Latest / Baba ji Vijay Vats / 25 Mar 25 - महा मौन की साधना! प्रार्थना करने का सही तरीका! दर्शन शास्त्र का गुप्त रहस्य!
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- 0:04बाबा जी प्रणब बाबा जी आप दर्शन शास्त्र से भरे जा रहे हैं।
- 0:22तो हम समझेंगे कैसे हैं? दर्शन शास्त्र से समझा जा ही नहीं
- 0:36सकता, दर्शन शास्त्र वाला है। दर्शन शास्त्र एक भ्रम देता है कि
- 0:54दर्शन शास्त्र समझा सकता है समझा नहीं सकता भ्रम देता है।
- 1:06कि समझा सकता है सही मायने में जिसने भी नाम रखा, दर्शन शास्त्र
- 1:17का गलत रखा क्योंकि दर्शन शास्त्र।
- 1:29को विचार शास्त्र कहा जाए तो से ठीक कहो, विचार विमर्श करें,
- 1:40बातचीत करें, शब्दों में डालें, उड़ेलें शब्दों में उसे उतारें।
- 1:49यह प्रयास ही गलत होगा। दर्शन शास्त्र को पढ़कर तुम अपनी
- 2:04बुद्धि को खराब करना शुरू कर देते हैं।
- 2:11इसलिए जिसने भी दर्शन शास्त्र पढ़ा, उसने शब्दों के बाल की खाल
- 2:18तो खेंच ली, लेकिन अनुभव का जर्रा भी उसमें नहीं आया।
- 2:32इसलिए तुम्हारा तथा कथित दर्शन शास्त्र फिलॉसोफी दर्शन शास्त्र
- 2:39नहीं, विचार शास्त्र है। और तुमने कहा बाबा समझ नहीं होता।
- 2:51वह समझा जा नहीं सकता। तुम्हारी सब कोशिशों बेकार हैं
- 3:04तुम्हारे दर्शन शास्त्र ने। एक भ्रम की स्थिति पैदा कर दी कि
- 3:10वह समझा जा सकता है। उसके बारे में शास्त्रार्थ हो
- 3:18सकता है, बेहद बाजी हो सकती है। ये धारणा गलत है।
- 3:32विचार से वो समझा नहीं जाता है। वह समझ में आता है अनुभव से।
- 3:49जैसे शरबत मीठा होता है, लाश दर्द करो, मीठा ऐसा होता है, ऐसा होता
- 4:01है क्या समझ पाओगे? कैसे समझाएगा शरबत का मीठा?
- 4:16पन उसे पी के समझाएगा और मज़े की बात यह है।
- 4:24के पीके समझ आएगा तुम्हारे तुम दूसरे को बता नहीं सकोगे।
- 4:37यही कठिनता है, यही मुश्किल है इसलिए मैं तुम्हें रोज़ कहता हूँ।
- 4:48समझ से संसार समझा जा सकता है आनंद नहीं, शांति नहीं, तुम्हारी
- 4:59समझ शांति को भंग कर सकती है, शांति दे नहीं सकते।
- 5:08दर्शन शास्त्र जमावड़ा है, शब्दों का और शब्दों के जमावड़े, कोलाहल
- 5:19होते हैं, और कोलाहल एक तरह का उपद्रव है।
- 5:26और जहाँ उपद्रव है, वहाँ शांति में है।
- 5:34तुम शांति की खोज में निकल जाते हो, गुरुओं के शरण में जाते हो,
- 5:45वो तुम्हें समझता है। उसे समझाता है जो समझ में आता
- 5:51नहीं कितनी बेड अभी सी बात है, उसको समझा दे न जो समझ में आता
- 6:04नहीं, पानी ठंडा है। शास्त्रार्थ से पता लग जाएगा।
