Latest / Baba ji Vijay Vats / 12 Jan 26 - गोरखनाथ: शब्द मारी शब्द जलाई | बाहरी शोर vs भीतरी नाद | काजी, नमाज और अहंकार का खेल |
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- 0:09विश्वनाथ कलकत्ता से। शब्दें मारी शब्दें जलाई ऐसे
- 0:32मोहम्मद बेरम ताके भ्रम ना भूलो, काजी सोबल नहीं सरीरम।
- 0:55मैंने आपसे पहले ही कहा कि गोरख ऐसी बात करते हैं जो कभी किसी ने
- 1:07कही। सीधी सरल, सपाट शब्दें मारी
- 1:19शब्दें जलाई गौरख कहते हैं दो तरह के शब्द।
- 1:32एक शब्द बाहर है, वह शब्द शोर है एक शब्द भीतर है, वह शब्द आनंद
- 1:45है। लेकिन तुम इन शब्दों को पहचान
- 1:54नहीं पाते बाहर के शब्द की तरफ तुम आकर्षित हो जाते हो भीतर के
- 2:05शब्द की तरफ तुम जाते नहीं। शब्दें मारी एक शब्द मार्क है
- 2:16बाहर का शब्द मार्क है, क्योंकि बाहर का शब्द शोर है शब्दें जलाई
- 2:26एक भीतर भी हमारे शब्द। गूंज रहा है।
- 2:322400 घंटे गूंज रहा है। बाहर का शोर तो कभी थम भी जाता है
- 2:40लेकिन भीतर तो अनवरत अनहद चलता ही रहता है।
- 2:49गौरव कहते हैं, यही शाश्वत है, जो चौबीसों घंटे चलता है और जो
- 2:55तुम्हारे चलाये से चलता नहीं, जो तुम्हारे बंद होने से बंद नहीं
- 3:00होता है। इसका कोई सूच तुम्हारे पास।
- 3:04नहीं है। ऑन और।
- 3:06ऑफ का। शब्दें मारी शब्दें जलाई बाहर का
- 3:14शब्द तुम्हें मारता है बाहर का शब्द उसका सच्चे तुम्हारे हाथ
- 3:21में। बाहर के शब्द को तुम रोक सकते हो,
- 3:30आपने देखा होगा डॉक्टर के एक किसी भी डॉक्टर के एक छोटी सी पट्टी
- 3:37लगी रहती है। कृपया शांत रहे, कृपया चुप रहे।
- 3:48बाहर का शब्द शोर है और शोर में तुम उलझ जाओगे, तुम पहले ही शोर
- 3:58से ग्रस्त हो एक तो करेला और दूसरा नींव चढ़ा।
- 4:09पहले ही से तुम्हारा मन शोर कर रहा है और फिर इस शोर से अलग तुम
- 4:24बाहर के शोर में चले जाते। फिर यह शोर गौर कहते हैं,
- 4:32तुम्हारे लिए मार्क हो जाता है तुम्हारे लिए शृंगार को हो जाता
- 4:38है तुम्हें जीवन नहीं देता तुम्हें मृत्यु दे देता है शब्दें
- 4:44जलाई। गौरख के अति शब्द भीतर भी गूंज
- 4:50रहा है। उसका ऑन ऑफ का बटन तुम्हारे हाथ
- 4:55में है, वह स्वत से शुरू होता है। और सतेह से ही बंद होता है।
- 5:06तुम उसे न तो चालू कर सकते हो, न बंद कर सकते हो।
- 5:13शब्द जलाई गौरव कहते हैं, तुम्हारा मन बड़ा शोर करता है।
- 5:29और इसे शोर करते हुए मन में तुम शोर शराबे में और भी ज्यादा संसार
- 5:37में उलझ के अपने शोर शराबे को बढ़ा लेते हो भीतर कम शोर है
- 5:46तुम्हारे मन का। और बाहर तुम शोर मटाने के लिए
- 5:52गुरु के बाद शायद गुरु कहता है ये लो राते राते झप लो, ये राम राम
- 6:00झप लो, ये पांच नाम झप लो, वह भी तो सो रहा है?
- 6:08तुम पहले से ही तुम्हारा मन शोर बोल में जा रहा था, उछल कूद कर
- 6:12रहा था और तुम उस शोर से कंग आकर गुरु के शरण में गए थे।
- 6:22के गुरुदेव यह मन बड़ा शोर करता है।
- 6:29और गुरु तुम्हें दूसरा शोर दे देते हैं।
- 6:33गुरु कहते कोई बात नहीं, तुम ऐसा करो, तुम पांच नाम ले जाओ, इसको
- 6:44चुप हो। पहले ही से मन तुम्हारा उत्पाद
- 6:53मचा रहा था। गुरु ने एक और शोर दे दिया शोर।
- 7:00बढ़ता ही क्या? झुंझुन दबा की तुम शोर को मिटाने
- 7:08से लेते बाहर के मूर्ख गुरुओं ने तुम्हारे शोर को बढ़ा दिया शब्दें
- 7:18मारी शब्दें जलाई। गौरव कहते हैं, लेकिन घबराओ नहीं,
- 7:29एक ऐसा भी शब्द है जो तुम्हें शांत कर देगा, जो तुम्हारे मनस के
- 7:39शोर को भी समाप्त कर देगा। जिससे तुम तंग आ गए हो धरती पे
- 7:48कौन ऐसा मानव है जो मन के शोर से तंग न दिन भर रात यह बोलता ही चला
- 7:58जाता है। यह थमने का नाम ही नहीं लेता और
- 8:04यह तो मैं कठपुतली की तरह नहीं चाहता।
- 8:10ये कहता चलो मैं खा नहीं चला और तुम कहते मैं खाना तो खराब लोग
- 8:20क्या कहेंगे? तो फिर कहते चलो फिर ऐसा करो,
- 8:23मंदिर चलो अयोध्या चलो चलो हरिद्वार ऋषिकेश चलो अमरनाथ चलो
- 8:37लेकिन मन तुम्हारा तुम्हे रोकने नहीं देता।
- 8:43तुम्हारा मन तुम्हें गतिमान रखे रहता है।
- 8:46हर वक्त और यह गतिमान होना ही तुम्हें ढरने नहीं देता।
- 8:54यही वादा है तुम्हारी शांति के भीतर।
- 9:01यह एक ऐसा पत्थर है जो झरने के ऊपर रखा हुआ है और झरने को फूटने
- 9:08से रोकता है। जैसे ही इस पत्थर को उठा लोगे
- 9:15भीतर का झरना बाहर फूट। आएगा।
- 9:21शब्दें मारी शब्दें जलाई शब्दें मारी शब्दें जलाई एस ए मोहम्मद
- 9:31पीरम मोहम्मद बीर ऐसे हैं। मोहम्मद तीर्थ में बतलाते हैं कि
- 9:44एक शोर बाहर है, वो भी शब्दों का है, एक शोर भीतर भी है, वो शोर
- 9:52नहीं है, वो नाद है। तुम मोहम्मद कहते तुम बाहर के शोर
- 10:00को छोड़ कर भीतर के शब्द की तरफ नाद की तरफ चले जाओ, तुम बड़े
- 10:11मदमस्त हो जाओ। तुम्हें जीवन का सुरूर मिलेगा
- 10:17बाहर का गुरुर खत्म। होगा तुम सुरूर में हो जाओगे अभी
- 10:24तुम गुरूर में हो इस गुरूर को छोड़ो, यह शोर से पैदा होता है
- 10:31गुरूर और शोर से हीन होना तुम्हें सुरूर देता है।
- 10:41शोर से लुप्त होना तुम्हें गुरूर देता है और तुम बड़े गुरूर में हो
- 10:49ऐसे मोहम्मद बेरम ताके भ्रम न बोलो का जी सो बल नहीं सरीरम बड़ा
- 10:59सुंदर शब्द है ताके भ्रम न बोलो का जी?
