Latest / Baba ji Vijay Vats / 7/2/26 - भोगों से मुक्ति कैसे पाएं? अष्टावक्र का गुप्त सूत्र!! मुक्ति के बाद क्या आना-जाना पड़ता है?
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- 0:09इस संसार में भोग की इच्छा वाले लोग हैं और ऐसे भी हैं जिन्हें
- 0:21मुक्ति की आकांक्षाएं लेकिन। ऐसे महापुरुष बहुत कम हैं अर्थात
- 0:31गर्ले हैं जिन्हें न भोगों की चाह है और न मोक्ष की अंकाक्षा
- 0:44जिन्हें कोई चाह। कोई अनकांक्षन अष्टावक्र का ये
- 0:57सूत्र बड़ा अद्भुत है चाह गई चिंतामटी मनवा बेपरवाह।
- 1:13जिनको कछु होना चाहिए सोई शहंसा किसी को मुक्ति की अभिलाषा है,
- 1:28किसी को भोगों की अभिलाषा है, लेकिन अभिलाषा है।
- 1:36और अभिलाषा चिंजीरें स्वर्ण जड़ित हीरों की हैं या जड़ लगे लोहे की
- 1:53हैं? जिंजीरें हथकड़ियाँ हथकड़ियाँ ही
- 1:58हम करती हैं अष्टमक कहते हैं कि ऐसे बहुत कम
- 2:14विरले हैं जिन्हें मोक्ष भी नहीं चाहिए।
- 2:19भोग भी नहीं चाहिए। इसका विश्लेषण करेंगे।
- 2:27बड़ा महत्वपूर्ण शब्द है, चाह बंधन और ये बंधन है।
- 2:44ये जान ना अति कठिन है, मेरे पास लोग आ जाते हैं बाबा कुछ
- 2:57भविष्यवाणी की अभी परसों ही मेरे पास एक प्रश्न आया के बाबा?
- 3:13ये दूर दूर से अलग अलग ऋषि होने पहुंचे हुए लोग भविष्यवाणियां कर
- 3:20रहे हैं कि प्रलय हो जाए सृष्टि खत्म होने के कगार।
- 3:31आप कुछ बोलें इन्हें चाह, इनको पता नहीं बहुत साल पहले।
- 3:54एक पुलिस मुलाजम मेरे पास अक्सर आया करता था, बहुत से पुलिस
- 3:58मुलाजम मेरे पास आया करता था। तू जा रहा था अपने गांव रास्ते
- 4:07में मेरा घर आता था रुक गया मैं फर्स्ट फ्लोर पे रहता था।
- 4:15ये छोटी सी छह फुट ऊंची एक गैलरी तपस्थली जिसे कहते थे मैं वहाँ पर
- 4:26रहता था आकर बैठ गया। बाबा आपके आशीर्वाद के लिए आया
- 4:38है, मैं जा रहा हूँ अपने गांव क्यों जाना है कुछ काम है जरूरी
- 4:47है मत जा। क्यों मत जाओ?
- 4:54कारण? कुछ लोग वृक्ष की जड़ों तक तह तक
- 5:02फलोर लेते हैं। इतना कहना काफी नहीं था।
- 5:07श्रद्धा की कमी क्यों? का जन्मदात्री है।
- 5:15कितना भी मुँह से प्रबल हो जाए, स्वयं के अनुभव से अगर कोई बात ना
- 5:20आएगी उसके भीतर शंका का एक हिलोरा हमेशा हिलता ही रहेगा।
- 5:33क्यों न जाऊ मैंने कहा आज तुम्हारे रात को रेड पड़ेगी,
- 5:41तुम्हारे बड़े ऑफिसर्स के द्वारा एसएसपी की रेड पड़ेगी।
- 5:47कब पड़ेगी रात को पड़ेगी ठंड का दिन था जनवरी की ठंडी रात फिर
- 5:59जाना है चले जा क्या पता, ईश्वर ने यही लिखा।
- 6:08तुम जाओ, अगर जाना है, लेकिन आज रेड पड़े कौन जाता है, कौन मूर्ख
- 6:16है? फिर तो नहीं जाऊंगा चाय वगैरह पील
- 6:22की वापस से लाना। नहीं गया, रेड पड़े क्या?
- 6:29पहले बहुत बार ऐसा हो चुका था। अब मज़े की बात ये है उसने खुद
- 6:40फायदा उठा लिया था इस बात का। यहीं बस नहीं हुआ चला गया वहाँ पर
- 6:49जाकर बड़े रैंक में था अपने छोटे रैंक वाले से बोला आज रात्रि को
- 6:58रेड पड़े अपनी वर्दियां धुलवा लो। सुकाल ठंडी बहुत है और रात्रि को
- 7:13किसी ने सोना नहीं। 24 घंटे की ड्यूटी होती है।
- 7:17प्रेस की ठीक तो नहीं है लेकिन होती है।
- 7:23सभी को मालूम है। ऑफिसर्स को भी पता है कि कोई
- 7:28व्यक्ति दिन भर रात जागेगा तो 910 दिन से ज्यादा जी नहीं पाएगा,
- 7:35पागल हो जाएगा। लेकिन पुलिस की ड्यूटी 24 घंटे
- 7:40है। दिलवा लो सभी अपने ड्रेसेस
- 7:49वर्तिया प्रेस करवा लो, चमका लो अपने अपने हथियार किसी के पास से
- 7:59डंडा लाठी है, किसी के पास राइफल बंदूक है।
- 8:08अब उसकी बात पर भी यकीन था। मुझे उस दिन पता चला कि ये मेरे
- 8:13से बात पूछ के अपने निचले स्तर के लोगों को बता देता है और बा बाजी
- 8:22खुद बन जाती है। आज भी वो जीवित है।
- 8:28व्यक्ति वापस चला गया, आदेश जारी कर दिया सब ने अपनी वर्दियां धोनी
- 8:40क्योंकि जानते थे अगर कहा है तो कोई कारण ये बाबा जी ने कुछ कहा
- 8:46है। मेरा उसने कभी नाम नहीं लिया
- 8:49क्योंकि मैंने रोका था कि ऐसा ना हो कि मेरे पास यहाँ झुंड का झुंड
- 8:56इकट्ठा कर दो। तेरे को बता दिया है अक्सर मुझसे
- 9:07पूछा। चला गया रात हो गई वर्दियां सूख
- 9:18गई डाल ली गई अटेंशन अपनी अपनी जगह पर खड़े हो गए जहाँ जहाँ
- 9:25ड्यूटियां थी कुछ नीचे, कुछ छत के ऊपर अपने अपने हथियार ली।
- 9:34रात भी अंधेरी थी गहरी थी सन्नाटक सर्दी में रात जल्दी हो जाती है
- 9:44जल्दी से हो जाता है ऊपर खड़े बहुत देर बीत गई।
- 9:57कहने लगे अभी कोई नहीं आया। ठंड में मारोगे क्या?