- 6:15नहीं अनुभव से पता लगेगा पानी को पीना पड़ेगा शीतल है तुम्हारा
- 6:30रोमा, रोमा, शीतल हो क्या पीकर। लेकिन अगर तुमको के दर्शन शास्त्र
- 6:42से इसको सिद्ध कर दें तो मुश्किल नहीं असंभव है।
- 6:52इसलिए कबीर कहते हैं यूँ गूंका गुड़ खाई कहें कौन मुख स्वाद उसके
- 7:00मिठास का वर्णन करने का कोई उपाय नहीं, कोई तरीका नहीं है और
- 7:07तुम्हारा दर्शन शास्त्र तो भ्रम देता है।
- 7:10और जहाँ भ्रम है, वहाँ दुई आई तुम पैरलल परमात्मा पैदा कर लेते हो,
- 7:21जिसका परमात्मा से कोई लागत देगा। है ही नहीं तुम पैरलल शांति पैदा
- 7:31कर लेते हो। आनंद पैदा कर लेते हो, जिसके
- 7:37जिससे परमात्मा का कुछ लेना देना नहीं है, यही तुम्हें भ्रम में
- 7:43डाल देता है। तुमने कहा, स्वामी।
- 7:52आप दर्शन शास्त्र से परे हट रहे हैं।
- 7:57मैं दर्शन शास्त्र से समझ में आता ही नहीं।
- 8:04जिन्होंने दर्शन शास्त्र से मुझे समझने की चेष्टा की वो चुप है।
- 8:16मुझे समझना है तो मेरे पास आना होगा।
- 8:29बाघों में बाहें डालनी होंगी, आगोश में लेना होगा।
- 8:39मेरे पास आसन बिछा के बैठने का तो मेरी तरंगें तुम्हें छू पाएंगे,
- 8:51लेकिन वो शब्दों में बयान नहीं होता, सही पूछो।
- 8:57तो शब्दों में जो बहुमूल्य है वह कभी भी व्याख्यात नहीं होता।
- 9:06शब्दों में जो बोला जाता वो किचरा होता है, शब्दों से पार हो जाता।
- 9:18वह होता है सही धन बाकी होता है हरण तुम शब्दों को धन समझता हुआ
- 9:32है। शब्दों की संपत्ति को इकट्ठा करते
- 9:37हो, अपनी स्मृति में बठा लेते हो, विश्वविद्यालय तुम्हे डिग्री से
- 9:46सीखता है और तुम उन डिग्रीज़ को लिए लिए।
- 9:53बड़े गर्वान्वित होते हैं हमने ये कमाया हमने वो कमाया तुम भूल जाते
- 10:09हो वह कमाने जैसी चीज़ है नहीं। आनंद कमाया नहीं जा सकता।
- 10:24आनंद से करीबी हो सकती है, आनंद से दूरी हो सकती है आनंद को कमाया
- 10:33नहीं जा सकता। उसके पास आसन बिछा के बैठ जाना।
- 10:40आचार्य उपासनम आचार्य जो जानता है जो सर्वज्ञ है।
- 10:51उसके करीब वैक्सीन ही उसकी तरंगें तुम्हें छिड़ेंगी और जैसे बिजली
- 11:00का शौक तुम्हें दिखता नहीं लग जाता है।
- 11:05नंगी तार को छू दो शौक तुम्हें दिखेगा न?
- 11:17लेकिन तुम झटक के गिर सकते हो, मर भी सकते हो, आचार्य के पास बैठ
- 11:30जाओगे और शांत बने रहोगे। तो आचार्य से जो लहरें निकलती हैं
- 11:44उनको तुम पी जाओगे, बस वो ही हैं जिनको आनंद कहा जाता है।
- 11:59जो तुम्हारे रुवय रुवय को खुशी से भर देंगे, आनंद से भर देंगी तुम
- 12:07नाचने लगोगे, तुम्हारा मन करेगा गाने को अभी तो तुम गाती हो?