- 11:16गौरख के शब्दों की इतनी प्रशंसा की जाए कम है।
- 11:25गौरख कहते हैं कि गुरु तो ठीक बोल के जाता है।
- 11:34लेकिन ये शिशु से विकृत कर लेते हैं पर महात्मा ने तो तुम्हें
- 11:41निर्मल जल दिया, शुद्ध वायु दी ऑक्सीजन दी, पेड़ पौधे दिए।
- 11:51जो कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करके ऑक्सीजन छोड़ते हैं।
- 11:56ऑक्सीजन तुम्हारे लिए जीवन दायनी शक्ति है।
- 12:04गौरव कहते हैं कि गुरु तो तुम्हें सत्य ही बोल के जाता है।
- 12:12कोई भी गुरु आज। तलक।
- 12:16असत्य नहीं बोले फिर असत्य कहाँ से आ गया गुरु सत्य होलता तो
- 12:26असत्य का जी बनाते थे। ता।
- 12:32के भरम न फूलों का जी। हे काजी, तुम मोहम्मद की बात कह
- 12:40सुनते हो, तुम उसकी बात को जहाँ इशारा किया था अपने भीतर जाने के
- 12:50लिए। और अपने भीतर जाने के तुम्हें
- 12:55उपाय बताए थे भीतर उतरो, जोखो नमाज़ करो, नमन करो नमो और तुम
- 13:08तो। मच्छरों के ऊपर चढ़ के ऊंचे ऊंचे
- 13:13लाने लगे जा चढ़ मुल्ला बाग दे क्या बहरा हुआ खुदा?
- 13:34गुरुत्व में सत्य बताके जाते। हैं फिर ये असत्य कहाँ से आ जाता
- 13:39है? असत्य आ जाता है।
- 13:48मोहम्मद को जो याद करता है काजी वह असत्य को फैलाता है।
- 13:58काजी ने जाना नहीं होता, काजी ने नमन नहीं किया होता, काजी ने
- 14:06समर्पण नहीं किया होता, काजी ने नमाज़ सत्य में नहीं पढ़ी होती।
- 14:13महज औपचारिक कर्मकांड की तरह वो नमाज़ करता है, पूरा झुक नहीं
- 14:20पाता, शरीर झुकता है, सिर्फ अहंकार वहीं डटा खड़ा रह जाता है,
- 14:29इसलिए सत्य में नमन होता नहीं। नमाज़ पढ़ी नहीं जाती, नमाज़ होती
- 14:36नहीं, उसके दरबार में स्वीकृत नहीं होती।
- 14:39नमाज़ क्योंकि तुम झुकते कहाँ हो, वो तुम्हारा शरीर झुकता है और
- 14:47बल्कि बात तो उलट है। जितनी बार तुमने नमाज़ी की
- 14:54शुक्रवार को तुम्हारा अहंकार देखने जैसा होता है क्योंकि आई
- 15:00तुमने जुम्मे की पांच नमाज़ी की तो अहंकार।
- 15:09इतना बढ़ गया। आज जितना छः दिनों में नहीं था कि
- 15:15आज तुमने पांच बार नमाज़ पढ़े, यह नमन होना तुम्हें और भी ज्यादा
- 15:23अहंकार से भर देता है, जबकि नमन होने।
- 15:27से अंगार मिटना चाहिए। यह तो उल्टा हो गया।
- 15:33काजी गौर कहते हैं, काजी ने नमाज़ पढ़ी, काजी का शरीर झुका।
- 15:46और शरीर तो एक भौतिक जंत्रण है, वह जो सच में टूटना चाहिए, वह जो
- 15:55सच में भ्रम मेंटना चाहिए, वह जो गलना चाहिए वह जो झुकना चाहिए, वो
- 16:02तो भीतर डटा खड़ा रहा। क्या था वो जो भीतर डटा खड़ा रहा
- 16:10वो था तुम्हारा आहंकार मेरे पास यहाँ एक स्त्री आई बहुत साल पहले
- 16:23की बात है। 16 सालों से उसे बच्चा नहीं हुआ
- 16:28था। लोग ताने मारते बांझ कहते
- 16:36स्त्रियों की अपनी सभा होती है, स्त्रियां उसको ताने मैंने देती
- 16:45हैं। जड़ों से सड़ा हुआ रुख है तू तेरी
- 16:48को खारी होती। तंग हो के मेरे पास आई बाबा तू सब
- 16:59की इच्छा पूरी करता है, मेरी इच्छा भी पूरी करता है।
- 17:05मेरी कोखरी नहीं हुई 16 वर्ष से शादी का।
- 17:14मैंने कहा, देख तुझे संतान तो हो जाएगी, लेकिन कहीं ऐसा न हो कि
- 17:24तेरे भीतर का अंकार जितना अब है, उससे ज्यादा बढ़ जाए।
- 17:30नहीं बाबा मेरा अहंकार तो बल्कि निम्नस्तर पे आ जाएगा।
- 17:38मैं तो भगवान को आपको कृत कृत्य हो के धन्यवाद दूंगा, शुक्रिया न
- 17:44करूँगा। झुक जाएगा अहंकार मेरा आपके चरणों
- 17:48में तो मैंने कहा ठीक तू जा, अगले साल तेरे बच्चा हो जाएगा।
- 17:55अगले साल उसके बेटा हो गया जैसा मैंने कहा था वैसा।
- 18:04ही हो गया। वह तो अहंकार की मारी, फिर वह तो
- 18:10बाहर कटोरा डाले बैठे, अब उसके पास कोई और था, जो ताने मैंने
- 18:18मारती थीं, वो आज उसके पास कोई ना।
- 18:24उसे पता है ये हिसाब चुकता करेगी जो उसको चार गालियां निकाले या
- 18:31चार के बजाय 40 निकालेगी। मेरे पास कमेंट आ जाते हैं बाबा
- 18:43मेरा काम कर दो ताकि मैं भी कह सकूँ।
- 18:46कि मैं बहुत बड़े गुरु का शिष्य हूँ।
- 18:50मैंने कहा तुम मेरी बरपने कर रहे हो तुम अपने बरपने।
- 18:54कर रहे हो? मैं कोई छोटे मोटे गुरु का शिष्य
- 19:00हूँ, मैं बहुत बड़े गुरु का शिष्य हूँ।
- 19:06वास्तव में तुम अपने अंगार को बढ़ाना चाहते हो गुरु के बड़प्पन
- 19:12को दिखाकर लेकिन यह किसी को दिखता नहीं है क्योंकि सब एक जैसे गधे
- 19:20कौन किसको समझेगा? दूसरे भी समझ लेते हूँ तेरा गो
- 19:28वाकई ही बलशाली है, अहंकार तुम्हारा ऊंचा हो जाता है।
- 19:39झूं झूं दबा की मर्ज बढ़ता ही क्या?
