Latest / Baba ji Vijay Vats / 7 Nov 25 - क्या ज्ञान के भंडार को इस तरह सर्वजन के लिए उपलब्ध नहीं होना चाहिए? Baba Ji Vijay Vats Satsang
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- 0:15अवधेश प्रसाद बाबा आप अमूल्य मोतियों को हीरों को जुहरातों को
- 0:34बिना मूल्यों के ये जो प्रसारित कर रहे हैं।
- 0:41यह ठीक नहीं है। ज्ञान के भंडार को इस प्रकार
- 0:54सर्वजन के लिए उपलब्ध नहीं होने देना चाहिए।
- 1:02अवधेश ऐसा लगता है कि तुम किसी को राजन
- 1:21गुफा में से निकल के आए लाखों साल पुरानी गुफाएं।
- 1:30कहीं छिपे पड़े थे अवधेश क्या तुम उस कालखंड की बात कर रहे हो जब
- 1:46ज्ञान को सर्वजन के लिए उपलब्ध नहीं करवाया क्या?
- 1:59उन्हें शूद्र कहा गया, उनको दंडित किया गया जबकि वो हमारे जैसे मानव
- 2:06भी थे। इस तरह ज्ञान के भंडार को हरे
- 2:15मोती जोरातों को बिखेर देना। सर्वजन के हितार्थ ठीक नहीं है।
- 2:23बाबा न तो मैं सर्व हूँ, न मैं आचार्य हूँ, न मैं फेरी डालने
- 2:45वाला। कोई मांगता हूँ और नहीं, मैं राम
- 2:53हूँ, अगर तुम सीधा सु हो तो इसे अगले
- 3:09शब्द मैं बोलूं तुम यहाँ से चले जाओ।
- 3:18पहली बात तो जो मैं बोल रहा हूँ विज्ञान नहीं है ज्ञान की सूचना
- 3:28भर है। इसे सुनकर आप मार्ग ले लें और
- 3:46गंतव्य की ओर निकल जाएं। तुमने कहा पुत्र ऐसे हीरे मोती
- 3:57जोहरा बांट रहे। सर्वजन के लिए हितार्थ है, पहली
- 4:07बात न तो मैं मूर्ख हूँ, न दूसरों को मूर्ख बनाना।
- 4:13चाहता हूँ। मैं कोई सर नहीं हूँ जो सूचनाओं
- 4:25को ज्ञान के आधार पे बांटे, ना ही कोई आचार्य जो सूचनाओं को ज्ञान
- 4:39का भ्रम देकर कोनेन के ऊपर शुगर चढ़ा।
- 4:43के। ज्ञान के नाम पे बेचते मैं तुमने
- 4:54कूड़े कचरे को शब्दों को ज्ञान समझा शुरू से।
- 5:05यह तुम्हारा पारंपरिक दृष्टिकोण इसी भ्रम के कारण तुमने सूत्र को
- 5:21शूद्रों के साथ। अमानुषिक व्यवहार किया लेकिन मैं
- 5:31तुम्हारे आचार्यों की तरफ पागल थोड़ी मैं जानता हूँ।
- 5:38यह ज्ञान है नहीं ज्ञान तक जाने की सीढ़ी है, रस्ता है।
- 5:45ये शब्द है तो थे। इन पर अमल करना होगा, इन्हें
- 5:56सुनना तो होगा लेकिन सुनना ही काफी।
- 6:07इतना सुनो कि तुम्हें चलने पर बाध्य होना पड़े भला क्या राम को
- 6:22ये पता नहीं था अगर बहुत गौर से देखोगे?
- 6:34राम एक बोले लेकिन अशिक्षित व्यक्ति नजर आ रहे हैं जैसे पढ़े
- 6:41लिखे ना जगह जगह पर उन्हें। मार्ग दिखाना पड़ता है।
- 6:57सीता को लंका का राजा हरन करके ले गया इस सूद्र से प्रार्थना कर रहे
- 7:07हैं भगवान श्रीराम हमें मार्ग दो। 3 दिन बीत गए, विनय करते करते
- 7:21कहाँ? राम की पॉलिसी कामयाब हुई, राम की
- 7:24पॉलिसी बुरी तरह पिट गई। आखिर में शीख नाक की घृजना के
- 7:32लक्षण भैया ये दुष्ट है और दुष्ट विनय से कवि मंथन विनय नमानत
- 7:47इजजड़ विनय नमानत इजड़ गए 3 दिन बीत।
- 7:54बोले राम जकोप तब भए बिन होई न प्रीत हाँ तुम्हारी बात ठीक है,
- 8:06दुष्ट कभी बातों से नहीं मानता दुष्ट कभी नारों से नहीं मानता।
- 8:12यही कृष्ण ने कहा हे ब्रोहो कर्पण्य दोषोपह स्वभाव परीक्षा
- 8:23मिताम धर्मसमुर्ण चिताह यक्ष्रय अनिश्चयम रोहितम में शिष्य।
- 8:33शादी ईमान तोम पर कायरता के दोस्त से मैं ग्रसित हुआ किंग कर्तव्य
- 8:45विमूढ़ हो गया मुझे पता नहीं बट शुड आई डू ऐट थिस क्रिटिकल सर।
- 8:57मुझे इस वक्त क्या करना चाहिए? युद्ध के मैदान में बैगल बज चुका
- 9:02है। कृष्ण कहते हैं शस्त्र उठा ले जो
- 9:20गांड़ी तुने फेंका वही काम करेगा। इस वेला में तेरे भीतर मोहो कैसे
- 9:37जन्म हो गया? यह है वेला तो लड़ाई करने की,
- 9:48लेकिन प्रभु सामने तो मेरे पिता मैं।
- 9:53सामने तो मुझे विद्या सिखाने वाले वाण विद्या सिखाने वाले गुरु तो
- 10:01कृष्ण कहते हैं, जब गुरु दुष्ट हो जाए उसके विरुद्ध भी शस्त्र उठा
- 10:08लेना धड़क। जब पिता पक्षपाती हो जाए तो उसके
- 10:22विरुद्ध भी शस्त्र उठा लेना धर्म है यूं जु सु ने ऐसा किया
- 10:28धृतराष्ट्र उसका पिता था, लेकिन यू जु सु।
- 10:36पांडवों के खेमे में चला गया। युद्ध करने के लिए पिता पक्षपाती
- 10:43हो, क्या यही कृष्ण कहते हैं? अर्जुन कहते हैं फिर मैं क्या
- 10:50करूँ कृष्ण का स्पाट। सीधा सा जब आप वध करते हैं इनका
- 11:00और क्या अचार डालेगा इनका इनका वध करते हैं।
- 11:06इनको बदला नहीं जा सकता। यह गलती मत कर।
- 11:13ना ही ये पूजने योग्य नहीं है क्योंकि जब शाम ने आके खड़े हो गए
- 11:17हैं तो पूजने योग्य कहाँ रह गए? शस्त्र उठा के तुम्हें मारने के
- 11:26लिए उदित है। वह तुम्हारा पितामह, वह तुम्हारा
- 11:33गुरु कैसे रह गया? फिर मैं क्या करूँ?
