Latest / Baba ji Vijay Vats / 25 Feb 26 - परमात्मा कौन है? आनंद, रस और मौन का रहस्य !! आनंद का वास्तविक मार्ग !! V.Imp!! Must Watch
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- 0:13बाबा जी प्रणव अगर आपको सारे संसार की मलकिए तो दे दी जाए तो
- 0:35आप इस संसार को कैसे चलाएंगे? छोटु राम।
- 0:56पहले से ही मैं संसार का मलक हूँ, पहले से ही सारी मलकियत मेरी है,
- 1:14तुम मुझे संसार की मलकियत क्या दोगे।
- 1:23और अगर तुमने ये प्रश्न पूछा कि व्यवस्था कैसे चलाओगे?
- 1:31तो व्यवस्था भी मैंने वेदना के हिसाब से लिख रखा है।
- 1:40ये तय है कि धरती नीचे खींचेगी। ये तय है कि सूरज के आस पास
- 1:49पृथ्वी गोल्डन के और अगर तुमने पूछा है पुत्र के संसार की
- 2:01व्यवस्था को कैसे चलावोगे? मानवीय अवस्था को जीव जन्तुओं की
- 2:09व्यवस्था को फिर आपका सवाल थोड़ा सा जायजा बनता है।
- 2:31अगर तुम कहो कि तुम ही संभालो, अभी तो कर्म करने की स्वतंत्रता
- 2:43मैंने मानव को दे रखी है, लेकिन अगर तुम कहो कि व्यवस्था ही तुम
- 2:57संभालो। फिर आप क्या करोगे?
- 3:10फिर मैं आपके सभी धर्म स्थलों को समाप्त कर दूंगा।
- 3:18शोकाज में पुत्र। ये मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा,
- 3:29चर्च ये तुम्हारे तीर्थ का का मक्का सब समर्थ करता हूँ।
- 3:45क्यों? क्योंकि ये तुम्हारे भ्रम हैं और
- 3:58ये भ्रम आपकी व्यवस्था ने बनाया। जीस व्यवस्था को आप मुझे।
- 4:15तो फिर पहला काम आपके सभी नकली श्रद्धा केंद्रों को समाप्त कर।
- 4:36वो मंदिर हो, वो मस्जिद हो, चर्च हो, गुरुद्वारा हो, सभी शास्त्रों
- 4:41को आग लगा दूंगा, क्या ये नहीं पूछोगे?
- 4:52बेटा क्यों? क्योंकि जहाँ मैं हूँ वो सही
- 5:08ठिकाना तुमने पाया? मैं बाहर की व्यवस्था को तोड़
- 5:19दूंगा ताकि तुम्हारा मुँह उनमें से खत्म हो जाए।
- 5:29अभी तो तीर्थों से मोह है, अभी तो काव्य से मोह है।
- 5:34अभी तो मंदिरों से मोह है, गुरुद्वारों और मस्जिद से मोह है
- 5:44और मैं जानता हूँ मेरा निवास कहाँ है?
- 5:55और मैं ये भी जानता हूँ कि वो नकली नकली है तुमने श्रद्धा के
- 6:02कागजी फूल निर्मित कर लिए, मैं उन कागजी फूलों को।
- 6:17तुम्हारे झूठों को मक्कारों को दुकानदारियों को समाप्त कर दूंगा।
- 6:29जब उपजक्त समाप्त हो जाए तो व्यक्ति स्वकेन्द्रित हो जाता है
- 6:35शब्द को सुन लेना। जब ऑब्जेक्ट समाप्त हो जाए तो
- 6:43व्यक्ति स्वकेन्द्र तो हो जाया करता है जैसे मैंने कहानी सुनाई।
- 6:51कोई वृद्ध स्त्री ने कॉटन जेनिंग एंड प्रोसेसिंग फैक्टरी रख ली थी।
- 7:01रुई की ऊंची ऊंची पहाड़ जैसे तह देख लिए थे तो साइकोलॉजिकल इफेक्ट
- 7:10आ गया था। कौन काटेगा कौन पीजेगा तो समझदार
- 7:19व्यक्ति ने। उसे आग ही लगा दे।
- 7:29कहा माता वो तो सारी आग लग गई फुक गया सब कुछ नहीं बचा।
- 7:42और वह वृद्धा प्रतक क्षण से ही होंगे तुम अगर आज इतने पागल हो
- 7:56तुम नहीं जानते। लेकिन मैं साक्षी सब जानता हूँ
- 8:08उसका कारण तुम्हारी चिपकाहटें हैं बाहर और अगर इन चिपकाहटों के
- 8:16बाहरी स्थल समाप्त कर दिए हैं। तो निश्चित रूप से तुम उसी ठिकाने
- 8:22पे पहुँच जाओगे जहाँ वास्तव में मेरा ठिकाना है ये मंदिरों,
- 8:35मस्जिदों, तीर्थों, गुरुद्वारों, काबा, मैं तुम मुझे ही ढूंढ़ते
- 8:44हो। और मैं कौन ये तुम्हें पता नहीं
- 9:04भला तुम्हें नाम क्या दूँ तुम्हें?