- 19:43जैसे जैसे तुम्हारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं।
- 19:46इच्छाएं नए नए रूप में बढ़ती चली जाती हैं और फिर इच्छाएं बड़े
- 19:53बड़े रूप ले लेती हैं। वो भी पूरी हो जाती हैं।
- 19:57फिर अंतिम पड़ाव आ जाता है। फिर तुम पीएम हो जाते हो कहाँ?
- 20:02पीएम थे अब पीएम हो गए। फिर तुम कहते हो अब तो अवतार
- 20:08घोषित हो जाये फिर बात बनी लेकिन अवतार तो परमात्मा बनाया कर।
- 20:23अवतरण तो वह किया करता है ऊपर से उतरा करता है वह गगन मंडल से यह
- 20:32बंदे के हाथ की बात नहीं है बंदा तुम्हें तुम्हारी पूजा कर सकता है
- 20:38तुम्हें अवतार नहीं बना सकता बंदा तुम्हारी।
- 20:45हुक्म को मान सकता है। लेकिन तुम्हारे भीतर अवतरण नहीं
- 20:51कर सकता। वो उस चेतना।
- 20:53को। जीस चेतना को पाकर तुम ब्रह्मलीन
- 20:58हो जाते हो और विस्तृत हो जाते हो अनंत में।
- 21:03वह बंदे के हाथ में नहीं शब्दें मारी शब्द जलाई ऐसे मोहम्मद बेरम
- 21:17ताके भरम न बोलो काजी हे काजी तुमने बड़ा भ्रम फैलाया है।
- 21:25और तुमने भर्मफला के लोगों को पहले से ही जो शोर में थे, तुमने
- 21:33और ज्यादा शोर में धकेल दिया, उन्हें बुला ही दिया।
- 21:44कि तुम्हारा लक्ष्य क्या था? तुम्हारा लक्ष्य था तुम्हारा मन
- 21:50बोलता है इसको पर मौन में ले जाना।
- 21:54यह था तुम्हारा लक्ष्य अभी तुम्हारा मन बोल के तुम्हें तंग
- 22:00करता है। वो तुम्हारा लक्ष्य था, इस बोलते
- 22:04हुए मन को शांत कर दो। वह कैसे हल होता अपने अंतःस में
- 22:10जा के बहर्मुखी हो के नहीं, तुम तो नाम दे देते हो बहर्मुखी होने
- 22:16के लिए वो नाम चाहे कोई भी दे लो। कोई क्रिया दे देते हो, यज्ञ कर
- 22:23लो, हवन कर लो, वेद पढ़ लो उपनिश्चित पढ़ लो गीता पढ़ लो,
- 22:29कुरान पढ़ लो वैबल पढ़ लो ग्रंथ पढ़ लो तुमने शोर मिटाने की जगह
- 22:37शोर बढ़ा दिया। और तुमने ऐसा शोर बढ़ा दिया कि
- 22:43तुमने कान में फुस फुसा दिया कि ये लो मंत्रो किसी को बताना इतना
- 22:56मोहताज कर दिया तुम्हें कि तुम दुखी भी हो तो किसी को बताना मत।
- 23:03कि गुरु ने क्या फूंक मार दी, किसी को बताना मत अपना दर्शन
- 23:11बताओगे तो बाप लगेगा भला गुरुदेव। तुमने भी तो लाखों को बताया,
- 23:22तुम्हें पाप नहीं लगा क्या फिर इसको कैसे पाप लग जाएगा?
- 23:30भगवान के नाम से अगर पुकारा जाए तो पाप कैसे लगेगा?
- 23:41भगवान के नाम से अगर भगवान को पुकारा जाए, तुम बताओ तो पाप कैसे
- 23:49लगेगा और तुम्हें क्यों नहीं लगा? मेरी कहते हैं हमें वो तो गया
- 23:55कैंसर हमारी तो धर्मपत्नी भी कैंसर हमने तुम्हारी ही तो पाप
- 24:02उठा रही है, इत्ते से पाप होते हैं, आदमी के नहीं, ये झूठ।
- 24:17लाखों लोगों के पास सिर्फ एक छोटे से कैंसर से नहीं उठाई जा सकती।
- 24:26लाखों आदमियों के पास लाखों आदमी को भुगतने दो।
- 24:32प्रत्येक व्यक्ति का कर्म, वह स्वयं भोग, हर व्यक्ति अपने कर्म
- 24:41का अधिकार भी रखता। है।
- 24:44और उस उसके फल का जिम्मेदार भी होता है।
- 24:49इस शब्द को फिर समझो। हर व्यक्ति अपने कर्म के लिए
- 24:56अधिकार भी रखता। है।
- 24:58अच्छा करे, बुरा करे और उस कर्म के फल के जिम्मेदार भी होता है
- 25:08उसने किया। तो फल भी वैभव है।
- 25:12जीस दिन तुमने अपने हृदय के अंतर तल में यह बात उतार ली है कि
- 25:19मैंने ही किया मेरे ही कर्मों का फल यद्यपि मैं भूल गया हूँ।
- 25:28तुम तो एक हफ्ता पहले तुमने शाम को और सुबह को क्या सब्जी खाई तो
- 25:35मैं ये भी नंबर पता है तुम्हें नहीं जाग रहा।
- 25:42था। फिर तुमने क्या पाप किया?
- 25:48तुम्हें कैसे याद रह जाएगा? तुम पुण्य को तो गिनते हो इतनी
- 25:55माला कर ली इतनी माला कर ली तुमने तो बैंक बना लिए राम राम लोगों ने
- 26:02बैंक खोल रखे हैं मैं कहा हाँ ले लेना जाके पाउंड उनसे।
- 26:08इस नाम से सुख नहीं मिलता। जीस नाम की व्याख्या ही गलत की
- 26:16गई। हो?
- 26:22राम से बड़ा राम का नाम। इसकी व्याख्या गलत की गई है।
- 26:33कभी फिर बताऊँगा क्योंकि अभी प्रसंग मूड खा जाएगा और गौर के
- 26:41शब्द धरे के धरे रह जाए। शब्द ए मारी।
- 26:49शब्द जलाई ऐसे मोहम्मद बीरम ताकि भरम न बोलो का जी, कहते का जी
- 26:57बिगाड़ लेते है सब चीजों को ये पंडित पुरोहित ये गर्भ थी ये कर्म
- 27:10कांडी। हवन यज कराने वाले ब्राह्मण फेरे
- 27:14करवाने वाले ब्राह्मण यह है तुम्हें मूर्ख बनाते हैं, अन्यथा
- 27:25कोई न तो गणेश उतरता है। न संकर उतरता है इन विचारों की
- 27:32क्या? औकात है?
