Latest / Baba ji Vijay Vats / 26 Nov 25 - परमात्मा को किसने बनाया? कर्म कौन करता है? चेतना या शरीर? कर्म का महा रहस्य Ist Time Ever. Baba Ji Vijay Vats
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- 0:05प्रश्न है कि आपने कहा संसार और परमात्मा इकट्ठे भोंगा जा सकता
- 0:09है, बिल्कुल भोंगा जा सकता है। ऐसे ही प्रश्नों को सुनकर संत का
- 0:21मन व्यथित हो जाता है। तुम कितने दिन हीन हो गए हो और
- 0:36तुम्हारी ये दीनहीनता की अवस्था की कृष्ण है?
- 0:41कौन है जिम्मेवार इसके लिए? वही लोग जो निहित स्वार्थों के
- 0:54लिए निहित स्वार्थ है, हमारे पग पुजो पांव धोके पियो हमारा नाम
- 1:05हिरण्यकश्यप की तरह जपों। जय जयकार करो, हम जैसा कहें वैसा
- 1:15करो तानाशाही चाहे संसार में हो चाहे अज्ञाता में हो इन लोगों ने
- 1:26तुम्हें। इतना लाचार कर दिया है कि आज ऐसे
- 1:30प्रश्न भी पूछे जा रहे हैं कि क्या संसार और परमात्मा को इकट्ठे
- 1:38को जा सकता है? संसार और परमात्मा अलग हुए।
- 1:46हर झर्रे में संसार जड़ में चेतन है।
- 1:54अब ये ढांचा बोल रहा है के है तो पार्थिव पंचभौतिक सिरी लेकिन बोल
- 2:01रहा है विथ दी कम्यूनिकेशन ऑफ़ दी।
- 2:05कान्शस्नस चेतना से संयुक्त हो गए।
- 2:13ये बोल रहा है यह पदार्थ संसार और वह चेतना।
- 2:27जिससे कनेक्शन इसे मिल गया। उस चेतना की चेतना को लेकर शक्ति
- 2:34को लेकर यह सारी क्रियाकलाप करता है।
- 2:38तुम ऐसा समझो कि एक घर में तुम सारे यंत्र लगा लो, पंखा लगा लो,
- 2:43एसी लगा लो, हीटर लगा लो। डीजर लगा लो पानी की मोटर लगा लो,
- 2:50पंप लगा लो सब लगा लो इन्स्ट्रुमेंट्स लेकिन बाहर से
- 2:58तुम स्विच को ऑफ कर दो मेन स्विच को।
- 3:04तो कोई यंत्र चलेगा नहीं चलेगा, फिर तुम पंखों को लाठियां मार मार
- 3:15कर थोड़ी देर चला सकते हो, लेकिन क्या वह चलना होगा?
- 3:20नहीं होगा। ऐसे तो तुम मुर्दे को भी उठा के
- 3:22चला देते हो, फिल्मों में सीन दिखा देते हैं।
- 3:35संसार और परमात्मा इकट्ठे भोग जा रहे हैं।
- 3:43जड़ अकेला भोग नहीं सकता। सुनिए बात को जड़ अकेला भोग नहीं
- 3:51सकता क्योंकि जड़ है। प्राण विहीन जड़ है और चेतना जड़
- 3:58के सहारे के बिना भोग नहीं सकते रथवान रथ के बिना।
- 4:12चलेगा किस और रथ रथ वान के बिना चलेगा किस ये दो चीजें जब तुमने
- 4:25समझीं द्वैत में आए, तभी तुम उलझे?
- 4:32तभी द्वैत आया और द्वैतिक भ्रम है, उपनिषद कहते हैं परमात्मा जगत
- 4:42के कणकण में विद्यमान है। जब चेतन जड़ता से संपर्क बनाता है
- 4:51तो जड़ता भी चेतन हो उठती है। शरीर से जब चेतनता निकल जाती तो
- 5:00शरीर जड़ हो जाता, क्योंकि जड़ है प्राकृतिक रूप से जड़ है।
- 5:09जब तुम उस बटन को ऑन कर दोगे तो सारे इन्स्ट्रुमेंट चलना शुरू हो
- 5:13जाएंगे, पंखा भी चलेगा, एसी भी चलेगा, सब चलेगा।
- 5:23संसार और परमात्मा इकट्ठे ही भोंगे जाते हैं।
- 5:27सदा अकेले से संसार भोंगा ही नहीं जा सकता।
- 5:38बिना परमात्मा के जब चेतना संयुक्त होती है, पदार्थ से तो
- 5:46पदार्थ भोगता है। हाँ, लेकिन याद रखो भोगता है
- 5:53पदार्थ बस ये बात काम की है जब तुम जीवा पर कोई टेस्टी चीज़ रख
- 6:02लोगे तो जीवा को स्वाद आएगा। अगर इसमें से प्राण खींच लिए जाएं
- 6:13तो जीबा पर तुम मरने के बाद पंचरत्नी रखते हो, शहद लगाते हो,
- 6:19दही लगाते हो अमृत लगा दो चाय। तीष्ठ वर्ष जब काम नहीं करेंगे
- 6:27चेतना जब निकल गई तो शरीर के सारे यंत्र बेकार फेल हो गए।
- 6:34न पंखा चलेगा न ही सी चलेगा। ईसा वश्य मेंदम सर्वम यत, किंच
- 6:41जगत याम जगत इसका मतलब। जगत परमात्मा की चेतना के बिना चल
- 6:47ही नहीं सकता। तुम्हें पता नहीं है इस बात का
- 6:58अगर ये धरती घूम रही है। तो तुम लाख कोशिश करो, तुम चेतनता
- 7:04को नहीं खोज पाओगे, बस यही तो मज़ा है।
- 7:14तुम चंद्रयान तीन छोड़ते हो उसमें कोई समझ नहीं है।
- 7:21उसमें कोई प्राण नहीं है, उसमें कोई चेतना नहीं है, मात्र जड़ता
- 7:27से बना हुआ है। स्टील है और भी जो अब तत्व आपने
- 7:31लगाई। लेकिन यहाँ से जो रेंज हम छोड़ते
- 7:35हैं। वो जाकर उसको रोटेट करते हैं।
- 7:43मन वांछित जगह के ऊपर वह चंद्रयान तीन उतर जाता है लेकिन ये सारा
- 7:51खेल झड़ता। धरती घूमती है तुम्हें कही चेतना
- 8:01नजर आई तुम कहती हो? ग्रैविटेशनल फोर्स है ग्रैविटेशनल
- 8:12फोर्स किसी ने देखा है। तुम प्रश्न तो कर देते हो कि
- 8:19परमात्मा किसी ने देखा है? मैं अब तुमसे पूछ रहा हूँ कि
- 8:24ग्रैविटेशनल किसी ने देखा है? तुम कहोगे नहीं देखा, लेकिन आवाज
- 8:31तो होता है। ईंट को फेंको ऊपर, लेकिन खेंच
- 8:33लेगा तो यही तो। यह वो तत्व है जो तुम्हारे चरम से
- 8:40दिखता नहीं देखने वाली चीज़ को तुम लाखों से कैसे देखोगे, सुनने
- 8:53वाली चीज़ को तुम आँखों से कैसे सुनोगे टेस्ट लेने वाली चीज़ को।
- 9:00तुम कानों से कैसे टेस्ट लोगे, स्पर्श करने वाली चीज़ को तुम
- 9:06आँखों से कैसे स्पर्श करोगे? प्रत्येक चीज़ का एक मायना है।
- 9:19जैसे आँखें सूंघ नहीं सकती, नाक देख नहीं सकता, कान स्वार्थ नहीं
- 9:26ले सकते और जीवा सुन नहीं सकते। ऐसे ही परमात्मा ऐसा तत्व है।
- 9:43जो किसी और इंद्री से देखा जाता है, वह कौन धरती घूम रही है?