- 9:11मनुष्य कहूं, सूअर कहूं, कुत्ता कहूं?
- 9:15गधा कहूं, घोड़ा कहूं, क्या कहूं? क्योंकि सभी में मैं ही तो हूँ।
- 9:37मैं तुम्हारी बाहरी तलाशों को खत्म कर दूंगा और मेरे इस वाक्य
- 9:45को हृदय के अंतःस्थल पद पर लिख लेना, पुत्र।
- 9:54जब बाहरी ऑब्जेक्ट्स मैं खत्म कर दूंगा तो तुम धर्म से अपने भीतर
- 10:01जापोगे अभी एक छोटी सी तमन्ना जिसे चिपकाहट कह सकते हैं वो
- 10:17तुम्हें बांधे हुए। और इन चिपकाहटों के कारण ही तुम
- 10:26बेहर मौके हो जाते हो, क्या तुम ये नहीं पूछोगे?
- 10:35मैं कहाँ हूँ? हूँ तो मैं सब जगह कोई स्थान ऐसा
- 10:49नहीं जहाँ मैं नहीं सब जगह मैं ही मैं हूँ।
- 11:02लेकिन उसका पहुंचने का स्थल तुम्हारा अंतः का हृदय स्थान है,
- 11:11वहाँ से जाती है वो सीढ़ियों जो तुम्हें मुझे तक पहुंचाती है।
- 11:22और तुम तीर्थ घूम आए, काबा घूम आए, लेकिन अपने हृदय में नहीं
- 11:26घूमे, जहाँ से वो सीढ़ियों जाती है और हम मुझ तक पहुँच जाते है।
- 11:38एक ही चूक तुम अनंत जीवनों से कर रहे हो और चूक से ही चले जाता है
- 11:52तुम्हारे ग्रंथ में उलझा देते है। तुम्हारे तीर्थ फसल तुम्हें उलझा
- 12:01लेते हैं और ये तुम्हारी चिपकाहटों के कारण हैं।
- 12:11सदा ही मैंने बोला चिपकाहटों को समाप्त कर दो, ज़रा सोचिये अगर इस
- 12:22वृद्धा को यह व्यक्ति ये न कहता। कि उस रूई के ढेर को तो आग लग गई
- 12:34तो यह स्त्री ठीक नहीं होती थी। इसके भीतर लगाव लगा ही रहता।
- 12:43बोझ बना ही रहता कौन गातेगा कौन पेंजेगा?
- 12:50समझदार व्यक्ति ने ओबजेक्ट ही समाप्त कर दिया।
- 12:57मैं ओबजेक्ट ही समाप्त कर दूंगा और देखिये ना मैं इंसान हूँ।
- 13:05ना मैं सुवर हूँ, ना मछली हूँ, ना क्रोधी मनुष्य हूँ, ना कृष्ण हूँ,
- 13:13ना राम हूँ, ना मोहम्मद हूँ। ये तो मेरे पैरों का है।
- 13:25मैं इनसे पार इन सब का स्वामी दुष्टता,
- 13:42लेकिन तुम्हें क्या पता उर्लोभी सोचता है कि परमात्मा।
- 13:51कोई बहुत बड़ा उल्लू होगा जिसने ये सारा संसार बनाया वो कभी नहीं
- 14:01सोचता के उल्लू के अतिरिक्त उसने मनुष्य भी बनाया, गधा भी बनाया,
- 14:08घोड़ा भी बनाया इसी तरह तुमने। तुम कहते हो परमात्मा के अनंत हाथ
- 14:19है, शेरों पे बैठी है माँ, पर्वतों में रहती है माँ तुमने एक
- 14:25ठगाना नियत कर दिया। और जैसे ही तुम परमात्मा का एक
- 14:36ठिकाना नियत कर देते हो, तुम उसे चार दीवारियों में कैद कर लेते हो
- 14:44और मैं वो शै हूँ जो तुम्हारे बंधनों में।
- 14:55तुम लाख अच्छे अच्छे शब्द ईजाद कर लो, मैं तुम्हारी मस्ज़िदों के
- 15:04गुरुद्वारों के मंदिरों के तीर्थ स्थलों के बंधनों में आता हूँ।
- 15:11क्यों कि मैं एक स्थान में नहीं हूँ?