- 11:38भगवान पृशामी तुम धर्मसमूह चेतवा? मैं डमंड हो गया किंग कर्तव्य
- 11:57मोड़ मुझे अपना कर्तव्य समझी नहीं आता सेंसर से ग्रस्त मैं।
- 12:05या श्रेयस या निश्चिंत रोगी तन्मय मेरे लिए अब जो सर्वश्रेष्ठ है वो
- 12:11बताइए शिष्य से अहम् मैं आपकी शरण में हूँ शाद इमाम तो हम पर पन्ना
- 12:20माँ मुझे बताइए श्रेष्ठ कर मार्ग कौन सा है मेरे लिए?
- 12:25इस गाड़ी में इस वक्त में यही तो किया तुम्हारे पंडितों की चालू है
- 12:41लेके क्या कहे यही भोंख से फिरते हैं मेरे प्रमोशन सुनते हैं।
- 12:55इसलिए मैंने पिछले में कहा वह कमाना जो तुम्हारी संग जाए, वह मत
- 13:05कमाना जो यही रह जाए। माना।
- 13:11वह शरीर के लिए आवश्यक है, जरूरत है उसकी, लेकिन ज़िन्दगी नहीं है,
- 13:17वो जरूरत है, उसकी ज़िन्दगी नहीं है, वो जीवन देता है, ज़िन्दगी
- 13:28नहीं देता। वह कमाना जो संघ जाएगा, संघ
- 13:36जाएगा। आनंद वह सुख जिसके भीतर कोई
- 13:48उत्तेज न हो नॉन स्टिमुलेशन। वह आनंद तुम्हारे संग जाएगा
- 13:58क्यों? क्योंकि आनंद ही तुम्हारी
- 14:02कॉन्शसनेस लेवल को बढ़ाएगा। कॉन्शसनेस लेवल का सम्पूर्ण हो
- 14:08जाने का एक अर्थ ये भी है। के आप से बड़ा कोई खुश और नसीब
- 14:16नहीं हो सकता। इसलिए ऐसे व्यक्ति को भाग्यवान
- 14:20कहा गया। भगवान कहा गया जिससे बड़ा भगवान
- 14:26कोई हो नहीं सकता जिससे बड़ा भाग्यवान कोई हो नहीं सकता।
- 14:32सबसे बड़ा कुशन नसीब कौन? जिसकी कॉन्शसनेस लेवल 100% तक
- 14:40ग्रो होगी। उसने चेतना के आकाश को छू लिया।
- 14:53वो ही सोचना, वो ही कर्म करना, वो ही कमाना, वो ही संग्रहीत करना।
- 15:01संग्रह यह भी है, लेकिन यह संग्रह ऑटोमेटिक है।
- 15:11इसे प्रकृति संभाल लेती है, तुम्हारा असली खजाना है कितने
- 15:17तालों के बीच में लॉकर के बीच में यह छुपाया गया।
- 15:23इसे हम चेतना कहते हैं, जो जड़ पत्थर से चली।
- 15:30और आज अपनी सम्पूर्णता को उपलब्ध हो गए जो लिमिट लेस हो गई।
- 15:40मैं जानता हूँ तुम कहाँ से बोल रहे हो और तुम्हारे जैसे फिलॉसोफर
- 15:50ने इस दुनिया को नर्क बनाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी।
- 15:58आज अगर ये स्वर्ग सी धरती नर्क में तब्दील हो के जगह जगह बम
- 16:06विस्फोट हो रहे हैं, मैं जाइली गिर रही है आइटम फूट रहे हैं।
- 16:15यह तुम्हारी इसी मनोदशा के कारण है ये जो आज तुम्हारे लटके लटके
- 16:22चेहर हैं उदास कहाँ गया वो संतत्व का आनंद झूमता नाचता हुआ वो मीरा
- 16:34सा नृत्य। कहाँ गया?
- 16:36वो नानक की वाणी गाते हुए उसकी शलाना करते हुए उसके गीत
- 16:47गुनगुनाते हुए कहाँ गए वो शब्द, कहाँ गया वो कीर्तन?
- 16:55कहाँ गई वो आनंद की धारा? आज खूब उन आनंदित शब्दों के साथ
- 17:09कोई वीणा किरदार नहीं गुजरा है। एटम के पटाखों की आवाज आ रही है।
- 17:22ये तुम्हारी इसी मानसिकता का फर्ज है।
- 17:28ऐसी मानसिकता वाले लोग धरती पर पैदा हुए हैं।
- 17:32उन्होंने धरती को आज नरक बनाने में।
- 17:34कोई कोर कसर बाकी नहीं छुड़ी आवाज है नहीं, लेकिन तुम्हें नहीं पता
- 17:42वह है और हैं और भटकते ही रहेंगे। अश्वथम की कथा तुम्हें क्या
- 17:52सिखाती? जो बदले की आग में जले मैं
- 18:03पांडवों का वंश नाच कर दूंगा, उसने कर दिया द्रोपदी के पांच
- 18:10पुत्र उसने मार दिए लेकिन बच्चे तो फिर भी क्या?
- 18:23कृष्ण ने एक को बचा लिया, परीक्षित को बचा लिया और बदले की
- 18:38आग में जलता होगा। अशु थमा है तो ये कहानी।
- 18:46आपको एक मोरल समझाने के लिए कहानी है?
- 18:49वैसे कोई ऐसा अमर तत्व अश्वथम है जो शरीर धारी रूप में जहाँ कहीं
- 18:59विचरता है ये जो गप्पे हैं ये सब आप जैसे लोगों की।
- 19:07कोई न स्वथमा है, न कोई हनुमान है जो कि इस धरती पर बिछ रहे हैं, न
- 19:16कोई आठ हमर हैं, ये तुम्हारी पंडितों की बनाई हुई गप्पे हैं।
- 19:22इसका कुछ कारण और ही है। मैंने बहुत बार बताया कहोगे तो
- 19:29फिर से व्याख्यात कर दूंगा, लेकिन अभी तो जो प्रसंग है उसे चरने दो?