- 10:06नीचे से आवाज आई, डटे रहो, डटे रहो पड़ेगी, जरूर रेड पड़ेगी कोई
- 10:13शक नहीं, बिला शक। मुझपे यकीन नहीं है क्या डट गए और
- 10:22कुछ ही देर पर एसएसपी की गाड़ी आ गई।
- 10:26सायरन बजाते उसके भीतर से निकले सभी एकदम सी छाप डाल दिया गया।
- 10:33वहाँ के लोगों के नाम तो उनके पास दर्ज रहते हैं।
- 10:37सभी के नाम बोले गए पलाराम पला सिंह पलाराम पला सिंह जी, यश सर
- 10:44सैल्यूट अच्छा। कि कितने आदमी ये नौ आदमी, ये 11
- 10:53आदमी सभी मौजूद चांदनी में देखा सभी की वर्तिया अप टु डेट क्रीज
- 11:01बनाई। बहुत प्रभावित हुए एसएसपी।
- 11:18और उनको पुरस्कृत किया गया। एक नंबर पंजाब का एक नंबर इतनी
- 11:31देर रात 11:00 बजे बहुत रात हो जाती और ठंडी बहुत।
- 11:37शीत लहर चल रही थी और ये अपनी डुडूस पे खड़े हैं।
- 11:42कितने ईमानदार लोग हैं इतने तो कोई समझ नहीं उस वक्त शायद एसएस
- 11:50पी राजन गुप्ता नाम के कोई व्यक्ति हुआ करते थे और इसमें।
- 12:01उनकी रेट उन्होंने देखा कि बहुत परिश्रमी लोग हैं, इनको अवश्य ही
- 12:14रेंक ऊंचे उठाने चाहिए और इन्हें पुरस्कार मिला जाए।
- 12:19विशेष पुरस्कृत किए गए कुछ लोग अपने टोहर बनाने के लिए सवाल
- 12:38पूछते हैं। मैं अक्सर बहुत सी बातों का जवाब
- 12:43नहीं जान जाता हूँ। ये व्यर्थ के प्रश्न दिमाग में
- 12:51कूड़ा कचरा करने इकट्ठा आए हैं, वो ही बात कहते हैं।
- 13:00अब इस बात का पहला सूत्र सुनिए। इस संसार में भोग की इच्छा वाले
- 13:08लोग हैं। ये पहला शब्द है ये भोग की इच्छा
- 13:15वाले लोग हैं, सम्मान मिल जाए वो भी भोग।
- 13:22ऊंची पदवी मिल जाए भोग सभी मुझसे खुश हों, ये भी भोग तनख्वाह बढ़
- 13:35जाएगी। धन मिलेगा।
- 13:41पदवी ऊंची हो गई, मान सम्मान मिल गया।
- 13:44संसार के होक इकट्ठा करने में व्यस्त ये लोग भोगी कहलाते हैं।
- 13:52अष्टावक्र की दृष्टि इस संसार में।
- 13:58भोग की इच्छा वाले लोग होते हैं ऐसे भी हैं जिन्हें मुक्ति की
- 14:08आकांक्षर ऐसे भी हैं मुक्ति की राह कोजते हैं क्यों?
- 14:23वही अष्टावक्र का कथन भोग से सुख नहीं मिलता, भोग से दुख मिलता है
- 14:34और दुःख से वैराग्य और वैराग्य से मुक्ति की खोज।
- 14:40तो वो लोग जो बहुत भोग लेते हैं और सुख नहीं पाते, क्षणिक सुख
- 14:45पाते हैं और सुख के बाद का दुख भी भोगते हैं तो समझ जाते हैं सुख है
- 14:52क्षणिक लेकिन उस सुख के बाद। जब उस सिक्के को पलट दिया जाता है
- 15:00तो दुख भी आता है और वो दुख ज्यादा महत्त्व होता है।
- 15:04ज्यादा महान होता है तो सुख भी दिया तो क्या धीरे धीरे आपकी
- 15:11इंद्रियां भोगती भक्ति निर्बल भी हो जाती है?
- 15:16आपको पता नहीं चला कि आज जीस इंद्रियों के द्वारा हमने होगा वो
- 15:24कल हमें दुख देंगे। इसलिए लोग कहते हैं के बच्चे
- 15:31अवश्य होनी चाहिए। क्यों?
- 15:35आज तो हम जवान कल हम बूढ़े होंगे, हमें संभाल लेगा, भोग भोग के
- 15:43इंद्रियां क्षीण हो जाएंगी, कृष्ण हो जाएंगी, कमजोर हो जाएंगी।
- 15:55हमारी लाठी का सहारा कौन बनेगा? इसीलिए औलाद होनी अवश्य और पहले
- 16:05लोग ज्यादा रिस्क नहीं लिया करते थे।
- 16:09बच्चों की शिशु दर ज्यादा थी। तो 123410101212 लोग बच्चे जन्मते
- 16:19थे, कौन जाने इतवार नहीं किया जा सकता?
- 16:27उन्हें अपनी गिणती पर विश्वास था, इतने जन्म दे दो।
- 16:34कि कोई तो सेवा करेगा जो थक जाते हैं।
- 16:42भोग, भोग सुख नहीं मिलता और अब आप थीम को समझना।
- 16:50प्रत्येक मनुष्य की आंतरिक अंकांक्षा भोगनिक नहीं, भोग के
- 17:01द्वारा सुख लेने की है अब इसको फिर सुन लीजिये प्रत्येक जीव की।
- 17:12आंतरिक अंकाक्ष भोगने की नहीं है। उस भोग के दौरान जो सुख मिलता है
- 17:22उसकी है। देखिए।
- 17:26अगर भोगों में से आप सुख का तटवर निकालो तो फिर उसे भोग पाओगे नहीं
- 17:36भोग पाओगे। क्यों?
- 17:40फिर इसका मतलब तुम भोगना चाहते थे, तुम सुख लेना चाहते थे?
- 17:45तुम्हारी सुई कभी उधर जाती ही नहीं।
- 17:49मूल तत्व क्या था? भोगने के पीछे भोग को कोई आदमी
- 17:58भोगने के लिए नहीं भोगता है। भोग को कोई भी।
- 18:05जी खुशी के लिए भोगता है। भोग में उतरता ही तब खुशी मिलती
- 18:14है भोग के द्वारा सारे दिन काम धाम बोझ, तनाव बॉस की झड़कें।
- 18:24ग्राहकों के उल्लाहों माथा खपाई माथा बच्ची व्यापार किया, नुकसान
- 18:36हो गया सरकारी नौकरी की घाँटा पड़ गया काहे?
- 18:50झिड़क ये घाटा ही तनाव ये घाटा ही व्यापारी को दूसरी तरह का घाटा
- 18:58होता है। पैसे का इसको वृतियों का घाटा
- 19:03होता है। कोई बेइज्जती कर गया, सलमान का
- 19:08घाटा हो गया, किसी ने डिग्रेडेशन कर दी, शिकायत कर दी, रिश्वत लेते
- 19:17पकड़े गए, शिकायत कर दी, घाटा हो गया।
- 19:25उनके लिए वो घाटा इसलिए ऐसा नहीं है।
- 19:29आपको लगता है कि नौकरियों वाले लोग सरकारी नौकरियों वाले लोग
- 19:35सुखी होते हैं, सुखी होते क्यों हैं?
- 19:38आपको लगता है पहली बार दूसरी बार सुखी इसलिए होते हैं?
- 19:44के सरकारी नौकरी वाला निश्चिंत हो जाता है ये निश्चिंतता।
- 19:52इसलिए एक कारण से मैं प्राइवेटाइज़ प्राइवेटाइजेशन के
- 20:00विरुद्ध नहीं। क्योंकि ये निश्चिंतता आपको आलस
- 20:09में धकेल देती है। अब निश्चिंत अब पक्की पक्की
- 20:15तनख्वाह मिलेंगे, काम करें, करें ना करें और पक्की पक्की।
- 20:26पेंशन भी मिलेंगे। निश्चिंत तथा आलस्य पैदा करते है,
- 20:35इसलिए एक तथ्य से एक दिशा से सरकारीकरण के।
- 20:44सरकारी काम करने वाले सभी नहीं सभी अपने दायरे में ना लेते आएं।
- 20:54बहुत से व्यक्ति होते हैं जो ईमानदारी से मेहनत।
- 21:01बहुत से व्यक्ति होते हैं जो सरकारी नौकरी लगते सा निश्चिंत
- 21:07होते हैं। अब काम करूँ करूँ ना हो तंखा तो
- 21:11मिलेंगे ही ये आदस्य काम करने की आपकी क्षमता को।
- 21:21बाधा बनता है। मेरी दृष्टि में प्राइवेटाइज़ेशन
- 21:30एक दृष्टि में शुभ भी है। हाँ, यह शुभ नहीं है।
- 21:39के सरकारी नौकरी छीन ली जाए। नौकरी होनी चाहिए अन्यथा वह
- 21:48परिवार को पालेगा। फिर मैंने सरकारी मुलाजिम बहुत
- 21:53देखे जो तनख्वाह भी लेते हैं। परिश्रोत भी खाती ये काहे ये तो
- 22:02देनी ही पड़ेगी। काम भी नहीं करे।
- 22:09इस कोड को निकालना आवश्यक है। बहुत से लोग हैं जो सरकारी
- 22:19ड्यूटीज के ऊपर होते हुए भी ईमानदारी से कर्तव्य निष्ठ होते
- 22:24हैं। प्रत्येक व्यक्ति तो मैं उन लोगों
- 22:28की बात करता हूँ जो सरकारी नौकरी मिलते ही शीतल हो जाते हैं।
- 22:41हम अपने प्रसंग पे है। अष्टावक्र कहते हैं, कुछ लोग तो
- 22:47ऐसे हैं जो भोग की तमरना रखते हैं और कुछ लोग ऐसे हैं जो मुक्ति की
- 22:53तमरना रखते हैं। मैं मुक्त हो जाऊं क्यों?
