Latest / Baba ji Vijay Vats / 24 Jan 26 - संसार से मुक्ति का रहस्य: भोगो, पर जाग कर! सच्चा फकीर कौन? झोला उठाने वाला या भीतर से खाली
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- 0:02तेन तक तेन भुंजेथ मागलधर कश्यस व्यन्धम जिन्होंने त्याग के भाव
- 0:11से उगा उनसे त्याग हो गया। नहीं।
- 0:20बहुत उथला उथला शब्द है। तेन तट तेन भूँजेतह माग्रधर
- 0:29कसस्सविथनम जिन्होंने त्याग के भाव से भोंगा।
- 0:42उन्होंने त्याग कर दिया नहीं त्याग करना न पड़े इस अभाव से
- 0:49भोगो जैसे मैंने कहा कि इतना भोगो।
- 0:59कि भोग ही त्याग बन जाए। मैंने कहा था आम तोड़ा भी जा सकता
- 1:09है जब खट्टा हो वृक्ष के साथ लगा हो आम।
- 1:18तो तोड़ा जा सकता है लेकिन वो कच्चा होगा, वो त्याग कच्चा होगा,
- 1:25टूट तो जाएगा वृक्ष से लेकिन कच्चा होगा, खट्टा होगा और दूसरा
- 1:33मैंने कहा था कि अगर। उसको लगा ही रहने दे वृक्ष के साथ
- 1:43वृक्ष के साथ लगे रहने को मैं कहता हूँ भोगना उसको पर्याप्त
- 1:49मात्रा में भोग मिलते ही रहे, मिलते ही रहे, मिलते ही रहे तो वो
- 1:55खट्टी अम्बी किसी वक्त? खुशबूदार आम स्वादिष्ट, मीठा आनंद
- 2:05देने वाला पक जाता है और पका हुआ फल पका हुआ आम।
- 2:16वृक्ष का त्याग किया नहीं करता, वृक्ष से उसका त्याग हो जाया करता
- 2:22है। अब थोड़ा इसको गहराई से समझना
- 2:25पड़ेगा के जब आम पक जाया करता है बिलकुल पक जाया करता है, खुशबू को
- 2:30बिखेरने लग जाया करता है हवाओं में।
- 2:34इतना पक जाता है कि उसके भीतर से उसकी छाल के भीतर से रस टपकने लग
- 2:40जाए। बाहर तो क्या उसको तोड़ना पड़ता
- 2:43है? नहीं, वो खुद से टूट के घर जाएगा।
- 2:47उसको मैं कहता हूँ त्याग का फलीभूत होना।
- 2:54त्याग करना तो आप मजबूरी में भी त्याग कर लोगे।
- 2:57कच्चे अम्बे को तोड़ लिया और पक्का फल समझ के भी आप तोड़ सकते
- 3:02हो समझ के लेकिन वो आपका समझे ना सही पका नहीं है।
- 3:08सही पका वही है जो आम पूरा पक जाए।
- 3:13और पक के खुशबू को बिखेरने लगे रस को अपनी चमड़ी के वार से उड़ेलने
- 3:18लगे और उसकी रसधार रस की खुशबू हवाओं को आंदोलित करने लगे।
- 3:26आपके नशा पुतों को छूने लगे और फिर वो घर जाए, अपने से ही घर
- 3:32जाए। वो है सही त्याग।
- 3:34फलीभूत हुआ हुआ त्याग फकीर दो तरह के होते हैं झोला छाप फकीर भी हुआ
- 3:42करते हैं झोला छाप फकीर समित्य फकीर।
- 3:51बहुत से लोग कह देते हैं हमारा क्या है, हम तो झोला उठाएंगे, चले
- 3:55जाएंगे। हम तो फकीर हैं नहीं, फकीर की ये
- 4:03परिभाषा नहीं है झोला उठाओगे और चले जाओगे।
- 4:10फकीर की या परिभाषा? मैंने भी ऐसा ही किया था।
- 4:173 जनवरी 1973 को मैंने जब गृह त्याग किया तो एक झोला साथ में
- 4:23लेके गया था, लेकिन वापस मुड़ना पड़ा।
- 4:32वापस मड़ा झोला लेके गया था अरे भाई जब फकीर ही हो गए हो तो झोला
- 4:43भी काहे को उठाना क्यों उठाओगे झोले में?
- 4:49रे रखने को कुछ वाकई रह ही नहीं गया है तो झोला किस काम का झोला
- 4:58उठाओगे, काहे को क्या रखने को उठाओगे झोला?
- 5:08फकीर ही हो गए हों तो झोला साथ लिए क्यों फिरते हो?
- 5:14झोला भी काहे को उठाओगे? झोला उठाने की जरूरत न रह जाए,
- 5:20ऐसे फकीर हो जाओ सच में फकीर झोला उठाए नहीं करते।
- 5:28कौन दोहमत ले झोला उठाने के शंकराचार्य कभी झोला नहीं उठाते।
- 5:34बुध कभी झोला नहीं उठाते, भिक्षा मांगने के दो तरीके होते हैं।
- 5:45गरीबी के भीतर मजबूरी वश भिक्षा मांगनी पड़ती है, ऐसे भिखारी भी
- 5:52हुआ करते हैं, ऐसे भिक्षुक भी हुआ करते हैं और उस भिक्षा की डेंगें
- 5:59हाँ कहाँ करते हैं? लेकिन भीख तो भी मांगते हैं, एक
- 6:08भीख मजबूरी में मांगी जाती है, पेट भरने के लिए उसका बखान नहीं
- 6:18हुआ करता कि मैं भीख मांगता हूँ, ये भी काहे की?
- 6:24कोई क्वालिफिकेशन है? भीख मांगना नहीं, एक भीख मांगी
- 6:31जाती है। जरूरत के लिए जो बुद्ध भीख मांगा
- 6:35करते हैं, शंकराचार्य भीख मांगा करते हैं, लेकिन वो भीख मांगने की
- 6:41बात ही कुछ निराली। पेख तबोध ने भी मांगी।
- 6:49लेकिन आपको पता होना चाहिए कि बुद्ध पूरी कपिल वस्तु के
- 6:54साम्राज्य को लात मार के आके भीख मांगे थे।
- 7:00भीख मांगी शंकराचार्य ने। लेकिन वो था सही भीख मांगना
- 7:08क्यों? क्योंकि शरीर को जरूरत है और शरीर
- 7:12को जरूरत है उनके लिए नहीं। आपके लिए करूणावश शरीर को बचाए
- 7:20रखें। करुणा वश शरीर को बचाए रखे हैं
- 7:28क्योंकि ये शरीर बड़े काम का है। इस शरीर में बहुत कुछ छिपा पड़ा
- 7:34है अपनी आने वाली संतानों के लिए। उनके लिए आप संसार की सभी संतानें
- 7:45हैं, जिनको वो अपनी अनुभव की दान बख्श के जाएंगे।
- 7:54अनुभव की संपदा बांट के जाएंगे। उनको बांटने के लिए बहुत कुछ है
- 8:01उनके पास। इसीलिए जरूरत के लिए भीख मांगते
- 8:04हैं, लेकिन एक भिखारी को बांटने के लिए कुछ नहीं है।
- 8:09उसके पास सिर्फ लेने के लिए है पेट भरने के लिए बांटने के लिए
- 8:14उनके पास कुछ नहीं है, लेकिन। शंकराचार्य के पास तो बांटने के
- 8:20लिए बहुत कुछ है। बुद्ध के पास बांटने के लिए बहुत
- 8:25कुछ है। बुद्ध को ज्ञान हुआ, कपिलवस्तु
- 8:28लौटे यशोधरा के पास चाहते तो शुद्धोधन से कह सकते थे।
- 8:38के खाली करो मेरा राज़ मैं बैठता हूँ राज्य पे सो 2 दिन बहुत खुश
- 8:45होते हैं सारी जनता आँखें बिछाई बैठी थी के कपल वस्तु का सम्राट
- 8:56गौतम बुद्ध होगा। लेकिन वो सिर्फ यशोधरा को समझाने
- 9:04के लिए आए थे के मूर्ख मत बन मैंने जो पाया है तुम भी पा ले।
- 9:17एक करुणा वश समझाने आए थे। जनता ने समझा पुत्र ने समझा,
- 9:28राहुल ने समझा, यशोधरा ने समझा। पिता ने समझा कि शायद अब सम्राट
- 9:38पथ पे आसीन हो जाएगा, क्योंकि इसने अपना गंतव्य पूरा कर लिया।
- 9:45इसने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया और देखें समझ लीजिये बात को।
- 9:52अगर लक्ष्य पूरा हो जाए तो गद्दियाँ बेकार हो जाती हैं।
- 10:00अगर गद्दियाँ अभी भी महत्वपूर्ण है, लालायित करती है तो अनुभव
- 10:07अधूरा रह गया है। मेरे पास एक त्यागी व्यक्ति आ गए,
- 10:17अपने त्याग की बताने लगे। मैंने बहुत त्याग किया, मैंने
- 10:23बहुत त्याग किया, मैंने बहुत दान किया।
- 10:25मैं रोज़ ये दान करता हूँ मैं वो दान करता हूँ, मैं ये कुछ छोड़ के
- 10:30आ गया। मैं साधु बन गया, मैं अक्सर मंदिर
- 10:36में जाया करता था, वह रो रो जे नित्य नई संत जन मुझे मिला करते
- 10:42थे और आपने अपने अनुभव मुझे बताया करते थे।
- 10:49ऐसे संत भी आ जाते वो जो बहुत कुछ त्याग करके आए थे, मैं उनसे पूछता
- 10:57क्या आपका परिचय तो वो बताते कि मेरे परचा मैं फलां शहर से आया
- 11:02हूँ और देखिए परिचय उनका मैं फलां शहर से आया हूँ।
- 11:11मेरे पास तीन कोठियां थी कारोबार बहुत बढ़िया था इंडस्ट्रियलिस्ट
- 11:17था, पत्नी थी, बच्चे थे, लेकिन सब कुछ लात मार के आ गया।
- 11:29काहे को परमात्मा को पाने के लिए तो ये व्यक्ति आ गया है परमात्मा
- 11:39को पाने के लिए, संसार के कोठियों को, इंडस्ट्रीज को पत्नी को।
- 11:48बच्चों को धन को सम्पदा को हिरे जोहरातों को स्वर्ण आभूषणों को
- 11:55लात मारके एक संत ऐसे मेरे पास है।
- 12:04मैंने कहा संत जी वापस लौट जाओ तो क्या?
