Latest / Baba ji Vijay Vats / 17 Mar 25 -सुख और दुख में समान कैसे रहें? Baba Farid मन की शांति का रहस्य: फरीदा के इस सरल सूत्र से।
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- 0:02स्वामी परमानंद फरीद का एक शब्द है बाबा फरीदा सुख दुख एक कर
- 0:26फरीदा सुख दुख एक कर। मन से लाह विकास अल्ला पावै,
- 0:36सोपला ता लब्बे दरबार। फिर कहते हैं परम आनंद की तलाश
- 0:52में हो। खोज रहे हो उसे कहीं मिलता नहीं
- 0:59है। तुम्हें बरबूर चेस्टाएं करते हो,
- 1:06मन ठहरता नहीं। मन गतिशील रहता है।
- 1:13हर वक्त तरीका बताते हैं तुम्हें जीवन का तरीका बताते हैं फरीदा
- 1:28सुख दुख एक कर। जीवन में सुख भी आएँगे, दुख भी
- 1:37आएँगे ये बात समझ ले ये मान ले न तो सुख से, न दुख से।
- 1:52चिपकना नहीं है ना दुख को दूर भगाना है, ना दुख से लड़ना है।
- 2:01जीस कारण से दुख आया उसको दूर भी नहीं करना है।
- 2:08उससे झगड़ा भी नहीं करना है। जीस कारण से सुख आया उसकी फिर से
- 2:20मांग भी नहीं करनी उसे जब करना भी नहीं है जब तुम्हारे लिए सुख और
- 2:29दुख। सम हो जाते हैं सम तो हम योग उचित
- 2:35हैं। फरीदा सुख दुख एक कर सुख आये तो
- 2:51ठीक दुख आये। तो ठीक एक कर उसको स्वीकार कर ले।
- 3:11फरीदा सुख दुख एक कर मन से लाभ विकार।
- 3:18मन से विकार उतारते विकार मैंने बताये काम, क्रोध, लोभ, मोभ,
- 3:29अहंकार और भय। उसके अतिरिक्त भी विकार है एक छै
- 3:40विकार तो हैं विषय पुकार इनको विषयों में रख सकते हो आप काम है,
- 3:51क्रोध है, लोभ है मोह। अहंकार और वह मन से लाह विकार
- 4:04विकार किसे कहते हैं प्रीत अस्वीकार की भावना को फ्रीद कहते
- 4:09हैं विकार अब यह नई प्रभाषा दे रहा हूँ।
- 4:15यद्यपि फरीद की परभाषा यही है, समझी समझाई नहीं गई।
- 4:27मन से लाह विकार अस्वीकार करने की भावना बेकार है।
- 4:34मतलब काम आया तुमने झगड़ना शुरू कर दिया लेट्रन शुरू कर दिया करो
- 4:48तो आया। तुमने झगड़ना शुरू कर दिया ये
- 4:53क्यों आ गया दुश्मन की तरह मत लो इनको, लोह आया मोह आया बह।
- 5:13ईर्ष्या द्वेषहाई जीसको भी तुम विकार कहते हो?
- 5:22अहंकार आया उसको स्वीकार कर लो। अस्वीकार करने की भावना को फरीद
- 5:30कहते हैं। ये बेकार है तो आएँगे जिंदा हो तो
- 5:39आएँगे काम क्रोध लोह मो। अहंकार भ।
- 5:46ईर्ष्या देश सब आयें, गलानी भी आएगी, प्रायश्चित भी आएगा।
- 5:52अब करें क्या? अद्भुत सूत्र हैं ध्यान से समझना
- 6:04ऐसा बहुत कम ऋषियों ने कहा जैसा प्रीत ने कहा।
- 6:10फरीद इस मसले में लाजवाब है। बिल्कुल नए आयाम की बात बताते
- 6:17हैं। आपको ऋषि कहते हैं काम विकार है,
- 6:28क्रोध विकार है। लोभ मोह अंकार विकार है, भय विकार
- 6:34है, लेकिन फरीद कहते हैं ये आएँगे, जब तक जिंदा हो तब तक
- 6:46आएँगे, फिर क्या करें? स्वीकार कर अब यहाँ समझना बात को
- 6:58तुम स्वीकार करने का अर्थ भोगना गिनते हो।
- 7:06फरीद कहते हैं, स्वीकार करने का मतलब भोगना नहीं है, एक्सेप्ट
- 7:13करना है के जे आएँगे जिंदा हूँ तो आएँगे मर गया तो नहीं आएँगे
- 7:21मुर्दे को अब आता है विकास। कोई भी बेकार नहीं आता, भय भी
- 7:25नहीं होता, आग में जला देते हैं, भय लगता है उसे फर्ज कहता आएँगे।
- 7:40स्वाभाविक हैं इट्स नेचुरल प्रोसेसेस।
- 7:44ये शभावी का प्रक्रिया है। इनसे जागर मत, इनसे लड़ मत
- 7:50परमात्मा की देन है। कोई भी ऊर्जा तुम्हारी देन नहीं
- 7:56है, ये बात समझ लेना कोई भी ऊर्जा तुमने पैदा नहीं किया।
- 8:01कोई भी ऊर्जा शरीर ने पैदा की और ऊर्जा शरीर ने पैदा की भोजन के
- 8:06द्वारा और भोजन दिया गया परमात्मा के द्वारा इट्स नेचुरल प्रोसेसेस।
- 8:24दिस विल कम, बट यू विल हैव टु एक्सेप्ट इट ये आयेंगे लेकिन
- 8:32तुमने झगड़ना लिया है तुम इन्हें स्वीकार कर लो, अद्भुत सूत्र देते
- 8:39हैं। स्वीकार करने से क्या होगा?
