Latest / Baba ji Vijay Vats / 9 Feb 26 - भगवान से भगवान को मांगना सही है? मांग और वासना का मनोविज्ञान !!
Transcript
- 0:01बाबाजी प्रणब बाबाजी क्या परमात्मा से परमात्मा को मांग
- 0:17लेना? परमात्मा से परमात्मा को मांग
- 0:29लेना। भी क्या गलत है?
- 0:43बड़ा सुंदर। सवाल है इसकी थोड़ी।
- 0:50गहराई नापेंगे मांग एक। वासना और वासना।
- 1:04दुष्पुर है। और वाश में।
- 1:12अंततः दुख में। ले जाती।
- 1:14है। क्योंकि पूरी नहीं होती है।
- 1:19तो दुख का हेतु बनती है। क्या परमात्मा को परमात्मा से
- 1:31मांग लेना भी गलत है? पदार्थ को मांग लेना।
- 1:44इतनी बड़ी मांग नहीं। परमात्मा को परमात्मा से मांग।
- 1:51लेना बड़ी से बड़ी। मांग है।
- 1:54जो तुम मांग सकते हो? इससे ज्यादा तो।
- 2:00तुम मांग भी नहीं सकते। परमात्मा परम।
- 2:09खुशी को कहते हैं। पदार्थों में तुम खुशी।
- 2:18ढूंढ़ते हो और फिर। परमात्मा में तुम परम खुशी
- 2:25ढूंढ़ते हो। बड़ी से बड़ी।
- 2:30मांग है परमात्मा को मांग लेना और मांग।
- 2:37के भीतर लोभ छिपा। होता है।
- 2:45लोभ के बिना मांग में। मांग एक वासन है।
- 2:52वासन दुष्पुर। है।
- 2:54और वासन अंततः दुख। में ले जाती है।
- 2:58क्योंकि दुष्पुर है, पूरी नहीं। बड़ा समझदारों से पूछा गया।
- 3:10सवाल। और अक्सर।
- 3:16दुनिया वाले तुम सोए। हुए को जगा दोगे कोई काम?
- 3:24धान में व्यस्त? है उसे भी।
- 3:26डिस्टर्ब करते हो लेकिन। आप मारला?
- 3:30फिरते हुए व्यक्ति को। डिस्टर्ब नहीं कर कार।
- 3:35तुम परमात्मा को मांग रहे हो और परमात्मा को मांगना हम।
- 3:40शुभ कृत्य समेत है, जबकि ऐसा है नहीं।
- 3:48मांग। इतनी बड़ी कर दी गई कि उसके बाद।
- 3:53मांग की इंतहा हो गई। और उसके बाद इससे।
- 3:58बड़ी मांग बची। नहीं।
- 4:03परमात्मा से। परमात्मा को मांग लेना।
- 4:07परम लोभी व्यक्ति ही ऐसा। कर सकता।
- 4:09है। छोटा लोभी पदार्थ मांगेगा।
- 4:18और बड़ा रोगी। पदार्थों के स्वामी को मांग।
- 4:22लेगा। तुम ही आजाओ।
- 4:28और तुम परमात्मा से। परमात्मा को मांग कर।
- 4:34छाती जोड़ी कर लेते हो। कि हमने तो बड़ी।
- 4:39शुद्ध मांग मांगी है। ये भी कोई मांग है?
- 4:47लेकिन तुम? चुप जाते हो?
- 4:52क्योंकि परमात्मा सबसे बड़ी वासना।
- 4:55है। परमात्मा को मांग।
- 4:58लेने से बड़ी वासना की है पदार्थ। को मांगना छोटी।
- 5:03वासना है? परमात्मा को मांग लेना।
- 5:06बड़ी से बड़ी। बसना है?
- 5:08इससे ज्यादा तुम्हारे पास। मांगने को कुछ बचता।
- 5:11है। देखने में यह प्रश्न बड़ा शुभम
- 5:19मालूम। पड़ेगा किसी भगत व्यक्ति?
- 5:22ने किया होगा। लेकिन इसके भीतर क्या छिपा पड़ा
- 5:27है? ये तुम्हें मालूम नहीं।
- 5:29होता। एक राजा उसका।
- 5:46नित्य प्रतिदिन का ये काम? था।
- 5:49कि सुबह सुबह जो पहला व्यक्ति उसके पास।
- 5:52आता? वह जो मांग था।
- 5:59वचनबद्ध था कि सुबह सुबह। प्रथम?
- 6:05याचक। मेरे से जो भी।
- 6:08मांगेगा। मिल जाये।
- 6:16किसी अत्यंत दृढ़ व्यक्ति ने ये घोषणा से अच्छा ऐसा राजा है।
- 6:28हम तो यहाँ वहाँ से मांग तांग। कर।
- 6:312 जून की। भोजन जुटा।
- 6:34पाते हैं। अगर ऐसा राजा है।
- 6:41तो फिर सुबह सुबह जागकर सबसे पहले उससे।
- 6:46मांग लेते। हैं और सुबह।
- 6:49कौन जाना है? मेरे से भी दृद्र लोग हो सकते है
- 6:56तो रात को ही जाके। बैठते है।
- 7:03लोग सो रास्ते ढूंढता है। रात।
- 7:12को ही जाके बैठ। गया अर्ध रात्रि को जाके।
- 7:16बैठ गया द्वार। के से मुख।
- 7:20सुबह हुई राजा। उठा भगवान का नाम लिया।
- 7:33फतह कि राजा जग। किया है।
- 7:38सारी प्रहरी सारे। मंत्री सावधान हो गए।
- 7:45उठा। सिनान किया।
- 7:49और आकर तख्त। पर बैठ गया।
- 7:53बस तख्त पर बैठते सांप सबसे पहले जो व्यक्ति।
- 7:59मांगने आएगा। उसे दे दिया जाता।
- 8:04है। उसका सौभाग्य उसने समझा।
- 8:13कि आज मैं। अकेला और कोई आया।
- 8:17भी तो है। और राजा थोड़ा सुबह जाग।
- 8:20गया था। आज तो मेरी।
- 8:22किस्मत खुल गई। धीमे धीमे पद जाप्स।
- 8:29है। राजा के तख्त की ओर बढ़ना दिखाओ
- 8:35किसी। प्रहरी ने उसे रोका नहीं सुबह
- 8:39सुबह उन्हें। आदेश था।
- 8:41कि जो भी व्यक्ति आए उसे रोका न जाए।
- 8:52वह याचक जाके राजा के सम्मुख हाथ। जोड़ लिए पैन्ती के।
- 9:03राजन आपकी जय हो। खुश हो।
- 9:12प्रिया कहो क्या मांगने आए हो? धृतरे ने कहा, राजन।
- 9:25अब क्या मांगने आए हो? इससे भीतर पुतू हल।
- 9:29पैदा हो गया। मांगने ही आया हूँ और जो मांगूंगा
- 9:39वो मिलेगा। तो फिर ठीक से सोच।
- 9:43तो हूँ। ये मांगना?
