात्मा का इसलिए उसे मालिक कहते
- 27:31हैं। जिसका माल है वह मालिक दान तुमने
- 27:38अपने हाथों से कर दिया और फूल के। तो संत देखता है कि मैं क्यों बट
- 27:47का क्योंकि पहुंचने के बाद उसके भीतर?
- 27:58एक नई वासना जगती है किसी किसी के प्रत्येक नहीं लाख में से एक
- 28:13व्यक्ति के मन में करुणा जन्मती है, जो वासन है, वासना टूट गयी,
- 28:21वासना छूट गयी, मटका फूट गया। लेकिन एक वासना उसके भीतर जन्मती
- 28:29है जो कि उसकी खुद की जनमाही हुई है, वह खुद ही जन्माता है।
- 28:36इन वासना के कारण अंधों को रास्ता दिखलाता है।
- 28:50रामकृष्णा परमहंस अक्सर प्रवचन देते बड़ा सुंदर प्रवचन होता संत
- 28:57का प्रवचन सुंदर ही होता है अनुभवी का प्रवचन मैंने कहा उसे
- 29:03लेबर से बढ़ गया। ऐसे तो बोलने वाले बहुत हैं, ऐसे
- 29:12तो हूँ हूँ तुम शब्दों को प्रटम करके बोल सकते हो कोई मुश्किल
- 29:21नहीं है। जो किसी ने बोल दिया एक बार तोता
- 29:30रेतंत है, तुम फिर से दोहरा सकते हो, कोई मुश्किल काम नहीं है।
- 29:37ऐसे तोते जगह जगह बैठे हैं, लेकिन पहचान में आ जाते हैं क्योंकि
- 29:43तोता? कोई न कोई बात ऐसी कह देता है
- 29:47जिससे पहचान में आ जाता है तो रामकृष्णा परमहंस बोलते बड़ा
- 29:56सुंदर बोलते और संत जब बोलता है अपने अनुभव से बोलता है और अनुभव
- 30:02से जो बोला जाता है। वो अनुभव के तल से आता है और
- 30:07अनुभव का तल आनंद से भरा पड़ा है। आनंद से भरा पड़ा है वो तल वहाँ
- 30:14से लबड़ के जोबानी आती है। वो तुम्हें भी अपने भीतर धकेल
- 30:19देती है। इसलिए तुम कहते हो बाबा बड़ा मज़ा
- 30:23आया। बाबा 3 घंटे बोल दिया करो, बोल
- 30:32दिया करूँगा भाई, लेकिन पूछो मेरे चैनल कंट्रोल से तुम सुनते कितने
- 30:39अभी बाबू कर? 35 मिनट आप सुन पाते हो?
- 30:43सुन पाओगे 3 घंटे मेरा बोला हुआ सिर्फ व्यर्थ ही चला जाएगा, इसका
- 30:53कोई उपयोग ना कर पाएगा इसलिए भला होगा की एक एक घंटा तीन बार बोला।
- 31:06तो बोलते बड़ा प्यारा लगता बहुत लोग दूर दूर से आते सुनने आना ही
- 31:11पड़ता है। कुंवर के पास कितना ही दूर हो बस
- 31:19शर्त एक है कि प्यास लगनी चाहिए, जगनी चाहिए।
- 31:28अगर प्यास जग गई है उस एक बूंद की प्यास जग गई है तो तुम कुएं को
- 31:35ढूंढने निकल जाओगे और बोलते बोलते बीच में से उठ के रसोई में चले
- 31:43जाते सारथा। क्या बनाया है सब्जी भला देखूं तो
- 31:54सब्जी का पतीला उठाते हाँ हाँ बड़ी सुन्दर खुशबू जल्दी डाल दे
- 32:03प्रवचन आधा छोड़ के आया। रोज़ का काम था, रामकृष्णा का
- 32:11श्रद्धा तंग आ गए। स्त्री लोकलाज को ज्यादा दिखते।
- 32:22अगर स्त्री ना होती तो समाज ना बनता।
- 32:26अकेला मनुष्य समाज नहीं बना सकता, ये जो समाज बने हैं, स्त्री के
- 32:32कारण बने हैं क्योंकि स्त्री निभा सकती है।
- 32:37लोकलाज को आदमी बड़ा उश्रिंकल होता है।
- 32:43सक्षम होता है। आज मैं किसी समाज की परवाह नहीं
- 32:50करता। समाज बनाती है अपने शारीरिक और
- 32:58मानसिक। गुणों के कारण दोषों के कारण इससे
- 33:10समाज का बड़ा ख्याल रखती है। जो श्रद्धा कहती आप ये क्या करते
- 33:20हो? ब्रह्मचर्चा करते करते ब्रह्म
- 33:24अन्य चर्चा में आ जाता। यह शोभा नहीं देता, क्या शोभा
- 33:31देता है? क्या नहीं देता?