- 22:57क्योंकि भोग से सुख नहीं मिला। मिलता भी अगर भोग से सुख निकाल
- 23:06लिया जाए। वैक्षणिक सुख तो आप कभी नहीं
- 23:11भोगोगे वही मैं कहा करता हूँ। ईश्वर ने गहरे से गहरा आनंद
- 23:17अंतरंग क्षणों में फेंक दिया। बड़ा समझदार तुमसे ज्यादा समझदार
- 23:26हालांकि तुम समझते हो की मैं समझदार एक कण रेत का नहीं बना
- 23:37सकते, तुम परमात्मा से ज्यादा समझदार।
- 23:46तुम्हारे लिए कुछ नहीं होता है। ईश्वर ने संभोग के भीतर वो सुख
- 23:54डाल दिया। गहरे से गहरे के जब तक तुम्हें
- 24:00इससे ऊंचा सुख उपलब्ध नहीं होता। तब तक तुम भोगों से मुक्त तो हो
- 24:09ही नहीं सकते। इसलिए मैं कहता हूँ कि भोगी है तब
- 24:19तक भोगी है। जब तक आपको इससे बड़ा सुख उपलब्ध
- 24:25नहीं होता, बड़े सुख की झलक पाए बिना छोटे सुख का त्याग मत कीजिए।
- 24:37अष्टा भकर भी आगे चलकर। किसी सूत्र में इसका वर्णन करते
- 24:42हैं होगो लेकिन जाग के भोग वो जागना क्या है?
- 24:53जागना ये है कि देखो भोग में सुख है।
- 25:00नहीं भोग में क्षणिक सुख है और उस क्षणिक अब ठीक से समझ लेना बात उस
- 25:09क्षणिक सुख के बाद जो महत्त्व दुख आता है।
- 25:16वो उस क्षणिक सुख को भला देता है। आप उस दुख को नज़रअन्दाज़ कर देते
- 25:23हो। बस यही गलती है आपकी इसलिए वो
- 25:26कहते हैं कि जाओ जाके देखोगे तो पाओगे?
- 25:34अंतरंग क्षणों में आनंद आता है, लोग पागल नहीं हैं, बिलकुल आता
- 25:41है, क्षणिक आता है लेकिन जागने का अर्थ क्या है ये किसी ने नहीं
- 25:46बताया। शास्त्र मैंने भी पढ़ी।
- 25:52ये भी बड़ा है कि जाद के भोगो लेकिन इसका अर्थ नहीं किसने
- 26:01समझाया? इसका अर्थ मैं आपको बताता हूँ।
- 26:05इसका अर्थ ये है कि भोगो भोगने से क्षणिक सुख मिलेगा।
- 26:13उसके बाद ये जो आपका पक्ष था। भोग के बाद का एक सिक्के का पहलू
- 26:26है सुख जो भोग से आता है। लेकिन आपको पता है।
- 26:31कोई भी सिक्का दो पहलू रखता है एक छुपा हुआ एक उबरा हुआ एक सिक्के
- 26:39के दो पहलू होते हैं। आपको पता है, जैसे ही एक पहलू।
- 26:47को आप उलटोगे दूसरा भी आएगा, निश्चित आएगा, बराबर आएगा, आएगा
- 26:53ही आएगा तो जब भोग लोगे तो दूसरा पहरू और दूसरा पहरू इतना दुखदाई
- 27:00होगा। पहले पहलू का सुख दुःख मालूम
- 27:06पड़े। प्रायश्चित की अग्नि में जलने लगे
- 27:13जिसने वो भारी दुख भोग के बाद का पहचान लिया।
- 27:17उसे जागना कहते हैं अब समझ आ गई होगी आपको बात।
- 27:29भोग को जाग के भोगने का अर्थ भोग के बाद के जब दूसरे पहलू का आगाज
- 27:37होता है और आप तड़पते हो आप शक्तिहीनता को प्राप्त होते हो।
- 27:44और प्रायश्चित को उपलब्ध होते हो तो फिर आप दुखी होते हो और वो दुख
- 27:51उस सुख से मात्रा में कहीं अधिक होता है।
- 27:56ये है जाग के भोग में इसीलिए जो लोग कहते हैं कि जाग के भोगो,
- 28:05उन्हें जाग के भोगने का अर्थ ही नहीं पता है?
- 28:09ऋषि भूल गए हैं, बहुत ऋषि बोल के गए हैं लेकिन समझा कि नहीं गए कि
- 28:17इस जाग के भोगों का अर्थ क्या है? और और सी एक्सप्लनेशन व्याख्याएं
- 28:27देखें, लेकिन वो सही व्याख्या नहीं है।
- 28:31व्याख्या से ही यही है जो भोग में सुख मिलता है।
- 28:35भोग के पश्चात का दुख। उससे कहीं विचार होता है और जैसे
- 28:44ही तुम्हें पता चलेगा कि कमाए तो ₹2 गंवाए ₹100 तो आप कमाओगे नहीं
- 28:50कमाओगे, क्योंकि जो ₹2 कमाए, उसके कारण ₹100 का नुकसान बढ़ गया।
- 28:58तो आप कमाओगे ही नहीं ये था जाग के भोगनो इस संसार में भोग की
- 29:11इच्छा वाले लोग हैं सभी। ऐसे भी हैं जिन्हें मुक्ति की
- 29:21आकांक्षा है, वो कैसे हैं? भोग के दिखते हैं, भोगा सुख नहीं
- 29:32पाया। आग का तीर आग का फलक भोग के सुख
- 29:39के ऊपर केंद्रित था। दूसरे व्यक्ति का तीर भोग के सुख
- 29:49के बाद की व्यथा के ऊपर केंद्रित। अब आपने वो सुख देखा तो बार बार
- 29:56उस सुख को लेने की आकांक्षा जगेगी।
- 30:01बार बार आप उसी क्रिया में उतरो और जिसने अपनी चेतना को।
- 30:11उसके फल की तरफ भोग के बाद की बहुत गहरी बातें हैं।
- 30:18एकाग्रता से सुनने की चेच्छा करेंगे तो समझ में आ जाएगा नहीं।
- 30:22बहुत लोग कहते हैं कि बातें दिमाग से ऊपर हो जाती हैं क्या फिर
- 30:27प्रश्न उठेंगे? इसीलिए मैं अक्सर कहता हूँ कि
- 30:34मेरी वीडियो उसको रात्रि के सन्नाटे में सुना करो या सुबह
- 30:40सुबह सुना करो तरू ताजा दीम आपके साथ तो समझा जाएंगे।
- 30:47दिन के कोलाहल में सुनोगे तो समझ में आया भोग में जीसको सुख लगा,
- 30:56उसका तीर भोग के सुख के अंदर था, भोग में सुख है कौन कहता है के
- 31:04भोग में सुख? ईश्वर ने भोग में सुख ना डाला
- 31:08होता तो आप भोग में जाते ही नहीं, सारी प्रजनन बंद हो जाती।
- 31:17उस गहरे आनंद के कारण ईश्वर ने डाल दिया वो आपसे ज्यादा।
- 31:28आप खींचे चले जाते हो, पशुपक्षी तक तो खींचे चले जाते हैं।
- 31:34उनके लिए तो मात्र आनंद का कारण ही यही है खाना पीना और संभोग
- 31:40करना। लेकिन आप मानव आपको एक अति
- 31:48इन्द्रीय वस्तु भी दी गई सिर्फ मनुष्य इसीलिए बुद्ध पुषों ने कहा
- 31:59कि मानव जीवन श्रेष्ठतम जीवन है। कर्मी आवय कपड़ा उसकी कृपा के
- 32:06बिना प्राप्त नहीं होता, मनुष्य के पास जाग के भोगने की बुद्धि
- 32:19है। वो समझ सकता है पशु को भोग के बाद
- 32:27प्रायश्चित मनुष्य को प्रायश्चित होता है।
- 32:38एक का तीर भोग के आनंद की तरफ गया।
- 32:41वो भोगों में लिप्त रहेगा। बूढ़ा हो जाएगा, इंद्रियां क्षीण
- 32:45हो जाएंगी, अशक्त हो जाएंगी, लेकिन भोगों के दमन्ना न और एक का
- 32:55फलक का तीर का निशान। दूसरे पहलू पे लगा सिक्के के जहाँ
- 33:01भोग के बाद का दुख आता है वो क्या कहेगा?