- 12:28अभी तो तुम भागवत की कथा कहते हो, अभी तो तुम शब्दों का अर्थ बताते
- 12:36हो लेकिन बिल्कुल टीचर की तरह। तुम मुआवजा लेके बोलते हो, तुम
- 12:47मुआवजा लेके पढ़ाते हो लेकिन वह मुआवजा लेके बोलने वाली चीज़ नहीं
- 12:57है। दर्शन शास्त्र से तुमने कहा मैं
- 13:12दूर हट रहा हूँ मैं करीब गया ही हफ्ता दर्शन शास्त्र मुझे छू नहीं
- 13:22सकता। मैं उन तारों पर थरकता हूँ, जन
- 13:42तारों पर विचार नहीं होता, संगीत के स्वर उठते हैं।
- 13:57मोहब्बत के लिए कुछ खास दिल मकसूल होते हैं।
- 14:06मोहब्बत के लिए कुछ खास दिल मकसूल होते हैं।
- 14:11ये वो नगमा है जो हर साज़ में गाया नहीं जाता।
- 14:23प्यार प्रेम ये वो गीत है हर साज पे गाया नहीं जाता।
- 14:42शब्दों की फिलसफी विचारशास्त्र है और प्रेम शब्द से भरा है, तुम देख
- 15:00हो क्या? जब चाहूँ ओर से तुम्हें प्रेम
- 15:06पकड़ के कहीं तो तुम्हारे पास चुप होने के सिवा और कोई रास्ता नहीं
- 15:16होगा तो मन हो जाओगे। और जैसे जैसे वो अपनी किरणें
- 15:24बिखेरेगा तुम वहाँ से तुम मौन से महामौन हो जाओगे इतनी चुप हो
- 15:37जाओगे। कि जैसे चुप्पी ने ही रूपधर लिया
- 15:44हो, ज़रा भी आहट नहीं होगी। बेआवाज़ हो जाएगा सब सुनसान हो
- 15:58जाएगा सब पुरुषों संसान में गीत उगता है।
- 16:04आनंदनाथ का तो पहली बात समझ लेना, संसार की
- 16:23कोई डिग्री पानी है, कोई प्रतियोगिता लड़नी है?
- 16:30कॉम्पटीशन करना है, कुछ बनना है? तो फिलॉसफी काम आयक है।
- 16:45अगर होना है बनना नहीं है तो सभी फिलॉसफियों को।
- 16:53गिरा दे न यह एक मूल सिद्धांत मैं बता देता हूँ फैलोसिफी जिसे तुमने
- 17:07नाम दिया दर्शन शास्त्र का, उसमें दर्शन तो बिल्कुल भी नहीं, वह
- 17:16शब्दों का शास्त्र है। फिलॉसोफी का सही अर्थ अगर तुम
- 17:22निकाल पाते हो तो वह विचार और तुम विचारों से उसे जानना चाहते हो
- 17:38विचारों से। उसे प्रकट करना चाहती हूँ।
- 17:50तुम शास्त्रों से उसके अर्थ निकालने में लगे हो, जो असंभव है।
- 18:00शास्त्रों में वो है ही नहीं, वो है जीवित शास्त्र।
- 18:16तुम लगे हो उसे बुद्धि से खोजने और बुद्धि तो शास्त्र शब्दों का
- 18:22भंडार है। बुद्धि में भरे पड़े हैं सभी
- 18:31शास्त्रों के शब्द लेकिन शब्दों से वह मिलता नहीं शब्दातीत होना
- 18:40पड़ता है। जैसे रात को तुम मौन हो जाते हो,
- 18:50गहरी छैया के तले विश्राम करते हो और तुम्हें पता भी नहीं होता कि
- 18:56हम कहाँ चले जाते हैं। बस ऐसे ही गुम हो जा तुम्हें
- 19:04तुम्हारी भानक तक न लगे क्योंकि जिसकी भानक तुम्हें लग रही है वो
- 19:13झूठ है। जो शास्त्रों की समझ में न आये,
- 19:24जो विचार की पकड़ में न आये, जो शब्दों के भीतर सामान न पाए, जो
- 19:29शब्दों की पकड़ और पहुँच से दूर हो, तुम उसे दर्शन शास्त्र कह
- 19:35देते हो। लेकिन वो सिर्फ पिया जाता है,
- 19:46उसका बखान नहीं होता ना वो समझ में आता है।
- 19:56ऐसा कोई शब्द नहीं बना। ऐसी कोई लीप ही नहीं बनी।
- 20:06जिनके शब्द तुम्हे समझा सके वो आता है अनुभव में।
- 20:19तुम तो छोटी छोटी बातों को भी लफ्ज़ों में प्रकट नहीं कर सकते।
- 20:27तुम्हारे दर्द हो रहा है तुम वैद्य से हकीम से डॉक्टर से कहते
- 20:33हो दर्द बहुत हो रहा है और डॉक्टर तुमसे कहे उस दर्द को निकाल के
- 20:42बताओ की ये रहा दर्द था। तुम यहीं असमर्थ हो जाते हो, तुम
- 20:50कहते हो मुझे तुम्हारे पर दया बहुत आती है और मैं तुम्हें कहूँ
- 20:58कि उस दया को निकाल के दिखाओ कहाँ है।
- 21:04छोटी छोटी बातों पर तुम लाचार हो जाते हो और बखान करना चाहते हो
- 21:12तुम विराट का परम तत्वों का पकड़ में नहीं आता तुम्हारे सुख।
- 21:25तुम बड़े सुखी हो बताओ वो कौन सा सुख है निकाल के दिखाओ ये सुख है,
- 21:33तुम दुखी हो, मैं तुमसे पूछ लूँ, ज़रा दुख को निकाल के दो तो कौन
- 21:40सा दुख है तुम्हें, कहाँ है वो दुख?