- 15:16ईशा बस से मैडम सर्वभम यह तकी यह सृष्टि अकेली पृथ्वी।
- 15:28ऐसी अनंत अनंत सृष्टियां और भी विद्यमान है।
- 15:35लेकिन तुम्हारी खोपड़ी सोचती है के परमात्मा कोई बहुत बड़ा
- 15:41आविष्कार हो। हो ही इज़ ए ह्यूज साइंटिस्ट।
- 15:49उल्लू भी ऐसा ही सुस्त होगा। गधा घोड़ा सुवर भी ऐसा ही सुस्त
- 15:58होगा क्योंकि उसको अपने होने के अतिरिक्त दूसरा होना दिखता है।
- 16:13शेप का हटे तुम खत्म ना कर पाओगे, ये है मुश्किल मामला है तो वो
- 16:25बुढ़िया पागल हो जाती अगर उई का ढेर को आग न लगते।
- 16:37ऐसे ही तुम भी पागल हो गए मछली सोचती के बहुत बड़ी मछली होगी
- 16:52जिसने ये सर्जना की परमात्मा है गधा सोचता बहुत बड़ा गधा होगा,
- 17:00घोड़ा सोचता बहुत बड़ा होगा। नहीं अस्तित्व में अस्तित्व और वह
- 17:17घोड़े में भी उतना ही है। जितना मनुष्य में मेंढक में,
- 17:26खरगोश में, मछली में, सूअर में ना गुरुद्वारे में कम ना मंदिर में
- 17:35ज्यादा ना तीर्थ स्थलों में ज्यादा।
- 17:40ना तुम्हारे घरों में कम, मैं सभी जगह बिल्कुल बराबर हूँ, जीता गीता
- 17:51गीता नाउ बिना ना में ना ही कोठा। ज़ाहिर शराब पीने दे, मस्जिद में
- 18:04बैठकर या वो जगह बता जहाँ खुदा का घर हो।
- 18:17ये तुम्हारी बुद्धि की करम आते है बुद्धि मैं बुद्धि भी हूँ, लेकिन
- 18:27सभी यंत्र तुम्हें भटकाते हैं। बुद्धि अपने ढांग से सोचती है और
- 18:40तुम्हें उलझा देती है, क्योंकि बुद्धि की सोचन शक्ति बड़ी छोटी
- 18:48है। शूद्र है कि तुम कहते हो अगर
- 18:56तुम्हें बना दिया जाए। व्यवस्थापक।
- 19:01मालिक सत्ता सौंप दी जाए तो वो तो मैं हूँ।
- 19:09सत्ता से पार्क भी हुआ है और ध्यान रखना सिर्फ मैं ही नहीं
- 19:16हूँ। तुम भी वो ही हो जैसे रात की परम
- 19:25शुक्ति में तुम अपने आपको भूल जाते हो जगा हुआ चौकीदार अपने
- 19:36आपको याद रखता है क्या चौकीदार? तुम भूल जाते हो ऐसे ही तुम सो गए
- 19:56सो गए हो मरे नहीं हो पूछते हैं लोग।
- 20:12तुम मंदिरों को मस्जिदों को, हम स्थलों को तीर्थों को क्यों मिटा
- 20:19दोगे? क्योंकि यह नकली है?