- 8:47स्वीकार करना भोगना नहीं होता, स्वीकार करना, लड़ना भी नहीं होता
- 8:59स्वीकार करना होता है तुम यथास्थिति बने रहो।
- 9:03जैसे हो जहाँ हो तुम तो झगड़े नहीं निकल पड़ते हो, तुम तो भगाने
- 9:11निकल पड़ते हो ये कहाँ से आ गए दुष्ट सोए हुए थे चैन से ओढ़े हुए
- 9:18कफन। जहाँ भी सताने आ गए किसने पता बता
- 9:23दिया फ्रीज़ कहते हैं यह प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं।
- 9:32आएंगी किसको नहीं आती सभी को आती हैं।
- 9:41लेकिन तुमने स्वीकार कर लेना है कैसे स्वीकार करना है यह अल्लाह
- 9:46की देन है अब आगे आगे समझना आगे आगे चीजें बड़ी सरल करूँगा मैं।
- 9:58लगेंगी। आपको असहज होगी वो सरल, सहज फरीदा
- 10:09सुख दुख एक कर सुख भी आएगा, दुख भी आएगा।
- 10:14इनको स्वीकार कर लें ये आएँगे, आते भी हैं तुम्हारे झगड़ा करने
- 10:20से इन्होंने कब आना बंद किया? ये आते ही रहे हैं, आते ही रहेंगे
- 10:28सुख भी आएँगे दुख भी आएँगे यह प्रकृति का।
- 10:33शरीर का मनुष्य का स्वभाग है, किसी ने तुम्हारी पूंछ मरोड़ दी।
- 10:41दर्द होगा किसी ने तुम्हें गाली निकाल दी, मन व्यथित होगा।
- 10:50ये सवागत है। लेकिन फरीद तीसरी बात कहते हैं,
- 10:56जो गाली निकाल गया, निकाल जाए, किसी ने पूछ उम्र उड़ दी, दर्द हो
- 11:00गया, हो गया, तुमने प्रतिक्रिया नहीं करनी, तुने स्वीकार कर लेना
- 11:10ये ऐसा ही है। स्वीकार करना भोगना नहीं होता
- 11:23स्वीकार करना सच में देखना होता है बात वहीं टक जाती है जाके
- 11:35आँखें मूँद के मत बैठे रहो। आँखें मूँद कर बैठे रहोगे तो
- 11:38झगड़ा करोगे या भोगोगे या भगाओगे दोनों में से एक काम करोगे या तो
- 11:50उसके पीछे लग जाओगे, इन्द्रियों से भोगोगे।
- 11:55या उनको भगाओगे अपने मन से निकल बाहर तू कैसे आ गया?
- 12:01दरवाजे बंद हैं फरीदा सुख दुख एक कर सुख आए दुख एक ही सूत्र देते
- 12:12हैं। मैं विस्तार कर रहा हूँ सिर्फ।
- 12:18फ्रीद कहते हैं, सुखाये दुखाये तुम स्वीकार कर लो क्या समझ के
- 12:23स्वीकार कर लो, यह अकेले फिक्र में आएगा मन से लाहविकार।
- 12:32विकार भी आएँगे, सुख भी आएँगे, दुख भी आएँगे, विकार भी आएँगे।
- 12:37सब आएँगे अगर जीवंत हो तो सब आएँगे।
- 12:41जब वो मर गए तो कुछ भी नहीं आएगा। आज की वीडियो छोटी करूँगा।
- 12:55बड़े कमेंट आए हैं बाबा वीडियो बड़ी मत किया करो, एक तो देखे ही
- 12:59नहीं जाते, दूसरे आप लगातार कमज़ोर हो रहे हो, इतनी लम्बी
- 13:07वीडियो मत बनाया करो, ठीक तो मैं शॉट कर दूंगा।
- 13:15शार्ट में भी बात समझाई जा सकती है।
- 13:19सूत्रों में भी बात समझाई जा सकती है, बशर्ते तुम समझने के योग्य हो
- 13:24जाओ। मुझे तो बात समझाने का प्रयोजन है
- 13:31वो मेरा हाल हो जाए। थोड़े शब्दों से हो जाए तो बहुत
- 13:35अच्छा है तो आज थोड़े शब्दों से समझाने की चेष्टा करूँगा।
- 13:41आप मुझे कमेंट में बताना कि आपको थोड़े शब्दों में समझ आया तो छोटी
- 13:49बना दिया करूँगा। मुझे क्या है?
- 13:56और कमजोर तो मैं नहीं हो रहा हूँ कमजोर मेरा शरीर हो रहा है वो
- 14:03मैंने दूध फिर तीन बार कर दिया। फरीदा सुख दुख एक कर सुख आये, दुख
- 14:18आये मन से लाह विकार विकार भी आये।
- 14:23कुछ भी आये तू उसे स्वीकार कर ले। क्या समझ के प्रभु की दात समझ के
- 14:35अगर सच में तुम देखो क्या जीस दिन तुम अपने अंतः समय उतरना शुरू हो
- 14:43गए गहरे और गहरे और गहरे। अतल गहराइयों में उतर गए उस दिन
- 14:52पाओगे सब प्रभु ने दिया था जो प्रभु ने दिया वो तुमने माना कि
- 15:02मैंने किया यहीं चूक हो गए? यही दुख का कारण है दिया प्रभु ने
- 15:14माना तुमने ये कि मैंने किया इसलिए तुम दुखी हो सब वह करता है,
- 15:25मानते हो तुम? के मैं करता हूँ बुनियादी जड़ यह
- 15:30है बहुत गहरे में देखोगे, फिर सुनिए, मेरी बात को बहुत गहरे में
- 15:37देखोगे, अपने ही भीतर उतर के अतल गहराइयों में देखोगे तो पाओगे?