- 19:43बाबा? आप हीरे, मोती, जो ह्रात इन्हें
- 19:47महंगे महंगे बिखेर रहे हो, सर्वजन हिताय और क्या करूँ?
- 19:57क्या करूँ? जब संत की गगरिया भर जाती है आनंद
- 20:08के रस्य और तुम्हें मालूम नहीं क्योंकि तुम्हारी गगरिया आनंद के
- 20:16रस से भरी है नफरत के जहर से भरी हुई है जो झलक रही है।
- 20:24आनंद के रस से सिर्फ संत की गगरिया भरते हैं, वह छलकती है।
- 20:33संत की गरिया जब भर जाती है तो छलकती है।
- 20:43बाबा नानक के गले से संगीत वन के पर छूटे तो होती है और ज़रा बताओ
- 20:53तो जो गगरिया भर जाए। और फिर भी उस स्वच्छ कंठ से आता
- 21:00हुआ गगन मंड से आता हुआ को आनंद रुके ना भरता ही जाए गगरिया को तो
- 21:09वह आने वाला अमृत जाएगा क छलके। और संत कृपाण नहीं होता, ना ही
- 21:23संत झूठ बोलता है ना ही संत तुम्हें।
- 21:26गुमराह करता है। बहजो गगड़िया भर गई, वहज चल गई एक
- 21:44अफसाना प्रकट होता है गगरिया के भर्त है और गीत बनकर गले में आ
- 21:51जाता और जो वहाँ पे उतर जाता सुनाना।
- 21:58भेजने मुश्किल सुनाना, भेजने, मुश्किल छुपाना भी जिन्हें
- 22:15मुश्किल। सुनाना भी जिन्हें मुश्किल छुपाना
- 22:25भी, जिन्हें मुश्किल हाँ तू ही बता ए दिल।
- 22:37वफ़साने कहाँ जाएं? सुनाना बे ही जिन्हें मुश्किल
- 22:51छुपाना भी। जिन्हें मुश्किल सुनाना भी
- 23:01जिन्हें मुश्किल छुपाना भी जिन्हें मुश्किल ज़रा तुम।
- 23:13ही बता ए दिल वो अफसाने कहाँ जाएं ज़रा तू ही बता ए दिल।
- 23:31वो अफसाने कहाँ जाएं ये अफसाना जो पैदा हुआ उस रस से जिससे गगरिया
- 23:44भर गई छलक गया रस। बरसेगा नहीं छलकेगा नहीं तो और
- 23:54कहाँ जाएगा तुम्हारी ये बातें लोग से आई हुई बातें ये उस जमाने की
- 24:06बातें हैं जब लोग ही पुरुष अधिकाधिक हुआ करते थे।
- 24:19और उनके राजा थे। राम लोग भी कहते हैं छुपा लो
- 24:32बांटो मत जिन्हें तुम शूद्र कहते हो उन्हें तुमने बांटा।
- 24:45ब्राह्मण ही पड़ेंगे, ब्राह्मण ही गद्दी पर बैठेंगे।
- 24:48ब्राह्मण ही सभी इगारों में स्थित हो गए।
- 24:55आज वही कुछ चल रहा है। फिर फिर से वही भृगु संगता शमा
- 25:01करना। मनोसमृति लागू करना चाहता है यह
- 25:12समाज का भ्रष्ट वर्ग छुपाओ। ज्ञान को बांटो मस्त पहली बात तो
- 25:26ये ज्ञान है ज्ञान की तरफ जाने का मार्ग है क्योंकि ज्ञान शब्दों
- 25:33में आता नहीं। ज्ञान को परिभाषित नहीं किया जा
- 25:41सकता। ज्ञान कैनट बी डिफाइन्ड ये शब्द
- 25:52हैं शब्द मार्ग बताते हैं एक मैप की तरह।
- 25:56लेकिन मैप गंतव्य नहीं होता। मैप मंजल नहीं होती कोरे कागज़ पे
- 26:05खींची हुई कुछ लकेरियां होती शब्द मैप कोरे कागज़ पर।
- 26:15खींची हुई कुछ लकीरें तुम्हें वहाँ तक पहुंचा देंगी अगर तुम
- 26:19चलोगे लेकिन अगर तुम इस नक्शे को छाती से चिपका के बैठे रहे जो कि
- 26:30आज बैठे हो तो इससे बड़ी मूर्खता कोई नहीं होती।
- 26:35ये जो पाक खंडी आज कह रहे हैं, रात ही रात ही करो राम राम करो
- 26:39हरी हरी करो ये सब पाक खंडी इन्होंने देखा नहीं ये नक्शा नवी
- 26:47से ही। नक्शों का सब पता है राहों का कुछ
- 27:04पता है राहों के कभी चले हैं न कभी मंजिल को छु ये नक्शा नबी
- 27:15श्लोक। सब लक्ष्मी झा लेकिन चले तो दो
- 27:23कदम भी न पहुंचे तो दो कदम भी न हैरानी की बात है मरीज।
- 27:36आज प्रवचन कर रहे हैं। जिनको अपनी बीमारियों का इलाज
- 27:42करना चाहिए वो आपको परमात्मा की शिक्षा दे रहे हैं।
- 27:52अंधे रंगों का वर्णन कर रहे हैं अनपढ़ लोग, गद्दी निशी हैं
- 28:07मूर्खों का टोला इन गद्दी निशीनों के साथ।
- 28:23और तुम? इनकी चिकनी चूपड़ी बातों में आ
- 28:29जाती है। चिकनी चूपड़ी बातें तू ये कब के
- 28:36घर है? इन्हीं ने तो फैलाया।
- 28:41ये द्वेष भरा पूरा पुरषण सुगंधी से भरा हुआ ये देश जिसकी माटी
- 28:55सुगंध उगती थी, आज तो यहाँ के फूल भी सुगंध नहीं उगलते।
- 29:04फूल भी बैठे गाने कैचे कुचरे उछी गर्दन वाली ये उपदेश दे रहे हैं
- 29:12तुम्हें भगवान को। और तुम हो तुम्हारे सोन के तुम तो
- 29:31परमात्मा से दंडित नहीं हो, तुम तो देखभाल के चलो।
- 29:41तुम्हें लाठी की आवश्यकता क्या है आँखें?