- 9:46क्या है? मन के भीतर खल।
- 9:51पैदा हो गए हीरे। जोहरा के मांगले स्वर्ण।
- 10:01कोष। नौकर?
- 10:05इसके ही दरबार में। कोई मंत्री की नौकरी मांग।
- 10:13ढेर। सारा अन्न मांगन।
- 10:18महल अटारिया मांगन मन इधर उधर। की बातें सोचने लगा।
- 10:27बड़े बड़े जाल। गूंजने लगा।
- 10:30जैसे स्वभाव से प्रत्येक। मनुष्य बनता है।
- 10:38मन का काम। ही किया है।
- 10:40मन सदा हवाई जाल। बनता रहता है।
- 10:44अगले पल का उसे पता नहीं। होता।
- 10:52सोचा? नौकरी मांग के क्या करूँ बाल?
- 10:59बच्चे भी हैं। धारा मार्ग।
- 11:04मैं चला गया। बच्चों के काम में।
- 11:10अच्छा सब। बंगला मांग रहा।
- 11:14है हीरे जोहरातों की। खान मांग रहा।
- 11:19राजा एकटक उसके। मुख की तरफ से निहार रहा था, कुछ
- 11:24मांगेगा, लेकिन अभी? तो वो सोच ही नहीं जा रहा।
- 11:32और सोचे ही जा रहा थी तो? अचानक मन में एक।
- 11:40बात। कुंजी जो मांगने ही चला है।
- 11:50वो राजा का ये प्राण है वचनबद्ध है।
- 11:56देते कह तो क्यों न? मैं इसका सिंघाशणी मांगू।
- 12:08मैं राजा से। कहूं की तू चल।
- 12:12ये मेरा कमंडल अपने हाथों में ले ले।
- 12:16और चल बस आज। से मैं राजा।
- 12:23तुम कमंडल। उठालो।
- 12:27मुझे गद्दी। का?
- 12:32तो उसने कहा। कहीं ऐसा ना हो।
- 12:36कि राजा मेरी। इस बात के ऊपर गुस्सा खा जाए,
- 12:42मुझे दंडित कर दे। तो उसने पूछा, राजन?
- 12:46वचन देते हो राजा वचन। गलत कैसे देखा?
- 12:53राजा मुस्कुराया। जो उसके मन के भीतर चल रहा।
- 12:59था राजा वहाँ से। गया था।
- 13:09राजा ने कहा, हे भिक्षु, मैं तुम्हें वचन देता हूँ।
- 13:18तुम निर्भय हो। के।
- 13:21अपनी मांग कह सत्य। और मुद्दों।
- 13:27से। जो भी याचिका यहाँ।
- 13:31आया है। मुराद पूरी करके ही।
- 13:34वापस गया। तुम सोच कैसे सकते हो?
- 13:38तुम प्रथम। व्यक्ति हो जो ऐसी बातें कर।
- 13:45जो मैं मैं वचनबद्ध पहले से ही हूँ अन्यथा वचन।
- 13:52देने का कोई सवाल? ही नहीं तुम मांगो।
- 14:00अब इससे ज्यादा। तो मांग।
- 14:01भी क्या सकता था? अब तो कुछ मांगने।
- 14:05को शेष। ज्यादा था ही नहीं।
- 14:10भिक्षुक ने का राजा थोड़ा घबराता हूँ।
- 14:19लेकिन ये अच्छा नहीं होगा। ये सिंहासन मुझे सौंप दो।
- 14:27और तुम ये कमेंटल पकड़ लो, तुम बाबा बन जाओ।
- 14:34ये नहीं हो सकेगा। तो राजा खिलखिला।
- 14:39के हँसा मुस्कुराया हँसा। हाथ ऊपर।
- 14:46उठाये यह अल्लाह। जिसकी इंतजार थी।
- 14:58आज वो आ ही। गया।
- 15:01या खुदा। तू रह मुरहिन है कर्मो।
- 15:06गरीब है तेरी सौगातों। का कोई अंत हे पर्वत?
- 15:13कार। मुद्दतों से इंतजार।
- 15:16करता था। आज तुने भेज ही दिया।
- 15:25आसमान की तरफ। हाथ उठे और ऐसे भीतर से।
- 15:37भावना उठे। तो बड़ा प्यार हुआ है।
- 15:46आखिर आ ही गया जिसका इंतजार वर्षों से।
- 15:51मैं कर। रहा था अब।
- 15:55थोड़ा जाचिक भी चूक? वो जो दृश्य देख रहा था।
- 16:03उसके ऊपर विश्वास। नहीं हो रहा था।
- 16:07समझा था राजा दंडित। करेगा।
- 16:11राजा कारागृह में भटक देगा। लेकिन ऐसा कुछ।
- 16:17भी तो नहीं होगा। उसने धीरे धीरे अपना।
- 16:26सिंगासिन। छोड़ा और उस भिक्षु।
- 16:34के चरण स्पर्श किए। जो का राजा।
- 16:39चरण स्पर्श किए। हे राजन मैं।
- 16:44तुम्हारे चरण स्पर्श इसीलिए। करता हूँ।
- 16:49कि तुम तुम्हारी से बड़ा दयालु। और कोई है ही नहीं।
- 16:56तुम बड़े कृपा। हो?
- 16:59तुम्हारी द्यारूता का कोई? अंतर नहीं।
- 17:02ईश्वर ने अपना। पैरोकार बना के तुम्हें बेचा है।
- 17:09मैं परमात्मा को इसीलिए। धन्यवाद दे रहा हूँ।
- 17:13यह अल्लाह लाख लाख। शुक्र गुजार है।
- 17:19चरण स्पर्श किए। क्योंकि अब से तुम राजा।
- 17:22हुए। मैं वचन वध हूँ।
- 17:27और। संभालो अपना सिंघास थोड़ा।
- 17:35संकोच बस। सिंहासन की तरफ।
- 17:39उसने कदम बढ़ाना शुरू। किया है।
- 17:46और कदम बढ़ाते बढ़ाते। सिंहासन के ऊपर।
- 17:50जाके बैठता। राजा ने गमंडल।
- 17:59उठाया। और जल्दी से।
- 18:05अपने मुख्य द्वार को। लांघ?