- 33:06भोग दुख है इस भोग को दुख का कारण कहते हैं अष्टमक।
- 33:16जो भोग के बाद का प्रायश्चित होता है, आपको दुख में ढकेल देता है,
- 33:21आपको निर्वेरी कर देता है, आपको अशक्त कर देता है, आपको कमजोर कर
- 33:28देता है। उसको कहते हैं अष्टवक्र दुख।
- 33:37जिसने इस दुख को कॉन्सेंट्रेट कर दिया उस तीर के ऊपर जहाँ सुख है
- 33:44वहाँ से हटाकर प्रायश्चित के दुख के ऊपर केंद्रित कर दिया।
- 33:54वह भोग में उतरना बंद हो जाएगा। धीरे धीरे कम होता होता होता होता
- 34:03भोगना बंद कर देगा। ये उस व्यक्ति की बात है जो
- 34:10मुक्ति चाहेगा। अब भोग से तो नहीं मिला?
- 34:13क्योंकि वो भी भोग क्या भोग? जिसमें सुख के पीछे दुख भी मिले
- 34:20वो तो भोग ना हुआ तो जो मुक्त होना चाहता है वह कैसा भोग चाहता
- 34:28है? वो चाहता है जिसमें सुख ही सुख।
- 34:33उसको उसने नाम दिया ऋषियों ने अखंड सुख जो कभी खंडित नहीं होता,
- 34:41कभी क्षमा करता जो सुख कभी खंडित ना हो।
- 34:52अखंड रहें, उस सुख की आकांक्षा करना है, मुक्ति की आकांक्षा करना
- 35:04है, ऐसे भी लोग हैं। जो भोगों की तमन्ना रखते हैं और
- 35:13ऐसे भी लोग हैं जो मुक्ति की तमन्ना रखते हैं।
- 35:20अब ये दो बातें मैंने आपको समझा दी।
- 35:26जाग के भोगने का अर्थ क्या है? यहाँ लोग बहुत उलझे हो गए हैं।
- 35:32जैसे मैंने बुद्ध के विपश्यना और दृष्टता इनके भीतर की जो महीन
- 35:46लकीर थी, वो तोड़ी। लाखों, लाखों लोग साधना करने वाले
- 35:55सुख को प्राप्त नहीं हुए। एक लकीर फँसी खड़ी थी।
- 36:04वो लकीर क्या थी? लोगों ने प्रश्न किया कि बाबा?
- 36:11द्रष्टा बनते हैं, सभी कर्मों की सुख नहीं आता।
- 36:15आप कहते हो उच्चारम सुख मिले साक्षी बनते हैं, सभी कर्मों का
- 36:25सुख नहीं मिलता। आप कहते हैं कंठ सुख में?
- 36:35श्वास के आने के जाने के दृष्टा बनते हैं, सुख नहीं मिलते, आते
- 36:42जाते देखते हैं, पता लगता है, देखते हैं, बराबर देखते हैं एक
- 36:47क्षण भर की चूक भी नहीं करते हैं। तीसरे नेत्र पर ध्यान लगाते हैं
- 36:52बराबर। एक क्षण के लिए भी नहीं चूकते।
- 36:57अना पान सती करते हैं लेकिन कोई आनंद नहीं मिलता।
- 37:03कारण क्या है महावीर का श्रावक वो भी बनते हैं।
- 37:11लेकिन उसमें भी कोई सुख नहीं मिलता, मात्र शब्द ही पले रह जाते
- 37:16हैं। क्या करें, कहाँ अर्चना गई,
- 37:23अर्चना गई, बड़ी भारी अर्चना गई और इस अर्चना को समाप्त करना बहुत
- 37:28जरूरी था। बहुत से लोगों ने मुझे बात में
- 37:33कमेंट बदले, गद्दगी के आप बुद्ध से ज्यादा से आने होंगे।
- 37:38मैंने कहा तब लोग ये भाषा समित आज आप शब्दों को पकड़ लेती हो, मैं
- 37:45क्या करूँ? तब के लोग शब्दों को नहीं पकड़ते।
- 37:49शब्दों के इशारों को पकड़ते थे। बुद्ध सही थे, बुद्ध गठित में थे।
- 37:56बुद्ध ने इशारा सही किया। उन्होंने कह दिया कि दृष्टया बन
- 38:04महावीर ने भी कह दिया के श्रावक्ल।
- 38:08लेकिन क्या कहना चाहिए था आज आप शब्दों को पकड़ना शुरू कर दिया
- 38:14हूँ तो आज मुझे तरमीम करनी पड़ेगी।
- 38:17ये तरमीम होती ही रहेंगी। कल को अगर कुछ और गड़बड़ किए।
- 38:26तो कोई आने वाला बुद्ध मेरे इन शब्दों को भी तोड़ देगा।
- 38:32उसे पता है कि तब ये भाषा समझी गई आज नहीं समझी जाती तो फिर किसी और
- 38:39भाषा का इस्तेमाल करेगा जिसे आप समझओ तो कैसे तोड़ी मैंने ये
- 38:44धारणा? मैंने ये धारणा ऐसी तोड़ी कि जब
- 38:53हम कहते हैं बनो तो आपके भीतर श्रम का भाव आ जाता है।
- 38:58कुछ बनना है आज बहुत से पागल है आई ए एस बनना।
- 39:11विश्वविद्यालय खोल दो भारत विश्व गुरु बन जाएगा जीस दिन आइआइटी।
- 39:30और ऐसे संस्थान खुलने शुरू हो गए। आईआईएम आइआइटी यूपीएससी वगेरा के
- 39:39कुछ उस दिन हम विश्व गुरु हो जाएंगे।
- 39:45देखिये एक क्षमा कर। ये लोग आपको बल अर्जित करना सीखा
- 39:53रहे हैं। ईश्वर विश्वर की कोई बात नहीं है,
- 39:58इसमें कर लोगे, लोग करते हैं। आज तक करते आए हैं, लेकिन कोई
- 40:09आदमी इस भ्रम में ना रहे कि मैं अगर जज बन गया, मैं अगर कोई बड़ा
- 40:17कलेक्टर बन गया तो मैं उपदेश धर्म का अधीर हूँ, ये गलती मत करो।
- 40:26और लोगों के भीतर भी ये भ्रम ना अपने आपको उस वर्चुअल लीडर, ना ये
- 40:34क्षमा ये आप धोखे में दे रहे हो हो जनता को।
- 40:44ये तो सांसारिकता ही सोंप रहे हो, कोनीन के ऊपर शुगर को चढ़ कर जज
- 40:55बन जाओगे, बन जाओगे। मन में अहम का अभाव आएगा।
- 41:02मैं न्यायकारी हो गया, न्यायकारी तो वो ही है।
- 41:06उसकी न्याय व्यवस्था बड़ी बारीक है, बड़ी बारीक है।
- 41:12जहाँ तक तुम पहुँच ही नहीं सकते, तुम्हारा कोई भी बड़े से बड़ा
- 41:21सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस न्याय नहीं कर सकता।
- 41:26उनके न्याय करने का डांग ही गलत गवाहों के बैसों के ऊपर न्याय
- 41:31होता है। ऑन दी बेसिस ऑफ विटनेस और गवाह
- 41:38खरीदे जा सकते हैं। ईश्वर की प्रकृति खरीदी नहीं जा
- 41:43सकती। अगर तुम ईश्वर की प्रकृति से कहो,
- 41:47चंद्रमा आज न निकले, तुम्हारी कोई बात नहीं मानी जाएगी।
- 41:53सूरज आज न छिपे, तुम्हारी बात नहीं मानी जाएगी।
- 41:59आज तारे न दिखाई पड़े नहीं मानी जाएगी।
- 42:04धरती से आदेश करो और सिर्फ ग्रैविटेशन को 1 मिनट के लिए बंद
- 42:11कर दो नहीं करेगी। आपका हुक्म उस प्रकृति के ऊपर