- 29:43क्यों हैं जब कोई। व्रती उस अंत स्थल पे पहुंचता है
- 29:59तो वह रस छलकता है गगरिया भर जाती।
- 30:05घगड़िया भर जाती, फिर छलकती वो छलकती ही घगड़िया का रस जाए, तो
- 30:12जाए कहाँ? तो छुपाया भी नहीं जाता, वो तुम
- 30:23बताने भी नहीं देते। ऐसा लो तुम कहाँ से लेके आये कोई
- 30:28आरएसएस के सदस्य को नहीं छुपाना भी जिन्हें मुश्किल बताना भी
- 30:44जिन्हें। मुश्किल जिन्हें ज़रा तुम ये बता
- 30:57है दिल अफसाने कहाँ जाएं। कहाँ जाएंगे उरस जो बिखर गया
- 31:09गगरिया तो भर गए, ओह छलके तो तुम छलकने नहीं देते, तुम कहती हो बंद
- 31:19रहो। डब के टक्कर ला दे मुस्क ना निकले
- 31:29बार की सा ग अच्छा मेम ना आ पहुंचा दरबार तुम आदमी हो जा ऊ द
- 31:46बलाओ। तुम बातें उद बिलाग जैसे ही करते
- 31:52हो जिनको तुमने हीरे जोहरत माना। यही तो गलती खा गए।
- 32:04आज मैं तुम्हारी ऐसी गलती हो तो ये हीरे जोहरत हैं।
- 32:11हीरे द्वारा तो कभी प्रकट नहीं किये जा सकते वो तो अनदेखे
- 32:21तुम्हारे शब्दों द्वारा अनछुए तुम्हारी बुद्धि द्वारा अनप्रकाश।
- 32:29तुम्हारी बुद्धि वहाँ पहुँच ही नहीं सकती उस बुद्धि को छोड़ के
- 32:33जाना पड़ता है जो शब्दों में नहीं आता उसे तुम हीरे मोती।
- 32:45और अगर कोई संत गाकर बताने की चिष्टा करें, अगर कोई संत किसी
- 32:54माध्यम से तुम्हें इशारा करने की कोशिश करे तो तुम ऐसे ऐसे प्रश्न
- 32:58करे कर देता। इन्हीं प्रश्नों ने तो हिंदुस्तान
- 33:02को नर्क बना दिया। 3600 को में पैदा कर दी।
- 33:08इसने किसी मान के भीतर किसी हिंदू, मुसलमान, सिख, इसाई के
- 33:16भीतर कोई अंग परमात्मा ने ऐसा कमजबत्ती डाला।
- 33:22जिससे तुम धर्म बना दिए नहीं डाला, बिल्कुल यज्ञ सा बनाया और
- 33:32यज्ञ सा बनाया। इसलिए तुम धर्म बदल भी सकते हो।
- 33:36बाबा साहब अंबेडकर ने हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म अपना लिया, क्यों?
- 33:42क्योंकि भगवान ने तो वही खुश बनाया।
- 33:44धर्म तुम्हारे उपकय चिपकाए हुए है जब चाहे एक चिपकाहट को उतार दो या
- 33:51वस्त्रों को उतारने की तरह है। वसांझी ऋण यथा विहाय।
- 34:00नवानी घृणार्थी नरो प्राणी तथा श्री रानी विहाय घृणा अनन्याणी
- 34:05सयाथी नवानी। यह वस्त्रों की भांति है, जब चाहे
- 34:11उकार दो, जब चाहे नए। तो मैंने कल ही एक नए धर्म की
- 34:21धर्म नहीं करूँगा, लेकिन कहना पड़ता है क्योंकि शब्दों के बिना
- 34:27मैं समझा नहीं सकूंगा। शब्दों के बिना तुम समझ नहीं
- 34:32सकोगे बात अटकी रह जाएगी। यह फासला मिटेगा नहीं, हम सिया न
- 34:46गया हम से बुलाया न गया। असला प्यार में दोनों से मिटाया न
- 35:06गया हमसे आया न गया। पर एक सांझी कन्वर्सेशन लैंगुएज
- 35:20बना देंगे। उसके बिना तुम समझ नहीं पाओगे, हम
- 35:25समझा नहीं पाएंगे, लेकिन कन्वर्सेशन इस नॉट आनंदा।
- 35:35शब्दों का जार शब्दों के जाल से ही मैं तुम्हें समझा सकूंगा और
- 35:45शब्दों के जाल आनंद नहीं हैं ये समझ लेना।
- 35:51बस इतना फर्क संत जब बोलता उसके शब्द आनंद से लेबरते बढ़ के आते
- 35:59है गच गच हो के आते है और तुम्हारे आचार्य जब बोलते है तो
- 36:06रस की एक बोझ भी ज़रा साथ नहीं आती, क्योंकि रस उन्होंने चखा
- 36:10नहीं। रस के दरबार में वो पहुंचे नहीं।
- 36:16उनकी यूबा के साथ शब्दों में मेरा सेलेब्र तबड के आएगा।
- 36:20किस यही फर्क है? अगर तुम समझ सको तो।
- 36:30तुम कहते हो बाबा, यह सार्वजनिक नहीं होना चाहिए।
- 36:37क्यों यही तुम्हारी बुद्धि बुद्धिहीन होने का प्रमाण बुद्धू
- 36:47होने का प्रमाण? शब्द परमात्मा को ले जाने तक
- 36:53परमात्मा तक ले जाने की सीढ़ी तो है, लेकिन शब्द परमात्मा नहीं है
- 37:04और तुम सीढ़ी से ही चिपक। यही तुम्हारी मूर्खता है, आज देखो
- 37:12डेरों में बैठे लोग कैसे धड़ाधड़ मरा फिर रहे हैं, किसी को मिला तो
- 37:20मुझे बताते हैं मिले कभी नहीं मिला भी नहीं था।
- 37:29मिलेगा भी नहीं। सच सच ही था आज सच जुगाद सच है भी
- 37:36सच नानक हुसीं भी सच शब्दों से निबित।
- 37:48तुम क्या चाहते हो? मैं भी उसी तरह का वातावरण फिर से
- 37:54करियर करने के भीतर सहयोग करूँ बिलकुल नहीं करूँगा।
- 38:01मैं काटूँगा और बुरी तरह काटूँगा। तुम्हारे अंधविश्वासों को
- 38:08तुम्हारी मूलताओं को तुम्हारी बुद्धू मान्यताओं को मैं काटूँगा
- 38:15काठता ही चला जाऊंगा धर्म नाचो गाओ करो आनंद।
- 38:32ये तुम्हारा तुम यह भाड़ जोकने करी आया, पर महात्मा ने इतनी
- 38:38मशक्कत से यह सर्जना बनाई, तुम्हें जीवन दिया, तुम्हें जन्म
- 38:48दिया, तुम्हें मानस का चौरा दिया। क्या राधे राधे करने के लिए दिया
- 38:56ये उल्लू के पुट्ठों को समझ नहीं आता के जीने की अपनी एकता सीर
- 39:01होती है। कहाँ राधे राधे में इतना आनंद?