- 18:07गया खो गया। कोई अता पता नहीं कहाँ गया।
- 18:15पता नहीं थोड़ी। देर के लिए बड़ा।
- 18:21प्रसन्न हुआ। के।
- 18:25आह, मैं। तो इस वक्त भिक्षा?
- 18:30मांगा। करता था।
- 18:33आज तो ईश्वर ने इतनी बड़ी कृपा? थी।
- 18:37बस अब सारी इच्छाएं पूरी ये एक व्यक्ति की।
- 18:46कहानी नहीं है ये कहानी। सभी मन की कहानी।
- 18:54है। मन ऐसा ही चाहता है।
- 18:59थोड़ी देर बीती। थी उसके थोड़ी सी।
- 19:05खुजली से दो शरीर। में खुजली उसने थोड़े।
- 19:13खर्च। कर ली।
- 19:15अक्सर। खुजली हो जाती है लेकिन वो खुजली।
- 19:20थी के बढ़ते ही चली। गई और घंटा बर्बाद।
- 19:29सारे शरीर के ऊपर। घोड़े फुंसी।
- 19:36भर गया सारा शरीर। और उसमें खरश।
- 19:45और ऐसी। खरश बड़ी तेज़ खरश।
- 19:52अब वो खरश करने लगा। बड़े बड़े फोड़े फुंसियाँ।
- 19:58खारिज। करता करता तंग।
- 20:00आ गया जितना खारिज करे जितना खुद। जलाये भीतर से।
- 20:11खून निकले। मवाद निकले, दुर्गंध आने लगी।
- 20:20ये क्या हो गया ये तो मैं राज़ सिंघाशी में बैठा अचानक मैं ठीक
- 20:29ठाक था, चंगा भरा था ये क्या हो पाया, ये खारिश क्यों हो गयी?
- 20:35और इतनी तेज खर्च। उसने अपनी पोशाक उतारी देखा।
- 20:42तो उसका सारा शरीर। बड़े बड़े पोरों से बराबर।
- 20:46था। बड़ा हैरान हो गया।
- 20:54राज्य वृद्धि को बनाया गया। राज्य वैद्य।
- 21:00को कहा कि ऐसे। ये सब कुछ हुआ वैद्य जी और मेरे।
- 21:06सारे शरीर में खुजली चल रही है खर्च।
- 21:11और बड़े बड़े फोड़े हो गए। तो राज्य वैद्य ने।
- 21:15कहा राजन तो हम। रोज़ दवाई देते।
- 21:22है। राजा को इस सिंहासन।
- 21:29को अभिशाद समझ लो। वरदान समझ लो।
- 21:36कि जो इस संभासन पर बैठेगा। वो कोढ़ ही हो।
- 21:41जाएगा। इससे पहले।
- 21:44राजा का भी यही। हाल था।
- 21:47पर वह तुम जैसे व्यक्ति के इंतजार।
- 21:49में बरसों तक बैठा। रहा।
- 21:53कोई ना आया। जो सुबह सुबह आएगा।
- 21:58जो मांग लेगा। इसलिए उसने ये उदघोषणा की लेकिन
- 22:05सब से। कोई व्यक्ति ऐसा नहीं।
- 22:08आया तुम। जैसा।
- 22:13आज तुम। प्रथम व्यक्ति आया पर।
- 22:17तुमने राजा की मुराद पूरी कर दी ये राजा?
- 22:21चाहता था राजा हर। वक्त।
- 22:27उसके शरीर से। खुजली होती रहती थी।
- 22:32इसको वरदान है या अभी साफ है जो इस सख्त।
- 22:37ताक पर बैठेगा और। कौड़ी हो जायेगा और एक राजा।
- 22:47ऐसा नहीं होता ये तो कहानी है। सभी राजा ऐसे होते हैं, कभी चैन
- 22:54से बैठे राजा को देखो। खारिश बहुत वितरी होती।
- 23:03है। राज़ वैद्य ने दवाई।
- 23:07दी। देखिए यही दवाई राजा जी पहले वाले
- 23:12राजा को भी। हमें देते थे।
- 23:15यही। दवाई तुम भी खाते।
- 23:16रहो। कुछ आराम।
- 23:18रहेगा, फिर समझा देंगे। आपको।
- 23:30रात्रि को सोते वक्त कौन सी दवाई? लेनी है।
- 23:33सुबह उठ के कौन सी दवाई? की मालिश करनी।
- 23:36है स्नान करने से। बात और।
- 23:39पहले। सभी बता देंगे एक बार आप इस दवा
- 23:45का। सेवन कर।
- 23:49व्यक्ति का मन। ऐसे ही प्रपंच सारे।
- 23:54दिन रचता रहता है। उसका अंजाम उसे।
- 23:57पता। है।
- 24:02आखिरी अंजाम? तो यही होता है।
- 24:05तुम्हारा सब करा धरा तुम्हारा सब। कमाया धमाया आखिर में तुम्हें।
- 24:12कोड दे जाता है। ऐसा।
- 24:14कोड जिसकी खुजली कभी खत्म नहीं होती।
- 24:19इसलिए मैं कहता हूँ वासना दुष्पूर।
- 24:22है। और छोटी वासना से तुम।
- 24:27तृप्त नहीं हो गए। पदार्थ।
- 24:30तुमने तुमने तो परमात्मा को ही तुमने तो राजशाही गद्दी।
- 24:41ही। और तुम्हें पता है, बिन मानकर
- 24:48मोती मेले कबीर यूं। ही ऐसे शब्दों को।
- 24:53बोलने ही देते। कबीर बड़े अनुभवी।
- 24:57मांगे में रहना भीख। बिनवा के मोती के।
- 25:07जैसे बच्चा प्रसन्न है। और कुछ नहीं।
- 25:12मांगता किलकारियां भरता है। छोटे छोटे निर्णय निर्णय पांव।
- 25:18चलाता है और। कितनी प्रसन्न मुद्रा में।
- 25:24केलकार्य मरता है तुम्हारे। बड़े से बड़े धर्मपति।
- 25:32बच्चे के केलकार्यों। को सुनकर।
- 25:35शर्म खाते हैं। बच्चा खुशी के जीस आगोश में जकड़ा
- 25:44होता है। तुम।
- 25:48जिंदगी भर उसकी कल्पना। नहीं कर सकते।
- 25:50की बच्चे को। आखिर मिल के।
- 25:52हालांकि। कभी तुम भी बच्चे थे, लेकिन बच्चे
- 25:58के। पास एक ऐसा मंत्र है।
- 26:06नय मांगने का मंत्र बिड माघ्य मूर्ति।
- 26:10पर है। बच्चा मांगता नहीं।
- 26:15और। बिना मांगे सब कुछ।
- 26:18माँ उसका फिकर रखती है। बच्चा थोड़ा सा हिचकी।
- 26:23भरता है और माँ फ़ौरन दौड़ के आती है बच्चा।
- 26:27भूखा। माँ जानती है?