- 27:36सुन रही हो निर्मला घर से प्याज ले सुन खा के आएं, ये कैसे
- 27:43पहुँचेंगे भला? भला प्याज लहसुन खाने वाला बंदा
- 27:48कभी पहुँच सकता है कभी नहीं पहुँच सकता तुम्हारे अलग अलग मानने का
- 28:00है। राम किशन पर मछली खा के भी पहुँच
- 28:06जाते हैं और तुम प्याज और लहसुन से इतनी तकलीफ मानते हो ये अहंकार
- 28:20को बढ़ावा देना। है।
- 28:23तुम अपने अंकार को इन कर्त्यों को करके, जिन्हें धार्मिक समझा जाता
- 28:30है, अपने अंकार को बढ़ावा देने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर रहा, तुम
- 28:37नमाज़ भी पढ़ते हो, उससे अंकार बढ़ता।
- 28:40है। तो कृष्ण ने कहा, सर्वधर्माण
- 28:50प्रतिज्ञा माह में कमी शरण बृज छोड़ दे।
- 28:56धर्म की व्यवस्था सभी धर्मों की व्यवस्था को छोड़ दे, सभी समाज की
- 29:05प्रणालियाँ को छोड़ दे। लात मार दे, इनके धार्मिक ग्रंथों
- 29:12को आग लगा दे, इनके धार्मिक ग्रंथों को गंगा में बहा दे, सभी
- 29:21सामाजिक कमाने गांवों को नष्ट वरष्ट कर दे।
- 29:26सभी धार्मिक मान्यताओं को जलादे खाक करते क्या बचा ले?
- 29:34दर्शन बचा ले क्योंकि इन किताबों में शब्द होते हैं, दर्शन नहीं
- 29:42होते। और भ्रम मिटता है।
- 29:45दर्शन से शब्दों से नहीं मिटता तुम गलती में मत रह जाना कि तुम
- 29:53जप जी का पाठ करके पहुँच जाओगे। जप जी की गहन शांति में उतरना
- 30:00होगा। जिन वलों में यह जप जी अवतरित हो।
- 30:05उन पलों में जाना होगा तुम गलती में मत रहना वह गुरु, वह गुरु
- 30:12करके तुम पहुँच जाओ, उसका शुक्राण करना होगा हृदय के अंतःस्थल से वह
- 30:20वह हे वह हे गुरु, वह हे गुरु। यह कोई रेपेटिशन की बात नहीं है।
- 30:38ज़रा सोचो तो मेरे पास अक्सर हनुमान जी आ जाया करता हे बाबा।
- 30:50यह भक्त बड़े परेशान करते हैं। मैं पूछता हूँ क्या हुआ बजरंग के
- 30:56बाबा क्या करें? जैसे कि तुम समझो, मुझसे कहते
- 31:02हैं। कि तुम्हें कोई बैठा बैठा व्यक्ति
- 31:06वैसे ही करे। बाबा बाबा बाबा बाबा तुम चलाओगे
- 31:12कि नहीं चलाओगे? मैंने कहा बिलकुल चलाऊंगा आरामखोर
- 31:16तू क्यों बाबा बाबा कर रहा है, बिलकुल चलाऊंगा।
- 31:24ऐसे भी भक्त है जो बिना बात के ओम अत्लितं बल धाम हम शैलाब देहम
- 31:34धनुजवन कृषानु ज्ञानी नाम गर्गनम सकलम गुण निधानम वानरानाम दीशम।
- 31:42रघु पति प्रेम भक्तों बातें जाते ना मैं देखता हूँ, कोई काम नहीं
- 31:53होता है, सिर्फ याद करते है अरे भाई याद करो तुम मुसीबत के वक्त
- 32:00करो। मैंने कहा ये याद नहीं करते ये
- 32:05बैंक भरते हैं कोई राम राम, कोई राधे राधे, कोई पांच नाम भगवान का
- 32:15नाम इन्होंने बैंक बनाते हैं, बैंक में डाल देते।
- 32:19हैं। रोज़ पैसों की तरह गिनते रहते
- 32:23हैं। पैसों वालों के पास अंकार कम होता
- 32:27है, नामधारियों के पास अंकार ज्यादा होता है पैसे वाला कहेगा
- 32:33मैं सबसे बड़ा अरबपति खरबपति क्रिरेदार मिलन यार मिलन यार
- 32:45लेकिन नाम धारी? कहेगा अरे तेरा तो?
- 32:49यही सब पड़ा रह जाएगा, मेरे तो साथ जाएगा।
- 32:56मैंने तो एक अरब नाम जोड़ लिया है राम राम का।
- 33:01राधे राधे का मेरे संघ जाएगा। अब कौन?
- 33:07इन मूर्खों को बताए कि संघ को नाम भी नहीं जाता, अगर धन नहीं जाता
- 33:14तो नाम? भी?
- 33:18किसने नाम को साथ जाते देखा? जो बंदा यहाँ मर जाता है उसका नाम
- 33:26यहीं पे खो जाता है ना? चंगेज मरा तो चंगेज का नाम खो गया
- 33:33सिकंदर मरा तो सिकंदर का नाम खो गया साथ थोड़ी लेके गया।
- 33:37इतिहास में पड़ा रह गया। गौर कहते हैं कि ये भगत लोग जो
- 33:47हैं ये करते हैं। मूर्खता गुरु का कोई भी स्वय गलत
- 33:53नहीं है। करना गुरु ठीक करके जाते हैं
- 33:58जीतने गुरु हुए संसार में। अपनी अपनी काल वेला में उन्होंने
- 34:05तो जो देखा वो बोल दिया शुभ। था।
- 34:10जिससे उन्हें आनंद मिला, जिससे उन्हें प्रमुख सुख मिला जिससे वो
- 34:16अपने अंत समय उतर गए और महा सुख को पाया।
- 34:21तो उन्होंने व्याख्यान कर दिया आप दिनों के हेतु ताकि आपकी दीनता मच
- 34:28जाए, लेकिन आप हो कि आप उसको नाम में ढाल के दिन भर रात जब्बे ही
- 34:36जाते हो, रटे ही जाते हो। भला हॉस्पिटल में कोई व्यक्ति
- 34:42बिना बात के डॉक्टर डॉक्टर, डॉक्टर करता रहे तो उसको फिर
- 34:47डॉक्टर क्या करेगा? बाहर निकालेगा ना?
- 34:50ऐसे ही भगवान आपको बाहर निकाल देते है।
- 34:54ईश्वर परमान। है।
- 35:02जिसने उस हीर को पाया। हीरो पायो काठगठियायो हीरो पायो।
- 35:21गांठ घटिया बार बार वा को क्यों खोले मन मन मस्त?
- 35:40फिर क्यों बोल अगर कोई मरीज ठीक हो गया क्या वो चलाएगा?