- 39:09जहाँ जीवन की उससे चेतना में आनंद है, फुल कार्य मारती झरनों की तरह
- 39:16उठती है और सारे आगोश में छा जाती है आसमान के मैं उस आनंद की बात
- 39:26करता हूँ। जीस आनंद की बात की गोरखनाथ
- 39:36हँसीबो खेलिबो गरीबों देहम हंसो खेलो नाचो।
- 39:46गाओ आनंद करो जोड़ो यह बोझा ढोने के लिए नहीं है।
- 39:54पृथ्वी यह मूड मान्यताओं की गठड़ी सिर पे जो लिए फिरते हो पटक दो
- 40:00इसको यह सब गिरा दो लड्डू को बालो।
- 40:07अगर इनमें कुछ बिगाड़ने की क्षमता है तो मेरे पास गए दोनों उल्लू के
- 40:12पाठों को इनको पूजने वाले बड़े उल्लू तो उल्लू उल्लू का ही
- 40:24निर्माण करेंगे। उल्लू आदमी का सृजन नहीं कर सकता,
- 40:31उल्लू का भगवान भी उल्लू ही होगा। तुमने भगवान की मूर्तियाँ जो
- 40:37बनाईं मनुष्य थोड़ा सा करना पड़ा है, उसने पशु भी बना दी है।
- 40:46भगवान की मूर्तियों में मछली भी बना दी मंत्रस्य अवतार भगवान की
- 40:53मूर्तियों में उसने कच्छप भी बना दिया कछु अवतार भगवान की
- 40:57मूर्तियों में उसने सुर भी बना दिया वह अवतार यह तो मनुष्य का
- 41:04नो। लेकिन अगर कोई कछुआ भगवान की
- 41:10कल्पना करेगा, वह आदमी नहीं बनाएगा, कछुआ ही बनाएगा, वो कहेगा
- 41:17कोई बहुत बड़ा कछुआ होगा। बहुत विराट कछुआ होगा जिसने
- 41:22सृष्टि बना। तो किसका दिमाग उससे परे जाता ही
- 41:27नहीं है? कुएं के डडू और समुद्र के डडू के
- 41:31भीतर बातचीत होने लगी। कन्वर्सेशन अच्छा, तुम्हारा
- 41:36समुद्र कितना होता है, क्या इतना होता है?
- 41:41नहीं? क्या इतना होता है?
- 41:44नहीं तो कु है जितना वो कहते हैं, इतना होता है, नहीं तो फिर
- 41:50तुम्हारा परमात्मा होता ही नहीं, ऐसे लोग मार कर सो जाते हैं।
- 41:58भला बुद्धि से वह सोचा जाता है। कछुआ बनाएगा तो बड़ा कछुआ बनाएगा।
- 42:04इतना बड़ा कछुआ बनाएगा, जिसका कोई और छोर नहीं बनाएगा।
- 42:09कछुआ है, आदमी ने भी बना दिया और बड़ी से बड़ी मुठ का आदमी ने वही
- 42:18जो कछुआ करता वही तुमने करती। उसने भी आदमी बना दिया बड़ा विशाल
- 42:25विराट हाथों में शस्त्र अस्त्र फेंक दिए भाई जब वो सर्वसमर्थ है,
- 42:32सर्वशक्तिमान है तो ये हाथों में तलवार क्यों ले रखी है?
- 42:36यह तो कायरता का प्रति है। मेरी मुलाकात हनुमान जी से होगी।
- 42:49लश्कर जंप मेरी बायोग्राफी में लिखा, मैंने कहा बाबा पूछ नहीं।
- 43:04वो अपनी भाषा में बात करते मैं अपनी भाषा में ही समझता।
- 43:09मैं पुंछ वाला हनुमान ही देखा जाना चित्रों में शुक्र है मैंने
- 43:19गोटना नहीं पूछा। और तुम्हारे पास तो घोटना भी है।
- 43:32हनुमान जी खड़े होते और तुम्हें आदेश देते इसका ये काम कर दो उसका
- 43:37वो काम कर दो उसका वो काम कर दो हनुमान नहीं गुलाम है गुलाम
- 43:44तुम्हारा बागेश्वर धान तुम्हारा। अनुमान नहीं गुलाम है अगर न
- 43:58बांटूँ तो क्या करूँ? सच्चा ऋषि कहता कि 100 हाथों से
- 44:07एक ठक्का है। सच्चा ऋषि कहता 1000 हाथों से
- 44:11बांटता है। तुम कहती हो, अवश्य ही कोई वणिक
- 44:25हो भणिक ही ऐसे व्यापार की बातें की करता है व्यापारी।
- 44:40यहाँ जाती से संबंधित कोई बात नहीं मैं जाती पाती में विश्वास
- 44:46की तो बात छोड़ जाती पाती सब तुम्हारी बनाई हुई है ईश्वर की
- 44:52बनाई न कोई जाती है ब्राह्मण का बच्चा बनिया गोद ले लेता है।
- 45:00बनिये का बच्चा क्षत्रिय गोद ले लेता है क्षत्रिय का बच्चा तुम
- 45:04जिसे शूद्र कहते हो, वो गोद ले लेता है और तुम्हें पता ही नहीं
- 45:11चलता क्या गाल माल हो रहा है? वही है चाल बेड़ंगी जो पहले थी वो
- 45:28अब भी है तू भी बदल फलक ज़माना बदल के तुमने अभी तक वही नाव की
- 45:44टोपी पहन रखी है। वहीं कुछ बनाओगे तुम्हें पता है
- 45:54तुम्हारी बातों का क्या असर होगा? आगे तुम्हें पता नहीं तुम इनके
- 46:04परिणाम नहीं जानते। उसे लोग कहते हैं भगवान ने सृष्टि
- 46:17क्यों बनाई? मैंने कहा वो बना सकता है इसलिए
- 46:20बनाई। उसको तो ऐसी बात की उम्मीद ही
- 46:26नहीं थी। ऐसा जवाब मिलेगा।
- 46:29और बिलकुल सही जवाब है क्योंकि वो बना सकता है इसलिए बनाती और देखिए
- 46:35आज भी बना रहा है। परमात्मा अपने कार्य से कभी अलग
- 46:44नहीं होगा। परमात्मा अपना काम करता ही चला
- 46:48जाता है, उसमें ज़रा भी रोक ले तुम्हारे जैसा हीरे जोहरा मोती
- 46:55बाँट रहे हो बाबा यह बांटने की चीज़ थोड़ी है, हीरे, मोती
- 47:02जोहराती नहीं है भाई ये तो शब्द है।
- 47:07मैं तो मार्क बता रहा हूँ और शब्दों से समझाने के अतिरिक्त
- 47:11मेरे पास कोई उपाय भी नहीं। तुम्हारे पास भी कोई उपाय नहीं
- 47:15समझों से समझने के अतिरिक्त इसलिए हमने शांति भाषा।
- 47:24अपनी कन्वय नहीं है ना उसके लिए ये पैदा करना है।
- 47:29कन्वर्सेशन के लिए जरूरी है ना मैं समझा पाऊंगा ना तुम समझ पाओगे
- 47:37जो बांट रहा हूँ मैं भी जानता हूँ इसीलिए।
- 47:42सदा बोलता और सदा बोलने के बाद अतृप्त रह जाता नहीं बोला शब्दों
- 47:49से कभी बोला जाता है वह आनंद न शब्दों में आता न शब्दों से प्रकट
- 47:56होता तो उसे बताऊँ भी तो कैसे बताऊँ?