- 26:31और बच्चे को दूध कर रखती है। इसका पेट भर जाए बाकी।
- 26:36काम धाम। बाद में करो।
- 26:42जिसने उस विराट के ऊपर छोड़ दिया। उसकी परवाह विराट करता है।
- 26:51जिसने। स्वयं के ऊपर छोड़।
- 26:53दिया कि मैं। ये करूँ?
- 26:56उसकी। परवाह परमात्मा।
- 26:58छोड़ देता है अब तुमने खुद में अपने जीवन की सारी नैया की पतवार
- 27:10खुद के। हाथों में ले ली।
- 27:13तो परमात्माणी करणो। क्या है परमात्मा?
- 27:17बाहों से विदा हो जाता है। जैसे जैसे बच्चा बड़ा।
- 27:21होता है। तुम उसे चालाकियाँ सिखाते।
- 27:26हो? समझदारियाँ सिखाते हो समझदारी?
- 27:30का मतलब चालाक। शेष स्याण का लक्ख हो गए त एक न
- 27:36चल लेना तुम स्याण प सीखाना शुरू कर देते हो।
- 27:39बच्चे और बस। तभी से बच्चे का जीवन तुम बर्बाद
- 27:44करना शुरू कर। देते।
- 27:49हो इतने बड़े। सम्राटों ने क्या पाया?
- 27:52अगर वो कुछ पाया होता तो सिंहासनों पर सत्तारूढ़ हुए
- 27:57सम्राट। फिर फिर से ना।
- 27:59मांग लेते अभी मांग बाकी है। अभी याचिक बाकी है।
- 28:08इसका तृप्ति आयु। यद्यपि सर्वोच्च पदासीन हो गए,
- 28:19लेकिन अगर। तृप्ति आ जाती।
- 28:22तो तुम डकार। मार लेते की नहीं, बस वो अब तृप्त
- 28:27हो गए। लेकिन तृप्ति होती है वासना
- 28:34दुष्पुर। है।
- 28:37और मांग वासना। है।
- 28:41छोटी मांग, छोटी वासना और परमात्मा को मांगना।
- 28:46बड़ी से बड़ी वासना। माघ तुम्हें नरक।
- 29:00की तरफ ले जाती। है।
- 29:05और माघ हीनता तुम्हें। स्वर्ग को दर्शन करवा।
- 29:10देती है। इसलिए।
- 29:13कबीर ने कहा, मांगना मत। जब बिना मांगे देने।
- 29:21वाला? बैठा हो।
- 29:24तो मागना खा लो। तुमने कभी जिंदा रहने के लिए
- 29:31ऑक्सीजन मांगी थी? तुमने कभी मांगा था कि मेरा।
- 29:35हृदय खुद से ही धड़कता है। तुमने कभी मांगा?
- 29:40था कि रात को जब। मैं सो जाऊं तो?
- 29:43ख्याल रखना, प्रभु श्वासों। का?
- 29:47अगर एक श्वास। में रुक गए।
- 29:50अगर एक, जबकि भी। हृदय खा गया।
- 29:56तो? यहाँ तो अंत हो।
- 29:57गया। यहाँ तो सारी दुनिया लूट जाएगी,
- 30:01प्रलय आ जाये। तो थोड़ा ध्यान।
- 30:04रखना। हालांकि बच्चा इस बात।
- 30:10की फिक्र नहीं करता। लेकिन जैसे जैसे तुम बड़े होते हो
- 30:14तो फिक्र करने। लगते हो, प्रभु?
- 30:17अब मैं सो रहा हूँ अब तुम्हारे हवाले।
- 30:19हैं अब तुम। रक्षा करना इससे पहले रक्षा किसने
- 30:23की थी जब तुमने। रक्षा मांगी नहीं थी।
- 30:29तो किसने की थी रक्षा? वो ही तो संभाल।
- 30:34अब तुम स्यानी हो। गए तो अब।
- 30:36तुम रात को फरियाद। करके सोते हो अब सारी रात?
- 30:40गहन निद्रा में मैं चला जाऊंगा, मुझे तो कुछ मालूम ना पड़े।
- 30:45मैं कहाँ लेकिन मेरी रक्षा। यद् की सदा से वो रक्षा।
- 30:55करता है यद्। की सब की वो रक्षा।
- 30:59करता है। लेकिन अचानक मांग?
- 31:04उठ। जैसे समझ जगी स्याणक जगी।
- 31:10मांगो। थी ये स्यानप बड़ी।
- 31:15कायर है। और कायर सदा मांगा करता है।
- 31:23वीर को तो मिल ही जाया करता है। कायर मांगा करता है।
- 31:30बच्चा भी है। बच्चा मंथ बच्चा तो?
- 31:36प्रसन्न। है।
- 31:38अपनी खिलखिलाहट को बिखेरता है जो भी उसके करीब आता है।
- 31:43प्रसन्न हो जाता। है।
- 31:48हाथ पांव चलाता है। अच्छा बड़े मज़े में है तुम
- 31:54सिखाते हो उसे होशियारी? तुम।
- 31:56सिखाते हो उसे सयानप और बाबा कहते हैं कि तुम?
- 32:011000 सयानप कर लो। एक कनक चल रहा है नाल तुम्हारे।
- 32:08साथ तो एक भी। शयनक नहीं चलती कहाँ तक शयनक
- 32:13बनोगे तुम्हारे स्यानेपन से ना? सूर्य उगता है ना चाँद जलता है।
- 32:23ना तारे निकलते हैं। न ग्रह चलते हैं न।
- 32:29सूजी डूबता। है।
- 32:33तुम्हारे चाहने से हवाएं नहीं चलती तुम्हारे।
- 32:36चाहने से फूल नहीं खेलते हैं। तुम्हारे चाहने से कभी क्या।
- 32:43हुआ है। कभी कोई ऐसे।
- 32:50कोइंसिडेंट हो गई होगी कि इधर से प्रभु ने चाहा होगा और उधर से।
- 32:56तुमने मांग लिया होगा। तो तुमने सोचा कि?