- 35:48डॉक्टर डॉक्टर डॉक्टर चलाएगा नहीं चलाएगा, मज़े से सो जाएगा।
- 35:57चिल्लाएगा तब जब उसे दर्द होता होगा, जब उसे पीड़ा होती होगी,
- 36:06कोई कष्ट होता होगा, कोई डिश ईज़ होती होगी अन्यथा बुक क्यों
- 36:15चिल्लाएगा? वह चैन से आनन से सो जाएगा।
- 36:24तुम जैसा मरीज शायद परमात्मा ने कभी देखा नहीं, नई ही तरह के मरीज
- 36:31नई ही बीमारियों से युक्त पैदा होते चले जाते।
- 36:35और। हरमान जी कहते हैं कि मैं अभी मैं
- 36:44इनके गोठना भी नहीं मार सकता। मैंने कहा हनुमान जी तुम चुपके से
- 36:56मेरे पास यहाँ बैठ जाया करो आके। यहाँ तो मस्ती है ना यहाँ तो
- 37:03मस्ती है बाबा यहाँ कोई नहीं आता यहाँ तुम आने ही नहीं देते, किसी
- 37:08को फिर गंद मार धर्म पर बैठ जाया करो।
- 37:15वहाँ। भी तो कोई।
- 37:16नहीं आता। हाँ, वहाँ भी तो कोई नहीं।
- 37:22तो फिर इनका इलाज तो तुम्हें बता दिया ना, मैं आनंद से गंध मार्जन
- 37:30पे बैठा हूँ। लोग कहते हैं गंध मार्जन पे बैठे
- 37:33हुए भी हनुमान को चैन नहीं आता वो राम राम करते रहते हैं।
- 37:37मैंने कहा। उसे कोई बिमारी है क्या?
- 37:44राम राम तो है, जब नहीं जिससे कोई बिमारी है, डॉक्टरी डॉक्टरी तो
- 37:50वही पकारेगा ना जिससे कोई दर्द। हो रहा है।
- 37:53हनुमान जी का कोई भेजा खराब है? वो राम राम करेगा बिना किसी तकलीफ
- 37:59के और हनुमान जी को कभी तकलीफ नहीं उससे बड़ा समर्पित व्यक्ति
- 38:07धरती पर आज तक नहीं होगा। नहीं कभी होगा समर्पण की साक्षात
- 38:15मूर्ति। अतिलितम बलधाम हैं शैलाब के अतिलत
- 38:26बल के होते हुए भी उसमें ज़रा भी अकड़ नहीं है।
- 38:39इतना अतिलित बल है। और उस बल को कहाँ प्रयोग करते
- 38:46हैं? भगवान राम की सेवा में यही सेवक
- 38:52का लक्षण है। बल तो तुम में भी।
- 38:56आओ। बल तो तुम में भी है।
- 39:01किसी के पास शरीर का बल है, किसी के पास धन का बल है किसी के पास।
- 39:08सुख का बल है। लेकिन तुम अपने बल को सेवा में
- 39:14नहीं लगाते लोगों के पास अगर कोई। ट्रिक कहा जाती है तो उससे पैसे
- 39:24कमाता है मुझे रो जाते हैं बाबा आप इतना ज्ञान बांटते हो, क्यों
- 39:29बांट रहे हो अपने बच्चों को दे दो इनकी रोज़ी रोटी ठीक चलेगी।
- 39:39मैंने कहा, बच्चे। सवस्थ हैं।
- 39:45बच्चे खुद कमा लेंगे, कितनी जरूरत होती है बंदे की होता तो कमा ही
- 39:52रहेगा और वासनाएं कभी किसी की बुरी नहीं होती।
- 40:00फिर क्यों मागीज, खपाई करना? जरूरतें इतनी छोड़ी हैं कि बड़ी
- 40:06आराम से पूरी हो सकती हैं और वासनाय दुष्यपुर हैं वासनाय पूरी
- 40:13नहीं होती। फिर बच्चों के लिए क्या करें?
- 40:18बच्चों को सवस्थ शरीर है सवस्थ मन है पूत कम्पूत तो क्यों धन संचय
- 40:27पूत सपूत तो क्यों धन संचय पूत कपूत होगा तो तुम्हारा जोड़ा भी
- 40:33खराब कर दे। पूत सपूत होगा तो तुम ने चाहे कुछ
- 40:40भी ना कमाया हो, इब्राहिम लंकन की तरह झोंपड़ी से व्हाइट हॉउस बन
- 40:49जाएगा। हमारे मोदी जी की तरह गरीब होते
- 40:56हुए भी पीएम तक पहुंचा पूत कपूत तो क्यों धन सिंच पूत सबूत तो
- 41:05क्यों धन सिंच भाई सब ठीक ठाक है? सारे अंग सही काम करते हैं, खुद
- 41:19कमा लेंगे, इतनी जरूरत भी क्या होती है और वासनायें तो दुष्पूर्ण
- 41:23है वासनायें तो कभी किसी की पूरी नहीं होती।
- 41:26कितना ही कमा के चले जाये। गौरख कहते हैं, गुरु कभी गलत नहीं
- 41:38होता। गुरु ने जो देखा जिसके कारण वह
- 41:48आनंद में नहाने लग गया। तुम तो आनंद की एक बूंद को चखने
- 41:54के लिए आता हो, वह तो स्नान करता है तीरथनावा जयतिशपाल बिन पाणी की
- 42:03नायक करे उसकी इच्छा के बिना तुम बूंद भी नहीं चख सकते।
- 42:10और अगर उसकी इच्छा हो जाए तो तुम उसमें स्नान भी कर सकते हो।
- 42:14अमृत के सागर में सच्चा साहब जे नजर करे ते काबो हंस कर अगर उसकी
- 42:23नजर हो जाए तो काग को वो हंस बना देता है।
- 42:29किसकी नजर वह जो है मार्क्स की दृष्टि में चारबाग की दृष्टि में
- 42:42और तुम बुद्धिवादियों की दृष्टि में जो है नहीं।
- 42:46वह जिसके ऊपर इन्दर कर देता है, कृपा कर देता है तो वह कौवा बिहंश
- 42:52हो जाता। है कितनी हैरानी?
- 42:59की बात होती है। मैं जब सोचता हूँ लोग बड़े मज़े
- 43:04से कह देते हैं भगवान। फिर जो कबीर ने देखा जो रामकृष्णा
- 43:13जी से देखकर हतप्रभ होकर सब कल्प समाधि में चले जाते थे, वह क्या
- 43:20मिर्गी का दुरा हुआ करता था? उसे मिर्गी के दौरे पड़ा करते थे।
- 43:28क्या अब हम दिन भर रात आनंद से 13 बरसों से एक स्थान पर बैठे हैं?
- 43:34कोई बिमारी है? क्या हमें कोई असाधे रोग हो गया
- 43:42है? क्या बड़े मस्त है?
- 43:45ऐसी मस्ती कि कभी जीवन में जानी ना थी ऐसी मस्ती कि कभी इस जीवन
- 43:53में नहीं, कभी किसी जीवन में भी नहीं जानी, इसलिए बैठ गए बा
- 44:02मुश्किल यह अमृत मिला है। अब काहे गंवाना एक पल सैर सपाटे
- 44:09में क्या करना है नार्वे जा के क्या करना?