- 42:19नहीं चलता, एक क्षण के लिए भी नहीं चलता।
- 42:25हाकम कहला सकते हो शाब्दिक? लेकिन असल में हाकम तो एक ही है,
- 42:32वो ही रहेगा और दूसरा कोई हाकम हो ही नहीं सकता और नकल होती है जैसे
- 42:40हम रामलीला खेलते हैं। राम होता नहीं, वस्त्र डाले।
- 42:49इसलिए सिख धर्म ने एक बहुत बढ़िया काम किया के बाबा नहाने के एक बार
- 42:54हो गए। गुरु गोबिंद सिंह एक बार हो गए।
- 42:58कोई उसकी नकल करने की चेष्टा ना करे, इमिटेशन करने की चेष्टा ना
- 43:03करे। जे मूर्ख होता है, लेकिन हमारे
- 43:06सनातन में आदि रूप से जो परंपरा चल रही है, उनका अपना मत सिख धर्म
- 43:14का अपना मत। ये जो आपको ये सुंदर सपने दिखाने
- 43:29जैसे हैं सब्जबाग दिखाने जैसे और देखना इन लोगों के पास आप भारी
- 43:37भीड़? बात स्पष्ट और साफ साफ है कि
- 43:46दुनिया में ज्यादातर रोग भोगने वाले हैं और भोगने की ढंग ढूंढ़ते
- 43:56हैं। अष्टवक्र वही बात।
- 44:03इस संसार में भोगने वाले लोग भी हैं सृष्टि को और मैं थोड़ी तरमीन
- 44:09कर भोगने वाले लोग बाबा नानक की तरह है।
- 44:16इस रेश्यो को निकालो, कोटिन में कोई एक जलक।
- 44:22औचलत शब्द संसार से वैराग्य के लिए प्रयुक्त किया गया कोटीन में
- 44:32कोई एक चलत है यानी कोटीन में एक व्यक्ति को वैराग्य होता है,
- 44:39भोगों से। वो देख पाता है भोगों के बाद का
- 44:43दुख वो चलता है उस राह पे जिसे हम मोक्षिता कहते हैं मुक्ति कहते
- 44:52हैं कोटिन जल वो भी नहीं पहुंचते कोटिन जल एक।
- 45:01करोड़ों लोग शर्तें हैं। पहुँचता है कोई एक, कोई
- 45:06एक्स्ट्रा, कोई बुद्ध, कोई महावीर, कोई कबीर, कोई नाना, कोई
- 45:12दया, कोई राबिया, कोई मीरा, कोई चैतन्य, कोई एक पहुंचता है।
- 45:24ये है रेशम लगा दो भेड़ी किस के पास होगी।
- 45:30इसलिए मैंने अकेला रहना ठीक समझा क्या करूँगा?
- 45:38भीड़भाड़ में शोरगुल मैं बोलेंगे, बात तो वही कहनी होगी, पहुंचेगी।
- 45:47करोड़ों में से एक के पास मैं इस रेश्यो को भलीभाँति जानता हूँ,
- 45:53इसलिए आपको मेरे ज्यादा शीशे नहीं मिले।
- 46:01इन लोगों के पास ज्यादा शीश इकट्ठे होंगे।
- 46:04निश्चित ही आज विश्वविद्यालय में ज्यादा दुख है, उन्हें भी।
- 46:16विद्या के बिना जीवन सुना है कुछ तो करोगे विद्या के गुणों को भोग
- 46:25लोगे तो वैराग्य आएगा, भोगने के बिना वैराग्य नहीं आएगा, भोग के
- 46:31दुख को देखकर ही वैराग्य का जन्म। अगर आप कहो कि भोग को भोग बिना
- 46:39बैराग हो जाए असंभव ये होगी रेशमा अगर कोई व्यक्ति सीखा रहा है आपको
- 46:51आया के आया एम। यूपीएससी के एग्ज़ैम्स वगैरह और
- 46:58खुद को वर्चुअल घोषित कर रहा है। ये मूर्खता है और फिर अगर ऐसा
- 47:03व्यक्ति ईमानदार भी बनता है तो ये ज्यादा मुघता है।
- 47:10ईमानदारी काहे रह गयी? सीखा रहे हो।
- 47:14हिंसा, भोग के साधन, ईमानदारी क्या रह गई?
- 47:20भोग के साधन सिखाने वाला व्यक्ति सांसारिक हुआ करता है।
- 47:27विश्वविद्यालय बनाने की बातें करते हुए शोभ हैं, मैं इन्हें गलत
- 47:32नहीं। पढ़ना लिखना आवश्यक है जैसे
- 47:41मनोरंजन करना आवश्यक है लेकिन हर वक्त मनोरंजन करना आवश्यक नहीं।
- 47:49हसन के दृण मन का चाव। मन के चाव भी पूरे करने होते है।
- 47:55हंसो खेलो उम्र है बच्चा हँसता खेलता है हम उसको रोक ले गलत,
- 48:02उसका विकास रुक जाए जीतने महापुरुष हुए पहले हँसे खेले।
- 48:13कृष्ण ने मटकियां पहले बोलीं और 15 वर्ष की आयु में संदीपनी आश्रम
- 48:21के भीतर पढ़ने के लिए आज शिक्षा 15 वर्ष में छोटी शिक्षा पूर्ण कर
- 48:29दी जाती है। फिर बड़ी और वो उस वक्त प्रवेश
- 48:36किया। जीस वक्त आप हार्श सेकेंडरी
- 48:40परीक्षाएं पास कर लेते हो। 15 वर्ष की उम्र में सुदामा,
- 48:44बलराम, कृष्ण ने संदीप ने आश्रम में जॉइन किया।
- 48:50उससे पहले क्या किया? हँसे खेले कूदे, नाचे मटकियां
- 48:55थोड़ी शरारतें की बड़े प्यारे बच्चों से उसका बचपन छिनोगे तो
- 49:06तुम भी कंस से कम नहीं हो। ये जो बच्चों को जन्मते बच्चों को
- 49:17दीवार के साथ टकरा के मार देने के पीछे एक कारण था।
- 49:22सच में ये घटना नहीं हुई, ये भी समझ ले।
- 49:27सच में ऐसी कोई घटना नहीं हुई कि कंस ने बच्चियों को मार दिया और
- 49:34सच में ऐसी कोई आकाशवाणी नहीं हुई।
- 49:37कंस को देवकी की विदाई के वक्त के इसके गर्भ से आठम कुछ बच्चा।
- 49:48ऐसा कोई ऊपर बैठा भी नहीं जो आपको आकाशवाणी कर दे।
- 49:52भूल कर भी इन चीजों की इच्छा रखना मत।
- 50:01बच्चों को जन्मते को दीवार से पटक के मार दे।
- 50:06ये कुछ नहीं, ये समझाने का कारण बच्चों से उसकी मासी में छीन लोगे
- 50:14तो कांस्य कहलाओ बच्चों से उनका खेलना कूदना सीख छीन लोगे तो
- 50:20कांस्य कहलाओ आप भी अपने बच्चों से खेलना कूदना।
- 50:27एक उम्र होती है दो ढ़ाई साल का बच्चा क्रैश में भेज देते उसको
- 50:33हंसने खेलने दो कितना भी स्कूल में भेज दो वो जो घर में आराम से
- 50:42नाच कूद पाएगा। वो तुम्हारे क्रैशेज में नर्सरी
- 50:46में नहीं कूदता है, जीतने बड़े आदमी देखो।
- 50:53आपको पता है अल्बर्ट आइंस्टीन 6 साल से ज्यादा कहते थे, तब बोलना
- 50:59सीखा और लोग उसे मंदबुद्धि कहते थे।
- 51:05अक्सर उसको क्लास से बाहर खड़े रहना पड़ता।
- 51:14अब उसकी व्याख्या क्या उन दिनों को मापदंड मान के की जाए?