- 9:55कौन गुमारा है? कोई तो गुमारा है।
- 9:58और सटीक गुमराह देखिए कितनी शानदार अगर ये धरती ऊपर खबड़ होती
- 10:10फिर भी तुम मान सकते थे कि इतनी ऊपर खबड़ है समय की प्रबध नहीं है
- 10:17आबध नहीं है। लेकिन यह सारा ब्रम्हंड इतना तार
- 10:26में घुसा हुआ और इतना सटीक चल रहा है कि यू कैन कैलकुलेट इतने बजकर
- 10:34इतने मिनट पे ये होगा। अज्ञानता हो सकती है।
- 10:43तुम्हें न देखने दे, लेकिन गृह तारों का सारा विज्ञान ये
- 10:51तुम्हारे ऊपर लगातार पढ़ रहा है और तुम कहते हो काम स्वतंत्र।
- 11:01परमात्मा और संसार को कैसे इकट्ठा भोंगा जाता है।
- 11:09भाई इकट्ठा ही भोंगा जाता है, संसार है जड़ परमात्मा है चेतन।
- 11:18सदा ही दोनों का कनेक्शन होगा तो कार्य होगा अन्यथा कार्य होगा
- 11:23नहीं। अब फिर से सुन लो।
- 11:32संसार और परमात्मा को इकट्ठे कैसे भोंका जा सकता है?
- 11:36भोगा ही इकट्ठे जाता है अलग अलग से भूगा ही नहीं जाता अगर भोगने
- 11:46की बात कही तो चेतना जुड़ेगी जीव के साथ तो टेस्ट आएगा टेस्ट वर्स
- 11:57को। जिससे भी इंद्रिय के साथ कनेक्शन
- 12:01होगा। चेतना का त्वचा के साथ होगा तो
- 12:05स्पर्श का आनंद आएगा, आँखों के साथ होगा तो दृश्य का आनंद आएगा,
- 12:12कानों के साथ होगा तो संगीत का आनंद आएगा।
- 12:17दीमक के साथ संबंध होगा तो विचारों का आनंद आएगा।
- 12:20हृदय के साथ संबंध होगा तो भावनाओं का आनंद आएगा।
- 12:27लेकिन हृदय तो जड़ है कान, जड़, आँख, जड़ जीवा, जड़, दिमाग, जड़।
- 12:37फिर ये सोच कैसे रहा है? ड्यू टु कान्शस्नस चेतना के कारण
- 12:43सभी शरीर के भीतर बाहरी ऑर्गन्स काम कर रहे हैं।
- 12:50यह संसार चेतना से ही। स्वाद ले सकता है।
- 13:01संसार और चेतना का संगम ही स्वाद को बताती है।
- 13:07मुर्दे की जेबा पर तुम पोटैशियम साइनाइड लगा दोगे, वह नहीं बता
- 13:12सकेगा। और मुर्दे की जीभ के ऊपर तुम शहद
- 13:17लगा दोगे, वह नहीं बता सकेगा क्यों चेतना खो गई?
- 13:22किसी ने स्विच ऑफ कर दिया, पावर का स्विच ऑफ कर दिया, शरीर चेतना
- 13:33से संयुक्त राहनी क्या तुम यहीं से नहीं जान सकते की स्वाद
- 13:41इन्द्रियां लेते है, स्वाद इन्द्रियां लेती है, तुम नहीं
- 13:52लेते? क्या तुम्हें यहाँ से समझा जाएगी?
- 13:59जब मुर्दा हो जाता है व्यक्ति तो उसकी जीबा पर तुम शहद लगा दो,
- 14:08क्या वह बता पाएगा जब जिंदा होता है आदमी?
- 14:15जब तब तुम जीवा के ऊपर छेद लगा दो, वो बताएगा ना मीठा है तो भोग
- 14:20किसने किया, किसने किया? जीवा ने किया देखा किसने चेतना
- 14:31में? चेतना की मौजूदगी में जीवा ने
- 14:39स्वाद लिया चेतना अकेले स्वाद नहीं ले सकते, ये भी समझ लो।
- 14:49चेतना अकेले स्वाद नहीं ले सकती। चेतना को स्वाद लेने के लिए
- 14:56परमात्मा को कहना पड़ता है। एक को अहम भविष्य एक से अनेक हो
- 15:00गया और वह अनेक हो गया। एक से अनेक होकर उसी चेतना के
- 15:08द्वारा वह सुनता भी है कानों से वह देखता है आँखों से वह स्पर्श
- 15:15का आनंद अनुभव करता है, चमड़ी से वह स्वाद लेता है जीवन से वह।
- 15:24सुगंध लेता है नासिक का पुटों से, लेकिन कभी ध्यान किया कि तुम अन्न
- 15:30तो वही खाते हो, उसी अन्न का रस रक्त में ही बनता है, जो बनता है
- 15:40वही लहू बनता है। और उसी अनाज का एक व्यक्ति के
- 15:49भीतर ए पॉज़िटिव ग्रुप बनता है, दूसरे के बी बनता है, तीसरे के ए
- 15:57भी बनता है, चौथे के वो बनता है। पांच में छठे के माइनस प्लस बनता
- 16:06है। लेकिन अन्न तो वही है लेकिन भीतर
- 16:12जाकर ये बदल क्यों गया? किसने बदला?
- 16:20मुर्दे के भीतर तो आप ना ए बनेगा ना ओह बनेगा ना पोस्टिव बनेगा ना
- 16:26नेगेटिव बनेगा, कुछ नहीं बनेगा। अब इसे समझिए गहन रूप से
- 16:32आध्यात्मिक रूप से साइंटिफिक रूप से एक है जड़ पत्थर।
- 16:40पंचभौतिक शरीर सारा जोड़ है, इसमें जीतने भी तत्व हैं, पानी
- 16:45है, वायु है, आकाश है, पृथ्वी है, ये सारे तत्व हैं, इसमें पांच
- 16:55भौतिक तत्व हैं, लेकिन तत्व में। प्राण नहीं है, चेतना नहीं है एक
- 17:05है चेतना शुद्ध चेतना पावर पावर जब संयुक्त होती है जड़ के साथ
- 17:20चेतना जब संयुक्त होती है जड़ के साथ।
- 17:26तो कर्म घटित होता है। समझिये बात को जब जड़ के साथ
- 17:36चेतना सुयुक्त हुई जब पंखे के साथ।
- 17:43बाबर सेब तो हुई तो पंखा चला और मुझे यह बताओ के कर्म कृष्ण ने
- 17:48किया। जब तक विद्युत नहीं थी, पंखा बंद
- 17:54पड़ा था और अगर विद्युत होगी और पंखा नहीं होगा।
- 18:05फरे पंखा नहीं चलेगा। कोई कोई पंखा है ही।
- 18:10नहीं उठ जाना प्राण तेरे फिर। क्यों नहीं बोल।
- 18:18रहा होने वाली। कुंजी आ तू फिर क्यों नहीं खोल?
- 18:29दा किथे तेरी अकड़ा किथे। अभिमान ओय।
- 18:41पल दा भरोसा कोई ना। ऐसी तेरी।
- 18:47जान ओय मिट्टी धया बदया तू कादा कर मान वे।
- 19:00फल का भरोसा कोई ना ऐसी तेरी। जान ओए, मिट्टी गया बंदेया।
- 19:19जड़ के साथ जब चेतन संबंध स्थापित करता है, तो यह मैं नाम का भ्रम
- 19:28उत्पन्न होता है, मैं नाम की कोशिश नहीं बताओ कहाँ है मैं।
- 19:40मैंने कहा काम पंखे ने किया या कर्म विद्युत ने किया, दोनों का
- 19:48जोड़ हुआ, दोनों का संगम हुआ तो कर्म घटा।
- 19:54यह मैं बीच में कैसे आ गया? यह तुम्हारा भ्रम है, इसे ही मैं
- 20:00भ्रम कहता हूँ। इसे ही शंकर आचार्य कहते हैं, शंक
- 20:08आचार्य तो बिलकुल ही मूर्खता की बात कर रहे हैं, तो कहते हैं जड़
- 20:12है ही नहीं। ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या तो जगत
- 20:19मिथ्या के साथ ब्रह्म चेतना जुड़ाव कैसे करेगी?
- 20:24कर्म कैसे गठित होगा मिथ्या के साथ मिथ्या जड़ के साथ?