- 12:08मेरा लक्ष्य मैंने कहा, आप कुछ बड़ी चीज़ पाने के लिए आए हो,
- 12:15छोटी चीजों का त्याग करते हैं और वो छोटी चीजें त्याग हुई नहीं है
- 12:23अगर सच में त्याग हो गई होती। तो बड़ी चीजें पाने के अधिकारी
- 12:28तुम हो गए होते। बुद्ध की तरह लात लग गई होती कपिल
- 12:34वस्तु को और फिर से वहाँ गए तो सिंहासन पे नहीं बैठे क्योंकि एक
- 12:40बार लात लग गई तो लग गई, ठुकरा दिया।
- 12:45ठुकरा दिया। जानबूझ के नहीं ठुकराया ठुकराना
- 12:50भीतर के त्याग से आया थोपा हुआ त्याग नहीं था, फला हुआ, त्याग
- 12:56था, फलीभूत हुआ त्याग था, ये भोग से आया हुआ त्याग था।
- 13:05तो मैंने उस संत से कहा कि संत जी लौट जाओ, बहुत धनवान थे, आज गरीब
- 13:17गरीब हो गए हो, जानबूझ के लौट जाओ।
- 13:22क्योंकि अभी जिन जिन चीजों को छोड़ के आए हो वो तुम्हे याद है।
- 13:26बुद्ध ने कभी नहीं कहा, मैंने कपिलवस्तु को छोड़ा, बुद्ध ने कभी
- 13:33नहीं कहा कि मैंने कपिलवस्तु को लात मारी।
- 13:41लेकिन लात लग गई। देखते हो बुध रातों रात भागे, रात
- 13:50को दबे पांव भागे, अभी 6 दिन का बच्चा था, राहुल उसका मुख देखा
- 13:58यशोदरा को सोए हुए देखा? और ऐसा भागा जैसे चोर चोरी करके
- 14:04भागता है। इसका भाग देखिए इसके सही लात लगी
- 14:10है ठिकाने पे ये कपल वस्तु के सिंहासन पे लात लगी है।
- 14:19ये थोपी गई लात नहीं है, ये लगी हुई लात है, भीतर से त्याग है,
- 14:23थोपा नहीं जाता। बच्चे को देखा और चुपचाप अपने
- 14:33सारथी से कहा कि चलो बांधो घोड़े। और सारथी की हिम्मत न पड़ी कि
- 14:44बुद्ध को कह सके कहाँ? राजकुमार था रथ, तैयार किया घोड़ा
- 14:53बांधा रथ चराया चल पड़ा। जैसे ही कपल वस्तु के साम्राज्य
- 15:01की सीमा समाप्त हुई तो बुध वहाँ से उतर गए।
- 15:05सारथी से बोले सारथी अब तुम चले जाओ बस।
- 15:15सार्थ है तो बहुत हैरान हुआ हक्का वक्का रह गया राजकुमार तुम्हें
- 15:26छोड़ के कहाँ जाऊं ऐसी रात गहरी रात और तुम अकेले।
- 15:35भियावान जंगल में यहाँ से मुझे वापस किए जा रहे हो अकेले कहाँ
- 15:41जाओगे मेरे साथ रथ पे आए हो मैं जिम्मेवार हूँ तुम्हारा मुझको सजा
- 15:51दे देंगे मुझको लटका देंगे वो। सुधोधन मुझसे पूछेंगे कहाँ लेके
- 15:58गए, कहाँ छोड़ के आए मेरे पुत्र को मेरे राज्य का अधिकारी कहाँ
- 16:06लूटा दिया तुमने कहाँ बाहर के गिरा के आए हो बताओ वो रात को
- 16:12लेके गए थे। सन्नाटे में कहाँ छोड़ के मेरे
- 16:19ऊपर अपराध लगेगा, मुझे मृत्युदंड मिलेगा राजकुमार मैं आपके पांव
- 16:25परता हूँ, लौट चलो, लेकिन। बुद्ध का त्याग बाहर से नहीं आया
- 16:37था, बुद्ध का जाग भीतर से आया था तो उसने कहा सारथी अपने रथ में एक
- 16:51कैंची पड़ी है, उसको निकालो। कांपते हाथ उसने केंची निकाली।
- 17:00क्या करू? राजकुमार मेरे बाल काट लो, बाल
- 17:07काट लो क्यों ये इतने सुन्दर बाल? सुनहरी बार गोंगराले सुनहरी बार
- 17:19बुध के बड़े सुंदर बाल थे। बुध के बाल बहुत ही सुंदर बाल थे।
- 17:28कंदिका काहे को राजकुमार ये बाल में क्यों काटूं?
- 17:32बड़े प्यारे लगती हैं तुम्हारे कहते नहीं काटो और इसको जाके मेरे
- 17:38पिता के चरणों में रख देना कहना तुम्हारे पुत्र ने तुम्हारे लिए
- 17:44सौगात भेजी है, अब ये राज़ करेंगे।
- 17:52मैं किसी और देश का वासी हो गया, वहाँ जाने तो मुझे फिर कभी आऊंगा।
- 17:57लौट के अगर मेरा लक्ष्य पूरा हो गया, सिर्फ ये लक्ष्य निभाने के
- 18:02लिए आये थे। लक्ष्य पूरा होने के बाद दिया गया
- 18:06वचन निभाने के लिए आये थे। लक्ष्य पूरा हो गया तो आज 2 दिन
- 18:12से मिल के आएँगे। आज यशोधरा से मिल के आएँगे अपने
- 18:18बच्चे से मिल के आएँगे आज जब सारी सृष्टि।
- 18:28इनकी संतान हो गई। आज चले हैं मिलने उनसे जो वचन
- 18:35दिया था बिछुड़ते वक्त कपिल वस्तु को छोड़ते वक्त उसकी सीमा को
- 18:43लांघते वक्त। तो सारथी तो कापा कहता नहीं ऐसे
- 18:50सोनी जैसे बाल मैं तो ना काट पाऊंगा।
- 18:53राजकुमार ये आप क्या कर रहे हो? इतने प्यारे बाल मुझे काटने का
- 18:59आदेश मुझसे न कट पाए। राजकुमार ने खुद ही कैंची पकड़ी
- 19:06और अपने बाल काट लिए, वो केस काट के उसको दे दिए कि जाओ अब तुम्हे
- 19:12कोई फांसी नहीं लगाएगा, उनसे बोल दे ना की ये मेरी ही चिट्ठी है,
- 19:21मैं खुशी से जा रहा हूँ। अपने बाल काट के तुम्हें चिट्ठी
- 19:25के रूप में दे दिए है जाके मेरे पिता के पवन में रख देना क्या अब
- 19:30ये राज्य करेंगे? अब सिद्धार्थ राज्य न कर पाएगा?
- 19:41सारथी तो रोने लगा। अँधेरी रात और ऐसा दृश्य और ऐसा
- 19:49प्यारा भक्ति और इतनी शानू शौकत के छोड़ के जा रहा है।
- 19:57उसके त्याग को देखकर सारथी जार जार रोया।
- 20:06उसके पांव में गिड़गिड़ाया, सिर रख के रोया मत जाओ राजकुमार, इतना
- 20:13कुछ त्याग के जाने को तुम्हारा मन कैसे किये है?