- 33:34रामकृष्णा अच्छी तरह से जानते हैं।
- 33:37परमात्मा की बात ही शोभा देते हैं।
- 33:41अगर एक इस मुख से निकल जाए परमात्मा की बात।
- 33:50तो ये मुख्य स्वयमान लेकिन राम कृष्णन कहते हैं, तू जल्दी कर तू
- 34:01बना के रखा कर। जब मैं बोलना शुरू करूँ तो खाना
- 34:06बनाना शुरू कर दिया कर मुझे भूख बड़ी लगती है।
- 34:10तेरी रसोई की जो खुशबू आती है मैं जाने उसमें क्या रस है तू जल्दी
- 34:18से खाना डालते हैं मैं आधा पेट खा लूँगा आधा फिर खा लूँगा तू जल्दी
- 34:24कर। 1 दिन शारदा को बड़ा गुस्सा
- 34:36कुप्पित हो गए। बोली आप रोज़ रोज़ यही कुछ क्या
- 34:47सोचेंगे लोग? ब्रह्मचर्चा सुनने के लिए तुम्हे
- 34:54इतने भी तसल्ली नहीं है, तुम भूख के ऊपर काबू पा लो थोड़ी।
- 34:58देर। लोग क्या कहेंगे, कैसे संत हो तुम
- 35:07चले गए? रामकृष्णा गुस्सा होकर चले गए।
- 35:13शारदा ने ऐसा समझा होगा, लेकिन संत गुस्सा नहीं होते, उनका
- 35:23गुस्सा होना भी तुम्हें कुछ सबक सिखाने के लिए होता है।
- 35:32प्रवचन समाप्त हुआ। सब चले गए तो शारदा ने आके पांव
- 35:35का बल दिया, थाली रख दी कि आप तो गुस्सा मान गए नहीं, नहीं, शारदा
- 35:43गुस्सा नहीं माना ले, सुन ले मेरी बात आज।
- 35:51जीस दिन मैं खाने नहीं आया और तू भोजन की थाली लेकर मेरे पास आ गई
- 36:00और शारदा मैंने मुँह मोड़ लिया बस मेरी जिंदगी उस दिन 72 घंटे की
- 36:09मैं। 3 दिन के बाद मेरा ये शरीर विदा
- 36:16हो जाएगा, मर जाएगा ये शरीर छोड़ दूंगा इसको जीस दिन तू आ गई और
- 36:25मैं खाने न आया। सिलसिला चलता रहा, शारदा भूल गई,
- 36:421 दिन ऐसा वक्त आया, राम किशन खाने के लिए नहीं आए।
- 36:53शारदा थाली लेकर गई। रामकृष्णा ने भोजन की थाली को
- 37:03देखकर मुँह मोर लिया, शारदा को फ़ौरन याद आया।
- 37:18थाली हाथ से छूट गई छन छन कर गिर पड़ी नीचे बिखर गया सब कुछ, भोजन
- 37:30भी बिखर गया, तमन्नाएँ भी बिखर गई, जीवन बिखर गया जैसे।
- 37:39याद आए वो शब्द तू थाली लेके आएगी मैं मुँह फेर लूँगा बस 72 घंटे
- 37:47शेष। संत पुरुष किसी न किसी वासना से
- 37:58अपने आप को बांधे रखते हैं। मैं बुद्ध की बात कर रहा था,
- 38:03करुणा से अपने आप को बांध लिया, इस बहाने बंधे रहेंगे।
- 38:13और कल्याण होता रहेगा। अति जरूरतमंदों का ज्यादा भटके
- 38:19हुए लोगों को जिनकी तमन्ना तो सही है, मार्गदर्शक नहीं मिलता।