- 20:26भ्रम है, तुम्हारे तुम्हें चिपकाटें देते हैं और मुझे तक तुम
- 20:35तब आओगे जब तुम्हारी सभी चिपकाटें खत्म हो जाएंगी, तो फिर अगर तुम
- 20:44मुझे। व्यवस्था सूख दोगे पुत्र तो मैं
- 20:54तुम्हारी चिपकातो को बाहर से खत्म कर दूंगा क्योंकि मैं जानता हूँ
- 20:58भीतर से तो तुम खत्म नहीं कर पाओगे।
- 21:04यू कांट इरेस इट इंटरनली तुम इसे भीतर से तो समाप्त न कर पाओगे।
- 21:19खैर, मेरे पास एक ही उपाय है। बाहरी ऑब्जेक्ट को समाप्त कर दूँ,
- 21:29ना रहेगा बॉस नौ पैसे के पास और मैं से बाहरी चीजों को समाप्त तब
- 21:39ही करना चाहता हूँ। कि मैं जानता हूँ, मेरा ठिकाना
- 21:44इनमें है। मेरे ठिकाने का रास्ता तुम्हारे
- 21:48ही भीतर से जाता है और अपने भीतर तुम कभी कह क्योंकि इन्होंने
- 21:57जंजीरों की तरह। तुम्हें बेहरमुखी ही रखा बांध करो
- 22:05और तुम्हें इनकी गर्भ से कभी छूटे हैं तो जब मैं ऑब्जेक्ट्स को मिटा
- 22:12दूंगा, यही समाधान है मेरे पास। जब मेरा बनाया हुआ इंसान मेरी ही
- 22:27सृष्टि को समाप्त करने पे तुला तो मैं प्रला कर देता हूँ, इंसान
- 22:38खुराफाती हो गया। मैं कौन हूँ मैं ना मनुष्य हूँ,
- 22:58ना हाथी, घोड़ा ना सुवर ना उल्लू। अब ध्यान से सुनिए हू एमआइ मैं
- 23:20आनंद हूँ मेरी शास्त्रीय प्रभाषण जो तुमने।
- 23:31पढ़ ली, सीख ली सब गलत है आज तुम्हें मैं अपनी डेफिनिशन बताता
- 23:41हूँ, मैं आनंद हूँ। एक किताब में लिखा भी है उपनिषद
- 23:55में रसू वैसा मैं रसू मैं आनंद हूँ।
- 24:11और तुम मुझे ढूंढ़ते हो, तीर्थन कावा के पत्थर और वृक्षों में
- 24:25पेड़ पौधों में। जानवरों में, मंदिरों में, वाशरूम
- 24:37में, गुरुद्वारा में नहीं। यह रास्ता मुल्क तक जाता ही नहीं।
- 24:47तुम्हें पहले मुझ तक आने के लिए प्रवेश द्वार खोजना होगा।
- 24:53इसलिए सभी धर्मों ने अपने धार्मिक स्थलों का नाम गलत दिया सिर्फ सिख
- 25:01धर्म को छोड़कर। सिख धर्म ने अपने धर्म स्थलों का
- 25:08नाम रखा गुरुद्वार, यह सटीक नम तुम द्वार तक कभी पहुंचे नहीं।
- 25:19जीस द्वार में से निकलकर तुम गुरु तक हो सको तुमने नकली गुरुओं का
- 25:26सहारा लिया जो कि ठग थे दुकानदार थे, लोभी थे जो मरते भी थे।
- 25:40जो बेईमान भी थे, जो गद्दियाँ भी बदलते थे, लेकिन अनुभव से हीन थे
- 25:54जो वे स्टिक थे जो अहिंकारी थे। जो अपनी पूजा कराना चाहते थे,
- 26:02मेरी पूजा नहीं कराना चाहते थे। मैं ट्रांसफर नहीं किया जा सकता,
- 26:17यह कोई गद्दियों की तरह। रूपआंतरण का मामला नहीं, यह पैदा
- 26:24किया जा सकता है, यह खोजा जा सकता है और खोजने का ढंग है गुरुद्वारा
- 26:34पहले द्वार खोजो, फिर उस द्वार में प्रवेश कर जाओ।
- 26:40फिर आगे रास्ता तुम्हें मिल जाएगा तुमने अभी तक द्वार ही नहीं कोचा
- 27:01पहले द्वार कोचा सब मिटा दो तुम्हारी मान्यताएँ।
- 27:15रोज़ नए तीर्थ स्थल बनते हैं, रोज़ नए गुरु जन्मते हैं, द्वार
- 27:31खोजकर, द्वार में प्रवेश कर, और उस प्रवेश द्वार में जाकर तुम्हें
- 27:38पता चलेगा कि मैं कहाँ हूँ। मैं कौन हूँ तुम्हें बताया मैं
- 27:49आनंद रसो वैसो मैं रसो रूप इसलिए जब ईसा को क्रॉस पीरियड कहा जाते।
- 28:06ईशा ने एक शब्द कहा और तुम उसका अर्थ आज तक नहीं समझ पाए?