- 33:00शायद मेरे मांगने से ही। प्रभु ने दिया।
- 33:08प्रभु गट गट के अंतर। की जान में।
- 33:13बड़े बुरे की पीर। पच्छान जब तक तुम।
- 33:21अपनी नैया। की पतवार, उसके हाथों में सोके
- 33:24रखते हो? तब।
- 33:28तक जैसा वो करे। भला?
- 33:31मेरी तो यही मर्जी कर वो ही जो। तेरी मर्जी पर तू।
- 33:35रहते और जैसे ही। पतवार तुमने अपने हाथ में ले ली
- 33:49फिर उसने। तुम्हारा फिकर करके क्या?
- 33:51करना। फिर अब।
- 33:53तुम बड़े हो गए। अब तुम बली हो गए।
- 33:59अब तुम निर्बल न रहे। अब तुम निस्सहाय, असहाय न रहे, अब
- 34:05तुम खुद अपनी सुरक्षा। आप कर सकते हो?
- 34:09और जब तुम अपनी सुरक्षा, आप। कर सकते हो तो?
- 34:12परमात्मा तुम्हारा दामन छोड़। देता है।
- 34:20रुक्मणी पंखा झेल। रही थाली लगा दी गई।
- 34:27भगवान श्री कृष्ण। आसन पर बैठे खाना।
- 34:35खाने लगे, पहला कोर तोड़ा। मुख में रहने लगे।
- 34:45अचानक से कोर। वहीं रख दिया।
- 34:52जल्दी से उठे उठे भागे द्वार की तरफ भागे तेज़ी से।
- 35:01भागे। और।
- 35:04द्वार पे जाके पर वो पकड़े। फिर पलटे धीमे धीमे कदमों से।
- 35:18वापस आए अपने आसमान। पर बैठे और भोजन।
- 35:25प्रारंभ कर। दिया।
- 35:28रुको, मैंने सोचा। आज ही ये कैसा दृश्य है?
- 35:31प्रथम बार ऐसा हुआ। है।
- 35:35भगवान ने इससे पहले। तो कभी ऐसा किया?
- 35:38नहीं। आज ऐसा क्या हुआ और भोजन करते
- 35:44वक्त तो कोई ऐसा। कर तो नहीं कर?
- 35:48आज ही ये कैसा प्रभु? उठे।
- 35:53और छोड़ा, भागे और भागे तो फिर फिर।
- 35:59वापस उमड़े क्यों? फिर वापस आकर।
- 36:02भोजन करना शुरू क्यों कर दिया? ये सारा माजरा क्या है?
- 36:11रुक्मणी। देखती रही की शायद भगवान कृष्ण
- 36:14बोलेंगे, लेकिन भगवान? कृष्ण ने खाना सम्पन्न।
- 36:18किया। और उठकर हाथ तो।
- 36:25चलने लगे। त्रिपुणी ने कहा सुनिए।
- 36:30प्रभु, मुझे दुविधा में डाल के मत।
- 36:34जाइए। एक प्रश्न लगातार।
- 36:39मेरे सर में घूम। रहा है, इसका हाल कर दीजिए।
- 36:48कृष्ण मुस्कुराए जानते थे। के हृदय में क्या चल।
- 36:56रहा है। पूछो प्रिय क्या।
- 37:04पूछना चाहते है? प्रभु, आप।
- 37:07जानते ही है। लेकिन फिर भी।
- 37:12खाना खाते वक्त तो। ऐसी हरकत आपने कभी?
- 37:15नहीं की थी। खाना छोड़ा और ग्रास मुक्तक।
- 37:24नहीं दे गए। थाली में ही।
- 37:26रखा और भागे और भागे। और द्वार पे छठ के छठ के तो वापस
- 37:34मुड़े वापस। मुड़े आसन पे।
- 37:37बैठे और भोजन शुरू कर दिया। ये क्या माज रहा?
- 37:39है कृष्ण? बोले मेरा एक।
- 37:46बहुत पुराना हो। जाता है।
- 37:49लोग उसको पत्थर। मार रहे थे।
- 37:55और बड़े बड़े? पत्थर मार रहे थे।
- 37:58और जब उसके पत्थर रखता पीड़ा होती तो मैं कहता हरे।
- 38:04कृष्ण, हरे कृष्ण। मेरा भगवान।
- 38:14देखेगा मेरे कृष्ण देखेंगे। मैं तो अशक्त हूँ।
- 38:20असहाय। हूँ वृद्ध हूँ।
- 38:24मैं कुछ। कर भी तो नहीं सकता।
- 38:28फिर कोई दूसरा पत्थर पड़ता है लेकिन पत्थर?
- 38:32बंद नहीं हो रहे थे लहू। लोहान हो गया सारे।
- 38:34शरीर से रक्त निकलने। लगा।
- 38:45फिर प्रभु। मैं।
- 38:47उसकी रक्षा के लिए दौड़ा। अनन्या चिंतन तो वहाँ।
- 38:53ये जना। जो अनन्य भाव।
- 38:57से मेरा स्मरण करता। है।
- 38:59मुझे बचत है। उसके दुखों का निर्वाहण मैं।
- 39:08करता। हूँ।
- 39:13मैं भागा फिर तू। वापिस कब हो गए?
- 39:23तुकुमणि। जैसे ही मैं द्वार पे पहुंचा उसने
- 39:29खुद। ही पत्थर उठा लिया था और मेरे बाप
- 39:35के सालों। ऊन, वर्ली।
- 39:42वाला तो जावा आएगा आएगा मैं ही नियुक्त लेता हूँ फिर जो।
- 39:56तो कृष्ण मुस्कुराए। रुक उन्हें फिर जब।
- 40:02उसने खुद ही अपनी। पतवार अपने हाथ में ले ली।
- 40:05मुझे वापस आना है। जो?