- 51:19यह तो मंदबुद्धि था। जिसने इतने सिद्धांतों को पैदा
- 51:24किया। लॉ ऑफ हर लेफ्ट के बगैर इतने
- 51:28सिद्धांतों का जन्मदाता 6 साल में बोलना सीखता है और आप उसको
- 51:34मंदबुद्धि करते हैं, आपके पैमाने यहाँ काम नहीं करते?
- 51:39ये घच मत करना बंद करो सीधे सीधे आओ, ईमानदारी का लिबादा ओढ़कर
- 51:53बहकाओ मत दुनिया को सीधा सीधा कोचिंग सेंटर खोल।
- 51:59सीधे सीधे विश्वविद्यालय खोर ईमानदारी की बात है।
- 52:11बहुत से लोग ऐसे ऐसे शास्त्रों को अपने ईस्टों में शुमार कर देते
- 52:18हैं, जिनके भीतर बकवास भरी पड़ी क्या नाम है?
- 52:28हम प्रसंग पे आ जाये, इस संसार में भोग की इच्छा वाले लोग हैं,
- 52:41थोड़ा मैं दमीम का। भोग की इच्छा वाले ही लोग हैं।
- 52:47अगर ये शब्द अष्टावक्र लिख देते तो ज्यादा बढ़िया था शुद्ध है
- 52:52क्योंकि 1% वो क्या है अपवाद है। एक्सेप्शनल केसेस आर देर ओनली 1%
- 53:06ज्यादा कह गया ऐसे भी है जिन्हें मुक्ति का अंक अच्छा है।
- 53:16वो मैंने बताया कि जिनके फलक का तीर।
- 53:21भोग के बाद के दुख के ऊपर जा टिका कहेंगे नहीं ये तो भ्रम हो गया।
- 53:31ये तो आईआईएमआईआईटी, यूपीएससी और जीतने भी एग्ज़ैम्स हैं।
- 53:41जीतने भी ये शोहरत के तग में हैं। आई सी एस तग ये शोहरत के तग में
- 53:50हैं और मान में आते हैं ध्यान रखना कोई मान चाहता है कोई बाल।
- 53:59जमा करके मान चाहता है। कोई धान जमा करके मान चाहता है,
- 54:05कोई बड़ी बदवेले के मान चाहता है, लेकिन इच्छा बाकी है।
- 54:13अष्टावकर इसी चीज़ को टारगेट करते है।
- 54:18इसी चीज़ के ऊपर निशाना साधते हैं।
- 54:21अर्जुन की चिड़िया की आँख के ढेले के ऊपर बिलकुल रेटिना के भीतर
- 54:26साफते हैं अपना निशान ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें मुक्ति की आंकाक्षा
- 54:37है। इन शब्दों के ऊपर सर्कल लगा दी।
- 54:42लेकिन ऐसे महापुरुष बहुत कम हैं, बहुत कम हरे अरे महान शब्द व्रत
- 54:53ना भोगी के लिए महान, ना मुक्ति वालों के लिए महान।
- 55:01महान शत किस आदमी के लिए वर्ता प्रयोग किया अष्टा बकरने कहते हैं
- 55:12कि ऐसे महापुरुष बहुत कम हैं अर्थात विरले हैं।
- 55:16अरे यार अष्ट जिन्हें। न भोगों की इच्छा है क्यों नहीं
- 55:23भोगों की मैं पहले ही बता चुका हूँ।
- 55:29भोगों की इच्छा है इसलिए नहीं है कि भोग दुख में ले जाती है।
- 55:36आ गई होगी, समझा? जिन्हें न भोगों की चाह है
- 55:42क्योंकि भोग भोग जाग के भोगते हैं।
- 55:45वो भोग इसलिए भोग की चाह मिट जाती है और न ही मोक्ष की आकांक्षा है।
- 55:54अब ये बात बड़ी है। अब ये बात ये है कि क्लिंगिंगनेस
- 56:03विथ एनीथिंग इस ए बॉन्डिंग चिपकाट किसी भी चीज़ के तहत इस हम
- 56:20अनकंक्षा कहते। वह एक बंधन का कारण है।
- 56:27भोग की इच्छा, त्याग की इच्छा, मुक्ति की इच्छा, लिबरेशन की
- 56:35इच्छा, ये सब एक ही बात है बात। इच्छा की है।
- 56:42इसलिए मैंने कहा कि अंतकाक्षा को आप शर्कल दे।
- 56:47थीम है अंतकाक्षा चाह गई चिंता के कारण चिंता मैं ये बन जाऊं मैं वो
- 56:57बन जाऊं, मैं वो बन जाऊं। चिंता होगी जो रोड़ा अटकाएगा उसके
- 57:08ऊपर गुस्सा भी बहुत आएगा, लहू हार्मोन पहले करेगा।
- 57:27बहुत क्रोध है जो आपकी इच्छा को पूर्ण करने में सहयोग देगा उस पर
- 57:35प्यार भी बढ़ाएगा। वह मित्र है नहीं, भूख की नहीं।
- 57:44मोक्ष की अंकाक्षा है, ऐसे भी लोग हैं तीन तरह के लोग गना दिए
- 57:49उन्होंने जिन्हें कोई अच्छा कोई आकांक्षा नहीं, जिनको कछु ना
- 58:00चाहिए वही शहंशाह। प्रतिक्षण कबीर ने कहा, कुछ बनने
- 58:14की आवश्यकता नहीं है। कबीर तो अनपढ़ नानक तो अनपढ़ हैं।
- 58:24कबीर ने ना किसी विश्वविद्यालय में जाना, ना उनकी विश्वविद्यालय
- 58:30में कोई चाहत है लेकिन फिर भी वो मस्त रहते हैं।
- 58:39उन्होंने वो पा लिया जीसको अष्टावक्र कहते हैं, इसलिए मैं
- 58:46कहता हूँ, दुई को त्यागें अध्यात्मिक पात सखाते हैं, संसार
- 58:52की बताते खुद को आध्यात्मिक। ना तो कबीर ने, ना नानक ने, ना
- 59:05बुद्ध ने, ना महावीर ने आइआइटी नहीं की थी, ना आईआईएम किया था,
- 59:12ना कोई कॉम्पिटिशन लड़ा था। ये सब आपके अंकार को बढ़ाने मंत्र
- 59:18के उपाय पर कबीर कहते हैं हम ये बिना।
- 59:22किये बड़ी मस्ती में हैं। ना कछु दे ना ना कछु ले ना ना कछु
- 59:45दे ना कबीरामग्न। कबीरी मैं मन दो लागो मेरा वो रहा
- 1:00:04फकीरी मैं। ओह, फकीरी मैं मनडोरा क्यों हो
- 1:00:18मेरा जो सुख पायो। जो सुख पायो राम भजन में जो सुख
- 1:00:40पायो राम भजनों में। सो, सुखना हीं अमीरी मैं मंडोला
- 1:00:56जो मेरो रहा फकीरी मैं। फकीरी, मैं मनडोला क्यों हो, मेरो
- 1:01:12रहा कहत कबीर। सुनो भाई सा दो कह तू कबीर सुनो
- 1:01:34भाई सा धो साहेब मिलही। साहेब मिलहीं सबूरी मैं साहेब
- 1:01:55मिलहीं सबूरी मैं? मन्नू डोला जो मेरो राम फकीरी मैं
- 1:02:14उफकी री मैं मन्नू डोला, जो मेरो राम।
- 1:02:24जो सुख पायो राम भजनों में है जो सुख पायो राम भजनों में।
- 1:02:43वो सुख, न हीं अमीर मैं मन बोला जो मेरा।
- 1:03:10मैं। कहत कबीर सुनो भाई साहब तत्व की
- 1:03:26बात कहते हैं कबीर सुन लो कान खोल के सुनो ध्यानपूर्वक सुन लो मेरी।
- 1:03:37ये रस की बात जो मैंने निचोड़ ली फूलो सर सर शब्द रस जो मैंने
- 1:03:48निचोड़ लिया वो सुन लो कहत कबीर सुनो भाई साधू।
- 1:03:58क्या कहना चाहते है कभी साहेब मेला ही साहेब बड़ा प्यारा आजकल
- 1:04:10प्रथा है एक शब्द नया चला साहेब बंधन।
- 1:04:17बड़ा सुंदर शब्द है, बड़ा प्यारा शब्द है अर्थ क्या होता है साहेब
- 1:04:27परम खुशी का नाम है साहेब अखंड आनंद का नाम है साहेब।
- 1:04:38इतना आन उस आनंद के सरोवर का नाम है साहेब कहते है साहेब बंद उस
- 1:04:49अखंड आनंद को मैं नमस्कार करता हूँ।
- 1:04:53ये अर्थ साहब बंदगी वाले कहने वाले लोगों को स्वयं भी मालूम है
- 1:04:59मुझसे किसी ने पूछा पांच 4 दिन पहले बाबा ये साहब बंदगी का अर्थ
- 1:05:04क्या होता है? मैंने उसे समझाया कि साहब बंदगी
- 1:05:09का अर्थ यही होता है। जैसे हम सुबह शहर को निकलते हैं
- 1:05:13जो रास्ते में मिलते हैं हम के राम राम भाई अकालपुर को याद करते
- 1:05:19हैं ये साहेब वो अकालपुर है ये वो रस का खजाना है वो रस का समुद्र।
- 1:05:32जो कल कल कहता बहता, आपके भीतर हर पल तैयार है बरसने के लिए, लेकिन
- 1:05:41आप उसे स्वीकार नहीं करते। आप तरजीह देते हो संसार की चीजों
- 1:05:48को साहेब मिलिंग सबूरी में अब तो घबरा के ये कहते हो कि मर जाओगे।
- 1:06:10घर मर के भी चैन न पाया तो किधर जाओगे?