- 20:35ब्रह्म सत्य चेतना जुडाब कैसे करेगी कि बिल्कुल मूर्खतापूर्ण
- 20:46सिद्धांत है जड़ है पक्का पक्का मारू टक्कर खून निकलेगा दीवार से
- 20:54जड़। तुम्हारे कोई हाथ काट लेता है,
- 20:59तुम फोर ने एफआइआर करा सकते हो, यह तो मिथ्या है, फिर तुमने क्यों
- 21:04एफआइआर कराया? अरे समझो भाई शंकराचार्य मूर्ख
- 21:08था। शंकराचार्य अपने अनुभव से नहीं
- 21:15बोला। वो सिद्धियों तक ही सीमित रहा।
- 21:21जिसे हम कहते हैं आत्मज्ञान, परमात्मा, ज्ञान वहाँ तक नहीं
- 21:25पहुंचा, वो परमात्मा ज्ञान तक नहीं पहुंचा।
- 21:33न परमात्मा ज्ञान तक बुद्ध पहुंचे, न परमात्मा ज्ञान तक और
- 21:43असली रहस्य बुद्धत्व से अनंत होने के बीच में ही असली रहस्य है।
- 21:53वही तुमने देखा नहीं। तो क्या बोलोगे, खाक बोलोगे?
- 21:59इसलिए मैं कहता हूँ ओशो ने मात्र जो लाख किताबें पढ़ी, उसकी उलटी
- 22:04कर दी या उलटी थी इट वास् वोमिटिंग जो बुक्स उन्होंने पढ़ी,
- 22:13अनुभव तो इसमें था ही नहीं। अनुभव आता है।
- 22:17बुधत्त्व से आगे बुधत्त्व तक कोई अनुभव नहीं होता।
- 22:26अनुभव शुरू होता है बुधत्त्व से आगे कृष्ण के तल तक स्वयं
- 22:32परमात्मा के तल तक। वो होता है अनुभव, वो होता है
- 22:35रहस्य उसको ही न बुद्ध जानते 900 जानत इसीलिए हेतु रहस्य की बात
- 22:45करने के लिए ओशो को इतना अडमब करना पड़ा सो को लाइटरसॉक्साइड।
- 22:543030 शीशियाँ सुन लो 9090 डाईसिपम खर पांच मिलीग्राम 450 मिलीग्राम
- 23:04450 ग्राम डाईसिपम ये सब लगो कहाँ जाएगी नब्ज़?
- 23:13450 ग्राम डाई से पाम ले के पांच ग्राम होता है, एक में वेलियम में
- 23:21और 90 गोलियां 450 ग्राम तो तुम्हारी इतनी सी नर फूल के इतनी
- 23:28हो जाएगी। क्योंकि डायलेटर है ये न वो
- 23:40डायलेट हो जाएगी डायलेट हो जाएगी तो तुम परमात्मा हो गए, लेकिन
- 23:48नकली नकली हुए। ऐसे तो गांजा से भी हुआ जा सकता
- 23:51है। एल एसटी से भी हुआ जा सकता है और
- 23:54बहुत से पदार्थ हैं। परमात्मा ने बनाए तो रहस्य की बात
- 23:59करते हुए सदा ही वो सूक्षक कराते थे।
- 24:08नाइट्रस ऑक्साइड। सूंघ कर जाना और लाफिंग बुद्धा की
- 24:16बात करना मूर्खता के सिवा और कुछ भी नहीं।
- 24:20लाफिंग बुद्धा भीतर से पैदा हो और ध्यान रखो और हास्य में गया हुआ
- 24:28व्यक्ति। लाफ़िंग बुद्धा की बात शायद ही
- 24:31करे, क्योंकि जहाँ जाकर हँसना रोना समान हो जाता है, वो व्यक्ति
- 24:40एक पक्ष की बात क्यों करेगा? हंसने की या रोने की शोक की या
- 24:45खुशी की बात क्यों करेगा? लफिंग बुद्धा की बात क्यों करेगा
- 24:50वो? इसलिए गोरखनाथ में बड़ी प्यारी
- 24:55बात कही, हँसी पो खेली पो करी पो तिहान संग संग चले, अब यहाँ आ
- 25:06जाऊंगा प्रश्न। हँसीबो खेलीबो धरीबो ध्यान ध्यान
- 25:13में जाए बिना ध्यान में जाए बिना तुम हँसते हो तुम खेलते रहो तुम
- 25:23नाचते रहो तुम गाते रहो। तुम्हें उस तत्व का अनुभव नहीं
- 25:28होगा जब तुम ध्यान में सर होकर बैठ जाओगे।
- 25:33तब तुम साक्षी हुए अब मैं बोल रहा हूँ तो मैं अपना अनुभव अभी का
- 25:40बताता हूँ, यह बोल रहा है शरीर। ऊंट फड़फड़ा रहे हैं, ऊपर नीचे हो
- 25:46रहे हैं, गले से आवाज आ रही है और मैं इसका साक्षी हूँ।
- 25:49देख रहा हूँ भेद मिल गया ना ये भेद आ गए हैं, आवाज़ निकल रही है
- 26:02गले में से ऊँट ऊपर नीचे हो रहे हैं, तालुवे से लग रही है जी।
- 26:08कभी दांतों के बीच में फंस रही है जीब इन सारी हरकतों को देखता हुआ
- 26:12बराबर मैं साक्षित में ठहरा हुआ परम अटल स्वरूप हूँ।
- 26:19मैं अपनी आनंद की आनंद की मस्ती में मस्त हूँ।
- 26:25और तभी ये आवाज़ उस मस्ती के साथ लेबोर के आती हुई तुम्हें
- 26:31प्रभावित करती है। यह तो कोई बात न हुई इसलिए ओशो का
- 26:43ज्ञान बकवास है। रहस्य के प्रति बकवास रहस्य के
- 26:50ऊपर पहली बात तो बोले नहीं हुआ, उन्होंने बात की जो 1,00,000
- 26:59किताबें पढ़ीं और लाख किताबें उनकी पढ़ीं जो प्रबुद्ध नहीं थे
- 27:06तो तुम पढ़ो। कोषों को करो देखोगे किसी
- 27:09वैज्ञानिक की बात, किसी चमत्कार, धारणा की बात होगी।
- 27:14मैसेज वुल्फ धारणा की बात बताये, लेकिन तुम्हें पता है पतंजलि की।
- 27:23यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि,
- 27:30धारणा, समाधि से दो अंक पहले आती है।
- 27:36यह शादी हुई कला तो मैं से बर्फ़ के कुदरती सद गई होगी।
- 27:42कोई पिछले जन्म का खिलाड़ी रहा होगा तो इस जन्म में वो खला उभर
- 27:48गई। पातंजलि का यम नियम आसन प्रणयम
- 27:57प्रातः धारणा छै। मान गए ध्यान समाधि।
- 28:02अष्टांग योग कहते हैं बुद्ध भी से अष्टांग योग कहते हैं महावीर भी
- 28:07से अष्टांग योग कहते हैं तो धारणा छठ मांग है और तुम देखना बोर फँसे
- 28:19की बात करेंगे रहस्य के रूप में। तब सुन न कभी वसु वुल्फ में से
- 28:31धारणा के निष्णा से हैं और धारणा एक कला है बिफोर एनलाइटनमेंट इससे
- 28:37आगे अभी ध्यान आएगा जिसके गोरख बात करते हैं।
- 28:42धरी बो। ध्यान और ध्यान के आगे समय दिया
- 28:45ही वह तो बोला ही नहीं जाता परम मौन, परम चुप्पी तो भाई माधक
- 28:54पदार्थ लेके नाइट्रस ऑक्साइड लेके।
- 29:00डाइसी पाम की डंपे गोली खाके तो तुम्हारी दर्द से डायलेट हो ही
- 29:06जाएगी फिर तुम परमात्मा हो ही जाओगे लेकिन बात तो ये है कि सत्य
- 29:13सत्य में परमात्मा हो जाओ, थोड़ी देर के लिए हो जाओ भाई थोड़ी देर
- 29:18के लिए तो एलएसडी ले लो हो जाओगे। मारी जोआना ले लूँ यह है क्यों
- 29:26बंद किया आगाज के रूप में तो ठीक था लेकिन लोग ऐडिक्शन करने लगे।
- 29:32इसकी तो बंद कर दिया लो आगाज के लिए ठीक है, मैं भी कहता हूँ कभी
- 29:38एडिक्टेड मत होना। मैं तो यहाँ तक भी कहता हूँ कि
- 29:41मेरी बातों के भी एडिक्टेड मत हो जाना, क्योंकि मेरी बातों में भी
- 29:46भीतर के आनंद की खुशबू जब लबड़ तबड़ के आती है तो वह तुम्हें
- 29:52सम्मोहित करेगी। एंड यू विल बी हिप्नोटाइज़्ड।
- 29:59तुम आत्म बोध को उपलब्ध नहीं होगे, तुम मेरे द्वारा सम्मोहित
- 30:07कर लिए जाओगे और वह थोड़ी देर के लिए रहेगा।
- 30:13तुम अब सुनते हो सारे दिन भर रहेगा मानो।
- 30:17रात को सुन के सो जाते हो सारी रात पर रहेगा, इतनी देर तक तो
- 30:20रहेगा क्योंकि आनंद इतनी जल्दी भी समाप्त नहीं होता।
- 30:25सच्चे आनंद के समुद्र से टकरा के आती हुई यह रेंजेस इतनी भी क्षीण
- 30:32नहीं होती कि एक 2 घंटे में समाप्त हो जाएंगे नहीं।
- 30:35यह नशा सारी रात तो रहेगा। यह नशा सारे दिन तो रहेगा फिर अगर
- 30:42अस्थाई ही काम करना है तो फिर जरूर ही है।
- 30:46मेरी जुआन एलएसडी वगैरह का प्रकोप तुम्हारे गुर्दे खराब कर देगा जब
- 30:51कोई नाइट्रस सुक्साइड को सोंघेगा। तो वह कहाँ जाएगा?