- 28:122000 वर्ष हुई थे। हे ईश्वर इन्हें क्षमा का दिन है
- 28:23क्योंकि ये जानते नहीं कि ये क्या कर रहे हैं?
- 28:28जीसको मिटाने चले वह कभी मिटता नहीं।
- 28:34मंसूर ने भी यही बात कही अनल हक मैं ही फरमा दूंगा ये मैं किसको
- 28:41संबोधन कर रहा था? मंदसौर का मैं आनंद को संबोधित कर
- 28:50रहा था। मैं आनंद हूँ, मैं रस हूँ, तुम
- 28:59शरीर के ढांचे को समाप्त कर दोगे क्योंकि तुमने सदा माना कि तुम
- 29:04सरीर। और जो तुमने माना उसको ही ध्वस्त
- 29:09कर दोगे क्योंकि उसको ही तुम मैं मानते हो तो मंसूर के शरीर को
- 29:15तुमने मैं माना, इसलिए मंसूर का शरीर तुमने काट दिया सोक्रेटिस का
- 29:22शरीर तुमने मार दिया। ईसा का शरीर तुमने सूली पे टांग
- 29:27दिया तो क्या कहा? ईसा ने तुम्हारी मूडता के ऊपर कहा
- 29:34इन्हें क्षमा कर देना यानी इन्हें सद्बुद्धि देना, जिसे ये मार रहे
- 29:40हैं। ओह मैं नहीं हूँ।
- 29:44मैं तो आनंद हूँ मैं सदा फिर भी बना रहूँ कटता हुआ ईसा भी नैनम
- 29:53षदंति शस्त्रान नैनम दहती पावका नैनम क्ले दंत जापों ने शोषण।
- 30:05मुझे आनंद को न शस्त्र काट सकता, ना आग जला सकती, ना वायु सुखा
- 30:15शक्ति, ना पानी का सकता मैं आनंद स्वरूप परास्वर।
- 30:21कोई तलवार की धार मुझे काट नहीं सकती, कोई आग की ज्वाला मुझे तपा
- 30:29नहीं सकती, मुझे गला नहीं सकती, मुझे सुखा नहीं हो सकती।
- 30:36मैं आनंद हूँ मनसूर विहसा मंसूर ने कहा अनलॉक, मैं ही खुदा और
- 30:52राजा ने कहा देखो हमारे धर्म में ऐसा कहना वंतन।
- 31:00मंसूर ने कहा, तुम्हारा धर्म नहीं बनता तो नहीं बनता, लेकिन मैं
- 31:06सत्य बोल रहा हूँ, मैं धर्म नहीं बोल रहा हूँ, मैं आनंद हूँ
- 31:13अनर्हक। हक हलाल का मतलब होता है सत्य
- 31:34आनंद रूपी सत्य और आनंद इस दृष्टि के गणगण में विद्यमान है।
- 31:48आनंद को तुम ई से कह लो, आनंद को तुम अल्लाह कह लो, मैं आनंद हूँ
- 32:01फिर अब तुम ऐसे सोचो जहाँ तुम्हें आनंद आता है वहाँ मैं हूँ।
- 32:11और आनंद की परिभाषा क्षुद्र मत रख लेना, क्योंकि इन्द्रियों के भी
- 32:17आनंद होते हैं वह एक सुराख रखे थे मुझे देखने के लिए।
- 32:28इंद्रों के आनंद से जो मैं दिखता हूँ वो वो तो ठीक है लेकिन एक
- 32:34श्रेणी कहें और मैं अखंड धारा हूँ आनंद की जो कभी टूटती नहीं नैनम्
- 32:45छिदंती शास्त्रण। कैसे भी करके मैं टूटता नहीं तुम
- 32:52काट दो तुम जला दो तुम गला दो तुम सूखा दो, मेरी परिभाषा ही तुमने
- 33:03गलत कर रही है ना मैं कहीं कैद किया जाता हूँ, ना मैं कहीं छुपा
- 33:10के रखा जाता। सब तुम्हारे बनाए हुए
- 33:20दुकानदारियों के तरीके तुमने मुझे शब्दों में डालने की चेष्टा की।
- 33:29यद्यपि मैं शब्दों में मिलता नहीं बल्कि सत्य देखो, तो मैं मौन
- 33:36परमौन में अवस्थित रहने वाला आनंद हूँ, मैं वहाँ हूँ जहाँ शोर की।