- 1:06:15कर गए बड़े बड़े पौधे ले गए सबसे बड़ी पीख।
- 1:06:27प्वाइंट की गदियाँ आपने ले सबूरी फिर भी नहीं मिलती नहीं, नहीं
- 1:06:34मिलती सबूत है आपके साथ अगर सबूरी मिल जाये।
- 1:06:45अगर एक बार के संभोग से आनंद मिल जाए, दूसरी बार व्यक्ति उस संबंध
- 1:06:55में जाने की इच्छा ही नहीं करेगा। साहिब मिलेंगी सबूरी में अगर
- 1:07:06आपको। परम खुशी का खजाना टल गया और
- 1:07:13मिलेंगे कैसे तृप्ति मिलेंगे, कैसे तृप्ति मिलेंगे?
- 1:07:23सस्तोरी की झलक से वो एक धागा है। कच्चा धागा उस धागे को पकड़ के
- 1:07:34धीरे धीरे ऊपर चढ़ते जाना और सभी मंजिलें को बाहर कर उस दशमवार में
- 1:07:43पहुँच जाना और पाओगे। जैसे जैसे ऊपर चले जाओगे, धागा
- 1:07:49मजबूत होता जाएगा। फिर तो मोटा रस्सा हो जाएगा फिर
- 1:07:56फिर तो लोहे की संगले होती जाएगी और फिर आप ऊपर पहुँच जाओगे।
- 1:08:02दसम द्वार में। सहस्त्र दल कमल में पहुँच जाओगे
- 1:08:09जहाँ खुशी ही खुशी है, आनंद ही आनंद फिर लोग कहते हैं कि आना
- 1:08:19जाना नहीं पड़ेगा इस बात को भी थोड़ा सा।
- 1:08:24आना जाना नहीं पड़ेगा। ऐसा नहीं आने जाने की इच्छा ही
- 1:08:30नहीं होगी। जब तरक्की हो गई, पंगत में बैठ
- 1:08:35गए, लंगर छक लिया, पेट भर लिया, गले तक भर लिया।
- 1:08:43और जगह ही नहीं बची तो खाने की इच्छा भाती रहेंगी।
- 1:08:53मुक्ति का अर्थ ये नहीं होता आपके भोजन से।
- 1:09:01क्षणिक भूख मिटती है ईश्वर के भोजन से परमानेंट मूख मिट जाती
- 1:09:09है। आने जाने का मन ही नहीं करता।
- 1:09:13बहुत से लोग मुझे प्रश्न कर देते है बाबू ये कल्प के बाद जो लोग
- 1:09:19मोक्ष में बैठे हैं। वो फिर से आ जाएंगे।
- 1:09:22क्यों आएँगे भाई जीसको रहस्य खुल गया जिसने वो अमृत पी लिया।
- 1:09:31कल्प के बाद जैसे ही कयामत आएगी, क्या वो नशा क्या वो तृप्ति?
- 1:09:40टूटने शुरू हो जाएगी नहीं तो वैसे ही रहेंगी वो तृप्त ही क्या हुआ
- 1:09:47जो कभी टूट गया? ये शुदा ऐसी भर्ती है कि फिर शुदा
- 1:09:53नहीं लगती है आपकी शुदा बार बार संसार बार बार।
- 1:10:00खाते हो फिर लग जाती सुबह खाते शाम लग जाती, शाम खाते रात लग
- 1:10:07जाती, लेकिन ये ऐसी तृप्ति है मुक्ति के बाद आने का मन ही कहाँ
- 1:10:16करेगा भाई? कहाँ उस परम पोषण पोषण ऑफ
- 1:10:24एक्सप्रेस परम आनंद के सूत्र में जैसे ही गोता लगा लिया?
- 1:10:39कौन मूड आना चाहेगा? मूड होगा ही नहीं।
- 1:10:43जिसने वो अमृत भी लिया उस पर मूड का कभी हावी नहीं हो सकती।
- 1:10:49ये ध्यान रख लेना प्रलय हो जाए क्या बता जाए?