- 40:12अपने जीवन की पतवार। नैया की खवैया खुद बन।
- 40:16जाता है उसका। खविया मैं नहीं रहता।
- 40:21हूँ। इसलिए मैं वापस लौट आया।
- 40:28बस। एक पत्थर भर का इंतजार और कर
- 40:33लेता। हूँ।
- 40:36मैं पहुँच। ही तो गया था, बस पहुँच ही गया
- 40:41था। द्वार पे।
- 40:49जैसे ही तुम। अपने जीवन की नैया उसके चरणों में
- 40:54समर्पित कर देते हो पहल तुम्हारी तरफ।
- 41:01से होगी। वह तुम्हें?
- 41:06अपने आगोश। में ले ही रखा मैं तुम्हारे जीवन
- 41:13की नैया तुम्हारे जीवन की गस्ती के पतवार अपने हाथों में ले रखा,
- 41:20मैं तुम्हें भटकने नहीं देखा। यह मजेदार के भीतर।
- 41:24तुम डूबने में? तुम्हारी नैया को डोलने नहीं
- 41:29देगा। कितने ही तूफान गुमाएं कितनी ही
- 41:33आधियां क्यों न चले। कितना ही मौसम का।
- 41:37विजाज क्यों न बिगड़े? लेकिन वह तुम्हें सुरक्षित।
- 41:42योगक्ष में वहाँ गया। हूँ।
- 41:52वह तुम्हें कुशलक्षेम ही। रखेगा।
- 41:59वह तुम्हारी रक्षा। लेकिन जैसे ही पतवार।
- 42:05तुमने अपने हाथों में उठा। ली याद।
- 42:08रखना या तो पतवार। तुम था।
- 42:12पूजा पतवार, वह थमने का ज़िन्दगी। को ऐसा मत बनाओ।
- 42:20कि कभी पतवार। तुम थामलो।
- 42:23और कभी पतवार। परमात्मा के हाथों में देता है।
- 42:29अक्सर ऐसे ही लोग धरती पे हैं। जो जब तक उनमें।
- 42:35जान होती है वह। करते हैं।
- 42:38मैं। करूँगा और जब।
- 42:43उनके। किए से होता नहीं कुछ।
- 42:45तो कहते हैं, अब तू। जान है।
- 42:48फिर वह कुछ। नहीं कर रहे।
- 42:54शुरू से ही। उसके समर्पित।
- 42:57हो जाए ये। भाव अत्यंत गहरा चला जाएगा।
- 43:04मैं कुछ नहीं कर। सकता।
- 43:06मैं निर्भर हूँ मैं अशक्त हूँ, मैं असह्य और तुम्हारे आचार्य।
- 43:13तुम्हे यह बात? नहीं है, समझाये।
- 43:16तुम्हें आचार्य तुम्हारे। वही बात समझाएंगे जो तुम्हारे
- 43:21पूंजीपति समझाते हैं। जो तुम्हारे सिकंदर सदा से
- 43:25तुम्हें समझाते रहे बस भाषाओं का। फर्क है।
- 43:30जो तुम्हारे मार्क्स। जो तुम्हारे चारवाक?
- 43:37तुम्हें सदा से समझाते। रहे वही तुम्हारे।
- 43:40आज के आचार्य। तो में समझेंगे।
- 43:43बल इकट्ठा कर। ये तो हमे पता।
- 43:53ही था। ये क्या नहीं बात?
- 43:56है। ये क्या पर्वत है, बल इकट्ठा करो
- 44:06पहले से ही कर रहे है। लेकिन कोई इकट्ठा करने नहीं देता,
- 44:12वह भी आगे से बल ही इकट्ठा कर। रहा है।
- 44:16तो फिर मुकाबलेबाजी शुरू होती है कॉम्पिटिशन?
- 44:20शुरू होता है दौड़। शुरू।
- 44:21होती है एक दौड़ता है दूसरा। कविता है।
- 44:27मैराथन। की दोस्त होती और तेज और तेज और
- 44:32पीछे देख के तुम कभी। देखते नहीं मर के।
- 44:36के पीछे लंबी कतार। सारी दुनिया दौड़े चले जा।
- 44:44पता नहीं कहाँ जाना है। मंजिल कहाँ है पहुँचना?
- 44:53कहाँ है ये तुम्हें मालूम है? बस।
- 44:58दौड़ना है। आज सारी।
- 45:01दुनिया दौड़ रही। है।
- 45:05तुम किसी बहाने से दौड़ो। त्योहारों के बहाने से।
- 45:10दौड़ो। कोई अच्छी खबर मिल जाए उसके कारण
- 45:18दौड़ो। ये सभी त्यौहार अज्ञानियों।
- 45:24ने बनाए थे। और हमारा।
- 45:28देश तो त्यौहार। प्रधान देश निश्चय ही।
- 45:34सबसे ज्यादा दुखी देश। रहा होगा।
- 45:39जहाँ इतने त्यौहार मनाने की जरूरत पड़ी।
- 45:44निश्चित ही वह दुखी देश। रहा होगा किसी जवानी?
- 45:50और दुखी व्यक्ति ही सुख को बाहर से आरोपित करने।
- 45:55की संभावनाओं संभावना नहीं। जुटाता है।
- 45:59वह बाजार से जब असली फूल नहीं खिलते।
- 46:04धरती के गर्भ। में से नहीं निकलते असली फूल तो।
- 46:07बाजार से पृष्ठित। के फूल ले आकर और भीतर छिड़क देता
- 46:11है तो हमारे त्यौहार बस ऐसे ही। तुम सदा बनाते।
- 46:22हो? तुम मांगते ही रहते।
- 46:29हो? सदा मंगते बने ही रहते हो
- 46:32तुम्हारी मांग? कभी रोहित नहीं होती और पहले छोटी
- 46:37चीजें मांगते हो, फिर आज तुमने भगवान से भगवान।
- 46:41को भी मांग ली। प्रभु?
- 46:49पूछ मुझसे मैं क्या? चाहता हूँ।
- 46:53मैं तुझसे तुझे मांगना चाहती हूँ ऐसे ऐसे वज़न बना दिए है।
- 47:00मूर्ता से परिपू। और तुम्हें पता नहीं।
- 47:06मांगा के मेटा। जैसे ही मांग।
- 47:11उठी। अब तो नहीं मिलेगा पक्का है।
- 47:17क्योंकि मांग वो खजोल है जो शीतल। जल में व्यवधान पैदा।
- 47:23करती है। गचल मसल कर देती है।
- 47:26तूफान उठा देती है। और जो नीचे बैठी।
- 47:30हुई मिट्टी थी। वो पानी।
- 47:32को गंध ला कर। देती थी।
- 47:36मंगो मौत। बच्चे की तरह सब मिल जाएगा।
- 47:51ईसा सड़क के किनारे। खड़े दोपहर के।
- 47:53वक्त मांग रहे है और अब हंगरी प्लीज़।
- 47:58प्रोवाइड मी, फोर्ट मैं। भूखा हूँ पर मत।
- 48:03मुझे भोजन दे दे। यह मालूम है।
- 48:09यह जरूरत है वक्त की। इसको मांग में मत तब्दील कर देना।
- 48:18ऐसी मांग तो सदा ही। उठती?
