Latest / Baba ji Vijay Vats / 4 Aug 25 - अंतर्मुखी बनने का रहस्य! शक्ति को भीतर कैसे मोड़ें? मेरा दान आपने स्वीकार क्यों नहीं किया?
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- 0:01प्रभा रंजन। मैं कल सारा दिन और रात रोती रही
- 0:25हूँ इसीलिए कि आपने मेरे द्वारा दिए हुए ₹45,000 वापस कर दिए।
- 0:51क्या मैं पूछ सकती हूँ कि आपने ये पैसे क्यों वापस किये
- 1:08अधिकार? तो नहीं है तुम्हे?
- 1:14जब आप जरूर दे देते हो, जैसे तुम्हारा रसोइया तुम्हें पूछ के
- 1:29भोजन लगा दो, हाथ को हो के नहीं लगना।
- 1:38तो क्या आप नाराज होते हो? उस से?
- 1:47आप क्यों कहते हो? के भोजन मत लगाओ और सोई के साथ
- 1:57कैसे नाराज। वह तो तुमने रखा ही इसलिए कि
- 2:06तुम्हारा भोजन पका दे, चाय बना दे, मेहमानों को खिला दे, साफ
- 2:13सफाई कर दे, आए गए अतिथि को संभाल लें।
- 2:19पानी धानी भेंट कर दे, वह आपसे कहता है मैं थाली लगा दूँ, आप
- 2:29कहते नहीं तो क्या वह पूछेगा क्यों नहीं?
- 2:38बस वही सवाल है तुम्हारा प्रभापुत्री तुमने पूछा क्या मैं
- 2:47पूछ सकती हूँ तुमने वापस क्यों कर दिया?
- 2:52अधिकार तो है जैसे अधिकार रसोइया कहने।
- 3:03भूख नहीं है। मालिक को जब भूख लगेंगी, वह खुद
- 3:09से बोल देगा कि खाना लगा दो, बोलेंगे नहीं बोलेंगे बोलेंगे।
- 3:23निश्चित ही अगर मैंने तुम्हारा पैसा वापस किया तो मुझे इस पैसे
- 3:33की जरूरत नहीं होगी और बिना जरूरत के।
- 3:42मेरे पास रखने का कोई स्थान नहीं है।
- 3:46यहाँ बिटिया थोड़ी सी बात समझलो जीसको भूख होती है।
- 4:07वो चिल्ला चिल्ला के मांग लेता। है।
- 4:12जीसको भूख नहीं होती, वह सामान्य भोजन भी हो तो भी इन्कार कर देता
- 4:21है। क्या वो भोजन से गुस्सा है या
- 4:26तुमसे नहीं, किसी से भी नहीं। भूख नहीं लगी तो कह दिया कि नहीं
- 4:42चाहिए, तुम ले जाओ, क्या ये होंगे बता दूँ?
- 4:57यही कमी है तुम्हारे में दान भी तुम देते हो, तानाशाहों की तरह
- 5:06दान देते हो। अगर मैंने इंकार कर दिया, ये सवाल
- 5:21ही तुम्हारा गलत है। क्या आपने इंकार क्यों?
- 5:26किया। बस इसका जवाब यही है भूख नहीं और
- 5:37तुम्हें समझ आना चाहिए। ये नहीं है।
- 5:42भूख आइए हम गीता के क्षलोक में चलते हैं पूत ग्रामां स ए वायम।
- 6:00भुतवा भुतवा प्रेलीयत्य ह्रात्र गमे अवश्य है पार्थ प्रवृत्त ह्रा
- 6:13गमे। सारे गीता का क्रब है शार्क है
- 6:31तुम्हारे सभी संदेहों का। नाश करने के लिए कृष्ण का एक
- 6:40श्लोक काफी है। हे पार्थ सभी प्राणी मात्र
- 6:48प्रकृति के पर्वश हुए शब्द को सम्मेलन सभी प्राणी मात्र।
- 6:57प्रकृति के पर्वत हुए ब्रह्मा के दिन में जन्म ले लेते हैं और
- 7:09ब्रह्मा के ह्रात्रि होने पर विलीन हो जाते हैं।
- 7:19जैसे ही ब्रह्म का दिन निकला प्रकृति के पर्वश ये शब्द इसको
- 7:29इसको साइकिल में दर्द। प्रकृति के पर्ववश ब्रह्म के दिन
- 7:41में जन्म लेते हैं, ब्रह्म की रात होते ही सो जाते हैं, निद्रा में
- 7:49विलीन हो जाते हैं। बहुत से लोग सवाल पूछ।
- 7:55लेते हैं। हम कुछ कर सकते हैं बाबा या कि
- 8:07पराधीन है? वैसे ये मेरे से पूछने योग्य
- 8:13प्रश्न है। यह प्रश्न पूछने योग्य है
- 8:19आचार्यों से। बुद्धिवादियों से तर्कवादियों से
- 8:29जिनके पास तर्क की तेज तलवार है। तुम कुछ कर सकते हो।
- 8:39कमाल की बात है, इस संसार में कर कर के भी कोई कुछ कर पाए?
- 8:59जन्म और मरह और भगवान कृष्ण कहते हैं पर वश हुआ प्रकृति के पर्व वश
- 9:08हुआ अंडर दी सर्कमस्टेंसेस ऑफ नेचर।
- 9:17अंडर दी सर्कमस्टैंसेस ऑफ नेचर प्रकृति का पर वश हुआ।
- 9:26भ्रम के दिन में जीवन ले लेता है और भ्रम की रात होते ही लीन हो।
- 9:33जाता है मर जाता है। गहरी बातें तुम्हारे सिर से गुजर
- 9:44जाती हैं क्योंकि वो इतनी गहरी होती हैं।
- 9:52कृष्ण की बातें जीस तरह से बोली गईं।
- 10:00उससे बुद्धि पकड़ नहीं सकते। मीरा ने कहा घायल की गति घायल जान
- 10:09है या ये ना घायल हो। हेरी मैं तो प्रेम देवान।
- 10:23मेरा दर्द न जाने को है, कृष्ण कहते हैं और तुम मान लो ऐसा नहीं
- 10:38है, ज़रा आखिर खोल लो और देखो। क्या तुम कुछ कर सकते हो?
- 10:55लाख सूरज हो आँखें ना कैसे जान पाऊँ के कौन सा रंग है?
- 11:14बड़ा शानदार शब्द बोला। कृष्ण प्रत्येक श्लोक में गीता
- 11:22समाप्त कर देते हैं। यद्यपि पार्थ का तर्क बना ही रहे।
- 11:35उसको स्मृति उपलब्ध होती है। वह अज्ञानता में फंसा हुआ कीड़ा
- 11:42है जो कृष्ण के लाख कहने पर भी नकल नहीं की सत्ता अज्ञानता से
- 11:49बाहर है। समझिए बात को कृष्ण क्या कहना
- 11:56चाहते हैं तुमने जन्म लिया तुम अभी बच्चे हो, तुम कहते हो मैं
- 12:06बच्चा हूँ। ये धीरे धीरे बड़े हो गए किशोर
- 12:14अवस्था में तुम कहते हो मैं किशोर और बड़े होते चले गए।
- 12:26वयस्क तुम कहते हो, मैं जवान हूँ, मैं वयस्क हूँ।
- 12:35और बड़े होते चले गए, तुम कहते हो मैं?