- 20:21तो बुध बोले कि तुम्हारे लिए ये कीमती है।
- 20:27मेरे लिए अब इनकी कोई कीमत नहीं है।
- 20:31मेरे लिए ये व्यर्थ हो गया है। तुम्हारे लिए अभी कीमत है, मैं
- 20:36मानता हूँ और मैं जानता भी हूँ। लेकिन मेरे लिए आज ये व्यर्थ हो
- 20:41गए हैं। तुम इनको ले जाओ और तुम चले जाओ,
- 20:46तुम्हे कोई प्रताड़ित नहीं करेगा। ये था त्याग जो भीतर से हुआ था।
- 20:59और उसी त्याग की बात मैं करता हूँ।
- 21:04ये पका हुआ आम का फल है, ये गिरेगा 1 दिन गिरेगा और जल्दी ही
- 21:12गिर गया, छः वर्ष में गिर गया। ज्यादा देर न लगे महावीर 12 साल
- 21:22में पके खुद 6 साल में पके ये भोग से आया हुआ पक के आया हुआ फल गिर
- 21:37गया। खुद से घर क्या तोड़ना नहीं पड़ा।
- 21:47खट्टी अब भी नहीं तोड़नी पड़ी पका फल, नहीं तोड़ना पड़ा खुद से जब
- 21:54परिपूर्ण अवस्था में फल पक गया तो टूट के जमीन पे गिर गया।
- 22:00तीसरी अवस्था फल पक भी जाए फिर भी मत तोड़ना।
- 22:07कुछ न कुछ अभी बाकी है जो स्वत से ही नहीं गिरा फल कुछ है अभी बाकी
- 22:19सो पके हुए फल को भी मत तोड़ना। अभी कुछ शेष है जो चुपटे रहना
- 22:27चाहता है वृक्ष के साथ बड़ी बारीक बात है इसको गौर से समझ लेना मैं
- 22:36कहता हूँ इतना भोगों की भोगी त्याग बन जाए।
- 22:42आम खट्टा भी तोड़ सकते हो क्या? मुसीबत है लेकिन खट्टा आम पक जाए
- 22:53फिर भी मत तोड़ लो उसको अपनी चरम परनीति को उपलब्ध होने देना।
- 23:00और खुद से पका हुआ फल गिर जाने देना, पका हुआ फल ठहनी को छोड़ ही
- 23:08देगा। पका हुआ फल ठहनी को खुद ब खुद
- 23:15छोड़ देगा, छोड़ना नहीं पड़ेगा। हद तपे सो ओलिया, जिसने भोग की
- 23:28अभी सार्थकता पाली हुई है, भोग में कुछ है?
- 23:36रह रह के मन को तड़पाई चली जाती है अभी गरीब हो अभी तो छोड़ ही न
- 23:44पाओ अभी छोड़ भी दोगे तो उस संत की तरह जो मुझे गिना रहा था कि
- 23:51तीन कोठियां छोड़ के आया हूँ, इंडस्ट्रियलिस्ट हूँ।
- 23:55व्यापार चलता छोड़ के आया हूँ पत्नी छोड़ के आया हूँ बच्चे छोड़
- 23:59के आया हूँ तेरे जोहरात स्वर्णभूषण छोड़ के आया हूँ,
- 24:02बिल्कुल वैसे ही हो जाओगे, लात लगनी नहीं, सही जगह पे वापस उड़ना
- 24:09पड़ेगा। ये त्याग परमात्मा तक ना ले जा
- 24:14पाव क्योंकि कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ क्रिंगनेस रह गई है अभी
- 24:22चिपकाहट बाकी है चाहे कितना ही लगे, फल टूट गया।
- 24:34बिना पका हुआ दिखे तो वो अभी बाकी कुछ साथ लेके टूटा है।
- 24:40ये बात ध्यान में रख लेना तुम हमेशा त्यागों से ही व्यक्ति को
- 24:48तौला करते हो। कितना छोड़ के आया है और बुद्ध
- 24:53कभी त्यागों से नहीं तुला करते हैं जो त्यागों से तुला करते हैं
- 25:02कि मैं इतना कुछ छोड़ के आया हूँ, वो छोड़ा गया नहीं होता सत्य में।
- 25:09क्योंकि अगर तुम्हारी स्मृति पे छोड़ने की लकीर अभी तक कायम है तो
- 25:15कहाँ छूटा है? लकीर कहाँ बनेगी अगर सत्य में
- 25:22छूटेगा इसको आप ऐसे समझिएगा। आप रोज़ मल त्याग करते हैं, पसीना
- 25:34त्याग करते हैं, थूक, बलगम त्याग करते हैं तो कभी आपने गुण गान
- 25:41किया कि मैंने मूत्र मल फूंक? त्याग करके आया क्यों?
- 25:55क्योंकि वो रखने योग्य ही नहीं था।
- 25:59मल त्याग ने योग्य था मूत्र त्याग ने योग्य था बलगम खखार।
- 26:08थूक त्याग नहीं थूक दिया तो ये क्या?
- 26:13त्याग की श्रेणियों में इनकी किताबें लिखते फिर हो गए कि मैंने
- 26:18ये कुछ त्याग और रोज़ त्यागा। मल को तो आप रोज़ त्यागते हो?
- 26:25तो जिसके लिए अभी आपके कीमती हीरे लोष्ठवत नहीं हो गए हैं।
- 26:35जैसे रावण ने लिखा अपने शिव तांडव स्तोत्र में दृष्ट रत्न लोष्ठियों
- 26:41सुहर्द पक्षियों। त्रिनार विंध्यचक्षुसो प्रजामही
- 26:47महिन्द्र समय प्रवृत्त के कदासुदा शिवम् भजा में हम शिव का स्वरूप
- 26:55होने के लिए आपके हीरे जोरात लोष्ठ व्रत होने ही चाहिए।
- 27:07और उस त्याग के लकीर मन में खींची रहनी नहीं चाहिए।
- 27:13मित्र और शत्रु समान दिखने चाहिए। सुहर्द पक्ष पक्षियों त्रिनार,
- 27:22विन्ध्य जक्षशु, प्रजा महेंद्र उसके लिए प्रजा और राजा समान हो
- 27:32गया और फिर शेव की तरफ। अगर मुख हो जाए समह गया कदा सदा
- 27:43शिवम् प्रजाम्य समप्रवृत्ति फिर शिव की तरफ मुखड़ा हो जाए तो सही
- 27:54त्याग। परमात्मा को ढूंढने चले हो तो इन
- 27:59लक्षणों को देख लेना अनीता बहु संसार से भाग के आए हुए कहलाओ गए।
- 28:09वो भिक्षा भी क्या भिक्षा हुई जीसको छोड़ के राज़ के ऊपर द्वार
- 28:14से लूटना पड़ा। बुद्ध का बिल वस्तु आए बिलकुल आए
- 28:23लेकिन दास सिंह का शीन पे नहीं बैठे बैठ सकते थे, उनका अधिकार
- 28:27था। बच्चा अभी छोटा था, अभी छह सात
- 28:32वर्ष का बच्चा था। राहुल अभी राज्य संभालने के योग्य
- 28:38नहीं हो रहा था। सुधोधन तैयार थे, उम्मीद रखे थे,
- 28:46कह नहीं पा रहे थे कि संभालो, अपना राज्य संभालो, तुम्हारा
- 28:51लक्ष्य पूरा हुआ। नहीं बैठे।
- 28:57ये था त्याग और ये त्याग भी था और दूसरी चीज़ को भी इंगित कर रहा था
- 29:05इंगित ही नहीं कर रहा था स्टेम्प लगा रहा था, दूसरी क्या चीज़ थी,
- 29:09जिसपे स्टेम्प लगा रहा था। ये राज़ को ना भोगना राज़ पे ना
- 29:14बैठना, अपने अधिकार को ग्रहण ना करना किस चीज़ की तरफ इशारा कर
- 29:20रहा था? देश को कुछ इस राज्य से कहीं
- 29:28ज्यादा विशाल राज्य मिल गया है। जिसे ईसा कहते हैं, ओनली दे विल
- 29:34एंटर इन मैं गॉड्स किंगडम मेरे परमात्मा के राज्य में हूँ विल बी
- 29:40इनोसेंट जस्ट लाइक ए चाय मेरे परमात्मा के साम्राज्य में सिर्फ
- 29:45वो ही व्यक्ति प्रवेश कर पाएंगे जो बच्चों के समान।
- 29:49मासूम हो गए मासूम ये दूसरी तरफ भी इशारा कर पाए कि इन्होंने वो
- 29:59विशाल साम्राज्य का दर्शन कर लिया है।
- 30:02उस विशाल साम्राज्य के मालिक हो गए हैं।
- 30:05इसीलिए क्षुद्र सिंहासन इसको विराट नहीं दिखता है।
- 30:09विराट के आगे क्षुद्र दिखाई पड़ता है ये कपिल वस्तु का राज्य?
- 30:18इन्होंने जो अपना साम्राज्य देख लिया है, जीस साम्राज्य में
- 30:23प्रवेश पाए है उससे कहीं ज्यादा क्षुद्र दिखाई पड़ता है।
- 30:33इसलिए उसके ऊपर बैठना मूर्खता के सिवा और कुछ भी प्रतीत नहीं होता
- 30:39था बुद्ध को इसलिए वो उस गद्दी पे ना बैठ सके।
- 30:45उन्होंने कहा नहीं। इसके ऊपर बैठ के मैं बांट न
- 30:52पाऊंगा, जो मैं बांटना चाहता हूँ। मैंने इतना कमा लिया है कि सारी
- 30:58जिंदगी अब लुटाने में बस सिर्फ लौटाने में आप राज्य कीजिए।
- 31:11यशोदरा से कहा कि मैंने पाया मेरे साथ चलना चाहती है तू चलो यशोदरा
- 31:22मान गई यशोदरा बुद्ध के साथ चली। उसके जीवन संगिनी बन के रहे और
- 31:41सारी उम्र भिक्षा मांग के खातिर है।
- 31:44देखिये एक राजा और एक रानी। कितनी सुंदर कहानी?