- 38:36उनको अपनी तरंगों से मार्ग दिखाते रहेंगे।
- 38:42इसलिए मैंने तुमसे कहा जब जरूरत हो मार्ग की और तुम्हारे पास गुरु
- 38:48ना हो तो ये तीन शब्द बोले ना बुद्ध, बुद्ध।
- 38:57सदर उपस्थित रहेंगे। तुम्हारे लिए बुद्धं शरणं गच्छा
- 39:07दमन शरणं गच्छा। संघ शरण गच्चा मैंने कल भी बताया
- 39:22था कि बुद्ध के साथ 131 निर्वाण प्राप्त लोग हर वक्त रहते हैं।
- 39:36जब आप इन्हें पुकारो गए क्योंकि सारे संसार में व्याप्त है
- 39:47ब्रह्मण्ड में बिखरे पड़े मालिक है।
- 39:56जैसे ही तुम्हे ने पुकारो के आवाज में पुकार होना चाहिए, दर्द होना
- 40:02चाहिए। बुद्धं शरणम गच्छों संगम शरण
- 40:11गच्छों। दम्मम शरण गच्छा में ये फौरन आ
- 40:25जाएंगे। ये मैं क्यों बता रहा हूँ?
- 40:29हमारी गैरमौजूदगी में तुम्हें काम आएगा।
- 40:34अब एक और तुम्हें चीज़ बता दूँ। तुम्हारे काम आएगा, हम चले
- 40:41जाएंगे, तुम्हारे काम आएगा जितना ज्ञान होने से पहले वासनाओं को
- 40:54भगाना मुश्किल होता है। ज्ञान से समझना जितना ज्ञान होने
- 40:59से पहले हू एमआइ वासनाओं को भगाना मुश्किल होता है, उतना ही ज्ञान
- 41:08होने के बाद वासना को रखना मुश्किल होता है, वरन उससे भी
- 41:14ज्यादा मुश्किल होता है। पता चल गया मैं कौन हूँ?
- 41:23वासन में भाग भाग जाएंगे, दौड़ेंगे, टूटेंगे, लेकिन उस
- 41:28अवस्था में वासन को बचाए रखना भी एक दुष्कर्म।
- 41:35बुद्धि जैसे लोग इन्हें बचा सकते हैं।
- 41:38ये बड़ा महत्त्व वृहद काल है। मानवता के लिए इतनी करुणा है उनके
- 41:49मन में प्रत्येक व्यक्ति के मन में ऐसी बात होती।
- 41:56वैसे जंजाल से छूट जाना चाहता हूँ इसलिए इस मामले में मैं बुद्ध को
- 42:04बड़ा आदर देता हूँ। एक वासना को बचाई रखना अति दुष्कर
- 42:16है। जैसे अभी तुम तड़पते हो।
- 42:19वासना से मुक्ति के लिए बुध कॉपी तड़पना पड़ता है।
- 42:24वासना लेने के लिए वासना दूर दूर छिटक जाती है लेकिन उन्हें अपनी
- 42:31ग्रस्त में रखना पड़ता है। जब भी अति मुश्किल है।
- 42:36ये दोनों ही चीजें मुश्किल हैं तुम्हारे लिए।
- 42:39वासनाओं से छूटना मुश्किल और बुद्ध के लिए वासना को बुलाना
- 42:44मुश्किल। तुम से कुछ भी करवा लो, सब दान
- 42:58करवा दोगे। बलिदान तक देने को तैयार हो
- 43:03जाओगे, लेकिन एक चीज़ गुर्बान न कर सकोगे कि मैंने बलिदान किया,
- 43:12मैंने दान किया या मैंने बलिदान किया या न छोड़ पाओगे?