- 30:57नाइट्रस ऑक्साइड फेफड़ों में सूंघा हुआ नाइट्रस ऑक्साइड
- 31:04फेफड़ों में जाएगा और वह फेफड़ों को नुकसान पहुंचाएगा।
- 31:08इसलिए उस। अंतिम समय में फेफड़ों की बिमारी
- 31:12से ग्रस्त हो गए होंगे। मैंने उनकी जांच नहीं की लेकिन
- 31:16मैं निश्चिंत हूँ इस बात में निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि
- 31:20फेफड़ों की बिमारी से ग्रस्त हो गए होंगे।
- 31:24क्यों? नाइट्रस ऑक्साइड कृत्रिम है?
- 31:29नई जरूरत नहीं और कृत्रिम चीज़ आपका नुकसान करती है।
- 31:39कृत्रिम भांग, कृत्रिम मर्जुहान इसके आप एडिट हो जाओगे।
- 31:50और थोड़ा थोड़ा नुकसान ये करते हैं।
- 31:52गुर्तों को जेकर को नुकसान थोड़ा थोड़ा करते हैं लेकिन मैं ये कहता
- 31:58हूँ कि शरीर का वैसे भी तो हम उपयोग करते हैं उस आनंद की तरफ
- 32:05गति को लेकर। अगर थोड़ा सा शरीर को नुकसान भी
- 32:09हो जाए तो कोई मूल्य नहीं चुकाया तुमने लेकिन एडिक्टेड में तो हो
- 32:14जाना मैं ये कहता हूँ तुमसे जैसे हम चलते हैं तो आपको पता है हम
- 32:21हमारे टिश्यूज़ टूट जाते हैं। जब हम चलते हैं तो हमारे टिश्यूज़
- 32:29टूट जाते हैं। ठीक तो टिश्यूज़ टूटने का नुकसान
- 32:33हुए हुआ, लेकिन हम अपनी मंजल तक भी तो पहुंचे।
- 32:38यह फायदा नहीं हुआ। टिश्यूज़ के टूटने का नुकसान हुआ
- 32:43मानव। लेकिन हम अपनी मंजिल तक गंतव्य तक
- 32:47भी तो पहुंचे अगर गंतव्य तक पहुँचने के लिए हम अपने टिश्यूज़
- 32:54को उपयोग कर लें, तो क्या बुरी बात कोई बड़ी बात नहीं इसी तरह
- 33:00तुम अगर इन चीजों का उपयोग। स्वे तक पहुंचने के लिए कर लो तो
- 33:07क्या बुरी बात है? स्वे तक पहुँच गए थे।
- 33:10मैंने कभी नहीं कहा कि उषा वास् नॉट एनलाइटन पर्सन बिल्कुल पहुँच
- 33:15गए थे, लेकिन उसके आगे कृष्ण की जो बात की उन्होंने कृष्ण की सारी
- 33:20गीता। ओशो ने वॉल्यूम 450 हो गया।
- 33:2990 खाई तो हाँ 450 ग्राम 250 ग्राम देके बोला।
- 33:39ओशो ने सारी गीता 90 गोलियां छक कर फिर बोला, तो इसकी तो नर्व्स
- 33:49डाइलेट हो गई। क्या तुम भी 90 गोलियां छक कर
- 33:53सुनोगे? ऐसे उसकी तरफ से सुननी पड़ेगी?
- 33:57जीस स्थल से बोली गई और जो लोग बिना वहाँ जाए गीता की अनवाद करने
- 34:05लग जाते हैं, उन्हें मैं महामूर्ख कहता हूँ।
- 34:11उसने सच में डाइलेट करके तो बोला, लेकिन आचार्य तो।
- 34:17दिलते भी नहीं करते, फिर बोलते हैं और बोला जा नहीं सकता दिलते
- 34:22हुआ बिना कृष्ण नैचुरली दिलते हो के बोलते हैं ओशो आर्टिफीसियली
- 34:32दिलते हो के बोलते हैं और आचार्य। बिना डायलेट होने ऐसे ही संकीर्ण
- 34:40भाव से बोलते हैं नहीं बोला जा सकता कृष्ण को ऐसा बस तीन ही
- 34:45मार्ग हैं, एक मार्ग तो बिल्कुल गलत आचार्य उन्होंने तो नब्ज को
- 34:54डायलेट किया ही ना? वो शो का गलत तरीका शरीर को भी
- 35:01नुकसान पहुंचाएगा और ज्ञान भी असली नहीं हुआ थोड़ी देर के लिए,
- 35:05फिर दूसरे दिन फिर तुम्हें जरूरत पड़ेगी डाई जुबां से, फिर अगले
- 35:10अध्याय का अगला शुल्क का फिर उसका अनुवाद करना है।
- 35:14और अनुवाद करके उस तल पर जाना है, क्योंकि उस तल पर तो चले ही गए।
- 35:18तुम समझाती है तुम्हें बस उस तल से आगे रहस्य का अनुवाद रहस्य की
- 35:28बात बतानी है तो उस तल पर तो जा सकते हो आराम से।
- 35:34ध्यान में तुम प्रवेश कर सकते हो, लेकिन ध्यान से आगे रहस्य की जो
- 35:40व्याख्या करोगे वह नर्व को डाइलेट करोगे, फिर बोलोगे उसके बिना नहीं
- 35:46बोला जाएगा। निश्चित रूप से यह 90 गोलियों का
- 35:52फरमान है। ओशो गीता पढ़ो महा गीता पढ़ो।
- 36:00लेकिन सारी डाइलेशन के कारण बोली गई यह सत्य नहीं है ये तुम इसे
- 36:06तुम्हारे दिमाग में नहीं आ गई। सत्य से जो चीज़ निकलेगी।
- 36:14वो रहस्य की उस गुण तत्व को भी कराएं।
- 36:22सत्य से जो गिरने निकलेंगे वो व्यक्ति सही में रहस्यमय चला गया
- 36:28है। वहाँ से टकराकर जो हवाएं आएंगी,
- 36:35जो किरणें आएंगी वो सच्ची सच्ची दिलटीओन साथ लेकर आएँगे, वो
- 36:43डाइसिव बम का डायरेक्शन नहीं होगा और वो तुम तुमको बदल देगी।
- 36:51इसे कहते हैं संतत्व की अनुभव की भाषा तो इन चीजों का जैसे बांग है
- 37:08और भी जो चीजें हैं रेस्ट वगैरह आज 1 है, वैसे।
- 37:13करने वालों ने गलत बैन किया क्योंकि लोग एडजेक्टेड हो गए।
- 37:18जब तुम बाहरी तत्वों पर डिपेंड करोगे तो तुम्हारी यही मनोदिशा और
- 37:24शरीर की दिशा होगा जब तुम सही ढंग से भीतर जाओगे।
- 37:31पहले स्वयं को पहचानो के जैसे बुद्ध ने पहचानो उसके आगे बुद्ध
- 37:39समझदार निकले। बुद्ध ने कहा यहाँ तक ही अगर रोग
- 37:45सीख जाए तो ये नहीं का तरीका तो सीख जाए।