- 33:52धड़कने भी नहीं धड़कते शोर वहाँ तक फटक नहीं सकता।
- 33:58तुमने मुझे शब्दों में ढूँढना चाहा मैं नहीं मिला, मिलूंगा भी
- 34:03नहीं। मैं जब भी कभी किसी को मिला हूँ
- 34:14शोर के क्षणों में नहीं मिला हूँ, मैं जब भी कभी किसी को मिला हूँ
- 34:19याद रखना, मैं आनंद हूँ प्रेम के मोन लम्हों में मिला हूँ।
- 34:30शोर के लम्हों में तो मैं खो जाता हूँ ऐसा कहते प्रभु से क्षमा कर
- 34:40देना बिकॉज़ दे डोंट नो व्हाट दे अरे डूइंग क्योंकि ये जानते नहीं।
- 34:48कि ये क्या कर रहे हैं ये मुझे समाप्त करने की चेष्टा कर रहे
- 34:54हैं, जबकि ये जानते हैं कि मैं आनंद हूँ।
- 35:06ये सब पंच भौतिक शरीर को समाप्त कर देंगे क्या बिगाड़ेंगे?
- 35:14इस ढांचे को विकिरण कर देंगे मुझे विकिरण न कर पाएंगे क्यों मैं आना
- 35:27तुम्हारी सभी पाठशालाएं मंदिर मस्जिद को सारा चर्च ये
- 35:34पाठशालाएं? और जब किसी पाठशाला का रिसाल्ट
- 35:40जीरो आता है तो उसे बंद कर देना ही उचित होता है।
- 35:46ये विश्वविद्यालय तुम्हारे सत्य को।
- 35:52बताने के लिए से उजागर करने के लिए से यहाँ मौन होना चाहिए तुमने
- 35:56बड़ा शोर कर दिया तुमने बड़े बड़े लाउडस्पीकर से लगा दिया मौन के
- 36:03स्थल को तुमने शोर के स्थल में बदल दिया।
- 36:12ये अपना लक्ष्य प्राप्त न कर सकें।
- 36:24मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च ये विश्वविद्यालय से मौन होने के
- 36:33लिए। तुम मौन तो नहीं हुए, तुमने शोर
- 36:40फैला दिया, शोर फैलाने के यंत्र लगा दिए, 1 घंटे घड़ियाल लगा दिए।
- 36:47आर्तियां करते हो तुम शोर ज्यादा मचाते हो, कोलाहल बहुत ज्यादा कर
- 36:52देते हो, मैं हूँ तो सब जगह। लेकिन तुम्हारे घंटों की शोर में
- 37:00खो जाता हूँ, फिर बाजार के शोर और मंदिर का शोर, इनमें फर्क, कोई
- 37:08शोर शोर में कोई फर्क नहीं होता। मस्ज़िदों में अजान की गूंज भी
- 37:18मुझे तक नहीं पहुंचती क्योंकि मैं मौन हूँ, आनंद सदा मौन होता है और
- 37:29जैसे जैसे तुम मौन होते शौक। तुम्हारा स्वरूप ही आनंद मुझमें
- 37:34समते जाओगे, तुमने तुम्हारे विश्वविद्यालय की तरह बनाया,
- 37:45मैंने कहा बन जाने दो शायद व्यक्ति किसी लम्हे में आनंद के
- 37:52उन क्षणों में पर मौन में बैठा हुआ व्यक्ति।
- 37:57अपने अंतश के उस आनंद को छू ले, वो द्वार दिख जाए और परमात्मा
- 38:04मुझे आनंद तक पहुँच जाए, लेकिन नहीं तुमने पहुंचा।
- 38:14तुम कतलोरत में उतर गए, तुम बहसबाजियों में उलझ गए, तुम
- 38:21शास्त्र में उलझ गए, तुमने धर्म का भी दौड़ बना दिया।
- 38:32तुमने धर्म को भी कॉम्पिटिशन का एक डंका बना दिया।
- 38:36जबकि यह कर्म ठहराव था और ठहराव में कोई कॉम्पिटिशन नहीं होता।
- 38:45भागने में कॉम्पिटिशन होता है। यह कोई मैराथन की दौड़ना था।