- 12:39प्रौढ़ हूँ और बड़े। होते चले गए।
- 12:46तुम कहती हो मैं? वरद हूँ हाथ पांव कपड़े लग जाते
- 12:52हैं तुम कहते हो मैं कब रहा हूँ। ध्यान से सुन न।
- 13:06कृष्ण के इस शलोक का बड़ा प्यारा है।
- 13:11आठ में अध्याय 1900 शलोक इन सब घटनाओं में तुम बच्चे थे थोड़े
- 13:22किशोर हुए। थोड़े व्यस्क हुए, फ्रॉड हुए,
- 13:28व्रत हुए और फिर कपने लग गए। तुम मर जाते हो क्या तुमने कभी
- 13:40कहा कि मैं मर गया क्यों नहीं? क्योंकि ये सारी अवस्थाएँ थी,
- 13:55बच्चा तुम नहीं थे किशोर तुम नहीं थे शरीर था अवस्थाएँ शरीर के हैं।
- 14:07जन्म लेता है शरीर माँ के गर्भ में जाता शरीर माँ के गर्भ में
- 14:13फलता फूलता शरीर शरीर बड़ा होता, जन्म लेता बच्चा होता खेलता कूदता
- 14:24के शोर हो जाता है। फिर वृष्क हो जाता है, तुम कहते
- 14:29हो मैं वृष्क हूँ, तुम ये नहीं कहते, मेरा शरीर वृष्क हूँ, यही
- 14:40चूक हो जाती है, कृष्ण कहता है यहाँ चूक हो जाती है।
- 14:52विचार तुम कहती हो मेरे विचार शरीर बचपन से किशोर में आता तुम
- 15:06कहती हो मैं किशोर। हूँ।
- 15:09किशोर अवस्था से युवा होता तुम कहते मैं युवा।
- 15:13हुआ मैं भ्रूण हुआ, मैं वृद्ध हुआ, मेरे हाथ पांव काँपे है।
- 15:24कृष्ण तुम्हें एक बात समझाना चाहती हूँ।
- 15:31कृष्ण कहते हैं, अवस्थाएं बदलीं लेकिन तुम बने रहे।
- 15:39येस तुम्हारा? होना नहीं बदला तुम कह तो मैं हूँ
- 15:53अब मैं बच्चा हूँ अब मैं किशोर हो गया किशोर होता होता मैं व्यस्त
- 16:01हो गया। और मैं क्रूड हो गया, मैं वृद्ध
- 16:06हो गया और मैं कपने। लगा।
- 16:10गौर से समझने जैसी बात है, शरीर की दशाएं बदलीं।
- 16:20एक दशा, दूसरी दशा, तीसरी दशा बच्चा, फिर किशोर, फिर व्यस्क,
- 16:27फिर प्रौढ़ फिर व्रत, लेकिन तुम रहे अवस्थये बदली लेकिन क्या
- 16:38तुम्हारी बदली? अवस्थायी क्या तुम्हारी पत्नी
- 16:46अवस्थायी शरीर क्यों बदले? शरीर कंपा है क्या तुम कंपनी?
- 16:57इसलिए मैं तुमसे एक बात कहता हूँ, जवानी में तो पहुंचना बहुत
- 17:02मुश्किल होता है और जवानी में जो पहुंचे उन्होंने जाने अनजाने का
- 17:12प्रयोग कर। लिया।
- 17:15वो चाहे बुद्ध हो चाहे महा हो। जाने अनजाने एक उपयोग कर लिया
- 17:22उपयोग ही था कि उन्होंने शरीर को कमजोर कर लिया, क्योंकि बलिष्ठ
- 17:32शरीर के साथ। संबंध तोड़ा नहीं जा सकता।
- 17:43कमजोर शरीर के साथ संबंध तोड़ा जा सकता है।
- 17:50वृद्ध को हमारे हिंदू धर्म में। चार आश्रम बने और चौथा।
- 17:58आश्रम था शून्य 775 साल के बाद तुम्हें संसार को छोड़ देना घर
- 18:09बार के बीच में ही रहना। जंगलों में मत जाना, फिर तो सभी
- 18:14जंगलों में चले जाएंगे, फिर वहाँ घर बसा दोगे।
- 18:19कृष्ण क्या कहते हैं? कृष्ण कहते हैं जो बदला वो शरीर
- 18:24की वस्थाएँ थीं। लेकिन तुम जो जान रहे थे ये बदला
- 18:34चाहे मुर्शीद ही रहे हो, लेकिन तुम देखने वाले तो बने ही रहे,
- 18:42बच्चा था तो बच्चे के शरीर को देखते रहे।
- 18:48थोड़ा बड़ा हो गया, किशोर हो गया, उसके शरीर को देखते रहे, युवा हो
- 18:54गया और प्रौढ़ हो गया। वृद्ध हो गया तो उसके शरीर को
- 19:00देखते रहे। तुम बने रहे लेकिन क्या टूटा क्या
- 19:05नहीं? शरीर की दशा बदली थोड़ा गहरा है।
- 19:12प्रवचन को ध्यान से सुनें। शरीर की दशाएं बदलीं, बच्चे से
- 19:22बूढ़ा हुआ, कपड़े लगा। तुमने एहसास किया कि मैं बच्चा
- 19:30हूँ, मैं युवा हो गया, मैं प्रौढ़ हो गया, मैं वृद्ध हो गया, मैं
- 19:37गपने लगा, तुम तो रहे। क्योंकि तुम बराबर देख रहे हो तुम
- 19:48बच्चे हो तो भी देख रहे हो जवान हुए किशोर हुए फिर भी देख रहे हो
- 19:55प्रोड हुए वृद्ध हुए, कपड़े लगे फिर भी देख रहे हो।
- 20:01तो कृष्ण कहते हैं तुम्हारा अस्तित्व नहीं बदलता, तुम देखने
- 20:07वाले हो सदा से बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक, कांपते हुए शरीर
- 20:14तक तुम देखते रहते हो, बराबर तुम बहुतत हो।
- 20:22जो सदा साक्षी हो, जो कभी साक्षीत से गिरे नहीं हटे बदला कौन बदला
- 20:33यह भौतिक पंचतत्व का पुतला बदला? और कमी क्या रह गई?
- 20:48तुम जानते हुए भी कि बच्चा आज किशोर हो गया, अयुवा हो गया, आज
- 20:59फ्रॉड हो गया? आज वृद्ध हो गया, आज कंपनी लगा।
- 21:04क्या था वो? जो समझे नहीं वो था कि तुम समझे
- 21:13नहीं ये बदलती हैं शरीर की अवस्थाएं में देखने वाला कभी नहीं
- 21:20बदलता। मैं देखने वाला देखता ही रहता
- 21:25हूँ, काश तुम मरने के बाद भी समझ सकते कि मैं मर गया हूँ तुम कह
- 21:32सकते, लेकिन कहते हो, तुम्हें पता नहीं होता।
- 21:40शरीर मर जाता है तुम इस शरीर को देखते हो, अर्थी में घरते हो,
- 21:51मुँह नहीं। टूटता।
- 21:53शरीर बच्चा था तो तुमने बच्चे से मुँह कर।
- 21:56लिया संबंध जोड़ लिया। किशोर हुए जवान हुए, व्यस्क हुए,
- 22:06वृद्ध हुए, प्रौढ़ हुए। तुमने सबके साथ अपना संबंध जोड़
- 22:12लिया, कभी भी ये नहीं देखा। कि मैं देखने वाला कभी बदलता
- 22:23नहीं, वह जो बदलता है वह मैंने तुम बिल्कुल उतने ही रहे।
- 22:32यथावत। जीतने बचपन में थे, उतने कंपटे
- 22:37हुए बूढ़े के साक्षी रहे तुम बस एक तुम हो तुम हो कृष्ण कहते हैं,
- 22:50तुम हो जो मेरे अंश हों। जो बदलता नहीं कौन नहीं बदलता जो
- 23:00देखता है कि मैं बच्चा में, किशोर में, जगह में, प्रौढ़ में वृद्ध
- 23:08में कापने लग गया, वह नहीं बदलता। कृष्ण कहते हैं, वह जो नहीं बदलता
- 23:15वह मेरा। अंश है वह मैं वह बदलता भी नहीं
- 23:23और वह मरता भी नहीं मर जाता है दृश्य अब समझना तुम सिनेमा हॉल
- 23:31में बैठो। सिनेमा हॉल में पिक्चर चल रही है,
- 23:38खेला चल रहा है, तुम बैठे आराम से देख रहे हो, निहार रहे हो।
- 23:45फ़िल्म को फ़िल्म चलती है, फ़िल्म की कहानी के साथ तुम संबंध जोड़
- 23:52लेते हो? फ़िल्म में कोई भावना, कोई दुख,
- 23:58कोई सुख, कोई भी दृश्य आता है, तुम उसके साथ संबंध स्थापित कर
- 24:04लेते हो, कोई दुखी होता है, रोता है, तुम भी रोते हो, कोई हँसता
- 24:11है? खुश होता है।
- 24:13तुम भी हस्ते हो, तुम भी खुश होते हो, कोई दुष्टता करता है तो तुम
- 24:19क्रोध करते हो। देखो कैसा झुलम ढा रहा है वो सब
- 24:24देखते देखते जब फ़िल्म द एंड आ जाती है।
- 24:30और पर्दा खाली हो जाता है और तुम फिर भी बैठे रहो तो क्या हुआ?