- 37:49नॉन रेक्टिवनेस। अगर एक शब्द में बोलू बुद्ध की
- 37:53बात तो वह है नॉन रिएक्टिवनेस प्रतिकार मत करना रिएक्शन मत करना
- 38:05अगर कोई अक्शॅन करे उसका रिएक्शन मत करना सारा अगर एक शब्द में
- 38:10बोलो। बुद्ध के ऊपर कृष्ण ने थूका बुद्ध
- 38:16चुप कर और भी कुछ कहना है भाई यह एक जीने का ढंग था और बड़ा स्थान
- 38:25दर कम है। बुद्ध का ढंग अगर सारी दुनिया
- 38:29अपना ले। तो ये बम्ब बम्ब बेकार हो जाएंगे,
- 38:34फिर सारी दुनिया सहमति के साथ इन बम्बों को डिस्पोज ऑफ करते थे।
- 38:44ये जो लोग इस प्रयास में बैठे हैं।
- 38:47कि हम राष्ट्रपति को समझाते, हम फलों को समझाते, हम ज्ञापन देते,
- 38:51हम चिट्ठी निकालते, वो कुछ कर लेंगे, इनके बस की बात नहीं है।
- 38:57बड़े ग्रोह के हाथों में ये बात आई हुई है कुछ लोग।
- 39:03इस संसार विश्व को चला रहे हैं और वह महामूर्ख हैं।
- 39:10तुम्हें कैसे जीने देंगे? वह खुद नहीं जी रहे हैं वह खुद
- 39:16सुविधाओं से युक्त तो हैं पदार्थों से युक्त तो हैं।
- 39:23सारे धरती की मलकिएत उनके पास हैं, सुख है उनके पास, लेकिन उनके
- 39:30पास रस हैं, ज़िन्दगी निरस है। ये जीतने व्यक्ति चला रहे हैं, बस
- 39:36यही 150 लोग हैं जो विश्व को चला रहे हैं।
- 39:43और अगर वो अपने भीतर झाँकना शुरू कर देंगे तो उनकी ज़िन्दगी भी
- 39:49स्वर्ग हो जाएगी और उनके कारण ही सारा विश्व नर्क बना हुआ था।
- 39:56सारा विश्व भी स्वर्ग बन जाएगा, स्वर्ग कहीं ऊपर नहीं है।
- 40:00सच्च खंड भी कहीं ऊपर नहीं है। इसलिए मैंने तुम्हें कहा मैं
- 40:05तुम्हें जीते जी सच्चखंड में लेके जाऊंगा मरने के बाद सच्चखंड न
- 40:09होता है, न कोई लेके जाता है। ये सब भ्रांतियां हैं और ये भी
- 40:16भ्रांति है कि हम आनंद ले लेंगे आनंद भानंद ये।
- 40:23इंद्रियां कभी आनंद ले ही नहीं सकतीं दे अरे अनेबुल टु डू इट सो
- 40:34इंद्रियों को आनंद आता ही नहीं, इंद्रियों को सिर्फ स्वाद आता है
- 40:39जिसे हम स्टिमुलेशन कहते हैं। और रहस्य या आनंद, वो है नॉन
- 40:47स्टिमुलेशन वहाँ उत्तेजना नहीं होती, आपके स्वभाव में कोई
- 40:52उत्तेजना नहीं है, बस आनंद है, मस्ती है, खुशनुमा है सब कुछ।
- 41:06वहाँ माहौल कुछ ऐसा ताकि गला कथिया न जाए, वहाँ की बातें कहीं
- 41:14नहीं जा सकती। हम बोलते हैं, जे को कहें, पाछे
- 41:19पछताए, कहते हैं लेकिन पीछे पछताते हैं, क्योंकि बोला नहीं
- 41:23जाता। वह इतना विराट आनंद से भरा, वह
- 41:30ऐसी मधुरशाला, ऐसा आनंद, मिलन, संसार और परमात्मा का।
- 41:42के बीच का पुल टूट गया, जिसे हम मैं कहते हैं वह पुल धोखा था।
- 41:50जैसे मैंने आपसे कहा कि विद्युत और पंखे का जब जोड़ाव होता है,
- 41:58किसी तार के द्वारा तो पंखा चलता है।
- 42:01और विद्युत अपना काम करते हैं तो कर्म किसने किया?
- 42:03बताओ कर्म हुआ जुड़ाव से किसी ने नहीं किया, जुड़ाव ने काम किया
- 42:16लेकिन तुम कहो मैं ये मैं शब्द ही करता।
- 42:21ये एक गलत पुल है जो गलती से बन गया है, है नहीं बताओ कहाँ है मैं
- 42:30किसने किया था मुझे बताओ तुम कहते हो, मैं करता हूँ मैं मैं
- 42:36स्वादहीन हूँ, मैं कर्म करने में स्वतंत्र हूँ।
- 42:39लेकिन कृष्ण ने एक बात अधूरी छोड़ दी।
- 42:43वो कहते हैं, कर्मण्य वाध कार्य से वस्तु कर्म करता चार मानम उसने
- 42:48बात ही नहीं छिड़ी आगे क्योंकि कर्म करेगा ही तू।
- 42:57जब तक चेतना तेरे शरीर के जड़ के भीतर बैठी है, यू विल हैव टू डू
- 43:04कर मास तुम्हें कर्म करने ही पड़ेंगे, क्योंकि चेतना है बिजली
- 43:13और पंखे का। जोड़ाव है और पंखा चलेगा भाई या
- 43:22कब टूटेगा जब सम्बन्ध टूटेगा जब स्विच ऑफ होगा पहला या चेतना?
- 43:35बाहर निकल जाएगी, जड़ता से अपने संबंध दौड़ लेंगे।
- 43:41दो ही ढंग से एक कदम रुकेंगे या तो तुम इस धेह को मैं नहीं हूँ यह
- 43:54जान लो ठीक? या फिर दूसरी घटना तो प्रकृति घटा
- 44:01ही देती है? आपको इस जड़ से बाहर फेंक देती
- 44:06है, उसे मृत्यु रहती है, फिर आप कर्म नहीं कर सकोगे लेकिन कर्म
- 44:12तुम तब कर सकोगे जब तुम यह जान लोगे।
- 44:15देखिए। ये वो बातें हैं जो अक्षरों में
- 44:18कही नहीं जाती लेकिन मैं कहने का प्रयास वर कर रहा हूँ और बहुत
- 44:23प्रयास किया। मैंने सारी रात मैंने रामायण पढ़ी
- 44:28लेकिन सुबह फिर आपने वही प्रश्न पूछ लिया कि सीता राम की माँ थी
- 44:34तो मैं माची पे हाथ मारता हूँ। क्या तुम क्या समझे ये ठीक के
- 44:42समझाया नहीं जा सकता लेकिन समझने वाला इशारों को पकड़ सकता है।
- 44:50इस बात को गौर से सुन लो, समझाया तो नहीं जा सकता वो।
- 44:55क्योंकि समझ से बाहर लेकिन जैसे गागर में सागर तो नहीं समा सकता?