- 31:52राजा ने भी भिक्षा मांग के खाया। रानी ने भी राजा के संग भिक्षा
- 31:58मांग के खाया। सिर्फ बुद्धि जी लिए आए थे, मैं
- 32:06तुम्हें त्याग गया था। तुम ऐसा मत समझना, मैं तुम्हें ले
- 32:12नहीं आया हूँ क्योंकि कुछ मैंने ऐसा पाया तो मैं चाहता हूँ कि तुम
- 32:22भी पा लो, तुम मेरी जीवन संघानी हो।
- 32:27अब अनुभव संगनी भी बन जाओ। मेरे अनुभव का भी तुम संग मान लो,
- 32:34तुम उस आनंद विराट का आनंद भी चख लो गृहस्थ का सुख चखा मेरे साथ।
- 32:45अब विराट का सुख भी चक्ख इसलिए आया तो मैं लेने आया चलोगे?
- 32:53यशोत्रा क्षण भर भी न सोच पाए क्षत्रानी निश्चित क्षत्रानी थी
- 33:04चल पड़े। ये होते हैं शत्रणियों के कलेजे
- 33:13और जब बुद्ध यशोदरा के पास आए तो यशोदरा भरी पड़ी थी।
- 33:21बहुत उ लंबे ताने दिए। मुझे छोड़ के भाग गए तुम्हें मुझ
- 33:27पर विश्वास नहीं था मुझसे आज्ञा लेकर तुम चले जाते तुम्हें
- 33:33तुम्हें कौन सा रोकते? अरे हम वो छत्रानियां होती हैं जो
- 33:39तुम्हें वीरगति को प्राप्त होने के लिए तलवार देखकर खुद तिलक करके
- 33:45तुम्हारे माथे पे विदा किया करती है कि जाओ शहीद हो जाओ या जीत के
- 33:50आओ मेरे भीतर साक्षरानी का कलिजा है तो तुम अगर युद्ध के लिए भी
- 33:59जाते तो मैं तुम्हें अपने हाथ से तलवा देती और तिलक करती के जाओ।
- 34:04युद्ध में या वीरगति को प्राप्त हो जाना या जीत के आना, अनंत मुझे
- 34:10मुख्यमंत्र दिखाना सो अगर तुम विराट की परतीति पे चले थे।
- 34:24तो मुझसे आज्ञा ले लेते, मैं तुम्हे रोकती थी, नहीं मैं तुम्हे
- 34:29कभी ना रोक पाती, मैं तुम्हे शहर से जाने की स्वीकृति दे देती, मैं
- 34:35तुम्हे तिलक करके भेजती, बिल्कुल उसी तरह जीस तरह तुम युद्ध भूमि
- 34:41में जाते। अपने हाथ से तलवार सौंपती और अपने
- 34:45हाथ से आज अगर तुम ईश्वर को पाने के लिए उस राह पे चलते, तो अपने
- 34:51हाथ से भिक्षा पत्र पकड़ाते की ये लो भिक्षा पत्र ले जाओ।
- 34:55जाओ विराट की तरफ जाओ, मुझे कोई एतराज नहीं।
- 35:03मेरी तरफ से तो वीर भूमि में युद्ध भूमि में गए या साधना भूमि
- 35:11में गए, मेरे लिए तो गए। और भेजने की कला में बखूबी जानती
- 35:18थी। मैं शतरणी का हृदय कलेजा रखती
- 35:21हूँ, मुझसे पीछे पूछ लिया होता, ऐसे चोरों की भांति भागने की
- 35:26आवश्यकता ही क्या थी? और बुद्ध को थोड़ी पहली बार लज्जा
- 35:32आई। उस क्षत्रानी के शब्द सुन के
- 35:37बुद्ध की पहली बार ले जाई के ठीक कह रही है।
- 35:44पुष्प के भी चला जाता तो मुझे इंकार न करती।
- 35:51और अब वो तो कह रहे हैं इस होत्रा से चलोगे मेरे साथ मैंने पा लिया
- 35:55है, बहुत आनंद है, हमने गृहस्थी का आनंद साथ साथ माना तो विराट का
- 36:06आनंद मेरे साथ लेना ना चाहोगी, ये श्रोत्रा झट से मान गई।
- 36:12और उसके साथ चल पड़े और सारी उम्र बुद्ध के संग बिदादी भिक्षुणी
- 36:21बनते। ऐसी कहानियों से भरा पड़ा है
- 36:28हमारा इतिहास। यह त्याग आया था भोग से ईशा वश
- 36:41में दम सर्वम यत किंच जगत या आम जगत ये तो एक सत्य है के ईश्वर स
- 36:46जगत के कण कण में व्याप्त है। दूसरा क्या कहा है तेन तग तेन
- 36:51भुंजित मा कृतः कश्यस वृद्ध। नम।
- 36:58इसका अर्थ समझे जिन्होंने भोंका भोग के पका पक के गिरा वो लोभ कर
- 37:10ना पाएंगे। इन्होंने क्या कहा है आगे चल के?
- 37:14तेन तेन भूँजी था माग्रधाम। अब अर्थ करने वाले क्या कहते हैं?
- 37:20लोभ मत करो नहीं पका हुआ फल लोभ कर ही ना पाएगा, क्योंकि लोभ करने
- 37:27को और कुछ बाकी रह ही क्या गया है?
- 37:29पाने को कुछ हुआ ही रह ही नहीं। पाने को कुछ बचा ही नहीं इतना पा
- 37:36लिया कि ठहनी को छोड़ दिया गया। प्राकृतिक रूप से टहनी छूट गई।
- 37:48अभी लोभ करने को कुछ बाकी रहेगा, लेकिन तुम्हारी।
- 37:53धर्मशास्त्र के तो इसका अर्थ ऐसा समझा रहे हैं।
- 37:58लोभ मत करो नहीं लोभ कर ही न पाओगे कर पाओगे ज़रा सोचो पक के
- 38:09गिरे हो। प्राकृतिक रूप से घिरे हो, टूट के
- 38:15गिरे हो तो और भी लोग बाकी रह जाएगा क्या?
- 38:20यही तो मैं कहता था कि अगर फल पका हुआ लगे भी तो भी उसको तोड़ मत
- 38:25लेना। तुम्हें बहुत बार लगेगा कि हम पक
- 38:30गए। लेकिन देखना, टोल मत लेना, गिरने
- 38:34देना और वो गिरने का मज़ा ही कुछ और होता है।
- 38:37तभी तो वह बनाना कहते हैं कि कोटिन में कोई एक चलत है कोटिन
- 38:42चलत एक पहुँचजत है ये जो एक स्रोत से गिरेगा उससे पहले भी बड़ा मन
- 38:48करेगा तुम्हारा कि छोड़ दे पक गए। अब शांति भंग नहीं होती, अब थूक
- 38:54जाते हैं लोग, लेकिन शांति भंग नहीं होती, गाली निकाल देते हैं,
- 39:00लेकिन शांति भंग नहीं होती, लेकिन नहीं कहा तुम अभी थूक लेते हो,
- 39:05अगर किसी ने कुछ कहा तो उसके तुम पैरेलल बिठा लेते हो।
- 39:09बात? भीतर से रंग उठे ही ना वो है
- 39:18त्याग। लोभ उठेगा ही नहीं।
- 39:21माग्रधा कश्यसब धन लोभ मत करने। ये शब्द अर्थ नहीं है, इसका लोभ
- 39:33होगा ही नहीं, ये है अर्थ इसका लोभ पैदा ही नहीं होगा मेरा सोचिए
- 39:40बिलकुल पक के खुद से प्राकृतिक रूप से घिरा हुआ फल अभी कुछ लोभ
- 39:48बाकी रहेगा पकने को। नहीं पूरा पूरा पक गया है।
- 39:54सब कुछ पा लिया है। रस तो उसकी छाल से बाहर टपकने लग
- 39:59गया है। सजा और क्या होगा?
- 40:01करुणा तो झलकने लग गई है। अब वो करुणा को बांटने में लगेगा
- 40:06या के लोभ को पाने में लगेगा। करुणा को बांटने में लगेगा करुणा
- 40:12वश बांटने में लगेगा। लोभ वश पाने में नहीं लगेगा लोभ
- 40:18मत करो। इसका अर्थ क्या है कि अभी लोभ कर
- 40:22सकते हो, लोभ कर ही ना सको? इस स्थिति में आना है।
- 40:32अब इसका पूरा अर्थ ईसा वास में दम सर्वम जगत कंच जगत याम जगत ईश्वर
- 40:38इस जगत के कण कण में व्याप्त है ये तो एक सत्य की बात कह दी अगला
- 40:43शब्द बोला है तेन तक तेन भुंज था। जिन्होंने भोंगा उन्होंने तागा और
- 40:48कैसे तागा मागृद कसस व्यथानम जब लोभ पाने का वाकई न रहे तब अपने
- 40:58आपको पका हुआ जानवों और उसका लक्षण क्या होगा?