- 44:13फिर लैंड वहाँ वृक्षों की हरियाली है, लेकिन आनंद नहीं और धरती पे
- 44:23या स्वर्ग में। नाथ तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरीय
- 44:31तुला एक अंग तोला न तहे सकल मिली, जो सुख लभ शक तुम्हारी ग्रीनरी
- 44:41धरी की धरी रह जाती। तुम्हारी शुद्ध वायु पानी धरी की
- 44:47धरी रह जाती है तुलना ता हे सकला मेरी जो सुखला बस सतसंग मैं
- 44:54तुम्हें ये नहीं कहता की हवा गन्दी कर दो पानी गन्दी कर दो ने
- 44:58तुम्हारे बच्चे अभी पहुंचे नहीं। हमारे बच्चे जब पैदा होंगे,
- 45:02अज्ञानी पैदा होंगे, उनको रोगी नहीं बनाना है ताकि वो अपने अंत
- 45:10में जाने के योग्य ही ना रहें, ऐसा नहीं बनाना है।
- 45:16स्वच्छ वातावरण देना है, शुद्ध वायु देनी है, शुद्ध पानी देना
- 45:20है, शुद्ध पेड़ पौधे ग्रीनरी देनी है।
- 45:26हरियाली वृक्ष सिर्फ हवा को ही साफ नहीं करते।
- 45:32तुम्हें पता नहीं। वृक्ष एक जो मुख्य काम करते हैं
- 45:37वो तो तुम्हारे वैज्ञानिक ने बताया ही नहीं।
- 45:43क्या देते हैं वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड खाते हैं ऑक्सीजन देते
- 45:51हैं तुम्हें? और ऑक्सीजन तुम्हारे लिए प्राण और
- 45:58ऐसा क्या है जो वृक्ष तुम्हें देते हैं और वैज्ञानिक बताते हैं
- 46:02वैज्ञानिक को पता ही नहीं वृक्ष तुम्हें देते हैं।
- 46:07साइलेंस मो। कभी जाना प्रकृति में जब भी
- 46:15तुम्हारा मन ज्यादा बोले, सुबह सुबह मत जाना, जब रोग हो तब दवा
- 46:25की आवश्यकता होती है, तुम तो सुबह सुबह।
- 46:28जब मन शांत होता है तब निकल जाते हो।
- 46:31नहीं नहीं गलत तब जाना जब तुम्हारा मन दुखी हो मन ज्यादा
- 46:38बोले तो बुद्ध की तरह निकल जाना, फिर बुद्ध को महलों में बढ़ा
- 46:46तनाव। था।
- 46:48महलों में बड़ा मन बोलता था, उसका तो घर छोड़ दिया और घर के साथ
- 46:53सारी पूंजी जिसे तुम अर्जित करना चाहते हो, वो भी छोड़ दी।
- 46:58उसने कहाँ निकल गए? एकांत में निकल गए जहाँ सब मोहन
- 47:04था। जहाँ वृक्ष पर मौन में आनंद से
- 47:14झूम रहे थे, उनके पत्ते नाच रहे थे, नृत्य था, मौन था पर मौन था
- 47:23सुगंधित हवाएँ धीमे, धीमे, भीनी भीनी सुगंध लिए।
- 47:28बिखर रहीं थीं तुम तब जाना उनके पास जब तुम दुखी हो तुम सुखी,
- 47:36सुखी सुबह की सैर करने चले जाते हो नहीं तुम्हें पता नहीं चलेगा
- 47:45कि इसमें प्रकृति में। तुम्हारे रोग की औषधि है तुम्हारा
- 47:52एक ही रोग है कि तुम्हारा मन बोलता है और इस रोग की औषधि
- 47:59प्रकृति के पास और उस प्रकृति को तुम नष्ट कर रहे हो।
- 48:04उस प्रकृति को तुम अडानी के अंबानी के हाथों भेज रहे हो और वो
- 48:10ऐसे थपेड़ों को काट रहे हैं जो तुम्हें तरंगें देते हैं।
- 48:14मौन के बुद्धा अगर पीपल के वृष के नीचे ना बैठे होते।
- 48:24तो इतना ही समय ओर लग जाता फिर मौन कौन?
- 48:31सीखाता घरों के दीवारों में पहुंचा तो जा सकता है पर घरों की
- 48:39दीवारें मौन नहीं बिखेरते। पेड़ प्रकृति का मोन बिखेरता है।
- 48:48पेड़ जीवंत हैं, दीवारें जड़ यही फर्क।
- 48:55है। पूछा बुद्ध की धर्मपत्नी ने?
- 49:08यशोधरा ने क्या? आप यहाँ से भगोड़ों की तरफ भाग के
- 49:14गए, क्या वो यहाँ नहीं मिल सकता था?
- 49:18बुध बोले बिल्कुल मिल सकता था, कैसे झूठ बोलूं?
- 49:24लेकिन बुध यह भी जानते हैं। कि यहाँ मिलता तो लेकिन थपेड़ों
- 49:31की वो शांति, थपेड़ों की वो तरंगें जो खुद भी मौन होती हैं और
- 49:41तुमसे टकरा कर तुम्हें भी परमॉन में धकेल देते हैं, वो कहाँ से
- 49:46आती है? महलों की दीवारें तो मोर नहीं
- 49:50बिखेरती महलों की दीवारें तो मोर नहीं बिखेरती महलों की दीवारों
- 49:56में तो गपशप करने वाले लोग आते हैं, उन्हें ही पी जाती है इसलिए
- 50:02मैंने तुमसे कहा। इस गायत्री के मंत्र को उन
- 50:07दीवारों को पीने देना। इनमें मौन का गहरा तत्व छिपा।
- 50:14हुआ है। यह दीवारें पी जाएंगी, फिर जो
- 50:19तुम्हारे घर में आएगा वो कहेगा क्या है यहाँ?