- 24:42सामने कुछ नहीं वह वेला है, जागने का।
- 24:48यह जो मैंने देखा यह श्वेत पर्दे के ऊपर सक्रीन के ऊपर चल रहा
- 24:57रंगों का खेला था, मैं तो हूँ अभी हूँ मैं तो अभी सिनेमा हॉल में
- 25:05हूँ। अभी उसी सक्रीन पे आँखें कढ़ाई
- 25:08बैठा हूँ, लेकिन कुछ है। नहीं, मैं अब।
- 25:15भी सिनेमा हॉल में बैठा देख रहा हूँ।
- 25:20श्वेत सक्रीन के ऊपर झांक रहा हूँ, देख रहा हूँ आँखें गडाईं,
- 25:25लेकिन कुछ है नहीं बस ऐसे ही तुम्हारी शरीर की व्यवस्थाएँ,
- 25:31बचपन से लेके बुढ़ापे तक और मृत्यु तक तुम लगातार देखते रहते
- 25:36हो तो मैं होश नहीं रहता। तुम बेहोशी की स्थिति में रहते
- 25:45हो, कभी ये नहीं देखा। फ़िल्म खत्म होने के बाद काश तुम
- 25:52जगत जाते तुम जगते। तुम वो कहानी आके घर पे सुनाते हो
- 26:01किसी को कि मेरी कहानी सुनो मैं फ़िल्म देख कर आया मैं फ़िल्म देख
- 26:09कर आई सुन रही हूँ पड़ेगी ये क्या है?
- 26:19कहानी ये शरीर की तुम्हारी भी एक कहानी है जो परदे के ऊपर चली वो
- 26:27भी एक कहानी थी तुम्हारे जाने के बाद ये तुम बैठे भी रहो।
- 26:34तो फ़िल्म का कोई गेट ही पर आके गएगा भाई अब क्यों बैठे हो?
- 26:40अब खेल खत्म और पीसा आजम तुम जाओ, अब यहाँ क्यों बैठे हो?
- 26:49कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति के पर वर्ष।
- 26:55प्रकृति खेल खिला रही थी, प्रकृति अपनी चाल चल रही थी, बच्चा गर्भ
- 27:03में था, जन्म लिया, बच्चा बड़ा हुआ, मर गया तुम सारा खेल खेलते
- 27:10देखते रहे। प्रकृति के पर वश घटनाएं घटती
- 27:15रही। बचपन से लेकर मृत्यु तक तुम
- 27:20लगातार साक्षी बने रहे, निहारते रहे प्रत्येक दृश्य।
- 27:24को। शरीर को दर्द हुआ, तुम भी रोए।
- 27:33शरीर वृद्ध हुआ कंपा तुम भी कब रस्सी जल गई मरने गया तुमने कभी
- 27:46देखा रस्सी को? ये प्रश्न की रस्सी होती है मोटी
- 27:53उसको ले लेना। पटसन की रस्सी होती है उसमें बट
- 27:59होते हैं गले में उसको ले आना, उसको आग लगा देना, बस जल जाए और
- 28:07तुम देखोगे। रस्सी जल गई लेकिन उसके भीतर।
- 28:11बल नहीं जाएंगे। वह जो टेड मेड थी, वह वैसे ही
- 28:15दिखेगी। तुम्हें ये तुम्हारे बल नहीं
- 28:21जाते। संबंध तुम्हारे बने रहते हैं, फिर
- 28:26तुम अगले जन्म में चले जाते हैं। इन बलों को कहते हैं संस्कार फिर
- 28:36अगले जन्म में भी तुम शरीरों के साथ संबंध स्थापित कर लेते हो?
- 28:41जन्मो गुजर गए, जीवन बीत गया, कितना वक्त बीत गया?
- 28:49तुम्हें यह छोटी सीसी समझ नहीं आई, जो बदल रहा था वो मैं नहीं।
- 28:56था। मैं सदा से देखने वाला था और अभी
- 29:03बैठा देख रहा हूँ, यद्यपि सक्रीन के ऊपर कुछ नहीं रहा।
- 29:09जब तुम्हारा शरीर मर जाता है तो तुम्हारी यही दशा होती है।
- 29:14बस तुम देखने इसलिए सन्तु ने कहा मर्जी बड़े हो जाओ जीते जी ये देख
- 29:24लो। पर्दे की कहानी चल रही है फ़िल्म।
- 29:29अच्छी है, बुरी है, गरीब की है, अमीन की है, तुम अच्छी कार में
- 29:40घूम रहे हो, तुम बढ़िया महल में बैठे हो, अच्छे डेवलप के विद्धों
- 29:43पर बैठे हो या तुम? टूटे फूटे रोड़ों के ऊपर सोए हुए
- 29:50हो? करीब दोपहर में तुम पत्थर तोड़
- 29:58रहे हो या तुम किसी इंडस्ट्रीज़ की मैनेजमेंट।
- 30:03कर रहे हो? जो भी कुछ कर रहे हो वह बदलता
- 30:12जाता है। जो दिखे सो सकल विनाशी जो दिखता
- 30:21है वो सब विनाश 55 मर किशोर मर। जवानी मर प्रौढ़, मर वृद्ध मर राख
- 30:35में शरीर मर जाता है, लेकिन जिसने देखा।
- 30:47वह चिपट गया, मैं बच्चा, मैं जवान हूँ, मैं किशोर हूँ, मैं वृद्ध
- 30:53हूँ, मैं फौर हूँ, मैं कप रहा हूँ।
- 31:00कृष्ण कहते हैं, यही यही अज्ञानता है।
- 31:08यही अज्ञानता है जो दिखें सुशक्ल बिनाशी आज बच्चा, कल किशोर परसों
- 31:22जामा। फिर प्रोट फिर वृद्ध फिर कंपता
- 31:28हुआ वो शरीर जो दिखे सो सकर वे ना सी वह विनिष्ट हो जाएगा एक टाइम
- 31:36जो देखे वह सदा वे ना सी। जो देखने वाला है वह कभी विनिष्ट
- 31:44को प्राप्त नहीं होता वह देखने वाला सदा अविनाशी, वह नहीं।
- 31:50मरता है क्या? दृश्य जैसे तुम फ़िल्म देख रहे थे
- 31:54क्या मरा सकरेन के ऊपर क्या मरा दृश्य मरा फ़िल्म मरीज।
- 32:00फ़िल्म खत्म हो गई लेकिन जो दिखे सो शक्ल बेनाशी फ़िल्म देखी
- 32:09तुमने, वह दी एंड हो गया तो कृष्ण कहती हैं जो दिखता है वो शक्ल
- 32:15बेनाशी। है।
- 32:19जो जानें। सो जो जानें जो सिचलते हुए फ़िल्म
- 32:25को जानता है देखता है वह अविनाशित वह कभी विनाश को उपलब्ध नहीं होता
- 32:35गहरी बात है। काश तुम्हें समझ आ जाए जस्टिन समझ
- 32:45आ गई हवाओं की रंगत खुशबू बदल जाएगी ये कहले गाने मेघ।
- 33:02भी तुम्हें हर्षित करें। अभी तो तुम्हें दुख देते हैं ये
- 33:09काले मेघ घने मेघ बरसते हुए मेघ अभी तो तुम्हें दुख देते हैं
- 33:18लेकिन जीस दिन तुम्हें समझा गई। जीस दिन बाहर के फलक को तुमने
- 33:24भीतर की तरफ से मोड़ लिया उस तीर को जो बाहर के पर्दे पर जा रहा
- 33:29था। काश जब फ़िल्म खत्म हो जाए तो तुम
- 33:33उसी फलक को अपनी ओर कर लो, ये नहीं होता तुमसे।
- 33:41वह जो ध्यान जाता था पर्दे के ऊपर रंग रंगीले तुम दृश्य देख रहे थे
- 33:49काश यह ध्यान तुम्हारा भीतर की तरफ फलक हो जाता चेंज हो जाता बदल
- 33:56जाता। जब तुम कर नहीं पाया आज तक या तो
- 34:04किसी ने समझाया नहीं, लेकिन समझाने वाले तो बहुत हो गए।
- 34:13यह वेद नहीं है, मैडम। तुम समझें नहीं समझाने।
- 34:18वाले तो बहुत हैं। समझाने वालों की कोई कमी समझने
- 34:28वालों की कमी जब फ़िल्म खत्म हो जाती है।
- 34:36तुम वृद्ध भी नहीं रहते, तुम कपने वाले भी नहीं रहते और मर जाता है
- 34:42वह जो सामने चित्र की तरह चल रहा था, फिर तुम देखने वाले तो सिनेमा
- 34:48हॉल में बैठे ही हो क्या दिक्कत? है।
- 34:54अगर तुम ये जान लो कि फ़िल्म खत्म हो गई लेकिन फ़िल्म को देख कौन
- 35:00रहा था? यही एक सवाल है जिसे हल करना है
- 35:09और इतने सन्तों ने। इसी बात को समझाया तुमने इतने
- 35:14ग्रंथ इसलिए पैदा हो गए संत बोलता तुमने सुना नहीं, संत कहता जो
- 35:25निगाहें जाती थीं साहब ने पर्दे में, काश वह बेहर्मुखी जाती हुई
- 35:30निगाही। अंतरम की योजना तो तुम उस देखने
- 35:35वाले तत्व को जान सको। वह कौन था जो देख रहा था सारी
- 35:41फ़िल्म को? काश कम जान जाओ, वह भाग्यशाली
- 35:46घड़ी कभी आ जाए। भूत ग्रहों से एवायम भूत व भुत्व
- 35:55परलययते रात्र्याग में अवशाह पार्थ प्रवत रागमे।
- 36:10फ़िल्म चल रही थी शुरू हुई, हम देख रहे थे और समझना बात को
- 36:22तुम्हारे प्रश्नों का जवाब है। क्या तुम चाहती हो अभी फ़िल्म का
- 36:34स्क्रिप्ट बदल सकते? थे नहीं बदल सकते थे क्योंकि
- 36:45फ़िल्म फिल्मों जा चुकी थी। फ़िल्म फिल्माई जा चुकी थी।
- 36:55फ़िल्म फिल्माके डब्बों में बंद हो चुकी थी।
- 37:00तुम्हें पता भी ना था। ये बात बड़ी गहरी है।
- 37:09और तुम इस सत्य को बुद्धि से जानने की चेष्टा करते हो, यद्यपि
- 37:19बुद्धि से जाना नहीं चाहता। कल ही मुझे एक बुद्ध का फ़ोन आया
- 37:37बाबा आपने बुध को मूर्ख क्यों कहा?
