Latest / Baba ji Vijay Vats / 2 Feb 26 - बौद्धिक ज्ञान vs आत्म-अनुभव | असली समाधि क्या है? समय और 'मैं' का अंत
Transcript
- 0:05बाबा जी प्रणव आप सर लोगों के लिए और अचारों के लिए जो बात कहते
- 0:21हैं। इसको आप सरलतम ढंग से हमें समझा
- 0:29भी पाएंगे। बिलकुल ध्यान से समझना, जो एकांत
- 0:40में नहीं उतरा। जिसने एकांत में जाकर फुर्सत के
- 0:51लम्हों में जाकर उस एकांत के तल को टच नहीं किया, जहाँ सिर्फ तुम
- 0:59अकेले रह जाते हो, उसे एकांत कह लो।
- 1:04महावीर ने कैबल ले कहा, बुद्ध ने निर्वाण कहा कृष्ण ने
- 1:11प्रस्तिप्रज्ञ का जब तक कोई व्यक्ति एकांत में नहीं उतरता, तब
- 1:19तक वह उस स्थल के बारे में जान नहीं हो सकता।
- 1:25तो ये सर लोग या आचार्य लोग कभी एकांत में गए ही नहीं, कभी
- 1:32कॉम्पिटिशन लड़े, कभी पढ़े, कभी नौकरी की, आईएएस की कभी छोड़ दी,
- 1:40अध्ययन किया, फिर बोले। अष्टावकर पे बोले उपनिषद पे बोले
- 1:48इनका पढ़ना भी तो बहुत वक्त मांगता है, फिर गीता को पढ़ा फिर
- 1:55गीता पे बोले लेकिन एकांत में कर गए, मूल चूक गए।
- 2:04और जब मूल ही चूक गए, एकांत ही चूक गए तो एकांत के बारे में क्या
- 2:09खाक बोलेंगे? एकांत के बारे में बोल रहा हूँ,
- 2:16अध्यात्म के बारे में बोल रहा हूँ एकांत का मज़ा इन्होंने।
- 2:23तो एकांत के बारे में क्या बोलेंगे ये?
- 2:27इसलिए मैं कहता हूँ इन्हें सुन लेना अगर आपको अच्छे लगते है तो
- 2:35लेकिन तुम पहुँच के ही नहीं पाओगे, तुम उस अंतर तन पे नहीं
- 2:40पहुँच पाओगे। तुम उस टारगेट को नहीं पा सकोगे
- 2:44जो कि तुम्हारा ध्येय है, जो तुम्हारा लक्ष्य है और तुम्हारा
- 2:48लक्ष्य है हरस, हरस, रहस्य, आनंद, मदहोशी, खुशबू, पलक।
- 3:03जिसने एकांत में जाना नहीं सीखा या नहीं गया, मात्र बुद्धि से ही
- 3:11काट चाट कर कर पड़के व्याख्या करता रहा।
- 3:16इनके पास अबे का ब्लरी बहुत होता है।
- 3:20और वोकबुलरी के कारण वे किसी भी शब्द का शब्द तो है ही ना, शब्द
- 3:26तो उपनिषद में भी हैं। गीता में भी हैं अष्टावक्र गीता
- 3:30में भी शब्दों का संदिषेद और शब्दों का अर्थ शब्दार्थ।
- 3:40ये बड़े आसानी से कर सकते हो, प्रभावी ढंग से कर सकते हैं और आप
- 3:45इनको सुनकर संतुष्ट भी हो जाएंगे कि ठीक कहा उन्होंने आप संतुष्ट
- 3:53हो जाएंगे। इसका अर्थ ये है कि आपकी
- 3:56अंतरात्मा नहीं संतुष्ट होगी, आपकी खोपड़ी संतुष्ट होगी।
- 4:00क्योंकि आपकी खोपड़ी शब्दों से संतुष्ट होती है लेकिन आपका
- 4:05अंतसरस के बिना संतुष्ट नहीं होता।
- 4:10आपका हृदय भी प्रेम से संतुष्ट हो जाता है।
- 4:13खोपड़ी विचारों से संतुष्ट हो जाती है, खोपड़ी तर्क से संतुष्ट
- 4:18हो जाती है। और हृदय प्रेम से संतुष्ट हो जाता
- 4:22है। लेकिन क्या होगा अंतर स्थल का?