- 38:55ठहरने में कभी दौड़ नहीं होती वरना दौड़ को बंद करना होता है।
- 39:04तुमने इन धर्मस्थलों में विश्वविद्यालय में मन होने की
- 39:07चेष्टा करने के बजाय शोर को बिखेरने की चेष्टा कर दी।
- 39:12शोर घनिभूत हो गया। कहीं देखो शोर है और सिर्फ शोर
- 39:22है, मैं ज्यादा तो कहीं नहीं, लेकिन उस शोर से पार बैठा रहता
- 39:34हूँ। इस इंतजार में कि तुम कब इस शोर
- 39:38को खत्म करोगे और इस शोर को खत्म होते ही मुझे पालोगे लेकिन तुमने
- 39:45ऐसा किया नहीं इसलिए अगर पुत्र व्यवस्था तुम मेरे हाथ में दोगे,
- 39:52मालिक तो मैं ही हूँ। और इस पृथ्वी का ने समग्र
- 40:01ब्रह्मंडों का मालिक सिर्फ मैं मैं मैं ही मैं ही मैं हूँ
- 40:12दूजापुर। बस यही कुछ करूँगा और कुछ नहीं
- 40:27करूँगा एक ही काम जो तुमने विकृत कर दिया उसी तुम्हारे
- 40:39विश्वविद्यालय में जहाँ मैंने मौन सीखाना चाहा था, तुमने शोर ज्यादा
- 40:46कर दिया। बाजार में शोर कम होता है जहाँ
- 40:52तुमने मोन में जाना था, वहाँ शोर तुमने घनी बहुत कर लिया, इसलिए
- 40:57मैं कहूंगा ये दुकानदारियाँ बंद कर दो, बंद कर दो।
- 41:11ज़िन्दगी के तोड़ दूँ।
- 41:35इसमें अब कुछ भी नजर। आ ता न कौरी सागर दिल को बहला ता
- 41:56न। देखो जी में भी करा आता न कोई
- 42:12सागर दिल को वह ला। तथा नहीं
- 42:32करे तो सब थे कारवां के साथ सा। कल तो सबसे कारवां के साथ सा आज
- 43:04दिखलाता न तोड़ दो इनको ज़िन्दगी के आइने को तोड़ दो इसमें अब कुछ
- 43:25भी नजर आता है तुमने बहुत। भेद पैदा करेंगे और अब आईना बचा
- 43:37नहीं। अब भेद ही भेद है और जीस आईने में
- 43:42भेद हो जाए, दरारें पड़ जाए। उसमें तुम्हें अपना चेहरा दिखेगा।
- 43:49खंडित आईना तुम्हें परिपूर्ण अपना चेहरा नहीं दिखा सकता, इसलिए इनको
- 43:55तोड़ दो। बेहतर होगा मैं ही तोड़ दूंगा।
- 44:07तो मालिक तो मैं हूँ वो तो बनाने की चेष्टा मत करना, लेकिन मेरी
- 44:16परिभाषा तुमने गलत कर दी। मेरी परिभाषा तुमने शब्दों में।
- 44:26किसने ओंकार कहा, किसने राम कहा? सब ने अपने अपने नाम दे दिए हैं,
- 44:37लेकिन नाम में मैं नहीं हूँ। नाम एक शॉवर है।
- 44:42शोर मैं मैं मिलता नहीं हूँ, मैं मिलूंगा मौन के लम्हों में मैं
- 44:47शिव हूँ याने सदा हूँ सनातन हूँ सदा रहूँगा शिव हूँ याने स्थाई
- 44:58हूँ कभी टूटता नहीं। कभी गलत नहीं जलता।
- 45:03नहीं कभी वासु विभूत नहीं होता। मुझे सेब की तरह ही खोजो, इन
- 45:12खंडित आईनों की तरह मुझे मत खोजो और मुझे नामों में मत खोजो मैं
- 45:19आनंद हूँ। मैं रस हूँ बस जहाँ तुम्हें आनंद
- 45:23मिले, जहाँ तुम्हें रस मिले, वहाँ मैं ही हूँ और तुम मुझे कभी छोड़
- 45:32ना पाओगे मेरी याद तुम्हें सदा सदाती ही।
- 45:41जानते नहीं ये जो तुम दुखी हो यह मेरी याद सता रही है तो दुखी तुम
- 45:51मुझे तक आना चाहते हो, तुम आनंद तक आना चाहते हो?