- 21:44दर्द कहूं प्यार कहूं नफरत कहूं नहीं दिखा न पाओगे तुम जीस प्रेम
- 22:01की तुम बात करते हो। वह महसूस होता है अनुभव में आता
- 22:12है, न देखा जाता है, न दिखाया जाता है।
- 22:31जीतने भी आचार्य कोशिश में लगे हैं।
- 22:40उनकी कोशिशों पहले दिन से बेकार हैं।
- 22:46वो जाने न जाने। ऐसे ही विचारों का प्रगटीकरण करते
- 22:52हुए वो देह त्याग देंगे और उन्हें पता भी नहीं चलेगा कि कुछ भी न
- 23:00बोल और जो बोल के इकट्ठा किया जर्रा भी साथ न गया।
- 23:12सोचा था सब पालेंगे यहाँ तो सब छोड़ना पड़ेगा ये क्या हुआ खुद से
- 23:24ही धोखा? बस दर्शनशास्त्र खुद से धोखा है
- 23:35अगर खुद को पीना है, तो वह पिया जाएगा मौन में और अगर खुद को धोखा
- 23:46देना है। तो दर्शन शास्त्र को पड़ने लग
- 23:51जाना वह खुद से धोखा है। तुमने गलत राह पकड़ी तुम बह के।
- 24:06तुम सत्य के विरुद्ध चले सत्य आता है, अनुभव में तुमने फाउंडेशन ही
- 24:23गलत ले ली। फिलॉसफी का नाम तुमने?
- 24:27बड़ी चालबाजी के लिए नाम रख दिया दर्शन शास्त्र वो लिखा पड़ता है
- 24:38ब्रह्म पड़ता है कि यह दर्शन में ले जाएगा नहीं विचार कभी दर्शन
- 24:45में नहीं ले के जाता। सोच सोच न होई जे सोच
- 25:06नानक कहते हैं, वह सोचनीय से सोच में आता नहीं, वह शब्दों से पार
- 25:16है। शब्दा तीर्थ शब्दों से पार जाना
- 25:22होगा। अगर सच्ची शांति चाहे तो कहीं
- 25:32नहीं है। सच्ची शांति।
- 25:35बस एक ही ठोड़ चुकाने और वो तुम खुद वो दूसरे में न आनंद है, न
- 25:52शांति है वटकन। भटक लो, जितना भटकना चाहती हो भटक
- 26:05लो और जब थक जाओ न मिले और मिलेगा भी नहीं, दूसरे से कभी कोई नहीं।
- 26:16पा सका है ना कोई पा सकेगा जिसने भी पाया स्वयं से पाया स्वयं होकर
- 26:31पाया और तुम दूसरों को समझने में लगे हो।
- 26:39शास्त्र दूसरा है। शब्द दुष रहे हैं लिपिया तुम्हारी
- 26:48बनाई हैं, इतनी लिपिया हैं क्योंकि तुमने बनाई है।
- 27:02शब्दों के बाहर जाना होगा। शब्दों का समूह है मन तुम जैसे ही
- 27:12दर्शन शास्त्र कहते हो। वह शब्दों से समझने की प्रक्रिया
- 27:20है। कोशिश काश उन शब्दों से समझा आ
- 27:28जाता उन शब्दों से नहीं समझाएगा जखाई मार के देख लो।
- 27:40मैं बहुत बार कहा, मेरे पास लोग आ जाते बाबा आओ शास्त्र हद करें,
- 27:54मैं हाथ जोड़ लेता हूँ तुम जीतने के लिए आए हो।
- 28:01चलो, मैं तुम्हारी चरण पकड़ लेता हूँ क्योंकि जो शब्दों में
- 28:06व्याख्यात नहीं हो सकता उसको मैं व्याख्यान न कर पाऊंगा।
- 28:12तुम मुझे पोती जो बगल में छिपा रखी है इसको नीचे रख दो।
- 28:20जलपान करो और से निशा शब्द तुम्हें भ्रम देते हैं और शब्द