- 48:04उधर से तुम पहरे लगाते। हो तो क्या?
- 48:11करें जो मिटना चाहते हैं वो क्या करें लगे हैं।
- 48:21शम पर पहर लगे हैं, शम पर पहर जमाने की निगाहों के।
- 48:39जमाने की नगाओं के जिन्हें मिटने की हसरत है, जिन्हें मिटने की।
- 48:57हँस रहेते हैं वो परवा ने कहाँ जाएं जिन्हें मिटने की हसरत है वो
- 49:12परवा ने कहाँ जाएं? बताओ कहाँ जाएं जिसने वो देख लिया
- 49:24आनंद मात्र देखने से ही व्यक्ति अगाता नहीं, इतना प्यारा है,
- 49:34देखता ही चले जाता रहता है। रहना चाहता है कि मैं देखता ही
- 49:39रहूँ। अंतरंग संबंधों में तुम्हें एक
- 49:42क्षण की झलक मिलती है। तुम देखते हो दूरस्थ उस गौरी शंकर
- 49:48के शिखर को उसे देखते हुए आगाती नहीं तुम?
- 49:55इसलिए बार बार तुम अंतरंग क्षण में जाना चाहते हो और कोई कारण
- 50:02नहीं है। तुम्हारे वैज्ञानिक का बता सके
- 50:08यही कारण है तो वह क्या करे जो वहाँ पर चला गया?
- 50:14जो समुद्र में शिलांग लगा के अठखेलियां खा रहा है आनंद के ये
- 50:20शुरू जिसमें बह रहे हैं वे क्या करें मैं छुपाने देते हो न बताने
- 50:27देते हो। लाखों पहरे लगा रखे हैं तुमने,
- 50:37जिन्हें जलने की हसरत है वो पर वाणी।
- 50:41कहा जाए यह? ठीक बता नहीं सकते हम।
- 50:52लेकिन भीतर से उद्वे का ऐसा कि अभी बता दूँ क्या करें?
- 50:59वह बताया, जातु ने बताया जा सकता नहीं।
- 51:06और तुम इसे हीरे मोती ज्वारथ कब के मान रहे हो जब के ये तो मैं
- 51:12क्या तुम आग लगाता हूँ तुम्हारे वेद शास्त्र, पुराण, प्राण सबको
- 51:16आग लगा दो शब्द हैं वही शब्द। जो कभी पेड़ थे आज कागीज बन गए जो
- 51:28कभी शाही थी आज तुम्हारे लिए 10 कमेंट्स बनकर बोझा ढो रहे हो।
- 51:42बस वही ब्राह्मणों की तरकीब मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा डाल
- 51:46दी। तुमने शास्त्र में प्राण
- 51:49प्रतिष्ठा कर दी। फर्क क्या है?
- 51:53आदमी की बुद्धि इधर से नहीं तो उधर से कान पकड़ लिया करती है।
- 52:03हमारे हिंदुओं ने मूर्तियों में प्राण डाल दिए।
- 52:06बाकी धर्मों ने किताबों में वस्त्रों में होली वृक्ष से कह के
- 52:11प्राण डाल दिए। बस ये तो पूजनीय है, क्यों पूजनीय
- 52:15है पूजनीय है? लेकिन उसको तुम समझ नहीं पाओगे।
- 52:26यह सीढ़ी भी पूजनीय होती है जो वहाँ तक पहुंचा देती है, जिसे हम
- 52:31छत करते हैं। दशम द्वार तक जो पहुंचा दे।
- 52:37सहस्रर तक जो पहुंचा दे ब्रम्हरद्र तक जो पहुंचा दे वो
- 52:42सीढ़ी भी धनी है पूजनीय लेकिन मात्र सीढ़ी ही पूजनीय नहीं अगर
- 52:54तुम चढ़ो ना। कोटिन में कोई एक चलत है कोटिन।
- 53:04चलत एक पहुँच है कोटिन पहुँच एक रोकत है ये अनुपात।
- 53:13है आपका करोड़ों रोगों? में एक चलता है कोई?