- 45:58आ नहीं पाते क्यों तुम गुरुद्वार पे नहीं पहुंचा मिटा दो इन बंदरों
- 46:10मस्ज़िदों को मिटा दो इन धर्म स्थलों को इनमे नहीं है गुरुद्वार
- 46:16गुरुद्वार तो तुम्हारे हृदय में है मैं इसलिए मिटा दूंगा कि ये
- 46:22तुम्हें। भ्रम देते है, यह परमात्मा के
- 46:27स्थान नहीं। परमात्मा का स्थान तुम्हारे ही
- 46:32भीतर है। हर वक्त तुम्हारे संग रहता है।
- 46:43कहीं नहीं जाता, तुम चले जाते हो उसे छोड़कर बड़ी दूर और आज यही
- 46:48हालत तो है तुम उसको छोड़कर बहुत दूर चले गए हो और यही बिछो।
- 47:03तुम्हारे दुख का कारण है तुम इसको परिभाषित कैसे?
- 47:09हमारे पास धन नहीं है, पद नहीं है, मान नहीं है सम्मान नहीं है,
- 47:13इसलिए हम दुखी है नहीं तुम्हारी भाषा गलत है।
- 47:19तुम में रस नहीं है, तुम में आनंद नहीं है, इसलिए तुम दुखी हो तुम
- 47:23रस को छोड़ कर आ गए, तुम आनंद को छोड़ कर आ गए इसलिए तुम दुखी हो
- 47:29फिर से वापस आ जाओ जैसे जैसे दूर निकलते हो तुम्हारा आइना खंडित
- 47:37होता है। उसमें तुम्हारा स्वयं का तत्व
- 47:41दिखाई नहीं पड़ता। फजी के रोच करीबी और कहाँ जाइएगा।
- 47:59जहाँ जाएगा हमें आएगा आज रूठकर। अब कहाँ जाइएगा
- 48:39कहीं भी चले जाओ मैं ही मिलूंगा, लेकिन तुम्हें गुरुद्वार खोजना
- 48:46होगा। यह गुरु नहीं जो पाखंडी है।
- 48:54जो तुम्हें नाम दान देते हैं नहीं वो गुरु ज्योति में मौन तक पहुँच
- 48:58जाता है, जो गुरु ज्योति में परम मौन में ले जाता है।
- 49:04ये तो तुम्हारे बनावटी गुरु हैं, तुम तो पत्थरों को भी कुछ लेने लग
- 49:09जाते हैं। यह पागलपन का एक ढंग है।
- 49:17और ये पागलपन का कोई भी ढंग तुम्हें मुझे आनंद रस तक नहीं
- 49:22पहुंचा देता। तुम चूक चूक के चले जाते हो, मैं
- 49:30सेव हूँ। मैं आनंद हूँ, मैं रस हूँ सभी
- 49:38परिभाषाओं को छोड़ दो, सही परिभाषा यही है, सभी परिभाषाएं
- 49:45गलत हैं, सही परिभाषा ये है कि मैं आनंद हूँ, मैं रस हूँ।
- 49:52जब तुम वापस आओगे तो पाओगे देखता हूँ अपने घर को सोचता हूँ।
- 50:09अपने घर को देख कर जैसे कभी छोड़कर अलग हो गए थे, उसकी याद
- 50:19सताती ही रहे। सोचता हूँ अपने घर को देख कर हो
- 50:37ना हो ये है मेरा देखा हुआ। हो ना हो ये है मेरा देखा हुआ
- 50:55जन्मो जन्मो, कारण का है, यह देखा हुआ है वर्ण यही तुम हो।
- 51:08शिव, हम। शिवम् अमर आत्मा, सचिदानंद शिवम्।
- 51:42शिओ हम शिओ हम शिओ हम अमर हात मा सचिदानंद।
- 52:02जिसे शस्त्र काट न अग्नि जलाये गलाये न पानी।
- 52:18न वायु सुखाय, वही सर शिदानंद आनंद, मैं हूँ।
- 52:35वहीं सचिदानंद आनंद में हूँ शिवा, हम शिवा, हम शिवा, हम शिवा अमर
- 52:52आत्मा। सचिता हिंदू मैं शिवोहम शिवोहम।
- 53:15धन्यवाद।