- 43:19और यही जड़ है तुम्हारे दुख के भटकते फिर इस कंधरा से उस कंधरा
- 43:28की ओर मैदानी इलाकों से पहाड़ों की ओर वनों में जाओ।
- 43:40कंधरावों में जाओ, मैदानों में आ जाओ, तेरे साथ चले जाओ संत जो
- 43:49कहेगा तुम कर दोगे। सब छोड़ दोगे, लेकिन एक चीज़ न
- 43:57छोड़ पाओगे और वही तो स्वाद देती है तुम्हें उसको ही छोड़ दिया तो
- 44:06तुम दान न कर पाओगे। संत यही कहते हैं कि दायां हाथ दे
- 44:14माई को पसंद नहीं। तुम दान का स्वाद मत लेने लग
- 44:18जाना, बुरे फस्य हो गए तुमने देखा?
- 44:2340,000 करोड़ रूपये की प्रॉपर्टी छोड़कर एक बच्चा एक व्यस्क
- 44:31जैनुमनी हो गया। 40,000 करोड़ छोड़ सकता है, लेकिन
- 44:39मैं छोड़कर जैन मुनि बना हूँ, ये नहीं छोड़ सकता हूँ।
- 44:42यह बड़ा मुश्किल है और यही जड़ है दुख की।
- 44:49तुम अगर दुखी हो तो मुझसे मत पूछना।
- 44:51मैं दुखी क्यों अपने भीतर? थोड़ा सा झांक के देख लेना, कहीं
- 45:02मेरे अच्छे कामो का इतनी गहरी लकीर तो नहीं छप गई है जिससे मैं
- 45:09दुखी हूँ? ये लकीर नहीं होती ये घाव होता है
- 45:12तुम्हारे हरदे पर। जो तुम्हें तड़प पाता रहता है,
- 45:2540,000 करोड़ तुम छोड़ सकते हो, लेकिन मैं 40,000 करोड़ दान कर
- 45:31जैन मनी हो गया। मैं लात मार के आ गया, ये नहीं
- 45:34छोड़ सकते। यह मैं को बड़ा फुलाएगा क्या है?
- 45:39लोग पांच 4,00,000 छोड़ के आ जाते हैं।
- 45:42पांच 4,00,00,000 हमने 40,000 करोड़ छोड़ दिया और यही तो छोड़ना
- 45:48था 40,000 करोड़ तो रख लेते। कृष्ण ने सब कुछ रखा, कुछ ना
- 45:57छोड़ा। बस ये छोड़ दिया जो छोड़ने की
- 46:00चीज़ है वो छोड़ दी और तुम अगर दुखी हो तो अपने भीतर जाती मार
- 46:09लेना। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम अपने
- 46:13अच्छे कर्मों के गुलाम हो गए? अपने बुरे कर्मों के गुलाम हो गए
- 46:19हो, उनके पश्चात में उलझ गए हो और अच्छे कर्मों का स्वाद चक्र हो।
- 46:26बस फिर दुख सही है तुम्हारा, तुम दुखी, सही हो और दुख भटकाता है,
- 46:34दुख भटकाता है। दुख ठहराता हूँ तुम्हारा ही किया
- 46:39हुआ पुण्य तुम्हारा ही किया हुआ बाप तुम्हें भगाता है, अगर उसके
- 46:47भीतर मैं आ गया था तो कृष्ण कहते हैं तुम इनका वध कर दे।
- 46:56भीष्म पितामा के आर पार तीर निकाल दे शरसैया पे लेटा दे।
- 47:03अब अर्जुन कहते हैं कि मैं हत्यारा नहीं बनना चाहता।
- 47:13दानी भर सकता है छोड़ छाड़ के चला जाऊंगा वणव मैं निकल जाऊंगा तब
- 47:18करूँगा वत नहीं करूँगा यही मुश्कलात है और इसी मुश्किलों को
- 47:25हल करते हैं गीता में कृष्ण कृष्ण कहते हैं बहुत कोई भी कर लेगा।
- 47:34जो तुम करना चाहता है भगोड़ा बनना, वो तो कोई भी भाग जाएगा
- 47:40लेकिन बात जो मैं कहता हूँ उसको तू इसका वध कर क्योंकि ये वध करने
- 47:51के योग्य है। और जो वध करने के योग्य है उनका
- 48:03वध करना ही पड़ेगा। जब मैं देखना कि मैं दुखी हूँ,
- 48:14मैं क्यों दुखी हूँ? दूसरे के ऊपर मढ़ना में तुम अपने
- 48:21भीतर जाती मार लेना कहीं ऐसा क्यों नहीं है?