- 45:02समझो बात को थोड़ा सा यहाँ समझ लेना गागर में सागर तो नहीं समाया
- 45:08जा सकता? लेकिन सागर का थोड़ा सा पानी तो
- 45:11भरा जा सकता है। जितनी गागर की कैपेसिटी है, बस
- 45:16मैं मैं कहता हूँ कि इतना सा ही कर लो, तुम सागर का थोड़ा सा पानी
- 45:22ही गागर में भर लो, उससे ही तुम्हें इसके स्वाद का पता चल
- 45:27जाएगा। फिर जैसे ही गागर ने स्वाद चखा
- 45:32पाने का, फिर गागर खुद ही सागर में अपने आपको विलीन कर देगी और
- 45:39यही है तरीका डिसोलवे यूरसेल्फ़ नहीं।
- 45:51टु इन्सर्ट यूरसेल्फ़ घोलना है नहीं मिलना है, घोलना है, नहीं
- 46:04मिलना है। तुम घुलते हो, नमक की तरह चीनी की
- 46:11तरह नहीं, तुमने मिलना है, मर्ज होना है, नॉट टू डिसोलवे यू आर टु
- 46:21मर्ज और जैसे ही बूंद समुद्र में मर्ज हो जाती है।
- 46:28तो फिर तुम पहचान में नहीं आओगे? आज कृष्ण की बूंद कोई समुद्र में
- 46:32से निकाल के दिखाई कबीर खो गए, नानक खो गए, मीरा खो गई, अब कोई
- 46:38बताये कि ये बूंद थी जो मीरा थी, ये बूंद थी जो कृष्ण थी।
- 46:44ये सब समुद्र में समज आती हैं। बूंद सामान्य।
- 46:48और समुद्र ही हो जाते हैं। फिर समुद्र की मलकियत उनकी उससे
- 46:56पहले बूंद की मलकियत उनकी थी। समुद्र में मिलने के बाद समुद्र
- 47:00की मलकियत उनकी। कर्म कौन करता है?
- 47:11कर्म जुड़ाव से होता है करता कोई भी नहीं जुड़ाव से चेतना और जड़
- 47:19के जुड़ाव से कर्म उत्पन्न होता है।
- 47:23इट इस नेचुरल प्रोसेसर। करता कोई भी नहीं है, ना विद्युत
- 47:31करती है, ना जड़ करता है, ना चेतन करता है।
- 47:34तो फिर किया जिसने जड़ और चेतन को बनाया एक जड़ और चेतन के पार ऐसी
- 47:43सत्ता है। जिसने जड़ को भी बनाया और चेतनों
- 47:47को भी बनाया। बड़ी मजेदार चीज़ है ये शायद कभी
- 47:50किसी ने बोली ना कर्म का सिद्धांत तुम्हें बता दिया कि कर्म तो ऐसा
- 47:57होगा, श्वाद लेती हैं इंद्रियाँ। लेकिन चेतना की मौजूदगी में स्वाद
- 48:06लेती हैं। चेतना की गैरमौजूदगी में कोई भी
- 48:12इन्द्रय स्वाद नहीं ले सकती। फिर तुम कहते हो की हम तो ऐश
- 48:17करेंगे, ऐश करते करते तुम ऐश हो जाते हो, राख हो जाते हो?
- 48:25ऐश किसने लिया? किसने किया ऐश?
- 48:29क्या छः बार कपड़े बदलना ऐश है कि 10 बार साड़ियाँ नैनी बदलना ऐश
- 48:34है? क्या बढ़िया बढ़िया पदार्थ खाना
- 48:37जो सुबह निकल जाएंगे शरीर से बाहर वो ऐश है।
- 48:42के सुंदर पेय पदार्थ का खाना ऐश है ये तो इंद्रियों ने इनका टेस्ट
- 48:47पहचाना स्वाद किसने लिया न इंद्रियों ने स्वाद लिया न चेतना
- 48:55ने स्वाद लिया इन्द्रियों। ने चेतना की मौजूदगी में स्वाद
- 49:01देखा। फिर सुनो, इसे गहरी बात है।
- 49:07इंद्रियों ने चेतना की मौजूदगी में स्वाद को चखा या देखा या सुना
- 49:15या स्पर्श किया। यह सुनकर तो मौजूद की किसकी चेतना
- 49:24की चेतना ने स्वाद लिया नहीं लिया, इन्द्रियों ने स्वाद लिया
- 49:29नहीं लिया, फिर किसने स्वाद लिया स्वाद किसी ने भी नहीं लिया।
- 49:38चेतन ने स्वाद लेती हुई इंद्रियों को देखा बस ये है प्रभाष तो आइए
- 49:45इससे आगे हम सिर्फ 5 मिनट में रहस्य की बात कर रहे हैं।
- 49:52आप एक बार स्वयं को पहचान लो, क्या पहचान लो कि तुम शरीर नहीं
- 50:01हो, तुम विचार नहीं हो, तुम भावनाओं नहीं हो, यह सेल्फ
- 50:06रिकग्निशन है। इसे आत्मज्ञान कहते हैं।
- 50:11इससे प्रबुद्धता कहते हैं। यहाँ तक तो न जाओ यह बुद्ध का तल
- 50:16कहता हूँ मैं ठीक तो चेतना है और जड़ है चेतना और जड़ के संयोग से
- 50:28कर्म हैपन कर्म होता है। कर्मकर्ता कोई चेतना और जड़ के
- 50:37संबंध से कर्म होता है, जैसे कैटलाइटिक एजेंट की मौजूदगी में
- 50:45रिएक्शन हैपन करती हैं। समझा के केमिस्ट्री के छात्र से
- 50:51समझ लेंगे कैटलाइटिक एजेंट की मौजूदगी में रिएक्शन घटती तो होती
- 50:59है लेकिन क्या कैटलाइटिक एजेंट ने वह रिएक्शन करी नहीं, भागीदार थी
- 51:07नहीं। फिर उसका रोल उसका रोल सिर्फ
- 51:12मौजूद थे। इन दी विटरनेस ऑफ कैटेलिटिक एजेंट
- 51:19इन दी विटरनेस ऑफ साक्षी कर्मास हैपन।
- 51:29इन दी विटनेस सोप साक्षी कर्मास हैपन अब यहाँ तक तुम आ गए, अगर
- 51:35तुम्हे थोड़ा समझ लग गई तो तुम भागीशाली हो।
- 51:41बुध के तल से थोड़ा आगे निकलो, बुध का तल कैसे आएगा?
- 51:44रिलैक्स करो अपने आप। क्रियायोग करो उसके बाद ध्यान में
- 51:49बैठो ध्यान का मतलब न कुछ करना कोई जप नहीं तप नहीं वाट नहीं
- 51:53पूजा नहीं कुछ नहीं अपने भीतर उतरते जाओ, उतरते जाओ तुम अपने ही
- 51:57तल पे आ जाओगे उससे पहले बड़े प्रलोभ बनाएंगे, जंक्चर पॉइंट
- 52:02आएगा। जो तुम मांगोगे मिल जाएगा क्योंकि
- 52:06संसार तुम्हारे अधीन है। तुम मालिक हो संसार के तुम
- 52:14राष्ट्रपति अप्राइम मिनिस्टर जहाँ से गुजरेगा, आसपास के लोग सलाम तो
- 52:18करेंगे ही न भाई कतार बांधे खड़े हैं।
- 52:22सभी स्थितियां सभी स्थितियां और बीच में से राष्ट्रपति गुजर रहा
- 52:27है तो वे सब सलाम तो करेंगे, लेकिन तुम उनकी तरफ आकर्षित मत
- 52:32होना, तुम उन्हें अपना मत लेना। अगर तुमने अपना लिया किसी को तो
- 52:38तुम गए काम से तुम्हारी यात्रा खत्म।
- 52:43तुम ना इधर ना उधर तो कबीर ने यहाँ आकर कहा है बिन मांगे मोती
- 52:49मिले मांगे मिले ना भीक और यहीं पे आकर नानक कहते हैं, जो मांगू
- 52:59ठाकुर अपने थे सोई सोई देव। दे तो देगा वो जो मांगोगे दे देगा
- 53:06तुम ऐसे पॉइंट पे आ गए एक पहरा कहते हैं नानक जो मांगू ठाकुर
- 53:13अपने से सोई सोई देवे तुम उस से जंक्चर पॉइंट पे पहुँच गए जो
- 53:16मांगोगे मिल जाएगा क्योंकि तुम भ्रमण के बिल्कुल करीब हो।
- 53:22और भ्रमण बाहर नहीं है। ब्राह्मण भीतर है, यथा पिंडे तथा
- 53:26भ्रमंडे तो तुम थोड़ा और नीचे उतरोगे तो कबीर यहाँ कहते हैं
- 53:33सावधान कुछ मांगना मत। ये बात अलग है कि वो गद्द में
- 53:38नहीं बोली गई पद्द में बोली गई चीज़ है और पद्द में बोली गई चीज़
- 53:42तुम्हें समझती नहीं तो कबीर कहते हैं बिना मांगे मोती मिले वहाँ
- 53:50कुछ मांगना नहीं है। हालांकि तुम कुछ भी मांग सकते हो
- 53:53और जो मांगोगे वही मिलेगा। तो ये दो संतों को मिलाकर चलवा जो
- 54:01मांगोगे मिल जाएगा लेकिन मांगना नहीं है।
- 54:05अगर नहीं मांगोगे तो मोती मिलेगा। मोती किसे कहते हैं?