- 48:21है। बुद्ध के भी उठती है बौद्ध वृक्ष
- 48:24के नीचे से उठ के। भिक्षा पत्र।
- 48:27उठाते हैं और मांगने चले जाते हैं द्वार।
- 48:34ऐसी मांग शंकर के भीतर भी उठते हैं।
- 48:38वह शंकर, जो एक। हुक्म से महामाई, महालक्ष्मी।
- 48:46को। आदेश कर सकता है के वर्षों।
- 48:51सोने की तरह वर्षों इस समितवा। ब्राह्मणी के घर।
- 48:59तीन नंबर का वर्ष। इतना आदेश?
- 49:07करने वाला शंकर हमारे। द्वार के आगे खड़ा।
- 49:10होता है। और तुम उस उसको भिखारी।
- 49:15समस्या हो। हम अरे है पोलक भूष नमाज़।
- 49:29बृंगांगनेकमकुला वरुणं तमाराम अंगीकृत खिल विद्युत पांव लीला।
- 49:48मांगल्यदसुरमा मंगल देवता और माँ लक्ष्मी हाथ।
- 50:01बांधकर खड़ी हो जाती। है।
- 50:03शंखरी। प्रभु आदेश मारते।
- 50:12हैं इस विधवा ब्राह्मणी के घर। बरसो स्वर्ण रूप में बरसो।
- 50:22और तीन प्रहर तो? बरसो?
- 50:25और निरंतर धारा प्रवाह। इसलिए उसको।
- 50:29जो उस वक्त सरोत्र बोला। गया है।
- 50:32उसको कणक धारा कहते। है धारक प्रवाह।
- 50:37सोने का प्रश्न। मांगते तो शंकर भी।
- 50:46है लेकिन भूख लगी। है मांगते।
- 50:53और उनका एक नियम। है।
- 50:56एक ही घर से। मालूम हुआ।
- 50:59अगर वहाँ से ना मिला हो? तो बस फिर दूसरे।
- 51:03दिन आऊंगा। दूसरे घर का मुख्यमंत्री।
- 51:08और विधवा ब्राह्मणी जानती है ये शंकर है।
- 51:14सौभाग्य है मेरे आज आये। लेकिन वध की स्मृति के आज मेरे
- 51:18पास है कुछ कोई भोजन मुझे दे। जाता तो मैं खुद।
- 51:24भूखी रह लेती। मैं भगवान के अर्पण।
- 51:30करके। लेकिन आज बदकिस्मती भटकती हुई इधर
- 51:40उधर। कोने खूंजे।
- 51:41फैला रही है और। देखती है।
- 51:44एक आले के भीतर एक आंवला। छोटा सा आंवला।
- 51:54हरा आमला। पड़ा है।
- 52:00और तो कुछ है नहीं। ये आमला ही मेरे।
- 52:04पास है। अब ये खाया भी नहीं जाएगा खट्टा।
- 52:08बहुत है। और उससे पेट भी न।
- 52:11करेगा? लेकिन करे क्या, किसी तरह कांपते।
- 52:20हृदय से कांपते हाथों से, शंख के पास पहुंची पांव में से।
- 52:30रख दिया भिक्षा पात्र? में आवड़ा।
- 52:35काकने लगी है भगवान। मैं विधवा प्राणी हूँ मेरे।
- 52:43पास। आपको देने के लिए भोजन नहीं है।
- 52:48मैं तो स्वयं लाचार हूँ, प्रभु अगर मेरे।
- 52:51पास भोजन होता। तो मैं खुद ना कहती।
- 52:56मुझे पता है आप एक घर से ही मांगते हैं, लेकिन मैं ऐसे ही।
- 53:02अभाग। में हूँ।
- 53:07कि स्वयं परमात्मा उसके। द्वार पर दस्तक, दीये, भिक्षुक।
- 53:10के रूप में खड़े हैं। लेकिन मैं ऐसी अवागनी कुछ भी तो।
- 53:16नहीं है मेरे पास। मुझे क्षमा करता हूँ।
- 53:28शंकराचार्य कभी कभी याचिकों के। भीतर भी परमात्मा खड़े।
- 53:36होते। इसलिए हमारे सनातन के भीतर एक
- 53:41अपरंपरा थी कि। संत को ध्रुवचन देकर।
- 53:44मत जला दे, प्रणाम। कर दिया के बाबा?
- 53:52मेरे पास तो नहीं है। बस।
- 53:57दुग्ध। कारनामक।
- 53:58सत्कार करके बोलते हैं। नहीं जाने किस रूप में नारायण मिल
- 54:04जाए। साक्षात नारायण।
- 54:07के। वह बुध हों।
- 54:09किसी को। कपिल वस्तु।
- 54:13को सिंहासन को लात मर के जो आगया नारायण।
- 54:17स्वरूप ही आग है। उसके भीतर का त्याग।
- 54:20तुमने देखा वो क्या? रखते हैं।
- 54:25अभी भी। मालिक हैं।
- 54:28जब चाहे रोक सकते। हैं।
- 54:29कपिल वस्तु उनका इंतजार कर रही है।
- 54:34लेकिन खड़े हैं द्वार। पर विक्षुक याचक।
- 54:37बन गए संत। को विक्षुक को दर्दकार।
- 54:44न ले। पता नहीं किस रूप।
- 54:46में परमात्मा ही सामने। खड़े हैं।
- 54:59पास से। गुज़र तो है एक।
- 55:00व्यक्ति कहने लगा जीसस मांगने लगे हो और खुद को उसका प्रिय।
- 55:06पुत्र? कह रहे हो मांगो।
- 55:09तो दोपहर का खाना क्या मांगो? उसके प्रिय पुत्र हो और वह।
- 55:15तुम्हारा पूज्य बरखात में है। मांगने ही लगे।
- 55:20हो तो रोज़ रोज़ की। ये काहे एक बारगी में ही सब?