- 50:24ऐसा क्या है यहाँ यहाँ आने से बड़ा आनंद मिलता है मन ठहर जाता
- 50:31है उसे बेचारे को पता भी नहीं होगा।
- 50:35कुछ ऐसी तरंगें हैं जो वृक्ष। छोड़ते हैं।
- 50:40जो प्रकृति छोड़ते। हैं।
- 50:43जो हिमालय की गुफाएं छोड़ती हैं जो बर्फ़ छोड़ती है जो शीतल हवाएं
- 50:51छोड़ती हैं। मुखी यह गायत्री एक प्रकृति के
- 50:57रूप में आज प्रकृति कट रही। है।
- 51:02पैसों के लालच में एक नंबर का अपने अभिमान को पूरा करने के लिए
- 51:07अपने अहंकार को पूरा करने के लिए कि मैं विश्व का एक नंबर का अमीर
- 51:12हूँ लाखों जीवनों की बलि दे रहा है या दुष्ट व्यक्ति।
- 51:22विकास के नाम रेगिस्तान बहुत बड़े हैं।
- 51:34हमारे हमारे इतना अलाका खाली पड़ा है जहाँ पेट नहीं हो संयंत्र वहाँ
- 51:44भी लग सकते। हैं।
- 51:47फिर थपेड़ों को क्यों काटा जाए? तुम्हें धरती चाहिए और उससे
- 51:54बढ़िया धरती नहीं मिलेंगे। तुम्हें ज़रा भी धसने की गुंजाइश
- 52:00नहीं है। पानी 1000 फुट पे है यहाँ तो पानी
- 52:05बड़ा करीब है। हमारे शहर में गदड़ पांव में दो
- 52:09पानी छः सात फुट पे हम तो यहाँ तीन मंजिला इमारत डालते वक्त
- 52:19आर्किटेक्ट ऐसा देखिए धरती का परीक्षण करवाइए।
- 52:27और तुम संयंत्रों का भार उपजाऊ जमीन के ऊपर फेंकते हो जबकि यहाँ
- 52:36लाखों लाखों माइल्स वर्क माइल्स धरती रेगिस्तान पड़ी है, उसको कोई
- 52:46छेड़ता नहीं, तुम्हारा स्वार्थ है, वहाँ जाने से बहुत खर्चा
- 52:52ज्यादा। होगा।
- 52:54तुम व्यापारी लोग तुम्हें किसी की जान की कोई परवाह नहीं, कोई मरे,
- 53:00चाहे कोई चाहिए। लेकिन तुम अपनी अपूर्त वासनाओं को
- 53:09पूरी कर लो, मैं एक नंबर का धनी हो जाऊं, मैं विश्व में झंडा गाड़
- 53:16दूँ, मेरा नाम इतिहास में अमर हो जाए कि एक नंबर का अमीर था कब है?
- 53:22क्या हो जायेगा इससे जिसके सामने तुम एक नंबर के अमीर हो ना तो वे
- 53:29बचेंगे ना तुम बच्चो के देख लेना। 1 दिन मेरे शब्द रिकॉर्ड है, आने
- 53:38वाली जेनरेशन इन्हें सुनेंगे। और ये भी देखेगी।
- 53:42आज कहीं नहीं है अडानी आज कहीं नहीं है अंबानी आज कहीं नहीं है
- 53:50मोदी आज कहीं नहीं है गडकरी लेकिन हवाएं हैं।
- 54:03दृष्ट हैं, पहाड़ हैं, ये धरती है।
- 54:13जल है, सब है, लेकिन तुम नहीं रहोगे।
- 54:23बाबा जाते जाते कहेंगे इन तीन चीजों को बचा लेना यह तुम्हारे
- 54:29जीवन का मुख्य तत्व है। यह तुम्हारा मुख्य बिंदु है,
- 54:33इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ अगर कोई पेड़ काटे।
- 54:38उसका सिर काट देना या खुद का कटवा लेना, यही विश्नोई धर्म में था।
- 54:47विश्नोई खुद कट जाता था। कहता नहीं पेड़ नहीं कटना उसका
- 54:53तत्व वह जानते थे, पेड़ कटा। तो जीवन कट जाएगा और फिर जीवन अगर
- 55:01तुमने अपंग हो के जिया भी तो क्या?
- 55:03जिया? अपाहिजों की तरह तुमने जीवन जिया
- 55:08भी तो क्या जिया और जब तुम्हें शुद्ध वायु न मिला कोरोना में
- 55:13देखा हमने। दिखा।
- 55:19मैनेजर साहब वोट मांग रहे थे, गंगा मेला से हॉस्पिटल में बैठे
- 55:30नहीं। साहेब की जरूरत थी कि बेड पैदा
- 55:35करे, हॉस्पिटल बनाए। इमरजेंसी के वक्त यहाँ बेड नहीं
- 55:44थे। यहाँ ऑक्सीजन तक नहीं थी और लोग
- 55:48मरे कसूर किसका? यह साहब कहते हैं मेरा का कसूर
- 55:52है? तीन कानून पास करते हैं।
- 55:55कहते हैं मेरा क्या क्या मेरे लिए अमर रहे भाई, ये कानून किसने पास
- 56:01किया? जिन जिन लोगों की स्टेम्प हैं, हम
- 56:05एक एक से हिसाब लेंगे। तुमने इन कानूनों के ऊपर क्यों
- 56:11मुहर लगाई? ये दस्तखत पहचान लिए जाएंगे, 750
- 56:19किसान वापस करो, हमारे कहाँ से दोगे, तुम हरजाना दे सकते हो?
- 56:32जीवन नहीं तुम दे सकते, फिर जीवन छीनने का हक भी तो तुम्हें नहीं।
- 56:40अगर जीवन नहीं दे सकते तो जीवन छीनने का हक भी तुम्हें नहीं और
- 56:48आज यही हो रहा है। तुम जीवन नहीं दे सकते जीवन
- 56:53दायिनी थपेड़ों को काट रहे हो जीवन दायिनी हवाओं को तुम खराब कर
- 56:59रहे हो दूषित कर दिया तुमने सब कुछ यह जल गंगा का जल जो पवित्र
- 57:07समझा जाता था। आज गंदगी से भरा पड़ा है, स्नान
- 57:12के योग्य नहीं इसे तुम विकास कहते हो, तुमने सब्य नष्ट कर दिया और
- 57:25फिर कहते हो सब्य चंगा सी। शब्दें मारी शब्दें जलाई ऐसे
- 57:46मोहम्मद पीरम ताकि भ्रम न भूलों का जी सो बल नहीं सरीरम तुम्हारे
- 57:53में इतना बल नहीं है। बल जाने तुम्हारे में इतनी अनुभव
- 58:03नहीं है अभी तुमने उस अंत को छुआ नहीं, तुम अपने धरातल में उतरे
- 58:11नहीं। हमें प्रोजेक्ट से कोई आपत्ति
- 58:16नहीं है। हमें विकास से कोई आपत्ति नहीं
- 58:19है, होना चाहिए दुनिया बड़ी विकसित लेकिन के बेस पे नहीं है,
- 58:28जीवन के बेस पे नहीं है जीवन के मूल्य पर।
- 58:33विकास नहीं चाहिए। इस शब्द को नोट करो, जीवन के
- 58:40मूल्य पर विकास नहीं चाहिए। एक में जीवन हो, एक में विकास हो
- 58:48तो हम जीवन को चुनेंगे, विकास को नहीं चुनेंगे।
- 58:53अगर जिंदा ही न रहे तो विकास देखेगा कौन विकास का लुत्फ लेगा,
- 59:00कौन विकास का आनंद मानेगा, कौन विकास तो चाहिए लेकिन जीवन के
- 59:08मूल्य पे नहीं चाहिए। रेगिस्तान में बनाओ अपने सारे
- 59:13संयंत्र बड़ी रेगिस्तान की भूमि खाली पड़ी, वो भी आबाद हो जाएगी,
- 59:20मशक्कत करनी पड़ेगी। तुम्हें हम परमवीर का खिताब
- 59:25देंगे। इन उपजाऊ भूमियों को खराब मत करो।
- 59:33और ध्यान रखो, हमारी सरकार आने पर हम देखेंगे तुमने कितने पेड़ काटे
- 59:41हैं। फिर हिसाब लेना तो हर कोई जानता
- 59:47होता है। हम देखेंगे तुमने ये क्यों किया
- 59:54जानते हैं, हम बिल्कुल जानते हैं और हम जैसा जानते हैं उसे वैसा तो
- 1:00:02आप भी नहीं जानते। हम जानते हैं महज अपनी आकांक्षाओं
- 1:00:08को पूर्ति करने के लिए अपनी अभिपक्षाओं और अपनी वासनाओं को
- 1:00:14पूर्ति करने हेतु कि मैं एक नंबर का वर्ल्ड का अमीर बन जाऊं, तुमने
- 1:00:20लोगों के जीवन दायिनी थपेड़ों को काट दिया।
- 1:00:25तुमने जीवनदायिनी जल को बर्बाद कर दिया।
- 1:00:29लाखों की तादाद में मछलियां मरी पड़ी पाई जाती हैं।
- 1:00:33पानी के ऊपर इन्हें जीवन का हक नहीं था।
- 1:00:41किस दुष्ट ने छीन लिया इनका जीवन? कोरोना के अंदर कितने लोग हमारे
- 1:00:54गए महामारी थी, पैनडेमिक था लेकिन व्यवस्था भी तो होनी चाहिए थी
- 1:01:07हॉस्पिटल? डॉक्टर दवाई, ऑक्सीजन, प्राण वायु
- 1:01:12तक नहीं थी तुम्हारे पास और इससे ऊपर कहर साहब वोट मांग रहे थे
- 1:01:19दीदी ओह दीदी तुम्हें लज्जा भी न आई?