- 54:11स्व को मोती कहते हैं जो तुम्हारा स्व का रूप है।
- 54:15स्वरूप को मोती कहते हैं। मांगे मिले न भीग अगर तुमने मांग
- 54:20लिया तो फिर जो मिलेगा वह तो भीग है।
- 54:24मैं तो भीख से भी मिल, वह भीख से भी मिल जाता है हीरे जौहरात राजा
- 54:30लोग प्रसन्न होकर वैसे भी लुटा देते हैं।
- 54:33ये लोग खुश हुए। नो लक्खा हार फेंक देते हैं लेकिन
- 54:40कबीर कहते हैं देखो जो करने रहना जान मांगने से मिल तो जाएगा लेकिन
- 54:48मांगना नहीं है। ये भीग है, ये तो भीग में भी मिल
- 54:53जाता है ऐसा कुछ तो। अगस्तो में मांगन से मरना, भला
- 55:03मांगना मत, उस तत्व के लिए मर जाना आहूत हो जाना, बलि दे देना,
- 55:11काहे की अहंकार की। बिन मांगे मोती मिले माँगे मिले
- 55:18ना भीख, मांगन से मरना भला, मांगना बुरा है मांगोगे तो फँस
- 55:29चाव के फिर चक्कर में। नहीं मांगोगे और मर जाओगे उसके
- 55:35लिए जो तुम्हारी आखिरी गंतव्य है मंजल है टारगेट है, लक्ष्य है तो
- 55:46मर जाना। गोरख भी कहते हैं मरो हे जोगी
- 55:50मरो। मरो मरण है मीठा ऐसी मरणी मरो जीस
- 55:57मरणी मर गोरख टीठा तुम्हें तुम्हारा अंत सत्तल पता चल जाए
- 56:04मिलेगा कैसे बिना मांगे से मिलेगा?
- 56:09एक सत्य बताते हैं नानक। कि जो मांगोगे मिल जाएगा, लेकिन
- 56:14आगाह करते हैं कबीर देखो मांगना मत और उसकी सच्चाई बताते हैं।
- 56:21गोरख मांगन से मरना भला यह है सतगुरु की सीख सच्चा गुरु तुम्हें
- 56:29यही बताएगा मांगना मत। मर जाना, उस से जलती हुई क्षमा
- 56:36में परवानी की तरह खाक हो जाना और राख हो जाना मांगना मत, क्योंकि
- 56:44हीरे जवाहरात, मोती मणियाँ नौ लग के हाथ को मांगने से भी मिल जाते
- 56:48हैं। राजा लोग प्रसन्न होकर भी किसी
- 56:52कला के ऊपर तुम्हें लुटा देते हैं, ये किसी के है नहीं, ये किसी
- 56:58का माल नहीं है। ये मालिक का माल है, माल मालिक का
- 57:02तुम्हारा कुछ नहीं है तुमने तो सिर्फ स्टाम्प लगाया, मैं कहा कि
- 57:06मैं मालिक हूँ। तीसरा कहते हैं वहाँ मरण ये गोरख
- 57:13कहते हैं गोरख कहते हैं मरो अब यहाँ पर आ गए हो तुम आखिरी आखिरी
- 57:23पॉइंट मरो हे जोगी मरो मरो मरण है मीठा।
- 57:33यहाँ आकर तुम मरो, मांगो मत बड़ा मीठा है बड़ा मीठा फर्क मिलेगा
- 57:43आनंद सा मीठा फल यहाँ धरती पे क्या स्वर्ग में भी कहीं कुछ
- 57:47नहीं। सारे भ्रमण में आनंद से ज्यादा
- 57:51मीठा कुछ भी नहीं। वह अवस्था जो तुम्हें खुमारी की
- 58:01अवस्था में हर वक्त बांधे रखती है, जो भी 100 घंटे।
- 58:06वह मांगने से नहीं मिलता, वह छोड़ने से मिलता है।
- 58:13वह मांगने से नहीं मिलता वह मरने से मिलता है इसलिए मर जाना।
- 58:21गोरख कहते हैं मरो। इस जंक्चर पॉइंट के बाद की बात हो
- 58:26रही है ये सारी ये जंक्चर पॉइंट के बाद की बात है सारी मरो है जो
- 58:33की मरो मरो मरण है मीठा बड़ा मीठा है अगर तुमने, एक बार वह मर गए
- 58:43जाके। तो फिर तुम्हारी ऐसी मरणी मरो,
- 58:47बहुर मरण न होए। अगर एक बार यहाँ मर गए तो फिर
- 58:53जीवन मरण का चक्र समाप्त हो गया। न मरोगे, न जीओगे, न मरोगे, न
- 58:57जीओगे, फिर सदा ही तुम सदा बाहर रहोगे।
- 59:03उस आनंद के सुन्दर में अठखेलियां गोते खाते हुए तुम परम आनंद में
- 59:08सदा ही झूमोगे जैसे तुमने मधुर रस पी लिया हो, मदहोसी की अवस्था में
- 59:19सदा डूबे रहोगे तुम। मरो हे जो की मरो मरो, मरण है
- 59:30मीठा ऐसी मरणी मरो जीस मरणी मर गोरख डीठा कृष्ण कहते हैं मैं ही
- 59:44हूँ प्रभात। गौरख कहते हैं मैं ही हूँ
- 59:49परमात्मा, मैं कहता हूँ मैं ही हूँ परमात्मा, लेकिन समुद्र
- 59:56किसका? जो बूंद समुद्र में चली गई वो
- 1:00:02दावा करेगी, मैं ही हूँ समुद्र। तो समुद्र किसका?