- 15:46तुमने आज तक कुछ नहीं किया तुमने सिर्फ देखा वह देखा जो हुआ यू आर
- 16:01अंडर सर्कमस्टैंसेस यू आर ऑल एक्शन्स आर अंडर सर्कमस्टैंसेस
- 16:08तुम्हें पता नहीं चलता? कुछ अज्ञात कारण होते हैं कुछ
- 16:12अज्ञात कारण होते हैं। तुम्हें उन लहरों का नहीं पता जो
- 16:17एक्स रेज की तरह तुम्हारे भीतर से गुजर जाती है और तुम्हें पता भी
- 16:22नहीं चलता, लेकिन। क्या करें आज का मानव यह समझना
- 16:37शुरू हो गया है कि जो दिखता है या जो समझ में आता है बस वो ही ठीक
- 16:46है जबकि वो ही ठीक नहीं होता। बहुत सी चीजें ऐसी हैं जो दिखते
- 16:51नहीं एक्स रे कि करने से दिखाई पड़े बहुत सी चीजें महसूस होती
- 17:02हैं, दिखती नहीं दुख और दर्द कहाँ दिखता है, शोक और धैर्य कहाँ
- 17:08दिखता है? मामूली मामूली भावनाएँ तुम्हें
- 17:12नहीं दिखती? प्रेम से भरा हुआ मन, इसमें प्रेम
- 17:18कहाँ है? दिखा सकोगे निकालकर जो अति
- 17:25सूक्ष्म है वो तुम्हें दिखता भी नहीं।
- 17:27वो सिर्फ अनुभव होता है। और वह समझ में भी नहीं आता, लेकिन
- 17:35तुमने एक धारणा बना ली। ये जीतने सर लोग हैं, मैंने सुनता
- 17:40नहीं। अक्सर मुझे पता है ये दो ही बातों
- 17:45का जिक्र करेंगे। एक जो दिखता है और एक जो समझ में
- 17:51आता है इनके पास दो ही यंत्र हैं देखने की आँखें और समझने की
- 17:56बुद्धि, लेकिन ये मूर्ख है मूर्ख, इसलिए कहता हूँ मैं।
- 18:07जो दिखता है और जो समझ में आता है, सृष्टि इतनी ही नहीं है।
- 18:18सृष्टि से बहुत विराट है, जो दिखता है और जो समझ में आता है वह
- 18:251% का। असंख्यमा हिस्सा है, 1% भी नहीं
- 18:34जीस पर तुम विश्वास कर लेते हो जो ये सर लोग बोलते हैं, इसलिए मैं
- 18:41कह देता हूँ गद्दियाँ चाहने ख्याति चाहिए।
- 18:47ज्ञान चाहिए, खोपड़ी भर लो और खोपड़ी भरो ऐसे सर के पास जाओ
- 18:55जिनकी कीर्ति दिव्य हो विकास से ज़रा भी ना हो इन मूड लोगों के
- 19:07पास। चेतना का विकास नहीं होता।
- 19:13कीर्ति दिव्य होती कहानी आपको सुनाएंगे, तुम्हें लगेगा समझा और
- 19:22क्या हाँ हूँ? हाँ हाँ हूँ, हूँ भी करोगे।
- 19:30क्योंकि बातें ही मजेदार करेगा लेकिन पता ही नहीं कुछ नहीं।
- 19:41अब देखिए ये कितना समझा पातें हैं आपको?
- 19:45तुम देख लेना किसी भी सड़क को सुन लेना, जो बुद्धि ने समझा और जो
- 19:52आँखों ने देखा जो तुम्हारी समझ में आया वो समझ में बुद्धि के
- 19:57द्वारा आया या आँखों को देखने से आया या इंद्रियों के द्वारा आया।
- 20:03बस उसी का वर्णन हो सकता है और उसी का वर्णन ये लोग करते हैं उसे
- 20:11पार नहीं, लेकिन फरीद जानते हैं कि इसे पार उस अखंड की धारा।
- 20:25बड़ी बराट है, जिसकी गणना भी नहीं हो सकती।
- 20:32असंख्य है अशंकना असंखथा बाबा कहते हैं गणित नहीं हो सकती।
- 20:49छोटी छोटी बातें तुम दिमाग में भर लेते हो और तुम ये भ्रम पाल लेते
- 20:59हो कि हमने सब जान लिया और सब जान लिया तो इसका मतलब साफ है।
- 21:07के और जानना बाकी है नहीं और अगर और जानना बाकी नहीं है तो फिर
- 21:21तुम्हारा मन क्यों चलता है? क्या ढूंढता है तुम्हारा मन?
- 21:29चौबीसों घंटे यह चलता क्यों है? है अगर और कुछ नहीं चाहिए।
- 21:38तुम्हें मिल गया सब कुछ तो यह मन क्या ढूंढता है?