- 1:01:28तुम्हें शर्म भी न आई इतनी लाशों को देखते हुए तुम अंधे के अंधे ही
- 1:01:36रहे, लेकिन जो दिमाग से अंधा हो, जो बुद्धि से अंधा हो।
- 1:01:44उसकी आँखें अगर खुली हुई हों तो बुद्धि तो अंत बुद्धि ही।
- 1:01:48है। हमने तुम्हें मैनेजर बनाया था तो
- 1:01:54मालिक क्यों बन गए? कहाँ लिखा है संविधान में?
- 1:02:05के मैं निधन व्यवस्थापक मालिक हुआ करता।
- 1:02:10है। संविधान के कौन से स्थान पर लिखा
- 1:02:18है? यह कौन सा नियम है?
- 1:02:24उसका नंबर क्या है? उसकी धारा कौनसी है जिसमें तुम
- 1:02:30चुने तो गए थे? तुम कहते हम तो जनता के द्वारा
- 1:02:33चुने गए ठीक लेकिन चुना तो मैं गया था मैनेजर व्यवस्थापक।
- 1:02:42मैनेजमेंट करो तुम बन गए मालक तुम तो कोठियों में हाथ डाल के फिरते
- 1:02:51हो, ज़रा भी निगरानी नहीं, तुम तो एक्टिंग करना सीख रहे हो?
- 1:03:05पुलवामा में हमारे शहीद मारे जा रहे हैं, जिनके कारण हम रात को
- 1:03:13चैन की नींद सोते हैं। एआरडीएक्स कहाँ से आया?
- 1:03:20तुमने आज तक इसका कोई जेपीसी नहीं बताया तो इसलिए हम बिल्कुल कहेंगे
- 1:03:25ये साहब आपने कराया, आपने पहलगाम के दरिंदों को नहीं पकड़ा तो साहब
- 1:03:35हम कहेंगे वो बंदे आपके थे। क्योंकि आज तो मुखर होके बोलना
- 1:03:42शुरू कर दिया लोगों ने। हम जब आरएसएस में थे तो हमने
- 1:03:46धमाके किया। कहीं ऐसा तो नहीं है?
- 1:03:52ये सब साहब आपकी चाल हो और इस गद्दी के ऊपर बैठने से।
- 1:03:58तुम्हें आनंद नहीं मिलेगा, यह समझना है।
- 1:04:02आनंद चाहिए तो किसी संत के चरणार बिंद छू लो, अंग्रेजों के चरणार
- 1:04:09बिंद छूने से भी नहीं मिलेगा, क्योंकि अंग्रेजों के पास आनंद है
- 1:04:13नहीं, वो तो बेचारे खुद ही प्यासे हैं।
- 1:04:18सेठों के पास कभी आनंद होता है अगर आनंद होता।
- 1:04:23है। तो वह कब के इस पैसे को छोड़कर
- 1:04:26जंगलों में निकल गए होते और जब भी जिसके पास भी कभी पैसा आएगा और
- 1:04:32उसे आनंद की एक बूंद मिल जाएगी, ये लिख लो।
- 1:04:36जब भी जिसके पास कभी कोई पैसा आएगा प्रचुर मात्रा में और उसे
- 1:04:41आनंद की एक बूंद मिल जाएगी, वह फौरन उस सारे मटेरियल को छोड़ कर
- 1:04:46चला जाएगा क्योंकि आनंद की एक बूंद आपको सभी प्यासों से मुक्त
- 1:04:52कर देती है। फिर कोई प्यास बाकी नहीं रहती, न
- 1:04:56धन की, न मान की, न गदियों की, न किसी और प्रकार की, न किसी
- 1:05:03सूचनाओं की, न किसी डिग्री की एक प्यास बूझ जाए तो सब प्यासी बूझ
- 1:05:13जाती है। वो प्यास है, आनंद की प्यास है और
- 1:05:21अगर एक प्यास है ना कुछ तो सारी प्यासे भी आपको बुझा दो, सारे
- 1:05:29संसार का धन दौलत इकट्ठा कर लो। जमीन जायदाद चक्रवर्ती सम्राट बन
- 1:05:36जाओ 10 दासियाँ सभी तुम्हारे पांव छुए, इतना सम्मानित हो जाओ तुम
- 1:05:46फिर भी तुम्हारे भीतर आग लगी ही रहेंगी।
- 1:05:51कोई तत्व में छेड़ता रहेगा के अभी प्यास बुझी नहीं, अभी त्रप्सी आई
- 1:05:57नहीं। तकदीर
- 1:06:33713 ने संग दुनिया चले भी तो क्या है?
- 1:06:46713 नहीं। संघ दुनिया चले भी तो क्या है?
- 1:06:58एक तू ना मिला तू ना मिला तू ना मिला।
- 1:07:21आनंद सब रोगों की औषधि। है।
- 1:07:27आनंद को पाना ही हमारा ध्येय है एक साधय सब सधय सब साधय सब जाय उस
- 1:07:38एक को साथ। लो।
- 1:07:40आनंद सभी रोगों की दवा है और आनंद तुम्हें मिलेगा बाहर से अपने ही
- 1:07:47वेतक से बेहतर उतरो अंतर्मुखी हो जाओ बेहर्मुखी होना छोड़ दो अभी
- 1:07:53से छोड़ दो धन्यवाद।