- 4:27जिसके बाद कृष्ण ने की। कबीर ने की, नानक ने की मीरा ने
- 4:31की, दादू ने की पलटू ने की उसका क्या होगा, इसे ही अध्यात्म कहते
- 4:38हैं। बाहर संतुष्ट हो गई खोपड़ी और तुम
- 4:44खोपड़ी को संतुष्ट करके घर वापस आ जाते हो।
- 4:50न रोग मिटता है, न दुख मिटता है, न दरिद्रय मिटता है, कुछ भी तो
- 4:56नहीं मिटता। सिर्फ पल भर के लिए खोपड़ी
- 5:00संतुष्ट हो जाती है और तुमने कहा वह क्या बात है, लेकिन इतने से सब
- 5:07कुछ नहीं हो जाता। बहुत कुछ बाकी रह जाता है।
- 5:12बहुत कुछ शेष ही छूट जाता है जो तुमने।
- 5:16अभी पाया नहीं जो उन्होंने अभी बोला नहीं और वो कभी बोल नहीं
- 5:21पाएंगे। बोल तो ही पाएंगे अगर वो छोड़ दे
- 5:25इस गोरखधंधे को और खुद अपने भीतर उतरे और स्थल पर पहुँचें।
- 5:30रस को पीएं और उस रस को बाहर ढले आप तक पहुंचे।
- 5:35अब तक उनकी आवाज में रस विभोर करने वाला वो रसों से लिप्त हुआ
- 5:41हुआ शब्द आए, वह आपको नहला देगा। तीर्थ सनानों से ही कहते हैं जी
- 5:51इनका टाइम टेबल बना होता है। समझे ना?
- 5:55टाइम टेबल बना होता है इतने बजे ये करना इतने बजे ये करना इतने
- 5:59बजे ये करना जब से विद्यार्थी होते है ना ये तब से इनके पास
- 6:03टाइम टेबल होता है उस टाइम टेबल के हिसाब से चलते है यानी इनके
- 6:09लिए समय प्रमुख है। और समाधि वहाँ जहाँ समय खत्म हो
- 6:14जाता है टाइम लेस्सनेस ईगो लेस्सनेस तुम स्वयं को खो देते
- 6:21हो, स्वयं का होना तो सदा बना रहता है, वह कभी खोता नहीं।
- 6:28लेकिन स्वयं का डुप्लीकेट होना, नकली नकली होना जो तुमने बनाया,
- 6:33जो प्रपंच तुमने रचा मैं कहा वो खत्म हो जाता है ईगोलेसनेस और
- 6:39टाइमलेसनेस समय शून्य ता मैं शून्य ता।
- 6:47ये दो ही चीजें होती हैं, लेकिन इनके पास समय भी है।
- 6:55इन्होंने टाइम टेबल के हिसाब से ही चले।
- 7:00इन्होंने देह की शून्यता कभी जानी नहीं।
- 7:02यद्यपि ये व्याख्यान कर रहे हैं। बस इसी बात को मैं बार बार कहना
- 7:07चाहता हूँ। जब जाना ही नहीं तो बोलेंगे क्या?
- 7:13जब गए ही नहीं तो बोलेंगे क्या? तुम बोलने से पहले जाना जरूरी
- 7:19होता है उस स्थल पर, फिर चाहे वो गीता को हो, फिर चाहे अष्टमक्र को
- 7:24हो, कबीर को हो। इनके आइकॉन कबीर है।
- 7:28लेकिन कबीर जीस स्थल पर पहुंचे। क्या ये उस स्थल पर पहुंचे नहीं
- 7:34पहुंचे? पर अगर नहीं पहुंचे तो इनका हक
- 7:37नहीं बनता। इनका जिम्मेदारी भी नहीं है।
- 7:42इनको बोलना भी नहीं चाहिए, लेकिन ये बोलते हैं।
- 7:45तो मैं फिर वही बात कहता हूँ, कोई ना कोई निहित स्वार्थ होगा निहित
- 7:52स्वार्थ के बिना बोला ही नहीं जाता।
- 7:58ये बोलेंगे और ऊपर आएगा संस्था के हाथ मजबूर करो, दान करो।
- 8:05संस्था के हाथ मजबूत करो, दान करो, दान करो, क्यों दान करें
- 8:09भाई? व्यक्ति की जरूरतें कितनी हैं?