- 21:50वह मन जो ढूंढता है वह इन सब लोगों से नहीं मिलेगा।
- 21:57क्योंकि ये सर लोग अपना टाइम टेबल बनाएंगे, किसी से पूछ लो।
- 22:0224 घंटे 25 तो होते भी नहीं, दिन में ही 24 घंटे और चौबीसों घंटों
- 22:11का इनके पास पूरा टाइम टेबल। ये नॉन बीज़ी कभी भी नहीं होते।
- 22:21इनका सब निर्धारित है। दे अरे बाउंडेड विथ टाइम इन टाइम।
- 22:32और वह समय से बाहर है समय की पर्दी से बाहर है जीसको तुम आनंद
- 22:39कहते हो और उसकी जरूरत इनको भी है, तुम्हें भी है तो तुम इनसे
- 22:50ज्ञान ले लेना। पेट भरने के लिए शान शोकत के लिए
- 22:55गद्दियाँ पाने के लिए सारे फॉर्मूले इनके पास हैं।
- 23:03बता देंगे, लेकिन कहीं भूल के भी आनंद पाने की।
- 23:12चेष्टा इनसे मत करिएगा। मैंने पहले भी एक प्रवचन में कहा
- 23:16था, जीस दिन अजामिल की कथा ये सारे लोग सुनाने लग गए।
- 23:25उस दिन कहर हो जाएगा क्यों? अजामिल की कथा आध्यात्मिक कथा है
- 23:34ये तोलेंगे उसको दिमाग से ये तोलेंगे उसको जैसा आँखों से देखा
- 23:41लेकिन दोनों चीजों से बाहर की चीज़ है अजामिल और कभी।
- 23:49बात करूँगा मैं उस पे जो समझ में आता है और जो दिखता है बस उसी का
- 24:02बखान हो सकता है एक बात को समझ लेना उसके बार का बखान तो हो ही
- 24:07नहीं सकता। उसके पार का होता है अनुभव छोटी
- 24:13छोटी बातों को जो अनुभव की होती हैं, उसे आप व्याख्यायित नहीं कर
- 24:18सकते। शब्दों में अनेबल टु एक्सप्रेस।
- 24:41फरीदा सुख दुख एकर सुखाय दुखय मन से लाह विकार कामय, रोधाय, लोभाय,
- 24:55मो। अंकार व ईर्षकविष।
- 24:59जो आए प्राकृतिक है, किसी कारण से आया होगा।
- 25:11अकारण नहीं आता अकारण तो एक ही चीज़ आया करती है, वो तुम्हें बता
- 25:18देता। बाकी सभी चीजें कारण से आती हैं।
- 25:25अकारण आती है एक ही चीज़ जैसे तुम ढूंढ रहे हो बस उसी की तमन्ना है
- 25:34तुम्हें। उसी के लिए तुम मरते हो और उसी के
- 25:40लिए तुम जीते हो मेरी है तमन्ना तेरे घर के सामने।
- 25:56मेरी जान जाए मेरी जान जाए हाय मेरी है तमन्ना तेरे घर के सामने।
- 26:16मेरी जान जाए, मेरी जान जाए किसी भी चीज़ के लिए तुम जान न्योछावर
- 26:29नहीं कर सकते। समझ लेना ये बात समझने जैसी है।
- 26:35कुछ सीखने के लिए तुम जान नहीं सावर नहीं कर सकते कुछ इकट्ठा
- 26:42करने के लिए तुम जान नहीं सावर नहीं कर सकते, जान को सदा बचाए
- 26:47रखोगे और पदार्थ को इकट्ठा करना और गदियों को इकट्ठा करना।
- 26:55वो ज्ञान को इकट्ठा करना, सम्मान को इकट्ठा करना, तुम जान को
- 27:00कुर्बान नहीं कर सकोगे लेकिन एक चीज़ के लिए तुम जान को कुर्बान
- 27:05कर दोगे। क्या है वो चीज़ जीसको तुम आनंद
- 27:11कहते हो? जिसके लिए परवाना क्षमा में जल के
- 27:17बस में भूत हो जाता है उसे संत कहते हैं आनंद हाँ उसे प्रेमी
- 27:27कहते हैं प्रेम फकीर कहते हैं इश्क हकीकी।
- 27:39उसके लिए तुम जान भी परवान कर सकते हो और फरीद यही कहते हैं।
- 27:44कबीर भी यही कहते हैं। बाकी चीजों की तमन्ना तो बुद्धि न
- 27:51डालो। कोई न कोई हल मिल जाएगा।
- 27:59लेकिन एक चीज़ ऐसी और उसी की तमन्ना है तुम्हें, जो बुद्धि
- 28:04लड़ने से नहीं मिलता। कैसे मिलता है बुद्धि छोड़ने से
- 28:08मिलता है? तुम तो हर चीज़ बुद्धि में भर
- 28:12लेना चाहते हो फिर क्या करें फिर आनंद कभी नहीं पाओगे, बस यही
- 28:21पुरस्कार है प्रकृति का तुम्हारे लिए।
- 28:26अगर तुम बुद्धि उसके चरणों में सौंप देते हो सर्पधर्माण पर तज्ञ
- 28:30मामी का शरणम वृक्ष अहम् तुम सर्व का भेभो मोक्ष श्यामि माँ सुचा
- 28:37मैं तुम्हें सभी दुखों से मुक्त कर दूंगा।
- 28:42बुद्धि को छोड़ने का साहस है जिसमें नहीं।
- 28:45समर्पण करने की चाहत जिसमे नहीं समर्पण करने की तीव्र भावना भीतर
- 28:51से जिसके नहीं आई, वह उस आनंद की कल्पना भी न कर रहा है।