- 41:04कि आप टूट के खुद ब खुद उस टहनी से वृक्ष से टूट के नीचे गिर
- 41:10पड़ोगे धरा पे ये है इसका सही सही अर्थ दूसरे शब्दों में कबीर के
- 41:19अर्थों में से समझिए। कबीर कहते हैं हद तपे सो ओलिया,
- 41:31गरीब हो अबे अभी मत छोड़ना, कृपा कर बने रहना संसार हद।
- 41:40तपेशो ओह लिया इच्छा है पानी की अभी संसार में बने रहना बेहद
- 41:47तपेशो पीर आ गया है, कमा लिया है उसको भोगना अमीर हो गया लेकिन
- 41:54त्याग नहीं हो गया। त्याग नहीं आया संसार से टूट के।
- 41:59गिरे नहीं हो नीचे बेहद टपे सो पीर आगे अमीरी को भोगो, खूब खूब
- 42:11भोगो, पूरे पको उस आम की तरह हद बेहद दोनों टपे।
- 42:19अब क्या होगा? उस अवस्था में आ गया आम जब खुशबू
- 42:23बुखेरने लगा जब उसकी रस धार भीतर का मीठा रस बाढ़ से टपकने लगा।
- 42:29अभी कभी आप पूरे पके हुए आम को देखना।
- 42:34जो खुद से घ्राहू उसकी छाल के ऊपर से आपको मीठी मीठी चीज़ दिखाई
- 42:39पड़ेगी। टपकती हुई वो करुणा बस टपक रही है
- 42:43क्योंकि भीतर समाने को कुछ रहा ही नहीं।
- 42:48इतना घड़ा भर गया इतनी गागर भर गई के भीतर समाने को अब कुछ रहा ही
- 42:53नहीं एक बूंद भी नहीं समा सकते तो वो बिखरेगी बाहर बाहर बिखरेगी
- 42:59सुगंध बिखरेगी ये आप जो प्रवचन कर रहे हो, जो बांट रहे हो ये बांटना
- 43:05नहीं। बांटना जो नहीं पड़ता, जो बंट ही
- 43:10जाया करता है फूल कभी खुशबू को बांटता है क्या नहीं खुशबू को
- 43:17बंटा करती है फूल खुशबू को जानबूझ के नहीं बांटता।
- 43:25कि तुम आ गए हो, तुम्हें थोड़ी सी सुगंध बांट दो, ऐसा नहीं होता है।
- 43:30फूल से सुगंध बटा करती है कोई भी ले ले कोई भी नशा पुटों को खोल के
- 43:39आ जाये और सुगंध का मान ले आनंद। फूल की खुश मुँह बता करती है।
- 43:51ऐसे ही आनंद जब भीतर भर जाया करता है गागर में।
- 43:58तो छलका करता है वो बंटा करता है उसको करूणावश बटना कह लो उसको
- 44:06सहतह से बटना कह लो उसको बटने की स्वाभाविक प्रक्रिया कह लो, कुछ
- 44:12भी कह लो नाम आपका दिन आपके शब्द हैं।
- 44:18स्वाभाविक रूप से बड़ा करता है हद टपे सो बोलिया बेहद टपे सो पीर हद
- 44:26बेहद दोनों टपे ताकू नाम फकीर फकीर उसको कहते है झोला छाप
- 44:33फकीरों की मैं बात नहीं करता। फकीर से क्या आपने पूछा की फकीर
- 44:41कौन करता है? ये होता है फकीर जो खुद से पक जाए
- 44:46पक के टहनी से टूट पड़े नीचे उसके वितरण लोभ जग ही नहीं सकता, लोभ
- 44:53मत करो। ये तो तुम्हारी कमेंट हो गई ये तो
- 44:58तुमने थोप न सीखा दिया गोबर के ऊपर सैंट छिड़क उस सैंट की खुशबू
- 45:08बाहर से ले लगे कि गोबर खुशबू दा है नहीं।
- 45:12थोड़ा सा उसको देखो, टटोल के देखो, खिलार दो, इस गोबर को भीतर
- 45:16से बंद हुआ है, मल की तरह त्याग दिया जाए, शरीर के द्वारा खुद से
- 45:23गिर पड़े फल टूट के मैंने बहुत सी उदाहरण दिए हैं।
- 45:27आपको किसी को भी समझ लेना जो भी आपकी समझ में आए।
- 45:33किसी भी दिशा से समझ लो जो भी आपकी समझ में आई और तीसरा आपने
- 45:39पूछा है मानगो लागो मेरो राम फकीरी में और जब फकीरी में फकीरी
- 45:46में ही मन लगेगा तो और कहाँ लगेगा?
- 45:50फकीरी में ही तो मन लगता है, लगता है का अर्थ कह समत्यु लगता का है?
- 46:01अर्थ ये कि मन डूब जाता है उसमें जो सरस है।
- 46:10जो रस से परिपूर्ण है रसो वैसा जिसे उपनिश्चित कहते हैं वो रस
- 46:17रूप है, उसमें तुम्हारा मन खो जाता है, उसमें तुम्हारा मन विलीन
- 46:22हो जाता है, उसमें मन अपना अस्तित्व खो देता है।
- 46:26उसमें मन अपना अहम खो देता है, उसमें मन अपना अहम खुदी का होना
- 46:33खो देता है, उसमें वेलिन हो जाता है, उसमें एक आकार हो जाता है, उस
- 46:45एक होने की प्रक्रिया है जब वो कहता है क्नॉइस।
- 46:51वेदका ऋषि एको अहम द्वितीय नास्त सिर्फ मैं ही मैं हूँ दूसरा कोई
- 46:59नहीं एम आत्म प्रह्म मैं ही आत्म स्वरूप प्रमुख।
- 47:14आत्मा परमात्मा में कोई भेद नहीं है।
- 47:18मेरी आत्मा ही परमात्मा है अहम् ब्रह्मस्प मैं ही तो ब्रह्मा हूँ
- 47:28अनल हक। देखिये जो नैत और जो नैत का जो
- 47:37शिष्य था मयंसूर दोनों को एक ही अनुभव हुआ है और मयंसूर जो नैत का
- 47:45शिष्य था, उसने घोषणा कर दी अनलहक।
- 47:50और इस्लाम में से स्वीकृति नहीं। इस्लाम नहीं की, तुम परमात्मा हो
- 48:03और राजा ने जब ये उदहोश सुना, बड़ा दुखित हुआ, क्योंकि इस्लामिक
- 48:09देश पे राज्य का शासक था। इस्लामिक हिसाब से चला रहा था और
- 48:15इस्लाम में इस बात की आज्ञा नहीं है कि तुम कहो कि मैं ब्रह्म हूँ
- 48:21तो उसने उसके गुरु के पास संदेश भेजा।
- 48:23जुनैद के पास और जुनैद को भी वही हुआ था जो मंसूर को हुआ और जुनैद
- 48:31ने बुलाया। बंसूर को कह रहे मूर्ख बोलना बंद
- 48:35कर दे, क्या मैं नहीं जानता हूँ? मैंने ही तो तुझे बताया है रास्ता
- 48:40तुम पहुँच गए हो, मैं भी तो घोषणा कर सकता हूँ, लेकिन इन मूर्खों के
- 48:45आगे घोषणा मत कर ये तुम्हें मार देंगे।
- 48:52मेरे पास संदेश आया है राजा का मेरा मित्र है, इसलिए मुझे संदेश
- 48:57भेजा है कि समझा ले उस मुँह को उस बेवकूफ को पगले को, के मत बोले,
- 49:02बोलना बंद कर दे ना लक तो बेटा। मत कहें, इस आवाज को यही रहने दे,
- 49:15बोलना बंद कर दे तो मंसूर का जवाब बहुत बढ़िया था, जो नेट उसका
- 49:21प्रतिकार न कर सका, जो नेट को चुप रहना पड़ा।
- 49:26पहली बार गुरु को शिष्य के आगे चुप रहना पड़ा।
- 49:31इससे पहले तो सदा शीशी ही चुप रहा था।
- 49:34गुरु के सामने सदा मंसूर के सामने जो नैत ही छाया रहता था, उसकी
- 49:42आज्ञा का पालन करना पड़ता था मंसूर को, लेकिन आज पहली बार।
- 49:49गुरु को चुप होना पड़ा, जुनैद को चुप होना पड़ा।
- 49:53मंसूर के आगे मंसूर ने बढ़ाया ऐसा शब्द, कह दिया प्यारा शब्द कह
- 49:57दिया कि जुनैद को कोई जवाब ही नहीं आया।
- 50:01मंसूर कहता कि मैं तो चुप ही हूँ, आपको पता नहीं है मैं कब से चुप
- 50:06हूँ मैं हूँ ही नहीं। मैं तो विलीन हो गया हूँ, मैं तो
- 50:12गया, अब जो बोलता है, उसको रोकूं कैसे?