- 37:50बुद्ध और कृष्ण में यही। फर्क है।
- 37:57बुद्ध कहते हैं, अपदि वो भव। तुम अपनी किस्मत खुद गढ़ सकते।
- 38:04हो? तुम्हे कष्ट भी आएगा, बेचैनी भी
- 38:13होगी। तुम्हे गुस्सा भी आएगा क्योंकि
- 38:19तुम सभी बुद्धि वादी हो कोई रात की अमावस्या के अंधकार में।
- 38:28एक जुबने की तरह दीया जलता है, वह आता है और चला जाता है।
- 38:37तुम्हें पता भी नहीं चलता और उसी के पास शक्ति की खबर होती है,
- 38:46लेकिन। सत्य की खबर लेने वाले बड़े वर्ले
- 38:49लोग। होते हैं और बड़ी कम मात्रा में
- 38:51होते हैं। जाग्यवल कृष्ण थोड़ा आगे चलोगे तो
- 39:06समझ आएगा बुद्ध क्योंकि बीच में रुक गए, मैंने बहुत बार बोला।
- 39:17और वही तल था जहाँ से आगे सत्य का मार्ग शुरू होता है।
- 39:26सत्य की अन्वेषण शुरू होती है। बुद्धि के दल तक व्यक्ति कहता है
- 39:35आई कैन डू आई कैन चेंज करके दिखाएं कहते हैं और दिखा भी देते
- 39:48हैं। मैं नहीं कहता कि तुम करके दिखाते
- 39:54नहीं, बिल्कुल करके दिखा देते। अभी लोग मुझे कहते हैं जल्दी ही
- 40:04व्यक्ति की मृत्यु पर काबू पा लिया जाएगा।
- 40:08बिल्कुल पा लिया जाएगा। फिर क्या हो जाए, एक चीज़ हो जाए
- 40:21तुम चाहे कुछ भी कहो, वक्त बतलाएगा ईश्वर पर कि ये दिन आ
- 40:29जाए। हम इंतजार करेंगे क्या मतलब, खुदा
- 40:39करे की कयामत हो और तू? आए खुदा करे की कयामत और तू आए हम
- 41:02इंतजार करेंगे। हम इंतजार करेंगे कयामत तक खुदा
- 41:16करे की कयामत हो और तू आए। क्या होगा अगर ऐसा दिन वाकई आ गया
- 41:30तो गलियों में, कूचों में, मंदिरों में, बशीदों में,
- 41:36गुरुद्वारों में लोग बैठे होंगे। शहनशाही ताज पर।
- 41:46गलियों में आवाजें गूंजेगी, मरने का टीका लगवा लो, आसानी से मरने
- 41:57का टीका लगवा लो। और कुछ शहंसा बने हुए धार्मिक
- 42:06दरबार में बैठे हो, जीवन एक रोग बन जाएगा।
- 42:17आज ही जीवन एक रोग है। एक वक्त आता है जब व्यक्ति जीवन
- 42:24से ऊब जाता है और वो कहता है कि अब मैं क्या करूँ?
- 42:33पढ़ लिया, लिख लिया, खेल लिया, कूद लिया, देख लिया, दिखा लिया
- 42:39असम। मिला कुछ अब क्या करूँ?
- 42:52ये भ्रम था, एक नंबर का अमीर हो जाऊंगा, ओके?
- 43:02बाहर लोग सलाम करते होंगे, लेकिन भीतर का कोई कोना यह कहता होगा कि
- 43:14क्या यही जीवन है? इसे ही कहते हैं जीवन।
- 43:25इसी को कहते हैं ज़िन्दगी 100 वर्ष की ज़िन्दगी तुम ठीक से जी
- 43:32नहीं पाते यू कमिट सुसाइड छोटी सी ज़िन्दगी।
- 43:39तुम उसको भी ठीक से जी नहीं पाते। कितने लोग आत्महत्याएं कर लेते
- 43:47हैं? लाखों?
- 43:50लोग संसार में प्रतिवर्ष आत्महत्या कर लेते हैं।
- 43:59आंकड़े बताते हैं कि कुल आत्महत्याओं में से 59% 59% लोग
- 44:09जो आत्महत्या करते हैं वो 29 वर्ष से कम के होते।
- 44:14हैं। अब तुम सोशल की जिंदगी का क्या
- 44:20करोगे? तुम ज्यादा समझदार हो।
- 44:28इनके पास समी थी, कम थी जो इन्होंने आत्महत्या कर ली।
- 44:37और सही पूछो तो तुम जिन्हें कहते हो प्रबुद्ध आत्महत्या का दूसरा
- 44:48रूप है, जीस दिन तुम जान जाओगे, प्रबुद्धता की सही।
- 44:56डेफिनिशन क्या व्हाट इस दी डेफिनिशन ऑफ़ एनलाइटनमेंट यू विल
- 45:03से टु कमिट सुसाइड हाँ? 29 वर्ष से कम के लोग 58% लोग।
- 45:17आत्महत्या जो करते हैं उनमें से ये उम्र ये होती है 29 वर्ष
- 45:23ज्यादा से ज्यादा 29 वर्ष सबसे ज्यादा एक आंकड़ा 20 से 29 वर्ष।
- 45:32तुम ज्यादा समझदार हो। क्या है ऐसा?
- 45:39ज़िन्दगी में तुम बता दो ये तो मन है अगर मन ना होता तो तुम भी
- 45:55सुसाइड कर लेते तुम्हें पता। तुम कहते हो कि मन एक रोग है
- 46:01नहीं, मन बड़ी शानदार चीज़ है। अगर ये मन न होता तो तुम 29 साल
- 46:09भी कहाँ जी पाते? हो?
- 46:14जब मैं अपने भीतर जा रहा था। तो बुद्धों की चरणबद्ध मानसिक
- 46:23स्थिति देखता गया। लगातार पर मैंने ये पाया कि जब
- 46:31कोई व्यक्ति बुद्ध होने के लिए घर से निकलता है।
- 46:37ही वांट्स टु कमिट सूइसाइड वह आत्महत्या करना चाहता है क्योंकि
- 46:46खुल गया सब कुछ जो अन्न उगड़ा था वो उखड़ गया।
- 46:55ये तो तुम्हारा मन दिलासा देता रहता है यह आशा नाम की चीज़ जो
- 47:01बांधी मन ने यह तुम्हें जीने पे विवश कर देती है यद्यपि जिंदगी
- 47:09तुम्हें अंगूठा दखाती है बाद में ये लो।
- 47:13कितने हो गए 122 साल क्या जीत लिया पद्मश्री जीत लिया, कुछ मिला
- 47:24मैं? पूछता हूँ तुमसे?
- 47:28सारे संसार के धार्मिक संस्थाएँ चलाने वाले शीशों से नहीं, गौरव
- 47:35से पूछता हूँ अगर तुम ईमानदार। हो?
- 47:40वास्तव में ईमानदार हो, तुम मुझे एक बात का जवाब दे दो।
- 47:47करोड़ों शिष्यों के होते। हो?
- 47:51लाखों फलो वर्ष के होते हो, करोड़ों फलो वर्ष के होते हो
- 47:54मिलियन्स के अंदर तुम्हारी सुनवाई हो रही है।
- 48:01अचानक खबर आती है। कि उसने सुसाइड कर लिया।
- 48:08तुम कहते था तो सब कुछ, उसके पास ऐसा क्या हो गया?