- 29:06और फिर ये जो तुम मैसेजस करते हो मेरे पास करीब करीब सभी मैसेजस
- 29:14उनके भीतर एक ही चीज़ होती है वो क्या होती है तुम इस मीठे शहद को
- 29:24पाना चाहते हो? तुम्हारी आत्मा की चीख पुकार
- 29:32चीतकार करती है तुम्हारी आत्मा मुझे आनंद चाहिए, लेकिन दब जाती
- 29:41है बुद्धि तक आते आते। तुम उसे ढाल लेते हो, पैसा चाहिए
- 29:47होगा, जैसे बच्चा रोता है, तुम समझते तो हो भूखा होगा।
- 29:55दूध पीला देते हो, वह नहीं पीता, उल्टी कर देता है, फिर तुम कहते
- 30:00हो पेट दुखता होगा। लेकिन फिर रोता रहता है।
- 30:081000 कोशिशों करते हो, तुम जायफल रगड़ के दे देते हो, बुखार चेक
- 30:13करते हो लेकिन वो रोने से हटता नहीं, तुम्हारी समझ से बाहर हो
- 30:19जाता है। बता वो सकता नहीं, समझो तुम्हें
- 30:26आता नहीं है आत्मचित कार करती है और तुम्हें समझ नहीं आता तुम
- 30:36सोचते हो धन मांगती हो क्या? पदवी मांगते होंगे, मान सम्मान
- 30:43मांगती होगी, ज्ञान मांगती होगी, खोपड़ी को भर लूँ और सभी लोग
- 30:49खोपड़ी को भरे पड़ते हैं। सब मेरे से 23 तर्रार हैं।
- 30:53सब ऊंची गद्दीयों पर बैठे हैं, सब के पास प्रचुर मात्रा में धन है।
- 30:57सभी लैंड लोड्स हैं, लेकिन नहीं तुम गलती में हो आत्मचित कार्य
- 31:05करती है, उस चीज़ के लिए जो अकारण आता है, पदार्थ उसका कारण नहीं
- 31:14होता। लेकिन तुम पदार्थ को कमाने निकल
- 31:18जाते हो, वह आता है, अकारण बिना किसी कारण के आता है।
- 31:24इसे समझ न पाओगे, लेकिन इशारा काफी है।
- 31:28जो इशारा जिसने पकड़ लिया वह समझ जाएगा।
- 31:39ये मन तुम कहते हो भटकता है, बोलता है, रात को भी बोलता रहता
- 31:43है, सपने में बोलता है, दिन में बोलता लेट जाते तो बोलता खाना
- 31:48खाते तो बोलता चलते फिरते तो बोलता है ये रुकता नहीं।
- 32:00कारण क्या है? कुछ ढूंढता है और तब तक यह
- 32:09चिल्लाता रहेगा जब तक यह उसे मिलेगा नहीं जिसे वो ढूंढ रहा है।
- 32:16चिल्लाना बंद तब करेगा। जब उसे वो मिल जायेगा, जो ये
- 32:21मांगता है उसे तृप्ति कहते हैं जब आवह संतुक धन सब धनथूड़ समान, फिर
- 32:33ये चुप हो जायेगा जैसे प्यासे को प्यास लगी, पानी मिल गया।
- 32:37भूखे को भूख लगी, खाना मिल गया, तर्क तो हो गया फिर वह चलाएगा
- 32:44नहीं। भूकंप प्यासा नहीं कहेगा, संत के
- 32:51पास तब जाना जब तुम समझ जाओ। पदार्थों से भूख मिट्ठी में फिर
- 33:01निश्चित ही उसकी भूख होगी जिसकी तरफ मैं इशारा करता हूँ, इसलिए
- 33:08मैं पहले सर लोगों के पास भेजता हूँ तुम्हें वहाँ जाओ भूख मिट्ठी।
- 33:16तो ठीक नहीं मटी तो संत का दरवाजा खटखटा लेना और मैं पक्का कहता हूँ
- 33:23कि मटेगी नहीं, इन सर लोगों की नहीं मिटी, तुम्हारी क्या
- 33:26मिटाएंगे? दिल ढूंढता ही रहेगा दिल ढूंढता।
- 33:41हे हे फिर वही फुरसत के रात दिन दिल ढूँढता हे फिर वही फुरसत के।
- 33:59रात दिन बैठे रहे तस बुरे जाना किए हुए दिल ढूंढता है फिर वही।
- 34:19फुर्सत के रात दिन फुर्सत के रात फुर्सत में मिलता है वह और
- 34:30तुम्हें आज डॉक्टर भी समझाते हैं, अकेले मत बैठो।
- 34:38अपने आप को बीज़ी रखो, इसलिए तुम दुखी हो।
- 34:47ये पढ़ाने वाले सर लोग भी तुम्हें बीज़ी रखते हैं, इतना सा सिलेबस
- 34:53दे देते हैं कि तुम? सोने तक को मोहताज हो जाता है जो
- 35:01नेचुरल प्रोसेसर है। जब नॉन बिज़नेस के लम्हे तुम कैसे
- 35:11पैदा करोगे, फुर्सत के लम्हे कैसे पैदा करोगे?
- 35:16और वह मिलता है फुर्सत के लम्हों में और जब तुम बड़ी नौकरी पे चले
- 35:25गए, बड़ी पद भी आ गई, समृद्धि मिल गई, सब मिल गया जो चाहा था।
- 35:36लेकिन तुम पाओ के भीतर झांकोगे खाली के खाली रह गए सोने के सोने
- 35:41रह गए। अगर तुम्हें ऐसा लगे तो संत का
- 35:49दरवाजा खटखटा लेना और ऐसा लगेगा। तुम जजू बन जाओ, सुप्रीम के जजू
- 35:58बन जाओ, तुम सीएम पीएम की गद्दी ले लो, लेकिन आखिर में क्या होगा?