- 53:17उस छत की तरफ सीढ़ी का इस्तेमाल करता है करोड़ों।
- 53:23चलते रास्ते में रुक जाते हैं। राग रागनियों से सिद्धियों ऋतियों
- 53:29से। रुक जाते हैं।
- 53:41और फिर उनमें से भी करोड़ों में। से एक कोई पहुँचता है छात्र पे और
- 53:47उसको भी तुम। कहते हो बोलो मत।
- 53:50ये हीरे जो है। नहीं।
- 53:54हैं। ये हीरे जौहरात और जो इनको हीरे
- 54:00जौहरात कहता। है वह समीदार है, नहीं, वह संत
- 54:06हुआ नहीं, वह झूठा। है मकार है व्यापारी।
- 54:12है। उसका कोई निर्यात और स्वार्थ है।
- 54:25वो ही मानसिकता तुम्हारी आज भी है।
- 54:28मुझे ये जानकर अच्छा नहीं लगा। मैं समझता था कि शायद।
- 54:38संविधान? बन गया तो तुम्हारी।
- 54:40मानसिकता भी बदल गई, लेकिन मुझे पता चला कि नहीं मानसिकता हुई।
- 54:49गीदड़ ने शेर की खाल ओढ़। ली और मैं।
- 54:56चाहता हूँ। ये।
- 55:00झगड़ा तब खत्म होगा। अगर हमारी सर्वोच्च सत्ता के ऊपर
- 55:11तुम्हारा। तथा कथित इश्यू में।
- 55:13बैठेगा, कोई दलित बैठेगा। कोई पिछड़ा, कोई अति पिछड़ा।
- 55:22जीसको तुम कहते हो परमात्मा के। दरबार में कोई पिछड़ा नहीं, कोई
- 55:27अति पिछड़ा नहीं। वहाँ कोई भेदभाव है।
- 55:31भेदभाव? तुम्हारे राजनीतिक दरबार में।
- 55:37होता है लेकिन वो दरबार। कोई राजनीतिक नहीं है।
- 55:42उसके तो सभी बच्चे हैं, उसकी सृजना तो सभी उसी।
- 55:46के हैं। मैंने कल जिक्र किया स्टैटिफिक वे
- 56:01से लेकिन साइन। सभी खोज नहीं पाई आज नहीं कल खोज
- 56:06ले के पी। न्यू ग्लैंड के पास एक रेत के
- 56:12झरे। के सामान।
- 56:13छोटी सी ग्रांति होती है। उसे साइंटिफिक भाषा में अभी नाम
- 56:22नहीं। दिया क्योंकि खो जाने का।
- 56:27लेकिन संत भाषा में उसे विभीषण कहते है।
- 56:33विभीषा की वो ग्रंथी बिल्कुल रेत। के जरिये के समान छोटे होते हैं
- 56:39और मैंने। उसका जिक्र पहले भी।
- 56:41किया जिसकी विभीषा एप्रोटाइज़। हो जाए समोहित हो जाए।
- 56:53वह अंधवक्त हो जाता है, लेकिन ध्यान रखना वह सभी की विभीषा
- 56:58संभावित नहीं होती। करोड़ों में से कोई एक।
- 57:02व्यक्ति होता है जिसकी। विभीषा संभावित होती है अगर तुम
- 57:08कहो कि हमारी जनसंख्या। 80% तुम गलती हो, तुम 7% हो, ये
- 57:17भी मैंने ज्यादा। बोल दिया सही अगर ठीक से।
- 57:23मैं संतों से पूछूं। मुनि जनों से पूछूं।
- 57:35तो कहेंगे? कि कुल मिला के।
- 57:39150 लोग। हैं जो अंध भक्त की श्रेणी में
- 57:43है। 150 लोग परसेंटेज नहीं गिनती,
- 57:49जिनकी। व्यवस्था।
- 57:52सम्मोहित हो गई पूरी। तरह से मर जाएंगे।
- 57:55कट जाएंगे, लूट जाएंगे, बिक जाएंगे, टूट जाएंगे फूट जाएंगे,
- 58:01झुकेंगे मानेंगे 150 से ज्यादा नहीं।
- 58:11मैं तो उसे आवाहन करता। हूँ जिनको।
- 58:16ये श्रेष्ठ कहलाने वाले। लोग दलित कहते हैं।
- 58:22मुझे सुकून उस दिन आएगा। जीस, तुम अपने।
- 58:27प्रयास से तुम अपने। पुरुषार्थ से इस।
- 58:35भारत देश के प्रधान। सेवक बनोगे आनंद तुम्हें।
- 58:55और मुझसे आनंद। न कभी कोई हुआ।
- 58:59न कभी कोई होगा, मैं उतना ही आनंदित हूँ जितना कभी कोई संत हुआ
- 59:04था, वो तो न बहु संत। है न?
- 59:09कभी पहले हो। न कभी बाद में।
- 59:11होगा उतना ही आनंदित में हूँ। ज़रा भी कम नहीं, ज़रा भी ज्यादा
- 59:16नहीं। लेकिन उस दिन।
- 59:25उस दिन मुझे बड़ी प्रसन्नता हो गई।
- 59:31उस दिन मेरे हृदय को बड़ी खुशी। मिलेंगे।
- 59:37वैसे सारा ढांचा मैं। नहीं हूँ अरे, लेकिन यह हृदय
- 59:43धड़के। का खुशी में धड़के।
- 59:45का उस दिन जीस दिन? कोई दलित, कोई पिछड़ा।
- 59:51कोई अति पिछड़ा। कोई गरीब जैसे अब्राहम, लिंकन,
- 59:58व्हाइट हाउस तक पहुंचे जोंपडिस ऐसे।
- 1:00:04ही इस देश में। पाखंडी।
- 1:00:08तो बहुत हुए सर्कस? करने वाले तो बहुत हुए।
- 1:00:12और बड़ी से बड़ी सर्कस करने वाले हम देख रहे हैं बैठे।
- 1:00:19धोखा देकर। गद्दी पाई तो?
- 1:00:23के पाई खा पाई। राज़ वह नहीं होता गद्दी पर बैठ।
- 1:00:32जाने से राज़ होता है दिलो पे इच्छा जाने से और मैं कहता हूँ।
- 1:00:38तुम दिलो पे इच्छा आ जाना, एक्का दुक्का रोक तो।
- 1:00:45बोलते ही रहेंगे उनका काम। लेकिन तुम बहू जन की आवाज बनो।
- 1:00:55तुम बहु जन हो, बस तुम्हें पता नहीं तुम यूनाइटेड नहीं हो, तुम
- 1:01:03खंडे हुए हो। तुम इकट्ठे हो जाओ मैं।
- 1:01:06तुम से आवाहन करता। हूँ एक।
- 1:01:11मंच पर आ जाओ, गद्दियों के। लिए लड़ाई झगड़ा छोड़ो।
- 1:01:19एक मंच पर आ। जाओ सबसे प्रथम कर्तव्य।
- 1:01:22है तुम्हारा। जो जो सताए गए, अतीत में जिन जिन
- 1:01:27लोगों ने इन्हीं। बातों का सामना।
- 1:01:29किया ये हीरे मोती। जोहरा थे जो के।
- 1:01:33थे ना हीरे मोती, जोहरा। के खाक होता है।
- 1:01:40बस लिखा जाएगा हीरा मोती, जोहरा। होंगे नहीं।
- 1:01:49लेकिन कोई क्या करे अगर तुमने शब्दों को भगवान मान लिया?