- 1:00:09मेरा भी, कृष्ण का भी, गोरख का भी, कबीर का भी, नानक का भी।
- 1:00:20जो बूँद समुद्र में मिल गई, सागर में मिल गई बूँद समानी, समुद्र
- 1:00:25में सागर ही हो गई, सागर वो ही हो गया, वो कह सकता है जीतने ऋषियों
- 1:00:34ने उदघोष किया अहम् ब्रह्मस्व। उदघोष ने भीतर जाकर किया उस
- 1:00:41समुद्र में एकाकार होके किया आह, पर बस वहाँ से जब जो उठती है
- 1:00:55चेतना की तरंग करने। मारे रोम रोम को रोमांचित कर देते
- 1:01:03हैं जब तक तुम जीओगे जो व्यक्ति जीते जी मर गया यानी उस पॉइंट पे
- 1:01:17मर गया जहाँ पर कहते हैं। के मांगन से मरना भला जहाँ पर
- 1:01:24जाके कहते हैं गोरख मरो हे जोगी मरो ऐसी मरणी मरो जीस मरणी मर
- 1:01:31गोरख जीता थोड़ी सी गहरी है बात आराम से सुनते हो।
- 1:01:38जीस मरनी मर गोरखो की उठाओ तुम्हें गोर्ख दिख जाए अपना गोर्ख
- 1:01:42तो कहेंगे गोर्ख दिख जाए कृष्ण कहेंगे कृष्ण देखी जाए मैं कहूंगा
- 1:01:47बाबा विजय देखी जाए कबीर कहेंगे कबीर दिख जाए नानक कहेंगे नानक
- 1:01:52दिख जाए देखिए ये ऐसे ही खिताब कर सकते हैं।
- 1:01:56आप वैसे समझ ही नहीं पाओगे तो मजबूरी है अलफाज़ में कहने की उस
- 1:02:03समुद्र को अलफाज़ में कहने की ढंग है गुर कहेगा जीस मरने से गोरखड़ी
- 1:02:10उठा कृष्ण कहेंगे तुम मेरी शरण में आजा।
- 1:02:17लेकिन ये एक ही अस्तित्व के वक्तव्य हैं।
- 1:02:22एक ही अखंड अस्तित्व के वक्तव्य हैं।
- 1:02:28वो कृष्ण के मुख से उच्चारित हुए कबीर के नानक के गौरव के या मेरे
- 1:02:35किसी के मुख से उच्चारित हुए वो उच्चारित हुए एक ही अस्तित्व से
- 1:02:42जिसे हम समुद्र कहते हैं। सागर कहते हैं आनंद का भू सागर
- 1:02:47जहाँ से ये आवाज़ उठती है। अहम् ब्रह्मस्व वहाँ से जब उठे हो
- 1:03:01तुम शरीर की अवधि अभी पड़ी है जब वो करने बाहर आएँगे, तुम जो
- 1:03:13करोगे। कुछ करने का मज़ा कुछ हो रहा है
- 1:03:21फिर तुम करता न रहोगे फिर तुम भोगता न रहोगे, लेकिन कर्म होगा।
- 1:03:35जैसे मैंने कहा बिजली की और पंखे की जोड़ाव के साथ जो कर्म होता है
- 1:03:42वो कौन करता है? कोई नहीं करता है लेकिन कर्म होता
- 1:03:45है तो उस तल को छूने के बाद। उस तल में अटकलियां खाने के बाद
- 1:03:53उस परम समुद्र को पीने के बाद अगस्त ने पूरा समुद्र पी लिया।
- 1:03:59उसका कुल मतलब इतना ही है के अगस्त ने पूरा समुद्र पी लिया।
- 1:04:04उस भूत ने पूरा सागर निगल लिया और अगस्त उस तल पर पहुँच गए।
- 1:04:12अगस्त से रहेंगे। उस स्तर पर जाओ जहाँ जाकर अगस्त
- 1:04:17से दिख जाए। उसकी भाषा ये होगी अब क्या करें?
- 1:04:25भाषा बड़ी कमजोर है, लेकिन भाषा में समझाना।
- 1:04:31हमारी मजबूरी है हमारे पास और कोई तरीका ही नहीं समझाने का।
- 1:04:37ये थोड़े थोड़े इशारे कर देंगे और भाषा से ही इशारे करेंगे हम।
- 1:04:45तो तुम उस तल पर पहुंचने के बाद जो कर्म होंगे, संसार और परमात्मा
- 1:04:54दोनों को इकट्ठे भोग लोगे। तुम उसके आनंद का क्या वर्णन करूँ
- 1:05:01मैं? राखियां, गल्ला कथियाँ न जाएं, जे
- 1:05:09को कहे पाछे पछता है, मैं इतना कुंटेंट फेंक रहा हूँ इसलिए नहीं
- 1:05:20कि कोई सुने आज मुझे। नहीं, कभी भी कोई भी जीस से प्यास
- 1:05:28लग गई हो और कोई भी जिसे किसी प्रश्न का उत्तर उस तल का चाहिए
- 1:05:35तो उसको कम से कम मेरे इस कंटेंट में उसका जवाब मिलता है।
- 1:05:41इसलिए कंटेंट पे कंटेंट में घरा ही चला जाता हूँ।
- 1:05:46फेंक के चला जाता हूँ लम्बी लम्बी वीडियो आखिर कल को कोई मोक्ष
- 1:05:53प्यासा उस तल पर पहुँच जाए। और उस तल पर किसी बात को खोजना
- 1:06:02चाहिए तो वह मेरे ग्रंथ से मिल जाए।
- 1:06:07मेरे वाणी से मिल जाए तो मैंने पहले दिन अपने चैनल कंट्रोलर से
- 1:06:12कहा कि मैं इतना कॅन्टेंट फेंकूंगा यूट्यूब पे इतना
- 1:06:18कॅन्टेंट। हेकूंगा कि तुम उसे स्टोर करते
- 1:06:22रहे। कल को कोई भी कोई भी मोक्ष उस जल
- 1:06:28पे पहुँच सकता है, किसी के माथे पे नहीं लिखा होता।
- 1:06:33परमात्मा किन रंगों में राजी है पता नहीं।
- 1:06:39कल को कोई ऐसा हो सकता है जो उस स्तर पे पहुँच जाए और फिर वह कुछ
- 1:06:47आगे आगे का रास्ता जानना चाहता है तो उसे मेरे घर से रास्ता मिल
- 1:06:53जाए। मैं आखिर तक बोल जाऊंगा, बिलकुल
- 1:06:57आखिर। वहाँ से आवे तो आज मैंने कहा जड़
- 1:07:09और चेतन शरीर और कान्शस्नस 100% होंगे।
- 1:07:22लेकिन इससे आगे की बात आज थोड़ी सी बहुत इनको किसने बनाया?
- 1:07:32एक तत्व ऐसा है जो सुपर पब है। उसने जड़ को भी बनाया।
- 1:07:42उसने चेतन को भी बनाया। ये सब तुम्हारे लिए अजूबा है।
- 1:07:47तुम एक मिट्टी का कण भी नहीं बना सकते और उसने मिट्टी का कण भी
- 1:07:54बनाया, चेतन भी बनाया। सब बनाया उसने जिसने बनाया वो
- 1:08:02सुपरपॉवर परम पिता, परम आदमी को, इन सब से परे, जड़ से परे चेतना
- 1:08:15से परे। उसको नाम नाम क्या करू मैं उसे,
- 1:08:25मैं कहूंगा, परम चेतनता है, सुपरकन्शियसनेस परम चेतनता।
- 1:08:37रहस्य से बिल्कुल आखिरी सिरा सोर मैं उसको हाथ लगा के वापस आया और
- 1:08:51जिसने वो परम चेतनता को छू लिया। वह परमात्मा होने का दावा करेगा,
- 1:09:00अवतार होने का दावा करेगा। जिसने जड़ भी बनाया जिसने चेतन भी
- 1:09:07बनाया और जिसने बनाया वो इनसे अलग।
- 1:09:15जड़ से भी अरक धीरे बोल रहा हूँ सर, चेतन से भी अरक, लेकिन वह
- 1:09:22क्रिएटर सच्चा क्रिएटर सच्चा पात्रशाह।
- 1:09:32आज सच जो इन सब चीजों को बनाने से पहले भी था वो सच जुगाद सच सदा सी
- 1:09:43सच था वो है भी सच आज भी सच हुस्सी भी सच अभी भी सच रहेगा।
- 1:09:53वह सुपरकन्शसनेस वहाँ जाकर व्रती मौन तो घटित हो जाता है बुद्ध के
- 1:10:06तर पर। लेकिन उससे आगे शब्दों में
- 1:10:14व्याख्यात क्या करूँ? पर मौन पर मौन भी जहाँ नहीं रहता,
- 1:10:23मौन भी नहीं रहता। पर मौन भी नहीं रहता, उससे भी पास
- 1:10:34बस अब ये इशारा चलेगा। ना जड़ ना चेतन।
- 1:10:44न परमात्मा, न कान्शस्नस सुपर कान्शस्नस जिसने इस सारी सृजना को
- 1:10:57निर्मित किया, बस वो आखिरी पॉइंट है, उसको छूना भर होता है।
- 1:11:06उसको छूने के बाद जो व्यक्ति वापस आ जाता है वह अवतार वह जब जाएगा
- 1:11:19वो समुद्र में समा जाएगा। और समुद्र ही हो जाएगा।
- 1:11:25उसने जीते जी जागते जागते देख लिया कि मैं समुद्र हूँ, मैं बूंद
- 1:11:32नहीं हूँ इसलिए वह बूंद सुन्दर में समा जाती है।
- 1:11:40बूंद समान समन्ध में। धन्यवाद।