- 48:15वह आत्महत्या कर गया। तुम्हारे बुध भी तो आत्महत्या
- 48:18करते हैं अन्यथा भरे पूरे। भरी थाली को लात मार के जानो किस
- 48:33चीज़ की खबर देता। है।
- 48:38नहीं जीना चाहता। वो।
- 48:42देख लिए उसने सब रस तुम्हारी अमीरी।
- 48:45के। देख लिए उसने तुम्हारी सब रस्म
- 48:56खाने के पीने के दास दासियों के नौकर चाकर के तुम्हारे लॉकर्स में
- 49:02पड़े हीरो के वाणी मोतियों के मुकुटों के।
- 49:06सिंहासनों के सब देख लिए गहरे से देख लिए और फिर वो जिद्द करते हैं
- 49:16और उन्हें पता है मुझे जाने नहीं देंगे।
- 49:2312 वर्ष के बाद बुध घर वापस लौटते हैं।
- 49:26यशोत्रा पूछती है तुम कायरों की तरह भाग गए या छोड़ के मैं
- 49:35क्षत्रानी थी, तुम मुझे बता के नहीं जा सकते थे।
- 49:44केव परमात्मा की खोज में चल क्या मैं तुम्हें रोक देती?
- 49:50मैं क्षत्राणी हूँ और वो क्षत्रानी जो अपने पति देव को
- 49:57अपने हाथों से तलवार भेंट के। तिलक करती, अंतिम तिलक करती हैं,
- 50:03तलवार भेंट करती हैं, या तो जीत के आना या फिर मुँह न दुखना मैं
- 50:14भूक्षत्रण। क्या तुम यह समझते हो कि मैं इतनी
- 50:20कायर हूँ? मैंने शत्रुणी का दूध पीया?
- 50:23है बुद्ध हँसे, हँसे, चुप रह। गए।
- 50:39क्षत्रानी कहती है कि तुम मुझे बता के चल।
- 50:42जाता है। और बुद्धे जानते हैं, क्या तुम
- 50:46मुझे जाने देते? तुम चीखो चिल्लाहट मिटा देते।
- 50:53तुम शुद्धोधन के पास जाके गुहार करते ये घर छोड़ के चला तुम्हारा
- 51:00वाज, क्या तुम मुझे जाने देगी? क्या कभी कोई इस तरह परमात्मा को
- 51:09खोजने के लिए अपने पति को जाने देगी?
- 51:13अच्छी तरह से जानती है छत्रानी तो सिर्फ नाम की बात।
- 51:19है। लेकिन बुध जागे हुए इंसान बुध
- 51:25जानते हैं। यह एक छत्रानी झूठ बोल रही थी।
- 51:32ठीक माना जो के दरबार में तो मुझे जाने दे देती, लेकिन परमात्मा की
- 51:38खोज में नहीं जाने देती। फिर वही सवाल कर दिया जो बुद्ध
- 51:43उम्मीद रखे बैठे थे। यशोत्रा ने पूछा क्या वो यहाँ
- 51:49नहीं मेरे? क्या भाई यहाँ नहीं मिल सकता था
- 51:55जो तुम्हें वहाँ मिल गया अब बुद्ध कहते है हाँ आ गए ना लाइन पे असल
- 52:01तो बात यही थी लोग कहते है मेरा बच्चा।
- 52:10पापी हो जाए, दुष्ट हो जाए, हत्यारा हो जाए, डाका मार ले,
- 52:16दूसरों का लूट ले और मुकर जाए। दूसरों से मांग ले और मुकर जाए कि
- 52:22नहीं? मैंने नहीं, ऐसे केस हैं, आज भी
- 52:25हैं। और हैरानी की बात बताऊँ उन्होंने
- 52:30दावा कर रखा है कि नहीं मैंने लेनी और उनकी आत्मा भली भांति
- 52:35जानती है किसने लेने? उनके बाद को भी पता है।
- 52:41उनके पूरे परिवार को पता है और हैरानी की बात है।
- 52:46वो रोज़ व्हाट्सएप पे स्टेटस डालते हैं के जाने की टिकट तय है
- 52:54कहाँ ते है भाई, कहाँ ते है इतने निर्दोष चित्र के हो गए हो तुम?
- 53:04इतने नॉर्मल चित के हो गए हो? तुम ये बातें हैं बातों का क्या?
- 53:17बातों की लपलप तो कोई भी कर सकता है।
- 53:20यशोधरा भी यही कर रही थी। और बुध पहचान गए मुझे कहाँ जाने
- 53:27देती अन्यथा मैं कोई मूर्ख थोड़ी था जो भागा आंधी रात को तुम
- 53:34सोचोगे यह भागा क्यों? सब कुछ तो था यही तो रह जाती थी,
- 53:40तुम भागे क्यों? क्या यहाँ नहीं मिल सकता था?
- 53:47बुद्ध जानते। थे।
- 53:48तो मुझे जाने नहीं देगी, इसलिए बुद्ध चोरो की तरफ भागे और उस
- 53:57वक्त भागे जब वह प्रसू पीड़ा से। जच्चा बच्चा सब ठीक था, देख के
- 54:04गया बच्चा सो रहा था मगन यशोत्रा सो रही थी मगन धीमे से दबे पांव
- 54:15आया और भाग्य तुम कहते किशोर। तुम्हारे भीतर कुछ और है और इसे
- 54:27ही राम कहते भगवान, ऐसा व्यक्ति मुझे अच्छा नहीं लगता।
- 54:41निरंबर चित्र सोई मोहि बाबा ओह हे कबट झल छेत्र र।
- 54:52बाबा? ये कपट ये छल ये छत द्र मुझे
- 54:57अच्छा नहीं लगता और तुम ढूँढ़ते हो परमा दो, पीसी का लालच तुम
- 55:07सत्य का नहीं जाता सत्य तुम बोल नहीं सकते।
- 55:20झूठ तुम्हारे प्रण हैं इन शिलाओं पर तुम खड़े हो और तुम उम्मीद
- 55:28रखते हो भगवान से की वो तुम्हारे हृदय में उतर जाये इतनी गंदगी में
- 55:32वो उतरेगा। इतनी कीचड़ में वो उतरेगा तुम
- 55:42जिसे बुद्ध कहते हो, महावीर कहते हो और उनकी पूजा करते हो, तुम्हें
- 55:49नहीं पता था, आज भी नहीं पता मैं बता रहा हूँ।
- 55:56बिल्कुल अंत में आके जब उन्होंने देख लिया और तभी ही व्यक्ति
- 56:01निकलता है जब देखता है कि फौक है इस इख में रसनी इस इख को चूसने से
- 56:11फोंका पानी निकलता है। तो वे भागते हैं।
- 56:15वहाँ से और ऐसे ही सुसाइड करते हैं।
- 56:26कुछ नहीं दिया। संसार भगवान ने बनाया बड़ा
- 56:32खूबसूरत बनाया। लेकिन है कुछ नहीं यार और वह
- 56:42आत्महत्या करने के लिए निकलते हैं।
- 56:44एक प्रकार की आत्महत्या है क्योंकि जिसे तुम अपना हो ना
- 56:51मानते हो? सच में तुम्हें वो ही गंवाना
- 56:58पड़ेगा तुम आत्महत्या नहीं हुई तो और क्या भी?
- 57:03जन्मो, जन्मो से तुमने जिसे अपना माना कि मैं हूँ, आज वह गंवाना
- 57:10पड़ेगा। और क्या करें?
- 57:16एक रास्ता तो चुनना ही होगा और एक रास्ता तो हमने देख लिया, आजमा खा
- 57:25लिया, पी लिया, खेल लिया, कूद लिया, भोग लिया।
- 57:29दास दासियां हैं, 3600 प्रकार के भोजन हैं, सब है तुम्हारे पास
- 57:35नहीं है तो तुम्हारा मन तुम्हें टिकाता रहता है।
- 57:41बड़ा टिकाऊ यंत्र है यह यह टिकाता रहता है।
- 57:45धीरज रखो यार। आज की नहीं, कल मिल जाएगा।
- 57:48क्यों चिंता करते हो देखो फलाऊ व्यक्ति ने छः बार सुसाइड करने की
- 57:52कोशिश की। आज वो करोड़पति हो गया।
- 57:55बिलकुल हो गया, खरबपति हो गया जिसकी बात करनी है वह तुम करते ही
- 58:02नहीं खरबपति हो गया। लेकिन क्या वो रस मिला?
- 58:11मैं कहता हूँ बुद्ध हो गया लेकिन क्या वो रस मिला?