- 48:25तुम्हारा पुण्य कर्म ही तुम्हें बबूल बनकर जख्म देता हूँ।
- 48:31तड़ पाता हूँ कहीं तुम्हारा ये अच्छा क्रम जिंदगी भर की आफत न
- 48:40मुल लिया हो। जिंदगी भर जुदा मुझे तड़पायेगा
- 48:59जिंदगी भर। हम जुदा हैं का मुझे तड़पएगा।
- 49:16हर। नया मौसम पुराने।
- 49:23याद लेकर आएगा ज़िन्दगी भर हम जुगाई का मुझे तर पाए।
- 49:42कहीं ऐसा तो नहीं ये छोड़ा हुआ नसूर बन गया हो?
- 49:52बस फिर तुम्हें तुम्हारी दुखती राख के ऊपर मैंने हाथ से लगा दिया
- 50:00इस रख। कि मरमपत्री करो, इसको छोड़ दो,
- 50:05मैंने कहा तुम बलिदान कर सकते हो, लेकिन मैंने बलिदान किया ये बहुत
- 50:12मुश्किल है, तुम 40,000 करोड़ छोड़ सकते हो, कोई बड़ी बात है।
- 50:21लेकिन मैंने 40,000 करोड़ छोड़कर ये जर्मनी बन गया।
- 50:26ये छोड़ना बड़ा मुश्किल है। ये ज़िन्दगी भर तुम्हारा नासूर
- 50:30बनके रचता रहेगा। हर नया मौसम पुरानी याद लेकर
- 50:35आएगा। मैंने छोड़े थे 40,000 करोड़।
- 50:40लाख लाख अपेक्षाएं तुम रखोगे इस से 40,000 करोड़ के बदले मुझे मान
- 50:46क्यों नहीं मिलता? मुझे आचार्य सम्राट की वधु क्यों
- 50:50नहीं मिलती दानवीर क्यों नहीं उपाधि से ग्रस्त कर दिया जाता?
- 50:54मुझे विभूषित क्यों नहीं होता? मैं क्यों नहीं लोग?
- 51:01मेरा सम्मान करते, मेरे पांव दो दो के क्यों नहीं पीते?
- 51:13कृष्ण कहते हैं, मान करने के बजाय तुम अपने भीतर उतर जाओ कहीं बट।
- 51:27कुछ भी किया उसको याद मत कराओ करना धरना सब यहीं रह जाएगा और
- 51:33कोई पता नहीं बस उसकी याद तुम्हारे संग रहनी चाहिए।
- 51:43उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो उजाले अपनी यादों के
- 51:50हमारे साथ रहने दो न जाने किस घड़ी इस ज़िन्दगी की शाम हो जाए।
- 52:02कौन जाने किस गढ़ी वक्त का बदले मजाक सदा याद रखो, मेरा कुछ नहीं
- 52:17और मैं हूँ। अगर तुम राम राम करने, राधे राधे
- 52:24करने के बजाए ऐसा अपने मन के भीतर भाव जगाते जाओगे तो ये तुम्हारे
- 52:32भीतर गहरे से गहरा उतरता जाएगा। यह एक मंत्र बन जाएगा तुम्हें
- 52:38छुटकारा दिलाने का राधे राधे बेड़ियों से युक्त कर देगा
- 52:44तुम्हें रामकृष्णन बेड़ियों से युक्त कर देगा उनका जाप।
- 52:57याद ही करना है। स्मरण ही करना है तो स्मरण करो
- 53:02मेरा यहाँ कुछ नहीं और खंगाल के देख लो तुम्हारा यहाँ है क्या