- 55:29कुछ मांग लो फिर से मांगना ना पड़े।
- 55:34क्यों? कष्ट।
- 55:35देते हो उसको रोज़ रोज़। और खुद भी कष्ट उठा।
- 55:38उठा के करो जी सस्ने का मांग। लो, पिता मांग लो।
- 55:47तो वो कब? खूब मांग लो।
- 55:50किताब 150 वर्षों। का मांग लो।
- 55:56मांग लेता है तुम। ठहरों 150।
- 56:03वर्षों का मांग लेता। लेकिन।
- 56:05ठहरों पक्का पता है 150 साल मैं। जीवित रहूँ।
- 56:16अब इस सब को अच्छी तरह। जानते हैं।
- 56:19गट गट के अंतर की जान। बड़े बुरे के वीर।
- 56:25वह जानते हैं कि भरी जवानी में उन्हें सलीब दे दीजिए।
- 56:35और जानते हैं तो इतनी मौन स्वीकृति।
- 56:38से शरीर को मंजूर कर लेते हैं। जानते हैं ये होगा।
- 56:45और जब होता है। ज़रा भी व्यवधान खड़ा नहीं करते।
- 56:49और स्वीकृति। की एक भी रेखा जबान पर नहीं
- 56:53उभरती? सर्व स्वीकार।
- 57:02मांग लूँ? 100।
- 57:0450 वर्षों का मांग लेता उसके घर क्या कम?
- 57:09और मेरा प्यारा पिताजी है। मुझे पता है इंकार।
- 57:21मैं। परमात्मा से जो भी।
- 57:23मांगूंगा वह। मिलेगा।
- 57:29लेकिन। का पक्का है।
- 57:32तुझे अब? तो मुझे भूख लगी।
- 57:37अब तो मैं मांग रहा हूँ भूख मिटाने।
- 57:39के लिए, लेकिन बोलो की तरह मांगो। अगले पल भरोसा है मैं जिंदा रहूं।
- 57:52अगर जिंदा जिंदा उसने बेच। दिया तो खा दूंगा, लेकिन उसके बाद
- 57:57तो खाने वाला ही नहीं। बचेगा वह तो थर।
- 58:07इतनी देर में। भोजन लिए कोई व्यक्ति आ गया।
- 58:10कि जीसस लो भोजन उखाड़ते। और वह व्यक्ति जो कहता था 150 साल
- 58:16का इकट्ठा ही। मान लो।
- 58:19चुप के चुप के। चला।
- 58:20गया उसको समझा गया। इसने मांगा।
- 58:27और तुरंत मिल। गया मांग लोभ के कारण।
- 58:40नहीं होनी चाहिए मांग। जरूरत के कारण उठे थे।
- 58:48मांग। लोभ के कारण उठे।
- 58:49तो पशु और। तुमने तो परम लोभ दिखा दिया।
- 58:59तुमने तो परमात्मा को परमात्मा से ही।
- 59:02मांगी इतना लोभ? ऐसे भी क्या चलती?
- 59:09बड़ा शॉर्टकट ढूंढ़ते हैं। बस जल्दी से उसे।
- 59:14ही ले लूँ। लेकिन तुम्हें पता नहीं।
- 59:21फिर वह जो कोर्ट की खारिज उसे बर्दाश्त।
- 59:24करने का वह में। नहीं होता।
- 59:28मिल तो जाएगा करोगे क्या आज? तुम्हारे गणपति तुम्हें पता नहीं,
- 59:37निरंतर खुजला रहे। हैं, लेकिन तुम्हें पता नहीं।
- 59:42चलता। ये खारी शीश तो है।
- 59:46ना रात को। चैन से सो पाते हैं ना दिन को चैन
- 59:50से आराम। ले पाते हैं।
- 59:55दन इकट्ठा कर। लेंगे।
- 59:59तख्तों तास। इन्हें मिल जाएंगे, बैठ जाएंगे।
- 1:00:03पर सब तख्तों तास? कोढ़ देते है, व्यक्ति को कोढ़ ही
- 1:00:12बना देते है। तुरंत खुजलाहट शुरू हो।
- 1:00:15जाती है। बस जब तुम समझ जाते हो।
- 1:00:24तो फिर ना। छोड़ते बनता है।
- 1:00:27ना अपनाते बनता है। जैसे।
- 1:00:29सांप के मुँह में। कोड करना।
- 1:00:32ना निगलते बनता है ना उगलते बनता। है बस तुम फंस गए।
- 1:00:47इस सूत्र को। ध्वस्त कर लेना मांगा।
- 1:00:54तो कोड मिलेगा, भीख भी नहीं मिलेंगे मांगे से।
- 1:01:01भिन मांगे मोती मिले। नहीं मांगोगे।
- 1:01:08तो फिर वो मालिक। बैठा है रचना हार।
- 1:01:11तुम्हारे कहने से उसने। सृजन भी नहीं किया और तुम्हारे
- 1:01:16कहने से वो नष्ट। भी नहीं करेगा ना?
- 1:01:20तुम्हारे कहने से हवाएं। चलती है ना गुल खेलते है।
- 1:01:24ना सूरज? ढलता है ना चंद्रमा?
- 1:01:27निकलता। है।
- 1:01:32तुम्हारे। चाहने से कुछ भी तो नहीं।
- 1:01:34होता हाँ, तुम भ्रह्मा अवश्य। उगा लेते हो?
- 1:01:39मैंने ऐसा चाहा था। फरियादें अवश्य कर लेते।
- 1:01:44हों, लेकिन अक्सर। वो भरे आसमान में।
- 1:01:49गायब हो जाते हैं। कब किसकी प्रार्थना स्वीकारती?
- 1:01:54हुई है कोई? इंसिडेंट हो सकता।
- 1:02:00है। उधर से उसने।
- 1:02:03फेंका हो? इधर से आपने मांगा हो।
- 1:02:05बस यही। कहानी है सब जन।
- 1:02:07की मांग वासना और परमात्मा की मांग।
- 1:02:19बड़ी से बड़ी। वासना।
- 1:02:21और वासना दुष्ट और। है।
- 1:02:24और वासना? दुख में ले जाती।
- 1:02:26है क्योंकि दुष्पूर्ण है। वासना पूरी नहीं?
- 1:02:30होती तो पूरी न होने से तुम दुखी होती।
- 1:02:35वासना दुख का सबब? बनती है और माघ वासना।
- 1:02:42है। और परमात्मा की माँ।
- 1:02:46बड़ी से बड़ी वासन। धन्यवाद।