- 58:15इसलिए मैं उससे मोरू कहता, मेरे शब्द तुम्हे यातना देंगे, मुझे
- 58:25पता है। लेकिन जो बोलने में कुताही कर जाए
- 58:32वह संत नहीं होता। संत बोलने में कुताही नहीं करेगा
- 58:41जो देखा जैसा देखा। वैसा ही कह देने का नाम मुझे
- 58:53बुद्ध मूर्ख लगते हैं। क्यों?
- 58:57इतनी फसल भी बिजली देख रेख भी कर ली।
- 59:04ईख की फसल इतनी ऊंची हो गई कि आदमी से भी दोगुना एक काट में और
- 59:12जब उसको खाने लगे, चूसने लगे तो निकला फोक रसने बिल्कुल ऐसा ही
- 59:22तुम्हारा संसार। सब है, लेकिन कागजी है रस नहीं और
- 59:34बुद्ध जान जाते हैं बुद्ध छोड़ते कुछ नहीं तुम गलती हो में बुद्ध
- 59:40भंगते हैं, छोड़ते कहाँ हैं? बहुत ज्ञान लेते हैं नहीं है जहाँ
- 59:46कुछ नहीं फोंक है भाई और तुम भी जश्न ये जान लोगे फोंक है, तुम भी
- 59:53निकल लोगे वो फिर तुम भाग के जान लो या रह के जान लो, इससे कोई
- 1:00:01फर्क नहीं पड़ता। कबीर रह के जान लेते हैं, नानक रह
- 1:00:07के जान लेते हैं, महावीर भाग की जान लेते हैं, लेकिन इतना पक्का
- 1:00:13कि घर छोड़ने से पहले वो जानते नहीं थे, न बुद्ध जानते थे, न
- 1:00:19महावीर जानते। थे।
- 1:00:21और बुद्ध जब अंगुली माल के सामने जाते हैं, ऐसा तुम्हारे हिसाब से
- 1:00:29आज तुमबद्ध का रास्ता चुन लेते हैं, तो तुम कहते हो कि बुद्ध
- 1:00:33बड़ा? त्याग कर रहे हैं।
- 1:00:34बहुत बड़े निर्भीत हैं तुम गलती में।
- 1:00:40बहुत न निर्भीक हैं, न डरते हैं। बहुत न जान लिया के व्यर्थ
- 1:00:50यूज़लेस बहुत न निर्भिक हैं, न डर हैं, न डरते हैं।
- 1:01:00दोनों से पार हो गए। हैं।
- 1:01:03अंतिम दिनों में गाँधी इस अवस्था में आ गए थे।
- 1:01:08नेटर नहीं हुए थे गाँधी लेकिन डरते हुए नहीं थे और पटेल ने
- 1:01:15बिल्कुल उसी दिन। कहा कि।
- 1:01:18बापू तुझे मार देंगे, तुम सिक्योरिटी ले लो।
- 1:01:22मुझे सीआईडी से रिपोर्ट मिली है, तुम्हें मार देंगे तो गाँधी जी
- 1:01:30कहते हैं इसको ये पता है कि फौक है, मार देंगे तो मार देंगे।
- 1:01:38फौक है। जीके भी क्या लेना है जो तमन्ना
- 1:01:45थी हिंदुस्तान की उसकी बेड़ियां टूट गई, ध्यान रखना गाँधी ने कभी
- 1:01:52ने कहा मैंने तुड़वाई गाँधी ने सदा ही।
- 1:01:57समूह का सहारा दिया, लोगों को घर से निकाला, कभी नहीं कहा।
- 1:02:02मैंने अकेले ने आजादी दे दी। ये तो शोएब जुल्फों वाले प्रचार
- 1:02:08पर हैं, सिर्फ राज़ करने के लिए और पाएंगे?
- 1:02:15ये भी वही बात जो बुद्ध ने पाई। राज़ करने में तेरी।
- 1:02:21आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है?
- 1:02:33तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है?
- 1:02:44ये उठें सुबह चले। ये झुके श्याम धले मेरा जीना मेरा
- 1:03:00मरना इन्हें फलकों के तले। तेरी आँखों के सिवा दुनिया में
- 1:03:15रखा क्या है? समझना बात को थोड़ी सी गहरी बात
- 1:03:24है गाँधी के लिए जीवन। होक रह गया था?
- 1:03:35चिंता रहेंगे तो अभी कोई बात नहीं मर जाएंगे तो अभी कोई बात नहीं।
- 1:03:42इसमें कुछ त्याग नहीं था, बस जीवन का सत्य जान लिया था।
- 1:03:51जब देश आजाद हुआ, बंगाल के भीतर नवा खली में वह अकेले ही अपने लठ
- 1:03:57के साथ चल रहे थे। उनके साथ कोई भी नहीं।
- 1:04:07फोक। जीवन फोक है।
- 1:04:14इन लोगों को त्यागी मत कहना। इन्हें ही मैं सच्चे गहने बताता
- 1:04:20हूँ जो जीवन के रस को अच्छी तरह से चख लेते हैं।
- 1:04:26और बातें हैं। फौक है फौक।
- 1:04:29है, फौक है, नीरस है, रस नहीं है, ऐसा ही बुद्ध ने भी जानती है तो
- 1:04:44भागे। क्या रीना दरबार से ऐसे ही महावीर
- 1:04:54भाग्य अपने पिता से कहा महावीर ने पिताजी मैं सिन्हित सुनना चाहता
- 1:05:01हूँ? पिता बोले देखो आज तो तुमने यह
- 1:05:03बात कही थी मेरे जिंदाजी तुम यह बात नहीं कहना चुप हो गए बेचारे
- 1:05:10क्या करें? वर्धमान के पिता स्वर्गवास हुए,
- 1:05:20कंदा लेकर गए। लकड़ियों पे जिन दी चेता ऊपर उसके
- 1:05:31पिता को लेटा दिया, आग लगा दी, अग्नि जल गयी सब ही रो रहे हैं।
- 1:05:45बाप बसा रहे हैं, बड़े शानदार उदाहरण हैं।
- 1:05:53महावीर के वर्धमान के बड़े भाई थे नंदीवर्धन बड़े भाई थे, उससे बोले
- 1:06:00भाई रास्ते में अभी घर में पहुँच। कहते भाई जब पिताजी जिंदा थे तो
- 1:06:13मैंने संयस्त की बात कही थी। पिताजी कहने लगे खबरदार मेरे
- 1:06:19जिंदा जी ये बात मत कहना अब पिताजी चले गए।
- 1:06:23क्या अब मैं यहीं से चला जाऊंगा? मैं ये किस बात की ही खबर देती
- 1:06:33है? नंदी वर्धन बड़ा गुस्सा, रो रहा
- 1:06:41आँखों में आंसू। कहता भाई इतना बड़ा पहाड़ गिर
- 1:06:49गया, पिता श्री चले गए, मैं बड़ा हूँ मेरे कंधों पे सारा बोझा है।
- 1:07:06तुमने राजगाज में मेरे संगीत साथी क्या बनना था, तुम ऐसी ऐसी बातें
- 1:07:12करने लगे। हैं।
- 1:07:19सहारा देने का वक्त है भाई। ऐसी ऐसी बातें मत करो।
- 1:07:27थोड़ा शक भी हुआ नंदीबर्धन को कहीं फर्क तो नहीं पड़ गया, हाथ
- 1:07:34तो नहीं खा गया पिताजी के स्वर्गवास का गौर से उसकी आँखों
- 1:07:38में झाँका। लेकिन शांति थी आँखों में शांति।
- 1:07:45थी। ये खबर देती है कि जान या जो सत्य
- 1:07:58है, सत्य क्या है, नई रस है, न अच्छा है न बुरा।
- 1:08:04है। फौक है नीरस किसी को वैराग्य कहते
- 1:08:15हैं जीवन नीरस है, न सुख है न दुख है।
- 1:08:27ऐसा व्यक्ति ही परमार्थों को। आता है इसलिए मैं कहता हूँ बुद्ध
- 1:08:33अगर रुक जाते तो 2500 साल और भजकना न पड़ता है।
- 1:08:42काम खत्म हो गया। क्योंकि तुम्हारा लक्ष्य है उस रस
- 1:08:46को पा लेना। पी लेना कितना भी हो बुद्ध ने वो
- 1:08:52रस ने पीला जो कृष्ण ने पी लिया। इसलिए शिलावत हैं मंत्र की मूर्ति
- 1:09:01के समान। टांग टेढ़ी करके कृष्ण के सामान
- 1:09:07होंठों पे वंशरू लिए उनके चेहरे से मुस्कान नहीं आती पत्थर की
- 1:09:16शिलावक्त मूर्ति बने बैठे हैं यही कमी।
- 1:09:24तुम अच्छा कहो। बुरा कहो, कोई फर्क नहीं पड़ता बस
- 1:09:31सबक सीख लो जो मैं कहना चाहता। हूँ है नहीं कुछ यहाँ रहो, बाहर
- 1:09:39रहो, कोई फर्क नहीं पड़ता। न सुख है, न दुख है, नीरस है।
- 1:09:50इसलिए मैंने कहा बुद्ध से आगे एक पड़ाव है कृष्ण वह रहस्य का मार्ग
- 1:09:57है और रहस्य का मतलब रहस्य को अगर।
- 1:10:02बीच में से दो शब्द हटा दिए जाएं तो रह जाता है और रस रस अगर इस रस
- 1:10:14को भी पाले थे तो बुध की आज शिक्षाएं ये न होती।
- 1:10:21वैसे बुद्ध कुछ लिखे तो नहीं गए, बुद्ध बिना लिखे चले गए।
- 1:10:27बुद्ध की बातों को बाद में लिखा गया कलमबद्ध किया गया।
- 1:10:30गलत भी हो सकता है। निश्चित ही बाद में लिखे की बातें
- 1:10:36जो कलमबद्ध करेगा। वह अपनी भावनाओं को बीच में पिरो
- 1:10:41देगा। वो शुद्ध नहीं हो सके।
- 1:10:44बुध नहीं बोल रहे हैं। उसके संग उसका संघवी बोल रहा है।
- 1:10:49संगम शरणं गच्छा बुध शुद्ध नहीं बोल रहे हैं।
- 1:10:56गीता शुद्ध बोल रहे हैं कृष्ण। लेकिन बुद्ध ऐस धम्मो संतनु शुद्ध
- 1:11:08नहीं हूँ। उसमें ही संग आ गया तो अगर जीवन
- 1:11:15में कुछ नहीं। लाख साल भी हो जाए, 10,00,000 साल
- 1:11:19भी हो जाए और जीवन रस ही न हो तो क्या करूँ?