- 53:08फ़ार द टाइम बीइंग तुम्हारा होता है कहाँ जाते हैं वो पल जब तुम
- 53:14लड़ के? धराशायी हो जाते हो, धरती पे घर
- 53:19जाते धराशायी हो जाती कहाँ जाते हो वो पर मृत्यु तुम्हें एक सत्य
- 53:26से परिचित करवा देते कि तुम्हारा कुछ नहीं था, तुम्हारा सोचा सब
- 53:30गलत था। और उससे आगे चलते चलते जैसे जैसे
- 53:41गहरे चलते जाओगे ये एक सत्य है और मैंने कहा सत्य को मान लेने में
- 53:45कोई अर्जुन नहीं होती क्योंकि आखिर में माना हुआ सत्य जान दिया
- 53:51जायेगा वो ऐसे ही होगा। मानोगे कि ए अनार होता है तुम
- 53:57पाओगे के ए अनार होता है, सत्य को मान लेने में कोई अर्थ नहीं है
- 54:03क्योंकि आखिर में वो जान भी लिया जाएगा और तुम पाओगे के ए अनार
- 54:07होता है भाई ये सत्य है। तो मानने से शक्ति को शुरू किया
- 54:14जाए तो कोई हर्द नहीं असक्ति को मानने से शुरू किया जाए तो बड़ा
- 54:20हर्षा है। आज असक्ति को मनानुमा डे रुक बैठे
- 54:25हैं। दाड़ियां पीली गईं।
- 54:32मुझे लोग कहते हैं आप निंदा करते रहो, मैं गया नहीं, सत्य बतलाता
- 54:38हूँ सत्य में इनकी निंदा हो जाती है जो कि आलोचना होती है।
- 54:43खुली आँखों से देखा हुआ तथ्य आलोचना कहलाता है लोचन जहाँ खुल
- 54:50जाएं जाके। वो आलोचना कहलाती है।
- 54:54मैं सत्य बतलाता हूँ, किसी की भावनाओं को ठेस लगे ना लगे ठेस
- 55:00लगाने के लिए मैं नहीं बोलता हूँ लग जाए बात अलग।
- 55:13भगवान कृष्ण कहते हैं वहाँ पहुँच जाओ, सब कुछ छोड़ छोड़ दो,
- 55:24तुम्हारा यहाँ कुछ है नहीं, याद करना है तो इसे करो, रेपेटिशन
- 55:28करनी है तो इसकी करो क्योंकि ये सत्य है।
- 55:33रेपेटिशन करनी है तो अल्लाह वह गुरु राम राधा इनकी मत करो
- 55:43रेपेटिशन करनी है तो मेरा यहाँ कुछ नहीं, यह बिल्कुल सत्य है।
- 55:50और मैं नहीं हूँ जी बिल्कुल सत्य है आखिर में तुम यही पाओगे कहाँ
- 55:54रह जाते हो तुम? आखिर में तुम्हारी तो यादें भी मट
- 55:58जाती हैं, भरपूर कोशिश करते हो जिंदा रहते हैं कि मेरा नाम अमर
- 56:03हो जाए। किसका अमर रहा है, किसी का नाम
- 56:07अमर नहीं रहा कब? तेरे जैसे लाखोय।
- 56:30लाखों इस माटी ने खा तेरे जैसे लाखों आए।
- 56:46लाखों इस मा पीने खा रहा न नामों निशान रे बंदे।
- 57:04जोठी तेरी शान रे मत कर तू अभिमान मत कर तू।
- 57:29मत कर तू अभी। कितने आए, कितने चले गए?