- 36:12ये जो दो बार चार बार पांच बार पीएम सीएम बन के कहते हैं एक बार
- 36:19मतलब तृप्ति नहीं हुई। साफ बात है तृप्ति नहीं हुई तो एक
- 36:26बार फिर झूठा उठा लिया। अब के फिर वोट डालता हूँ।
- 36:33और सदा इनके हाथ में ठूठा ही रहेगा।
- 36:38ये ठूठे को कभी फेंकना इनके लिए मुश्किल है क्यों?
- 36:45क्योंकि ये नॉन बिज़नेस में कभी आएँगे नहीं।
- 36:49अब के चुनाव जीत लिया, जीत लिया ये तो हो गया, अब अगला कैसे
- 36:55जीतेंगे? उसमें खो जाएंगे।
- 37:00यह कभी ये व्यस्त नहीं होते और वह मिलता है अव्यवस्था में।
- 37:09व्यस्तता में वो कभी मिलता नहीं। मुझे परमात्मा रोज़ कहता है ये जो
- 37:16मुझे ढूंढ रहे हैं, मैं रोज़ इनके द्वार खड़ता हूँ लेकिन पाता हूँ
- 37:22दे आर बीज़ी। बाहर पट्टिका लिखी होती है।
- 37:27हम व्यस्त हैं। कृपया छेड़छाड़ ना करें तो मैं
- 37:33वापस चला जाता हूँ, परमात्मा ठीक कहता है, वह तो आता है।
- 37:44उसके तो तुम बच्चे हो, उसे तो तुम्हारी बड़ी फिक्र है उसका लाल
- 37:54गुम हो गया है उसके बच्चे बच्चियां गुम हो गई हैं वो
- 37:58तुम्हारे द्वार पे आता खट खटाता लेकिन यू अरे?
- 38:06इन अप्स सी इन आई ए एस इन जजमैंट्स इन डिस्कस्शन्स यू आर
- 38:16बिज़ी? परमात्मा कहता, मैं वापस लौट जाता
- 38:22हूँ और करीबी का पिक्चर है, इतना हिंसक नहीं के दरवाजा तोड़ दे
- 38:32बड़ा अहिंसक है नॉन वायलेंट। चला जाता है वापस द्वार जरूर खट
- 38:46खटाता है तुम्हारा तुम सुनता नहीं तुम इतने व्यस्त हो तुम कहते हैं
- 38:54छेड़ो मत मुझे। अभी मैंने एग्ज़ैम में बैठ रहा
- 38:58है, अभी मैंने कॉम्पिटिशन लढ़ना है, फिर तुम ढूंढ़ते हो परमात्मा
- 39:09को, चैन को, आनंद को, खुशी को सच्ची खुशी को मिलेंगे भी कैसे?
- 39:19जब वो द्वार पे रो जाता और तुम अपने आपको व्यस्त रखते और अव्यस्त
- 39:24तुम हुए नहीं कभी एक बार अव्यस्त हो के देखो दिल ढूंढता है फिर वही
- 39:34फुर्सत के रात दिन। बैठे रहे हैं तो सबरे जान किए हुए
- 39:40हैं। बस देखते रहे प्यार के लहों में
- 39:45तेरी आँखों में झाँका तेरी आँखों के सिवा धुनिया।
- 39:58रखा क्या है तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है?
- 40:11ये उठे सुहा, चले। ये झुके शाम ढले मेरा जीव, न मेरा
- 40:26मरना फलकों के तले ये उठती हैं तो सभा होती है।
- 40:38ये झोकती हैं तो शाम होती है ये उठे सुबह चले ये झोके शाम ढले ये
- 40:53झोकती हैं तो शाम ढट जाती है। मेरा जीना मेरा मरना इन्हीं पलकों
- 41:04के तले इन पलकों के तले तेरी आँखों के सिवा दुनिया में।
- 41:14रखा क्या है और रखा भी क्या है जब तुम थक जाओ, चारों तरफ़ से घोर
- 41:24निराशा, अंधकार अमावस्या की रात और बादल घनेरा चारों तरफ़ दुखड़े।
- 41:34तुम कितने भी बड़े हो, कितने भी बड़े गद्दी निशी हो, कितने
- 41:41न्यूरोन जो तुमने सूचनाओं से भर लिए हैं सभी पर ये बेला तो आता ही
- 41:48है तो फिर एक काम करना। फिर उसके दरवाजे पे दस्तक देना है
- 41:58आज तक वो तुम्हारे दरवाजे पे दस्तक देता है तुम व्यस्त थे जब
- 42:07तुम्हारे ऊपर गनेरे बादल छा जाएं। तो तुम उसके द्वार पे दस्तक दे
- 42:11देना वह खोल देगा और तुम्हारा मसला हल हो जाएगा।
- 42:26फरीदा सुख दुख एक कर मन से लाहविकार।
- 42:33सुख आये, दुख आये, कोई भी विकार आये उसको स्वीकार कर लो, जे
- 42:38आयेंगे दे आर नैचुरल शरीर है तो जे आयेंगे, मर गए तो कोई नहीं
- 42:46आएगा, आगे चलें। वक्त थोड़ा रह के आये अल्लाह पावे
- 43:02सो पला ये तुम्हारी इच्छा से नहीं आये।
- 43:07फरीद कहते हैं ये उसकी इच्छा से आये, तुम्हारी इच्छा से कुछ हुआ
- 43:12भी नहीं तुम अपने आपको मूर्ख बनाने में।
- 43:20बड़े माहिर हो तुमने खुद को ही मूर्ख बना दिया जानबूझकर मूर्ख
- 43:28यानी तुम दुखी हो सयाना तो वो होता है जो कभी दुखी नहीं हुआ।
- 43:35जो सुखी हो गया, जो शांत हो गया, जो आनंदित हो गया।
- 43:38जो नाचने लग गया वो वो सयाना जो गाने लग गया मस्त भाव से जो मेरा
- 43:46की तरह नाचने लग गया, पद गोखुर बांध वही सयाना, तुमने अपने आप को
- 43:53मूर्ख जानबूझकर बना दिया। तुम ही हो कारण इसके अला पा वे सो
- 44:00पला, यह अल्लाह की दात है सुख दुख काम क्रोध लो मो अहंकार भै मद
- 44:11मत्सर ईर्षदुवेश। ये सब उसकी दांत है, इनको स्वीकार
- 44:16कर लो, इनके साथ एकाकार मत हो। ना झगड़ो ना एकाकार हो, ना भगाओ
- 44:26ना अपनाओ ये बात को समझ लेना चूक सकते हो तुम?