- 1:11:26बात तो रस है, रस भरी जिंदगी कितनी ही छोटी क्यों न?
- 1:11:32हो? लेकिन पर्याप्त होती।
- 1:11:38है। तो चार घड़ी भी पर्याप्त होती है।
- 1:11:48लंबी लंबी उमरिया की कभी कामना न करना लंबी लंबी उमरिया को छोड़ो।
- 1:12:03लंबी लंबी हो, मरिया को छोड़ो, प्यार की एक घड़ी है बड़ी।
- 1:12:19प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी उस प्रेम के रस में उतर जाओ घड़ी दो
- 1:12:29घड़ी भी अगर तू उस प्रेम के रस में उतर गया तो ज़िन्दगी निहार हो
- 1:12:33जाएगी तीर्थ नवा ज्योत सपावे। वह तीर्थ का शिनान ऐसा जो तन मन
- 1:12:45की धूल को मिटा देता और तुम्हें निर्मल कर जाता है।
- 1:12:49निर्मल का अर्थ है जहाँ आनंद है, मल है, दुख निर्मलता है आनंद।
- 1:12:57आनंद का रस और तुम कितने भी शास्त्र पढ़ लो, कितने भी प्रवचन
- 1:13:05सुन। लो।
- 1:13:07वो किसी के भी मेरे ही हो, कुछ नहीं पा सकोगे।
- 1:13:17कुछ नहीं रखा है। बस एक ही है कि तुम इससे
- 1:13:25मार्गदर्शन ले लो, जो ध्यान तुम्हारा बाहर स्क्रीन के ऊपर
- 1:13:31जाता है, वही शक्ति को तुम बिल्कुल वही शक्ति को तुम।
- 1:13:38अंतर्मुखी कर लो। बेहर मुखी से अंतर्मुखी कर लो,
- 1:13:44उसी शक्ति को यू विल गेट युअर शर्ट तुम अपने आप को पा लोगे।
- 1:13:54इसी सुख को एनलाइटनमेंट कहते हैं। नाम है।
- 1:14:01लेकिन नामों में रखा क्या है? इन आचारों से पूछो एनलाइटनमेंट
- 1:14:06नहीं होती तो क्या रस्बे नहीं होती एनलाइटनमेंट हम मान लेते
- 1:14:14क्या रस्बे नहीं होते? क्या ज़िन्दगी आनंदित नहीं हो
- 1:14:20सकती? क्या आनंद भी नहीं है क्या फिर
- 1:14:25तुम जी क्यों रहे हो? फिर जीने का अर्थ अभी क्या है?
- 1:14:32तत्पर ये क्या? है।
- 1:14:34उस आनंद को ही एनलाइटनमेंट कहते हैं।
- 1:14:39नाम का क्या फर्क पड़ता है? बात तो आनंद की है, खुशी में तुम
- 1:14:46नाचते हो थोड़ी देर के लिए आनंद वो खुशी है जिसकी अखंड धार कभी
- 1:14:54टूटती है। सुख की धार टूट जाती है आनंद की
- 1:15:01धार कभी टूटती है अखंड धार है स्वाद निरादा है मिले कैसे?
- 1:15:15कबीर ने शब्द कहा, गो धन, गज धन वाज धन और रतन धन खान, सभी प्रकार
- 1:15:24के धन हैं तुम्हारे। पास सभी प्रकार।
- 1:15:30जब आवे संतोष था बुद्ध के पास्ता महावीर के पास्ता एक नहीं था।
- 1:15:35क्या संतोष नहीं उसकी आत्मा तृप्त नहीं थी, इसलिए भाग गया, तृप्त
- 1:15:42होता तो वहीं बैठा रहता। और तृप्त व्यक्ति अगर सिंहासन में
- 1:15:54बैठ जाए तो जनता के भाग्य उजागर हो।
- 1:15:58गए। अतिप्त व्यक्ति अगर तख्त संभाले
- 1:16:06तो जनता की मौत आ। गई।
- 1:16:16माव देदांग ने करोड़ों कतल कर दिया काय के लिए गद्दी के लिए और
- 1:16:25एक महावीर हैं के पूछ रहे हैं नंदी वर्धन को क्या मैं चला जाऊं?
- 1:16:32पिताजी ने कहा था। क्या फर्क है दोनों में मओ जेदांग
- 1:16:44मूड है मूड है उसे पता नहीं। सबको भी मार देगा तो भी तू अपने
- 1:16:56भीतर न जा सकेगा। जहाँ आनंद का वास है, जहाँ झरने
- 1:16:59बहते हैं, आनंद के परम खुशबूएं लहरा रही हैं जहाँ जहाँ तुम्हारी
- 1:17:07ज़िन्दगी वास्तविक स्वर्ग बन जाएगा।
- 1:17:11और स्वर्ग में होता है कल्पवृक्ष, और ये ऐसा कल्पवृक्ष है जहाँ जाकर
- 1:17:21तुम सब कुछ मांगना चाहते खत्म हो जाएगा कुछ नहीं मांग रहे हो
- 1:17:27स्वर्ग का कल्पवृक्ष अनोखा। है।
- 1:17:33उस तरह तुम बैठोगे और कल प्रेषित तुम्हें कहेगा मांगो, लेकिन तुम
- 1:17:42जानते हो कि फौक है क्या मांगू मांगने को?
- 1:17:47खुशबा कि नहीं? जहाँ जाकर तुम्हें कल।
- 1:17:51वृक्ष मिलता है वहाँ तुम्हारी मांग खत्म हो जाती है और जहाँ
- 1:17:58मांग खत्म हो गई वहाँ मिलता है आनंद।
- 1:18:02इन शब्दों को आखिरी शब्द हैं इनको अच्छे से समझ लेना हाँ तो वंडर
- 1:18:08लाइन कर दो इसको। जहाँ तुम्हारी मांग खत्म हो जाती
- 1:18:15है, वहाँ मिलता है अब फायदा। क्या हमारी पंजाबी में कहावत है
- 1:18:25कि सावन के बाद लूँगी को क्या फूंकना होता?
- 1:18:28है। लूँगी मिली और सावन के बाद मिली
- 1:18:31घर उसका क्या फायदा जब तक तुमने चाहा कि ये हो जाऊं वो हो जाऊं
- 1:18:37जहाजों पे उड़ूं सारे देशों की यात्रा कर लूँ सब कुछ भौंक लूँ खा
- 1:18:42लूँ दिन में 10 बार वस्त्र बदलूँ साड़ियां बदलूँ सोने के तगमे लगा
- 1:18:47लूँ। इकट्ठा कर लूँ।
- 1:18:49सारे देशों से मान सम्मान जितना मिलता है तब तक तुम मगते हो और
- 1:18:57मज़े की बात है। परमात्मा के इस दरबार में अगर कोई
- 1:19:01चमत्कार है तो हो ये। वह चमत्कार है कि जब तुम उसके पास
- 1:19:08पहुंचते हो, जिसे कल्पवृक्ष कहते हैं, ज़िन्दगी भर तुम जिसके
- 1:19:13इंतजार में बैठे रहे, जब वह कल्पवृक्ष तुम्हें मिलता है,
- 1:19:18तुम्हारे सामने आता है तो तुम्हारी मांगने की इच्छाएं।
- 1:19:22खत्म हो जाती है। बड़ा अजूबा ये है चमत्कार।
- 1:19:29है। क्या खाक मांगू?