- 28:37जाल इतना विशाल हो गया है। कि तुम शब्दों को ही सब कुछ समझने
- 28:45लग गए हो, वह मिलता है मान में जहाँ शब्दों की कोई खनक नहीं होती
- 28:59शब्दों का शोर नहीं होता। और कोई भी बहुमूल्य चीज़ है वो
- 29:09शोर से रहित है, वो प्रेम हो, वो आनंद हो, वो खुशी हो।
- 29:24वहाँ शोर नहीं होता, वहाँ मौन होता है, शब्दों का शोर इबादत में
- 29:38खलल पड़ता है, वो आ रहे हैं। वो आ रहे हैं सांसों ज़रा ठहर जाओ
- 29:54वो आ रहे हैं सांसों ज़रा ठहर जाओ दिल के धड़कने से भी।
- 30:03इबादत में खलल पड़ती है ये दिल की धड़कन शोर करती है, इतना शोर भी
- 30:14कहाँ सुहाता है? तुम जीतने सेंसिटिव होते जाओगे।
- 30:25उतना ही तुम्हें शोर खलता रहेगा। जीतने तुम नॉन सेंसिटिव होगे,
- 30:40उतना तुम्हें शोर अच्छा लगेगा। तुम आज दुनिया के भीड़ बर्खे में
- 30:46भरते हो। इतना डेसिबल है वहाँ और तुम मज़े
- 30:53से गुजर जाते हो, तुम्हें पता ही नहीं चलता ये शोर तुम्हें भटकाता
- 31:04है पहुँच जाता है। अगर उस प्यार को पीना चाहते हो,
- 31:14तुम तो प्रार्थना में भी शब्दों का प्रयोग करते हो, जबकि
- 31:21प्रार्थना में शब्दों का शोरगुल नहीं होता, ये बात तुम्हें पता ही
- 31:29नहीं। प्रार्थना अवाक होती है।
- 31:38वहाँ कोई वाक नहीं होता है प्रार्थना नी शब्दता में होती है
- 31:47शब्दों से बहुत दूर। बहुत शब्दों की दुनिया से दूर
- 31:57बहुत दूर निकल जाना शब्दों की दुनिया में जब वो नहीं मिलता।
- 32:08शब्दों की दुनिया से जब तुम मजबूर हो जाते हो, तेरी दुनिया से होके
- 32:24मजबूर होर चला। मैं बहुत दूर बहुत दूर चला।
- 32:47तेरी दुनिया से हो के मजबूर चला मैं बहुत दूर।
- 33:07बहुत दूर, बहुत दूर चला, तेरी दुनिया से दूर निकल जाओ।
- 33:25बहुत दूर निकल जाओ, शब्दों से सन्नाटा और सन्नाटों से भी आगे
- 33:43अनुभव की बातें। शब्दों में नहीं आती तुम्हारे
- 33:52दर्शन शास्त्र वहाँ आग लगा देना। दर्शन शास्त्र शोरगुल है।
- 34:03फिलॉसोफी की सारी किताबें फूंक देना और जो पढ़कर दिमाग में कचरा
- 34:12इकट्ठा किया वो नहीं जला देना, दूर निकल जाना, बहुत दूर निकल
- 34:22जाना। निःशब्दता से भी बहुत दूर है उस
- 34:31तत्वों में स्थित हो जाना जहाँ शोरगिल का नामो निशान है।
- 34:42शब्दों की दुनिया में तुम्हें तुम्हारा एहसास होगा।
- 34:50इससे दूर निकल जाना है यथार्थ के गरीब आना, सत्य के करीब आना।
- 35:01और जैसे जैसे तुम शब्दों से दूर निकलोगे, सत्य के करीब जाओगे, तुम
- 35:10अपनी सुधि खो दोगे। एक बिटिया ने पूछा।
- 35:18बाबा मैं तुम्हारे पास से दीक्षा लेने आई थी, परिवार समय।