- 1:11:00फिर फिर दुनिया जन्मे ये सभी तुम्हारी मान्यताएँ लेकिन एक बात
- 1:11:08थीम का में जवाब देती उसे फिर से संसार में आने की इच्छा नहीं।
- 1:11:16जो बूंद समुद्र में मिल गई बूंद से जुदा होने की इच्छा कभी नहीं
- 1:11:21करे, बूंद समुद्र से अलग होने की इच्छा कभी नहीं करे, ना ही समुद्र
- 1:11:30उसे छोड़ने की कभी इच्छा करे। परित नहीं करे।
- 1:11:36इसलिए वो उसका आनंद मानती रहेंगी। बूंद सदा ही समद्र या भ्रम तोड़
- 1:11:43देना तो फिर अगला कल्प शुरू होगा तो फिर मोक्ष की आत्मा फिर फिर आ
- 1:11:50जाएंगे। नहीं ऐसा होता नहीं हो सकता।
- 1:11:55ईश्वर नई सृष्टि से निर्माण करे ना करे, मैं इतना जानकार जो जानते
- 1:12:03हैं उनसे पूछ लो, वो तो आपको वर्ष भी घना देंगे।
- 1:12:09इस सृष्टि का आरंभ कब हुआ? कब हुआ, कैसे हुआ स्वयंभू का
- 1:12:18विवाह हुआ शत्रु का उसके पांच पुत्र पुत्रियां, तीन पुत्रियां
- 1:12:26हुईं दो पुत्र प्रिय व्रत और उत्थान पात।
- 1:12:30फिर आगे सारा खिलार आंसू। चाहिए तो बता दूँ पर तुम भाग
- 1:12:38जाओगी। मुझे बता ये मूडता की बातें हमारे
- 1:12:44शास्त्रों में भरी पड़ी। तत्त्व निकाल नहीं पाए, रस खोज
- 1:12:50नहीं पाए तो फिर चलो यही चलने दो, ऐसा ही कुछ बकवास से भरे पड़े
- 1:12:59हैं। तुम्हारे शास्त्र कितना ही गुणगान
- 1:13:02किए जाओ, कितना ही रस उसमें ढूंढे जाओ।
- 1:13:06जो नीरस है, जिसमें रस है ही नहीं, वहाँ से रस मिलेगा भी नहीं,
- 1:13:12खोजे से भी नहीं मिलेगा कैत कबीर सुनो भाई, साधु साहेब मिलहीं
- 1:13:23सबूरी में। यहाँ आके बात खत्म कबीर यहाँ आके
- 1:13:32बात को इति इतिश्री अगर सबूरी अगर।
- 1:13:45साहेब मिल गया दोनों बातें एक ही आप दो स्मृत्य हो, तृप्ति का
- 1:13:52दूसरा नाम है साहेब और साहेब का दूसरा नाम है तृप्ति।
- 1:13:59ये दोनों यकसाण हैं। नाम दो हैं।
- 1:14:04बात एक ही है स्थिति एक ही है प्रायवाची शब्द प्रयोग कर लेते
- 1:14:09हैं कुछ बनने की चेष्टा मतलब हो जाना आप कहते हो दृष्टा बन।
- 1:14:27धृष्टा आप हों उसको जाने की हम धृष्टा हैं, बस बनने की प्रक्रिया
- 1:14:35छोड़ देनी है, बनने की प्रक्रिया, एक श्रम है, और सभी श्रमों को जो
- 1:14:41छोड़ दे श्रम कर रहा है वो। आपके लिए उसने बहुत श्रम कर दिया।
- 1:14:48आपको श्रम करने की कोई आवश्यकता नहीं।
- 1:14:51भला आपका दल आपकी शक्ति से श्रम करता है, आपके पूछने से चलता है
- 1:15:00नहीं, नहीं, उसकी शक्ति से चलता है।
- 1:15:05आपका फेफड़ा आपके श्रम से चलता है फिर रात्रि को तो आप बेहोश होते
- 1:15:12हो फिर श्रम कहाँ से आता है रात्रि को तो आप बेहोश होते हो?
- 1:15:17फिर ये दिल लगातार 1 मिनट में 72 बार धड़कता है।
- 1:15:22ये कहाँ से लेता है शक्ति नहीं, नहीं आप भूल जाते हो, श्रम मत
- 1:15:31करो। फिर तो दिल को धड़कने के लिए भी
- 1:15:35आपको श्रम करना पड़ेगा और याद रखना जिंदगी नर्क हो जाएगी।
- 1:15:40श्रमहीन हो जाओ। और जैसे ही आप दुष्टता बनते हो,
- 1:15:45श्रम करना पड़ता है। जैसे ही आप महावीर के श्रावक बनते
- 1:15:49हो, श्रम करना पड़ता है, मैं यही चीज़ तोड़ना चाहता हूँ बनना नहीं
- 1:15:57जैसे आई एस नहीं बनना। आईआईएमआईआईटी यूपीएससी कॉम्पिटिशन
- 1:16:05नहीं डरना अगर वो साहेब की सबूरी में जाना चाहते हो।
- 1:16:13देखिए मैं आपको गुमराह नहीं कर रहा।
- 1:16:18संसार में रहने के लिए विद्या आवश्यक ही नहीं, परम अवश्य वो मत
- 1:16:27छोड़ दे। मेरे कहने का तात्पर्य भी नहीं
- 1:16:30है। खूब खुरे विश्वविद्यालय, लेकिन
- 1:16:36विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले। इस बात की दुविधा मत रखें।
- 1:16:47इस बात की मूडता मत पाले कि हम अध्यात्म का मार्ग तय कर रहे हैं,
- 1:16:54क्योंकि पढ़ने से अध्यात्म का मार्ग तय नहीं होता।
- 1:16:59कबीर कहते हैं मैं कुछ देना नहीं, कुछ पढ़ना नहीं, कुछ देना नहीं
- 1:17:03हूँ। कबीरा मगन कबीर कुछ करना नहीं हूँ
- 1:17:09ये तो संसार की आवश्यकताओं पूर्ण करने के लिए आपके कॉम्पिटिशन वे
- 1:17:15हैं। और जो गुरु आपको समझाते है वो
- 1:17:19मात्र सांसारिक गुरु है। वो गुरु, गुरु शब्द की तो ही मत
- 1:17:28कर और शिक्षक, शिक्षक और आचार्य में फर्क होता है।
- 1:17:36शिक्षक और गुरु में फर्क होता है। टीचर शिक्षक है, गुरु आचार्य है
- 1:17:46आचार्य उपासना स्वचम सैरियम आत्मा लिंगरव कृष्ण कहते हैं आचार्य के
- 1:17:53पास वर्शन आचार्य। वही गुरु जिसकी बात करते हैं, इस
- 1:17:59संसार की बात है, आचार्यों, उपासन जिसके पास आप बैठते हो आचार्य, वो
- 1:18:10गुरु, शिक्षक जो संसार सिखाए वो गुरु।
- 1:18:19आचार्य को जो अध्यात्म से काट कबीर कहते हैं, हमने कुछ नहीं
- 1:18:25करना, भाई ना कछु लेना। कोई एक्सेप्ट नहीं करना, कुछ
- 1:18:34पढ़ना नहीं, कुछ लेना नहीं, कोई ज्ञान नहीं लेना।
- 1:18:38आपका ये महज सूचनाएं ना कछु देना, ना पढ़ाना है आपको आचार्य ऐसा
- 1:18:47होता है आचार्य शिक्षक की बात नहीं।
- 1:18:54साहेब ना कछु देना, ना कछु लेना। कबीरा मगन कबीरी में बड़ा शानदार
- 1:19:04शब्द है कबीरी क्या होती है आपका अपना होना ही कबीरी है।
- 1:19:11कबीर जब अपने होने में होते हैं, अब बोलने में आते नहीं, शब्द में
- 1:19:18क्या करूँ? कबीर जब अपने आपे में होते हैं तो
- 1:19:23वहाँ होती है कबीर की कबीरी। तुम अपने आप में स्थित हो।
- 1:19:30भगवान कृष्ण जी से स्थिति प्रज्ञा कहते वो है कबीर की कबीर कृष्ण का
- 1:19:37कृष्णत्व राम का रामात्व वो है ना कुछू लेना वहाँ किसी से कुछ लेना।
- 1:19:47ना कछु देना कुछ देना कबीरा मगन कबीरी कबीर तो मगन है वहाँ जाके
- 1:19:54मगन मगनता ना आएगी तो फिर और कहाँ आएगी वहाँ जाके कबीर मगन हो जाते
- 1:20:00हैं और आखिरी शब्द एक। आपके लिए उपदेश हैक अमेरिका कहत
- 1:20:10कबीर सुनो भाई। साहब, मिल ही सबूरी मैं।
- 1:20:29मनडोला जो मैं रो रहा हूँ, कह तू कवि सुनो भाई।
- 1:20:48साधु कह तू कबीर सुनो भाई साधु। गौर से सुन लेना सदबो शिशु।
- 1:21:04साहेब मेलोहीन जे परम कुशी जे परम ऑन पोशन ऑफ एक्सप्रेस।
- 1:21:23इटरनल ट्रांकुइलटी साहेब मिलहीन सबूर।
- 1:21:34में सबूरी में सबर और सबर कब होता है।
- 1:21:44जब तृप्त होता है व्यक्ति तृप्ति आजाद गो धन, गज, धन, बाज, धन और
- 1:21:53रतन धन खां जब आवै संतोष, धन सब धन दौड़ जमा।
- 1:22:02साहेब मिलहीं सबूरी मैं मन्नड़ोला जो मेरे वो फकीरी मैं।
- 1:22:22जी फकीरी में मनुड़ोला दो। में रो रहा धन्यवाद।