- 50:17इस सागर की बाढ़ को कैसे रोकूं? वो विराट बोलना चाहता है उसको
- 50:24रोकना मेरे वश में है गुरूजी। उसने उसके पांव पकड़ लिया कि बता
- 50:28दो मुझे मैं रोक सकता हूँ, मेरे में स्मृता है इतनी और जन्नत चुप
- 50:36हो गया। जुनैद को पता था कि जब विराट की
- 50:41बाढ़ आएगी तो उसे ये रोक नहीं पाता।
- 50:47ये ठीक है भाई तो उसने उसे जाने दिया कि ठीक मैं संतुष्ट हूँ, तुम
- 50:52जा घोषणा कर उसे मृत्यु दंड दे दिया क्या?
- 51:05जुनैद उर्फ मंसूर? तो उनका अनुभव समान लेकिन अनुभव
- 51:13की जो प्रगाढ़ता से व्याख्या अलग अलग जो नैद चुप होना सीख गया,
- 51:22मंसूर बोलना सीख गया, वो बोला, करूणावश बोला।
- 51:31सुनैद करुणावश भी न बोला। इसलिए मैं कहता हूँ कि दो फकीरों
- 51:38की आपस में तुलना मत करना ज्ञान दोनों का।
- 51:47एक फकीर नहीं चाहता, वो चुप रहना चाहता है, दूसरा फकीर बोलना चाहता
- 51:52है वो बोल गया, मंसूर बोल गया, लेकिन उसके भीतर विराट ही चुप
- 51:57रहना चाहता है, जो नैद के भीतर विराट ही चुप रहना चाहता है।
- 52:03वो मनसूर के भीतर विराट बोलना चाहता है इसलिए जुनैद बोल न पाएगा
- 52:11और मनसूर चुप न रह पाएगा। ये इच्छा विराट की चल रही है,
- 52:17जुनैद और मनसूर की नहीं चल रही है इसीलिए तू बाबना ने कहा।
- 52:23कि तेरा पाना मीठा लग है, बुलवाना है बुलवा ले तेरे हाथ की कठपुतली
- 52:31नाचाना है नाचवाले नहीं नाचवाना है तो मत नाचवा लेकिन हम।
- 52:44उसके हाथ की कठपुतली नहीं होती है।
- 52:51ये जो नय जैसे मनसूर जैसे लोग तो सत्य को भी सोपन की तरह देखते हैं
- 53:01ये शंकराचार्य जैसे लोग? जो तुम्हें दिखाई पड़ता है उसको
- 53:06भी ये माया की तरह देते हैं। शर्कराचार्य कहते थे ब्रह्म सत्यम
- 53:13जगत मिथ्या जगत मिथ्या करता है कि जगत जैसा दिखता है वैसा है नहीं।
- 53:22ब्रह्म सत्य है। जगत मिथ्या है, जगत जैसा देखते हो
- 53:26वैसा है नहीं। ईश्वर चंद्र विद्यासागर बहुत बड़े
- 53:32समझदार व्यक्ति हुए। हमारे भारत में एक बार उनको एक
- 53:40नाटक। मंडली ने बना लिया अपना नाटक
- 53:43दिखाने के लिए मुख्य मेहमान के रूप में आमंत्रित किया।
- 53:48ईश्वर चंद्र विद्यासागर वहाँ चले गए।
- 53:52पहली रोह के अंदर पहली कतार के अंदर मुख्य चीफ गेस्ट के ऊपर वो
- 53:58बैठे हुए थे। उन्होंने फैसला करना था कि नाटक
- 54:04में कौन प्रथम कौन द्वितीय ये पुरस्कार बांटने थे और जज भी थे
- 54:10और सिर्फ गेस्ट भी थे। मुख्य मेहमान भी थे, निर्णायक भी
- 54:15थे। मंचन किया गया।
- 54:20उस नाटक का रात अंधेरी अमावस्या की काली रात के भीतर सन्नाटा, घोर
- 54:28सन्नाटा और ये नाटक का मंचन खेला जा रहा है।
- 54:31एक सीन आ गया वो दृश्य क्या आया? एक लड़की जा रही है बड़ी खूबसूरत
- 54:39लड़की है। जंगल में अकेली चली जा रही है
- 54:42बियाबान जंगल बीहड़ जंगल के भीतर अकेली चेली जा रही है।
- 54:47वहाँ कुछ बदमाश आ जाती है। एक बदमाश ने उस युवती को पकड़
- 54:54लिया। अवदृश्य देखने वाले बहुत से लोग
- 54:59हैं, सारी कुर्सियां भरी पड़ी हैं।
- 55:01सारा पांडा लवा लुक भरा पड़ा है, दर्शकों से और मुख्य मेहमान के
- 55:06रूप में बैठे हैं ईश्वर चंद्र विद्यासागर हमारे हिंदुस्तान के।
- 55:12बहुत से समझदार लोगों की कतारों में से प्रमुख गिने जाने वाले वो
- 55:19समझदार व्यक्ति बैठे हैं निर्णय करने के लिए निर्णायक की कुर्सी
- 55:26पे। तो ये दृश्य चल पड़ा तो वो गुंडे
- 55:37लोग उनमें से एक गुंडा उस लड़की को पकड़ लेता है बलात्कार करने के
- 55:47उद्देश्य से। उससे छेड़छाड़ करना शुरू करता है।
- 55:51लड़की अपने आप को छुड़ाने की चेष्टा करती है और वो अपना ज़ोर
- 55:55आजमाई शुरू हो जाती है और लड़की अपने आप को छुड़ाना चाहती है
- 55:58लेकिन वो उसको छोड़ता नहीं बलशाली है।
- 56:04गुंडे अक्सर बलशाली ही हुआ करते हैं।
- 56:15गुंडे अक्सर बलशाली ही हुआ करते हैं।
- 56:19बलात्कारी अक्सर बलशाली ही हुआ करते हैं।
- 56:23निर्दोष युवतियों उनके आगे हार ही जाया करती हैं।
- 56:28अक्सर बॉबी खुद को असमर्थ पा रही थी और खुद को असमर्थ होता देख वो
- 56:38चिल्ला रही थी, बेअबान जंगल में भी हर जंगल में रात्रि का वक्त है
- 56:44अकेली युवती। और गुंडे उसके साथ बलात्कार करना
- 56:49चाहते हैं। एक गुंडे ने उसको जकड़ के पकड़
- 56:52रखा है बड़ी पल के साथ और वो अपने आप को मुक्त करने के लिए हाथ पांव
- 56:57छटपटा रही है और सीखे चिल्लाए जा रही है कि बचाओ बचाओ बचाओ कोई है
- 57:04बचाओ? इतना भयावह दृश्य और रात अँधेरी
- 57:09और सन्नाटा गहरा हो बड़ा वीभस् दृश्य ईश्वर चंद्र विद्यासागर
- 57:19उनमें अपना पांव का जूता खुला। और जूता पटक के दे हमारा उस बदमाश
- 57:28के सिर के ऊपर चोर से लगा जा के बदमाश का जो रोल किरदार निभा रहा
- 57:40था उसको जाके लगा। नाटक बंद हो गया से लाए ईश्वर
- 57:51चंद्र विद्यासागर अरे तुष्ट ठहर मैं आता हूँ नाटक बंद हो गया
- 58:02ईश्वर चंद्र की भी आँखें खुली को। ये क्या हो गया?
- 58:07ये तो नाटक था तो ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या, ये तो बात खत्म हो
- 58:14गई। खुद ही प्रचार किए जाते हैं और
- 58:17खुद ही चूक गए। और उस गुंडे का रोल निभा रहे
- 58:29व्यक्ति ने उस बूट को उठाया और माथे से लका लिया, चूम लिया,
- 58:39रौशनी कर दी गई, अँधेरा मिटा दिया गया।
- 58:43नाटक हटा लिया गया, नाटक को बंद करना पड़ा।
- 58:47ईश्वर चंद्र विद्यासागर सिर नीच के खड़े तो बड़ा प्यारा शब्द बोला
- 58:58उस गुंडे का रोल निभाने वाले व्यक्ति हैं।
- 59:06विश्वचंद्र विद्या सागर से कहने लगा, प्रभु आपने अपनी जजमेंट दे
- 59:14ही दे, आपने अपना फैसला सुना ही दिया कावे नाम का अधिकारी कौन?