- 1:19:33फोक फोक का भी क्या मांगना होता है कभी फोक मांगा किसी ने?
- 1:19:44जब रथ सामने पड़ा है, तो फौक मांगेगा कौन?
- 1:19:51कामना कौन करेगा? फौक की कोई नहीं करेगा, जिससे
- 1:20:00तृप्ति हो गई। जिसका पेट भी भर गया और पेट के
- 1:20:05संग संग नियत भी भर। गए।
- 1:20:09यहाँ लालों के पेट भर जाते हैं राजनीतिज्ञों के पेट भर जाते हैं
- 1:20:14सारी दिल्ली उल्टी कर रहे है राजनीतिज्ञ कहता हूँ विशेष।
- 1:20:21उल्टी कर रहे हैं। वो अगड़े आगे निकलें।
- 1:20:25गर्भवती स्त्रियों की तरह तृप्ति नहीं और महावीर की आंचलियां सूख
- 1:20:35के पिच के जाती हैं, लेकिन तृप्ति।
- 1:20:43गो धन, गज धन वाज धन और रतन धन खान जब आवै संतोष धन, सब धन, दूध,
- 1:20:50श्वान जब संतोष का धन आ जाता है तो तुम्हें कल्पवृक्ष मिलता है।
- 1:20:57यही अजूबा है धरती में काश यक्ष ने युधिष्ठिर से सवाल पूछ लिया,
- 1:21:05मुझसे पूछता तो मैं कह देता क्यों उस स्तर पे जहाँ जाके कर्प वृक्ष
- 1:21:12मिलता है? सबसे बड़ा अजूबा यही है।
- 1:21:15कि मिलता ही कल्पवृक्ष तब है जब इच्छाएं वासना खो जाती हैं।
- 1:21:21क्या करोगे? क्या करोगे माँ का भेंट, मिट गया
- 1:21:33सब। मिल गया वह जो चाहिए था जीसको
- 1:21:45मिलने से पेट खाली हो या भरा हो कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 1:21:53द्वैत मिट जाता है, भेद मिट जाता है, न दुख रहता है, न सुख रहता।
- 1:21:58है। न सुख की कामना, न दुख की कामना,
- 1:22:05न लोभ रहता, न त्याग रहता, न दान रहता, न डाका रहता।
- 1:22:10सारे द्वंद मिट गए तो भेद मिट गए। और वह उसकी रजा में राजी हो जाता
- 1:22:16है, फिर उसके पास कुछ होता भी नहीं राजी यारदी राजी आरदी रजादी
- 1:22:38विचरण राजी आरदी रजा विचरण। कुलीचुपाएं कख न रवय रजिया हरदी
- 1:23:03राजा विचरणन कुलीचुपाएं, कख नारवय।
- 1:23:13अगले शब्द तुम्हे झकझोर जाएंगे, परमात्मा भी नहीं चाहिए, संसार भी
- 1:23:25नहीं चाहिए क्योंकि दोनों ही मांगे हैं।
- 1:23:29कोई भी मांग नहीं बचती, ना संसार की बचती है, ना परमात्मा की बचती
- 1:23:35है। कख न रवे, दोहे पख न रवे कख न रहे
- 1:23:54दोहे पख न रहे ऐद्रवक न रहे। ओधर्वख न रहे राजी यारदी ऐधर्वख न
- 1:24:08रहे ओधर्वख न रहे, न संसारती कामना, न परमात्मा की कामना और पर
- 1:24:16ले कुछ भी हम। जीसको आनंद मिल जाता है, वह तृप्त
- 1:24:23हो जाता है राजी आर दी राजी आर दी रजा विच रडा।
- 1:24:39गुल्ली छुपाए कख न रवे, कख न रवे दोवें बख न रहे ऐदर वख न रहे औदर
- 1:24:57वख न रहे। राजी आरदी राजी आरदी राजी आरदी
- 1:25:08रजा देवचरेणा कुली छुपाए कख न रवे।
- 1:25:20मेरे पास आते है, बाबा से कह दो, एक बार दर्शन दे देंगे, यह भी एक
- 1:25:26तमन्ना है ध्यान से सुन ना मेरी बात को आखिर में यही अवस्था हो
- 1:25:35जाती। है।
- 1:25:38कुछ नहीं चाहिए। परमात्मा से भी कुछ नहीं चाहिए।
- 1:25:44संसार फोक होता ही है, परमात्मा भी फोक होता है।
- 1:25:50तुम जिसके लिए झगड़े करते हो, मार काट करते हो, खून बहते हो।
- 1:25:56वह एक राजनीतिक व्यवस्था। है।
- 1:26:00उन्हें परमात्मा को कोई पता भी नहीं, कुछ लेना देना भी नहीं।
- 1:26:03उन्हें राज़ करना है जो सही संत हो गया उसको कुछ नहीं चाहिए।
- 1:26:13चाह गयी चिंता मटी। मनमा बेपरवाह जिन को कछु ना चाहिए
- 1:26:20न परमात्मा, न संसार वो ही शहंशाह, चिंता करो इस स्थान पे
- 1:26:30कैसे पहुंचा हो यहाँ कामना मात्र ही ना बचा।
- 1:26:37संसार भी नपन और परमात्मा भी नपन। अगर इतनी सी भी कामना रहती है तो
- 1:26:48वह कामना ही तुम्हारे लिए एक कांटा बनेगा।
- 1:26:52और काँटा रड़का करता है चोखा। करता है, रात को सोने नहीं देता
- 1:26:59ना भौतिक कामना हो ना पार भौतिक कामना हो ना संसद कामना हो ना
- 1:27:08ईश्वर्य कामना हो। दोनों काम नहीं जहाँ समाप्त हो
- 1:27:11जाती हैं वहाँ आती है तृप्ति, तृप्ति, तृप्ति हुआ तुम्हारे हीरे
- 1:27:23के ऊपर किंच मात्र भी कीचड़ है ना बच्चा?
- 1:27:34तुम शुद्ध हो हीरे अब जाओ, हीरे तो हो इस कीचड़ को भी हटा दो, यह
- 1:27:43कीचड़ तुम्हारी मांग का कीचड़ है न संसार को मांगो।
- 1:27:51न परमात्मा को मांगो और जब मांग खत्म होती है तो मानसरोवर मिलता
- 1:28:00है, मस्त हो जाता है एक बार। मस्ती का सरोवर पी के देख इसकी एक
- 1:28:19बूँद तो चखो यार की मज्ज़ी के आदमी यार का दम भर्क देख यार की
- 1:28:34मर्जी के आगे यार का दम भर्क देख। अर्जे उल्फत कर चुका है ये भी
- 1:28:41उल्फत करके रखो तो तुम तरफ तो जाओगे पर तुम ठहर जाओगे ठहरना।
- 1:28:56ही। सबसे बड़ा पुरस्कार परमात्मा के
- 1:29:01दरबार में इससे बड़ा पुरस्कार नहीं होता है।
- 1:29:06वहीं जाके मान मिलता है तारितलैया।
- 1:29:24मन मस्त हुआ फिर क्यों बोले मन मस्त हुआ।
- 1:29:33फिर क्यों बोले ये जो संत लोग बोलते हैं?
- 1:29:41तुम्हें पता नहीं कितनी मुश्किलात से बोलते हैं, तुम इनके शब्दों को
- 1:29:48आया गया कर देते हो ठीक ईश्वर करे तुम उस मकाम पे आ जाओ।
- 1:30:00फिर तुम समझ पाओगे इनका दर्द जैसे सुबह की नींद, ठंडी हवाओं में
- 1:30:10तुम्हें कोई झंझोर दिया कह के उठो तुम्हें कैसा लगेगा?
- 1:30:20वैसा ही संत जब बोलता है तो उसे लगता है वे क्यों बोलेंगे हमसा
- 1:30:31पायो। मानसरोवरु हंसावयो मानसरोवरु।
- 1:30:53ताल तले या क्यूँ? मस्त हुआ मन मस्त हुआ फिर क्यों
- 1:31:20बोला मन मस्त हुआ फिर क्यों बोला? धन्यवाद।