- 44:32फिसल सकते हो, बड़ी फिसलन भरी हैरान या तो तुम चिपक जाते हो
- 44:40इन्हें भोग लेते हो या तुम इन्हें दुश्मन की तरह घसीटते हो बाहर
- 44:46निकलो। यहाँ तुम्हारा क्या काम है?
- 44:51ये दोनों ही नहीं करना फ्रीज़ कहते एक्सेप्ट कर लेना, झगड़ा
- 44:56नहीं करना, ये आएँगे इनको आने देना, बस इनसे एकाकार मत होना और
- 45:04इनसे झगड़ा भी मत करना, ये दोनों चीजों से बच सकोगे।
- 45:10अगर बच सकोगे तो प्रेत कहते हैं ता लग गए दरबार तो दरबार मिल
- 45:16जाएगा तुम्हें जीस अखंड खुशी की तलाश में तुम दर दर भटक रहे थे आज
- 45:21तारक और तुम्हें मिली नहीं थी सब कमाया आनंद न आया।
- 45:32अल्लाह पा वे सोपला इन सब को आने देना, उसकी नियामत समझ के अल्लाह
- 45:40पा वे सोपला वो अच्छा ही भेजेगा यह मालिक है, तुम्हारा पिता है।
- 45:48पिता कभी बुरा सोच सकता है अपने पुत्र, पुत्रियों का?
- 45:52वह किसी जीव तक का बुरा नहीं सोच सकता।
- 45:55वह सदा भला ही सोचता है। यही लव से कहते हैं, वह जो अच्छा
- 45:59करता है, भले के लिए करता है, वह जो करता है।
- 46:09अच्छा करता है और भले के लिए करता है अल्लाह पाबे सोपला ता लम्बे
- 46:16दरबार सरल भाषा में मैंने अर्थ कर दिया वक्त बड़ा कम लिया।
- 46:28फिर भी पौन घंटा हो गया। फरीदा सुख दुख एककर मन से लहविका
- 46:38फ्रीद कहते हैं सुख को भी अपना ले आने दे।
- 46:41दुख को भी अपना ले कुंती ने तो मांग ही लिया कि दुख दे दे प्रभु
- 46:50काम क्रोध लोग अंकार जे अल्लाह की देन हैं आएँगे जिसने शरीर दिया
- 46:56बेकार तो आएँगे भाई। तुम कहो विकार मुक्त जीवन चाहिए
- 47:02तो तुम मुर्ख हो, फिर तो मेरी जा जा रही चौके समझ रहे तो विकार
- 47:13नहीं आएँगे। अल्लाह पावे सोपला ये उसकी दांत
- 47:26हैं और वैसे तुम्हारी दांत तो कुछ है भी नहीं।
- 47:29तुम्हारा सिर्फ दावा है, तुम तो स्टेम्प लगा देते हो, मेड इन
- 47:33इंडिया और तुम्हारे पास कुछ है भी नहीं।
- 47:43ताज बेहतर तो मिलेंगे परम खुशी परम आनंद जो भीतर से पुकार उठ रही
- 47:55थी, जब पानी पानी, भूख भूख करा रही थी और तुम्हें चैन नहीं आ रहा
- 48:02था। जब बच्चा रोए ही चला जा रहा था और
- 48:06तुम्हें पता नहीं था इसका क्या दुख रहा है?