- 1:01:57तो कोई क्या करे? ऐसे ही पागलपन का नाम।
- 1:02:02हिंदू धर्म है। सनातन तो।
- 1:02:09सदा ही आज सच। जुगाद सच एबी सच नानक हुस्से भी
- 1:02:14सच। आज।
- 1:02:20सनातन तो वही होता। है।
- 1:02:23और वो सभी धर्मों का एक है, उसे सनातन कहते हैं जिसे एकोंकार कहते
- 1:02:29हैं जिसे संत कहता है एको, अहम् द्वितीय नाश अहम्।
- 1:02:38ब्रह्मस्त्र अनल हक। वह एक।
- 1:02:42वह एक सना तुम्हें और बच्चों तुम्हें दुख।
- 1:02:55हुआ तुम्हें कष्ट हुआ। तुम्हें तकलीफ हुई उसके लिए माफी
- 1:03:01का स्वास्थ्यगार। में।
- 1:03:03हमारे ही बुजुर्गों। ने तुम्हें कष्ट दिए।
- 1:03:08मुझे नहीं पता हमारे। थे किसी और के।
- 1:03:10थे क्योंकि आज मैं। ब्राह्मण परिवार में हूँ।
- 1:03:15इससे पहले मैं बनिया में था, उससे पहले अलग अलग।
- 1:03:20प्रहार बदलते चले गए। लेकिन बात करता हूँ कि इस लड़ी
- 1:03:26ने। आपको बड़ा दुख आया, बड़ा भेदभाव
- 1:03:30किया, बड़ा नफरत फैलाया, अब तुम्हारी बारी है, तुम बदला मत
- 1:03:36लेना, लेकिन तुम शांति से राज़ करने की बारी है तुम्हारी इकट्ठे
- 1:03:40हो जाओ इकट्ठे होने के बिना राज़ नहीं किया जा सकता।
- 1:03:45और राज़ करना गद्दियो पे बैठने के लिए नहीं है।
- 1:03:49राज़ करना सबके सुख के लिए है। सर्व सुखाय सर्व हीता।
- 1:04:02है। बहुत है राज़।
- 1:04:07दिलों पे छा जाओ। दिलों पे राज़ ग्रुप होता।
- 1:04:10राज़। आज हिंदुस्तान को ऐसे व्यक्ति।
- 1:04:15की जरूरत हो जो परमात्मा जैसा निर्लो भी हो।
- 1:04:18परमात्मा जैसा सच्चा। दाता तिलना तमय।
- 1:04:25वह दाता। जैसा हो परमात्मा जैसा।
- 1:04:28हो सच्चा दाता। तिल ना कम आए।
- 1:04:33उसके भीतर तमानी होती तिल बराबर हुई मैं।
- 1:04:38तुमसे कुछ नहीं मानता। और तुम ये जो ढोंग करते।
- 1:04:43हो पूजा करके। पाठ करके दान करके।
- 1:04:50पत्रम पुष्पम फ़िल्म। तोयम ये चढ़ा के छतर चढ़ा के।
- 1:04:57कपूर घी। से नहला के पत्थरों को यह जो तुम
- 1:05:00पूजा करते हो, यह बकवास है और कुछ नहीं है।
- 1:05:07थोसी बकवास में पड़ मत जाना इन्होंने।
- 1:05:10बहुत दुनिया का बुरा किया है भला करने का वक्त आ गया है।
- 1:05:19तुम इकट्ठे हो जाओ या प्रश्नपुरी। है।
- 1:05:24इकट्ठे होकर यूनाइटेड होकर। तुम अपना नेता चुनो।
- 1:05:30जो ईमानदार। हो गरीब हो कोई बात नहीं लेकिन
- 1:05:34ईमानदार हो। ईमानदारी और गरीबी यह संघ संग चल
- 1:05:39सकती है। कोई नेता चुनो मेरा हृदय।
- 1:05:48बड़ा प्रसन्न होगा जश्न। कोई दलित व्यक्ति भारतवर्ष का।
- 1:05:56प्राइम मिनिस्टर हो इनकी बातों में ये जो।
- 1:06:06कहते हैं हम 80% हैं। तुम कहते हो कि 85 प्रतिशत हैं।
- 1:06:12हम दोनों ही गलत। क्योंकि ऐसे लोग?
- 1:06:20मुझे ये हिंदू समझते हैं मैं कहाँ हिंदू?
- 1:06:32इंसान ही हो जाऊं तो? क्या कम नहीं क्या?
- 1:06:38हिंदू होना जरूरी होता। है इंसान होने के।
- 1:06:40लिए क्या हिंदू होना बड़ा होता है?
- 1:06:43इंसानियत से मुझे? हिंदू में गन।
- 1:06:50रहे हैं। ऐसे भी।
- 1:06:54ये गनती है इनकी। मैं आपको बताता हूँ, मैंने।
- 1:07:02तुम्हें राहत खात किया है। और आज वो वेला आ गया।
- 1:07:10मैं जानता हूँ मेरे साथ जो बुक। ना मूर्ख हूँ।
- 1:07:15ना? ऊँचा सुंत है बहरहन आँखें कम देख।
- 1:07:25पाती हैं। अंदानी।
- 1:07:29उम्र का। तकाजा है उम्र।
- 1:07:32का तकाजा है और। कुछ मैंने खुराक मैं।
- 1:07:34कौन सा मशहूर हूँ खाता हूँ? चाय देता हूँ तीन बार गाइडेंस की।
- 1:07:41जरूरत मेरे पास आ जाना। मैं तुम्हें।
- 1:07:46मार्गदर्शन? दूंगा।
- 1:07:51ये 7% है अगर ठीक से देखोगे तुम। सर्वे कराके देख लो।
- 1:08:01इसलिए तो खरीदा जा रहा। है सस्त्रों को खरीदना अत्यंत
- 1:08:10अत्यंत। नीचेता का कर्म है, फिर लोकतंत्र
- 1:08:22कहाँ रह गया? फिर तुम सीधा ही कह दो।
- 1:08:26कि लोकतंत्र नहीं है। पाई, यह तो राज्यतंत्र है?
- 1:08:32लेकिन सच हमने बोला नहीं। हमने झूठ बोलना है, झूठ है
- 1:08:39व्यक्तियों के। जड़ों को पाट दो, सच्चे व्यक्ति
- 1:08:44को गद्दी निश्चिंत। कर दो।
- 1:08:56मेरी बात को गहरे से समझना सुनना। ऐसे ही विचारों ने।
- 1:09:08तुम कहते गुलाम। अरे, गुलामी ही होगा।
- 1:09:10जब देश बढ़ जाएगा जाती पाती में। धर्मों में बढ़ जाएगा तो गुलाम ही
- 1:09:15तो होगा। देश की।
- 1:09:19गुलामी का कारण मात्र। तुम्हारी डिवाइडेशन आंचाइ
- 1:09:30ब्राह्मण पर। क्यों उठेगा वैश्य?
- 1:09:34क्यों उठेगा क्षुद्र? क्यों?
- 1:09:35उठेगा सूत्र इनको त्रिस्क्रिप्ट करते हो?
- 1:09:39तुम ये गुलामी का स्वीकार है, ये बताते नहीं क्योंकि इनका फैलाया
- 1:09:43हुआ है।