- 57:40कितने के कपाल टूट गए, कितनों के कपाल टूट जाएंगे तुम्हे होश का
- 57:46बाइक है, जागो जागो सवेरा कब का हो चुका है, फिर से रात होने वाली
- 57:57है। और अगर अब न जावे तो रात का
- 58:06अंधियारा फैल जाएगा या सूरज अस्त हो जाएगा रात घनी घनी होती चली
- 58:13जाएगी। अमावस्या की रात है।
- 58:22और कोई चांदनी का प्रकाश जोगुन की तरह भी दिखाई नहीं पड़ता।
- 58:28अभी वेला है, जागने का जागजा याद करना है तो सत्य को याद करो
- 58:40तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं। और तुम यहाँ हो नहीं देखिये ज्ञान
- 58:48से समझना उपनिषद में लिखा संत सभी कहते शास्त्रों में लिखा।
- 59:00ईशा वशी में दम सर्वम यक्तकैंच जगह से आम जगह ध्यान से समझना
- 59:05मेरी बात को थोड़ी गहरी है पर तुम्हें उस स्थल पर ले जाएगा अगर
- 59:11वोर से समझ लिए ईशा वशी उपनिषद कहता है कि।
- 59:21ईशा वास में तुम सर्वम जगत के जगत में हम जगत ईश्वर इस जगत के कण कण
- 59:27में व्याप्त है ज़रा मुझे जवाब देना है इस बात का अगर ईश्वर ही
- 59:34इस जगत के कण कण में व्याप्त है। तो तुम कहाँ रह गए भाई बिन नावें
- 59:44नाहीं को ठान कोई ठान नहीं जहाँ वो नहीं तो फिर तुम कहाँ रह गए
- 59:52ज़रा गौर से सोचोगे। तो सब बात समझ आ जाये करोग।
- 1:00:09या दू तो हर। बात याद आयेगी करोगे याद तो है
- 1:00:30बात याद। आएगी।
- 1:00:37गुजरते वक्त की हरमौत ठहर जाएगी। करोगे याद तो हर बात याद आएगी
- 1:01:02थोड़ा याद। करो, अगर ईश्वर ही है तो तुम कहाँ
- 1:01:09हो? तुम्हारा ठोर ठिकाना कहाँ है?
- 1:01:12बीन नाही नाही। कोठा सब जगह उसका ठिकाना है तो
- 1:01:18तुम्हारा ठिकाना कहाँ है ज़रा ढूंढो।
- 1:01:25तो यही मैंने कहा पिछले प्रवचन में।
- 1:01:30रमण कहते हैं, देखो तुम पाओगे कमा होने, संत कहते हैं नुदाए सैल्फ
- 1:01:42जानने तो निकलो, चिन्ह खोजा तिन पाजा गहरे पानी।
- 1:01:48मैं वह पूरा उड़न डरा गयो किनारे बैठो ज़रा खोजो तो खोजने से
- 1:01:54मिलेगा और खोजने से मिलेगा और तुम हो नहीं तो संतो का ये वचन साकार
- 1:02:03हो जाते हैं। अगर तुम हो तो संतो का ये वचन
- 1:02:06बेकार हो जाते हैं। या तो तुम सत्य हो या संत सत्य
- 1:02:14अगर तुम हो तो ईश्वर से जगत के कण कण में नहीं।
- 1:02:19अगर ईश्वर से जगत के कण कण में व्याप्त है तो वह तुम नहीं हो,
- 1:02:23पक्का सत्य हो। नग्न आँखों से देख लेना शुभ होता
- 1:02:29है और सत्य को पूर्ण हृदय से स्वीकृत कर लेना बड़ा शुभ होता
- 1:02:34है। देख ये लोग रमन जो कहते हैं वो आर
- 1:02:39यू तुम हो, तुम हो भी कि नहीं? मेरी इस बात का दिमाग मेरा कर
- 1:02:50प्रश्न घर चले जाने और बताओ तुम हो कौन अगर ईश्वर ही है सब जगह
- 1:03:00फिर तुम कहाँ हो व्हेर अरे यू? या तो फेरेश्वर हो सकता है या तुम
- 1:03:08हो सकते हो दोनों तो नहीं हो सकते भाई श्री।
- 1:03:16कृष्ण गोबिंद। हरे मुरारी हे नाथ नारायण
- 1:03:30वासुदेव, श्रीकृष्ण, गोविंद हरे मुरारी।
- 1:03:38हिनाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद हरे मुराई हिनाथ।
- 1:03:57नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण, गोविन्द हरे मुरारी हे।
- 1:04:08नाथ? नारायण वासुदेव, पितमात स्वामी।
- 1:04:18सखा? हमारे पितुमातू स्वामी सखा हमारे
- 1:04:32हिनाथ नारायण? वासुदेव श्री कृष्ण भावविन्द।
- 1:04:47हरे मुरारी। हरे मुरारी इनाथ नारायण वासुदेव
- 1:05:08पितमात स्वामी। सखा हमारे पितमावत स्वामी सखा
- 1:05:21हमारे ईनाथ नारायण वासुदेव। श्री?
- 1:05:29कृष्ण, गोविन्द, हरे मुरारी। हे।
- 1:05:38नाथ नारायण, वासुदेव। धन्यवाद।