- 59:27बस अब आपके मुख से सुनना प्रासंगिक भी नहीं होगा और शक्ति
- 59:33भी नहीं होगा क्योंकि आपने बता दिया है ये नाटक था।
- 59:39ये भूल गए आप असलियत समझ। बैठे हमने इतना जीवंत रोल किया,
- 59:46इतना जीवंत अभिनय किया कि आप जैसा समझदार व्यक्ति को सत्य समझे,
- 59:51बैठो। ईश्वर चंद्र विद्यासागर बहुत
- 1:00:04लज्जित हुए आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।
- 1:00:14हाथ जोड़ के खड़े हो गए ईश्वर चंद्र बोले के निश्चित ही।
- 1:00:25तुम्हारे जीवंत अभिनय मेरी सुधि बुधि खत्म करती थी, मैं भूल गया
- 1:00:37था कि ये नाटक है तुमने इतनी प्रगाढ़ता से अपना नाटक का अभिनय
- 1:00:44निभाया। गुंडे का अभिनय निभाया कि मैं
- 1:00:47नाटक को सत्य समझे बैठा हूँ और मैंने कहा कि मैं न बचाऊंगा तो और
- 1:00:54कुंभ बचाएगा। इस युवती को अचानक मेरा हाथ मेरे
- 1:01:00पांव की तरफ चला गया। मैंने जूता उतारा और तुम्हारे मुख
- 1:01:03पे दे मरा। लगी होगी।
- 1:01:06क्षमा करो। उसने कहा नहीं ये तो मुझे आपने
- 1:01:12जिंदगी का एक न भूलने वाला पुरस्कार दे दिया है।
- 1:01:18उनफोरगेतबले प्राइस ऑफ मैं लाइफ ता ज़िन्दगी इस पुरस्कार को भूल न
- 1:01:27सकूंगा के ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसा महान बुद्धिमान पुरुष मेरी
- 1:01:36नृत्य शैली के अभिनय के भीतर। सुधि बुधि खो बैठा मैं पुरस्कृत
- 1:01:44हो गया प्रभु मैं पुरस्कृत हो गया ये आपका इनाम और उसने उसका बूट
- 1:01:51वापस नहीं दिया ईश्वर चंद्र विद्यासागर जो बूट फेंके थे उसके
- 1:01:57मुखड़े पे उसने वापस नहीं किया। उसने कहा बस यही मेरा इनाम है।
- 1:02:01मैं इसके अतिरिक्त कुछ इनाम नहीं मांगता हूँ और इससे बड़ा इनाम
- 1:02:05मुझे कभी मिल भी नहीं सकता और कोई दे भी नहीं पाएगा उसने सारी उम्र
- 1:02:10वह बूट उसका वापस नहीं किया आयोजकों नहीं।
- 1:02:15विद्यासागर को एक नया बोट का जोड़ा ला के दिया।
- 1:02:25आप विश्वरचंद्र विद्यासागर की तरह कितने भी विद्वान और कितने भी
- 1:02:31समयदार व्यक्ति कहलाते हो समाज में लेकिन आप मुँह रखो क्यों?
- 1:02:38क्योंकि आप। इस ड्रामा को सत्य समझ लिए हो।
- 1:02:47आप इस नाटक को सत्य समझ लिए हो, क्लिंग हो गए हो, चिप कर गए हो।
- 1:02:57इसके साथ ये। ड्रामा है।
- 1:03:01ये एक खेल है, इसको खेल की तरह खेलो और खेल की तरह देखो बस यही
- 1:03:11है कला जो मैं आपको सीखाना चाहता हूँ।
- 1:03:16जो मैं कहता हूँ के भोगने के लिए पूर्ण भोगो लेकिन जागते हुए भोगो,
- 1:03:25अब आगे की बात आखिर में बात जो मैं आपको इसका तत्व बता रहा हूँ।
- 1:03:36भोगो, ये जानते हुए भोगो के कौन भोग रहा है?
- 1:03:46अब इस अंतिम पैराग्राफ को अंतिम फिकरे को अच्छी तरह से समझ लेना।
- 1:03:54क्योंकि ये तत्व है जीसको हम मोरल कहते हैं, भोगो, जागते हुए भोगो,
- 1:04:04कौन भोग रहा है, ये जानते हुए भोगो।
- 1:04:14स्वाद लिए हो तो स्वाद जीवा को आ रहा है।
- 1:04:20सुंदर युवती को देख रहे हो सुंदर पुरुष को देख रहे हो तो ये जानते
- 1:04:27हुए कि आंखें सुंदरता को निहार रही।
- 1:04:34आँखें निहार रही हूँ मैं निहारने वाला हूँ मैं दर्शक हूँ मैं देखने
- 1:04:42वाला हूँ आँखों के द्वारा दिख रही है यह दृश्य है सुनो संगीत तो
- 1:04:55जागते हुए सुनो। क्या आप सुनने वाले हो कान्ह के
- 1:05:01द्वारा कानों को सुनाई पड़ रहा है और आप कानों को सुनाई पड़ता हुआ
- 1:05:08देख रहे हो? इस वीणा की मधुर जांकृति को आप
- 1:05:15देख रहे हो कि। ये कान सुन रहे हैं सुंदर स्वर
- 1:05:20कुक सुंदर स्वर लहरियां सुनाई पड़ी है।
- 1:05:26बोल रहे हो ये मीठे मीठे शब्द तुम्हारे कंठ से बाहर।
- 1:05:36प्रण कष्ट हो रहे हैं उन्हें देखो बोलते हुए देखो कंठ से निकलती हुई
- 1:05:42आवाज को देखो तो तुम पाओगे कि स्वाद जीवा ले रही है और तुम।
- 1:05:56जीवा को स्वाद लेते हुए देख रहे हो कान सुंदर ध्वनि को सुने जा
- 1:06:05रहे हैं, सुंदर ध्वनि को भोग रहे हैं और तुम उस भोगने वाले कान को
- 1:06:10देख रहे हो पात्र दृष्टा के। आंख सुंदर दृश्य को देख रही है और
- 1:06:20तुम उस आंख को सुंदर दृश्य को देखते हुए निहार रहे हो तुम दृश्य
- 1:06:25मुँह देखने वाले दिमाग सुंदर कल्पनाएं कर रहा है।
- 1:06:32और तुम दिमाग को सुंदर कल्पनाएं करते हुए देख रहे हो सो रहे हो तो
- 1:06:42नींद बहुत अच्छी आ रही है। तुम सोते हुए उस व्यक्ति को सुंदर
- 1:06:47नित्रा के भीतर। निद्रा मग्न हुए आनंद लिए हुए
- 1:06:54निहार रहे हो निद्रा लिए जा रहा है ये व्यक्ति ये शरीर स्वपन
- 1:07:04सुंदर आए तो देखो। के सुंदर स्वपन मनुस पटल पर
- 1:07:11फ़िल्म की तरह चले जा रहा है और तुम देखने वाले हो तुम्हारे देखने
- 1:07:21के कारण सभी होने वाली घटनाएं रिकॉर्ड होती है।
- 1:07:26अगर कोई देखने वाला न हो तो रिकॉर्डिंग भी नहीं होगी।
- 1:07:29बात समझ लेना तुम देखते हो तो रिकॉर्ड हो जाती है।
- 1:07:39अगर दर्शक होगा तो देखने की क्रिया जो दिख रहा है दृश्य वो
- 1:07:45रिकॉर्ड हो जाएगा। चाहे वो सुंदर दृश्य हो, चाहे वो
- 1:07:52सुंदर संगीत हो, चाहे वो सुंदर समैल हो।
- 1:07:56नासिका से आप फूलों के सुगंध लिया करते हो तो देखो।
- 1:08:02कि ये सुगंध नाशिका में जा रही है।
- 1:08:05नाशिका सुगंध का आनंद मान रही है और मैं उस आनंद को मानते हुए
- 1:08:11नाशिका छिद्रों को देख रहा हूँ। भोगो, किसी भी इंद्रिय के द्वारा
- 1:08:20भोग। मैं भोग से कब इंकार करता हूँ?
- 1:08:27खूब तल्लीनता के साथ भोगो और उतनी ही तल्लीनता के साथ भोगते हुए उस
- 1:08:34इंद्रियों का दर्शन करो, बस। यही है सूत्र अगर आप समझ पाओगे
- 1:08:42यद्यपि बहुत गहरा है, पूरी तल्लीनता के साथ भोंको फिर पकोगे
- 1:08:52और वो पक न मैं किसे कहता हूँ और पक के घिर न मैं किसे कहता हूँ?
- 1:08:57जीस दिन पूरी तलीनता से आपने भोगते हुए को देख लिया तो आप उससे
- 1:09:04अपने आपको अलग देख पाओगे, उसी वक्त उसी क्षण ऐट दैट वेरी मोमेंट
- 1:09:13उसी क्षण को आप पूर्ण तलीनता के साथ।
- 1:09:17भोगते हुए उस इंद्रिया को पाओगे तो आपका भ्रम मठ जाएगा कि आप हैं
- 1:09:24कौन देखने वाले या भोगने वाले? बस यही बात खत्म हो जाएगी।
- 1:09:31जीस दिन आपने उस इंद्रिया को भोग करते हुए देख लिया।
- 1:09:37पूर्णतःलीनता के साथ मज़ा उठाते हुए देख लिया और आपने अलग पाया
- 1:09:43अपने आपको और भोगने वाली इंद्रिया को अलग पाया अपने आप से बस आप
- 1:09:48दूसरे हो गए नहीं, आपका भ्रम टूट जाएगा।
- 1:09:52इसी को मैं कहता हूँ भ्रम को टूटना, पके हुए फल को टूटना, अपने
- 1:09:57आप से टूटना यही है मेरी कुल परिभाषा आपको भोग में धकेलने की।
- 1:10:09यहाँ आके भोग व्यर्थ हो जाता है कब तक भोग होगे बोलो जब इंद्रिय
- 1:10:17ही भोग रही है जीवा स्वाद ले रही है और जैसे ही गले से नीचे उतरा
- 1:10:24वो स्वादिष्ट भोजन फिर आपको पता चलता है भोजन का?