- 48:11प्रियता सुख दुख एक कर मन से लह विकार सुख भी आएँगे, दुख भी
- 48:18आएँगे। सारे विकार भी आएँगे।
- 48:23इनको उतर जाने दे, इनको स्वीकार कर ले ना अपना ना दुतकार ये दोनों
- 48:32शब्द समझने योग्य हैं। लड़ोगे तो फंसोगे एक्सेप्ट करोगे
- 48:39तो फसोगे भोगोगे फिर? तो क्या करो, इन्हें आने दो,
- 48:46स्वीकार कर लो, स्वीकार करने से भोगना नहीं पड़ेगा तुम्हें ध्यान
- 48:50रखना ये मेरा सूत्र याद रख लेना, ये फरीद ने दिया स्वीकार कर लो ये
- 48:58आएँगे भाई। स्वीकार करो, इनके पीछे मत लगो,
- 49:04भोगो मत इन्हें दुग्ध करो भी मत, क्यों अपनी शक्ति वह करनी ये
- 49:09तुम्हारी ही शक्ति है अल्लाह की शक्ति है अल्लाह की शक्ति से
- 49:14अल्लाह की शक्ति को बढ़ाओगे। नहीं, गदर, मचाओगे रलक क्षेत्र
- 49:21बनाओगे? शरीर को इस दिमाग को नहीं नहीं,
- 49:25फरीद कहते हैं, लड़ो मत, स्वीकार करो, भोगो मत और लड़ो मत, स्वीकार
- 49:34करो अल्लाह पा वे सो पला। जो उसने दे दिया भला है शंकर विश
- 49:47भी लेते हैं अल्लाह पावै सो भला त लम्बे दरबार जीस।
- 49:54खुशी की तलाश में तुम जन्मो जन्मो से फिर रहे थे, और चूक रहे थे उस
- 50:00आनंद को। इस फॉर्मूलेशन से आपको मिल जाएगा
- 50:05इट्स ए अल्टीमेट फर्मूलेशन ऑफ आनंदा वह आनंद होता क्या है अभी
- 50:11तो तुम्हें पता भी नहीं, तुम तो कहते होते ही नहीं जैसे मार्क्स
- 50:15कहते हैं परमात्मा नहीं होता, कर्म का विधान लेखा जोखा नहीं
- 50:21होता। चार भाग कह देते हैं।
- 50:23नीच से कहते हैं वो था तो लेकिन मर गया, मैंने दफन कर दिया।
- 50:28आचार्य कहते हैं लाइटर मेंट नहीं होता और तुम्हारे सर कहते हैं
- 50:34आनंद नहीं होता, होता ही नहीं, तुम खाओ, पीओ, मौज करो।
- 50:41गद्दी नशीं हो जाओ बड़ी बड़ी डिग्रीज़ ले लो कॉम्पिटिशन ले लो
- 50:46मौज करो धन कमाओ परचूरसा अच्छी सी कार गाडी ले लो हेलिकॉप्टर ले लो
- 50:52जहाज़ ले लो बस तुम सुखी हो जाओगे लेकिन नहीं सुखी नहीं होगे फरीद
- 50:59कहते है तुम सुखी नहीं हो। फिर भी तुम्हारे भीतर कोई चीज़
- 51:05तुम्हें सताती रहेंगी, अभी भी तुम्हें कुछ चाहिए, वो क्या
- 51:11चाहिए? वो कैसे मिलेगा, ये बताते हैं वह
- 51:14आनंद चाहिए, वो मिलेगा अल्लाह की दाद को स्वीकार कर के।
- 51:21वह जो देता है, मेरी तो यही मर्जी कर वो ही मेरी तो यही अर्जी कर,
- 51:28वो ही जो तेरी मर्जी है, तू वैसी ही नचा जैसे तू नचाना चाहती है,
- 51:35मेरा अपना कुछ नहीं है और है भी नहीं।
- 51:39जब तक तुमने समझा कि मेरा कुछ है, तब तक तुम हो और तुम्हारा होना ही
- 51:45दुख है। तुम्हारा होना दुख का कारण है।
- 51:51जीस दिन तुने जान लिया कि मेरा कुछ नहीं तेरा तुझ को अर्पण प्यार
- 51:58लाके मोरा। उस दिन न तुम रहोगे, न तुम्हारा
- 52:03रहेगा, उस दिन जिसका है उसका ही रहेगा।
- 52:08अभी तक तुम्हें भ्रम है कि मेरा है, मैं सदा ही दो बातें कहा करता
- 52:17हूँ। दो तरह के लोग हैं एक कहते हैं
- 52:19प्रकृति स्वयंम है प्रकृति स्वयंम उत्पन्न हुई बुद्धि जैसे लोग और
- 52:24एक कहते हैं प्रकृति स्वयं नहीं पैदा हुई, परमात्मा ने पैदा किया
- 52:27नानक जैसे लोग मैं कहता हूँ अगर दोनों में से दोनों भी सही हैं।
- 52:36तो एक बात तो सिद्ध होती है, अगर प्रकृति स्वयं से पैदा हुई तो
- 52:42प्रकृति का प्रत्येक अणु अपना स्वयं मालिक है।
- 52:46तुम मालिक नहीं और अगर प्रकृति परमात्मा ने पैदा की।
- 52:53तो प्रकृति का प्रत्येक अणु का मालिक परमात्मा है।
- 52:57तुम क्या लगते हो? दोनों ही स्थितियों में तुम मालिक
- 53:01नहीं हो सैब हम चाहे प्रकृति हो सैब हम चाहे परमात्मा हो,
- 53:09तुम्हारा कुछ नहीं है, जान। तुम तलाश में हो आनंद के और आनंद
- 53:16मिलेगा। फरीद कहते हैं, कैसे मिलेगा
- 53:22अल्लाह पावै सो पला जिसने तुम्हारे हृदय के भीतर उतर गया,
- 53:31अभी तो खोपड़ी में नहीं उतरता। अभी तो खोपड़ी का दिन नहीं ना
- 53:37इट्स ए रॉन्ग कॉन्सेप्ट इट्स ए बैड कॉन्सेप्ट यह थोड़ी ही होता
- 53:43है, हम भी तो हैं भाई तुम्हारा सिर्फ दाबा है, यह दाबा छोड़ जाए।
- 53:54तुम सुखी हो जाओगे। इस दावे के कारण तुम दुखी जीस दिन
- 53:59तुम्हारा कुछ न रहा उस दिन तुम सुख के स्वरूप हो जाओगे, तुम आनंद
- 54:05के सागर हो जाओगे। राधे राधे श्याम मिला दे गोविंदा
- 54:22गोपाल हरे राधे राधे। श्याम मिला दे गोविंदा गोपाल हर
- 54:38मेरी नैया पार लगा दे गोविंदा गोपाल हर।
- 54:50मेरी नैया पार लगा दे गोविंदा गोपाल हरे राधे राधे शाम मिला दे
- 55:07गोविंदा। गोपाल हरे ओह, धन्यवाद।