- 8:15दान ही मांगते रहोगे, तुम बिखरे ही बने रहोगे शहंशाह।
- 8:24शहनशाही आलम बनो जहाँ जाकर दृढ़ता मिट जाती जहाँ जाकर तुम सम्राट हो
- 8:32जाते हो और ध्यान रखना प्रत्येक व्यक्ति सम्राट है, भीतर से
- 8:39सम्राट है बाहर से तुम कुछ भी बन जाओ।
- 8:44इसलिए इसको लीला कहा? बाहर से जो तुम बनते हो वो बनते
- 8:50हो होते नहीं और जो तुम्हारा बनना है वह गलत है।
- 8:56इमेजिनेशन है वह तुम्हारी कल्पना है।
- 9:02वह झूठी है। वास्तव में तुम सम्राट हो, ये तो
- 9:07एक ड्रामा है। ये तो एक लीला है जो तुम भिखारी
- 9:10होते हो, जो तुम जन्म के हो, जो तुम मरते हो, जो तुम वस्त्र बदलते
- 9:16हो, जो तुम इकट्ठा करते हो। जो सूचनाएं इकट्ठा करते हो, जो
- 9:24डिग्रीज़ इकट्ठी करते हो, जो धन, जो जमीन, जायदाद, पुत्र, पोतरादि,
- 9:31स्त्री ये सब इकट्ठा करते हो, ये तो सब ड्रामा है।
- 9:37वास्तव में तुम जो हो। ये सब कुछ नहीं है।
- 9:42ये तो बाहर का सिर्फ कल्पना है तुम्हारी ये तो बाहर का इकट्ठा
- 9:46किया हुआ धन है, ये आज है, कल नहीं रहेगा, लेकिन वो जो तुम हो
- 9:52असल में जो हो जहाँ तुम जाओगे जहाँ जाने के लिए मैं रोज़ बोलता
- 9:56हूँ वहाँ तुम सम्राट। वहाँ चले जाओ, वहाँ कोई अभाव नहीं
- 10:05तुम गरीब हो, तो बाहर से हो नकली नकली हो ड्रामा वहाँ चले जाओ,
- 10:11तुम्हारी गरीबी खत्म हो जाएगी तुम वहाँ सम्राट हो जाओगे, फिर तुम
- 10:15कुछ मांगोगे नहीं। फिर तुम्हें सब मिल जाएगा और
- 10:20तुम्हें बिना महंगे मिल जाएगा तुम वहाँ क्यों नहीं जाती वहाँ क्यों
- 10:26नहीं जाते तुम वहाँ कोई प्रश्न नहीं उठता वहाँ जाकर तुम्हारी सब
- 10:32प्रश्नों का हनन हो जाता है। उसे ही समाधि कहते हैं, समाधान हो
- 10:37जाता है। सिर्फ प्रश्नों का ही नहीं,
- 10:39समस्याओं का भी समाधान हो जाता है।
- 10:42वहाँ कोई समस्या शीष नहीं रहती, समस्याएं दूर दूषित हो जाती हैं,
- 10:47समस्याएं खाक हो जाती हैं, जैसे परमाना क्षमा में मिलके राख हो
- 10:53जाता है। हाँ भाई हाँ, पहले पदार्थों के इस
- 10:58देह से पार होना पड़ेगा, फिर मन की भावनाओं से पार होना पड़ेगा,
- 11:05मन से पार होना पड़ेगा और देहाती तो हो गए ना तुम मन के भी पार हो
- 11:12गए ना तुम? उन्मणि अवस्था में आ गए ना मन से
- 11:17पार हो के मन को क्रॉस कर दिया। आपने मन ही समय है, मन ही समय का
- 11:26तुम्हें आवाज़ कराता है अगर मन ना हो।
- 11:31तो समय का आभास नहीं होगा। देखिये रात को आप सो जाते हो, रात
- 11:36को मन नहीं होता तो तुम्हें समय का आभास लगता है।
- 11:40तुम्हारी एक बार आंख लगी, जब आँख खुली तो तुम बता सकते हो कि तुम
- 11:45कितनी देर सोये नहीं बता सकते क्यों?
- 11:49क्योंकि पैमाना खत्म हो गया। समय को मापने का पैमाना है।
- 11:54मन और रात्रि को निद्रा में मन नहीं होता, मन एक जगह छिप जाता
- 12:01है। समाधि में मन समाप्त हो जाता है,
- 12:06लेकिन निद्रा में मन एक जगह छिप जाता है।
- 12:10और रात्रि को मन नहीं होता इसलिए समय का आभास नहीं होता।
- 12:15मन सभय समय का आभास कराता है। निद्रा में भी मन नहीं होता, छिप
- 12:21जाता, समाधि में भी मन नहीं होता, समय नहीं होता।
- 12:27वह गल जाता है वह मिट जाता है। समय का आभास इसलिए न समाधि में
- 12:33होता है, न निद्रा में होता है। दोनों दशाओं में मन समाप्त हो
- 12:40जाता है। इस दिशा से के सोने में मन छिप
- 12:45जाता है और समाधि में मन खत्म हो जाता है।
- 12:50गल जाता है विलीन हो जाता है। धन्यवाद।