- 1:10:28फिर तो वो मल बन के ही बाहर निकलता है।
- 1:10:33फिर शरीर उस मल को त्याग देता है, उसी स्वादिष्ट खाद्यान का जीसको
- 1:10:38तुमने इतनी स्वादिष्टता से खाया जब मल बन जाता है तब आप उसको
- 1:10:44झाँकते भी नहीं हो बस वो स्वादिष्ट अन।
- 1:10:48मल की तरह जब दिखने लग जाए आपके लिए वो बेकार हो गए।
- 1:11:01आप जब अपने आपको उन भोगों को मानती हुई इंद्रियों से अलग ना
- 1:11:07देख पाओगे जब तक आप पूरे ना पक पाओगे तब तक।
- 1:11:18जब तक आप भोगती हुई इंद्रियों के साथ चिपके रहोगे कि ये मैं हूँ
- 1:11:24आँखों को सुंदर दृश्य देखते हुए आँखों से चिपक जाओगे, कानों को
- 1:11:29सुंदर संगीत सुनते हुए कानों से चिपक जाओगे।
- 1:11:33इंद्रियों को संभोग के क्षणों में आनंद लेते हुए इंद्रियों से चमक
- 1:11:37जाओगे, गुप्त इन्द्रियों से चमक जाओगे, तब तक आप अपने आप का दर्शन
- 1:11:44कर ही नहीं पाओगे। ये शिक्षण तुमने इन सभी
- 1:11:50इन्द्रियों को मज़ा लेते हुए देख लिया उसे क्षण तुम पाओगे कि ये
- 1:11:59मज़ा तो इन्द्रियों को आ रहा है, मैं तो देखने वाला हूँ कि इस
- 1:12:04इन्द्रियों को मज़ा आ रहा है, आनंद आ रहा है।
- 1:12:15बिल्कुल मूल तत्व हमारे धर्म का किसी भी धर्म में चले जाओ, यही
- 1:12:23मस्ती है, यही मज़ा है, यही आनंद है, यही शांति है।
- 1:12:33नाम चाहे कोई भी दे लो, ईश्वर कह लो अल्लाह कह लो राम कह लो रहीम
- 1:12:39कह लो ये आनंद के ही प्रय वाशी हैं, अल्लाह और राम में कोई फर्क
- 1:12:46नहीं रहता वहाँ आनंद को क्या नाम दे पाओगे तुम?
- 1:12:50खुशी का कोई नाम होता है क्या? खुशी का नाम अल्लाह के राम बताओ
- 1:12:59सुख का क्या नाम होता है सुख का नाम अल्लाह होता है के राम होता
- 1:13:06है ये बताओ। जीस शिक्षण तुमने सुख लेती हुई
- 1:13:15इन्द्रियों को अपने से जुदा पा लिया।
- 1:13:20उस शिक्षण तुम्हारे लिए भोग बेकार हो गए।
- 1:13:25फिर तुम न कह पाओगे कि हम ऐश कर लें, क्योंकि ऐश तो इन्द्रियां
- 1:13:30करती हैं। और जो ऐश इन्द्रियां करती हैं वो
- 1:13:34यहाँ दफन कर दी जाती हैं या जला दी जाती हैं या गिद्धों को खिला
- 1:13:40दी जाती हैं। वो इन्द्रियां जिन्होंने
- 1:13:44स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया, जिन्होंने।
- 1:13:49सुन्दर स्व लहरियों का कानों के द्वारा आनंद लिया, सुंदर दृश्यों
- 1:13:53का आँखों के द्वारा आनंद लिया संभोग के द्वारा इन्द्रियों के
- 1:13:57द्वारा आनंद लिया संभोग का ये इन्द्रियां तुम नहीं हो बस।
- 1:14:08यही महर्षि रमन ने कहा था हू एमआइ पहले ये देख तो लो आगे विचार कर
- 1:14:16लेना, हम फल आगे रिज़ल्ट आगे निकालेंगे, पहले तुम देखो रमन ने
- 1:14:23पहले ही प्रहार कर दिया आपके ऊपर। के स्वाद लेने से पहले मज़ा लेने
- 1:14:29से पहले किसी भी इन्द्रियां के द्वारा मज़ा लेने से पहले ये देख
- 1:14:33लो कि मज़ा तुम ले रहे हो या तुम्हारी इन्द्रियां ले रही हैं
- 1:14:39यहाँ बात खत्म हो जाएगी। अगर तुम इन्द्रियां हो तो फिर तुम
- 1:14:43मज़ा ले रहे हो। अगर तुम इन्द्रियां नहीं हो तो
- 1:14:48फिर इन्द्रियां मज़ा ले रही हैं, तुम एक मंचन हो रहा है संसार के
- 1:15:00अंदर जैसे ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने उसके साथ चिपक के उसके वचानों
- 1:15:08हेतु। उस गुंडे का रोल कर रहे उस
- 1:15:14बलात्कारी का रोल कर रहे व्यक्ति के सिर में अपना जूता पटक के मारा
- 1:15:18था। ऐसे ही तुम रिएक्शन्स किया करते
- 1:15:22हो। ये हैं तुम्हारी रिएक्शन्स और ये
- 1:15:26रिएक्शन्स मोर्चा से आया करते हैं।
- 1:15:33मोर्चा से आया करती है। तुम्हारी रिएक्शन्स जागने से
- 1:15:38अवेयरनेस से रिएक्शन नहीं आया करती यही समझा रहा था।
- 1:15:47अब इसको ठीक से समझ लो कैसे आवास में सर्वम जगत तेन तेन भूँजीथा
- 1:15:55चाहिए, समझो चाहे हद टपे सो वो लिया हद टपे सो पीर हद बेहद दोनो
- 1:16:05टपकता को नाम। यह तीसरा तो मैंने कहा कि भोगो,
- 1:16:13इतनी तल्लीनता से भोगो, खूब भोगों के पक जाओ उन भोगों से और पक के
- 1:16:19घर जाओ वो सही भोग का परिणाम त्याग।
- 1:16:26होना चाहिए थोपना नहीं चौथा मेनुड़ो लागो मेरो राम फकीरी में
- 1:16:36कब फकीर हो पाओगे जब मन फकीरी के भीतर रंग गया?
- 1:16:46उस एक के भीतर रहम गया। वो जो देखने वाला है, जो अवेयरनेस
- 1:16:54है, जो ऊर्जा अवेयर, एनर्जी अवेयरनेस।
- 1:17:03उसके भीतर आपका मन रम जाए। मन्नो लागो मेरो राम फकीर।
- 1:17:10वो होता है फकीर फकीर का कुल मत यही मतलब है और दूसरा कोई अस्त्र
- 1:17:19नहीं जो रम जाए। हम राम राम तो करते हैं लेकिन
- 1:17:23रमते कहा है। रम जाओ उस राम में उस रमने का नाम
- 1:17:35राम है। राम राम जपने की बात नहीं है।
- 1:17:42राम राम रमने की बात है। तो मरा में जाओ, उसके भीतर खप
- 1:17:47जाओ, उसके भीतर खुद को खपा दो, उसके भीतर खुद को विदा कर दो,
- 1:17:53मर्ज हो जाओ, उसमें वैलिन हो जाओ, उसमें अपना अस्तित्व खत्म कर दो,
- 1:17:59अपना अस्तित्व वैलिन कर दो उसके भीतर उसके साथ।
- 1:18:03एकाकार हो जाओ और जीस दिन तुम एकाकार हो जाओगे।
- 1:18:14उसी दिन तुम कह पाओगे अहम् ब्रह्मस्पा मैं ही हूँ।
- 1:18:27बस जिसे ढूंढ़ते फिर रहे थे वो तुम खोदी हो।
- 1:18:30कस्तूरी कुंडल बस है मृग ढूंढे बनवा कस्तूरी कुंडल बस है मृग
- 1:18:40ढूंढे बनवा ऐसे घाट में भी वह। मुर्ख जाने ना ऐसा ही तुम्हारे
- 1:18:56भीतर तुम्हारा पिया जिसे तुम ढूंढ रहे हो तुम्हारा आनंद तुम्हारी
- 1:19:04शांत कुछ भी ना दे दो तुम्हारे भीतर ही बैठा है बाहर ढूंढ ही
- 1:19:08जाते हो। दिशा अलग है, दिशा बदलो सही दिशा
- 1:19:14चुनो पहुँच जाओ उस आनंद के भीतर कस्तूरी कुंडल बस है मृगा ढूंढ है
- 1:19:26बन माँ तुम बन में ढूंढ रहे हो। तुम कुर्सियों में ढूंढ रहे हो
- 1:19:32तुम मान सम्मान में ढूंढ रहे हो तुम डॉलर में सोने की चमक में
- 1:19:38हीरे ज्वार हाथों में पांव पुजाने में लगे हो।
- 1:19:48लोग तुम्हारी जय जयकार करें, उसमें उलझे हुए हो लेकिन मेरे
- 1:19:52घटूँ है बन माँ ऐसे गाठ में भी मूरख जाने जब तक तुम जानोगे नहीं
- 1:20:00मूरख ही कहलाओगे धन्यवाद।